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मोटिवेशनल कहानी

एक लड़का था जो एक ऑफ़िस मैं 8 घंटे की डूटी करता 9 – 5 की। मगर रोज 8 बजे  office पहुँच जाता और देर रात तक काम करता रहता। 

एक दिन एक साथी ने पूछा, क्यूँ ? इतना काम करते हो ? कोई ओवर टाइम तो मिलता नहीं। 
वो बोला 8 घंटे डूटी तो सैलरी के लिया करता हूँ , बाक़ी के घंटे तरक़्क़ी, काम की बारीकी को सीखने और आगे बढ़ने के लिए करता हूँ।
काम घड़ी देख के मत करो । जब तक जिम्मेदारी पूरी ना हो तब तक करो। 
शुभ दिन
एम के पाण्डेय निल्को
Managing Worker – VMW Team 
| Research Scholar | छुट्टा आलोचक |
कलम, कैमरा और कम्प्यूटर | http://www.vmwteam.in

होलिका दहन – जश्न का पर्व

कहते हैं होलिका दहन के दिन तीन चीजों का होना काफी शुभ माना जाता है. ये तीन चीजें हैं प्रदोण काल का होना, पुर्णिमा तिथि का होना और भद्रा ना लगा होना. इस साल ये तीनों संयोग बन रहे है. जिससे इस साल होलिका दहन बहुत शुभ मानी जा रही है . फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के शुभ मुहूर्त में आज होलिका दहन और पूजन किया जाएगा। इसलिए इस शुभ मुहूर्त में पूजा करेंगे तो सौभाग्य मिलेगा।

आज शाम होलिका दहन किया जाएगा और कल रंगों के साथ इस पर्व का जश्न मनाया जाएगा.

मैं फिर से ‘नज़र निल्को की’ ये शीर्षक ले कर आया हूँ

आज कई दिनो बाद फिर यहाँ पर आया हूँ

इतने दिन व्यस्त रहा वो बताने आया हूँ

आप याद किए या न किए हो पर

मैं फिर से नज़र निल्को की ये शीर्षक ले कर आया हूँ

सादर वंदे

एम के पाण्डेय निल्को 

खुले मंच पर देता हूँ चुनौती

हमारे मेसेज को पढ़कर के
ग्रुप में आया एक तूफान
कुछ लोगो के दिल में
उठ गई एक उफान
पलटकर दिया उन्होंने जवाब
जैसे हड्डी बीच कवाब
खुले मंच पर देता हूँ चुनौती
क्यू की वो भी है लाज़वाब
स्वर एक साथ हुए खड़े
प्रयोग हुए शब्द कड़े
बीचबचाव में आये एडमिन
नहीं तो अपनी बात पर हम भी अड़े
मन में रह गई है कसक
हो गया था भेजा सरक
पर शुक्रिया उस शख्स की
जिसने बना आँखो का पलक
पर अब खींच गई है तलवारे
अब इनको कौन सुधारे
जब मिलगे फिर सभी
तो ही दूर होगी तकरारे

सादर वंदे
एम के पाण्डेय निल्को

आखिर कब तक ढूँढेगा निल्को

बहुत याद आउगा 
जब छोड़ के जाउगा
चाहे लाख बुराई क्यू न हो
पर तुम जैसा दोस्त नहीं पाउगा

बहुत छेड़ता हूँ न मैं
परेशान भी करता हूँ न मैं
गुस्सा तुम होते हो मन ही मन
पर मनाता भी न हूँ मैं

क्यू सताते हो कुछ इस तरह
मिलते नहीं हो रोज की  तरह
आखिर कब तक ढूँढेगा निल्को
तुम्हे बीच इस शहर

कहती हो न की छोडो मुझको
अपनी बाहों में न लो मुझको
उस दिन आँसू न बहाना
जिसदिन छोड़ जाऊगा तुम सबको

बहुत ही अच्छा मैं तो नहीं
दिल से बच्चा मैं तो नहीं
पर एक बात तो कहूँगा ही
थोडा सा सच्चा मैं भी सही

