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Mobile Addiction – Track & Control

तकनीक के इस दौर में हम दुनिया के साथ मिलकर चलना चाहते हैं, लेकिन क्या हम इसको आदत भी बनाना चाहते हैं? घर से लेकर ऑफिस तक हमारे हाथ में स्मार्टफोन खेल रहा होता है या ये कहें कि हम उसके हाथ खेले जा रहे होते ऐसे में यह समझना बहुत जरूरी है कि कहीं आप स्मार्टफोन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर अपना समय तो बर्बाद नहीं कर रहे हैं? एक रिपोर्ट कहती है कि 80 प्रतिशत स्मार्टफोन यूजर्स सुबह जागने के 15 से 20 मिनट के भीतर अपने फोन को चेक करते हैं तथा एक दिन मे औसतन 3-4 घंटे मोबाइल का इस्तेमाल करते है वहीं दिन भर मे लगभग 150 बार अपने मोबाइल को अनलॉक करते है। वैसे तो फोन पर टेक्स्टिंग, इंटरनेट सर्फिंग, ईमेल भेजने, एप्लिकेशन को यूज करने और गेम्स खेलने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसमें जरूरत से ज्यादा उपयोग आपकी सेहत के लिए भी ठीक नहीं है। 

सबसे पहले आप अपने स्मार्ट फोन में YourHour – Phone Addiction Tracker & Controller एप्लिकेशन डाउनलोड करें (लिंक- shorturl.at/bvwH8) आप इस एप्लिकेशन से देखेगे की आप कितना मोबाइल उपयोग करते है , कौन सा एप्प कितनी देर इस्तेमाल करते है फिर आप उस को कम कर सकते है । फिर भी आप इस लत को कम नहीं कर पा रहें है तो ये तरीके अपनाए – 
1. जिस जेब व पर्स के पॉकेट में आप फोन रखते हैं या रखती हैं, उसकी जगह कुछ दिन बदल दें, इससे वह तुरंत आपके हाथों में आने से बचेगा और हो सकता है कि इस बीच आप किसी और काम में व्यस्त हो जाएं। 
2. स्मार्टफोन की सेटिंग्स में जाकर नोटिफिकेशन बंद कर दें। इससे बार-बार आपका ध्यान फोन की नोटिफिकेशन बीप बजने पर नहीं जाएगा। यदि किसी को आपसे कोई जरूरी काम होगा तो वह आपको सीधे कॉल कर लेगा। 
3. दिन के कुछ घंटे आप अपना डाटा ऑफ़ रखें यानी कि इंटरनेट बंद रखें। इससे आपका मन बार-बार फोन देखने के लिए नहीं ललचाएगा और बैटरी की भी बचत होगी।

4. अपने फोन को चेक करने का समय निश्चित करें, उसी दौरान आप सभी अपडेट्स देख लें, बार-बार देखने से भी आपके काम की ज्यादा अपडेट्स आ जाएगी, ऐसा तो होने से रहा 
5. पक्का मन बना लें कि सुबह उठते ही कुछ घंटे फोन से दूर रहेंगे और रात को सोने के कुछ घंटे पहले ही फोन को दूर रख देंगे। 
6. जब आप फोन से थोड़ी दूरी बनाकर चलेंगे तो स्वत: ही आपका मन दूसरे पसंदीदा कामों में लगने लगेगा, साथ ही आप कई अन्य तरह की परेशानियों से भी बच जाएंगे।

एम के पाण्डेय निल्को

मेकडोनाल्ड : 16 दिन पुराने तेल में पका रहे आलू-टिक्की, फ्रेंच फ्राइज

मेकडोनाल्ड : मुनाफे के िलए भरोसा तोड़ा

 
16 दिन पुराने तेल में पका रहे थे आलू-टिक्की, फ्रेंच फ्राइज 
काला और गाढ़ा तेल मिला, 2 सैंपल लिए, 120 लीटर तेल फिंकवाया 
जयपुर| पांचबत्ती स्थित मेकडोनाल्ड में पिछले 16 दिन से आलू टिक्की, फ्रेंच फ्राइज और अन्य पदार्थों को तलने वाले तेल को नहीं बदला गया था। यहां ऐसे तेल को काम में लिया जा रहा था जिसकी क्वालिटी सबसे गुणवत्ताहीन होती है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की टीम ने शुक्रवार को मेकडोनाल्ड पर कार्रवाई के दौरान ऐसी ही स्थिति पाई। टीम ने यहां खराब हो चुका 120 लीटर तेल फिंकवाया और तेल के दो नमूने लिए। साथ ही टीम ने डोमिनोज से भी दो सॉस के सैंपल लिए हैं। 

मामले के अनुसार सीएमएचओ डॉ. नरोत्तम शर्मा के निर्देश पर फूड इंस्पेक्टर की टीम शुक्रवार शाम मेकडोनाल्ड पर पहुंची। यहां जिन स्थान पर फ्रेंच फ्राइज और टिक्की पकाए जा रहे थे, वहां ऑयल मैनेजमेंट शीट की जांच की। इस शीट में तेल बदलने की तिथि डाली जाती है। जांच में सामने आया कि एक जून को तेल डाला गया और उसके बाद कभी चेंज ही नहीं किया गया। 

