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होलिका दहन – जश्न का पर्व

कहते हैं होलिका दहन के दिन तीन चीजों का होना काफी शुभ माना जाता है. ये तीन चीजें हैं प्रदोण काल का होना, पुर्णिमा तिथि का होना और भद्रा ना लगा होना. इस साल ये तीनों संयोग बन रहे है. जिससे इस साल होलिका दहन बहुत शुभ मानी जा रही है . फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के शुभ मुहूर्त में आज होलिका दहन और पूजन किया जाएगा। इसलिए इस शुभ मुहूर्त में पूजा करेंगे तो सौभाग्य मिलेगा।

आज शाम होलिका दहन किया जाएगा और कल रंगों के साथ इस पर्व का जश्न मनाया जाएगा.

मैं फिर से ‘नज़र निल्को की’ ये शीर्षक ले कर आया हूँ

आज कई दिनो बाद फिर यहाँ पर आया हूँ

इतने दिन व्यस्त रहा वो बताने आया हूँ

आप याद किए या न किए हो पर

मैं फिर से नज़र निल्को की ये शीर्षक ले कर आया हूँ

सादर वंदे

एम के पाण्डेय निल्को 

शिक्षा , शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था

किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा के अनेक आयाम हैं, जो राष्ट्रीय विकास में शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हैं। वास्तविक रूप में शिक्षा का आशय है ज्ञान, ज्ञान का आकांक्षी है-शिक्षार्थी और इसे उपलब्ध कराता है शिक्षक।
तीनों परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। एक के बगैर दूसरे का अस्तित्व नहीं। यहां शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाली प्रबंधन इकाई के रूप में प्रशासन नाम की नई चीज जुड़ने से शिक्षा ने व्यावसायिक रूप धारण कर लिया है। शिक्षण का धंधा देश में आधुनिक घटना के रूप में देखा जा सकता है।
प्राचीनकाल की ओर देखें तब भारत में ज्ञान प्रदान करने वाले गुरु थे, अब शिक्षक हैं। शिक्षक और गुरु में भिन्नता है। गुरु के लिए शिक्षण धंधा नहीं, बल्कि आनंद है, सुख है। शिक्षक अतीत से प्राप्त सूचना या जानकारी को आगे बढ़ाता है, जबकि गुरु ज्ञान प्रदान करता है। शिक्षा से मानव का व्यक्तित्व संपूर्ण, विनम्र और संसार के लिए उपयोगी बनता है। सही शिक्षा से मानवीय गरिमा, स्वाभिमान और विश्व बंधुत्व में बढ़ोतरी होती है। अंतत: शिक्षा का उद्देश्य है-सत्य की खोज। इस खोज का केंद्र अध्यापक होता है, जो अपने विद्यार्थियों को शिक्षा के माध्यम से जीवन में और व्यवहार में सच्चाई की शिक्षा देता है। छात्रों को जो भी कठिनाई होती है, जो भी जिज्ञासा होती है, जो वे जानता चाहते हैं, उन सबके लिए वे अध्यापक पर ही निर्भर रहते हैं। यदि शिक्षक के मार्गदर्शन में प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा को उसके वास्तविक अर्थ में ग्रहण कर मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में उसका प्रसार करता है तो मौजूदा 21वीं सदी में दुनिया काफी सुंदर हो जाएगी। आज की युवा पीढ़ी ऐसी शिक्षा प्रणाली चाहती है जो उसके खोजी और सृजनशील मन को सबल बनाने के साथ-साथ उसके सामने चुनौती प्रस्तुत करे। देश का भविष्य उन पर टिका हुआ है। वे वर्तमान में शिक्षा प्रणाली के संबंध में सोच-विचार करना चाहते हैं। एक अच्छी शिक्षा प्रणाली में ऐसी क्षमता होनी चाहिए जो छात्रों की ज्ञान प्राप्ति की तीव्र जिज्ञासा को शांत कर सके। शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे पाठ्यक्रम बनाने के लिए खुद को तैयार करना चाहिए जो विकसित भारत की सामाजिक और प्रौद्योगिकी संबंधी आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील हाें। वर्तमान पाठ्यक्रम में विकास कार्यो की गतिविधियों को अनिवार्यत: स्थान दिया जाना चाहिए ताकि ज्ञान समाज की भावी पीढ़ी पूरी तरह से सामाजिक परिवर्तन के सभी पहलुओं के अनुकूल हो सके।शिक्षा क्या है’ में जीवन से संबंधित युवा मन के पूछे-अनपूछे प्रश्न हैं और जे.कृष्णमूर्ति की दूरदर्शी दृष्टि इन प्रश्नों को मानो भीतर से आलोकित कर देती है पूरा समाधान कर देती है। ये प्रश्न शिक्षा के बारे में हैं, मन के बारे में हैं, जीवन के बारे में हैं, विविध हैं, किन्तु सब एक दूसरे से जुड़े हैं।
“गंगा बस उतनी नहीं है, जो ऊपर-ऊपर हमें नज़र आती है। गंगा तो पूरी की पूरी नदी है, शुरू से आखिर तक, जहां से उद्गम होता है, उस जगह से वहां तक, जहां यह सागर से एक हो जाती है। सिर्फ सतह पर जो पानी दीख रहा है, वही गंगा है, यह सोचना तो नासमझी होगी। ठीक इसी तरह से हमारे होने में भी कई चीजें शामिल हैं, और हमारी ईजादें सूझें हमारे अंदाजे विश्वास, पूजा-पाठ, मंत्र-ये सब के सब तो सतह पर ही हैं। इनकी हमें जाँच-परख करनी होगी, और तब इनसे मुक्त हो जाना होगा-इन सबसे, सिर्फ उन एक या दो विचारों, एक या दो विधि-विधानों से ही नहीं, जिन्हें हम पसंद नहीं करते।”
क्या आप स्वयं से यह नहीं पूछते कि आप क्यों पढ़-लिख रहे हैं ? क्या आप जानते है कि आपको शिक्षा क्यों दी जा रही है और इस तरह की शिक्षा का क्या अर्थ है ? अभी की हमारी समझ में शिक्षा का अर्थ है स्कूल जाना पढ़ना लिखना सीखना, परीक्षाएं पास करना कालेज में जाने लगते हैं। वहाँ फिर से कुछ महीनों या कुछ वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, परीक्षाएं पास करते हैं और कोई छोटी-मोटी नौकरी पा जाते हैं, फिर जो कुछ आपने सीखा होता है भूल जाते हैं। क्या इसे ही हम शिक्षा कहते हैं ? क्या आप समझ रहे हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ ? क्या हम सब यही नहीं कर रहे हैं ? 
लड़कियां बी. ए. एम.ए. जैसी कुछ परीक्षाएं पास कर लेती हैं, विवाह कर लेती हैं, खाना पकाती हैं या कुछ और बन जाती हैं, बच्चों को जन्म देती हैं और इस तरह से अनेक वर्षो में पाई जाने वाली शिक्षा पूर्णतः व्यर्थ हो जाती है हां, यह जरूर जान जाती हैं कि अंग्रेजी कैसे बोली जाती है, वे थोड़ी-बहुत चतुर, सलीकेदार, सुव्यवस्थित हो जाती हैं और अधिक साफ सुथरी रहने लगती हैं, पर बस उतना ही होता है, है न ? किसी तरह लड़के कोई तकनीकी काम पा जाते हैं, क्लर्क बन जाते हैं या किसी तरह शासकीय सेवा में लग जाते है इसके साथ ही सब समाप्त हो जाता है। ऐसा ही होता है न ? 
आप देख सकते हैं कि जिसे आप जीना कहते हैं, वह नौकरी पा लेने बच्चे पैदा करने, परिवार का पालन-पोषण करने, समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं को पढ़ने, बढ़–चढ कर बातें कर सकने और कुशलतापूर्वक वाद-विवाद कर सकने तक सीमित होता है। इसे ही हम शिक्षा कहते हैं-है न ऐसा ? क्या आपने कभी अपने माता-पिता और बडे लोगों को ध्यान से देखा है ? उन्होंने भी परीक्षाएं पास की हैं, वे भी नौकरियां करते हैं और पढ़ना-लिखना जानते हैं। क्या शिक्षा का कुल अभिप्राय इतना है ? 
दुर्भाग्य से हमारे देश में समाज के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और आदर प्राप्त “शिक्षक” की हालत अत्यधिक दयनीय और जर्जर कर दी गई है।
शिक्षक शिक्षण छोड़कर अन्य समस्त गतिविधियों में संलग्न हैं। वह प्राथमिक स्तर का हो अथवा विश्वविद्यालयीन, उससे लोकसभा, विधानसभा सहित अन्य स्थानीय चुनाव, जनगणना, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अथवा अन्य इस श्रेणी के नेताओं के आगमन पर सड़क किनारे बच्चों की प्रदर्शनी लगवाने के अतिरिक्त अन्य सरकारी कार्य संपन्न करवाए जाते हैं।
देश की शिक्षा व्यवस्था एवं शिक्षकों की मौजूदा चिंतनीय दशा के लिए हमारी राष्ट्रीय और प्रादेशिक सरकारें सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, जिसने शिक्षक समाज के अपने हितों की पूर्ति का साधन बना लिया है। शिक्षा वह है, जो जीवन की समस्याओं को हल करे, जिसमें ज्ञान और काम का योग है? 
आज विद्यालय में विद्यार्थी अध्यापक से नहीं पढ़ते, बल्कि अध्यापक को पढ़ते हैं।