एम के पाण्डेय निल्को 




शिक्षा , शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था

किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा के अनेक आयाम हैं, जो राष्ट्रीय विकास में शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हैं। वास्तविक रूप में शिक्षा का आशय है ज्ञान, ज्ञान का आकांक्षी है-शिक्षार्थी और इसे उपलब्ध कराता है शिक्षक।
तीनों परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। एक के बगैर दूसरे का अस्तित्व नहीं। यहां शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाली प्रबंधन इकाई के रूप में प्रशासन नाम की नई चीज जुड़ने से शिक्षा ने व्यावसायिक रूप धारण कर लिया है। शिक्षण का धंधा देश में आधुनिक घटना के रूप में देखा जा सकता है।
प्राचीनकाल की ओर देखें तब भारत में ज्ञान प्रदान करने वाले गुरु थे, अब शिक्षक हैं। शिक्षक और गुरु में भिन्नता है। गुरु के लिए शिक्षण धंधा नहीं, बल्कि आनंद है, सुख है। शिक्षक अतीत से प्राप्त सूचना या जानकारी को आगे बढ़ाता है, जबकि गुरु ज्ञान प्रदान करता है। शिक्षा से मानव का व्यक्तित्व संपूर्ण, विनम्र और संसार के लिए उपयोगी बनता है। सही शिक्षा से मानवीय गरिमा, स्वाभिमान और विश्व बंधुत्व में बढ़ोतरी होती है। अंतत: शिक्षा का उद्देश्य है-सत्य की खोज। इस खोज का केंद्र अध्यापक होता है, जो अपने विद्यार्थियों को शिक्षा के माध्यम से जीवन में और व्यवहार में सच्चाई की शिक्षा देता है। छात्रों को जो भी कठिनाई होती है, जो भी जिज्ञासा होती है, जो वे जानता चाहते हैं, उन सबके लिए वे अध्यापक पर ही निर्भर रहते हैं। यदि शिक्षक के मार्गदर्शन में प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा को उसके वास्तविक अर्थ में ग्रहण कर मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में उसका प्रसार करता है तो मौजूदा 21वीं सदी में दुनिया काफी सुंदर हो जाएगी। आज की युवा पीढ़ी ऐसी शिक्षा प्रणाली चाहती है जो उसके खोजी और सृजनशील मन को सबल बनाने के साथ-साथ उसके सामने चुनौती प्रस्तुत करे। देश का भविष्य उन पर टिका हुआ है। वे वर्तमान में शिक्षा प्रणाली के संबंध में सोच-विचार करना चाहते हैं। एक अच्छी शिक्षा प्रणाली में ऐसी क्षमता होनी चाहिए जो छात्रों की ज्ञान प्राप्ति की तीव्र जिज्ञासा को शांत कर सके। शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे पाठ्यक्रम बनाने के लिए खुद को तैयार करना चाहिए जो विकसित भारत की सामाजिक और प्रौद्योगिकी संबंधी आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील हाें। वर्तमान पाठ्यक्रम में विकास कार्यो की गतिविधियों को अनिवार्यत: स्थान दिया जाना चाहिए ताकि ज्ञान समाज की भावी पीढ़ी पूरी तरह से सामाजिक परिवर्तन के सभी पहलुओं के अनुकूल हो सके।शिक्षा क्या है’ में जीवन से संबंधित युवा मन के पूछे-अनपूछे प्रश्न हैं और जे.कृष्णमूर्ति की दूरदर्शी दृष्टि इन प्रश्नों को मानो भीतर से आलोकित कर देती है पूरा समाधान कर देती है। ये प्रश्न शिक्षा के बारे में हैं, मन के बारे में हैं, जीवन के बारे में हैं, विविध हैं, किन्तु सब एक दूसरे से जुड़े हैं।
“गंगा बस उतनी नहीं है, जो ऊपर-ऊपर हमें नज़र आती है। गंगा तो पूरी की पूरी नदी है, शुरू से आखिर तक, जहां से उद्गम होता है, उस जगह से वहां तक, जहां यह सागर से एक हो जाती है। सिर्फ सतह पर जो पानी दीख रहा है, वही गंगा है, यह सोचना तो नासमझी होगी। ठीक इसी तरह से हमारे होने में भी कई चीजें शामिल हैं, और हमारी ईजादें सूझें हमारे अंदाजे विश्वास, पूजा-पाठ, मंत्र-ये सब के सब तो सतह पर ही हैं। इनकी हमें जाँच-परख करनी होगी, और तब इनसे मुक्त हो जाना होगा-इन सबसे, सिर्फ उन एक या दो विचारों, एक या दो विधि-विधानों से ही नहीं, जिन्हें हम पसंद नहीं करते।”
क्या आप स्वयं से यह नहीं पूछते कि आप क्यों पढ़-लिख रहे हैं ? क्या आप जानते है कि आपको शिक्षा क्यों दी जा रही है और इस तरह की शिक्षा का क्या अर्थ है ? अभी की हमारी समझ में शिक्षा का अर्थ है स्कूल जाना पढ़ना लिखना सीखना, परीक्षाएं पास करना कालेज में जाने लगते हैं। वहाँ फिर से कुछ महीनों या कुछ वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, परीक्षाएं पास करते हैं और कोई छोटी-मोटी नौकरी पा जाते हैं, फिर जो कुछ आपने सीखा होता है भूल जाते हैं। क्या इसे ही हम शिक्षा कहते हैं ? क्या आप समझ रहे हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ ? क्या हम सब यही नहीं कर रहे हैं ? 
लड़कियां बी. ए. एम.ए. जैसी कुछ परीक्षाएं पास कर लेती हैं, विवाह कर लेती हैं, खाना पकाती हैं या कुछ और बन जाती हैं, बच्चों को जन्म देती हैं और इस तरह से अनेक वर्षो में पाई जाने वाली शिक्षा पूर्णतः व्यर्थ हो जाती है हां, यह जरूर जान जाती हैं कि अंग्रेजी कैसे बोली जाती है, वे थोड़ी-बहुत चतुर, सलीकेदार, सुव्यवस्थित हो जाती हैं और अधिक साफ सुथरी रहने लगती हैं, पर बस उतना ही होता है, है न ? किसी तरह लड़के कोई तकनीकी काम पा जाते हैं, क्लर्क बन जाते हैं या किसी तरह शासकीय सेवा में लग जाते है इसके साथ ही सब समाप्त हो जाता है। ऐसा ही होता है न ? 
आप देख सकते हैं कि जिसे आप जीना कहते हैं, वह नौकरी पा लेने बच्चे पैदा करने, परिवार का पालन-पोषण करने, समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं को पढ़ने, बढ़–चढ कर बातें कर सकने और कुशलतापूर्वक वाद-विवाद कर सकने तक सीमित होता है। इसे ही हम शिक्षा कहते हैं-है न ऐसा ? क्या आपने कभी अपने माता-पिता और बडे लोगों को ध्यान से देखा है ? उन्होंने भी परीक्षाएं पास की हैं, वे भी नौकरियां करते हैं और पढ़ना-लिखना जानते हैं। क्या शिक्षा का कुल अभिप्राय इतना है ? 
दुर्भाग्य से हमारे देश में समाज के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और आदर प्राप्त “शिक्षक” की हालत अत्यधिक दयनीय और जर्जर कर दी गई है।
शिक्षक शिक्षण छोड़कर अन्य समस्त गतिविधियों में संलग्न हैं। वह प्राथमिक स्तर का हो अथवा विश्वविद्यालयीन, उससे लोकसभा, विधानसभा सहित अन्य स्थानीय चुनाव, जनगणना, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अथवा अन्य इस श्रेणी के नेताओं के आगमन पर सड़क किनारे बच्चों की प्रदर्शनी लगवाने के अतिरिक्त अन्य सरकारी कार्य संपन्न करवाए जाते हैं।
देश की शिक्षा व्यवस्था एवं शिक्षकों की मौजूदा चिंतनीय दशा के लिए हमारी राष्ट्रीय और प्रादेशिक सरकारें सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, जिसने शिक्षक समाज के अपने हितों की पूर्ति का साधन बना लिया है। शिक्षा वह है, जो जीवन की समस्याओं को हल करे, जिसमें ज्ञान और काम का योग है? 
आज विद्यालय में विद्यार्थी अध्यापक से नहीं पढ़ते, बल्कि अध्यापक को पढ़ते हैं।

