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Google Self Driving Bike/ Cycle

गूगल ने आधुनिकता और तकनीक नया दिशा फिर से प्रदान किया है । ड्राइवरलेस कारों के बाद अब सेल्फ ड्राइविंग ​साइकिल /बाइक भी अब बाजार में आ गई है। अब आपकी साइकिल खुद-ब-खुद रोड पर चलेगी। गूगल ने इन्हें वल्र्ड प्रीमियम साइकलिंग सिटी के मौके पर एम्सटर्डम की गलियों में टेस्ट भी किया गया है। ये साइकिलें पॉवरफुल इलेक्ट्रिक मोटर से लैस हैं। सथ ही इनमें पिकअप फंक्शन भी दिया गया है जो साइकिल को किसी भी पोजीशन से पिकअप कर सकती है। अपने रोमांच को कई गुना बढ़ाने के लिए नीचे दिए गए सेल्फ ड्राइविंग बाइक/साइकिल किल्स के इस वीडियो को देखें।

मेकडोनाल्ड : 16 दिन पुराने तेल में पका रहे आलू-टिक्की, फ्रेंच फ्राइज

मेकडोनाल्ड : मुनाफे के िलए भरोसा तोड़ा

 
16 दिन पुराने तेल में पका रहे थे आलू-टिक्की, फ्रेंच फ्राइज 
काला और गाढ़ा तेल मिला, 2 सैंपल लिए, 120 लीटर तेल फिंकवाया 
जयपुर| पांचबत्ती स्थित मेकडोनाल्ड में पिछले 16 दिन से आलू टिक्की, फ्रेंच फ्राइज और अन्य पदार्थों को तलने वाले तेल को नहीं बदला गया था। यहां ऐसे तेल को काम में लिया जा रहा था जिसकी क्वालिटी सबसे गुणवत्ताहीन होती है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की टीम ने शुक्रवार को मेकडोनाल्ड पर कार्रवाई के दौरान ऐसी ही स्थिति पाई। टीम ने यहां खराब हो चुका 120 लीटर तेल फिंकवाया और तेल के दो नमूने लिए। साथ ही टीम ने डोमिनोज से भी दो सॉस के सैंपल लिए हैं। 

मामले के अनुसार सीएमएचओ डॉ. नरोत्तम शर्मा के निर्देश पर फूड इंस्पेक्टर की टीम शुक्रवार शाम मेकडोनाल्ड पर पहुंची। यहां जिन स्थान पर फ्रेंच फ्राइज और टिक्की पकाए जा रहे थे, वहां ऑयल मैनेजमेंट शीट की जांच की। इस शीट में तेल बदलने की तिथि डाली जाती है। जांच में सामने आया कि एक जून को तेल डाला गया और उसके बाद कभी चेंज ही नहीं किया गया। 

काम में ले रहे पामोलीन ऑयल 

सुबह11 बजे से रात 11 बजे तक 360 डिग्री पर तेल को उबाल कर खाद्य पदार्थ पकाए जाते थे। टीम ने यहां ऐसा तेल पकड़ा जो कि पूरी तरह काला और गाढ़ा हो चुका था। डामर जैसा। निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि खाने के लिए पामोलीन तेल काम में लिया जा रहा है। ऐसे में तुरंत खराब 120 लीटर तेल नष्ट कराया। साथ ही तेल के दो सैंपल भी लिए। 

बार-बारपका तेल हानिकारक 

एसएमएसअस्पताल के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. पुनीत सक्सैना ने बताया कि तेल को बार-बार पकाने से तेल के प्रोटीन और न्यूट्रीशियंस समाप्त हो जाते हैं। चिकनाई खत्म हो जाती है। तेल सेचुराइट फैटी एसिड में तब्दील हो जाता है। इससे शरीर में सीधे वसा और कोलेस्ट्रोल जाता है। 

संगीत प्रतियोगिता ‘सुरतरंग’ का होगा आयोजन

जयपुर, संगम कला ग्रुप 31 मई को राज्यस्त्रीय संगीत प्रतियोगिता ‘सुरतरंग’ का आयोजन करेगी। इसे लेकर एक बैठक जयपुर स्थित कार्यालय में हुई। बैठक की अध्यक्षता जय सूद ने की। राज्यस्त्रीय संगीत प्रतियोगिता ‘सुरतरंग’ के लिए 31 मई को आडिशन लिया जाएगा। izfr;ksfxrk ds Js”B xk;d@xkf;dk dks fo[;kr laxhrdkj Lo0 Jh /keZohj usgjk Le`fr VªkWQh ls lEekfur fd;k tk,xkA  इस बारे में एम के पाण्डेय निल्को ने बताया की इस प्रतियोगिता में सीनियर और जूनियर वर्ग के कलाकार भाग लेंगे। इस दौरान कहा गया की गायन प्रतियोगिता के विजेताओ को दिल्ली में होने वाली आल इंडिया फाइनल में भाग लेने का मौका मिलेगा तथ विजेता कलाकारों को संस्थान आगे बढ़ाने का प्रयास करेगी । laxe dyk xqi }kjk lksuw fuxe] Js;k ?kks”kky] lqfuf/k pkSgku] tlfiUnj u:yk] fiukt+ elkuh] vkuUn jkt vkuUn]  feuk{kh ‘ks”kknzh] f’kckuh d’;i] Lusgk] eks- lyker] rks”kh] ‘kkfjc] vkd`fr dDdM+] johUnz mik/;k;] _pk eq[kthZ] jathr iaokj] uezrk ‘kekZ]  lkftn [kku] ikouh ik.Ms] yksfj;k] :nzk{k जैसे कई लोगो को मंच प्रदान किया है ।

