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हनुमान जी दलित और वंचित हैं

हनुमान जी को दलित कहने पर देश में सियासत शुरू हो गयी है। यूपी के सीएम योगी के बयान को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। योगी के हनुमान जी को दलित कहने पर लोगों ने अपनी -अपनी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया है। हालांकि, सीएम योगी के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर उनकी खूब आलोचना हो रही है. ट्विटर, फेसबुक पर कई तरह के मेम्स बनाए जा रहे हैं. बता दें कि इससे पहले शहरों के नामों को लेकर भी योगी आदित्यनाथ विवादों में रहे हैं. सोशल मीडिया में इस बयान के हवाले से लोगों ने भाजपा और आदित्यनाथ पर जबर्दस्ती की जातिवादी राजनीति करने का आरोप लगाया है. फेसबुक पर पोस्ट एक है, ‘जिन्हें कृष्ण में यादव और हनुमान में दलित नजर आते हैं, वो हमें हिंदूवादी नहीं, जातिवादी नजर आते हैं.’ वैसे भी भारतीय चुनाव ऐतिहासिक और मिथकीय किरदारों जैसे मुगल, टीपू सुल्तान, नेहरू, गांधी, भगवान राम, हनुमान और विकास आदि के बारे में जानने का बहुत ही अच्छा मौका होते हैं.

English Medium School

अभिभावक चाहे महल का हो या स्लम काहर एक की पहली पसंद इंग्लिश मीडियम स्कूल हो गयी है। परिणाम आज गली-गली में इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल रहे है। पर सवाल यह पैदा होता है कि इस इंग्लिश मीडियम शिक्षा व्यवस्था में बच्चे कुछ सीख भी पाते है ? साथियों ! शिक्षा का अर्थ मनुष्य की चेतना को जागृत कर ज्ञान को व्यवहारिक बनाना है। वही हमारे बच्चे बीना व्यवहारिक अर्थ समझें रटते चले जाते है। वे रट-रट कर केजी से पीजी तक पास कर जाते है। पर मौलिक ज्ञान सृजन नहीं कर पाते। हमारे बच्चों ने ‘रटनेको ही ‘ज्ञान’ समझ लिया है और ‘अंग्रेजी बोलने की योग्यता को (इंग्लिश स्पीकिंग)’ को ही ‘शिक्षा’ । विद्यार्थी वर्ग आज सिर्फ उतना पढ़ता है जितना की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए काफी है। डिग्री ही ज्ञान है इसका परिणाम यह निकला है कि डिग्री प्राप्त करों-  चाहे रटोंनकल करों या खरीद लो। हमारे बच्चे स्कूल में रटे ज्ञान का स्कूल के बाहर के बाहर की दूनियां के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते . 