मुझे ऐसी कोई शिक्षा व्यवस्था नजर नहीं आ रही, जिसे हम एक आदर्श ढांचा कह सकें, हरेक में तमाम कमियां हैं। आप चाहे जैसा ढांचा तैयार कर लें, उसमें आप भले ही कमियां न ढूंढ पाएं, लेकिन बच्चे जरूर उसमें कमियां निकाल लेंगे। आप पाएंगे कि आप जैसी भी पुख्ता व्यवस्था क्यों न बनाएं, बच्चे उसमें सुराख ढूंढ ही लेते हैं। मेरे ख्याल से ऐसे बहुत सारे बच्चे हैं, जो व्यव्स्था में कमियां ढूंढ निकालते हैं इसका मतलब कि वे बच्चे वाकई अच्छे हैं! एक अच्छी शिक्षा नीति में, ज्ञान तथा शिक्षा प्राप्त करना आसान होना चाहिए ताकि हर किसी को शिक्षा प्राप्त करने का समान अवसर मिले, और जिसमें जाती, वर्ण और वर्ग जैसे शब्दों का कोई स्थान न हो । इसमें कोई शक नहीं की शिक्षा में आरक्षण एक अच्छे मक्सद ( वर्गीकरण की समाप्ति ) को प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल में लाया गया तथा अधिनियमित किया गया , परन्तु इसके विपरीत ये विभाजिकरण का एक मुख्य कारण बन गया है, ज्यादातर महाविद्यालयों एवं संस्थानों में लोग आरक्षण से क्रुद्ध हो कर गुटबंदी कर लेते है और कमजोर वर्ग के लोगों का बहिष्कार करते हैं तथा उन्हें हीन समझते हैं । शिक्षा नीति में चाहिए की शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के पहुँच में हो ताकि शिक्षा ग्रहण करने में उसके परिवार की आर्थिक ऋण न टूट जाये । जबकि शिक्षा के निजीकरण के बाद इस लक्ष्य की प्राप्ति की शिक्षा एक अत्यंत लाभकारी व्यवसाय के रूप में निखर के आया है ।
शिक्षा की धांधली को
अब हम कैसे मिटायें
शिक्षा हमारा जीवन है
इसे कैसे आगे बढायें

