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कोरोना पर कुछ दोहे द्वारा सरिता कोहिनूर

कोरोना की फैलती,बीमारी घर द्वार।
महमारी भारी हुई,कहता अब संसार।।

काल भंयकर आ गया,भज लो प्रभू का नाम।
कोरोना का हो गया,विश्व बड़ा अब धाम।।

छूने से यह फैलता,खाँसी छींक जुकाम।
श्वसन तंत्र को फेल कर,मृत्यु लाय तमाम।

विचलित मानव सभ्यता,जीवन के आधार।
कोरोना का डर बुरा,घबराया संसार।।

अर्थव्यवस्था ठप्प है,ठप्प हुये सब काम।
मंदिर मस्जिद बंद है,घर में बंद अवाम।।

शेयर सभी लुटक गये,बंद हुये व्यापार।
भारी क्षती के दिख रहे,हम सबको आसार।।

त्राही त्राही मच गई, हुई प्रकृति की मार।
भैया अब तो बंद कर,सारे अत्याचार।।

साबुन से अब हाथ धो,कुछ मत छूना यार।
कहना यदि तुम मान लो,बचा रहे आधार।।

महमारी से जूझते,बूढे, बाल, जवान।
दूषित पानी अरु हवा,है विष वेल समान।।

कालेज इस्कूल बंद सब,और सिनेमा हाल।
सभागार सब बंद है,बंद हुये सब माल।।

सैर सपाटा बंद कर ,घर चुप बैठें लोग।
रूखी सूखी जो मिले,शांत लगाये भोग।।

कोरोना से हो रहा ,महा भयंकर नाश।
मानव मूरख खुद बना,करके जगत विनाश।।

सरिता कोहिनूर 💎

Mobile Addiction – Track & Control

तकनीक के इस दौर में हम दुनिया के साथ मिलकर चलना चाहते हैं, लेकिन क्या हम इसको आदत भी बनाना चाहते हैं? घर से लेकर ऑफिस तक हमारे हाथ में स्मार्टफोन खेल रहा होता है या ये कहें कि हम उसके हाथ खेले जा रहे होते ऐसे में यह समझना बहुत जरूरी है कि कहीं आप स्मार्टफोन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर अपना समय तो बर्बाद नहीं कर रहे हैं? एक रिपोर्ट कहती है कि 80 प्रतिशत स्मार्टफोन यूजर्स सुबह जागने के 15 से 20 मिनट के भीतर अपने फोन को चेक करते हैं तथा एक दिन मे औसतन 3-4 घंटे मोबाइल का इस्तेमाल करते है वहीं दिन भर मे लगभग 150 बार अपने मोबाइल को अनलॉक करते है। वैसे तो फोन पर टेक्स्टिंग, इंटरनेट सर्फिंग, ईमेल भेजने, एप्लिकेशन को यूज करने और गेम्स खेलने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसमें जरूरत से ज्यादा उपयोग आपकी सेहत के लिए भी ठीक नहीं है। 

सबसे पहले आप अपने स्मार्ट फोन में YourHour – Phone Addiction Tracker & Controller एप्लिकेशन डाउनलोड करें (लिंक- shorturl.at/bvwH8) आप इस एप्लिकेशन से देखेगे की आप कितना मोबाइल उपयोग करते है , कौन सा एप्प कितनी देर इस्तेमाल करते है फिर आप उस को कम कर सकते है । फिर भी आप इस लत को कम नहीं कर पा रहें है तो ये तरीके अपनाए – 
1. जिस जेब व पर्स के पॉकेट में आप फोन रखते हैं या रखती हैं, उसकी जगह कुछ दिन बदल दें, इससे वह तुरंत आपके हाथों में आने से बचेगा और हो सकता है कि इस बीच आप किसी और काम में व्यस्त हो जाएं। 
2. स्मार्टफोन की सेटिंग्स में जाकर नोटिफिकेशन बंद कर दें। इससे बार-बार आपका ध्यान फोन की नोटिफिकेशन बीप बजने पर नहीं जाएगा। यदि किसी को आपसे कोई जरूरी काम होगा तो वह आपको सीधे कॉल कर लेगा। 
3. दिन के कुछ घंटे आप अपना डाटा ऑफ़ रखें यानी कि इंटरनेट बंद रखें। इससे आपका मन बार-बार फोन देखने के लिए नहीं ललचाएगा और बैटरी की भी बचत होगी।

4. अपने फोन को चेक करने का समय निश्चित करें, उसी दौरान आप सभी अपडेट्स देख लें, बार-बार देखने से भी आपके काम की ज्यादा अपडेट्स आ जाएगी, ऐसा तो होने से रहा 
5. पक्का मन बना लें कि सुबह उठते ही कुछ घंटे फोन से दूर रहेंगे और रात को सोने के कुछ घंटे पहले ही फोन को दूर रख देंगे। 
6. जब आप फोन से थोड़ी दूरी बनाकर चलेंगे तो स्वत: ही आपका मन दूसरे पसंदीदा कामों में लगने लगेगा, साथ ही आप कई अन्य तरह की परेशानियों से भी बच जाएंगे।