मुझे ऐसी कोई शिक्षा व्यवस्था नजर नहीं आ रही, जिसे हम एक आदर्श ढांचा कह सकें, हरेक में तमाम कमियां हैं। आप चाहे जैसा ढांचा तैयार कर लें, उसमें आप भले ही कमियां न ढूंढ पाएं, लेकिन बच्चे जरूर उसमें कमियां निकाल लेंगे। आप पाएंगे कि आप जैसी भी पुख्ता व्यवस्था क्यों न बनाएं, बच्चे उसमें सुराख ढूंढ ही लेते हैं। मेरे ख्याल से ऐसे बहुत सारे बच्चे हैं, जो व्यव्स्था में कमियां ढूंढ निकालते हैं इसका मतलब कि वे बच्चे वाकई अच्छे हैं! एक अच्छी शिक्षा नीति में, ज्ञान तथा शिक्षा प्राप्त करना आसान होना चाहिए ताकि हर किसी को शिक्षा प्राप्त करने का समान अवसर मिले, और जिसमें जाती, वर्ण और वर्ग जैसे शब्दों का कोई स्थान न हो । इसमें कोई शक नहीं की शिक्षा में आरक्षण एक अच्छे मक्सद ( वर्गीकरण की समाप्ति ) को प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल में लाया गया तथा अधिनियमित किया गया , परन्तु इसके विपरीत ये विभाजिकरण का एक मुख्य कारण बन गया है, ज्यादातर महाविद्यालयों एवं संस्थानों में लोग आरक्षण से क्रुद्ध हो कर गुटबंदी कर लेते है और कमजोर वर्ग के लोगों का बहिष्कार करते हैं तथा उन्हें हीन समझते हैं । शिक्षा नीति में चाहिए की शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के पहुँच में हो ताकि शिक्षा ग्रहण करने में उसके परिवार की आर्थिक ऋण न टूट जाये । जबकि शिक्षा के निजीकरण के बाद इस लक्ष्य की प्राप्ति की शिक्षा एक अत्यंत लाभकारी व्यवसाय के रूप में निखर के आया है ।
शिक्षा की धांधली को
अब हम कैसे मिटायें
शिक्षा हमारा जीवन है
इसे कैसे आगे बढायें

एम के पाण्डेय निल्को

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Happy Teachers Day

आज पाँच सितम्बर है यानी शिक्षक दिवस। आज हम सभी उन अध्यापकों, गुरुओं, आचार्यों, शिक्षकों, मास्टरों, टीचरों को बधाइयाँ देते हैं, याद करते हैं, जिन्होंने हमारे जीवन-दर्शन को कहीं न कहीं से प्रभावित किया। गुरू को इश्वर से अधिक महत्व प्राप्त है। गुरू का नाम ज़रूर बदला है, लेकिन हरेक के जीवन में कहीं न कहीं गुरू रूपी तत्व का समावेश ज़रूर है। ज़रूरी नहीं कि गुरू किसी गुरू के चोंगे में ही हो। प्रत्येक का गुरू अलग है। किसी के लिए माँ गुरू है, किसी के लिए पिता तो किसी के लिए मित्र। आज #VMW_Group भी ऐसे ही सभी गुरुओ को प्रणाम करता है ।

