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ट्रैफिक सिग्नल पर भारत के कर्णधार

एक लावारिश बिना मां-बाप का बच्चा क्या खुद ही भिखारी बनने का फैसला कर लेता है? बिना किसी छत के भूखे पेट खुले आसमान के नीचे गुजारने वालों की तकदीर में जिल्लत और तिरस्कार के सिवा और क्या होता है तिस पर हमारी मरी हुई संवेदनाओं से निकले लफ़्ज जब उन्हें नसीहत देते हैं तो शायद एक बार उन्हें बनाने वाले भगवान भी कह उठते होंगे “वाह रे इंसान” – Tamanna

भिक्षावृत्ति एक अपराध, यह वे पंक्तियां हैं जो कभी पोस्टरों तो कभी विज्ञापनों द्वारा अकसर दिखाई दे जाती हैं, इन पंक्तियों को पढ़कर हम भिखारियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि हमारी घृणा का वास्तविक हकदार आखिर है कौन, वो जो अपनी भूख मिटाने के लिए 1-1 रुपए के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाते हैं, धूप, बारिश, तूफान हर मौसम में आसमान को ही अपनी छत समझकर रहते हैं, कूड़े के ढेर से खाने का सामान एकत्रित कर खाते हैं या फिर वो लोग जो इनकी ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार हैं? विकसित देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा भारत देश आज एक अहम समस्या समस्या का शिकार बना हुआ है। हालांकि सांस्कृतिक देश भारत में यह कोई नई बात नहीं है। इतिहास के पन्नों को उलटकर देखें तो पता चलेगा कि पहले भी हमारे देश में ‘भिक्षावृत्ति होती थी। सांसारिक मोह-माया त्यागकर ज्ञान प्राप्ति के लिए निकले महापुरुष भिक्षा मांगकर अपना जीवन-यापन करते थे। उनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ज्ञान प्राप्ति होता था। तत्कालीन समाज में भिक्षावृत्ति को सामाजिक बुराई नहीं मानी जाती थी। बल्कि भिक्षुओं का आदर-सत्कार किया जाता था।दूसरी ओर समय के साथ-साथ हर ची बदल गई। देश विकास की राह में बढ़ा, इसके साथ ही बाजारवाद को बढ़ावा मिला, लेकिन साथ ही बढ़ी भिखारियों की संख्या। हालांकि इसे रोकने के लिए काफी कोशिशें की गईं लेकिन यह महज जीवन-यापन का जरिया नहीं बल्कि एक नए कारोबार के रूप में समाज के सामने सीना तानकर खड़ा हो गया। 