एम के पाण्डेय निल्को

गोस्वामी तुलसीदास की जयंती मनाई गई

जयपुर , गोपालपुरा बाइपास स्थित कृष्ण विहार हनुमान मंदिर में सरयूपारीण ब्राह्मण समाज, राजस्थान के तत्वावधान में गोस्वामी तुलसीदास जयंती कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमे मंदिर परिसर में आम, जामुन, अशोक सहित कई छायादार और फलदार पौधे समाज के अध्यक्ष बलराम मिश्रा के निर्देश में रोपण किया गया ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देवस्थान के चेयरमैन श्री आ डी शर्मा ने वरिष्ठजन  को स्मृति चिन्ह और अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया तथा गोस्वामी तुलसीदास के जीवन पर प्रकाश डाला ।

समारोह में डॉ राम किशोर शुक्ल, डॉ जय प्रकाश पाण्डेय , डॉ राजेंद्र मिश्र, डॉ अशोक तिवारी को उनके क्षेत्र मे उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम संचालक डॉ जयनारायण शुक्ल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए मानस के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से बताया कि किस तरह हम आजके भटके युवा वर्ग को सही मार्ग पर लाकर उसे सही संस्कार दे सकते हैं । महासचिव ओमप्रकाश तिवारी ने दु:ख प्रकट करते हुए कहा कि जब से पाठ्यक्रमों से रामायण-गीता जैसे संस्कार देने वाले ग्रन्थों को धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर बाहर निकाल दिया गया तब से हमारे बालक-बालिकाएँ उन संस्कारों से वंचित होगए जिनका उनके जीवन में महत्व था । परिणाम हमारे सामने है । मानस का लक्ष्मण-परशुराम संवाद युवाओं में जान फूँक देता था । अपने अद्यक्षीय उद्बोधन में डॉ अशोक तिवारी ने इस बात पर विशेष बल दिया की युवावर्ग को राम चरित मानस जैसे ग्रन्थों का नियमित अध्ययन करना चाहिए ।

कार्यक्रम के अंत में सुरेन्द्र चौबे ने कहा की तुलसी के साध्य राम की भक्ति है, पर साधन है उनकी कविता, तुलसी कविता की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि कविता वह है जो बुद्धिमानों को संतुष्ट करती है, आम आदमी का मनोरंजन करती है व तात्कालिक समस्याओं का समाधान करती है। उनका काव्य हमारे भीतरी और बाहरी तापों का शमन करने में सक्षम है।  यही कारण है कि वे सांस्कृतिक क्रांतिकारी माने जाते हैं तथा संगठन सचिव ए के पाण्डेय ने धन्यवाद उद्बोधन मे कहा की भारतीय समाज की अस्मिता का आधार शताब्दियों से राम चरित मानस रहा है और गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित्र मानस में हमारी अस्मिता को वाणी दी है। उपरोक्त अवसर पर श्री राम तिवारी, राजेश मिश्रा, सौरभ, विजय तिवारी, दुर्गा प्रसाद मिश्र, राकेश पाठक, ज्ञानेश्वर पाण्डेय, विनायक, विजय, मधुलेश, रवि, बबलू, सम्पत, नीलेश, सिद्धेश, हरी नारायण सहित सैकड़ो लोग उपस्थित थे ।

मोदीजी को बधाई

मोदीजी को बधाई
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     बहस बहुत बधाई .लोक सभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन के लिए .  वैसे मोदी को समर्थन करने के नाते इस देश की बहुसंख्यक जनता को बहुत गालियाँ , अपशब्द सुनने पड़े हैं. चोचलेबाज विपक्षियों के . अंधभक्त कहकर अपमानित किया गया . सच्चे हिन्दुस्तानियों को देशभक्ति के लिए विपक्षी जलील करते रहे . और सभी मोदी के गुणों की समर्थक जनता मौन-मुखर दोनों तरह से सहती रही है । एक महिला नेता  आपको थप्पड़ (प्रजातंत्र का )  मारने की कहकर सरेआम हिंसक और असंसदीय हुई थी । अब जनता ने सबको एक साथ जवाब दे दिया है ।  “चौकीदार चोर है” कहनेवाले की बोलती बंद करदी है ।  आप के हर कार्य पर सही का ठप्पा लगाया है इसलिए बधाई ।

.               पुलवामा काण्ड पर घेरने की साजिश करने वाले , पाकिस्तान के भरोसे मोदी को हराने की साजिश करने वाले , जनता को भ्रम मे डालने की कोशिश करने वालों को जनता ने घेरे मे रख दिया है ।रफाल पर जनता  को बर्गलाने की साजिश विपक्ष के काम नहीं आयी . जनता ने अंततः मोदी पर भरोसा किया ।

         देश के विखण्डन , भेदभाव पूर्णव्यवहार, और सरकार को चलने मे जगह-जगह रोड़ा अटका कर जनता के बीच झूठ फैला कर येनकेनप्रकारेण सत्ता पर काबिज होने के लिए  सेना, मान. सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और ईवीएम  को दोष देने वालों की जनता ने एक न चलने दी .
आगे के लिए यह सभी के लिए लेसन हैं । जातिवाद वर्गवाद की दीवार तोड़कर जनता ने मोदी को अपनाया है ।अत: आगामी पाँच वर्षों के लिए पुनः एक सक्षम सरकार  को ध्यान में रखकर मोदी जी को कोटिश: बधाइयाँ । 
शुभमस्तु ।

                     —  —  –हरि शरण ओझा ।

499/500 अंक पाने वाले मेधावी कितने विशिष्ट हैं !

