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भारत महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश


एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट में भारत को महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश बताया गया है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की सर्वे में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा, मानव तस्करी और यौन व्यापार में ढकेले जाने के आधार पर भारत को महिलाओं के लिए खतरनाक बताया गया है । 

इस सर्वे के अनुसार महिलाओं के मुद्दे पर युद्धग्रस्त अफगानिस्तान और सीरिया क्रमश: दूसरे और तीसरे सोमालिया चौथे और सउदी अरब पांचवें स्थान पर हैं । सात साल पहले इसी सर्वे में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश बताया गया था।

दुनिया भर से केवल 548 जानकारों से 26 मार्च से 4 मई के बीच ऑनलाइन फोन और व्यक्तिगत तौर पर रायशुमारी की गई और बना दी गई एक ऐसा रिपोर्ट जिस पर विश्वास हो भी तो क्यो और कैसे ? 


जो फिरंगी आजतक एक आदर्श परिवार न बसा सके वो खुद के बनाए मापदंड के अनुसार भारत का सर्वे कर रहे है ? इस मुद्दे पर महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा है कि भारत के बाद रखे गए देशों में महिलाओं को बोलने का हक भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों से सर्वे किया गया उनकी संख्या बहुत कम है। उनकी राय के आधार पर दुनिया की राय नहीं बनाई जा सकती। 

भारत से ज्यादा सुरक्षा जिन देशो में है इस सर्वे के मुताबिक , उनका नाम लिखुंगा तो हसते हसते पेट मे दर्द हो जाएगा । आज भी भारत की महिलाएं और देशो की महिलाओं की तुलना में बहुत सभ्य संस्कारी और सुरक्षित है हाँ कुछ अपवाद हो सकते है इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता लेकिन इस तरह की रिपोर्ट तो बस पूर्व प्रायोजित ही है । महिलाएं ही नहीं किसी भी श्रेणी के लोगो के लिए भारत ही सबसे सुरक्षित देश है , इसके लिए कोई भी इतिहास का सहारा ले सकता है ।

एम के पाण्डेय निल्को

रोज़ी-रोटी का मसला सुलझे,कविता-कहानियां भी तभी सुहाती हैं

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था साफ तौर पर दो भागों में बंटी हुई नजर आती है। एक आधुनिक शिक्षा प्रणाली है जिसके अंतर्गत रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम हैं एवं दूसरी तरफ परम्परागत शिक्षा व्यवस्था है जिसके साथ रोजगार के बहुत की कम अवसर जुड़े हुए हैं। रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने वाली शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक रूप से सम्पन्न वर्ग तत्पर दिखाई देता है क्योंकि वह जानते हैं कि उनके बच्चे इस शिक्षा को प्राप्त करके ही बड़े रोजगार प्राप्त कर सकते हैं। हमारे ग्रामीण युवाओं के माता-पिता इतने सम्पन्न नहीं होते कि वे बच्चों को महंगी शिक्षा उपलब्ध करा सकें। हमारे देश में शिक्षा के लिए ऐसा वातावरण तैयार होता जा रहा है जिसमें सभी को सब कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। ऐसे वातावरण के लिए हमारी सरकारी नीति ही जिम्मेवार है।

देश की आजादी के समय लॉर्ड मैकाले द्वारा दी गई शिक्षा व्यवस्था को ही अंगीकार किया गया जिससे हमारे देश का आज तक केवल नुकसान ही हुआ है। आज भी हम शिक्षा के लिए ग्रामीण स्तर पर आधारभूत ढांचा तैयार नहीं कर सके हैं। कई गांवों में आज भी प्राथमिक स्कूलों की कमी है। बच्चे आज भी कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाने को अभिशप्त हैं। ऐसे वातावरण में कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार अपने बच्चों को आगे की शिक्षा के लिए शहरों में भेजने की स्थिति में नहीं होते। आज भी लभग 60 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक स्कूल से आगे पढऩे की स्थिति में नहीं होते। 40 प्रतिशत बच्चे माध्यमिक शिक्षा के बाद पढऩा छोड़ देते हैं। 20 से 25 प्रतिशत बच्चे हाई स्कूल तक जाते-जाते विपरीत परिस्थितियों में फंस जाते हैं तब हम सोच सकते हैं कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीण युवकों की क्या स्थिति होगी। यदि परम्परागत शिक्षा प्राप्त करके कोई ग्रामीण युवा स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर भी लेता है तब वह रोजगार के बाजार में अपने आप को कहीं भी स्थापित नहीं कर पाता। सरकारी क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति बहुत ही खराब है। पिछले कई सालों में भर्तियां लगभग नहीं के बराबर हैं। निजी क्षेत्रों में बीए या एमए किए हुए युवाओं को सम्मानजनक रो•ागार नहीं मिल पाता क्योंकि वहां तो प्रबंधकों और आईटी प्रोफेशनल्स की ही आवश्यकता बनी हुई है।

