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हनुमान जी की जाति क्या है ?

हनुमान ब्राह्मण जाति से हैं – रामायण में कई स्थान पर उनके प्रगाढ़ पाण्डित्य पर प्रकाश डाला गया है । जब वे अशोक वाटिका पहुंचते हैं तो उनका वक्तव्य है – यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् । रावण मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ॥ अर्थात् यदि मैं संस्कृत भाषा का प्रयोग करता हूं तो सीता मां मुझे रावण समझकर भयभीत हो सकती हैं । ( संस्कृत प्रायः उच्च वर्गों की खास तौर पर ब्राह्मणों की भाषा थी)

हनुमान क्षत्रिय जाति से हैं – क्षत्रिय कौन होता है जो शौर्य प्रदर्शन करे । आपद्काल में शत्रुओं से रक्षा करे । हनुमान जब राक्षसों के विरूद्ध लड़ रहे हैं तो अपने क्षत्रियत्व गुण का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । हनुमान चालीसा में उक्त है –महावीर विक्रम बजरंगी । आगे वहीं पर कथित है कि उनके हाथ में वज्र और ध्वजा विद्यमान है और वे जनेउ भी धारण किए हैं ( हाथ वज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेउ साजै)

हनुमान वैश्य जाति से हैं – अर्थ की दृष्टि से इस शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है जिसका मूल अर्थ “बसना” होता है। कर्म सिद्धांत वर्गीकरण मे पोषण के कार्यों से जुड़े गतिविधियों को वैश्य जाति के लोग अंजाम देते हैं । इस लिहाज से हनुमान सबसे बड़े वैश्य हैं क्योंकि वे स्वयं तो बसे ही लक्ष्मण को भी बसा दिया ।( संजीवनी लाकर उन्होंने लक्ष्मण को पुनर्जीवित किया था।)

हनुमान शूद्र जाति से हैं – गीता के १८वें अध्याय में कहा गया है कि परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यपि स्वभावजम् अर्थात् सेवा व सुश्रुषा करना शूद्र का कर्तव्य है । हनुमान से बड़ा भक्त खोज पाना नामुमकिन है । वे अनवरत अपने अराध्य प्रभु राम की सेवा में निरत रहते थे ।

गौरतलब है कि वर्ण का वर्गीकरण कर्म का वर्गीकरण है, न कि मनुष्य का वर्गीकरण। प्रत्येक मनुष्य कहीं न कहीं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र स्वयं है क्योंकि इन चारों के गुण उसमें समबेत हैं । पहले समय मनुष्य जाति का एक ही वर्ण था, चार वर्ण अथवा भिन्न-भिन्न जातियों की स्थापना बाद में हुई है

एक वर्ण मिदं पूर्वं विश्वमासीद् युधिष्ठिर।

कर्म क्रिया विभेदेन चातुर्वर्ण्यम् प्रतिष्ठितम्॥

न विशेषोऽस्ति वर्णानाम् सर्व ब्राह्ममिदं जगत्। ( महाभारत )

आज के परिप्रेक्ष्य में हमें यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि वार्ता का प्रस्थान बिन्दु क्या है? क्या हनुमान को हम वर्ग विशेष के नाते पूजते हैं या उनके कर्म व गुणों के आधार पर । यदि वे नीच कुल के भी होते तो क्या हम उनके गुणों के आधार पर उन्हें समादृत नहीं करते ?