भारतवर्ष मेधा की खान है । आदि गुरु शंकराचार्य ,स्वामी विवेकानंद ,वीरबालक अभिमन्यु के नाम से सभी परिचित हैं । आज कल कई ऐसे बच्चे टीवी पर दिखाये जाते हैं जो असाधारण जानकारियाँ प्रस्तुत कर सबको चकित कर देते है । लेकिन इनकी अद्भूत क्षमता जन्म से संभवतः माता पिता के द्वारा वंशानुगत रूप से प्राप्त हुई । किसी विद्यालय या शिक्षा बोर्ड के कोर्स  पर आधारित नहीं पायी जाती । ये अतिविशिष्ट होते है जो विद्यालय या शिक्षा बोर्डों से हरदम ऊपर रहे ।

             अब 499/500 या 498/500 अंक प्राप्त कर परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं को किस कोटि मे रखा जाय ? इस घटना को पूर्णता का कौन सा नाम दिया जाय ? आश्चर्य होता है कि किसी एक को भी 500/500 क्यों नहीं मिला ?  फिर भी , मै 499 या 498 को  परफेक्ट कहना चाहता हूँ । इसका सीधा अर्थ यह होता है कि प्रश्नपत्र निर्माता, माडरेटर , परीक्षक यानी उत्तरपुस्तिकाओ़ का मूल्यांकन कर्ता और परीक्षार्थी अर्थात मेधावी  ये सभी एक ही  हैं । तभी तो पूरे पूरे अंक मिले । यह शैक्षिक दृष्टि से कितना महत्व रखता है , यह तो शिक्षा शास्त्री ही बेहतर जानेंगे लेकिन एक बात निश्चित है कि एक साथ 75 से अधिक बच्चों का लगभग परफेक्ट हो जाना यह बताता है कि पाठ्यक्रम, शिक्षण, प्रश्नपत्र निर्माण , उनका उत्तर और मूल्यांकन सबकुछ घिसा-पिटा हो गया है । बस्तुनिष्ठता के चक्कर मे सृजनात्मकता नदारत । पूरे अंक मिलने के बाद इन्होंने बोर्ड को पीछे छोड़ दिया है , वाकई सभी बधाई के पात्र हैं ।

                  लिखित परीक्षा प्रणाली की खामियों की चर्चा बहुत की जाती है । इसलिए प्रेक्टिकल और प्रोजेक्ट आदि को लागू किया जाता है ताकि हमारे बच्चे कार्यात्मक दृष्टि से अधिक से अधिक सक्षम हों । लेकिन लिखित में प्राप्त पूर्ण अंकों को पूर्ण सफलता का आधार कोई नहीं मानता , और यहीं पर परीक्षा पद्धति और प्राप्तांकों की विश्वसनीयता वैधता घटने लगती है ।और आगे चलकर बहुतों के लिए यह मृगमरीचिका सिद्ध होने लगती है । इस बात से सभी बच्चों को अवगत कराते रहना सभी का दायित्व है । अच्छा तो तब हो जब हमारी परीक्षा पद्धति वास्तविक मेधा और प्रगतिशील क्षमता की पहचान करे न कि केवल पूर्ण अंक लाने और देने को ही अपना लक्ष्य बना ले ।  मेधावी बच्चों को शुभकामनाओं सहित । शुभमस्तु ।
                             —  —  — हरि शरण ओझा ।

गंगा मइया की रक्षा के लिए अनशन पर बैठा एक संत अमर हो गया |

लंबे समय से मां गंगा की स्वच्छता और रक्षा की मांग कर रहे पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल की गुरुवार को मौत हो गई। उन्‍हें स्वामी सानंद के नाम से जाना जाता था। स्वामी सानंद पिछले 112 दिनों से अनशन पर थे और उन्होंने 9 अक्टूबर को जल भी त्याग दिया था। उन्‍होंने ऋषिकेश में दोपहर एक बजे अंतिम सांस ली। वह 87 साल के थे। सानंद गंगा नदी की स्वच्छता को लेकर प्रयासरत थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिख चुके थे। 

जीडी अग्रवाल आईआईटी कानपुर में सिविल और पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख थे। उन्होंने राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण का काम किया। इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सचिव भी रहे।

गंगा समेत अन्य नदियों की सफाई को लेकर जीडी अग्रवाल ने पहली बार 2008 में हड़ताल की थी। मांगें पूरी कराने के लिए उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों को अपना जीवन समाप्त करने की धमकी भी दी। वे तब तक डटे रहे, जब तक सरकार नदी के प्रवाह पर जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण को रद्द करने पर सहमत न हुई।

जुलाई 2010 में तत्कालीन पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री जयराम रमेश ने व्यक्तिगत रूप से उनके साथ बातचीत में सरकार के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। साथ ही, गंगा की महत्वपूर्ण सहायक नदी भागीरथी में बांध नहीं बनाने पर सहमति भी जताई।

2014 में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा की स्वच्छता के लिए प्रतिबद्धता दिखाई थी। इसके बाद जीडी अग्रवाल ने आमरण अनशन खत्म कर दिया था। हालांकि, सरकार बनने के बाद से अब तक ‘नमामि गंगे’ परियोजना का सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। ऐसे में अग्रवाल ने 22 जून, 2018 को हरिद्वार के जगजीतपुर स्थित मातृसदन आश्रम में दोबारा अनशन शुरू कर दिया।

अग्रवाल 2012 में पहली बार आमरण अनशन पर बैठे थे। इस दौरान राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण को निराधार कहते हुए उन्होंने इसकी सदस्यता से त्याग पत्र दे दिया। साथ ही, अन्य सदस्यों को भी यही करने के लिए प्रेरित किया। पर्यावरण के क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा को देखते हुए उनके हर उपवास को गंभीरता से लिया गया।