फ़ॉर्म डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे  http://bit.ly/1Ol3OD0 


Venue : The Roots, 60 Shiv Colony,

LAXMI NAGAR, HATWARA ROAD, JAIPUR – 06 


for more details contact 
Mr. Jai Sood +91-9799113100 
& 
Mr. M K Pandey +91-8890553555

मदर्स डे पर विशेष

आज मै तुम्हे याद करूँगा क्योंकि आज मदर डे है, आज मै तुमको तोहफे में कुछ दूंगा क्योकि आज मदर डे है, आज मै तुमसे समय निकाल कर मिलूँगा क्योंकि आज मदर डे है, साल में एक बार ही सही मै तुम्हारे बारे में सोचूंगा क्योंकि आज मदर डे है.
कई समाचार पत्र और न्यूज चैनल कहते है कि आपको मम्मी से कितना प्यार है? कितनी खास हैं माँ आप के लिए? मदर्स दे पर तोहफा देकर आप साबित कर सकते हैं कि माँ से बड़ा कोई नहीं,( कमाल है! अब बाजारू तोहफे माँ को माँ साबित करेंगे) शायद माँ को उन नेताओं कि सड़क पर लगी मूर्ति समझ लिया गया है जिनपर साल भर कबूतर व कौए गन्दा करते हैं और साल मे एक दिन कोई नेता उन्हें साफ करवाकर नयी माला पहनाता है और उन्हें याद करके अपना फर्ज निभाता है और फिर उसे उसके जीवन पर्यंत चलने वाले हाल पर छोड़ देता है.
क्या इतना उतावलापन किसी भारतीय के लिए माँ के प्रति साल में एक ही दिन रहता है, क्या हम माँ को साल में एक दिन याद रखने वाली मूर्ति समझते हैं कि उसे साफ किया और कुछ नये मालाओं से सजाकर फिर किसी ओट पर रख दिया कि अगले साल फिर उसे मदर डे पर उठाऊंगा और वही काम पूरा करके माँ के कर्ज को अदा कर दूंगा.
हमारी नई दुनिया में जीने वाले आधुनिक भारतीयों ये हमारी परंपरा नही है, क्योकि माँ हमारे सर्वश्व मे निवास करती है वह हमारे जीवन के हर क्षण मे हमारे साथ रहती है, पूरा जीवन हम उसकी सेवा करके भी उसके कर्ज को नही उतार पाते तो साल मे एक दिन याद करके हम क्या कर लेंगे ।
अरे जो लोग अपनी माँ को अपने साथ नहीं रखते या भूल जाते हैं वे लोग मदर डे मनावें. हम तो भारतीय हैं हमारी तो दिन की शुरुआत ही माँ के चरणों से होती है इसीलिए हमारा हर दिन मदर डे होता है.
हमें पश्चिम से ये सीखने की नहीं बल्कि उनको ये सिखाने की जरुरत है कि हम अपने रिश्तों कि मार्केटिंग नहीं करते और न ही उनको साल मे केवल एक दिन मनाते हैं बल्कि हमारे हर रिश्ते हमारे जीवन कि अनमोल कडिया होते हैं जिनकी माला हम हर पल अपने ह्रदय से लगाये रहते हैं।
(डॉ रत्नेश त्रिपाठी जी के फेसबुक वाल से )

एक दिन कार,दूसरे दिन बेकार

 दिल्ली हाईकोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से मिली कड़ी फटकार के बाद केजरीवाल सरकार ने शुक्रवार को डीजल और पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियों को लेकर बड़ा फैसला लिया। सरकार ने घोषणा की है कि एक जनवरी से राजधानी में इवेन और ऑड नंबर की गाड़ियों के लिए अलग अलग दिन निश्चित होगा। यानी 2,4,6,8,0 के नंबर वाली गाड़ियां पहले दिन और 1,3,5,7,9 की गाड़ियां दूसरे दिन चलेंगी। दिल्ली में वायु प्रदूषण घटाने के लिए केजरीवाल सरकार का गाड़ियों के सम-विषम नंबर वाला ये फैसला खुद दिल्ली वालों की नजर में कितना व्यावहारिक है? फैसले पर अमल से कैसे बढ़ेंगी उनकी दिक्कतें? और स्वच्छ हवा के लिए क्या वे ये कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं?
झाड़ू, जब तक एक सूत्र में बँधी होती है, तब तक वह कचरा साफ करती है लेकिन वही झाड़ू जब बिखर जाती है तो खुद कचरा हो जाती है एकता का महत्व समझे

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इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये – मुनव्वर राना


इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये 

आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिये


आप दरिया हैं तो फिर इस वक्त हम खतरे में हैं 

आप कश्ती हैं तो हमको पार होना चाहिये


ऐरे गैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों 

आपको औरत नहीं अखबार होना चाहिये


जिंदगी कब तलक दर दर फिरायेगी हमें 

टूटा फूटा ही सही घर बार होना चाहिये


अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दें मुझे 

इश्क के हिस्से में भी इतवार होना चाहिये

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शिक्षा , शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था

किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा के अनेक आयाम हैं, जो राष्ट्रीय विकास में शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हैं। वास्तविक रूप में शिक्षा का आशय है ज्ञान, ज्ञान का आकांक्षी है-शिक्षार्थी और इसे उपलब्ध कराता है शिक्षक।
तीनों परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। एक के बगैर दूसरे का अस्तित्व नहीं। यहां शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाली प्रबंधन इकाई के रूप में प्रशासन नाम की नई चीज जुड़ने से शिक्षा ने व्यावसायिक रूप धारण कर लिया है। शिक्षण का धंधा देश में आधुनिक घटना के रूप में देखा जा सकता है।
प्राचीनकाल की ओर देखें तब भारत में ज्ञान प्रदान करने वाले गुरु थे, अब शिक्षक हैं। शिक्षक और गुरु में भिन्नता है। गुरु के लिए शिक्षण धंधा नहीं, बल्कि आनंद है, सुख है। शिक्षक अतीत से प्राप्त सूचना या जानकारी को आगे बढ़ाता है, जबकि गुरु ज्ञान प्रदान करता है। शिक्षा से मानव का व्यक्तित्व संपूर्ण, विनम्र और संसार के लिए उपयोगी बनता है। सही शिक्षा से मानवीय गरिमा, स्वाभिमान और विश्व बंधुत्व में बढ़ोतरी होती है। अंतत: शिक्षा का उद्देश्य है-सत्य की खोज। इस खोज का केंद्र अध्यापक होता है, जो अपने विद्यार्थियों को शिक्षा के माध्यम से जीवन में और व्यवहार में सच्चाई की शिक्षा देता है। छात्रों को जो भी कठिनाई होती है, जो भी जिज्ञासा होती है, जो वे जानता चाहते हैं, उन सबके लिए वे अध्यापक पर ही निर्भर रहते हैं। यदि शिक्षक के मार्गदर्शन में प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा को उसके वास्तविक अर्थ में ग्रहण कर मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में उसका प्रसार करता है तो मौजूदा 21वीं सदी में दुनिया काफी सुंदर हो जाएगी। आज की युवा पीढ़ी ऐसी शिक्षा प्रणाली चाहती है जो उसके खोजी और सृजनशील मन को सबल बनाने के साथ-साथ उसके सामने चुनौती प्रस्तुत करे। देश का भविष्य उन पर टिका हुआ है। वे वर्तमान में शिक्षा प्रणाली के संबंध में सोच-विचार करना चाहते हैं। एक अच्छी शिक्षा प्रणाली में ऐसी क्षमता होनी चाहिए जो छात्रों की ज्ञान प्राप्ति की तीव्र जिज्ञासा को शांत कर सके। शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे पाठ्यक्रम बनाने के लिए खुद को तैयार करना चाहिए जो विकसित भारत की सामाजिक और प्रौद्योगिकी संबंधी आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील हाें। वर्तमान पाठ्यक्रम में विकास कार्यो की गतिविधियों को अनिवार्यत: स्थान दिया जाना चाहिए ताकि ज्ञान समाज की भावी पीढ़ी पूरी तरह से सामाजिक परिवर्तन के सभी पहलुओं के अनुकूल हो सके।शिक्षा क्या है’ में जीवन से संबंधित युवा मन के पूछे-अनपूछे प्रश्न हैं और जे.कृष्णमूर्ति की दूरदर्शी दृष्टि इन प्रश्नों को मानो भीतर से आलोकित कर देती है पूरा समाधान कर देती है। ये प्रश्न शिक्षा के बारे में हैं, मन के बारे में हैं, जीवन के बारे में हैं, विविध हैं, किन्तु सब एक दूसरे से जुड़े हैं।
“गंगा बस उतनी नहीं है, जो ऊपर-ऊपर हमें नज़र आती है। गंगा तो पूरी की पूरी नदी है, शुरू से आखिर तक, जहां से उद्गम होता है, उस जगह से वहां तक, जहां यह सागर से एक हो जाती है। सिर्फ सतह पर जो पानी दीख रहा है, वही गंगा है, यह सोचना तो नासमझी होगी। ठीक इसी तरह से हमारे होने में भी कई चीजें शामिल हैं, और हमारी ईजादें सूझें हमारे अंदाजे विश्वास, पूजा-पाठ, मंत्र-ये सब के सब तो सतह पर ही हैं। इनकी हमें जाँच-परख करनी होगी, और तब इनसे मुक्त हो जाना होगा-इन सबसे, सिर्फ उन एक या दो विचारों, एक या दो विधि-विधानों से ही नहीं, जिन्हें हम पसंद नहीं करते।”
क्या आप स्वयं से यह नहीं पूछते कि आप क्यों पढ़-लिख रहे हैं ? क्या आप जानते है कि आपको शिक्षा क्यों दी जा रही है और इस तरह की शिक्षा का क्या अर्थ है ? अभी की हमारी समझ में शिक्षा का अर्थ है स्कूल जाना पढ़ना लिखना सीखना, परीक्षाएं पास करना कालेज में जाने लगते हैं। वहाँ फिर से कुछ महीनों या कुछ वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, परीक्षाएं पास करते हैं और कोई छोटी-मोटी नौकरी पा जाते हैं, फिर जो कुछ आपने सीखा होता है भूल जाते हैं। क्या इसे ही हम शिक्षा कहते हैं ? क्या आप समझ रहे हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ ? क्या हम सब यही नहीं कर रहे हैं ? 
लड़कियां बी. ए. एम.ए. जैसी कुछ परीक्षाएं पास कर लेती हैं, विवाह कर लेती हैं, खाना पकाती हैं या कुछ और बन जाती हैं, बच्चों को जन्म देती हैं और इस तरह से अनेक वर्षो में पाई जाने वाली शिक्षा पूर्णतः व्यर्थ हो जाती है हां, यह जरूर जान जाती हैं कि अंग्रेजी कैसे बोली जाती है, वे थोड़ी-बहुत चतुर, सलीकेदार, सुव्यवस्थित हो जाती हैं और अधिक साफ सुथरी रहने लगती हैं, पर बस उतना ही होता है, है न ? किसी तरह लड़के कोई तकनीकी काम पा जाते हैं, क्लर्क बन जाते हैं या किसी तरह शासकीय सेवा में लग जाते है इसके साथ ही सब समाप्त हो जाता है। ऐसा ही होता है न ? 
आप देख सकते हैं कि जिसे आप जीना कहते हैं, वह नौकरी पा लेने बच्चे पैदा करने, परिवार का पालन-पोषण करने, समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं को पढ़ने, बढ़–चढ कर बातें कर सकने और कुशलतापूर्वक वाद-विवाद कर सकने तक सीमित होता है। इसे ही हम शिक्षा कहते हैं-है न ऐसा ? क्या आपने कभी अपने माता-पिता और बडे लोगों को ध्यान से देखा है ? उन्होंने भी परीक्षाएं पास की हैं, वे भी नौकरियां करते हैं और पढ़ना-लिखना जानते हैं। क्या शिक्षा का कुल अभिप्राय इतना है ? 
दुर्भाग्य से हमारे देश में समाज के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और आदर प्राप्त “शिक्षक” की हालत अत्यधिक दयनीय और जर्जर कर दी गई है।
शिक्षक शिक्षण छोड़कर अन्य समस्त गतिविधियों में संलग्न हैं। वह प्राथमिक स्तर का हो अथवा विश्वविद्यालयीन, उससे लोकसभा, विधानसभा सहित अन्य स्थानीय चुनाव, जनगणना, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अथवा अन्य इस श्रेणी के नेताओं के आगमन पर सड़क किनारे बच्चों की प्रदर्शनी लगवाने के अतिरिक्त अन्य सरकारी कार्य संपन्न करवाए जाते हैं।
देश की शिक्षा व्यवस्था एवं शिक्षकों की मौजूदा चिंतनीय दशा के लिए हमारी राष्ट्रीय और प्रादेशिक सरकारें सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, जिसने शिक्षक समाज के अपने हितों की पूर्ति का साधन बना लिया है। शिक्षा वह है, जो जीवन की समस्याओं को हल करे, जिसमें ज्ञान और काम का योग है? 
आज विद्यालय में विद्यार्थी अध्यापक से नहीं पढ़ते, बल्कि अध्यापक को पढ़ते हैं।