सादर
एम के पाण्डेय निल्को

स्वतंत्रता दिवस – आज हथकड़ी टूट गई है, नीच गुलामी छूट गई है –

आजादी के नए संघर्ष का वक्त हमने आजादी जनता के लिए प्राप्त की थी और नारा दिया था कि हम ऐसी व्यवस्था अपनाएंगे जो जनता की जनता द्वारा और जनता के लिए होगी, लेकिन आजादी के 68 साल बीतने के बाद अनुभव यह हो रहा हे कि हमारी सत्ता अंग्रेजी सत्ता के समान ही कुछ निहित स्वार्थी लोगों के हित चिंतन में सिमटकर रह गई है। क्या आजादी का संघर्ष इसीलिए किया गया था? युवाओं ने इसीलिए बलिदान दिया था कि अंग्रेजों के स्थान पर कुछ ‘स्वदेशी’ लोग सत्ता का उपयोग करें। सत्ता का हस्तानांतरण हुआ है, लेकिन उसके आचरण में बदलाव नहीं आया है। जब भी 15 अगस्त नजदीक आता है मुझे ये पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं-आज हथकड़ी टूट गई है, नीच गुलामी छूट गई है, उठो देश कल्याण करो अब, नवयुग का निर्माण करो सब।
क्या सचमुच हथकड़ी टूट गई है और गुलामी से छुटकारा मिल गया है? हमारी शक्ति किसके कल्याण में लग रही है और कौन से नवयुग का हम निर्माण कर रहे हैं। यदि कुछ चमचमाती सड़कें, सड़कों पर पहले की अपेक्षा सौ गुना अधिक दौड़ रहे वाहन, शहरों का निरंतर विस्तार, तकनीकी उपकरणों की भरमार और कर्ज के सहारे निर्वाह को नवयुग का कल्याण माना जाए तो हम सचमुच 15 अगस्त 1947 के बाद बहुत आगे बढ़ गए हैं, लेकिन जिन जीवन मूल्यों के लिए हमने आजादी की जंग लड़ी, क्या उस दिशा में कोई प्रगति हुई है? देश में बढ़ते एकाधिकारवादी आचरण ने सत्ता को इतना भ्रष्ट और निरंकुश कर दिया है कि उसकी चपेट में आकर सारा अवाम कराह रहा है। महात्मा गांधी का मानना था कि गांवों का विकास ही उत्थान का प्रतीक होगा। गांवों में जीवन मूल्य के बारे में अभी भी संवेदनशीलता है। हमने पंचायती राज व्यवस्था को तो अपनाया है, लेकिन गांवों को उजड़ते जाने से नहीं रोक पा रहे हैं। कृषि प्रधान देश में खेती करना सबसे हीन समझा जाने लगा है। शिक्षा के लिए अनेक आधुनिक ज्ञान वाले संस्थान जरूर स्थापित हो गए हैं, लेकिन वहां से ‘शिक्षित’ होकर निकलने वालों की पहचान किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचा वेतन पाने के आधार पर हो रही है। स्वदेशी, स्वाभिमान और स्वावलंबन की भावना तिरोहित होती जा रही है। कर्ज जिसे आजकल ‘एड’ का नाम दे दिया गया है, एकमेव साधन बनकर रह गया है, जिसने हमें फिर गुलामी की तरफ धकेल दिया है। राजनीतिक आजादी तो मिली, लेकिन आत्मनिर्भरता के लिए प्रयास न होने के कारण हम आर्थिक रूप से गुलाम होते जा रहे हैं, जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में हुआ था। तब भी शासक तो स्वदेशी ही थे, लेकिन उनको चलना ईस्ट इंडिया कंपनी के अनुसार पड़ता था। आज हम भी अपने आर्थिक क्षेत्र को विश्व बैंक या विश्व मुद्रा कोष के पास गिरवी रख चुके हैं। जिन वस्तुओं की हमें जरूरत भी नहीं है उनको आयात करने की विवशता से हम बंधते जा रहे हैं। हमारी सीमाएं असुरक्षित हैं। 
हम यह जानते हैं कि किसके द्वारा और किस-किस प्रकार से असुरक्षा पैदा की जा रही है, लेकिन हम कार्रवाई नहीं कर सकते, क्योंकि उसके लिए किसी की रजामंदी जरूरी है। हमारा ध्यान केवल सत्ताधारी बने रहने तक सीमित हो गया है। उसे पाने के लिए समाज में संविधान के उपबंधों के अनुसार समान नागरिकता की भावना पैदा करने के बजाय हम वैसा ही उपाय करते जा रहे हैं जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था। उससे भी उसमें बढ़कर हम जातियों, उपजातियों आदि की पहचान उभारने में लगे हुए हैं। लालबहादुर शास्त्री ने संकट से उबरने के लिए सोमवार को अन्न न खाने की जो अपील की उससे कोई बहुत बड़ी बचत नहीं होने वाली थी, लेकिन लोगों ने उनकी बात मानी थी। आज क्या यह संभव है?

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें

 एम के पाण्डेय निल्को

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गीत ग़ज़ल हो या हो कविता – एम के पाण्डेय निल्को


गीत ग़ज़ल हो या हो कविता 
नज़र है उस पर चोरो की 
सेंध लगाये बैठे तैयार 
कॉपी पेस्ट को मन बेक़रार 
लिखे कोई और, पढ़े कोई और 
नाम किसी और का चलता है 
कुछ इस तरह इन चोरो का 
ताना बना भी चलता रहता है 
सोच सोच कर लिखे गजल जो
प्रसंशा वो नहीं पाता है 
पर चुराए हुए रचना पर 
वाह वाही खूब कमाता है 
मन हो जाता उदास निल्को 
किसी और का गुल खिलाये जाते है 
वो खुश होता किन्तु 
मन से पछताए जाये है 
***************
एम के पाण्डेय निल्को 

एम के पाण्डेय ‘निल्को’ की कविता – वो दूरिया बढ़ाते गए

वो दूरिया बढ़ाते गए
और कुछ लोग यह देख कर मुस्कुराते गए
इस ज़िंदगी के कशमकश में
शायद निल्को को वो भुलाते गए
जब याद दिन वो आते है
इतिहास बनाए जाते है
ढ़ूढ़ते है सबको इधर उधर
पर तन्हा की ख़ुद को पाते है
जब जब तुम मुझसे दूर गए
शायद हमें तुम भूल गए
पर पुरानी अपनी बातों से
कहा तुम चूक गए
पर सुनो लकीरें भी बड़ी अजीब होती हैं
माथे पर खिंच जाएँ तो किस्मत बना देती हैं
जमीन पर खिंच जाएँ तो सरहदें बना देती हैं
खाल पर खिंच जाएँ तो खून ही निकाल देती हैं
और रिश्तों पर खिंच जाएँ तो दीवार बना देती हैं
जब जब तुम मौन रहते हो
तब तब मैं गुज़रते लम्हों में सदिया तलाश करता हूँ
में अपने आप में ही खामिया तलाश करता हूँ
अब तो  मेरा खुदसे मिलने को जी चाहता है
काफी कुछ सुना रहा हूँ अपने बारे में
इतना, आसान हूँ कि हर किसी को समझ आ जाता हूँ
लेकिन शायद तुमने ही ठीक से न पढ़ा है मुझे
किन्तु ये सबक मिल ही गया जाते जाते मुझे
अच्छे होते हैं बुरे लोग
कम से कम अच्छे होने का,
वे दिखावा तो नहीं करते………
सादर



एम के पाण्डेय निल्को

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अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता

एम के पाण्डेय ‘निल्को’  

कुछ मेरे मित्र मेरे परिचय के बारे में ज्रिक कर रहे थे , उनकी शिकायत थी की कभी मैंने अपना परिचय ठीक से नहीं दिया | बताना चाहूगा की यह मेरी कमजोरी है की मैं अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता कई बार कोशिश की किन्तु सफल पूरी तरह से न हो सका , एक बार पुनः संक्षिप्त में कोशिश कर रहा हूँ ज़रा आप की बताइए कहा तक यह कोशिश सफल हुई | लेकिन इस बात का अफ़सोस है की कुछ लोग – 

हज़ारों ऐब ढूँढ़ते है वो निल्को में इस तरह,

अपने किरदारों में वो फरिश्तें हो जैसे …..!