एम के पाण्डेय निल्को

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गीत ग़ज़ल हो या हो कविता – एम के पाण्डेय निल्को


गीत ग़ज़ल हो या हो कविता 
नज़र है उस पर चोरो की 
सेंध लगाये बैठे तैयार 
कॉपी पेस्ट को मन बेक़रार 
लिखे कोई और, पढ़े कोई और 
नाम किसी और का चलता है 
कुछ इस तरह इन चोरो का 
ताना बना भी चलता रहता है 
सोच सोच कर लिखे गजल जो
प्रसंशा वो नहीं पाता है 
पर चुराए हुए रचना पर 
वाह वाही खूब कमाता है 
मन हो जाता उदास निल्को 
किसी और का गुल खिलाये जाते है 
वो खुश होता किन्तु 
मन से पछताए जाये है 
***************
एम के पाण्डेय निल्को 

कन्या हत्या सर्वाधिक भारत मे

नवरात्रि के पवन पर्व पर

कन्याए जिमाई जाती है

ढुढ़ते है घर घर उनको

फिर पूजन करी जाती है

कन्या हत्या सर्वाधिक भारत मे

फिर भी देवी का रूप माना जाता है

विरोधाभास लगती है रीति रिवाज भी

आखिर इनका बचपन काटा क्यो जाता है

****************
एम के पाण्डेय ‘निल्को’

Valentine Special – आग लगे इस वेलेंटाइन डे को

क्या रोज डे
क्या प्रपोज डे
क्या करे प्रॉमिस डे को
किसे किस करे किस डे को
जब गर्ल फ्रेंड ही नहीं हमारी तो
आग लगे इस वेलेंटाइन डे को
जिस के नीचे बया करते है प्यार अपना
थोड़ा प्यार करे उस पेड़ को
अक्सर धोखा खा जाते है इश्क मे लोग
क्योकि दिल की जगह जिस्म चाहने लगे है लोग
प्यार का प्रदर्शन कुछ इस तरह करते है लोग
जैसे लाज हया बेच आए है वे लोग
विरोधी नहीं है निल्को प्रेम का
मिलता है मुझे भी भेट सप्रेम का
किन्तु प्यार का प्रदर्शन न हो कुछ इस तरह
की लोग कहे की बेशर्म है ये देश का
राज तो अपना भी चला करता है
पसंद करने वालो के दिल मे
और नापसन्द करने वालो के दिमाग मे बसा करता है
देखो अपना तो सीधा सा फंडा है यार
7 days मनाओ वेलेंटाइन का प्यार
आप लोगो से विनीति है बार बार
ध्यान रखे प्यार के लिए न हो वार
********************
एम के पाण्डेय निल्को