एम के पाण्डेय निल्को

अवन्तिका शिक्षक सम्मान समारोह कल 12 बजे

अवन्तिका संस्था द्वारा दिनांक 28 फरवरी 2017 को स्थानीय इंटरनेशनल स्कूल ऑफ इन्फॉर्मैटिक्स एंड मैनेजमेंट टेक्निकल कैम्पस, मानसरोवर पर शहर के चयनित शिक्षाविदों को उनके द्वारा किए गए समर्पित शिक्षण सेवा व अनुकरणीय कार्यों हेतु अवन्तिका शिक्षक सम्मान से नवाजा जाएगा । इस अवसर पर डॉ॰ राखी गुप्ता (आई॰ आई॰ एस॰ यूनिवर्सिटी), डॉ॰ मधु श्रीवास्तव (सुबोध गर्ल्स कॉलेज), डॉ॰ निमाली सिंह (महारानी कॉलेज), श्रीमती रामा दत्त (संस्कार स्कूल), फादर जॉन रवि (सेंट जेवियर्स स्कूल, नेवटा), श्रीमती रश्मी तलवार (महावीर पब्लिक स्कूल), श्रीमती नीरा पाण्डेय (आर्मी पब्लिक स्कूल), श्रीमती सोनाली सिंधवी बंसल (जयश्री पेड़ीवाल प्री स्कूल) श्रीमती ज्योति राठौड़ (एम॰ के॰ बी॰ स्कूल), श्रीमती माला अग्निहोत्री (इंडिया इन्टरनेशनल स्कूल), सिस्टर दीपा मैथ्यु (सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर), श्रीमती सुनीता राठौड़ (टैगोर पब्लिक स्कूल), श्रीमती उषा किरण शर्मा (बाल विश्व भारती स्कूल), श्रीमती सरिता कटियार (रेयान इन्टरनेशनल स्कूल), श्रीमती मधु सूद (रवीन्द्र निकेतन पब्लिक स्कूल), श्रीमती तान्या शर्मा (टी॰ पी॰ एस॰), श्रीमती सीमा अहमद (आलोक मेमोरियल स्कूल), श्रीमती बीना शर्मा (टी॰ पी॰ एस॰), श्रीमती सीमा चौधरी (राजकीय सी॰ सै॰ स्कूल, हरमाड़ा), श्री धीरज मिश्रा ( टैगोर विद्द्या भवन), श्रीमती पीयूष सूद (द रूटस पब्लिक स्कूल) को सम्मानित किया जाएगा । कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ॰ अशोक गुप्ता (वाइस चांसलर, दी आई. आई. एस. यूनिवर्सिटी), श्री पी. डी. सिंह (कमिशनर, अवंतिका, राजस्थान), डॉ॰ आनंद अग्रवाल (राष्ट्रीय निदेशक, अवंतिका) द्वारा किया जाएगा । इस अवसर पर विख्यात मंत्रज्ञ व मेडिटेसन एक्सपर्ट निर्मला सेवानी, बाल विलक्षण प्रतिभा मनन सूद (गूगल बॉय) तथा संगीतज्ञ श्री सुदेश शर्मा आकर्षण का केंद्र रहेगे। उक्त जानकारी अवंतिका राजस्थान कोडिनेटर श्री आलोक सूद तथा मिडिया प्रभारी एम के पाण्डेय निल्को ने दी।

मुक्तक – सुबह जैसे ही आँख खुलती है

सुबह जैसे ही आँख खुलती है
मानो एक शिकायत किया करती है
भोर होते ही क्यू छोड़ देता है मुझको
मेरी तनहाई मुझसे यही सवाल किया करती है

एम के पाण्डेय निल्को

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मुक्तक – तेरे चाहने वालों की बहुत आबादी है

तेरे चाहने वालों की बहुत आबादी है
पर निल्को को कहा लिखने पर पाबंदी है
ये टूटे फूटे मन के भावो को पढ़कर भी
लोग कहते है मधुलेश तेरी भी तो चाँदी है
एम के पाण्डेय निल्को


 

मुक्तक – नज़र निल्को की मैंने शीर्षक ही रख लिया

दिल मे कोई प्रेम रत्न धन रख लिया
उनके लिए लिख , उनका भी मन रख लिया
ऐसी नजरों से घूरते है वो मुझको
की नज़र निल्को की’ मैंने शीर्षक ही रख लिया

एम के पाण्डेय निल्को

मुक्तक – चाँद की चादनी मे नहाती रही

चाँद की चादनी मे नहाती रही

सारी रात मुझे वो जगाती रही

प्यार से ज़रा छु लिया था होठो को उसके

और निल्को की धुन वो अब तक गाती रही

एम के पाण्डेय निल्को


खुले मंच पर देता हूँ चुनौती

हमारे मेसेज को पढ़कर के
ग्रुप में आया एक तूफान
कुछ लोगो के दिल में
उठ गई एक उफान
पलटकर दिया उन्होंने जवाब
जैसे हड्डी बीच कवाब
खुले मंच पर देता हूँ चुनौती
क्यू की वो भी है लाज़वाब
स्वर एक साथ हुए खड़े
प्रयोग हुए शब्द कड़े
बीचबचाव में आये एडमिन
नहीं तो अपनी बात पर हम भी अड़े
मन में रह गई है कसक
हो गया था भेजा सरक
पर शुक्रिया उस शख्स की
जिसने बना आँखो का पलक
पर अब खींच गई है तलवारे
अब इनको कौन सुधारे
जब मिलगे फिर सभी
तो ही दूर होगी तकरारे