और मैं हर बार यही कहता हूँ की –

जैसा भी हूँ अच्छा या बुरा अपने लिए हूँ 
मैं ख़ुद को नहीं देखता औरो की नज़र से ….!
वैसे 
ख़ामोशी भी  बहुत कुछ कहती है
कान लगाकर नहीं ,

दिल लगाकर सुनो ….

मै कोई बहुत बड़ा लेखक या कवि नहीं , बस यूं ही अपने मन के भावों को अपनी कलम के जरिये कागज़ पर उतार लेता हूँ जो कहीं कविताओं के रूप मे, कहीं लेखो के रूप मे अपनी जगह बना लेते है । मैं इस विश्व के जीवन मंच पर अदना सा किरदार हूँ जो अपनी भूमिका न्यायपूर्वक और मन लगाकर निभाने का प्रयत्न कर रहा है। पढ़ाई लिखाई के हिसाब से बुद्धू डिब्बा (कम्प्युटर) से स्नातक हूँ और प्रबंधन से परास्नातक। कई मासिक पत्रिका और वैबसाइट पर स्वतंत्र लेखन में कविता, टिप्पणी, आलोचना आदि में विशेष रुचि है उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िला के हरखौली गाँव मे जन्म और राजस्थान मे पढ़ाई की और आगे गांवो के लिए कुछ सरकारी – गैर सरकारी , सामाजिक परियोजनाओ का संचालन करने का इरादा । अपनी रचनाओ के माध्यम से गांवो/लोगो में जागरुकता लाना चाहता हूं ऒर समाज के लोगों का ध्यान उनकी समस्याओं की ऒर खीचना चाहता हूं। ताकि उनको भी स्वतंत्र पहचान एवं उडान भरने के लिए खुला आसमान मिल सके। बस यही मेरे जीवन का लक्ष्य है । बस इतनी सी बातें है मेरे बारे में।


सादर 

एम के पाण्डेय ‘निल्को’ 

मैं कवि नहीं हूँ


जब भी मैं कोई कविता पढ़ता हूँ

मेरे मन में ख्याल आता है

इतनी अच्छी रचना मेरे द्वारा क्यो नहीं …?

‘निल्को ‘की नज़र के सामने

किताबों के पन्नो में

वो शब्दो का समूह

जिसमे कभी प्रेम

तो कभी आक्रोश

कभी बनता बिगड़ता वाक्य

बार – बार यही कहता है

मैं कवि नहीं हूँ

दरअसल कविता मन का भाव है

कवि के जीवन का सार है

रचना भले की

किसी रूप रंग की हो

उसकी नज़रिये का माध्यम

तो तुम ही हो

पर मन अनायास ही

कह उठता है

मैं कवि नहीं हूँ

एम के पाण्डेय ‘निल्को’

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उत्तर प्रदेश

एम.के.पाण्डेय “निल्को जी”
दोस्तों इस बार VMW Team  के एम.के.पाण्डेय “निल्को जी” आप को भारत का सबसे बड़ा राज्य (जनसंख्या के आधार पर) के बारे में बताने जा रहे है अच्छा लगने पर अपने सुझाव मेल या कमेन्ट जरुर करे.. धन्यवाद !