हमारे ग्रामीण समाज के केवल 0.12 प्रतिशत युवा ही कोई मैनेजमेन्ट या रोजगार परक कोर्स करने में सफल हो पाते हैं । उनमें से केवल 0.2 प्रतिशत ही कोई बड़ा रोजगार प्राप्त करने में सफल होते हैं। हमारी सरकार ने जिस तेजी से रोजगारोन्मुख शिक्षा का निजीकरण किया है उसके चलते गरीब आम आदमी को ऐसी शिक्षा से वंचित होना पड़ा है। निजी क्षेत्र ने इंजीनियरिंग, चिकित्सा, मैनेजमेंट, कम्प्यूटर एवं विभिन्न रोजगारोन्मुख डिप्लोमा एवं सर्टिफिकेट कोर्स की शिक्षा व्यवस्था पर लगभग कब्जा कर लिया है और मनमाने ढंग से प्रवेश प्रक्रिया एवं फीस का ढांचा खड़ा कर लिया है जिसके चलते उनके द्वारा संचालित संस्थान केवल पैसा बनाने और डिग्रियां बांटने में संलग्न हैं। शहरी साधन- सम्पन्न लोगों के बच्चों को प्रवेश देकर मोटी फीस वसूली जाती है ताकि उनकी तथा उनके संस्थान की सेहत बनी रहे। शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटके ये संस्थान सरकारी दिशा-निर्देशों का अक्षरश: पालन कभी नहीं करते क्योंकि उन्होंने अपने नियम कानून अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ लिये हैं।

गरीब आम आदमी एवं ग्रामीण युवाओं को उच्च शिक्षा से ही वंचित रखने काकेवल खेल नहीं चल रहा है उन्हें प्रारंभ से ही पर्याप्त स्कूली शिक्षा से भी वंचित रखने का षड्यंत्र चल रहा है। बड़े पब्लिक स्कूलों के पास गरीबों के बच्चों को भी मुफ्त और अच्छी शिक्षा देने का कोई कार्यक्रम नहीं है। वे देशहित में सोचने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे केवल उन्हें ही अपने स्कूलों में प्रवेश देते हैं जो उनके द्वारा निर्धारित फीस को बिना कोई सवाल-जवाब किए अदा कर सकें। इसी प्रारंभिक स्तर से ही जीवन स्तर की खाई पडऩी शुरू हो जाती है फलस्वरूप अमीर और गरीब समाज का निर्माण होता है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अमीर और गरीब के बीच की खाई तेजी से चौड़ी होती जा रही है जिसका मुख्य कारण शिक्षा में असमानता ही है।

शिक्षा की असमानता से ग्रामीण युवा तेजी से बेरोजगार होते जा रहे हैं क्योंकि परम्परागत शिक्षा से रोजगार प्राप्त नहीं हो पाता। इससे वे कुंठित होते जा रहे हैं। ऐसे में एक अराजक समाज के निर्माण की नींव डाली जा रही है जिसके परिणाम भविष्य में विस्फोटक हो सकते हैं। ग्रामीण युवा छोटे-मोटे कार्यों के लिए ही शहर की ओर पलायन कर रहे हैं जिससे देश के राजस्व की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि क्षेत्र को भी नुकसान हो रहा है। शहरों में जीवन स्तर में भारी अंतर को देखते हुए कुछ युवा जल्दी अमीर बनने के चक्कर में अपराध के गहरे अंधकार में खो जाते है। गांवों में यदि वे रहते है तब भी वे खेती के कार्य में तालमेल बिठाने में सक्षम नहीं होते क्योंकि एक सच्चाई यह भी है कि खेती आजकल घाटे का सौदा बनती जा रही है, उसमें लागत मूल्य निकालना ही दूभर हो गया है। ऐसे में सभी रास्ते बंद देखकर ग्रामीण युवा क्या करे और कहां जाए, उसे कुछ भी समझ नहीं आता।