एम के पाण्डेय ‘निल्को’ की कविता – वो दूरिया बढ़ाते गए

वो दूरिया बढ़ाते गए
और कुछ लोग यह देख कर मुस्कुराते गए
इस ज़िंदगी के कशमकश में
शायद निल्को को वो भुलाते गए
जब याद दिन वो आते है
इतिहास बनाए जाते है
ढ़ूढ़ते है सबको इधर उधर
पर तन्हा की ख़ुद को पाते है
जब जब तुम मुझसे दूर गए
शायद हमें तुम भूल गए
पर पुरानी अपनी बातों से
कहा तुम चूक गए
पर सुनो लकीरें भी बड़ी अजीब होती हैं
माथे पर खिंच जाएँ तो किस्मत बना देती हैं
जमीन पर खिंच जाएँ तो सरहदें बना देती हैं
खाल पर खिंच जाएँ तो खून ही निकाल देती हैं
और रिश्तों पर खिंच जाएँ तो दीवार बना देती हैं
जब जब तुम मौन रहते हो
तब तब मैं गुज़रते लम्हों में सदिया तलाश करता हूँ
में अपने आप में ही खामिया तलाश करता हूँ
अब तो  मेरा खुदसे मिलने को जी चाहता है
काफी कुछ सुना रहा हूँ अपने बारे में
इतना, आसान हूँ कि हर किसी को समझ आ जाता हूँ
लेकिन शायद तुमने ही ठीक से न पढ़ा है मुझे
किन्तु ये सबक मिल ही गया जाते जाते मुझे
अच्छे होते हैं बुरे लोग
कम से कम अच्छे होने का,
वे दिखावा तो नहीं करते………
सादर



एम के पाण्डेय निल्को

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कान्हा ओं कान्हा – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

आदरणीय मित्रो ;
नमस्कार;
मेरी पहली भक्ति रचना  “कान्हा ओं कान्हा” आप सभी को सौंप रहा हूँ । मुझे उम्मीद है कि  मेरी ये छोटी सी कोशिश आप सभी को जरुर पसंद आएँगी,  रचना   कैसी लगी पढ़कर बताईये कृपया अपने भावपूर्ण कमेंट से मेरा हौसला बढाए. कृपया अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा. आपकी राय मुझे हमेशा कुछ नया लिखने की प्रेरणा देती है और आपकी राय निश्चिंत ही मेरे लिए अमूल्य निधि है |


कान्हा ओं कान्हा

कैसा हो गया जमाना
लगता है अब फिर पड़ेगा
तुम्हे धरती पे आना
कान्हा ओं कान्हा….!
सब कुछ तुम देख रहे हो
फिर भी नहीं कुछ बोल रहे हो
पर आज तुम्हे पड़ेगा बताना ….!
बासुरी की धुन पर
तुम सबको नचाते
पता नहीं क्या – क्या
तुम रास रचाते …!
दिल किसी का
तुम न दुखाते
फिर क्यों ऐसा
दिन दिखाते ….!
पर ये जो कुछ भी
हो रहा है
तुम सब यह देख रहे हो
पर मौन का कारण
तुम्हे पड़ेगा बताना …!
दुःख तो बहुत है
लोग भी बहुत है
पर तुम बिन
कोई नहीं है…!
एक बार फिर आ जाओ
अपने दर्शन करा जावो
‘निल्को’ की यही चाह
पूरा करा जाओ …!
जब तक तुम न आओगे
मुझे अकेला पाओगे
कैसे मुझे समझोगे
जब तुम्हे हम बुलायेगे …! 
*************
एम के पाण्डेय निल्को’

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