सादर वंदे
एम के पाण्डेय निल्को

दशहरा : क्या रावण सचमुच मे मर गया ?

 दशहरे पर कल पूरे देश में अच्छाई पर बुराई की विजय के रूप में भगवान राम की पूजा होगी, दशहरा यानी विजय पर्व। दशहरा यानी न्याय और नैतिकता का पर्व। दशहरा यानी सत्य और शक्ति का पर्व। यह पर्व हमें संदेश देता है कि अन्याय और अनैतिकता का दमन हर रूप में सुनिश्चित है। चाहे दुनिया भर की शक्ति और सिद्धियों से आप संपन्न हों लेकिन सामाजिक गरिमा के विरूद्ध किए गए आचरण से आपका विनाश तय है।

कलयुग की तुलना में त्रेता युग हर मामले में बेहतर कहा जाता है और आखिर हो भी क्यों नहीं, उस समय कम से कम इस बात का सुकून था कि रावण एक ही था और उसे एक राम ने ठिकाने लगा दिया लेकिन आज के परिवेश में हालात बहुत पेचीदा हैं। अब तो गली-गली में रावण हैं। इन्हें मारने के लिए इतने राम कहां से लाएं?

पब्लिक जो हर बार रावण दहन देखने जाती है और खुशी-खुशी इस उम्मीद से घर लौटती है कि चलो रावण मर गया लेकिन हर बार होता है उसकी उम्मीदों पर …….? हम चाहे कितने ही रावण जला लें लेकिन हर कोने में कुसंस्कार और अमर्यादा के विराट रावण रोज पनप रहे हैं। रोज सीता के देश की कितनी ही ‘सीता’ नामधारी सरेआम उठा ली जाती है और संस्कृति के तमाम ठेकेदार रावणों के खेमें में पार्टियाँ आयोजित करते नजर आते हैं। आज देश में कहाँ जलता है असली रावण? जलती है यहाँ सिर्फ मासूम सीताएँ। जब तक सही ‘रावण’ को पहचान कर सही ‘समय’ पर जलाया नहीं जाता, कैसे सार्थक होगा, शक्ति पूजा के नौ दिनों के बाद आया यह दसवाँ दिन जिस पर माँ सीता की अस्मिता जीती थीं। भगवान राम की दृढ़ मर्यादा जीती थीं। कब जलेंगें इस देश में असली रावण और कब जीतेगीं हर ‘सीता’? कब तक जलेंगे रावण के नकली पुतले और कब बंद होगा दहेज व ‘इज्जत’ के नाम पर कोमल ‘सीताओं’ का दहन?

दशहरा कहो या विजयदशमी लेकिन रावण की पराजय कहीं दिखाई नहीं देती। जब तक सही रावण को पहचान कर सही समय पर जलाया नहीं जलाया नहीं जाता, व्यर्थ है, शक्ति पूजा के नौ दिनों के बाद आया यह दसवां दिन जिस पर असत्य पर सत्य की विजय हुई थी। भगवान राम की दृढ़ मर्यादा जीती थीं।

आज कहीं भी असली रावण नहीं जलते। वे तो अपने पुतले की तरह लगातार ऊंचे हो रहे हैं। होड़ हो रही है तेरा रावण 67 फुट का तो उसका 80 का फुट का परंतु मेरा रावण तो 100 फुट का। पुतलों की ऊंचाई की होड़ हो रही है जबकि राम जैसे चरित्र का कहीं अता-पता नहीं है। कब जलेंगे असली रावण और कब जीतेगा साधनहीन, वनवासी सरल राम और उसकी सेना। आखिर क्यों-

झूठ की जय-जयकार है सच पर सौ इल्जाम।

रावण का कद बढ़ रहा, सिकुड़ रहे श्रीराम॥

एम के पाण्डेय निल्को

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अपने लिए भी जियें…..!

ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं.! फिर शुरू होती है नौकरी की खोज.!
ये नहीं वो, दूर नहीं पास.
ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते,
अंत में एक तय होती है, और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है. !
और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक, वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है… अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल..!
इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ.!
‘वो’ स्थिर होता है.
बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं.
इतने में अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.!
विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.!
शादी के पहले 2-3 साल नर्म, गुलाबी, रसीले और सपनीले गुज़रते हैं.!
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने.!
पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं.!
क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमना फिरना, खरीदी होती है.!
और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.!
सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है.! उसका खाना पीना , उठना बैठना, शु-शु, पाॅटी, उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार.!
समय कैसे फटाफट निकल जाता है, पता ही नहीं चलता.!
इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना, घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला..?
इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और बच्चा बड़ा होता गया…
वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में.!
घर की किस्त, गाड़ी की किस्त और बच्चे की ज़िम्मेदारी, उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शून्य  बढ़ाने का टेंशन.!
उसने पूरी तरह से अपने आपको काम में झोंक दिया.!
बच्चे का स्कूल में एॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा.!
उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.!
इतने में वो पैंतीस का हो गया.!
खूद का घर, गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य.!
फिर भी कुछ कमी है..?
पर वो क्या है समझ में नहीं आता..!
इस तरह उसकी चिड़-चिड़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगता है।
दिन पर दिन बीतते गए, बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया.! उसकी दसवीं आई और चली गयी.!
तब तक दोनों ही चालीस के हो गए.!
बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.!
एक नितांत एकांत क्षण में उसे वो गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है,
“अरे ज़रा यहां आओ,
पास बैठो.!”
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें, कहीं घूम के आएं…! उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहती है,
“तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है. मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है..!” कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल जाती है.!
और फिर आता है पैंतालीसवां साल,
आंखों पर चश्मा लग गया,
बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे,
दिमाग में कुछ उलझनें शुरू हो जाती हैं,
बेटा अब काॅलेज में है,
बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं, उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और…
बेटे का कालेज खत्म हो गया,
अपने पैरों पर खड़ा हो गया.!
अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया…!!!
अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा…!
उसे भी चश्मा लग गया.!
अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा  हो रहा था..!
पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू हो गया.!
बैंक में अब कितने शून्य हो गए,
उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे..!
गोली-दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा.!
डाॅक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं.!
बच्चे बड़े होंगे….
ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा.
बच्चे कब वापस आएंगे,
अब बस यही हाथ रह गया था.!
और फिर वो एक दिन आता है.!
वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था.!
वो शाम की दिया-बाती कर रही थी.!
वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है.!
इतने में फोन की घंटी बजी,
उसने लपक के फोन उठाया,
उस तरफ बेटा था.!
बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा..!
उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा..?
अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी..!”
एक काम करिये, इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहिये.!”
कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया..!
वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी.
उसने उसे आवाज़ दी,
“चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें.!”
वो तुरंत बोली,
“बस अभी आई.!”
उसे विश्वास नहीं हुआ,
चेहरा खुशी से चमक उठा,
आंखें भर आईं,
उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए,
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया..!!
उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा,
“बोलो क्या बोल रहे थे.?”
पर उसने कुछ नहीं कहा.!
उसने उसके शरीर को छू कर देखा, शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था..!
क्षण भर को वो शून्य हो गई,
“क्या करूं” उसे समझ में नहीं आया..!
लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई,  धीरे से उठी और पूजाघर में गई.!
एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई..!
उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली,
“चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे.!”
बोलो…!! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं..!
वो एकटक उसे देखती रही,
आंखों से अश्रुधारा बह निकली.!
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया.!
ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था….!!
यही जिंदगी है…??
नहीं….!!!
संसाधनों का अधिक संचय न करें,
ज्यादा चिंता न करें,
सब अपना अपना नसीब ले कर आते हैं.!
अपने लिए भी जियो, वक्त निकालो..!
सुव्यवस्थित जीवन की कामना…!!
जीवन आपका है, जीना आपने ही है…!
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