इस सामाजिक कुरीति के बढऩे का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है। एक तरफ जहां सरकार सर्वशिक्षा अभियान के तहत सभी को शिक्षित करना चाहती है, तों महंगी होती शिक्षा से गरीब तबका कोसों दूर होता जा रहा है। ऐसे में यह तबका मजबूर हो जाता है कि जितना वक्त पढ़ाई में बर्बाद किया जाएगा, उतने वक्त में भविष्य के लिए भीख मांगकर अच्छी खासी रकम इकट्ठा की जा सकती है। भारत जैसे विकासशील देश में रोजगार के पर्याप्त साधन न होने के चलते इस पेशे को बढ़ावा मिलता है। यहां तक कि कभी-कभी ऐसे लोग भी दिख जाते हैं जो शिक्षित तो हैं पर उनके पास रोजगार नहीं है, थक-हार कर वो इस पेशें से जुडऩे में तनिक भी संकोच नहीं करते।
कुछ देर के लिए जिस जगह से गुजरने पर हम अपनी नाक रुमाल से ढक लेते हैं वहां यह लोग अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं, लेकिन जब किसी को दोषी ठहराने की बात आती है तो हम इन्हें ही साफ-सुधरे शहर की गंदगी समझ लेते हैं. इनके जीवन को सुधारने के स्थान पर हम इनके जीवन को ही कोसते रहते हैं.
सरकार की नजर में भिक्षावृति एक अपराध है और भीख मांगने वाले लोग एक अपराधी, लेकिन हैरत की बात तो यह है कि इन अपराधियों के लिए तो जेलों में भी कोई जगह नहीं है. उन्हें यूं ही सड़कों पर सड-अने के लिए छोड़ दिया जाता है. भिक्षावृत्ति को आपराधिक दर्जा देने के अलावा हमारी सरकार ने कभी उनकी ओर, उनके जीवन में व्याप्त मर्म की ओर ना तो कभी ध्यान दिया और ना ही उनके लिए किसी भी प्रकार की कोई योजना बनाई. सरकार ही क्यों हम अपनी ही बात कर लेते हैं, समाजिक व्यवस्था को ताने देने के अलावा हम करते भी क्या है. सड़क पर कोई भीख मांगता है तो हम उसे लेक्चर सुना देते हैं कि कुछ काम कर लो, लेकिन आप ही बताइए क्या कोई खुशी से अपने आत्म-सम्मान को किनारे रखकर कटोरा हाथ में उठाता है? हम उन्हें यह समझाते हैं कि कुछ काम करो भीख मांगना अच्छी बात नहीं है तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें दुत्कार कर अपनी शान बढ़ाते हैं . समाज की गंदगी समझे जाने वाले यह भिखारी सड़क पर ही पैदा होते हैं, वहीं अपने रिश्ते बनाते हैं और कभी बीमारी से तो कभी भूख से वहीं मर जाते हैं. लेकिन इनकी ओर कभी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है और भविष्य में भी ऐसी उम्मीद करना आसमान छूने जैसा ही है. बड़ी-बड़ी बातें करने वाले सरकारी नुमाइंदों के साथ-साथ शायद अन्य लोग भी जिन्हें आजकल हम समाज सुधारक कहते नहीं थक रहे उनके सामने भी जब कोई भिखारी भीख मांगने आता है तो वह उसे कभी पैसे देकर तो कभी दुत्कार कर अपनी गाड़ी के शीशे बंद कर लेते हैं. लेकिन शोहरत और संपन्नता से भरे अपने जीवन में वापस लौटने के बाद उन्हें कुछ याद नहीं रहता और बात फिर वहीं की वहीं रह जाती है कि भिक्षावृत्ति अपराध है और भीख मांगने वाले अपराधी . 