एम के पाण्डेय
रिसर्च स्कॉलर

वृक्षारोपण के इस काम को बढ़ावा दें, योगदान दें।

प्रकृति की एक ताक़त होती है, आपने भी अनुभव किया होगा कि बहुत थक करके आए हो और एक गिलास भर पानी अगर मुहँ पर छिड़क दें, तो कैसी freshness आ जाती है। बहुत थक करके आए हो, कमरे की खिड़कियाँ खोल दें, दरवाज़ा खोल दें, ताज़ा हवा की सांस ले लें – एक नयी चेतना आती है। जिन पंच महाभूतों से शरीर बना हुआ है, जब उन पंच महाभूतों से संपर्क आता है, तो अपने आप हमारे शरीर में एक नयी चेतना प्रकट होती है, एक नयी ऊर्जा प्रकट होती है। ये हम सबने अनुभव किया है, लेकिन हम उसको register नहीं करते हैं, हम उसको एक धागे में, एक सूत्र में जोड़ते नहीं हैं। इसके बाद आप ज़रूर देखना कि आपको जब-जब प्राकृतिक अवस्था से संपर्क आता होगा, आपके अन्दर एक नयी चेतना उभरती होगी और इसलिए 5 जून का प्रकृति के साथ जुड़ने का वैश्विक अभियान, हमारा स्वयं का भी अभियान बनना चाहिये। पर्यावरण की रक्षा हमारे पूर्वजों ने की, उसका कुछ लाभ हमें मिल रहा है। अगर हम रक्षा करेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को लाभ मिलेगा। वेदों में पृथ्वी और पर्यावरण को शक्ति का मूल माना गया है। हमारे वेदों में इसका वर्णन मिलता है। और अथर्ववेद तो पूरी तरह, एक प्रकार से पर्यावरण का सबसे बड़ा दिशा-निर्देशक ग्रंथ है और हज़ारों साल पहले लिखा गया है। हमारे यहाँ कहा गया है – ‘माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्याः’। वेदों में कहा गया है कि हम में जो purity है वह हमारी पृथ्वी के कारण है। धरती हमारी माता है और हम उनके पुत्र हैं। अगर हम भगवान् बुद्ध को याद करें तो एक बात ज़रूर उजागर होती है कि महात्मा बुद्ध का जन्म, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति और उनका महा-परिनिर्वाण, तीनों पेड़ के नीचे हुआ था। हमारे देश में भी अनेक ऐसे त्योहार, अनेक ऐसी पूजा-पद्धति, पढ़े-लिखे लोग हों, अनपढ़ हो, शहरी हो, ग्रामीण हो, आदिवासी समाज हो, प्रकृति की पूजा, प्रकृति के प्रति प्रेम एक सहज समाज जीवन का हिस्सा है लेकिन हमें उसे आधुनिक शब्दों में आधुनिक तर्कों के साथ संजोने की ज़रूरत है। सभी राज्यों में वर्षा आते ही वृक्षारोपण का एक बहुत बड़ा अभियान चलता है। करोड़ों की तादात में पौधे लगाये जाते हैं। स्कूल के बच्चों को भी जोड़ा जाता है, समाज-सेवी संगठन जुड़ते हैं, NGOs जुड़ते हैं, सरकार स्वयं initiative लेती है। हम भी इस बार इस वर्षा ऋतु में वृक्षारोपण के इस काम को बढ़ावा दें, योगदान दें। जितने भी लोकप्रिय व्यक्ति हैं वह पेड लगाये ओर इस मुहिम को आगे बढ़ाने में सहायक बने। सरकार द्वारा लाखों पेड़ फाइलों में लगते है ज़मीन पर नही। और वही लाखों पेड़ों की फाइल के कागज बनाने के लिए एक पेड़ और काट दिया जाता है आज देश में एक और हरित क्रांति की आवश्यकता है जय हिंद।

गुरुपूर्णिमा 9 जुलाई – गुरु गूंगे गुरू बावरे गुरू के रहिये दास

एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए !
भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया ! जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे ! उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो !

जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे ! उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो !

भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है ! आप निगुरे है ! जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है !

यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ ! नारायण! बोले हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मानलो !

नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए ! जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला ! नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ ?

यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो ! नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ ! पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया !

मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापीस भगवान के पास गए और कहा हे भगवान! मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे ! यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा !

यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान! इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये !भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो ! नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई ! गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे माफ़ करदो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा !
नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा ! यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया !
नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है !
गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस !

गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए ! गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ,अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा “स्वयं गुरु” भी नहीं कर सकते !

एक प्रसंग है कि एक पंडीत ने धन्ने भगत को एक साधारण पत्थर देकर कहा  इसे भोग लगाया करो एक दिन भगवान कृष्ण दर्शन देगे ! उस धन्ने भक्त के विश्वास से एक दिन उस पत्थर से भगवान प्रकट हो गए ! फिर गुरु पर तो वचन विश्वास रखने वाले का उद्धार निश्चित है।

रोज़ी-रोटी का मसला सुलझे,कविता-कहानियां भी तभी सुहाती हैं

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था साफ तौर पर दो भागों में बंटी हुई नजर आती है। एक आधुनिक शिक्षा प्रणाली है जिसके अंतर्गत रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम हैं एवं दूसरी तरफ परम्परागत शिक्षा व्यवस्था है जिसके साथ रोजगार के बहुत की कम अवसर जुड़े हुए हैं। रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने वाली शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक रूप से सम्पन्न वर्ग तत्पर दिखाई देता है क्योंकि वह जानते हैं कि उनके बच्चे इस शिक्षा को प्राप्त करके ही बड़े रोजगार प्राप्त कर सकते हैं। हमारे ग्रामीण युवाओं के माता-पिता इतने सम्पन्न नहीं होते कि वे बच्चों को महंगी शिक्षा उपलब्ध करा सकें। हमारे देश में शिक्षा के लिए ऐसा वातावरण तैयार होता जा रहा है जिसमें सभी को सब कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। ऐसे वातावरण के लिए हमारी सरकारी नीति ही जिम्मेवार है।