काम में ले रहे पामोलीन ऑयल 

सुबह11 बजे से रात 11 बजे तक 360 डिग्री पर तेल को उबाल कर खाद्य पदार्थ पकाए जाते थे। टीम ने यहां ऐसा तेल पकड़ा जो कि पूरी तरह काला और गाढ़ा हो चुका था। डामर जैसा। निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि खाने के लिए पामोलीन तेल काम में लिया जा रहा है। ऐसे में तुरंत खराब 120 लीटर तेल नष्ट कराया। साथ ही तेल के दो सैंपल भी लिए। 

बार-बारपका तेल हानिकारक 

एसएमएसअस्पताल के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. पुनीत सक्सैना ने बताया कि तेल को बार-बार पकाने से तेल के प्रोटीन और न्यूट्रीशियंस समाप्त हो जाते हैं। चिकनाई खत्म हो जाती है। तेल सेचुराइट फैटी एसिड में तब्दील हो जाता है। इससे शरीर में सीधे वसा और कोलेस्ट्रोल जाता है। 

संगीत प्रतियोगिता ‘सुरतरंग’ का होगा आयोजन

जयपुर, संगम कला ग्रुप 31 मई को राज्यस्त्रीय संगीत प्रतियोगिता ‘सुरतरंग’ का आयोजन करेगी। इसे लेकर एक बैठक जयपुर स्थित कार्यालय में हुई। बैठक की अध्यक्षता जय सूद ने की। राज्यस्त्रीय संगीत प्रतियोगिता ‘सुरतरंग’ के लिए 31 मई को आडिशन लिया जाएगा। izfr;ksfxrk ds Js”B xk;d@xkf;dk dks fo[;kr laxhrdkj Lo0 Jh /keZohj usgjk Le`fr VªkWQh ls lEekfur fd;k tk,xkA  इस बारे में एम के पाण्डेय निल्को ने बताया की इस प्रतियोगिता में सीनियर और जूनियर वर्ग के कलाकार भाग लेंगे। इस दौरान कहा गया की गायन प्रतियोगिता के विजेताओ को दिल्ली में होने वाली आल इंडिया फाइनल में भाग लेने का मौका मिलेगा तथ विजेता कलाकारों को संस्थान आगे बढ़ाने का प्रयास करेगी । laxe dyk xqi }kjk lksuw fuxe] Js;k ?kks”kky] lqfuf/k pkSgku] tlfiUnj u:yk] fiukt+ elkuh] vkuUn jkt vkuUn]  feuk{kh ‘ks”kknzh] f’kckuh d’;i] Lusgk] eks- lyker] rks”kh] ‘kkfjc] vkd`fr dDdM+] johUnz mik/;k;] _pk eq[kthZ] jathr iaokj] uezrk ‘kekZ]  lkftn [kku] ikouh ik.Ms] yksfj;k] :nzk{k जैसे कई लोगो को मंच प्रदान किया है ।

फ़ॉर्म डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे  http://bit.ly/1Ol3OD0 


Venue : The Roots, 60 Shiv Colony,

LAXMI NAGAR, HATWARA ROAD, JAIPUR – 06 


for more details contact 
Mr. Jai Sood +91-9799113100 
& 
Mr. M K Pandey +91-8890553555

मदर्स डे पर विशेष

आज मै तुम्हे याद करूँगा क्योंकि आज मदर डे है, आज मै तुमको तोहफे में कुछ दूंगा क्योकि आज मदर डे है, आज मै तुमसे समय निकाल कर मिलूँगा क्योंकि आज मदर डे है, साल में एक बार ही सही मै तुम्हारे बारे में सोचूंगा क्योंकि आज मदर डे है.
कई समाचार पत्र और न्यूज चैनल कहते है कि आपको मम्मी से कितना प्यार है? कितनी खास हैं माँ आप के लिए? मदर्स दे पर तोहफा देकर आप साबित कर सकते हैं कि माँ से बड़ा कोई नहीं,( कमाल है! अब बाजारू तोहफे माँ को माँ साबित करेंगे) शायद माँ को उन नेताओं कि सड़क पर लगी मूर्ति समझ लिया गया है जिनपर साल भर कबूतर व कौए गन्दा करते हैं और साल मे एक दिन कोई नेता उन्हें साफ करवाकर नयी माला पहनाता है और उन्हें याद करके अपना फर्ज निभाता है और फिर उसे उसके जीवन पर्यंत चलने वाले हाल पर छोड़ देता है.
क्या इतना उतावलापन किसी भारतीय के लिए माँ के प्रति साल में एक ही दिन रहता है, क्या हम माँ को साल में एक दिन याद रखने वाली मूर्ति समझते हैं कि उसे साफ किया और कुछ नये मालाओं से सजाकर फिर किसी ओट पर रख दिया कि अगले साल फिर उसे मदर डे पर उठाऊंगा और वही काम पूरा करके माँ के कर्ज को अदा कर दूंगा.
हमारी नई दुनिया में जीने वाले आधुनिक भारतीयों ये हमारी परंपरा नही है, क्योकि माँ हमारे सर्वश्व मे निवास करती है वह हमारे जीवन के हर क्षण मे हमारे साथ रहती है, पूरा जीवन हम उसकी सेवा करके भी उसके कर्ज को नही उतार पाते तो साल मे एक दिन याद करके हम क्या कर लेंगे ।
अरे जो लोग अपनी माँ को अपने साथ नहीं रखते या भूल जाते हैं वे लोग मदर डे मनावें. हम तो भारतीय हैं हमारी तो दिन की शुरुआत ही माँ के चरणों से होती है इसीलिए हमारा हर दिन मदर डे होता है.
हमें पश्चिम से ये सीखने की नहीं बल्कि उनको ये सिखाने की जरुरत है कि हम अपने रिश्तों कि मार्केटिंग नहीं करते और न ही उनको साल मे केवल एक दिन मनाते हैं बल्कि हमारे हर रिश्ते हमारे जीवन कि अनमोल कडिया होते हैं जिनकी माला हम हर पल अपने ह्रदय से लगाये रहते हैं।
(डॉ रत्नेश त्रिपाठी जी के फेसबुक वाल से )