मुझे ऐसी कोई शिक्षा व्यवस्था नजर नहीं आ रही, जिसे हम एक आदर्श ढांचा कह सकें, हरेक में तमाम कमियां हैं। आप चाहे जैसा ढांचा तैयार कर लें, उसमें आप भले ही कमियां न ढूंढ पाएं, लेकिन बच्चे जरूर उसमें कमियां निकाल लेंगे। आप पाएंगे कि आप जैसी भी पुख्ता व्यवस्था क्यों न बनाएं, बच्चे उसमें सुराख ढूंढ ही लेते हैं। मेरे ख्याल से ऐसे बहुत सारे बच्चे हैं, जो व्यव्स्था में कमियां ढूंढ निकालते हैं इसका मतलब कि वे बच्चे वाकई अच्छे हैं! एक अच्छी शिक्षा नीति में, ज्ञान तथा शिक्षा प्राप्त करना आसान होना चाहिए ताकि हर किसी को शिक्षा प्राप्त करने का समान अवसर मिले, और जिसमें जाती, वर्ण और वर्ग जैसे शब्दों का कोई स्थान न हो । इसमें कोई शक नहीं की शिक्षा में आरक्षण एक अच्छे मक्सद ( वर्गीकरण की समाप्ति ) को प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल में लाया गया तथा अधिनियमित किया गया , परन्तु इसके विपरीत ये विभाजिकरण का एक मुख्य कारण बन गया है, ज्यादातर महाविद्यालयों एवं संस्थानों में लोग आरक्षण से क्रुद्ध हो कर गुटबंदी कर लेते है और कमजोर वर्ग के लोगों का बहिष्कार करते हैं तथा उन्हें हीन समझते हैं । शिक्षा नीति में चाहिए की शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के पहुँच में हो ताकि शिक्षा ग्रहण करने में उसके परिवार की आर्थिक ऋण न टूट जाये । जबकि शिक्षा के निजीकरण के बाद इस लक्ष्य की प्राप्ति की शिक्षा एक अत्यंत लाभकारी व्यवसाय के रूप में निखर के आया है ।
शिक्षा की धांधली को
अब हम कैसे मिटायें
शिक्षा हमारा जीवन है
इसे कैसे आगे बढायें

एम के पाण्डेय निल्को

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शिक्षा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’


शिक्षा है सब काल कल्प-लतिका-सम न्यारी;

कामद, सरस महान, सुधा-सिंचित, अति प्यारी।

शिक्षा है वह धारा, बहा जिस पर रस-सोता;

शिक्षा है वह कला, कलित जिससे जग होता।

है शिक्षा सुरसरि-धार वह, जो करती है पूततम;

है शिक्षा वह रवि की किरण, जो हरती है हृदय-तम।

क्या ऐसी ही सुफलदायिनी है अब शिक्षा?

क्या अब वह है बनी नहीं भिक्षुक की भिक्षा?

क्या अब है वह नहीं दासता-बेड़ी कसती?

क्या न पतन के पाप-पंक में है वह फँसती?

क्या वह सोने के सदन को नहीं मिलाती धूल में?

क्या बनकर कीट नहीं बसी वह भारत-हित-फूल में?

प्रतिदिन शिक्षित युवक-वृंद हैं बढ़ते जाते;

पर उनमें हम कहाँ जाति-ममता हैं पाते?