उत्तर प्रदेश का इतिहास बहुत प्राचीन और दिलचस्‍प है। उत्तर वैदिक काल में इसे ब्रह्मर्षि देश या मध्‍य देश के नाम से जाना जाता था। यह वैदिक काल के कई महान ऋषि-मुनियों, जैसे – भारद्वाज, गौतम, याज्ञवल्‍क्‍य, वशिष्‍ठ, विश्‍वामित्र और वाल्‍मीकि आदि की तपोभूमि रहा। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा (जनसंख्या के आधार पर) राज्य है। करीब १६ करोड़ की जनसंख्या के साथ उत्तर प्रदेश विश्व का सर्वाधिक आबादी वाला उप राष्ट्रीय इकाई है। विश्व में केवल पाँच राष्ट्र चीन, स्वयं भारत, संराअमेरिका, इण्डोनिशिया, और ब्राज़ील की जनसंख्या प्रदेश की जनसंख्या से अधिक है उत्तर प्रदेश की राज्धानी लखनऊ है । रामायण में वर्णित तथा हिन्दुओं के एक मुख्य भगवान “भगवान राम” का प्राचीन राज्य कौशल इसी क्षेत्र में था, अयोध्या इस राज्य की राजधानी थी। हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान विष्णु के आठवे अवतार भगवान कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में हुआ था। संसार के प्राचीनतम शहरों में एक माना जाने वाला वाराणसी शहर भी यहीं पर स्थित है। वाराणसी के पास स्थित सारनाथ का चौखन्डी स्तूप भगवान बुद्ध के प्रथम प्रवचन की याद दिलाता है।
उत्तर प्रदेश का भारतीय एवं हिन्दू धर्म के इतिहास मे अहम योगदान रहा है। उत्तर प्रदेश आधुनिक भारत के इतिहास और राजनीति का केन्द्र बिन्दु रहा है और यहाँ के निवासियों ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम और पाकिस्तान पृथकता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। इलाहाबाद शहर प्रख्यात राष्ट्रवादी नेताओं जैसे मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टन्डन और लालबहादुर शास्त्री का घर था। यह शहर भारत देश के आठ प्रधान मन्त्रियों जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, लालबहादुर शास्त्री, चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह चन्द्रशेखर, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी का चुनाव क्षेत्र भी रहा है। इंदिरा गांधी के पुत्र स्वर्गीय संजय गांधी का चुनाव-क्षेत्र भी यहीं था और वर्तमान में सोनिया गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ रही हैं जबकि राहुल गांधी अमेठी से चुनाव लड़ रहे हैं। सन १९०२ में नार्थ वेस्ट प्रोविन्स का नाम बदल कर यूनाइटिड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे यूपी कहा गया। सन १९२० में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद से लखनऊ कर दिया गया। प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक् न्यायपीठ स्थापित की गयी। स्वतन्त्रता के बाद १२ जनवरी सन १९५० में इस क्षेत्र का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रख दिया गया। गोविंद वल्लभ पंत इस प्रदेश के प्रथम मुख्य मन्त्री बने। अक्टूबर १९६३ में सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश एवम भारत की प्रथम महिला मुख्य मन्त्री बनी।
उत्तर प्रदेश के उत्तर में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, पश्‍चिम में हरियाणा, दक्षिण में मध्‍य प्रदेश तथा पूर्व में बिहार राज्‍य है। सन २००० में पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र स्थित गढ़वाल और कुमाऊँ मण्डल को मिला कर एक नये राज्य उत्तरांचल का गठन किया गया जिसका नाम बाद में बदल कर उत्तराखण्ड कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा (जनसंख्या के आधार पर) राज्य है। लखनऊ प्रदेश की प्रशासनिक व विधायिक राजधानी है और इलाहाबाद न्यायिक राजधानी है। प्रदेश के अन्य महत्त्वपूर्ण शहर हैं आगरा, अलीगढ, अयोध्या, बरेली, मेरठ, वाराणसी( बनारस), गोरखपुर, गाज़ियाबाद, मुरादाबाद, सहारनपुर, फ़ैज़ाबाद, कानपुर। इसके पड़ोसी राज्य हैं उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार। उत्तर प्रदेश की पूर्वोत्तर दिशा में नेपाल देश है।
साहित्य के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश का स्थान सर्वोपरि है. साहित्य और भारतीय सेना दो ऐसे क्षेत्र हैं जिनमे उत्तर प्रदेश निवासी गर्व कर सकते हैं. आदि कवी वाल्मीकि , तुलसीदास , कबीरदास , सूरदास से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचर्य राम चन्द्र शुक्ल, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद , निराला, पन्त, बच्चन, महादेवी वर्मा, मासूम राजा, अज्ञये जैसे इतने महान कवि और लेखक हुए हैं उत्तर प्रदेश में कि पूरा पन्ना ही भर जाये. उर्दू साहित्य में भी बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है उत्तर प्रदेश का. फिराक़, जोश मलीहाबादी, चकबस्त जैसे अनगिनत शायर उत्तर प्रदेश ही नहीं वरन देश की शान रहे हैं.
संगीत उत्तर प्रदेश के व्यक्ति के जीवन में बहुत महतवपूर्ण स्थान रखता हैं यह तीन प्रकार में बांटा जा सकता है १- पारंपरिक संगीत एवं लोक संगीत : यह संगीत और गीत पारंपरिक मौको शादी विवाह, होली, त्योहारों आदि समय पर गया जाता है २- शास्त्रीय संगीत : उत्तर प्रदेश उत्तक्रिष्ठ गायन और वादन की परंपरा रही है. ३- हिंदी फ़िल्मी संगीत एवं भोजपुरी पॉप संगीत : इस प्रकार का संगीत उत्तर प्रदेश में सबसे लोकप्रिय है.
कत्थक उत्तर प्रदेश का एक परिष्कृत शास्त्रीय नृत्य है जो कि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ किया जाता है। कत्थक नाम ‘कथा’ शब्द से बना है, इस नृत्य में नर्तक किसी कहानी या संवाद को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करता है। कत्थक नृत्य के प्रमुख कलाकार पन्डित बिरजू महाराज हैं। फरी नृत्य, जांघिया नृत्य, पंवरिया नृत्य, कहरवा, जोगिरा, निर्गुन, कजरी, सोहर, चइता गायन उत्तर प्रदेश की लोकसंस्कृतियां हैं ।
इलाहाबाद में प्रत्‍येक बारहवें वर्ष कुंभ मेला आयोजित होता है जो कि संभवत: दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। इसके अलावा इलाहाबाद में प्रत्‍येक 6 साल में अर्द्ध कुंभ मेले का आयोजन भी होता है। इलाहाबाद में ही प्रत्‍येक वर्ष जनवरी में माघ मेला भी आयोजित होता है, जहां बड़ी संख्‍या में लोग संगम में डुबकी लगाते हैं। अन्‍य मेलों में मथुरा, वृंदावन व अयोध्‍या के झूला मेले शामिल हैं, जिनमें प्रतिमाओं को सोने एवं चांदी के झूलों में रखा जाता है। ये झूला मेले एक पखवाड़े तक चलते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा में डुबकी लगाना अत्‍यंत पवित्र माना जाता है और इसके लिए गढ़मुक्‍तेश्‍वर, सोरन, राजघाट, काकोरा, बिठूर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और अयोध्‍या में बड़ी संख्‍या में लोग एकत्रित होते हैं। आगरा जिले के बटेश्‍वर कस्‍बे में पशुओं का प्रसिद्ध मेला लगता है। बाराबंकी जिले का देवा मेला मुस्‍लिम संत वारिस अली शाह के कारण काफी प्रसिद्ध हो गया है। इसके अतिरिक्‍त यहां हिंदू तथा मुस्‍लिमों के सभी प्रमुख त्‍यौहारों को राज्‍य भर में मनाया जाता है।
उत्तर प्रदेश में सभी प्रकार के सैलानियों के लिए आकर्षण की कई चीजें हैं। प्राचीन तीर्थ स्थानों में वाराणसी, विंध्‍याचल, अयोध्‍या, चित्रकूट, प्रयाग, नैमिषारण्‍य, मथुरा, वृंदावन, देव शरीफ, फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्‍ती की दरगाह, सारनाथ, श्रावस्‍ती, कुशीनगर, संकिसा, कंपिल, पिपरावा और कौशांबी प्रमुख हैं। आगरा, अयोध्‍या, सारनाथ, वाराणसी, लखनऊ, झांसी, गोरखपुर, जौनपुर, कन्नौज, महोबा, देवगढ़, बिठूर और विंध्‍याचल में हिंदू एवं मुस्‍लिम वास्‍तुशिल्‍प और संस्‍कृति के महत्‍वपूर्ण खजाने हैं।
इसी के साथ अगले हफ्ते एक नई प्रदेश के बारे में जानेगे तब तक के लिए नमस्कार !
जय हिंद !

मधुलेश पाण्डेय “निल्को जी”
 

 
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तेजो महालय



एम. के. पाण्डेय “निल्को जी”

ताजमहल का नाम तो आपने कई बार सुना होगा लेकिन VMW Team आप को श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक  जी की पुस्तक “Tajmahal is a Hindu Temple Palace”  के बारे में बताने जा रहा  है  जिसमे ताजमहल को तेजोमहालय बताने के कई तर्क है  |  