हमारी सरकार को चाहिए कि वह इस समस्या को समझे तथा ग्रामीण युवाओं के लिए कुछ ऐसा करे ताकि वे अपना जीवन यापन समाज की मुख्य धारा में जुड़कर कर सकें। ग्रामीण युवाओं को ऐसे अवसर उपलब्ध कराए ताकि वे कुंठित न हों। शिक्षा की गारंटी या ‘स्कूल चलें हम’ एवं मिड डे मील जैसे सरकारी प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। जमीनी स्तर पर सच्चाई कुछ और ही है इस बात को समझने की आवश्यकता है। प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा जो कि रोजगार परक हो एवं शिक्षा के बाद रोजगार के लिए प्रशिक्षण आदि कार्यक्रम को उच्च निरीक्षण वाली समिति के संरक्षण में गति प्रदान करनी होगी तब ही हमारे समाज में असमानता की खाई को पाटा जा सकता है। महात्मा गांधी जी ने भी कहा था कि जब तक हमारे समाज का ग्रामीण वर्ग सुविधा सम्पन्न नहीं होगा देश वास्तविक तरक्की की राह पर नहीं चल सकता एक सामाजिक सच है कि कोइ आदमी समाज पर बोझ नहीं हो सकता क्‍योंकि यदि वह खाने के लिये लिये एक पेट लेकर पैदा होता है तो कमाने के लिये दो हाथ लेकर जमीन पर आता है। इसका साफ मायने तो यह है कि कोइ व्‍यक्ति नैसर्गि‍क तौर पर बेरोजगार या बेकार नहीं होना चाहिये। यानि मानवीय समाज में बेरोजगारी का कोइ स्‍थान नहीं होना चाहिये। जबकि वर्तमान में यह ऐसा रोग बन गया है जिसका सही सही डायगनोस ही नहीं हो पाया है। कहने का मतलब साफ है कि बेरोजगारी दूर करने के सच्‍चे प्रयास किये ही नहीं गये है और जो प्रयास किये जा रहे है वे प्रयास कम, शोरशराबा ज्‍यादा है । सरकारी विभाग अपनी नौकरी बचाने के लिए स्‍वरोजगार, अपने धंधे खडे करने के‍ लिए ऋण एवं ट्रेनिंग की सिफारिश कर रहें है । सुनने में यह सिफारिशें रोचक लग सकती है लेकिन बढती जनसंख्‍या बेरोजगारी की चपेट में जिस तरह से आ रही है उसकी कहानी बढते अपराध, भष्‍टाचार, उग्रवाद,तस्‍करी,जैसे अनन्‍त विषयों पर समाप्‍त होती है । सादा लफ्जों में आप कह सकते है कि बेरोजगारी ही सब रोगों की जड है । आज मैं सोचता हूं कि बचपन से लेकर आजतक बेरोजगारी पर पता नहीं कितनी बार निबन्‍ध लिखें होंगे । लेकिन फिर भी इस विषय पर समग्रता से सोचने व विचारने की गुंजाइश अभी भी बाकी है । प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपनी उम्र में बेरोजगारी का सामना अवश्‍य करता है । इसीलिए प्रत्‍येक व्‍यक्ति इस विषय पर एक गम्‍भीर सोच व जानकारी भी रखता है । ज्‍यादा जानकारी रखने वाले कुछ समझदार काउन्‍सलर बनकर बेरोजगारी दूर करने के रोग में नुस्‍खें बताते हुए देखे जा सकते है । वास्‍तव में बेरोजगारी एक ऐसा स्‍लोगन है जिस पर नेताओं की नेतागिरी हमेशा चमकायी जा सकती है, और चमकायी जा रही है । आप माने या न मानें, शायद ही ऐसी कोई योजना या परियोजना हो जिसमें रोजगार देने का लक्ष्‍य निर्धारित न हो । लेकिन रोजगार सृजन का तरीका बेहद गजब है । जरा उदाहरण से समझिए, कि सरकार का कहना है कि देश में लगभग एक हजार स्‍पेशल इकानामिक जोन को मंजूरी मिलने के बाद लगभग एक तीस लाख लोगों को रोजगार मिलेगा । अब यह रोजगार पाने वाले कौन लोग होंगे । इसका निर्धारण कौन करेगा एवं कैसे होगा । किस प्रकार के हुनरमन्‍द या सामान्‍य शिक्षा हासिल किये हुए बेरोजगार इन जोन में नौकरी पा सकते है । इस मामले पर कोई कार्य योजना प्रस्‍तुत नहीं की जाती बल्कि नियोजकों की इच्‍छा व मनमर्जी पर बेरोजगारों को छोड दिया जाता है । सरकारी मशीनरी नौकरी देने का काम विकेन्द्रित कर चुकी है या यूं कहे कि इतने महत्‍वपूर्ण कार्य को प्रत्‍येक सामान्‍य विभाग के जिम्‍मे छोड दिया गया है । सरकार यह मान चुकी है कि पहले तो सरकारी नौकरियां बहुत कम है और जो है उन पर वरीयता सबसे पहले सत्‍ता पक्ष को मिलनी चाहिए इसीलिए आम जनता ईमानदारी से नौकरी पाने का सपना छोड दें।