देश की आजादी के समय लॉर्ड मैकाले द्वारा दी गई शिक्षा व्यवस्था को ही अंगीकार किया गया जिससे हमारे देश का आज तक केवल नुकसान ही हुआ है। आज भी हम शिक्षा के लिए ग्रामीण स्तर पर आधारभूत ढांचा तैयार नहीं कर सके हैं। कई गांवों में आज भी प्राथमिक स्कूलों की कमी है। बच्चे आज भी कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाने को अभिशप्त हैं। ऐसे वातावरण में कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार अपने बच्चों को आगे की शिक्षा के लिए शहरों में भेजने की स्थिति में नहीं होते। आज भी लभग 60 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक स्कूल से आगे पढऩे की स्थिति में नहीं होते। 40 प्रतिशत बच्चे माध्यमिक शिक्षा के बाद पढऩा छोड़ देते हैं। 20 से 25 प्रतिशत बच्चे हाई स्कूल तक जाते-जाते विपरीत परिस्थितियों में फंस जाते हैं तब हम सोच सकते हैं कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीण युवकों की क्या स्थिति होगी। यदि परम्परागत शिक्षा प्राप्त करके कोई ग्रामीण युवा स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर भी लेता है तब वह रोजगार के बाजार में अपने आप को कहीं भी स्थापित नहीं कर पाता। सरकारी क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति बहुत ही खराब है। पिछले कई सालों में भर्तियां लगभग नहीं के बराबर हैं। निजी क्षेत्रों में बीए या एमए किए हुए युवाओं को सम्मानजनक रो•ागार नहीं मिल पाता क्योंकि वहां तो प्रबंधकों और आईटी प्रोफेशनल्स की ही आवश्यकता बनी हुई है।

हमारे ग्रामीण समाज के केवल 0.12 प्रतिशत युवा ही कोई मैनेजमेन्ट या रोजगार परक कोर्स करने में सफल हो पाते हैं । उनमें से केवल 0.2 प्रतिशत ही कोई बड़ा रोजगार प्राप्त करने में सफल होते हैं। हमारी सरकार ने जिस तेजी से रोजगारोन्मुख शिक्षा का निजीकरण किया है उसके चलते गरीब आम आदमी को ऐसी शिक्षा से वंचित होना पड़ा है। निजी क्षेत्र ने इंजीनियरिंग, चिकित्सा, मैनेजमेंट, कम्प्यूटर एवं विभिन्न रोजगारोन्मुख डिप्लोमा एवं सर्टिफिकेट कोर्स की शिक्षा व्यवस्था पर लगभग कब्जा कर लिया है और मनमाने ढंग से प्रवेश प्रक्रिया एवं फीस का ढांचा खड़ा कर लिया है जिसके चलते उनके द्वारा संचालित संस्थान केवल पैसा बनाने और डिग्रियां बांटने में संलग्न हैं। शहरी साधन- सम्पन्न लोगों के बच्चों को प्रवेश देकर मोटी फीस वसूली जाती है ताकि उनकी तथा उनके संस्थान की सेहत बनी रहे। शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटके ये संस्थान सरकारी दिशा-निर्देशों का अक्षरश: पालन कभी नहीं करते क्योंकि उन्होंने अपने नियम कानून अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ लिये हैं।

गरीब आम आदमी एवं ग्रामीण युवाओं को उच्च शिक्षा से ही वंचित रखने काकेवल खेल नहीं चल रहा है उन्हें प्रारंभ से ही पर्याप्त स्कूली शिक्षा से भी वंचित रखने का षड्यंत्र चल रहा है। बड़े पब्लिक स्कूलों के पास गरीबों के बच्चों को भी मुफ्त और अच्छी शिक्षा देने का कोई कार्यक्रम नहीं है। वे देशहित में सोचने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे केवल उन्हें ही अपने स्कूलों में प्रवेश देते हैं जो उनके द्वारा निर्धारित फीस को बिना कोई सवाल-जवाब किए अदा कर सकें। इसी प्रारंभिक स्तर से ही जीवन स्तर की खाई पडऩी शुरू हो जाती है फलस्वरूप अमीर और गरीब समाज का निर्माण होता है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अमीर और गरीब के बीच की खाई तेजी से चौड़ी होती जा रही है जिसका मुख्य कारण शिक्षा में असमानता ही है।