नज़र निल्को की – तेरी नज़दीक वाली दूरिया


तेरी नज़दीक वाली दूरिया
लगती है जैसे गोलिया
तेरी हर अदा कुछ ख़ास नहीं
पर सहती है हर एक बोलिया


उसका बनना और सवरना
जैसे हो पानी का ठहरना 
पर इतराती ऐसे वो
जैसे दौड़ में भी टहलना
पुकारते है कई नाम से उसे 
धूप मे भी बारिश हो जैसे 
पर सुनती नहीं वो एक बार भी 
चाहे करा लो अपनी जैसे तैसे  
झील सी आखे है उसकी 
पर पता नहीं है वो किसकी 
मिलने का बनाया था इरादा 
किन्तु नहीं दी पता वो घर की 

उसकी खामोसी जब जब बोली है 
असर करती जैसे दर्द -ए -दिल की गोली है 
सारे पर्व और त्योहार उसके चेहरे पर 
और खेलता ‘निल्को‘ रोज जैसे होली है 

**************

एम के पाण्डेय निल्को 

गीत ग़ज़ल हो या हो कविता – एम के पाण्डेय निल्को


गीत ग़ज़ल हो या हो कविता 
नज़र है उस पर चोरो की 
सेंध लगाये बैठे तैयार 
कॉपी पेस्ट को मन बेक़रार 
लिखे कोई और, पढ़े कोई और 
नाम किसी और का चलता है 
कुछ इस तरह इन चोरो का 
ताना बना भी चलता रहता है 
सोच सोच कर लिखे गजल जो
प्रसंशा वो नहीं पाता है 
पर चुराए हुए रचना पर 
वाह वाही खूब कमाता है 
मन हो जाता उदास निल्को 
किसी और का गुल खिलाये जाते है 
वो खुश होता किन्तु 
मन से पछताए जाये है 
***************
एम के पाण्डेय निल्को 

चेहरे की वो बात – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

चेहरे की वो बात
अधूरी रह गई थी रात
किनारे बैठे थे वे साथ
डाले एक दूसरे मे हाथ
कह रहे थे
सुन रहे थे
एक दूसरे को
बुन रहे थे
और चेहरा पढ़ने की कोशिश मे
एक दूसरे पर हस रहे थे
फिर झटके से टूटा सपना
सब कह रहे है अपना अपना
पर अनुभव भरे इस ज़िंदगी मे
दर्द कर रहा है मेरा टखना
रात रह गई
बात रह गई
सपना टूटा पर
वह साथ ही रह गई
जैसे आई वर्षा की बूंद
पी हो जैसे अमृत की घूट
मस्तिक मे हो रही शब्दो की युद्ध
और सब लग रहा था है ये शुद्ध
रच रहे थे निल्को डूब कर
कौन कराये उनको पार
पूरी कविता पढ़ समझ लो
इतना ही है बस मेरा सार
********************