वृक्षारोपण के इस काम को बढ़ावा दें, योगदान दें।

प्रकृति की एक ताक़त होती है, आपने भी अनुभव किया होगा कि बहुत थक करके आए हो और एक गिलास भर पानी अगर मुहँ पर छिड़क दें, तो कैसी freshness आ जाती है। बहुत थक करके आए हो, कमरे की खिड़कियाँ खोल दें, दरवाज़ा खोल दें, ताज़ा हवा की सांस ले लें – एक नयी चेतना आती है। जिन पंच महाभूतों से शरीर बना हुआ है, जब उन पंच महाभूतों से संपर्क आता है, तो अपने आप हमारे शरीर में एक नयी चेतना प्रकट होती है, एक नयी ऊर्जा प्रकट होती है। ये हम सबने अनुभव किया है, लेकिन हम उसको register नहीं करते हैं, हम उसको एक धागे में, एक सूत्र में जोड़ते नहीं हैं। इसके बाद आप ज़रूर देखना कि आपको जब-जब प्राकृतिक अवस्था से संपर्क आता होगा, आपके अन्दर एक नयी चेतना उभरती होगी और इसलिए 5 जून का प्रकृति के साथ जुड़ने का वैश्विक अभियान, हमारा स्वयं का भी अभियान बनना चाहिये। पर्यावरण की रक्षा हमारे पूर्वजों ने की, उसका कुछ लाभ हमें मिल रहा है। अगर हम रक्षा करेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को लाभ मिलेगा। वेदों में पृथ्वी और पर्यावरण को शक्ति का मूल माना गया है। हमारे वेदों में इसका वर्णन मिलता है। और अथर्ववेद तो पूरी तरह, एक प्रकार से पर्यावरण का सबसे बड़ा दिशा-निर्देशक ग्रंथ है और हज़ारों साल पहले लिखा गया है। हमारे यहाँ कहा गया है – ‘माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्याः’। वेदों में कहा गया है कि हम में जो purity है वह हमारी पृथ्वी के कारण है। धरती हमारी माता है और हम उनके पुत्र हैं। अगर हम भगवान् बुद्ध को याद करें तो एक बात ज़रूर उजागर होती है कि महात्मा बुद्ध का जन्म, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति और उनका महा-परिनिर्वाण, तीनों पेड़ के नीचे हुआ था। हमारे देश में भी अनेक ऐसे त्योहार, अनेक ऐसी पूजा-पद्धति, पढ़े-लिखे लोग हों, अनपढ़ हो, शहरी हो, ग्रामीण हो, आदिवासी समाज हो, प्रकृति की पूजा, प्रकृति के प्रति प्रेम एक सहज समाज जीवन का हिस्सा है लेकिन हमें उसे आधुनिक शब्दों में आधुनिक तर्कों के साथ संजोने की ज़रूरत है। सभी राज्यों में वर्षा आते ही वृक्षारोपण का एक बहुत बड़ा अभियान चलता है। करोड़ों की तादात में पौधे लगाये जाते हैं। स्कूल के बच्चों को भी जोड़ा जाता है, समाज-सेवी संगठन जुड़ते हैं, NGOs जुड़ते हैं, सरकार स्वयं initiative लेती है। हम भी इस बार इस वर्षा ऋतु में वृक्षारोपण के इस काम को बढ़ावा दें, योगदान दें। जितने भी लोकप्रिय व्यक्ति हैं वह पेड लगाये ओर इस मुहिम को आगे बढ़ाने में सहायक बने। सरकार द्वारा लाखों पेड़ फाइलों में लगते है ज़मीन पर नही। और वही लाखों पेड़ों की फाइल के कागज बनाने के लिए एक पेड़ और काट दिया जाता है आज देश में एक और हरित क्रांति की आवश्यकता है जय हिंद।

रोज़ी-रोटी का मसला सुलझे,कविता-कहानियां भी तभी सुहाती हैं

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था साफ तौर पर दो भागों में बंटी हुई नजर आती है। एक आधुनिक शिक्षा प्रणाली है जिसके अंतर्गत रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम हैं एवं दूसरी तरफ परम्परागत शिक्षा व्यवस्था है जिसके साथ रोजगार के बहुत की कम अवसर जुड़े हुए हैं। रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने वाली शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक रूप से सम्पन्न वर्ग तत्पर दिखाई देता है क्योंकि वह जानते हैं कि उनके बच्चे इस शिक्षा को प्राप्त करके ही बड़े रोजगार प्राप्त कर सकते हैं। हमारे ग्रामीण युवाओं के माता-पिता इतने सम्पन्न नहीं होते कि वे बच्चों को महंगी शिक्षा उपलब्ध करा सकें। हमारे देश में शिक्षा के लिए ऐसा वातावरण तैयार होता जा रहा है जिसमें सभी को सब कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। ऐसे वातावरण के लिए हमारी सरकारी नीति ही जिम्मेवार है।