शिक्षा की असमानता से ग्रामीण युवा तेजी से बेरोजगार होते जा रहे हैं क्योंकि परम्परागत शिक्षा से रोजगार प्राप्त नहीं हो पाता। इससे वे कुंठित होते जा रहे हैं। ऐसे में एक अराजक समाज के निर्माण की नींव डाली जा रही है जिसके परिणाम भविष्य में विस्फोटक हो सकते हैं। ग्रामीण युवा छोटे-मोटे कार्यों के लिए ही शहर की ओर पलायन कर रहे हैं जिससे देश के राजस्व की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि क्षेत्र को भी नुकसान हो रहा है। शहरों में जीवन स्तर में भारी अंतर को देखते हुए कुछ युवा जल्दी अमीर बनने के चक्कर में अपराध के गहरे अंधकार में खो जाते है। गांवों में यदि वे रहते है तब भी वे खेती के कार्य में तालमेल बिठाने में सक्षम नहीं होते क्योंकि एक सच्चाई यह भी है कि खेती आजकल घाटे का सौदा बनती जा रही है, उसमें लागत मूल्य निकालना ही दूभर हो गया है। ऐसे में सभी रास्ते बंद देखकर ग्रामीण युवा क्या करे और कहां जाए, उसे कुछ भी समझ नहीं आता।

हमारी सरकार को चाहिए कि वह इस समस्या को समझे तथा ग्रामीण युवाओं के लिए कुछ ऐसा करे ताकि वे अपना जीवन यापन समाज की मुख्य धारा में जुड़कर कर सकें। ग्रामीण युवाओं को ऐसे अवसर उपलब्ध कराए ताकि वे कुंठित न हों। शिक्षा की गारंटी या ‘स्कूल चलें हम’ एवं मिड डे मील जैसे सरकारी प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। जमीनी स्तर पर सच्चाई कुछ और ही है इस बात को समझने की आवश्यकता है। प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा जो कि रोजगार परक हो एवं शिक्षा के बाद रोजगार के लिए प्रशिक्षण आदि कार्यक्रम को उच्च निरीक्षण वाली समिति के संरक्षण में गति प्रदान करनी होगी तब ही हमारे समाज में असमानता की खाई को पाटा जा सकता है। महात्मा गांधी जी ने भी कहा था कि जब तक हमारे समाज का ग्रामीण वर्ग सुविधा सम्पन्न नहीं होगा देश वास्तविक तरक्की की राह पर नहीं चल सकता एक सामाजिक सच है कि कोइ आदमी समाज पर बोझ नहीं हो सकता क्‍योंकि यदि वह खाने के लिये लिये एक पेट लेकर पैदा होता है तो कमाने के लिये दो हाथ लेकर जमीन पर आता है। इसका साफ मायने तो यह है कि कोइ व्‍यक्ति नैसर्गि‍क तौर पर बेरोजगार या बेकार नहीं होना चाहिये। यानि मानवीय समाज में बेरोजगारी का कोइ स्‍थान नहीं होना चाहिये। जबकि वर्तमान में यह ऐसा रोग बन गया है जिसका सही सही डायगनोस ही नहीं हो पाया है। कहने का मतलब साफ है कि बेरोजगारी दूर करने के सच्‍चे प्रयास किये ही नहीं गये है और जो प्रयास किये जा रहे है वे प्रयास कम, शोरशराबा ज्‍यादा है । सरकारी विभाग अपनी नौकरी बचाने के लिए स्‍वरोजगार, अपने धंधे खडे करने के‍ लिए ऋण एवं ट्रेनिंग की सिफारिश कर रहें है । सुनने में यह सिफारिशें रोचक लग सकती है लेकिन बढती जनसंख्‍या बेरोजगारी की चपेट में जिस तरह से आ रही है उसकी कहानी बढते अपराध, भष्‍टाचार, उग्रवाद,तस्‍करी,जैसे अनन्‍त विषयों पर समाप्‍त होती है । सादा लफ्जों में आप कह सकते है कि बेरोजगारी ही सब रोगों की जड है । आज मैं सोचता हूं कि बचपन से लेकर आजतक बेरोजगारी पर पता नहीं कितनी बार निबन्‍ध लिखें होंगे । लेकिन फिर भी इस विषय पर समग्रता से सोचने व विचारने की गुंजाइश अभी भी बाकी है । प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपनी उम्र में बेरोजगारी का सामना अवश्‍य करता है । इसीलिए प्रत्‍येक व्‍यक्ति इस विषय पर एक गम्‍भीर सोच व जानकारी भी रखता है । ज्‍यादा जानकारी रखने वाले कुछ समझदार काउन्‍सलर बनकर बेरोजगारी दूर करने के रोग में नुस्‍खें बताते हुए देखे जा सकते है । वास्‍तव में बेरोजगारी एक ऐसा स्‍लोगन है जिस पर नेताओं की नेतागिरी हमेशा चमकायी जा सकती है, और चमकायी जा रही है । आप माने या न मानें, शायद ही ऐसी कोई योजना या परियोजना हो जिसमें रोजगार देने का लक्ष्‍य निर्धारित न हो । लेकिन रोजगार सृजन का तरीका बेहद गजब है । जरा उदाहरण से समझिए, कि सरकार का कहना है कि देश में लगभग एक हजार स्‍पेशल इकानामिक जोन को मंजूरी मिलने के बाद लगभग एक तीस लाख लोगों को रोजगार मिलेगा । अब यह रोजगार पाने वाले कौन लोग होंगे । इसका निर्धारण कौन करेगा एवं कैसे होगा । किस प्रकार के हुनरमन्‍द या सामान्‍य शिक्षा हासिल किये हुए बेरोजगार इन जोन में नौकरी पा सकते है । इस मामले पर कोई कार्य योजना प्रस्‍तुत नहीं की जाती बल्कि नियोजकों की इच्‍छा व मनमर्जी पर बेरोजगारों को छोड दिया जाता है । सरकारी मशीनरी नौकरी देने का काम विकेन्द्रित कर चुकी है या यूं कहे कि इतने महत्‍वपूर्ण कार्य को प्रत्‍येक सामान्‍य विभाग के जिम्‍मे छोड दिया गया है । सरकार यह मान चुकी है कि पहले तो सरकारी नौकरियां बहुत कम है और जो है उन पर वरीयता सबसे पहले सत्‍ता पक्ष को मिलनी चाहिए इसीलिए आम जनता ईमानदारी से नौकरी पाने का सपना छोड दें।

