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क्या प्रेम में शारीरीक संबंध जरूरी होता है? 

प्रेम में शारीरिक संबंध जरुरी है…क्योंकि शरीर की यादाश्त होती हैं…जिस प्रकार एक नव्जन्मा शिशु भी अपनी अपनी मां का स्पर्श पहचानता हैं…चाहे आंखे बन्द हो पर वह मां की गोद अौर हाथो को पहचानता है..जबकि उसका मस्तिस्क इतना विकसित नहीं होता..ये शरीर की यादाश्त हैं…प्रेम में भी यही होता हैं…हम आन्खे बन्द करके स्पर्श करके अपने साथी को पहचान सकते हैं…. आज प्रेम की हालत यह है कि 25 साल का होने से पहले, आप 25 साथी बदल चुके होते हैं – इसकी कीमत लोग चुका रहे हैं – अमेरिका की 10 फीसदी जनसंख्या डिप्रेशन या अवसाद की दवाओं पर निर्भर है। उसकी एक बड़ी वजह यह है कि उनमें स्थिरता की कमी होती है क्योंकि उनका शरीर भ्रमित होता है।

बहुत ज्यादा अंतरंगता की कीमत हर जगह चुकानी पड़ती है – जब तक कि आप यह नहीं जानते कि इस शरीर को खुद से एक दूरी पर कैसे रखें। जिसने यह दूरी बनानी सीख ली, वॊ दुनिया जीत लेता है… ऐसे इंसान का ऐसी चीजों की ओर कोई झुकाव नहीं होता। वह शरीर की सीमाओं और विवशताओं से मजबूर नहीं होता – वह अपने शरीर को एक साधन या उपकरण की तरह इस्तेमाल करता है। वरना, अंतरंगता को कम से कम तक रखना सबसे अच्छा होता है। इसलिए हमने कहा कि एक के लिए एक, जब तक कि उनमें से किसी एक की मृत्यु नहीं होती और दूसरा पुनर्विवाह नहीं कर सकता….

आपके शरीर की याददाश्त की तुलना में आपके दिमाग की याददाश्त बहुत कम है। अगर आप किसी चीज या किसी इंसान को एक बार छू लें, तो आपका दिमाग भूल सकता है मगर शरीर में वह हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। जब लोग एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो मन उसे भूल सकता है, मगर शरीर कभी नहीं भूलेगा। अगर आप तलाक लेते हैं, तो चाहे आप अपने साथी से कितनी भी नफरत करते हों, फिर भी आपको पीड़ा होगी क्योंकि शारीरिक याददाश्त कभी नहीं खो सकती

चाहे आप थोड़ी देर तक किसी का हाथ पर्याप्त अंतरंगता से पकड़ें, आपका शरीर कभी उसे नहीं भूल पाएगा

हथेलियां और आपके तलवे बहुत प्रभावशाली रिसेप्टर यानी ग्राहक हैं। जब भी आप किसी ऐसे इंसान को देखते हैं, जिसके साथ आप जुड़ना नहीं चाहते, तो सिर्फ ‘नमस्कार’ करें क्योंकि जब आप दोनों हाथों को साथ लाते हैं (या अपने पैर के दोनों अंगूठों को साथ लाते हैं), तो यह शरीर को याददाश्त ग्रहण करने से रोक देता है।

इसका मकसद शारीरिक याददाश्त को कम से कम रखना है, नहीं तो आपको अनुभव के एक भिन्न स्तर पर ले जाना मुश्किल हो जाएगा। जो लोग भोगविलास में अत्यधिक लीन होते हैं, उनके चेहरे पर एक खास मुस्कुराहट होती है, जिसमें एक धूर्तता भरी होती है, उसमें कोई खुशी नहीं होती। उससे छुटकारा पाने में बहुत मेहनत लगती है क्योंकि भौतिक याददाश्त आपको इस तरीके से उलझा देती है कि आपका दिमाग उसे समझ भी नहीं पाता। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप अपने शरीर को जिन चीजों के संपर्क में लाते हैं, उनके प्रति जागरूक होना सीखें।

– प्रज्ञा पाठक

….या फिर तुम्हारी यादें

तुम या फिर तुम्हारी यादें

जब जब आती है

एक सुखद एहसास मेरे मन को

छू कर भाग जाती है

भाग जाती है

क्योकि

वो रुक नही सकती

और मैं उसे

रोक नही सकता

उस क्षणिक समय में

खो जाते है

हम दोनों 

जी हाँ , सही सुन रहे है

हम दोनों

मैं और मेरी तन्हाइयां

क्योंकि यही तो साथ देती है

पहले से थी और 

बाद तक साथ रहेगी

यही तो है जो अपना है

जो साथ है

जो साथ रहेगा 

सुनाऊंगा किसी रोज

एक दूसरा किस्सा

जिसका तू ही होगा एक हिस्सा

मेरी खामोशियों को न तोड़ो

भादो का महीना है

वर्षा से कही आफत है तो

कही राहत है

क्या सुनाऊ

क्या लिखूं

सोच रहा हूँ यही छोड़ 

देता हूँ जो है

वो किस्मत के 

भरोसे

या करे संघर्ष 

मिलते है इस आधी अधूरी

बिना सिर पैर की

रचना के बाद

एम के पाण्डेय निल्को

ये चन्द लाइने लिखने से क्या फ़ायदा- एम के पाण्डेय ‘निल्को’