देश की आजादी के समय लॉर्ड मैकाले द्वारा दी गई शिक्षा व्यवस्था को ही अंगीकार किया गया जिससे हमारे देश का आज तक केवल नुकसान ही हुआ है। आज भी हम शिक्षा के लिए ग्रामीण स्तर पर आधारभूत ढांचा तैयार नहीं कर सके हैं। कई गांवों में आज भी प्राथमिक स्कूलों की कमी है। बच्चे आज भी कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाने को अभिशप्त हैं। ऐसे वातावरण में कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार अपने बच्चों को आगे की शिक्षा के लिए शहरों में भेजने की स्थिति में नहीं होते। आज भी लभग 60 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक स्कूल से आगे पढऩे की स्थिति में नहीं होते। 40 प्रतिशत बच्चे माध्यमिक शिक्षा के बाद पढऩा छोड़ देते हैं। 20 से 25 प्रतिशत बच्चे हाई स्कूल तक जाते-जाते विपरीत परिस्थितियों में फंस जाते हैं तब हम सोच सकते हैं कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीण युवकों की क्या स्थिति होगी। यदि परम्परागत शिक्षा प्राप्त करके कोई ग्रामीण युवा स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर भी लेता है तब वह रोजगार के बाजार में अपने आप को कहीं भी स्थापित नहीं कर पाता। सरकारी क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति बहुत ही खराब है। पिछले कई सालों में भर्तियां लगभग नहीं के बराबर हैं। निजी क्षेत्रों में बीए या एमए किए हुए युवाओं को सम्मानजनक रो•ागार नहीं मिल पाता क्योंकि वहां तो प्रबंधकों और आईटी प्रोफेशनल्स की ही आवश्यकता बनी हुई है।

हमारे ग्रामीण समाज के केवल 0.12 प्रतिशत युवा ही कोई मैनेजमेन्ट या रोजगार परक कोर्स करने में सफल हो पाते हैं । उनमें से केवल 0.2 प्रतिशत ही कोई बड़ा रोजगार प्राप्त करने में सफल होते हैं। हमारी सरकार ने जिस तेजी से रोजगारोन्मुख शिक्षा का निजीकरण किया है उसके चलते गरीब आम आदमी को ऐसी शिक्षा से वंचित होना पड़ा है। निजी क्षेत्र ने इंजीनियरिंग, चिकित्सा, मैनेजमेंट, कम्प्यूटर एवं विभिन्न रोजगारोन्मुख डिप्लोमा एवं सर्टिफिकेट कोर्स की शिक्षा व्यवस्था पर लगभग कब्जा कर लिया है और मनमाने ढंग से प्रवेश प्रक्रिया एवं फीस का ढांचा खड़ा कर लिया है जिसके चलते उनके द्वारा संचालित संस्थान केवल पैसा बनाने और डिग्रियां बांटने में संलग्न हैं। शहरी साधन- सम्पन्न लोगों के बच्चों को प्रवेश देकर मोटी फीस वसूली जाती है ताकि उनकी तथा उनके संस्थान की सेहत बनी रहे। शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटके ये संस्थान सरकारी दिशा-निर्देशों का अक्षरश: पालन कभी नहीं करते क्योंकि उन्होंने अपने नियम कानून अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ लिये हैं।

गरीब आम आदमी एवं ग्रामीण युवाओं को उच्च शिक्षा से ही वंचित रखने काकेवल खेल नहीं चल रहा है उन्हें प्रारंभ से ही पर्याप्त स्कूली शिक्षा से भी वंचित रखने का षड्यंत्र चल रहा है। बड़े पब्लिक स्कूलों के पास गरीबों के बच्चों को भी मुफ्त और अच्छी शिक्षा देने का कोई कार्यक्रम नहीं है। वे देशहित में सोचने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे केवल उन्हें ही अपने स्कूलों में प्रवेश देते हैं जो उनके द्वारा निर्धारित फीस को बिना कोई सवाल-जवाब किए अदा कर सकें। इसी प्रारंभिक स्तर से ही जीवन स्तर की खाई पडऩी शुरू हो जाती है फलस्वरूप अमीर और गरीब समाज का निर्माण होता है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अमीर और गरीब के बीच की खाई तेजी से चौड़ी होती जा रही है जिसका मुख्य कारण शिक्षा में असमानता ही है।