उनमें सच्चा त्याग कहाँ पर हमें दिखाया?

देश-दशा अवलोक वदन किसका कुम्हलाया?

दिखलाकर सच्ची वेदना कौन कर सका चित द्रवित;

किसके गौरव से हो सकी भारतमाता गौरवित।

अपनी आँखें बंद नहीं मैंने कर ली हैं;

वे कंदीलें लखीं जो कि तम-मधय बली हैं।

वे माई के लाल नहीं मुझको भूले हैं।

सूखे सर में जो सरोज-जैसे फूले हैं।

कितनी आँखें हैं लगीं जिन पर आकुलता-सहित;

है जिनकी सुंदर सुरभि से सारा भारत सौरभित।

किंतु कहूँगा काम हुआ है अब तक जितना;

वह है किसी सरोवर की कुछ बूँदों-इतना।

जो शाला कल्पना-नयन-सामने खड़ी है;

अब तक तो उसकी केवल नींव ही पड़ी है।

अब तक उसका कल का कढ़ा लघुतम अंकुर ही पला;

हम हैं विलोकना चाहते जिस तरु को फूला-फला।

प्यारे छात्र समूह, देश के सच्चे संबल,

साहस के आधार, सफलता-लता-दिव्य-फल,

आप सबों ने की हैं सब शिक्षाएँ पूरी;

पाया वांछित ओक दूर कर सारी दूरी।

अब कर्म-क्षेत्र है सामने, कर्म करें, आगे बढ़ें;

कमनीय कीर्ति से कलित बन गौरव-गिरिवर पर चढ़ें।

है शिक्षा-उपयोग यही जीवन-व्रत पालें;

जहाँ तिमिर है, वहाँ ज्ञान का दीपक बालें।

तपी भूमि पर जलद-तुल्य शीतल जल बरसे;

पारस बन-बन लौहभूत मानस को परसें;

सब देश-प्रेमिकों की सुनें, जो सहना हो वह सहें;

उनके पथ में काँटे पड़े हृदय बिछा देते रहें।

प्रभो, हमारे युवक-वृंद निजता पहचानें;

शिक्षा के महनीय मंत्र की महिमा जानें।

साधन कर-कर सकल सिध्दि के साधन होवें;

जो धब्बे हैं लगे, धौर्य से उनको धोवें।

सब काल सफलताएँ मिलें, सारी बाधाएँ टलें;

वे अभिमत फल पाते रहें, चिर दिन तक फूलें-फलें।

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महात्मा गांधी और भारतरत्न पं. लालबहादुर शास्त्री को नमन।

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लालबहादुर शास्त्री – सादा जीवन, उच्च विचार

आज भारत को जय जवान जय किसान का नारा देने वाले देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन है। सादा जीवन और उच्च विचार कहने वाले लाल बहादुर शास्त्री ने यह दुनिया को जता दिया कि अगर इंसान के अंदर आत्मविश्वास हो तो वो कोई भी मंजिल पा सकता है। शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 में उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। वह गांधी जी के विचारों और जीवनशैली से बेहद प्रेरित थे। उन्होने गांधी जी के असहयोग आंदोलन के समय देश सेवा का व्रत लिया था और देश की राजनीति में कूद पड़े थे। लाल बहादुर शास्त्री जाति से श्रीवास्तव थे। लेकिन उन्होने अपने नाम के साथ अपना उपनाम लगाना छोड़ दिया था क्योंकि वह जाति प्रथा के घोर विरोधी थे। उनके नाम के साथ जुड़ा ‘शास्त्री’ काशी विद्यापीठ द्वारा दी गई उपाधि है। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होने 2 साल तक काम किया। उनका प्रधानमंत्रित्व काल 9जून 1964 से 11जनवरी 1966 तक रहा। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में देश में भीषण मंदी का दौर था। देश के कई हिस्सों में भयानक अकाल पड़ा था। उस समय शास्त्री जी ने देश के सभी लोगों को खाना मिल सके इसके लिए सभी देशवासियों से हफ्ते में 1 दिन व्रत रखने की अपील की थी। शास्त्री जी की मृत्यु यूएसएसआर के ताशकंद में हुई थी। शकंद की सरकार के मुताबिक शास्त्री जी की मौत दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई थी पर उनकी मौत का कारण हमेशा संदिग्ध रहा। उनकी मृत्यु 11 जनवरी 1966 में हुई थी। वे उस समय देश के प्रधानमंत्री थे। आज एक बार फिर से देश को लाल बहादुर शास्त्री जैसे लोगों की जरूरत है, क्योंकि आज देश को महंगाई ने अपने मकड़जाल में घेर रखा है और आम जनता के सामने दो जून की रोटी का प्रश्न है। ऐसे में अगर देश के लोग फिर से अपने लाल को याद करके आगे बढ़े तो निश्चित रूप से देश अपनी समस्या से मुक्ति पा लेगा। भारत मां के इस सपूत को वनइंडिया परिवार भी कोटि कोटि प्रणाम करता है।

एक रचना जो बेहद मुझे अच्छी लगी वो भी आप के सामने प्रस्तुत करता हूँ यह रचना मैंने http://mkushwansh.blogspot.ae/2015/10/blog-post.html  महेश जी के ब्लॉग से ली है ।