देश में इस समय नरेगा, मनरेगा के द्वारा प्रत्‍येक घर से बेरोजगारी को उखाड फेंकने के लिए 100 दिन के रोजगार की गारण्‍टी दी जा रही है । मेरी नजर में रोजगार एक आजीविका होती है जो जीवन के साथ साथ्‍ा चलने वाली आर्थिक क्रिया है जिसके द्वारा प्रत्‍येक व्‍यकित गरिमापूर्ण जीवन जी सकता है । लेकिन 100 दिन का रोजगार देकर सरकार आम आदमी को केवल 100 दिन ही गरिमा के साथ जीने का अधिकार देना चाहती है । उसमें भी पता नहीं कितने तरह की कोताही बरती जा रही है । चलिए न मामा से अच्‍छा काना मामा । इसी प्रकार कुछ दिन पूर्व उत्‍तर प्रदेश सरकार ने भी बेरोजगारी दूर करने की कसम खा कर अपना वोट बैंक बढाना चाहा था । बेरोजगारों को अपना बनाने के लिए उस समय की सरकार 500 रू0 प्रति महीना बेरोजगारी भत्‍ता देकर सरकारी रिश्‍वत देने की कोशिश करते हुए लगभग 11 करोड रूपये बॉट दिये थे । एक अचरज की बात ओर यह है कि बेरोजगारी भत्‍तें से ज्‍यादा रूपया भत्‍ता वितरण हेतु मुख्‍यमंत्री द्वारा आयोजित कार्यक्रमों पर खर्च कर दिया गया । प्रदेश का पूरा प्रशासनिक अमला जिस मुस्‍तैदी से इस कार्य को अन्‍जाम दिया वह तारीफ के काबिल था । यदि इस प्रकार की मुस्‍तैदी गरीबी मिटाने एवं भूखें परिवारों को चिन्हित करने के लिए दिखायी जाती तो कितना बेहतर रहता । 

Rajasthan 12th Board Result 2016

We are informing you all RBSE students, Rajasthan Board 12th Result 2016 declared on 16th May 2016 at 6:00PM Today. As Board of secondary education Rajasthan announce the exact date we will update here. We are reuqestiing your all students belongs from scince, commerce and arts stream please keep patience. Firstly Rajasthan Boardannounced Commerce Result 2016 and after that science result 2016 and arts result 2016. For viewing the RBSE 12th Result 2016 online connected with us. We will update the 12th result 2016 BSER here on the same time when board update it on the official website rajresults.nic.in 


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कारगिल युद्ध – विजय दिवस

किसी का चित्र नोटों पे
किसी का चिन्ह वोटो पे
शहीदों तुम ह्रदय में हो
तुम्हारा नाम होंठो पे …..