देश में इस समय नरेगा, मनरेगा के द्वारा प्रत्‍येक घर से बेरोजगारी को उखाड फेंकने के लिए 100 दिन के रोजगार की गारण्‍टी दी जा रही है । मेरी नजर में रोजगार एक आजीविका होती है जो जीवन के साथ साथ्‍ा चलने वाली आर्थिक क्रिया है जिसके द्वारा प्रत्‍येक व्‍यकित गरिमापूर्ण जीवन जी सकता है । लेकिन 100 दिन का रोजगार देकर सरकार आम आदमी को केवल 100 दिन ही गरिमा के साथ जीने का अधिकार देना चाहती है । उसमें भी पता नहीं कितने तरह की कोताही बरती जा रही है । चलिए न मामा से अच्‍छा काना मामा । इसी प्रकार कुछ दिन पूर्व उत्‍तर प्रदेश सरकार ने भी बेरोजगारी दूर करने की कसम खा कर अपना वोट बैंक बढाना चाहा था । बेरोजगारों को अपना बनाने के लिए उस समय की सरकार 500 रू0 प्रति महीना बेरोजगारी भत्‍ता देकर सरकारी रिश्‍वत देने की कोशिश करते हुए लगभग 11 करोड रूपये बॉट दिये थे । एक अचरज की बात ओर यह है कि बेरोजगारी भत्‍तें से ज्‍यादा रूपया भत्‍ता वितरण हेतु मुख्‍यमंत्री द्वारा आयोजित कार्यक्रमों पर खर्च कर दिया गया । प्रदेश का पूरा प्रशासनिक अमला जिस मुस्‍तैदी से इस कार्य को अन्‍जाम दिया वह तारीफ के काबिल था । यदि इस प्रकार की मुस्‍तैदी गरीबी मिटाने एवं भूखें परिवारों को चिन्हित करने के लिए दिखायी जाती तो कितना बेहतर रहता । 

Clean Master की एक भयानक सच्चाई

यह एक नीडफुल स्‍मार्टफोन एप है. इस एप से आप अपने फोन की जंक फाइल्‍स को ईजिली डिलीट कर सकते हैं. इसके अलावा इस एप का सबसे जरूरी काम फोन की मेमोरी को बूस्‍ट करके प्रोसेसिंग स्‍पीड इनक्रीज करना है. इस एप को गूगल प्‍लेस्‍टोर से डाउन लोड किया जा सकता है. दोस्तों आज मै आप सभीको Clean Master की एक भयानक सच्चाई बताने जा रहा हु जैसा की आप जानते है Clean master एक एंटीवायरस /बूस्टर app है जो Cheetah mobile की तरफ से है अधिक जानकारी के लिए इस विडियो को जरुर देखे और इसे इतना शेयर करे की हर एक Clean master यूजर के पास ये पहुंचे और वो इसकी सच्चाई जान ले | जय हिन्द !!!