एम के पाण्डेय निल्को

एम के पाण्डेय ‘निल्को’ की कविता – वो दूरिया बढ़ाते गए

वो दूरिया बढ़ाते गए
और कुछ लोग यह देख कर मुस्कुराते गए
इस ज़िंदगी के कशमकश में
शायद निल्को को वो भुलाते गए
जब याद दिन वो आते है
इतिहास बनाए जाते है
ढ़ूढ़ते है सबको इधर उधर
पर तन्हा की ख़ुद को पाते है
जब जब तुम मुझसे दूर गए
शायद हमें तुम भूल गए
पर पुरानी अपनी बातों से
कहा तुम चूक गए
पर सुनो लकीरें भी बड़ी अजीब होती हैं
माथे पर खिंच जाएँ तो किस्मत बना देती हैं
जमीन पर खिंच जाएँ तो सरहदें बना देती हैं
खाल पर खिंच जाएँ तो खून ही निकाल देती हैं
और रिश्तों पर खिंच जाएँ तो दीवार बना देती हैं
जब जब तुम मौन रहते हो
तब तब मैं गुज़रते लम्हों में सदिया तलाश करता हूँ
में अपने आप में ही खामिया तलाश करता हूँ
अब तो  मेरा खुदसे मिलने को जी चाहता है
काफी कुछ सुना रहा हूँ अपने बारे में
इतना, आसान हूँ कि हर किसी को समझ आ जाता हूँ
लेकिन शायद तुमने ही ठीक से न पढ़ा है मुझे
किन्तु ये सबक मिल ही गया जाते जाते मुझे
अच्छे होते हैं बुरे लोग
कम से कम अच्छे होने का,
वे दिखावा तो नहीं करते………
सादर



एम के पाण्डेय निल्को

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अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता

एम के पाण्डेय ‘निल्को’  

कुछ मेरे मित्र मेरे परिचय के बारे में ज्रिक कर रहे थे , उनकी शिकायत थी की कभी मैंने अपना परिचय ठीक से नहीं दिया | बताना चाहूगा की यह मेरी कमजोरी है की मैं अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता कई बार कोशिश की किन्तु सफल पूरी तरह से न हो सका , एक बार पुनः संक्षिप्त में कोशिश कर रहा हूँ ज़रा आप की बताइए कहा तक यह कोशिश सफल हुई | लेकिन इस बात का अफ़सोस है की कुछ लोग – 

हज़ारों ऐब ढूँढ़ते है वो निल्को में इस तरह,

अपने किरदारों में वो फरिश्तें हो जैसे …..!


और मैं हर बार यही कहता हूँ की –

जैसा भी हूँ अच्छा या बुरा अपने लिए हूँ 
मैं ख़ुद को नहीं देखता औरो की नज़र से ….!
वैसे 
ख़ामोशी भी  बहुत कुछ कहती है
कान लगाकर नहीं ,

दिल लगाकर सुनो ….

मै कोई बहुत बड़ा लेखक या कवि नहीं , बस यूं ही अपने मन के भावों को अपनी कलम के जरिये कागज़ पर उतार लेता हूँ जो कहीं कविताओं के रूप मे, कहीं लेखो के रूप मे अपनी जगह बना लेते है । मैं इस विश्व के जीवन मंच पर अदना सा किरदार हूँ जो अपनी भूमिका न्यायपूर्वक और मन लगाकर निभाने का प्रयत्न कर रहा है। पढ़ाई लिखाई के हिसाब से बुद्धू डिब्बा (कम्प्युटर) से स्नातक हूँ और प्रबंधन से परास्नातक। कई मासिक पत्रिका और वैबसाइट पर स्वतंत्र लेखन में कविता, टिप्पणी, आलोचना आदि में विशेष रुचि है उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िला के हरखौली गाँव मे जन्म और राजस्थान मे पढ़ाई की और आगे गांवो के लिए कुछ सरकारी – गैर सरकारी , सामाजिक परियोजनाओ का संचालन करने का इरादा । अपनी रचनाओ के माध्यम से गांवो/लोगो में जागरुकता लाना चाहता हूं ऒर समाज के लोगों का ध्यान उनकी समस्याओं की ऒर खीचना चाहता हूं। ताकि उनको भी स्वतंत्र पहचान एवं उडान भरने के लिए खुला आसमान मिल सके। बस यही मेरे जीवन का लक्ष्य है । बस इतनी सी बातें है मेरे बारे में।