VMW Group सभी शहीदों को कोटि कोटि नमन करता हैं।
जय हिन्द जय भारत

आज कारगिल युद्ध की वर्षगाठ है आप सभी को इस

विजय दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
और हमारे जांबाज सैनिको और शहीद जवानों को शत शत नमन…


One year of Narendra Modi Government

 आज से करीब एक साल पहले देश में हुए आम चुनावों में यहां की आवाम ने ऐसा फैसला सुनाया जो वाकई चौंकाने वाला था। भारतीय जनता ने एकजुट होकर सत्ता की बागडोर किसी एक पार्टी को या कहें कि एक इंसान को ही सौंप दी। वो शख्स कोई और नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे।

लोकसभा चुनावों में मोदी ने जिस तरह से अच्छे दिनके सपने जनता के सामने संजोए उससे जनता को उन पर अटूट विश्वास सा जग गया। इसीलिए तो देश में 1984 के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब किसी एक पार्टी ने केंद्र में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। इन चुनावों में मोदी फैक्टर ने जमकर अपना असर दिखाया।
यूपीए सरकार के दौरान हुई गलतियों, घोटालों और सरकार के उठाए गए कदमों को मोदी ने जमकर भुनाया। मोदी ने तत्कालीन मनमोहन सरकार को घोटालों की सरकारकह के संबोधित किया। इतना ही नहीं उन्होंने चुनावों में कांग्रेस मुक्त भारतका नारा दे दिया।
चाहे आम चुनावों के दौरान की बात हो या फिर सत्ता संभालने के बाद की स्थिति हो। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बातों से लोगों के दिलों पर राज जरूर किया। उन्होंने लगभग सभी मुद्दों पर अपने बयानों से जनता के बीच जगह बनाई। जनता ने उनमें अपने नायक की छवि देखी।
शायद यही वजह थी कि लोकसभा चुनावों में उन्हें पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का मौका दिया। लेकिन जिस अंदाज में पीएम मोदी ने जनता के बीच अपनी बातें रखी सत्ता में आने के बाद ये सरकार उससे उलट काम करती दिखाई दी। शायद यही वजह थी कि धीरेधीरे ही सही लेकिन महज एक साल लोगों की धारणा बदलने लगी। आज परिस्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं।
एक साल के भीतर आखिर ऐसा क्या हो गया कि जिस शख्स को देश की जनता ने भारीभरकम बहुमत से सत्ता दी। उससे भरोसा उठने सा लगा है। इसके पीछे वजह और कोई नहीं खुद प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की कार्यशैली है।
जिन मुद्दों की वजह से पीएम मोदी सत्ता में आए अब वो उन्हीं मुद्दों से पीछे हटने लगे। एक के बाद एक यूटर्न से जनता में उनकी छवि को गहरा धक्का लगा। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कटाक्ष से सामने आता है। जिसमें उन्होंने इस सरकार को सूटबूट की सरकार कह कर संबोधित करना शुरू किया है।
राहुल गांधी ने ना केवल मोदी सरकार को इस जुमले से घेरने की कोशिश की है। बल्कि उस सच्चाई को भी बताया है जिसे जनता भी समझने लगी है।
ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को ये समझने की जरूरत है कि जिस जनता ने उन्हें चुना है अगर जल्दी ही इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो हालात बिगड़ भी सकते हैं। जनता का मोहभंग होने में समय नहीं लगता। इसलिए जरूरी यही है कि अब प्रधानमंत्री मोदी बातों और वादों की जगह कुछ ऐसा करें कि जनता को उन पर फिर से विश्वास कायम हो जाए।

प्रधानमंत्री मोदी ने जब देश की सत्ता संभाली तो उन्होंने किसानों के लेकर कई ऐलान किए। लेकिन उन दावों की पोल एक साल में ही खुल गई। इस दौरान में देश के अलगअलग हिस्सों में किसानों ने आत्महत्याएं की। एक अनुमान के मुताबिक देश में हर आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या करता है। साल 2014 में भी आत्महत्या की दर में तेजी आई है।

इन सबके बीच केंद्रीय खुफिया विभाग ने हाल ही किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। जिसमें कहा गया था कि किसानों की आत्महत्या की वजह प्राकृतिक भी है और कृत्रिम भी। इसमें बारिश, ओलावृष्टि, सिंचाई की दिक्कतें, सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक वजहें शामिल हैं। हालांकि इस रिपोर्ट में कहीं भी इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि आखिर किसानों की समस्या पर अंकुश कैसे और कब लगेगा? इन सबके बीच अब ये मोदी सरकार को सोचना है कि आखिर कैसे वो देश के अन्नदाताको बचाते हैं? आखिर वादों की जो फेहरिस्त चुनाव में नजर आई थी उसकी बानगी देखना बाकी है।




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ऐसे बुद्ध जिनका श्रम ही आनंद – डा. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय

अनुकरणीय: लोक सेवक की साहित्य साधना बनी चर्चा का विषय

ब्रजेश पाण्डेय, सिद्धार्थनगर – गौतम की धरती को एक ऐसे बुद्ध मिले हैं, जो अक्षर के ज्ञान रूपी सागर को गागर में भरने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। यह कोई और नहीं अपने डीएम हैं डा. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय। माटी का सौभाग्य है कि चौबीस में बारह घंटे आम जनता और सरकार को देते हैं, तो तीन से चार घंटे किताबों को। 1 बहुत कम लोगों को पता है कि जिलाधिकारी लेखन प्रतिभा के धनी हैं। अध्यात्म से लेकर योग और साहित्य पर इतनी मजबूत पकड़ कि व्यस्त समय में दो दर्जन किताबें हमारे बीच प्रकाश पुंज हैं। वास्तु विमर्श और न्यायाधिपति ग्रह शनि-एक समग्र विवेचक नाम से दोप्रकाशाधीन हैं। कपिलवस्तु महोत्सव के बहाने ही सही इनकी किताबें भी चर्चा की विषय बनी हुई हैं। किताबों के संग्रह भंडार में ज्ञान की असीम दीप जलायी गयी है। 1शब्द संक्षेप सागर के नाम से नवीन विधा की रचना हिन्दी रूपांतरण ने इसकी बोधगम्यता, उपयोगिता, व सार्थकता द्विगुणित कर दी है। सामान्य ज्ञान की दिशा में यह किताब मील का पत्थर है। इसमें सामान्य ज्ञान के व्यापक आयाम एवं अंतरदृष्टि को लेकर प्रणीत है। हिन्दी भाषा के प्रसार एवं उसको हिन्दीतर क्षेत्रों में लोकप्रिय बनाने के साथ ही यह शिक्षा, कृषि विज्ञान, प्रशासन, चिकित्सा, कंप्यूटर राजनीति अन्तर्जाल एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए लोगों के लिए निश्चित तौर पर उपयोगी साबित हो सकती है। दैनिक काम काज में जुड़े ऐसे लोग जिनके लिए अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी रूपांतरण कठिन है, उनके लिए यह मुफीद है। 1 गंगा दशहरा जून 2014 को प्रकाशित ‘शब्द संक्षेप सागर’ को लिखने के पीछे की कहनी कम दिलचस्प नहीं है। डा. सुरेन्द्र बताते हैं कि जुलाई 2013 में विशेष सचिव वित्त के रूप में सचिवालय में जब तैनात था तो बैठकों में अनेक योजनाएं, संस्थान, समितियों एवं विभागों का नाम संक्षेप में प्रयोग किया जाता था।1 शब्द संक्षेपों के बारे में जानकारी न होने पर मुङो व अन्य प्रतिभागियों को भी विषय वस्तु को आत्म सात करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता था। उसी संकल्प एवं निश्चय का प्रतिफल है कि आज यह किताब मौजूदा एवं भावी पीढ़ी के लिए समर्पित है। पुस्तक को और अधिक ज्ञानवर्धक बनाने के लिए सभी के लिए सुलभ कराया गया है। पुस्तक रचना में अग्रज राकेश चौबे विशेष सचिव वित्त का भरपुर मार्ग दर्शन और सहयोग मिला। मेरा श्रम ही मेरे लिए आनंद है। किताब के लिए तीन से चार घंटे तो निकाल ही लेता हूं। योग और अध्यात्म के बारे में लिखी गई पुस्तक पर कहते हैं कि रचना में उनकी प}ी प्रेमा पाण्डेय का अहम योगदान हैं, जिन्होंने गृह कार्यो से निश्चित रखकर मुङो सहयोग दिया।ब्रजेश पाण्डेय, सिद्धार्थनगर 1गौतम की धरती को एक ऐसे बुद्ध मिले हैं, जो अक्षर के ज्ञान रूपी सागर को गागर में भरने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। यह कोई और नहीं अपने डीएम हैं डा. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय। माटी का सौभाग्य है कि चौबीस में बारह घंटे आम जनता और सरकार को देते हैं, तो तीन से चार घंटे किताबों को। 