शिक्षा की असमानता से ग्रामीण युवा तेजी से बेरोजगार होते जा रहे हैं क्योंकि परम्परागत शिक्षा से रोजगार प्राप्त नहीं हो पाता। इससे वे कुंठित होते जा रहे हैं। ऐसे में एक अराजक समाज के निर्माण की नींव डाली जा रही है जिसके परिणाम भविष्य में विस्फोटक हो सकते हैं। ग्रामीण युवा छोटे-मोटे कार्यों के लिए ही शहर की ओर पलायन कर रहे हैं जिससे देश के राजस्व की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि क्षेत्र को भी नुकसान हो रहा है। शहरों में जीवन स्तर में भारी अंतर को देखते हुए कुछ युवा जल्दी अमीर बनने के चक्कर में अपराध के गहरे अंधकार में खो जाते है। गांवों में यदि वे रहते है तब भी वे खेती के कार्य में तालमेल बिठाने में सक्षम नहीं होते क्योंकि एक सच्चाई यह भी है कि खेती आजकल घाटे का सौदा बनती जा रही है, उसमें लागत मूल्य निकालना ही दूभर हो गया है। ऐसे में सभी रास्ते बंद देखकर ग्रामीण युवा क्या करे और कहां जाए, उसे कुछ भी समझ नहीं आता।

हमारी सरकार को चाहिए कि वह इस समस्या को समझे तथा ग्रामीण युवाओं के लिए कुछ ऐसा करे ताकि वे अपना जीवन यापन समाज की मुख्य धारा में जुड़कर कर सकें। ग्रामीण युवाओं को ऐसे अवसर उपलब्ध कराए ताकि वे कुंठित न हों। शिक्षा की गारंटी या ‘स्कूल चलें हम’ एवं मिड डे मील जैसे सरकारी प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। जमीनी स्तर पर सच्चाई कुछ और ही है इस बात को समझने की आवश्यकता है। प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा जो कि रोजगार परक हो एवं शिक्षा के बाद रोजगार के लिए प्रशिक्षण आदि कार्यक्रम को उच्च निरीक्षण वाली समिति के संरक्षण में गति प्रदान करनी होगी तब ही हमारे समाज में असमानता की खाई को पाटा जा सकता है। महात्मा गांधी जी ने भी कहा था कि जब तक हमारे समाज का ग्रामीण वर्ग सुविधा सम्पन्न नहीं होगा देश वास्तविक तरक्की की राह पर नहीं चल सकता एक सामाजिक सच है कि कोइ आदमी समाज पर बोझ नहीं हो सकता क्‍योंकि यदि वह खाने के लिये लिये एक पेट लेकर पैदा होता है तो कमाने के लिये दो हाथ लेकर जमीन पर आता है। इसका साफ मायने तो यह है कि कोइ व्‍यक्ति नैसर्गि‍क तौर पर बेरोजगार या बेकार नहीं होना चाहिये। यानि मानवीय समाज में बेरोजगारी का कोइ स्‍थान नहीं होना चाहिये। जबकि वर्तमान में यह ऐसा रोग बन गया है जिसका सही सही डायगनोस ही नहीं हो पाया है। कहने का मतलब साफ है कि बेरोजगारी दूर करने के सच्‍चे प्रयास किये ही नहीं गये है और जो प्रयास किये जा रहे है वे प्रयास कम, शोरशराबा ज्‍यादा है । सरकारी विभाग अपनी नौकरी बचाने के लिए स्‍वरोजगार, अपने धंधे खडे करने के‍ लिए ऋण एवं ट्रेनिंग की सिफारिश कर रहें है । सुनने में यह सिफारिशें रोचक लग सकती है लेकिन बढती जनसंख्‍या बेरोजगारी की चपेट में जिस तरह से आ रही है उसकी कहानी बढते अपराध, भष्‍टाचार, उग्रवाद,तस्‍करी,जैसे अनन्‍त विषयों पर समाप्‍त होती है । सादा लफ्जों में आप कह सकते है कि बेरोजगारी ही सब रोगों की जड है । आज मैं सोचता हूं कि बचपन से लेकर आजतक बेरोजगारी पर पता नहीं कितनी बार निबन्‍ध लिखें होंगे । लेकिन फिर भी इस विषय पर समग्रता से सोचने व विचारने की गुंजाइश अभी भी बाकी है । प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपनी उम्र में बेरोजगारी का सामना अवश्‍य करता है । इसीलिए प्रत्‍येक व्‍यक्ति इस विषय पर एक गम्‍भीर सोच व जानकारी भी रखता है । ज्‍यादा जानकारी रखने वाले कुछ समझदार काउन्‍सलर बनकर बेरोजगारी दूर करने के रोग में नुस्‍खें बताते हुए देखे जा सकते है । वास्‍तव में बेरोजगारी एक ऐसा स्‍लोगन है जिस पर नेताओं की नेतागिरी हमेशा चमकायी जा सकती है, और चमकायी जा रही है । आप माने या न मानें, शायद ही ऐसी कोई योजना या परियोजना हो जिसमें रोजगार देने का लक्ष्‍य निर्धारित न हो । लेकिन रोजगार सृजन का तरीका बेहद गजब है । जरा उदाहरण से समझिए, कि सरकार का कहना है कि देश में लगभग एक हजार स्‍पेशल इकानामिक जोन को मंजूरी मिलने के बाद लगभग एक तीस लाख लोगों को रोजगार मिलेगा । अब यह रोजगार पाने वाले कौन लोग होंगे । इसका निर्धारण कौन करेगा एवं कैसे होगा । किस प्रकार के हुनरमन्‍द या सामान्‍य शिक्षा हासिल किये हुए बेरोजगार इन जोन में नौकरी पा सकते है । इस मामले पर कोई कार्य योजना प्रस्‍तुत नहीं की जाती बल्कि नियोजकों की इच्‍छा व मनमर्जी पर बेरोजगारों को छोड दिया जाता है । सरकारी मशीनरी नौकरी देने का काम विकेन्द्रित कर चुकी है या यूं कहे कि इतने महत्‍वपूर्ण कार्य को प्रत्‍येक सामान्‍य विभाग के जिम्‍मे छोड दिया गया है । सरकार यह मान चुकी है कि पहले तो सरकारी नौकरियां बहुत कम है और जो है उन पर वरीयता सबसे पहले सत्‍ता पक्ष को मिलनी चाहिए इसीलिए आम जनता ईमानदारी से नौकरी पाने का सपना छोड दें।