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अवन्तिका शिक्षक सम्मान समारोह कल 12 बजे

अवन्तिका संस्था द्वारा दिनांक 28 फरवरी 2017 को स्थानीय इंटरनेशनल स्कूल ऑफ इन्फॉर्मैटिक्स एंड मैनेजमेंट टेक्निकल कैम्पस, मानसरोवर पर शहर के चयनित शिक्षाविदों को उनके द्वारा किए गए समर्पित शिक्षण सेवा व अनुकरणीय कार्यों हेतु अवन्तिका शिक्षक सम्मान से नवाजा जाएगा । इस अवसर पर डॉ॰ राखी गुप्ता (आई॰ आई॰ एस॰ यूनिवर्सिटी), डॉ॰ मधु श्रीवास्तव (सुबोध गर्ल्स कॉलेज), डॉ॰ निमाली सिंह (महारानी कॉलेज), श्रीमती रामा दत्त (संस्कार स्कूल), फादर जॉन रवि (सेंट जेवियर्स स्कूल, नेवटा), श्रीमती रश्मी तलवार (महावीर पब्लिक स्कूल), श्रीमती नीरा पाण्डेय (आर्मी पब्लिक स्कूल), श्रीमती सोनाली सिंधवी बंसल (जयश्री पेड़ीवाल प्री स्कूल) श्रीमती ज्योति राठौड़ (एम॰ के॰ बी॰ स्कूल), श्रीमती माला अग्निहोत्री (इंडिया इन्टरनेशनल स्कूल), सिस्टर दीपा मैथ्यु (सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर), श्रीमती सुनीता राठौड़ (टैगोर पब्लिक स्कूल), श्रीमती उषा किरण शर्मा (बाल विश्व भारती स्कूल), श्रीमती सरिता कटियार (रेयान इन्टरनेशनल स्कूल), श्रीमती मधु सूद (रवीन्द्र निकेतन पब्लिक स्कूल), श्रीमती तान्या शर्मा (टी॰ पी॰ एस॰), श्रीमती सीमा अहमद (आलोक मेमोरियल स्कूल), श्रीमती बीना शर्मा (टी॰ पी॰ एस॰), श्रीमती सीमा चौधरी (राजकीय सी॰ सै॰ स्कूल, हरमाड़ा), श्री धीरज मिश्रा ( टैगोर विद्द्या भवन), श्रीमती पीयूष सूद (द रूटस पब्लिक स्कूल) को सम्मानित किया जाएगा । कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ॰ अशोक गुप्ता (वाइस चांसलर, दी आई. आई. एस. यूनिवर्सिटी), श्री पी. डी. सिंह (कमिशनर, अवंतिका, राजस्थान), डॉ॰ आनंद अग्रवाल (राष्ट्रीय निदेशक, अवंतिका) द्वारा किया जाएगा । इस अवसर पर विख्यात मंत्रज्ञ व मेडिटेसन एक्सपर्ट निर्मला सेवानी, बाल विलक्षण प्रतिभा मनन सूद (गूगल बॉय) तथा संगीतज्ञ श्री सुदेश शर्मा आकर्षण का केंद्र रहेगे। उक्त जानकारी अवंतिका राजस्थान कोडिनेटर श्री आलोक सूद तथा मिडिया प्रभारी एम के पाण्डेय निल्को ने दी।

भूत-प्रेत क्या होते हैं ?