10 जुलाई, 2018 को पुलिस ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे जीडी अग्रवाल को जबरन उठा लिया और एक अज्ञात स्थान पर ले गए। अग्रवाल ने इसके खिलाफ उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 12 जुलाई, 2018 को उत्तराखंड के मुख्य सचिव को आदेश दिया कि जीडी अग्रवाल से अगले 12 घंटे में बैठक करके उचित हल निकाला जाए। इसके बावजूद कुछ भी सार्थक परिणाम नहीं निकला।

सरकार ने वयोवृद्ध पर्यावरणविद को ऋषिकेष स्थित एम्स में हिरासत में ले लिया। यहां चिकित्सकों के जबरदस्ती करने पर भी उन्होंने भोजन नहीं किया। 9 अक्टूबर से जल भी त्याग दिया था। इस दौरान सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने उनसे अनशन खत्म करने का आग्रह किया, जिसे स्वामी सानंद ने अस्वीकार कर दिया था।

भारत महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश


एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट में भारत को महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश बताया गया है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की सर्वे में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा, मानव तस्करी और यौन व्यापार में ढकेले जाने के आधार पर भारत को महिलाओं के लिए खतरनाक बताया गया है । 

इस सर्वे के अनुसार महिलाओं के मुद्दे पर युद्धग्रस्त अफगानिस्तान और सीरिया क्रमश: दूसरे और तीसरे सोमालिया चौथे और सउदी अरब पांचवें स्थान पर हैं । सात साल पहले इसी सर्वे में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश बताया गया था।

दुनिया भर से केवल 548 जानकारों से 26 मार्च से 4 मई के बीच ऑनलाइन फोन और व्यक्तिगत तौर पर रायशुमारी की गई और बना दी गई एक ऐसा रिपोर्ट जिस पर विश्वास हो भी तो क्यो और कैसे ? 


जो फिरंगी आजतक एक आदर्श परिवार न बसा सके वो खुद के बनाए मापदंड के अनुसार भारत का सर्वे कर रहे है ? इस मुद्दे पर महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा है कि भारत के बाद रखे गए देशों में महिलाओं को बोलने का हक भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों से सर्वे किया गया उनकी संख्या बहुत कम है। उनकी राय के आधार पर दुनिया की राय नहीं बनाई जा सकती। 

भारत से ज्यादा सुरक्षा जिन देशो में है इस सर्वे के मुताबिक , उनका नाम लिखुंगा तो हसते हसते पेट मे दर्द हो जाएगा । आज भी भारत की महिलाएं और देशो की महिलाओं की तुलना में बहुत सभ्य संस्कारी और सुरक्षित है हाँ कुछ अपवाद हो सकते है इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता लेकिन इस तरह की रिपोर्ट तो बस पूर्व प्रायोजित ही है । महिलाएं ही नहीं किसी भी श्रेणी के लोगो के लिए भारत ही सबसे सुरक्षित देश है , इसके लिए कोई भी इतिहास का सहारा ले सकता है ।

एम के पाण्डेय निल्को

कौन है यह चोटीकटवा ? जानें पूरा सच…!

बीते कई दिनों से चर्चाओं में आए चोटी कटवा को लेकर हर कोई सच्चाई जानना चाहता है । हर कोई जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा?  इसको लेकर बड़े-बड़े टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और वेब मीडिया में भी सुर्खियां बनी हुई है । तो वही सरकार से लेकर पुलिस प्रशासन भी चोटी कटवा को लेकर हैरान है, और जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा? सर्च करने पर पता चला कि राजस्थान से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली, गुडगांव, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित अलग-अलग जगहों से भी आ रही हैं, समझ आया कि मसला मास हिस्टीरियाका है ।
राजस्थान के एक छोटे से गांव से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली हरियाणा चंडीगढ़ पंजाब होते होते देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश जा पहुंची है। यहां के मथुरा, आगरा, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, देवरिया समेत कई शहर चोटी कटवा से दहशत जदां है । यहां के कई गांवों से चोटी कटवा नाम की अफवाह से सनसनी मची हुई है । इससे सबसे ज्यादा दहशत में महिलाएं हैं, और अपनी चोटी बचाने को लेकर हैरान हैं। क्योंकि उसकी किसी ना किसी पड़ोसी गांव में या पड़ोसी की चोटी कट गई है , और अब वह भी दहशत में है। सच तो यह है कि 2017 में भी हम ऐसे हैं कि हमारे बीच मास हिस्टीरिया फैलाना बहुत आसान है।  आप सोचिए कि कौन सा भूत ऐसे लोगों की चोटी काटते फिरेगा?  कैमरे के सामने आने के लिए क्या लोग ये नहीं कर सकते?  या फिर बस डर के मारे?  मैं नहीं कह रहा कि ऐसा ही है, पर ऐसा भी हो सकता है। यूजीन इनस्को (फ्रेंच लेखक) की किताब राइनोसोर्स  की कहानी याद आ गई, ऐसा होता है कि एक आदमी शहर में राइनोसोर्स बन जाता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और धीरे-धीरे बाकी सब। ये चोटीकटवा की कहानी कुछ ऐसी ही लगती है. इसके कई तर्क हो सकते हैं,  पब्लिसिटी,  धार्मिक संवेदना फैलाना,  मास हिस्टीरिया फैलाना। कुछ भी हो सकता है, मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि हम जरा सोचे कि कहीं हम सब राइनोसोर्स तो नहीं बन रहे?
अपने आसपास के माहौल में अफवाहों की चपेट में आकर लोग एक्यूट साइकोसिस (मेनिया) की जद में आकर मास हिस्टीरिया का शिकार हो रहे हैं। इसमें कोई अंजान डर एक से दूसरे में पहुंचकर अफवाहों को बढ़ावा देता है। मास हिस्टीरिया की उन जगहों पर होने की आशंका ज्यादा रहती है जहां परिवार या समाज में भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इसमें पीड़ित को देखकर परिवार या अन्य आसपास के सदस्य खुद को उसी में ढालने की कोशिश करते हैं।  मास हिस्टीरिया एक सामान्य समस्या है। इसमें यदि एक बच्चा शिकायत करता है कि उसे पेट दर्द हो रहा है तो अन्य बच्चों को भी लगता है कि उनके साथ भी वैसा ही हो रहा है। जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं होता। हिस्टीरिया (Hysteria) की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। बहुधा ऐसा कहा जाता है, हिस्टीरिया अवचेतन अभिप्रेरणा का परिणाम है। अवचेतन अंतर्द्वंद्र से चिंता उत्पन्न होती है और यह चिंता विभिन्न शारीरिक, शरीरक्रिया संबंधी एवं मनोवैज्ञानिक लक्षणों में परिवर्तित हो जाती है। 