देश में इस समय नरेगा, मनरेगा के द्वारा प्रत्‍येक घर से बेरोजगारी को उखाड फेंकने के लिए 100 दिन के रोजगार की गारण्‍टी दी जा रही है । मेरी नजर में रोजगार एक आजीविका होती है जो जीवन के साथ साथ्‍ा चलने वाली आर्थिक क्रिया है जिसके द्वारा प्रत्‍येक व्‍यकित गरिमापूर्ण जीवन जी सकता है । लेकिन 100 दिन का रोजगार देकर सरकार आम आदमी को केवल 100 दिन ही गरिमा के साथ जीने का अधिकार देना चाहती है । उसमें भी पता नहीं कितने तरह की कोताही बरती जा रही है । चलिए न मामा से अच्‍छा काना मामा । इसी प्रकार कुछ दिन पूर्व उत्‍तर प्रदेश सरकार ने भी बेरोजगारी दूर करने की कसम खा कर अपना वोट बैंक बढाना चाहा था । बेरोजगारों को अपना बनाने के लिए उस समय की सरकार 500 रू0 प्रति महीना बेरोजगारी भत्‍ता देकर सरकारी रिश्‍वत देने की कोशिश करते हुए लगभग 11 करोड रूपये बॉट दिये थे । एक अचरज की बात ओर यह है कि बेरोजगारी भत्‍तें से ज्‍यादा रूपया भत्‍ता वितरण हेतु मुख्‍यमंत्री द्वारा आयोजित कार्यक्रमों पर खर्च कर दिया गया । प्रदेश का पूरा प्रशासनिक अमला जिस मुस्‍तैदी से इस कार्य को अन्‍जाम दिया वह तारीफ के काबिल था । यदि इस प्रकार की मुस्‍तैदी गरीबी मिटाने एवं भूखें परिवारों को चिन्हित करने के लिए दिखायी जाती तो कितना बेहतर रहता । 