भूत-प्रेत के नाम से एक अनजाना भय लोगो की मन को सताता है।  इसके किस्से भी सुनने को मिल जाते है और लोग बहुत रुचि व विस्मय के साथ इन्हें सुनते है और इन पर बनें सीरियल, फिल्मे देखते है व कहानियाँ पढ़ते हैं। भूत-प्रेत का काल्पनिक मनः चित्रण भी लोगों को भयभीत करता है-रात्रि के बारह बजे के बाद, अँधेरे में, रात्रि के सुनसान में भूत-प्रेत के होने के भय से लोग़ डरते हैं। क्या सचमुच भूत-प्रेत होते है ? यह प्रशन लोगों के मन में आता है ? क्योंकि इनके दर्शन दुर्लभ होते है, लेकिन ये होते है। जिस तरह से हम वायु को नहीं देख सकते, उसे महसूस कर सकते हैं, उसी तरह हम भूत को नहीं देख सकते पर कभी-कभी ये अचानक देखे भी जाते है।  भूतों का अस्तित्व आज भी रह्स्य बना हुआ है।  इसलिए इनके बारे में कोई भी जानकारी हमें रोमांच से भर देती है। आखिर भूत है क्या ? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है।  परंपरागत तौर पर यही माना जाता है कि भूत उन मृतको की आत्माएँ हैं, जिनकी किसी दुर्घटना, हिंसा, आत्महत्या या किसी अन्य तरह के आघात  आकस्मिक मृत्यु हुई है।  मृत्यु हो जाने के कारण इनका अपने स्थुल शरीर से कोई संबंध नहीं होता।  इस कारण ये भूत-प्रेत देखे नहीं जा सकते।  चूँकि हमारी पहचान हमारे शरीर से होती हैं और जब शरीर ही नहिं है तो मृतक आत्मा को देख पाना और पहचान पाना मुश्किल होता हैं। भूत-प्रेतों को ऐसी नकारात्मक सत्ताएं माना गया है, जो कुछ कारणों से पृथ्वी और दूसरे लोक  बीच फँसी रहती हैं।  इन्हे बेचैन व चंचल माना गाया है, जो अपनी अप्रत्याशित मौत के कारण अतृप्त हैं।  ये मृतक आत्माएँ  कई बार छाया, भूतादि के रूप में  स्थानों  के पीछे लॉग जाती हैं, जिनसे जीवितावस्था में इनका संबन्ध या मोह था।

कैंसर पीड़ितों की मदद के लिये हमारे साथ हाथ मिलाये

लिखने में भी हाथ कई बार काप जाते है , किस्मत के बारे में क्या कहे , यह बालक उम्र महज 13 साल बचपन में ही पिता जी छोड़ कर चले गए , दादा जी क्या होते है पता ही नहीं ऊपर से कोई भाई नहीं केवल 3 बहने और डॉक्टर ने कहा कि आपको कैंसर है । हे भगवान इतनी सी उम्र में क्या क्या दिखाया आपने इस परिवार को । नाना जी अपने सामर्थ्य के अनुसार इलाज करवा तो रहे है किंतु मानवता के नाते हमारा भी हक़ बनता है कि हो सके तो आप भी मदद के लिए आगे आये । यदि कुछ मदद करने को दिल चाहता हो तो  8890553555 या 9024589902 पर संपर्क करे ।

VMW Team के सक्रीय सदस्य एम के पाण्डेय निल्को बताया की कई लोग हमारी मदद को आगे आ रहे हैं। हम उन दोस्तों के शुक्रगुजार हैं, जिनकी आर्थिक सहायता से हम इनकी कुछ आर्थिक मदद कर पा रहे है जिससे इनको इलाज़ में आसानी हो रही है , हमारी टीम के आनंद उपाध्याय जो की मेडिकल क्षेत्र से है उन्होंने बताया की हम उनकी जाँच करने भी कसार नहीं छोड़ते है , खासकर कैंसर पीड़ितों के लिए हम उनका विशेष ध्यान रखते है। यदि आप उन कैंसर पीड़ितों हमारे साथ करना चाहते है, तो उपरोक्त नम्बर संपर्क कर सकते है।

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Happy New Year – 2017

नव वर्ष मुबारक
नए साल की पावन बेला में एक नई सोच की ओर कदम बढ़ाएँ, हौसलों से अपने सपनों की ऊंचाइयों को छू कर दिखाएँ, जो आज तक सिमट कर रह गई थी ख्यालों में, उन सपनों को नव वर्ष 2017 में सच कर दिखाएँ………!!!!!!
आपको दिल के हर कोने से नव वर्ष मुबारक

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जन्मदिन उन बच्चो के साथ

जन्मदिन उन बच्चो के साथ
डाल गले मे हाथ
खा रहे थे सभी बैठ सड़क पर
पिज्जा हम उनके साथ
कोई जाति नहीं
कोई मजहब नहीं
जो उनको दे दिया
है वही सही

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गरीब बच्चो के संग लिया जन्मदिन का ‘आनंद’