गंगा में तैरेते हुये पार करना 
और  उसमे निहित  बाल सुलभ  चेस्ठा   ने  
तुम्हें  महान बना दिया  
तुम्हारे मन मंदिर मे  था साफ सफ़फाक  हृदय  
कलम दवात से पट्टी  पर  लिखे  
मास्टर जी के शब्द  
तुम्हारे मन मे कहीं  दूर तक लिख गए 
मानो  सफ़ेद अक्षर  से लिखे हों  
जिन्हें  
तुमने तो आत्मसात कर लिया  
ये देश नहीं   समझ  पाया  
और समझा भी तो 
जानबूझकर अंजान बना रहा  
तुम्हारी खिलौने सी  कद- काठी ने 
हिमालय छुआ  
तुम्हारे विशाल हृदय  मे  छिपे  मर्म को  देश ने समझा  
तुममे अपना भविस्य  ढूढ़ा  
तुम्हें सरताज  बना दिया  
तुमने माँ का कर्ज चुकाया  
और दुश्मन को छठी  का दूध याद दिला दिया 
जय जवान -जय किसान 
तुम्हारी साफ सफ़फाक छवि  का  
आईना बन गया  
मगर  तुम  चले गए   
विदेसी  माटी  पर  चुपचाप  
बे-आवाज़       
और हम रो भी नही पाये      
हमने  आज तक वो आंशू  सँजो कर रखे हैं  
भारत माँ के सच्चे  लाल
इस देश में  
तुम्हें फिर आना होगा   
देश की माटी  का  कर्ज जो बाकी  है  
हमपर  
हमें ही चुकाना होगा
ईस्वर से विनम्र  विनती है  
भारत   माँ को एक बार फिर वो  बहादुर  बेटा लौटा   दे  
ताकी माँ के सपूत  धो सकें अपने पाप   
चुका सकें आंशुओं के कर्ज
और सच्चे अर्थों मे बहा सकें 
सदियों से सूखे आंशू
और ये माँ 
पा सके कोई मुकाम 
और हम  
इस भारत के लाल पर  
बहा सकें रुके आंशू  
अपनी धरती पर 
तुम्हारे जन्म दिन के दिन   

-कुशवंश 

इस कविता को दिल से पढ़िये शब्द शब्द में गहराई है…

जब आंख खुली तो अम्‍मा की
गोदी का एक सहारा था
उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको
भूमण्‍डल से प्‍यारा था

उसके चेहरे की झलक देख
चेहरा फूलों सा खिलता था
उसके स्‍तन की एक बूंद से
मुझको जीवन मिलता था

हाथों से बालों को नोंचा
पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस मां ने पुचकारा
हमको जी भर के प्‍यार किया

मैं उसका राजा बेटा था
वो आंख का तारा कहती थी
मैं बनूं बुढापे में उसका
बस एक सहारा कहती थी

उंगली को पकड. चलाया था
पढने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज
अन्‍तर में सदा सहेजा था

मेरे सारे प्रश्‍नों का वो
फौरन जवाब बन जाती थी
मेरी राहों के कांटे चुन
वो खुद गुलाब बन जाती थी

मैं बडा हुआ तो कॉलेज से
इक रोग प्‍यार का ले आया
जिस दिल में मां की मूरत थी
वो रामकली को दे आया

शादी की पति से बाप बना
अपने रिश्‍तों में झूल गया
अब करवाचौथ मनाता हूं
मां की ममता को भूल गया

हम भूल गये उसकी ममता
मेरे जीवन की थाती थी
हम भूल गये अपना जीवन
वो अमृत वाली छाती थी

हम भूल गये वो खुद भूखी
रह करके हमें खिलाती थी
हमको सूखा बिस्‍तर देकर
खुद गीले में सो जाती थी

हम भूल गये उसने ही
होठों को भाषा सिखलायी थी
मेरी नीदों के लिए रात भर
उसने लोरी गायी थी

हम भूल गये हर गलती पर
उसने डांटा समझाया था
बच जाउं बुरी नजर से
काला टीका सदा लगाया था

हम बडे हुए तो ममता वाले
सारे बन्‍धन तोड. आए
बंगले में कुत्‍ते पाल लिए
मां को वृद्धाश्रम छोड आए

उसके सपनों का महल गिरा कर
कंकर-कंकर बीन लिए
खुदग़र्जी में उसके सुहाग के
आभूषण तक छीन लिए

हम मां को घर के बंटवारे की
अभिलाषा तक ले आए
उसको पावन मंदिर से
गाली की भाषा तक ले आए

मां की ममता को देख मौत भी
आगे से हट जाती है
गर मां अपमानित होती
धरती की छाती फट जाती है

घर को पूरा जीवन देकर
बेचारी मां क्‍या पाती है
रूखा सूखा खा लेती है
पानी पीकर सो जाती है

जो मां जैसी देवी घर के
मंदिर में नहीं रख सकते हैं
वो लाखों पुण्‍य भले कर लें
इंसान नहीं बन सकते हैं

मां जिसको भी जल दे दे
वो पौधा संदल बन जाता है
मां के चरणों को छूकर पानी
गंगाजल बन जाता है

मां के आंचल ने युगों-युगों से
भगवानों को पाला है
मां के चरणों में जन्‍नत है
गिरिजाघर और शिवाला है

हिमगिरि जैसी उंचाई है
सागर जैसी गहराई है
दुनियां में जितनी खुशबू है
मां के आंचल से आई है

मां कबिरा की साखी जैसी
मां तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली
खुसरो की अमर रूबाई है

मां आंगन की तुलसी जैसी
पावन बरगद की छाया है
मां वेद ऋचाओं की गरिमा
मां महाकाव्‍य की काया है

मां मानसरोवर ममता का
मां गोमुख की उंचाई है
मां परिवारों का संगम है
मां रिश्‍तों की गहराई है

मां हरी दूब है धरती की
मां केसर वाली क्‍यारी है
मां की उपमा केवल मां है
मां हर घर की फुलवारी है