शिक्षाविदों को अवंतिका शिक्षक सम्मान से नवाजा गया

  • जयपुर के गूगल बॉय मनन सूद ने अपने विलक्षण प्रतिभा से किया सभी को आश्चर्यचकित । 
  • संगीत समीक्षक सुदेश शर्मा ने अपने गायन से लोगो का मन मोहा ।
अवन्तिका संस्था द्वारा स्थानीय इंटरनेशनल स्कूल ऑफ इन्फॉर्मैटिक्स एंड मैनेजमेंट टेक्निकल कैम्पस, मानसरोवर पर शहर के चयनित शिक्षाविदों को उनके द्वारा किए गए समर्पित शिक्षण सेवा व अनुकरणीय कार्यों हेतु अवन्तिका शिक्षक सम्मान से नवाजा गया । कार्यक्रम का शुभारंभ विख्यात मंत्रज्ञ व मेडिटेसन एक्सपर्ट निर्मला सेवानी द्वारा मेडिटेशन और दीप प्रज्वलित कर किया गया । उक्त अवसर पर अवंतिका के राष्ट्रीय निदेशक डॉ॰ आनंद अग्रवाल ने कहा की शिक्षक समाज का दर्पण होते हैं और देश के विकास में शिक्षकों की महत्ती भूमिका होती है। उन्होंने शिक्षकों से आव्हान किया कि वे निःश्वार्थ भाव शिक्षण कार्य का निर्वहन करने और शिक्षक और विद्यार्थियों बीच की गरिमा को बनाये रखने पर जोर दिया। इस सम्मान समारोह में  डॉ॰ राखी गुप्ता (आई॰ आई॰ एस॰ यूनिवर्सिटी), डॉ॰ मधु श्रीवास्तव (सुबोध गर्ल्स कॉलेज), डॉ॰ निमाली सिंह (महारानी कॉलेज), श्रीमती रामा दत्त (संस्कार स्कूल), फादर जॉन रवि (सेंट जेवियर्स स्कूल, नेवटा), श्रीमती रश्मी तलवार (महावीर पब्लिक स्कूल), श्रीमती नीरा पाण्डेय (आर्मी पब्लिक स्कूल), श्रीमती सोनाली सिंधवी बंसल (जयश्री पेड़ीवाल प्री स्कूल) श्रीमती ज्योति राठौड़ (एम॰ के॰ बी॰ स्कूल), श्रीमती माला अग्निहोत्री (इंडिया इन्टरनेशनल स्कूल), सिस्टर दीपा मैथ्यु (सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर), श्रीमती सुनीता राठौड़ (टैगोर पब्लिक स्कूल), श्रीमती उषा किरण शर्मा (बाल विश्व भारती स्कूल), श्रीमती सरिता कटियार (रेयान इन्टरनेशनल स्कूल), श्रीमती मधु सूद (रवीन्द्र निकेतन पब्लिक स्कूल), श्रीमती तान्या शर्मा (टी॰ पी॰ एस॰), श्रीमती सीमा अहमद (आलोक मेमोरियल स्कूल), श्रीमती बीना शर्मा (टी॰ पी॰ एस॰), श्रीमती सीमा चौधरी (राजकीय सी॰ सै॰ स्कूल, हरमाड़ा), श्री धीरज मिश्रा ( टैगोर विद्द्या भवन), श्रीमती पीयूष सूद (द रूटस पब्लिक स्कूल) को सम्मानित किया गया ।
समारोह को मुख्य रूप से आई. आई. एस. यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ॰ अशोक गुप्ता, श्री पी. डी. सिंह आदि ने संबोधित किया तथा निर्मला सेवानी, आलोक सूद ने सभी लोगो का आभार व्यक्त किया था । इस अवसर पर जय, मधुलेश पाण्डेय, अर्जुन, प्रणव सहित सैकड़ो लोग उपस्थित रहे ।