सादर 

एम के पाण्डेय ‘निल्को’ 

कान्हा ओं कान्हा – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

आदरणीय मित्रो ;
नमस्कार;
मेरी पहली भक्ति रचना  “कान्हा ओं कान्हा” आप सभी को सौंप रहा हूँ । मुझे उम्मीद है कि  मेरी ये छोटी सी कोशिश आप सभी को जरुर पसंद आएँगी,  रचना   कैसी लगी पढ़कर बताईये कृपया अपने भावपूर्ण कमेंट से मेरा हौसला बढाए. कृपया अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा. आपकी राय मुझे हमेशा कुछ नया लिखने की प्रेरणा देती है और आपकी राय निश्चिंत ही मेरे लिए अमूल्य निधि है |


कान्हा ओं कान्हा

कैसा हो गया जमाना
लगता है अब फिर पड़ेगा
तुम्हे धरती पे आना
कान्हा ओं कान्हा….!
सब कुछ तुम देख रहे हो
फिर भी नहीं कुछ बोल रहे हो
पर आज तुम्हे पड़ेगा बताना ….!
बासुरी की धुन पर
तुम सबको नचाते
पता नहीं क्या – क्या
तुम रास रचाते …!
दिल किसी का
तुम न दुखाते
फिर क्यों ऐसा
दिन दिखाते ….!
पर ये जो कुछ भी
हो रहा है
तुम सब यह देख रहे हो
पर मौन का कारण
तुम्हे पड़ेगा बताना …!
दुःख तो बहुत है
लोग भी बहुत है
पर तुम बिन
कोई नहीं है…!
एक बार फिर आ जाओ
अपने दर्शन करा जावो
‘निल्को’ की यही चाह
पूरा करा जाओ …!
जब तक तुम न आओगे
मुझे अकेला पाओगे
कैसे मुझे समझोगे
जब तुम्हे हम बुलायेगे …! 
*************
एम के पाण्डेय निल्को’

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मैं कवि नहीं हूँ


जब भी मैं कोई कविता पढ़ता हूँ

मेरे मन में ख्याल आता है

इतनी अच्छी रचना मेरे द्वारा क्यो नहीं …?

‘निल्को ‘की नज़र के सामने

किताबों के पन्नो में

वो शब्दो का समूह

जिसमे कभी प्रेम

तो कभी आक्रोश

कभी बनता बिगड़ता वाक्य

बार – बार यही कहता है

मैं कवि नहीं हूँ

दरअसल कविता मन का भाव है

कवि के जीवन का सार है

रचना भले की

किसी रूप रंग की हो

उसकी नज़रिये का माध्यम

तो तुम ही हो

पर मन अनायास ही

कह उठता है

मैं कवि नहीं हूँ

एम के पाण्डेय ‘निल्को’

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मैं अपनी पहचान कैसे छोड़ दूं!

तेरी गलिया भी करती है यही पुकार
मुझे छोड़ , कहाँ चले गए यार
जब तू आया था पहली बार
सब लोगो से पता पूछा बार बार
और कई दिन तक लगातार
बाहर करता था इन्तजार
आज तू बड़ा हो गया
इसलिए दूर हो गया
जब तू धीरे – धीरे चलता था
गली के बच्चो के साथ खेलता था
शायद अब तू बड़ा खेल खेलता है
इसलिए दूर हो गया
सोचता हूँ निल्को
तेरी चर्चा छोड़ दूँ
तेरी गलिया
तेरा चौबारा
छोड़ दूँ
दिन गया बहुत गुजर
कट गया यह भी सफर
तुम लाख बार कुछ भी कहो
पर यह याद रखना की
मैं अपनी पहचान कैसे छोड़ दूं!
*******************
मधुलेश पाण्डेय निल्को