सातों सुर नर्तन करते जब
कोई मां लोरी गाती है
मां जिस रोटी को छू लेती है
वो प्रसाद बन जाती है

मां हंसती है तो धरती का
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्‍काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर
धरती को शीश झुकाता है

माना मेरे घर की दीवारों में
चन्‍दा सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में
बस केवल मां की मूरत है

मां सरस्‍वती लक्ष्‍मी दुर्गा
अनुसूया मरियम सीता है
मां पावनता में रामचरित
मानस है भगवत गीता है

अम्‍मा तेरी हर बात मुझे
वरदान से बढकर लगती है
हे मां तेरी सूरत मुझको
भगवान से बढकर लगती है

सारे तीरथ के पुण्‍य जहां
मैं उन चरणों में लेटा हूं
जिनके कोई सन्‍तान नहीं
मैं उन मांओं का बेटा हूं

हर घर में मां की पूजा हो
ऐसा संकल्‍प उठाता हूं
मैं दुनियां की हर मां के
चरणों में ये शीश झुकाता हूं

(व्हाट्सएप्प से प्राप्त)

नज़र निल्को की – तेरी नज़दीक वाली दूरिया


तेरी नज़दीक वाली दूरिया
लगती है जैसे गोलिया
तेरी हर अदा कुछ ख़ास नहीं
पर सहती है हर एक बोलिया


उसका बनना और सवरना
जैसे हो पानी का ठहरना 
पर इतराती ऐसे वो
जैसे दौड़ में भी टहलना
पुकारते है कई नाम से उसे 
धूप मे भी बारिश हो जैसे 
पर सुनती नहीं वो एक बार भी 
चाहे करा लो अपनी जैसे तैसे  
झील सी आखे है उसकी 
पर पता नहीं है वो किसकी 
मिलने का बनाया था इरादा 
किन्तु नहीं दी पता वो घर की 

उसकी खामोसी जब जब बोली है 
असर करती जैसे दर्द -ए -दिल की गोली है 
सारे पर्व और त्योहार उसके चेहरे पर 
और खेलता ‘निल्को‘ रोज जैसे होली है 

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एम के पाण्डेय निल्को 

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई |

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई
 एवं शुभकामनायें
आजकल हम लोगों के लिए 15 अगस्त एक छुट्टी मात्र ही तो रह गया है। इस दिन हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और बाकी पूरे साले उस आज़ादी का दुरूपयोग करते हैं। कहीं सुना था कि 68 साल में क्या बदला। कुछ ख़ास नहीं पहले अँगरेज़ यहां से पैसा लूट कर विदेश ले जाते थे और आज हम खुद अपना धन लूट कर विदेशों में जमा करते हैं। हमारे देश का कड़वा सत्य यही है कि यहां देशप्रेम सिर्फ किताबों और फिल्मों में ही दिखता है। चाहे रिश्वत देना हो या लेना, सड़क पर चलना हो या थूकना, दो सेकंड में किसी की भी माता जी और बहन जी तक पहुँच जाना, दंगे कराना और उसके मज़े लेना, बलात्कारियों में धर्म ढून्ढ लेना ये है हमारा और आपका आज़ाद भारत। ऑस्ट्रेलिया में 90 टन की ट्रेन को 50-60 लोग मिलकर झुका देते हैं ताकि एक आदमी की जिंदगी बच जाए और यहां हज़रत निजामुद्दीन पर एक आदमी 40 टन की ट्रेन के नीचे डेढ़ घंटे फंसे रहने के बाद मर जाता है। अरे हमारा बस चले तो सड़क चलते आदमी के ऊपर ही गाडी चढ़ा दें। क्या ये वही सपनों का भारत है जो आज से 67 साल पहले देखा गया था? कब तक हम आर्यभट्ट के ‘0’ को रोते रहेंगे। कब तक अपनी संस्कृति की दुहाई देते रहेंगे। आज का भारत क्या सच में आज़ाद भारत है? इतने प्रयासों, मुश्किलों और बलिदानों के बाद मिली इस आज़ादी की क़द्र होनी चाहिए मुझे। मुझे सच में गर्व होना चाहिए हिन्दुस्तानी होने पर और हिन्दुस्तानियोंके बीच रहने पर। मेरी और आपकी, हम सबकी कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ हैं इस देश के प्रति। एक बार जरा सोचियेगा जरूर क्योंकि सिर्फ नेता नहीं चलाते देश हम सब भी उसके सहभागी हैं!
जय हिन्द! जय भारत!
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स्वतंत्रता दिवस – आज हथकड़ी टूट गई है, नीच गुलामी छूट गई है –