ए दोस्त ज़रा मुझ पर
रहमत की नज़र रखना
मै भी तुंहरा ही हूँ
इसकी तो खबर रखना 
मुझ जैसे डूबने वालों को
अब तेरा सहारा है
निल्को ने देख लिया सबको
अब तुझको पुकारा है 
कही डूब न जाऊ मैं
मेरा हाथ पकड़ रखना
तेरी ज़िंदगी के इतिहास में
मेरी भी एक कहानी लिखना 
प्रेम की गर न हो निशानी
ऐसी मीरा की क्या जो न हो दीवानी
ये चन्द लाइने लिखने से क्या फ़ायदा
जिसमे न हो तेरी मेरी कहानी

रंग तो इसका कुछ और चढ़ा होता
प्रेम का यदि व्याकरण तुमने पढ़ा होता
तुम्हारे साथ मिलकर मधुलेश
इक नया आचरण गढ़ा होता
अपनी तो क्या लिखू ए दोस्त
कुछ कम,कुछ गम और कुछ नम लिखते है
एक डायरी रखता हूँ दिल के अंदर
जिस पर सिर्फ़ और सिर्फ तुम्हारा नाम लिखते है
 एम के पाण्डेय निल्को
(युवा ब्लॉगर और कवि)

आखिर कब तक ढूँढेगा निल्को

बहुत याद आउगा 
जब छोड़ के जाउगा
चाहे लाख बुराई क्यू न हो
पर तुम जैसा दोस्त नहीं पाउगा

बहुत छेड़ता हूँ न मैं
परेशान भी करता हूँ न मैं
गुस्सा तुम होते हो मन ही मन
पर मनाता भी न हूँ मैं

क्यू सताते हो कुछ इस तरह
मिलते नहीं हो रोज की  तरह
आखिर कब तक ढूँढेगा निल्को
तुम्हे बीच इस शहर

कहती हो न की छोडो मुझको
अपनी बाहों में न लो मुझको
उस दिन आँसू न बहाना
जिसदिन छोड़ जाऊगा तुम सबको

बहुत ही अच्छा मैं तो नहीं
दिल से बच्चा मैं तो नहीं
पर एक बात तो कहूँगा ही
थोडा सा सच्चा मैं भी सही

एम के पाण्डेय निल्को 




थोड़ा तो ठहर – एम के पाण्डेय निल्को

चेतावनी – दोस्तो आज एक मनगढ़त रचना आप के सामने पेश कर रहा हूँ इसका किसी भी जीवित व्यक्ति से कोई भी सम्बंध नहीं है यदि ऐसा पाया जाता है तो उसे मात्र एक संयोग ही कहा जाएगा । 


गई थी वो दूसरे शहर 

बरपा रही थी कही वो कहर 

जब मुड़ कर देखि वो मुझको 

तो निल्को ने कहा – थोड़ा तो ठहर 

शुरू हुआ एक अनोखा सफर 

आए और बीते कई पहर 

मन मे बसी तस्वीर उसकी 

और उठ रही थी कई लहर 

रेलगाड़ी के सफर मे पड़ी जब नज़र 

जा रही थी वो अपने घर 

क्षण भर के मुलाक़ात मे ही 

वो लगी गणित की अंश और मैं हर 

छोड़ गई आधे रास्ते मे ही वो 

और हंस कर कह गई – यू केन गो 

देखता रहा मधुलेश जब तक पड़ी नज़र 

और लगा समय गया था कुछ पल ठहर 

एम के पाण्डेय निल्को
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लालबहादुर शास्त्री – सादा जीवन, उच्च विचार