एम के पाण्डेय निल्को

शोध छात्र 


रोज़ी-रोटी का मसला सुलझे,कविता-कहानियां भी तभी सुहाती हैं

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था साफ तौर पर दो भागों में बंटी हुई नजर आती है। एक आधुनिक शिक्षा प्रणाली है जिसके अंतर्गत रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम हैं एवं दूसरी तरफ परम्परागत शिक्षा व्यवस्था है जिसके साथ रोजगार के बहुत की कम अवसर जुड़े हुए हैं। रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने वाली शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक रूप से सम्पन्न वर्ग तत्पर दिखाई देता है क्योंकि वह जानते हैं कि उनके बच्चे इस शिक्षा को प्राप्त करके ही बड़े रोजगार प्राप्त कर सकते हैं। हमारे ग्रामीण युवाओं के माता-पिता इतने सम्पन्न नहीं होते कि वे बच्चों को महंगी शिक्षा उपलब्ध करा सकें। हमारे देश में शिक्षा के लिए ऐसा वातावरण तैयार होता जा रहा है जिसमें सभी को सब कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। ऐसे वातावरण के लिए हमारी सरकारी नीति ही जिम्मेवार है।

देश की आजादी के समय लॉर्ड मैकाले द्वारा दी गई शिक्षा व्यवस्था को ही अंगीकार किया गया जिससे हमारे देश का आज तक केवल नुकसान ही हुआ है। आज भी हम शिक्षा के लिए ग्रामीण स्तर पर आधारभूत ढांचा तैयार नहीं कर सके हैं। कई गांवों में आज भी प्राथमिक स्कूलों की कमी है। बच्चे आज भी कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाने को अभिशप्त हैं। ऐसे वातावरण में कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार अपने बच्चों को आगे की शिक्षा के लिए शहरों में भेजने की स्थिति में नहीं होते। आज भी लभग 60 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक स्कूल से आगे पढऩे की स्थिति में नहीं होते। 40 प्रतिशत बच्चे माध्यमिक शिक्षा के बाद पढऩा छोड़ देते हैं। 20 से 25 प्रतिशत बच्चे हाई स्कूल तक जाते-जाते विपरीत परिस्थितियों में फंस जाते हैं तब हम सोच सकते हैं कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीण युवकों की क्या स्थिति होगी। यदि परम्परागत शिक्षा प्राप्त करके कोई ग्रामीण युवा स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर भी लेता है तब वह रोजगार के बाजार में अपने आप को कहीं भी स्थापित नहीं कर पाता। सरकारी क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति बहुत ही खराब है। पिछले कई सालों में भर्तियां लगभग नहीं के बराबर हैं। निजी क्षेत्रों में बीए या एमए किए हुए युवाओं को सम्मानजनक रो•ागार नहीं मिल पाता क्योंकि वहां तो प्रबंधकों और आईटी प्रोफेशनल्स की ही आवश्यकता बनी हुई है।

हमारे ग्रामीण समाज के केवल 0.12 प्रतिशत युवा ही कोई मैनेजमेन्ट या रोजगार परक कोर्स करने में सफल हो पाते हैं । उनमें से केवल 0.2 प्रतिशत ही कोई बड़ा रोजगार प्राप्त करने में सफल होते हैं। हमारी सरकार ने जिस तेजी से रोजगारोन्मुख शिक्षा का निजीकरण किया है उसके चलते गरीब आम आदमी को ऐसी शिक्षा से वंचित होना पड़ा है। निजी क्षेत्र ने इंजीनियरिंग, चिकित्सा, मैनेजमेंट, कम्प्यूटर एवं विभिन्न रोजगारोन्मुख डिप्लोमा एवं सर्टिफिकेट कोर्स की शिक्षा व्यवस्था पर लगभग कब्जा कर लिया है और मनमाने ढंग से प्रवेश प्रक्रिया एवं फीस का ढांचा खड़ा कर लिया है जिसके चलते उनके द्वारा संचालित संस्थान केवल पैसा बनाने और डिग्रियां बांटने में संलग्न हैं। शहरी साधन- सम्पन्न लोगों के बच्चों को प्रवेश देकर मोटी फीस वसूली जाती है ताकि उनकी तथा उनके संस्थान की सेहत बनी रहे। शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटके ये संस्थान सरकारी दिशा-निर्देशों का अक्षरश: पालन कभी नहीं करते क्योंकि उन्होंने अपने नियम कानून अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ लिये हैं।