श्री पी.एन. ओक अपनी पुस्तक “Tajmahal is a Hindu Temple Palace” में 100 से भी अधिक प्रमाण और तर्को का हवाला देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजोमहालय है। श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक ने कई बार हिन्दू धर्म की दूसरे धर्मों पर श्रेष्ठता प्रमाणित करने का प्रयास किया है। साथ ही, यह तथ्य भी प्रमाणित करने का प्रयास किया है, श्री ओक ने कई वर्ष पहले ही अपने इन तथ्यों और प्रमाणों को प्रकाशित कर दिया था पर दुःख की बात तो यह है कि आज तक उनकी किसी भी प्रकार से अधिकारिक पुष्टी नहीं हुई। यदि ताजमहल के शिव मंदिर होने में सच्चाई होता तो भारतीय़ इसे जरुर स्वीकार करते। स्वीकार करने का सबसे बडा कारण यह है कि ताजमहल एक मुस्लिम प्रशासक के द्वारा बनाया गया है और आज के राजनीतिक परिवेश में मुस्लिम समाज एक अहम स्थान रखता है।
श्री पी.एन. ओक साहब को उस इतिहास कार के रूप मे जाना जाता है तो भारत के विकृत इतिहास को पुर्नोत्थान और सही दिशा में ले जाने का किया है। ओक साहब ने ताजमहल की भूमिका, इतिहास और पृष्ठभूमि से लेकर सभी का अध्ययन किया और छायाचित्रों छाया चित्रो के द्वारा उसे प्रमाणित करने का सार्थक प्रयास किया। श्री ओक के इन तथ्यो पर सरकार और प्रमुख विश्वविद्यालय आदि मौन जबकि इस विषय पर शोध किया जाना चाहिये और सही इतिहास से हमे अवगत करना चाहिये। किन्तु दुःख की बात तो यह है कि आज तक उनकी किसी भी प्रकार से अधिकारिक जाँच नहीं हुई। यदि ताजमहल के शिव मंदिर होने में सच्चाई है तो भारतीयता के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। आज भी हम जैसे विद्यार्थियों को झूठे इतिहास की शिक्षा देना स्वयं शिक्षा के लिये अपमान की बात है, क्योकि जिस इतिहास से हम सबक सीखने की बात कहते है यदि वह ही गलत हो, इससे बड़ा राष्ट्रीय शर्म और क्या हो सकता है ?श्री पी.एन. ओक का दावा है कि ताजमहल शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजो महालय है। इस सम्बंध में उनके द्वारा दिये गये कुछ तर्कों का हिंदी रूपांतरण इस प्रकार हैं
शाहज़हां और यहां तक कि औरंगज़ेब के शासनकाल तक में भी कभी भी किसी शाही दस्तावेज एवं अखबार आदि में ताजमहल शब्द का उल्लेख नहीं आया है। ताजमहल को ताजमहल समझना हास्यास्पद है।
शब्द ताजमहल के अंत में आयेमहलमुस्लिम शब्द है ही नहीं, अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में एक भी ऐसी इमारत नहीं है जिसे कि महल के नाम से पुकारा जाता हो।
साधारणतः समझा जाता है कि ताजमहल नाम मुमताजमहल, जो कि वहां पर दफनाई गई थी, के कारण पड़ा है। यह बात कम से कम दो कारणों से तर्कसम्मत नहीं हैपहला यह कि शाहजहां के बेगम का नाम मुमताजमहल था ही नहीं, उसका नाम मुमताज़उलज़मानी था और दूसरा यह कि किसी इमारत का नाम रखने के लिय मुमताज़ नामक औरत के नाम सेमुमको हटा देने का कुछ मतलब नहीं निकलता।
चूँकि महिला का नाम मुमताज़ था जो कि ज़ अक्षर मे समाप्त होता है कि में (अंग्रेजी का Z कि J), भवन का नाम में भी ताज के स्थान पर ताज़ होना चाहिये था (अर्थात् यदि अंग्रेजी में लिखें तो Taj के स्थान पर Taz होना था)
शाहज़हां के समय यूरोपीय देशों से आने वाले कई लोगों ने भवन का उल्लेखताजमहलके नाम से किया है जो कि उसके शिव मंदिर वाले परंपरागत संस्कृत नाम तेजोमहालय से मेल खाता है। इसके विरुद्ध शाहज़हां और औरंगज़ेब ने बड़ी सावधानी के साथ संस्कृत से मेल खाते इस शब्द का कहीं पर भी प्रयोग करते हुये उसके स्थान पर पवित्र मकब़रा शब्द का ही प्रयोग किया है।
मकब़रे को कब्रगाह ही समझना चाहिये, कि महल। इस प्रकार से समझने से यह सत्य अपने आप समझ में जायेगा कि कि हुमायुँ, अकबर, मुमताज़, एतमातुद्दौला और सफ़दरजंग जैसे सारे शाही और दरबारी लोगों को हिंदू महलों या मंदिरों में दफ़नाया गया है।
यदि ताज का अर्थ कब्रिस्तान है तो उसके साथ महल शब्द जोड़ने का कोई तुक ही नहीं है।
चूँकि ताजमहल शब्द का प्रयोग मुग़ल दरबारों में कभी किया ही नहीं जाता था, ताजमहल के विषय में किसी प्रकार की मुग़ल व्याख्या ढूंढना ही असंगत है।ताजऔरमहलदोनों ही संस्कृत मूल के शब्द हैं।
 ताजमहल शिव मंदिर को इंगित करने वाले शब्द तेजोमहालय शब्द का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मंदिर में अग्रेश्वर महादेव प्रतिष्ठित थे।
संगमरमर की सीढ़ियाँ चढ़ने के पहले जूते उतारने की परंपरा शाहज़हां के समय से भी पहले की थी जब ताज शिव मंदिर था। यदि ताज का निर्माण मक़बरे के रूप में हुआ होता तो जूते उतारने की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि किसी मक़बरे में जाने के लिये जूता उतारना अनिवार्य नहीं होता।
देखने वालों ने अवलोकन किया होगा कि तहखाने के अंदर कब्र वाले कमरे में केवल सफेद संगमरमर के पत्थर लगे हैं जबकि अटारी कब्रों वाले कमरे में पुष्प लता आदि से चित्रित पच्चीकारी की गई है। इससे साफ जाहिर होता है कि मुमताज़ के मक़बरे वाला कमरा ही शिव मंदिर का गर्भगृह है।
संगमरमर की जाली में 108 कलश चित्रित उसके ऊपर 108 कलश आरूढ़ हैं, हिंदू मंदिर परंपरा में 108 की संख्या को पवित्र माना जाता है।
ताजमहल के रखरखाव तथा मरम्मत करने वाले ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने कि प्राचीन पवित्र शिव लिंग तथा अन्य मूर्तियों को चौड़ी दीवारों के बीच दबा हुआ और संगमरमर वाले तहखाने के नीचे की मंजिलों के लाल पत्थरों वाले गुप्त कक्षों, जिन्हें कि बंद कर दिया गया है, के भीतर देखा है।
भारतवर्ष में 12 ज्योतिर्लिंग है। ऐसा प्रतीत होता है कि तेजोमहालय उर्फ ताजमहल उनमें से एक है जिसे कि नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था क्योंकि उसके जलहरी को नाग के द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। जब से शाहज़हां ने उस पर कब्ज़ा किया, उसकी पवित्रता और हिंदुत्व समाप्त हो गई।