 बड़े बड़े होटलो और रिहायसी जगह तो अपना जन्मदिन सभी मनाते है किन्तु आर्थिक रूप से कमजोर बच्चो के साथ ये कुछ और स्पेशल हो जाता है । हमारा उदेश्य उन तरसती आखो तक जन्मदिन के मिठाई और केक पहुंचाना है जो कभी ये स्वाद चख न सके । इस तरह से बच्चों की खुशियों को देखकर एक अलग ही आत्म-संतुष्टि का एहसास मिलता है| देवदर्शन डॉट नेट के सहयोग से बच्चो को खाने-पीने की सामग्री व खिलौने दिये गए । एम के पाण्डेय निल्को ने कहा की इस तरह से बच्चों की खुशियों को देखकर एक अलग ही आत्म-संतुष्टि का एहसास मिलता है| अपने बच्चों के जन्मदिन की पार्टी पर हम हजारों और लाखों रूपये खर्च कर देते हैं और कुछ बच्चों, दोस्तों और रिश्तेदारों को हम खिलाते-पिलाते हैं, जो कि इस तरह की पार्टी से उब चुके होते हैं या उनके लिये इतना महत्वपूर्ण नहीं होता , लेकिन यकीन मानिये आप उतनी ख़ुशी नहीं पा सकते जो इन बच्चों को ख़ुशी देकर पायी है| उक्त अवसर पर उमाकांत, रोहित, रवि, सुभाष ज्योति, प्रीती, कृष्ण, दीपक, अनुप, वर्षा, इत्यादि कई लोग मौजूद थे । 

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मन की बात – एम के पाण्डेय निल्को

हम में से ज्यादातर लोगों का कोई टाईम टेबल नहीं होता, जब मन किया पढने बैठ जाते हैं, जो मन किया किताब उठा लेते हैं और पढने लगते हैं, कोई भी टॉपिक बीच से ही पढ्ने लग जाते हैं, इससे सिवाय confusion के कुछ हाथ नहीं लगता हमें ये तक पता नहीं रहता कि हमने कौन सा विषय कितना पढ लिया है, और लोग बेवजह ही अपनी meomory को दोष देते हैं, एक बेहतर रणनीति ही बेहतर जीत दिला सकती है, और रणनीति का पहला हिस्सा जो कि यहाँ पर टाईम टेबल है, यदि यह कमजोर है तो आप जीत की आशा कैसे कर सकते हैं, तो बेहतर सफलता के लिये एक बेहतर टाईम टेबल बनाईये

एम के पाण्डेय निल्को
ब्लॉगर

अंतरराष्ट्रीय कराटे मे पूर्वाञ्चल का प्रतिनिधितव करेगा मास्टर सिद्धेश

अंतरराष्ट्रीय कराटे मे खेलेगा, देवरिया का सिद्धेश
6 देशो के खिलाड़ी लेगे हिस्सा,पूर्वाञ्चल का प्रतिनिधितव करेगा मास्टर सिद्धेश
जयपुर में 22 जुलाई से 24 जुलाई तक होने वाली पहली अंतरराष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता में देवरिया का सिद्धेश भाग लेगा। प्रतियोगिता में 6 देशों की कराटे टीम भाग लेंगी। पूर्वाञ्चल से एक मात्र खिलाड़ी सिद्धेश है । इससे पहले मई मे भी राज्यस्त्रीय प्रतियोगिता मे सिल्वर मैडल के साथ सिद्धेश ने किया था देवरिया का नाम रौशन । इंडियनमार्शल आर्ट संस्थान के बैनर तले जयपुर में अंतरराष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा है। शुक्रवार से आयोजित होने वाली इस प्रतियोगिता में भारत सहित छह देश हिस्सा ले रहे हैं। 24 जुलाई तक चलने वाली इस प्रतियोगिता में करीब 1100 बच्चे हिस्सा लेंगे। उद्घाटन भारतीय कॉमनवेल्थ चयनकर्ता अजय कुमार शेट्टी करेंगे। प्रतियोगिता में 5 से 18 साल तक के बच्चे हिस्सा लेंगे। पहले भारत के 19 राज्यों के खिलाड़ियों के बीच प्रतियोगिता होगी। इसके आधार पर भारतीय टीम का चयन होगा। यह टीम श्रीलंका, बंगलादेश, भूटान, नेपाल और अफगानिस्तान के खिलाड़ियों को चुनौती देगी। 
किस देश से कितने खिलाड़ी 
नेपाल45 
अफगानिस्तान 33 
बंगलादेश 07 
श्रीलंका 17 
भूटान 09 
भारत 24 

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