गरीब आम आदमी एवं ग्रामीण युवाओं को उच्च शिक्षा से ही वंचित रखने काकेवल खेल नहीं चल रहा है उन्हें प्रारंभ से ही पर्याप्त स्कूली शिक्षा से भी वंचित रखने का षड्यंत्र चल रहा है। बड़े पब्लिक स्कूलों के पास गरीबों के बच्चों को भी मुफ्त और अच्छी शिक्षा देने का कोई कार्यक्रम नहीं है। वे देशहित में सोचने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे केवल उन्हें ही अपने स्कूलों में प्रवेश देते हैं जो उनके द्वारा निर्धारित फीस को बिना कोई सवाल-जवाब किए अदा कर सकें। इसी प्रारंभिक स्तर से ही जीवन स्तर की खाई पडऩी शुरू हो जाती है फलस्वरूप अमीर और गरीब समाज का निर्माण होता है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अमीर और गरीब के बीच की खाई तेजी से चौड़ी होती जा रही है जिसका मुख्य कारण शिक्षा में असमानता ही है।

शिक्षा की असमानता से ग्रामीण युवा तेजी से बेरोजगार होते जा रहे हैं क्योंकि परम्परागत शिक्षा से रोजगार प्राप्त नहीं हो पाता। इससे वे कुंठित होते जा रहे हैं। ऐसे में एक अराजक समाज के निर्माण की नींव डाली जा रही है जिसके परिणाम भविष्य में विस्फोटक हो सकते हैं। ग्रामीण युवा छोटे-मोटे कार्यों के लिए ही शहर की ओर पलायन कर रहे हैं जिससे देश के राजस्व की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि क्षेत्र को भी नुकसान हो रहा है। शहरों में जीवन स्तर में भारी अंतर को देखते हुए कुछ युवा जल्दी अमीर बनने के चक्कर में अपराध के गहरे अंधकार में खो जाते है। गांवों में यदि वे रहते है तब भी वे खेती के कार्य में तालमेल बिठाने में सक्षम नहीं होते क्योंकि एक सच्चाई यह भी है कि खेती आजकल घाटे का सौदा बनती जा रही है, उसमें लागत मूल्य निकालना ही दूभर हो गया है। ऐसे में सभी रास्ते बंद देखकर ग्रामीण युवा क्या करे और कहां जाए, उसे कुछ भी समझ नहीं आता।

हमारी सरकार को चाहिए कि वह इस समस्या को समझे तथा ग्रामीण युवाओं के लिए कुछ ऐसा करे ताकि वे अपना जीवन यापन समाज की मुख्य धारा में जुड़कर कर सकें। ग्रामीण युवाओं को ऐसे अवसर उपलब्ध कराए ताकि वे कुंठित न हों। शिक्षा की गारंटी या ‘स्कूल चलें हम’ एवं मिड डे मील जैसे सरकारी प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। जमीनी स्तर पर सच्चाई कुछ और ही है इस बात को समझने की आवश्यकता है। प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा जो कि रोजगार परक हो एवं शिक्षा के बाद रोजगार के लिए प्रशिक्षण आदि कार्यक्रम को उच्च निरीक्षण वाली समिति के संरक्षण में गति प्रदान करनी होगी तब ही हमारे समाज में असमानता की खाई को पाटा जा सकता है। महात्मा गांधी जी ने भी कहा था कि जब तक हमारे समाज का ग्रामीण वर्ग सुविधा सम्पन्न नहीं होगा देश वास्तविक तरक्की की राह पर नहीं चल सकता एक सामाजिक सच है कि कोइ आदमी समाज पर बोझ नहीं हो सकता क्‍योंकि यदि वह खाने के लिये लिये एक पेट लेकर पैदा होता है तो कमाने के लिये दो हाथ लेकर जमीन पर आता है। इसका साफ मायने तो यह है कि कोइ व्‍यक्ति नैसर्गि‍क तौर पर बेरोजगार या बेकार नहीं होना चाहिये। यानि मानवीय समाज में बेरोजगारी का कोइ स्‍थान नहीं होना चाहिये। जबकि वर्तमान में यह ऐसा रोग बन गया है जिसका सही सही डायगनोस ही नहीं हो पाया है। कहने का मतलब साफ है कि बेरोजगारी दूर करने के सच्‍चे प्रयास किये ही नहीं गये है और जो प्रयास किये जा रहे है वे प्रयास कम, शोरशराबा ज्‍यादा है । सरकारी विभाग अपनी नौकरी बचाने के लिए स्‍वरोजगार, अपने धंधे खडे करने के‍ लिए ऋण एवं ट्रेनिंग की सिफारिश कर रहें है । सुनने में यह सिफारिशें रोचक लग सकती है लेकिन बढती जनसंख्‍या बेरोजगारी की चपेट में जिस तरह से आ रही है उसकी कहानी बढते अपराध, भष्‍टाचार, उग्रवाद,तस्‍करी,जैसे अनन्‍त विषयों पर समाप्‍त होती है । सादा लफ्जों में आप कह सकते है कि बेरोजगारी ही सब रोगों की जड है । आज मैं सोचता हूं कि बचपन से लेकर आजतक बेरोजगारी पर पता नहीं कितनी बार निबन्‍ध लिखें होंगे । लेकिन फिर भी इस विषय पर समग्रता से सोचने व विचारने की गुंजाइश अभी भी बाकी है । प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपनी उम्र में बेरोजगारी का सामना अवश्‍य करता है । इसीलिए प्रत्‍येक व्‍यक्ति इस विषय पर एक गम्‍भीर सोच व जानकारी भी रखता है । ज्‍यादा जानकारी रखने वाले कुछ समझदार काउन्‍सलर बनकर बेरोजगारी दूर करने के रोग में नुस्‍खें बताते हुए देखे जा सकते है । वास्‍तव में बेरोजगारी एक ऐसा स्‍लोगन है जिस पर नेताओं की नेतागिरी हमेशा चमकायी जा सकती है, और चमकायी जा रही है । आप माने या न मानें, शायद ही ऐसी कोई योजना या परियोजना हो जिसमें रोजगार देने का लक्ष्‍य निर्धारित न हो । लेकिन रोजगार सृजन का तरीका बेहद गजब है । जरा उदाहरण से समझिए, कि सरकार का कहना है कि देश में लगभग एक हजार स्‍पेशल इकानामिक जोन को मंजूरी मिलने के बाद लगभग एक तीस लाख लोगों को रोजगार मिलेगा । अब यह रोजगार पाने वाले कौन लोग होंगे । इसका निर्धारण कौन करेगा एवं कैसे होगा । किस प्रकार के हुनरमन्‍द या सामान्‍य शिक्षा हासिल किये हुए बेरोजगार इन जोन में नौकरी पा सकते है । इस मामले पर कोई कार्य योजना प्रस्‍तुत नहीं की जाती बल्कि नियोजकों की इच्‍छा व मनमर्जी पर बेरोजगारों को छोड दिया जाता है । सरकारी मशीनरी नौकरी देने का काम विकेन्द्रित कर चुकी है या यूं कहे कि इतने महत्‍वपूर्ण कार्य को प्रत्‍येक सामान्‍य विभाग के जिम्‍मे छोड दिया गया है । सरकार यह मान चुकी है कि पहले तो सरकारी नौकरियां बहुत कम है और जो है उन पर वरीयता सबसे पहले सत्‍ता पक्ष को मिलनी चाहिए इसीलिए आम जनता ईमानदारी से नौकरी पाने का सपना छोड दें।