वास्तुकला की विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में शिवलिंगों मेंतेजलिंगका वर्णन आता है। ताजमहल मेंतेजलिंगप्रतिष्ठित था इसीलिये उसका नाम तेजोमहालय पड़ा था।
आगरा नगर, जहां पर ताजमहल स्थित है, एक प्राचीन शिव पूजा केन्द्र है। यहां के धर्मावलम्बी निवासियों की सदियों से दिन में पाँच शिव मंदिरों में जाकर दर्शन पूजन करने की परंपरा रही है विशेषकर श्रावन के महीने में। पिछले कुछ सदियों से यहां के भक्तजनों को बालकेश्वर, पृथ्वीनाथ, मनकामेश्वर और राजराजेश्वर नामक केवल चार ही शिव मंदिरों में दर्शनपूजन उपलब्ध हो पा रही है। वे अपने पाँचवे शिव मंदिर को खो चुके हैं जहां जाकर उनके पूर्वज पूजा पाठ किया करते थे। स्पष्टतः वह पाँचवाँ शिवमंदिर आगरा के इष्टदेव नागराज अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर ही है जो कि तेजोमहालय मंदिर उर्फ ताजमहल में प्रतिष्ठित थे।
चार कोणों में चार स्तम्भ बनाना हिंदू विशेषता रही है। इन चार स्तम्भों से दिन में चौकसी का कार्य होता था और रात्रि में प्रकाश स्तम्भ का कार्य लिया जाता था। ये स्तम्भ भवन के पवित्र अधिसीमाओं का निर्धारण का भी करती थीं। हिंदू विवाह वेदी और भगवान सत्यनारायण के पूजा वेदी में भी चारों कोणों में इसी प्रकार के चार खम्भे बनाये जाते हैं।
ताजमहल की अष्टकोणीय संरचना विशेष हिंदू अभिप्राय की अभिव्यक्ति है क्योंकि केवल हिंदुओं में ही आठ दिशाओं के विशेष नाम होते हैं और उनके लिये खगोलीय रक्षकों का निर्धारण किया जाता है। स्तम्भों के नींव तथा बुर्ज क्रमशः धरती और आकाश के प्रतीक होते हैं। हिंदू दुर्ग, नगर, भवन या तो अष्टकोणीय बनाये जाते हैं या फिर उनमें किसी किसी प्रकार के अष्टकोणीय लक्षण बनाये जाते हैं तथा उनमें धरती और आकाश के प्रतीक स्तम्भ बनाये जाते हैं, इस प्रकार से आठों दिशाओं, धरती और आकाश सभी की अभिव्यक्ति हो जाती है जहाँ पर कि हिंदू विश्वास के अनुसार ईश्वर की सत्ता है।
ताजमहल के गुम्बद के बुर्ज पर एक त्रिशूल लगा हुआ है। इस त्रिशूल का का प्रतिरूप ताजमहल के पूर्व दिशा में लाल पत्थरों से बने प्रांगण में नक्काशा गया है। त्रिशूल के मध्य वाली डंडी एक कलश को प्रदर्शित करता है जिस पर आम की दो पत्तियाँ और एक नारियल रखा हुआ है। यह हिंदुओं का एक पवित्र रूपांकन है। इसी प्रकार के बुर्ज हिमालय में स्थित हिंदू तथा बौद्ध मंदिरों में भी देखे गये हैं। ताजमहल के चारों दशाओं में बहुमूल्य उत्कृष्ट संगमरमर से बने दरवाजों के शीर्ष पर भी लाल कमल की पृष्ठभूमि वाले त्रिशूल बने हुये हैं। सदियों से लोग बड़े प्यार के साथ परंतु गलती से इन त्रिशूलों को इस्लाम का प्रतीक चांदतारा मानते रहे हैं और यह भी समझा जाता है कि अंग्रेज शासकों ने इसे विद्युत चालित करके इसमें चमक पैदा कर दिया था। जबकि इस लोकप्रिय मानना के विरुद्ध यह हिंदू धातुविद्या का चमत्कार है क्योंकि यह जंगरहित मिश्रधातु का बना है और प्रकाश विक्षेपक भी है। त्रिशूल के प्रतिरूप का पूर्व दिशा में होना भी अर्थसूचक है क्योकि हिंदुओं में पूर्व दिशा को, उसी दिशा से सूर्योदय होने के कारण, विशेष महत्व दिया गया है. गुम्बद के बुर्ज अर्थात् (त्रिशूल) पर ताजमहल के अधिग्रहण के बादअल्लाहशब्द लिख दिया गया है जबकि लाल पत्थर वाले पूर्वी प्रांगण में बने प्रतिरूप मेंअल्लाहशब्द कहीं भी नहीं है।
हिंदू मंदिर प्रायः नदी या समुद्र तट पर बनाये जाते हैं। ताज भी यमुना नदी के तट पर बना है जो कि शिव मंदिर के लिये एक उपयुक्त स्थान है।
मोहम्मद पैगम्बर ने निर्देश दिये हैं कि कब्रगाह में केवल एक कब्र होना चाहिये और उसे कम से कम एक पत्थर से चिन्हित करना चाहिये। ताजमहल में एक कब्र तहखाने में और एक कब्र उसके ऊपर के मंज़िल के कक्ष में है तथा दोनों ही कब्रों को मुमताज़ का बताया जाता है, यह मोहम्मद पैगम्बर के निर्देश के निन्दनीय अवहेलना है। वास्तव में शाहज़हां को इन दोनों स्थानों के शिवलिंगों को दबाने के लिये दो कब्र बनवाने पड़े थे। शिव मंदिर में, एक मंजिल के ऊपर एक और मंजिल में, दो शिव लिंग स्थापित करने का हिंदुओं में रिवाज था जैसा कि उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और सोमनाथ मंदिर, जो कि अहिल्याबाई के द्वारा बनवाये गये हैं, में देखा जा सकता है।
 ताजमहल में चारों ओर चार एक समान प्रवेशद्वार हैं जो कि हिंदू भवन निर्माण का एक विलक्षण तरीका है जिसे कि चतुर्मुखी भवन कहा जाता है।
ताजमहल में ध्वनि को गुंजाने वाला गुम्बद है। ऐसा गुम्बज किसी कब्र के लिये होना एक विसंगति है क्योंकि कब्रगाह एक शांतिपूर्ण स्थान होता है। इसके विरुद्ध हिंदू मंदिरों के लिये गूंज उत्पन्न करने वाले गुम्बजों का होना अनिवार्य है क्योंकि वे देवीदेवता आरती के समय बजने वाले घंटियों, नगाड़ों आदि के ध्वनि के उल्लास और मधुरता को कई गुणा अधिक कर देते हैं।
ताजमहल दक्षिणमुखी भवन है। यदि ताज का सम्बंध इस्लाम से होता तो उसका मुख पश्चिम की ओर होता।
विचार करने योग्य बात है कि जिस शाहज़हां ने मुमताज़ के जीवनकाल में उसके लिये एक भी भवन नहीं बनवाया, मर जाने के बाद एक लाश के लिये आश्चर्यमय कब्र कभी नहीं बनवा सकता।
एक विचारणीय बात यह भी है कि शाहज़हां के बादशाह बनने के तो या तीन साल बाद ही मुमताज़ की मौत हो गई। तो क्या शाहज़हां ने इन दो तीन साल के छोटे समय में ही इतना अधिक धन संचय कर लिया कि एक कब्र बनवाने में उसे उड़ा सके?
इस लेख मे  VMW Team का  योगदान उतना ही है जितना कि रामसेतु के निर्माण में गिलहरी का था, श्रेय मूल लेखक श्री ओक साहब तथा अन् प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से लगे सभी इतिहास प्रेमियो को।
जय  हिंद !