आज भारत को जय जवान जय किसान का नारा देने वाले देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन है। सादा जीवन और उच्च विचार कहने वाले लाल बहादुर शास्त्री ने यह दुनिया को जता दिया कि अगर इंसान के अंदर आत्मविश्वास हो तो वो कोई भी मंजिल पा सकता है। शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 में उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। वह गांधी जी के विचारों और जीवनशैली से बेहद प्रेरित थे। उन्होने गांधी जी के असहयोग आंदोलन के समय देश सेवा का व्रत लिया था और देश की राजनीति में कूद पड़े थे। लाल बहादुर शास्त्री जाति से श्रीवास्तव थे। लेकिन उन्होने अपने नाम के साथ अपना उपनाम लगाना छोड़ दिया था क्योंकि वह जाति प्रथा के घोर विरोधी थे। उनके नाम के साथ जुड़ा ‘शास्त्री’ काशी विद्यापीठ द्वारा दी गई उपाधि है। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होने 2 साल तक काम किया। उनका प्रधानमंत्रित्व काल 9जून 1964 से 11जनवरी 1966 तक रहा। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में देश में भीषण मंदी का दौर था। देश के कई हिस्सों में भयानक अकाल पड़ा था। उस समय शास्त्री जी ने देश के सभी लोगों को खाना मिल सके इसके लिए सभी देशवासियों से हफ्ते में 1 दिन व्रत रखने की अपील की थी। शास्त्री जी की मृत्यु यूएसएसआर के ताशकंद में हुई थी। शकंद की सरकार के मुताबिक शास्त्री जी की मौत दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई थी पर उनकी मौत का कारण हमेशा संदिग्ध रहा। उनकी मृत्यु 11 जनवरी 1966 में हुई थी। वे उस समय देश के प्रधानमंत्री थे। आज एक बार फिर से देश को लाल बहादुर शास्त्री जैसे लोगों की जरूरत है, क्योंकि आज देश को महंगाई ने अपने मकड़जाल में घेर रखा है और आम जनता के सामने दो जून की रोटी का प्रश्न है। ऐसे में अगर देश के लोग फिर से अपने लाल को याद करके आगे बढ़े तो निश्चित रूप से देश अपनी समस्या से मुक्ति पा लेगा। भारत मां के इस सपूत को वनइंडिया परिवार भी कोटि कोटि प्रणाम करता है।

एक रचना जो बेहद मुझे अच्छी लगी वो भी आप के सामने प्रस्तुत करता हूँ यह रचना मैंने http://mkushwansh.blogspot.ae/2015/10/blog-post.html  महेश जी के ब्लॉग से ली है ।

गंगा में तैरेते हुये पार करना 
और  उसमे निहित  बाल सुलभ  चेस्ठा   ने  
तुम्हें  महान बना दिया  
तुम्हारे मन मंदिर मे  था साफ सफ़फाक  हृदय  
कलम दवात से पट्टी  पर  लिखे  
मास्टर जी के शब्द  
तुम्हारे मन मे कहीं  दूर तक लिख गए 
मानो  सफ़ेद अक्षर  से लिखे हों  
जिन्हें  
तुमने तो आत्मसात कर लिया  
ये देश नहीं   समझ  पाया  
और समझा भी तो 
जानबूझकर अंजान बना रहा  
तुम्हारी खिलौने सी  कद- काठी ने 
हिमालय छुआ  
तुम्हारे विशाल हृदय  मे  छिपे  मर्म को  देश ने समझा  
तुममे अपना भविस्य  ढूढ़ा  
तुम्हें सरताज  बना दिया  
तुमने माँ का कर्ज चुकाया  
और दुश्मन को छठी  का दूध याद दिला दिया 
जय जवान -जय किसान 
तुम्हारी साफ सफ़फाक छवि  का  
आईना बन गया  
मगर  तुम  चले गए   
विदेसी  माटी  पर  चुपचाप  
बे-आवाज़       
और हम रो भी नही पाये      
हमने  आज तक वो आंशू  सँजो कर रखे हैं  
भारत माँ के सच्चे  लाल
इस देश में  
तुम्हें फिर आना होगा   
देश की माटी  का  कर्ज जो बाकी  है  
हमपर  
हमें ही चुकाना होगा
ईस्वर से विनम्र  विनती है  
भारत   माँ को एक बार फिर वो  बहादुर  बेटा लौटा   दे  
ताकी माँ के सपूत  धो सकें अपने पाप   
चुका सकें आंशुओं के कर्ज
और सच्चे अर्थों मे बहा सकें 
सदियों से सूखे आंशू
और ये माँ 
पा सके कोई मुकाम 
और हम  
इस भारत के लाल पर  
बहा सकें रुके आंशू  
अपनी धरती पर 
तुम्हारे जन्म दिन के दिन   

-कुशवंश 

नज़र निल्को की – तेरी नज़दीक वाली दूरिया


तेरी नज़दीक वाली दूरिया
लगती है जैसे गोलिया
तेरी हर अदा कुछ ख़ास नहीं
पर सहती है हर एक बोलिया


उसका बनना और सवरना
जैसे हो पानी का ठहरना 
पर इतराती ऐसे वो
जैसे दौड़ में भी टहलना
पुकारते है कई नाम से उसे 
धूप मे भी बारिश हो जैसे 
पर सुनती नहीं वो एक बार भी 
चाहे करा लो अपनी जैसे तैसे  
झील सी आखे है उसकी 
पर पता नहीं है वो किसकी 
मिलने का बनाया था इरादा 
किन्तु नहीं दी पता वो घर की 

उसकी खामोसी जब जब बोली है 
असर करती जैसे दर्द -ए -दिल की गोली है 
सारे पर्व और त्योहार उसके चेहरे पर 
और खेलता ‘निल्को‘ रोज जैसे होली है 

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एम के पाण्डेय निल्को 
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