देश में इस समय नरेगा, मनरेगा के द्वारा प्रत्‍येक घर से बेरोजगारी को उखाड फेंकने के लिए 100 दिन के रोजगार की गारण्‍टी दी जा रही है । मेरी नजर में रोजगार एक आजीविका होती है जो जीवन के साथ साथ्‍ा चलने वाली आर्थिक क्रिया है जिसके द्वारा प्रत्‍येक व्‍यकित गरिमापूर्ण जीवन जी सकता है । लेकिन 100 दिन का रोजगार देकर सरकार आम आदमी को केवल 100 दिन ही गरिमा के साथ जीने का अधिकार देना चाहती है । उसमें भी पता नहीं कितने तरह की कोताही बरती जा रही है । चलिए न मामा से अच्‍छा काना मामा । इसी प्रकार कुछ दिन पूर्व उत्‍तर प्रदेश सरकार ने भी बेरोजगारी दूर करने की कसम खा कर अपना वोट बैंक बढाना चाहा था । बेरोजगारों को अपना बनाने के लिए उस समय की सरकार 500 रू0 प्रति महीना बेरोजगारी भत्‍ता देकर सरकारी रिश्‍वत देने की कोशिश करते हुए लगभग 11 करोड रूपये बॉट दिये थे । एक अचरज की बात ओर यह है कि बेरोजगारी भत्‍तें से ज्‍यादा रूपया भत्‍ता वितरण हेतु मुख्‍यमंत्री द्वारा आयोजित कार्यक्रमों पर खर्च कर दिया गया । प्रदेश का पूरा प्रशासनिक अमला जिस मुस्‍तैदी से इस कार्य को अन्‍जाम दिया वह तारीफ के काबिल था । यदि इस प्रकार की मुस्‍तैदी गरीबी मिटाने एवं भूखें परिवारों को चिन्हित करने के लिए दिखायी जाती तो कितना बेहतर रहता । 

जन्मदिन उन बच्चो के साथ

जन्मदिन उन बच्चो के साथ
डाल गले मे हाथ
खा रहे थे सभी बैठ सड़क पर
पिज्जा हम उनके साथ
कोई जाति नहीं
कोई मजहब नहीं
जो उनको दे दिया
है वही सही

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अंतरराष्ट्रीय कराटे मे पूर्वाञ्चल का प्रतिनिधितव करेगा मास्टर सिद्धेश