आजादी के नए संघर्ष का वक्त हमने आजादी जनता के लिए प्राप्त की थी और नारा दिया था कि हम ऐसी व्यवस्था अपनाएंगे जो जनता की जनता द्वारा और जनता के लिए होगी, लेकिन आजादी के 68 साल बीतने के बाद अनुभव यह हो रहा हे कि हमारी सत्ता अंग्रेजी सत्ता के समान ही कुछ निहित स्वार्थी लोगों के हित चिंतन में सिमटकर रह गई है। क्या आजादी का संघर्ष इसीलिए किया गया था? युवाओं ने इसीलिए बलिदान दिया था कि अंग्रेजों के स्थान पर कुछ ‘स्वदेशी’ लोग सत्ता का उपयोग करें। सत्ता का हस्तानांतरण हुआ है, लेकिन उसके आचरण में बदलाव नहीं आया है। जब भी 15 अगस्त नजदीक आता है मुझे ये पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं-आज हथकड़ी टूट गई है, नीच गुलामी छूट गई है, उठो देश कल्याण करो अब, नवयुग का निर्माण करो सब।
क्या सचमुच हथकड़ी टूट गई है और गुलामी से छुटकारा मिल गया है? हमारी शक्ति किसके कल्याण में लग रही है और कौन से नवयुग का हम निर्माण कर रहे हैं। यदि कुछ चमचमाती सड़कें, सड़कों पर पहले की अपेक्षा सौ गुना अधिक दौड़ रहे वाहन, शहरों का निरंतर विस्तार, तकनीकी उपकरणों की भरमार और कर्ज के सहारे निर्वाह को नवयुग का कल्याण माना जाए तो हम सचमुच 15 अगस्त 1947 के बाद बहुत आगे बढ़ गए हैं, लेकिन जिन जीवन मूल्यों के लिए हमने आजादी की जंग लड़ी, क्या उस दिशा में कोई प्रगति हुई है? देश में बढ़ते एकाधिकारवादी आचरण ने सत्ता को इतना भ्रष्ट और निरंकुश कर दिया है कि उसकी चपेट में आकर सारा अवाम कराह रहा है। महात्मा गांधी का मानना था कि गांवों का विकास ही उत्थान का प्रतीक होगा। गांवों में जीवन मूल्य के बारे में अभी भी संवेदनशीलता है। हमने पंचायती राज व्यवस्था को तो अपनाया है, लेकिन गांवों को उजड़ते जाने से नहीं रोक पा रहे हैं। कृषि प्रधान देश में खेती करना सबसे हीन समझा जाने लगा है। शिक्षा के लिए अनेक आधुनिक ज्ञान वाले संस्थान जरूर स्थापित हो गए हैं, लेकिन वहां से ‘शिक्षित’ होकर निकलने वालों की पहचान किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचा वेतन पाने के आधार पर हो रही है। स्वदेशी, स्वाभिमान और स्वावलंबन की भावना तिरोहित होती जा रही है। कर्ज जिसे आजकल ‘एड’ का नाम दे दिया गया है, एकमेव साधन बनकर रह गया है, जिसने हमें फिर गुलामी की तरफ धकेल दिया है। राजनीतिक आजादी तो मिली, लेकिन आत्मनिर्भरता के लिए प्रयास न होने के कारण हम आर्थिक रूप से गुलाम होते जा रहे हैं, जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में हुआ था। तब भी शासक तो स्वदेशी ही थे, लेकिन उनको चलना ईस्ट इंडिया कंपनी के अनुसार पड़ता था। आज हम भी अपने आर्थिक क्षेत्र को विश्व बैंक या विश्व मुद्रा कोष के पास गिरवी रख चुके हैं। जिन वस्तुओं की हमें जरूरत भी नहीं है उनको आयात करने की विवशता से हम बंधते जा रहे हैं। हमारी सीमाएं असुरक्षित हैं। 
हम यह जानते हैं कि किसके द्वारा और किस-किस प्रकार से असुरक्षा पैदा की जा रही है, लेकिन हम कार्रवाई नहीं कर सकते, क्योंकि उसके लिए किसी की रजामंदी जरूरी है। हमारा ध्यान केवल सत्ताधारी बने रहने तक सीमित हो गया है। उसे पाने के लिए समाज में संविधान के उपबंधों के अनुसार समान नागरिकता की भावना पैदा करने के बजाय हम वैसा ही उपाय करते जा रहे हैं जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था। उससे भी उसमें बढ़कर हम जातियों, उपजातियों आदि की पहचान उभारने में लगे हुए हैं। लालबहादुर शास्त्री ने संकट से उबरने के लिए सोमवार को अन्न न खाने की जो अपील की उससे कोई बहुत बड़ी बचत नहीं होने वाली थी, लेकिन लोगों ने उनकी बात मानी थी। आज क्या यह संभव है?

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें

 एम के पाण्डेय निल्को

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महत्वपूर्ण सूचना – कृपया ध्यान दे ….!

दोस्तो/पाठको आप का स्नेह मिलता रहे हमे और हम कुछ नया करते रहे ऐसी अभिलाषा और अपेक्षा रखते है, बताना चाहेगे की आज से हम ‘योगेश के युग’, ‘निशु के निशान’, ‘गजेंद्र का गोला’, ‘अभिषेक की अभिव्यक्ति’, ‘अनुज की अगड़ाई’, ‘नज़र और निशाना निल्को का’, ‘Whats App हँगामा’, और ‘मोहक की मार’, शीर्षक से कुछ अपनी अभिव्यक्ति, नज़रिया, सोच आप के सामने प्रस्तुत करेगे। उम्मीद है की यह VMW Team का नया, मज़ेदार, और अनोखा प्रयोग आप को रास आएगा । दोस्तों हमारा यह नया प्रयोग कैसा लगा पढ़कर बताईये, कृपया अपने भावपूर्ण कमेंट मेरे blog पर comment box में लिखिए और हमारा हौसला बढाए. कृपया अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा. आपकी राय हमे हमेशा कुछ नया लिखने की प्रेरणा देती है और आपकी राय निश्चिंत ही हमारे लिए अमूल्य निधि है । मित्रों हम VMW Team ब्लॉग में लगातार कुछ ऐसा व्यापक बदलाव लाने की कोशिश में हैं जिससे कि यह आपकी अपेक्षाओं पर और भी खरा उतर सके। हम चाहते हैं कि इसमें आपकी भी सक्रिय भागीदारी हो। आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। हमेशा की तरह आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।

सादर, सप्रेम
एम के पाण्डेय ‘निल्को’ 

एडमिन 
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