1 बहुत कम लोगों को पता है कि जिलाधिकारी लेखन प्रतिभा के धनी हैं। अध्यात्म से लेकर योग और साहित्य पर इतनी मजबूत पकड़ कि व्यस्त समय में दो दर्जन किताबें हमारे बीच प्रकाश पुंज हैं। वास्तु विमर्श और न्यायाधिपति ग्रह शनि-एक समग्र विवेचक नाम से दोप्रकाशाधीन हैं। कपिलवस्तु महोत्सव के बहाने ही सही इनकी किताबें भी चर्चा की विषय बनी हुई हैं। किताबों के संग्रह भंडार में ज्ञान की असीम दीप जलायी गयी है। 1शब्द संक्षेप सागर के नाम से नवीन विधा की रचना हिन्दी रूपांतरण ने इसकी बोधगम्यता, उपयोगिता, व सार्थकता द्विगुणित कर दी है। सामान्य ज्ञान की दिशा में यह किताब मील का पत्थर है। इसमें सामान्य ज्ञान के व्यापक आयाम एवं अंतरदृष्टि को लेकर प्रणीत है। हिन्दी भाषा के प्रसार एवं उसको हिन्दीतर क्षेत्रों में लोकप्रिय बनाने के साथ ही यह शिक्षा, कृषि विज्ञान, प्रशासन, चिकित्सा, कंप्यूटर राजनीति अन्तर्जाल एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए लोगों के लिए निश्चित तौर पर उपयोगी साबित हो सकती है। दैनिक काम काज में जुड़े ऐसे लोग जिनके लिए अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी रूपांतरण कठिन है, उनके लिए यह मुफीद है। 1 गंगा दशहरा जून 2014 को प्रकाशित ‘शब्द संक्षेप सागर’ को लिखने के पीछे की कहनी कम दिलचस्प नहीं है। डा. सुरेन्द्र बताते हैं कि जुलाई 2013 में विशेष सचिव वित्त के रूप में सचिवालय में जब तैनात था तो बैठकों में अनेक योजनाएं, संस्थान, समितियों एवं विभागों का नाम संक्षेप में प्रयोग किया जाता था।1 शब्द संक्षेपों के बारे में जानकारी न होने पर मुङो व अन्य प्रतिभागियों को भी विषय वस्तु को आत्म सात करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता था। उसी संकल्प एवं निश्चय का प्रतिफल है कि आज यह किताब मौजूदा एवं भावी पीढ़ी के लिए समर्पित है। पुस्तक को और अधिक ज्ञानवर्धक बनाने के लिए सभी के लिए सुलभ कराया गया है। पुस्तक रचना में अग्रज राकेश चौबे विशेष सचिव वित्त का भरपुर मार्ग दर्शन और सहयोग मिला। मेरा श्रम ही मेरे लिए आनंद है। किताब के लिए तीन से चार घंटे तो निकाल ही लेता हूं। योग और अध्यात्म के बारे में लिखी गई पुस्तक पर कहते हैं कि रचना में उनकी प}ी प्रेमा पाण्डेय का अहम योगदान हैं, जिन्होंने गृह कार्यो से निश्चित रखकर मुङो सहयोग दिया।स्टाल पर प्रदर्शित जिलाधिकारी डा.सुरेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई पुस्तकें। जागरण ।डा.सुरेन्द्र कुमार।ज्यातिष शब्द कोष, ज्योतिष पंचशील, आयुर्वेद पंचशती, श्लेष अलंकर सिद्धांत एंव प्रयोग, धर्म शास्त्रस्रसहस्रकम, उत्तर खोजते प्रश्न, र} विमर्श, उत्तर प्रदेश की नदियां एवं पहाड़, हिन्दु समाज के प्रचलित संस्कार, भारत की विदुषी महिलाएं, शंकर गीता, वास्तु शब्दार्णव (उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से पुरस्कृत) अमृत जीवन (उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से पुरस्कृत) अरिष्टयोग विमर्श,(उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से पुरस्कृत) पूर्वाचल लोक भाषा कोश, अमेरिका का प्रशैक्षणिक यात्र-एक संस्मरण, सम्पादन-सूर्य विमर्श, संपादन-हिन्दुस्तानी त्रैमासिक लेख-अनुक्रमणिका, संपादन-संस्कृति पुरुष: पंडित विद्या निवास मिश्र, संपादन-सोहित्य-शेवधि, संपादन-इलाहाबाद साहित्यकार को कोष, संपादन-भारतीय मनीषा दर्शन, कौशाम्बी का स्वर्णिम इतिहास एवं वर्तमान, योग और अभ्यास।