अंतरराष्ट्रीय कराटे मे खेलेगा, देवरिया का सिद्धेश
6 देशो के खिलाड़ी लेगे हिस्सा,पूर्वाञ्चल का प्रतिनिधितव करेगा मास्टर सिद्धेश
जयपुर में 22 जुलाई से 24 जुलाई तक होने वाली पहली अंतरराष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता में देवरिया का सिद्धेश भाग लेगा। प्रतियोगिता में 6 देशों की कराटे टीम भाग लेंगी। पूर्वाञ्चल से एक मात्र खिलाड़ी सिद्धेश है । इससे पहले मई मे भी राज्यस्त्रीय प्रतियोगिता मे सिल्वर मैडल के साथ सिद्धेश ने किया था देवरिया का नाम रौशन । इंडियनमार्शल आर्ट संस्थान के बैनर तले जयपुर में अंतरराष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा है। शुक्रवार से आयोजित होने वाली इस प्रतियोगिता में भारत सहित छह देश हिस्सा ले रहे हैं। 24 जुलाई तक चलने वाली इस प्रतियोगिता में करीब 1100 बच्चे हिस्सा लेंगे। उद्घाटन भारतीय कॉमनवेल्थ चयनकर्ता अजय कुमार शेट्टी करेंगे। प्रतियोगिता में 5 से 18 साल तक के बच्चे हिस्सा लेंगे। पहले भारत के 19 राज्यों के खिलाड़ियों के बीच प्रतियोगिता होगी। इसके आधार पर भारतीय टीम का चयन होगा। यह टीम श्रीलंका, बंगलादेश, भूटान, नेपाल और अफगानिस्तान के खिलाड़ियों को चुनौती देगी। 
किस देश से कितने खिलाड़ी 
नेपाल45 
अफगानिस्तान 33 
बंगलादेश 07 
श्रीलंका 17 
भूटान 09 
भारत 24 

Sangam Kala Group – SURTARANG – Rajasthan Audition

 Sangam Kala Group needs no introduction to the music, dance and drama loving audience. The Group is prominent non-commercial registered cultural group which is engaged in the promotion of Country’s artistic cultural tradition. The group owes its existence to the concerted efforts and devotion of young amateur artists dedicated to the cause of cultural promotion. Founded in 1974 by some such enthusiasts, the Group set forth as its main objectives the provision of cultural smooth flow of their talents in the form of dance, drama and music. Towards this direction, the Group started in a humble way by organizing plays which had one common theme “the social reform”. The plays served a dual purpose of not only making the audience think about social reforms but also of bringing to light the amateur talent which normally remains behind the veils because of lack of opportunities. In 1977, the Group organized the First All India Light Music Vocal Competition in the memory of the immortal singer Master Madan, Master Madan was the Durbar musician of His Highness the Raja Sahib Bahadur of keonthol State (Simla Hills). The Group organized this competition to spot amateur talent in the Country and bring it out of oblivion, laying special emphasis on discovering singing talent amongst the below fourteen age group. Renowned Music Director & composer from the radio, television and films have graced the panel of judges to select the best talent. The Group also offers scholarships to educate promising voices in light music.

Venue :Tigers Martial Art Academy

Civil Lines, Jaipur – 06 


for more details contact Mr. Jai Sood +91-9799113100 & Mr. M K Pandey +91-8890553555

मेकडोनाल्ड : 16 दिन पुराने तेल में पका रहे आलू-टिक्की, फ्रेंच फ्राइज

मेकडोनाल्ड : मुनाफे के िलए भरोसा तोड़ा

 
16 दिन पुराने तेल में पका रहे थे आलू-टिक्की, फ्रेंच फ्राइज 
काला और गाढ़ा तेल मिला, 2 सैंपल लिए, 120 लीटर तेल फिंकवाया 
जयपुर| पांचबत्ती स्थित मेकडोनाल्ड में पिछले 16 दिन से आलू टिक्की, फ्रेंच फ्राइज और अन्य पदार्थों को तलने वाले तेल को नहीं बदला गया था। यहां ऐसे तेल को काम में लिया जा रहा था जिसकी क्वालिटी सबसे गुणवत्ताहीन होती है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की टीम ने शुक्रवार को मेकडोनाल्ड पर कार्रवाई के दौरान ऐसी ही स्थिति पाई। टीम ने यहां खराब हो चुका 120 लीटर तेल फिंकवाया और तेल के दो नमूने लिए। साथ ही टीम ने डोमिनोज से भी दो सॉस के सैंपल लिए हैं। 

मामले के अनुसार सीएमएचओ डॉ. नरोत्तम शर्मा के निर्देश पर फूड इंस्पेक्टर की टीम शुक्रवार शाम मेकडोनाल्ड पर पहुंची। यहां जिन स्थान पर फ्रेंच फ्राइज और टिक्की पकाए जा रहे थे, वहां ऑयल मैनेजमेंट शीट की जांच की। इस शीट में तेल बदलने की तिथि डाली जाती है। जांच में सामने आया कि एक जून को तेल डाला गया और उसके बाद कभी चेंज ही नहीं किया गया। 

काम में ले रहे पामोलीन ऑयल 

सुबह11 बजे से रात 11 बजे तक 360 डिग्री पर तेल को उबाल कर खाद्य पदार्थ पकाए जाते थे। टीम ने यहां ऐसा तेल पकड़ा जो कि पूरी तरह काला और गाढ़ा हो चुका था। डामर जैसा। निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि खाने के लिए पामोलीन तेल काम में लिया जा रहा है। ऐसे में तुरंत खराब 120 लीटर तेल नष्ट कराया। साथ ही तेल के दो सैंपल भी लिए। 

बार-बारपका तेल हानिकारक 

एसएमएसअस्पताल के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. पुनीत सक्सैना ने बताया कि तेल को बार-बार पकाने से तेल के प्रोटीन और न्यूट्रीशियंस समाप्त हो जाते हैं। चिकनाई खत्म हो जाती है। तेल सेचुराइट फैटी एसिड में तब्दील हो जाता है। इससे शरीर में सीधे वसा और कोलेस्ट्रोल जाता है। 

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