अवन्तिका शिक्षक सम्मान समारोह कल 12 बजे

अवन्तिका संस्था द्वारा दिनांक 28 फरवरी 2017 को स्थानीय इंटरनेशनल स्कूल ऑफ इन्फॉर्मैटिक्स एंड मैनेजमेंट टेक्निकल कैम्पस, मानसरोवर पर शहर के चयनित शिक्षाविदों को उनके द्वारा किए गए समर्पित शिक्षण सेवा व अनुकरणीय कार्यों हेतु अवन्तिका शिक्षक सम्मान से नवाजा जाएगा । इस अवसर पर डॉ॰ राखी गुप्ता (आई॰ आई॰ एस॰ यूनिवर्सिटी), डॉ॰ मधु श्रीवास्तव (सुबोध गर्ल्स कॉलेज), डॉ॰ निमाली सिंह (महारानी कॉलेज), श्रीमती रामा दत्त (संस्कार स्कूल), फादर जॉन रवि (सेंट जेवियर्स स्कूल, नेवटा), श्रीमती रश्मी तलवार (महावीर पब्लिक स्कूल), श्रीमती नीरा पाण्डेय (आर्मी पब्लिक स्कूल), श्रीमती सोनाली सिंधवी बंसल (जयश्री पेड़ीवाल प्री स्कूल) श्रीमती ज्योति राठौड़ (एम॰ के॰ बी॰ स्कूल), श्रीमती माला अग्निहोत्री (इंडिया इन्टरनेशनल स्कूल), सिस्टर दीपा मैथ्यु (सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर), श्रीमती सुनीता राठौड़ (टैगोर पब्लिक स्कूल), श्रीमती उषा किरण शर्मा (बाल विश्व भारती स्कूल), श्रीमती सरिता कटियार (रेयान इन्टरनेशनल स्कूल), श्रीमती मधु सूद (रवीन्द्र निकेतन पब्लिक स्कूल), श्रीमती तान्या शर्मा (टी॰ पी॰ एस॰), श्रीमती सीमा अहमद (आलोक मेमोरियल स्कूल), श्रीमती बीना शर्मा (टी॰ पी॰ एस॰), श्रीमती सीमा चौधरी (राजकीय सी॰ सै॰ स्कूल, हरमाड़ा), श्री धीरज मिश्रा ( टैगोर विद्द्या भवन), श्रीमती पीयूष सूद (द रूटस पब्लिक स्कूल) को सम्मानित किया जाएगा । कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ॰ अशोक गुप्ता (वाइस चांसलर, दी आई. आई. एस. यूनिवर्सिटी), श्री पी. डी. सिंह (कमिशनर, अवंतिका, राजस्थान), डॉ॰ आनंद अग्रवाल (राष्ट्रीय निदेशक, अवंतिका) द्वारा किया जाएगा । इस अवसर पर विख्यात मंत्रज्ञ व मेडिटेसन एक्सपर्ट निर्मला सेवानी, बाल विलक्षण प्रतिभा मनन सूद (गूगल बॉय) तथा संगीतज्ञ श्री सुदेश शर्मा आकर्षण का केंद्र रहेगे। उक्त जानकारी अवंतिका राजस्थान कोडिनेटर श्री आलोक सूद तथा मिडिया प्रभारी एम के पाण्डेय निल्को ने दी।

जन्मदिन उन बच्चो के साथ

जन्मदिन उन बच्चो के साथ
डाल गले मे हाथ
खा रहे थे सभी बैठ सड़क पर
पिज्जा हम उनके साथ
कोई जाति नहीं
कोई मजहब नहीं
जो उनको दे दिया
है वही सही

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