भारतीयता की पहचान है साड़ी——————–एम. के. पाण्डेय "निल्को जी"

निल्को जी
साड़ी भारतीय औरत का मुख्य परिधान है। यह शायद विश्व की सबसे लंबी और पुराने परिधानों में से गिना जाता है। यह लगभग 5 से 6 यार्ड लम्बी बिना सिली हुए कपड़े का टुकड़ा होता है 
साड़ी पहनने के कई तरीक़े होते हैं जो भौगोलिक स्थिति और पारंपरिक मूल्यों और रुचियों पर निर्भर करता है। अलग-अलग शैली की साड़ियों में कांजीवरम साड़ी, बनारसी साड़ी, पटोला साड़ी और हकोबा मुख्य हैं 
साड़ी बांधने के कई तरीके
वैसे तो सबसे आम तरीका यही है कि साड़ी का एक हिस्सा कमर में लपेटा जाए और दूसरा हिस्सा कंधे पर समेटा जाए। पर देश के अलग–अलग हिस्से में अलग–अलग तरीके से साड़ी बांधी जाती है। साड़ी पर शोध करने वाले फ्रांस के विशेषज्ञ सी. बाउलैंगर ने साड़ी बांधने के अलग–अलग तरीकों को इस तरह नाम दिए हैं:

निवि-: यह नाम मूल रूप से आंध्र प्रदेश में साड़ी बांधने के तरीके को दिया गया है।

गुजराती : साड़ी का खुला सिरा दाएं कंधे पर लपेटा जाता है। एक किनारा पीछे से आगे की ओर रखा जाता है।

मराठी : महाराष्ट्र में जिस तरह साड़ी बांधी जाती है उसे काष्ठा भी कहते हैं। यह कुछ उसी तरह का है, जैसे पुरुष धोती बांधते हैं। साड़ी का बीच का हिस्सा समेट कर पीछे की ओर से कमर के बीच में बांधा जाता है। और दोनों किनारे दोनों पैरों की ओर लपेटे जाते हैं। इसके साथ एक लंबा कपड़ा इस्तेमाल किया जाता है, जिससे शरीर का ऊपरी हिस्सा ढका जाता है।

मदिसारा स्टाइल : तमिलनाडु और केरल की ब्राrाण महिलाएं जिस स्टाइल में साड़ी पहनती है, उसे मदिसारा नाम दिया गया है।

कोदागु स्टाइल : यह स्टाइल कर्नाटक के कोदागु जिला की महिलाओं तक सीमित है। महिलाएं सामने के बजाय पीछे की ओर प्लीट बनाती हैं। खुला किनारा दाएं कंधे पर पीछे से आगे की ओर लाते हुए शरीर का ऊपरी हिस्सा ढका जाता है। साड़ी का बाकी हिस्सा पिन लगा कर टाइट कर दिया जाता है।

गोंड : मध्य भारत में इसी शैली में साड़ी बांधी जाती है। कमर में लपेटकर साड़ी पहले बाएं कंधे की ओर लाई जाती है और फिर बचे हुए भाग से बाकी शरीर ढका जाता है।

कहां की कौन सी साड़ी है मशहूर
बनारसी और शालू : उत्तर प्रदेश

पैठानी : महाराष्ट्र

बांधनी : गुजरात व महाराष्ट्र

कोटा डोरिया : राजस्थान

लुगाडे : महाराष्ट्र

पटोला : गुजरात

चंदेरी : मध्य प्रदेश

माहेश्वरी : मध्य प्रदेश

कोसा सिल्क : छत्तीसगढ़

कांचीपुरम, अरानी : तमिलनाडु

मंगलागिरी : आंध्र प्रदेश

इलकाल, मैसूर सिलक : कर्नाटक

तसर सिल्क : बिहार

राजशाही सिलक, ढाकाई बनारसी, तांगेल कॉटन : बांग्‍लादेश

मूंगा सिल्क : असम

तांत : शांतिपुर, पश्चिम बंगाल

मुर्शिदाबाद सिल्क, बालूचारी सिल्क : पश्चिम बंगाल

कोटकी, इक्कत : उड़ीसा

एम. के. पाण्डेय “निल्को जी”

जयपुर में छठ के धूम

ऐसे त भर दुनिया के हिंदुलो के तरह बिहारो में तमाम तरह के पर्व-त्योहार मनावल जाला बाकि एगो पर्व अइसन बा जेकरा के अगर बिहारी पर्व कहल जाव त गलत न होई… जी हां रउआ ठीक समझनी हम सूर्यषष्ठी यानी कि छठ के ही बात करतानी.
छठ के महातम त सबका खातिर बहुत बा बाकी हमनी जइसन परदेसी लो खातिर एकर महातम तनी ज्यादा ही बा. इहे कारण बा कि हमनी भले गांव घर से दूर बानी स… बाकी छठी मइया अपना अंचरा से कबो हमनी के दूर न कइली.
सन 2000 हजार में हम पहिला साल छठ के मौका पर घर से दूर रही… सच बताई …. भीतर से करेजा रोवत रहे. तब एगो संगी हमरा के गलता किनारे लेकर गइल. जइसे गलता के नजदीक पहुंचे लगनीं… छठ वरतिया और उनकर संगी-साथी लो के भीड़ देखके मन धीरे-धीरे हलुक होखे लागल. गलता बीच पर पहुंच के त एकदम से हम हरान रह गइनी… भीड़ लाखों में. बुझाते न रहे कि हम गावं  से कहीं बाहर बानी. चारों तरफ माहौल एकदम छठमय भइल रहे…
खैर… वोकरा बाद से त जब भी छठ में  जयपुर  में रहेके पड़ेला तब गलता गइला बगैर त कुछ भुलाइल जइसन लागेला.
अबकी छठी मइया के कृपा से छठ में  देवरिया   अपना घरे जाएके मौका मिलतआ… घरे जाएके खुशी त बा… बाकी जयपुर के छठ के भी हम ओतने मिस करतानी…

तअ एक बार जोर से बोलीं छठी मइया की जय!!!

नरियवा जे फरेला घवद से ओ पर सुगा मेड़राय
सुगवा के मरबो धनुष से
सुगा गिरे मुरझाय
रोवें सुगा के सुगनिया
सुगा काहे मारल जाए
रखियों हम छठ के बरतिया आदित होइहें सहाय
दीनानाथ होइहें सहाय
सूरूज बाबा होइहें सहाय

मधुलेश कुमार पाण्डेय

“निल्को जी”