महात्मा गांधी और भारतरत्न पं. लालबहादुर शास्त्री को नमन।

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नज़र निल्को की – तेरी नज़दीक वाली दूरिया


तेरी नज़दीक वाली दूरिया
लगती है जैसे गोलिया
तेरी हर अदा कुछ ख़ास नहीं
पर सहती है हर एक बोलिया


उसका बनना और सवरना
जैसे हो पानी का ठहरना 
पर इतराती ऐसे वो
जैसे दौड़ में भी टहलना
पुकारते है कई नाम से उसे 
धूप मे भी बारिश हो जैसे 
पर सुनती नहीं वो एक बार भी 
चाहे करा लो अपनी जैसे तैसे  
झील सी आखे है उसकी 
पर पता नहीं है वो किसकी 
मिलने का बनाया था इरादा 
किन्तु नहीं दी पता वो घर की 

उसकी खामोसी जब जब बोली है 
असर करती जैसे दर्द -ए -दिल की गोली है 
सारे पर्व और त्योहार उसके चेहरे पर 
और खेलता ‘निल्को‘ रोज जैसे होली है 

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एम के पाण्डेय निल्को 

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई |

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई
 एवं शुभकामनायें
आजकल हम लोगों के लिए 15 अगस्त एक छुट्टी मात्र ही तो रह गया है। इस दिन हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और बाकी पूरे साले उस आज़ादी का दुरूपयोग करते हैं। कहीं सुना था कि 68 साल में क्या बदला। कुछ ख़ास नहीं पहले अँगरेज़ यहां से पैसा लूट कर विदेश ले जाते थे और आज हम खुद अपना धन लूट कर विदेशों में जमा करते हैं। हमारे देश का कड़वा सत्य यही है कि यहां देशप्रेम सिर्फ किताबों और फिल्मों में ही दिखता है। चाहे रिश्वत देना हो या लेना, सड़क पर चलना हो या थूकना, दो सेकंड में किसी की भी माता जी और बहन जी तक पहुँच जाना, दंगे कराना और उसके मज़े लेना, बलात्कारियों में धर्म ढून्ढ लेना ये है हमारा और आपका आज़ाद भारत। ऑस्ट्रेलिया में 90 टन की ट्रेन को 50-60 लोग मिलकर झुका देते हैं ताकि एक आदमी की जिंदगी बच जाए और यहां हज़रत निजामुद्दीन पर एक आदमी 40 टन की ट्रेन के नीचे डेढ़ घंटे फंसे रहने के बाद मर जाता है। अरे हमारा बस चले तो सड़क चलते आदमी के ऊपर ही गाडी चढ़ा दें। क्या ये वही सपनों का भारत है जो आज से 67 साल पहले देखा गया था? कब तक हम आर्यभट्ट के ‘0’ को रोते रहेंगे। कब तक अपनी संस्कृति की दुहाई देते रहेंगे। आज का भारत क्या सच में आज़ाद भारत है? इतने प्रयासों, मुश्किलों और बलिदानों के बाद मिली इस आज़ादी की क़द्र होनी चाहिए मुझे। मुझे सच में गर्व होना चाहिए हिन्दुस्तानी होने पर और हिन्दुस्तानियोंके बीच रहने पर। मेरी और आपकी, हम सबकी कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ हैं इस देश के प्रति। एक बार जरा सोचियेगा जरूर क्योंकि सिर्फ नेता नहीं चलाते देश हम सब भी उसके सहभागी हैं!
जय हिन्द! जय भारत!
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Whats App से प्राप्त – आरक्षण विरोध

हे युवाओं ! उठो और बहिष्कार कर दो ,

आरक्षण के उत्थान को तुम खाक़ कर दो ,


आरक्षण तो स्वार्थ है नेताओं का ,

जो कर देते हैं खंडन हम युवाओं का,

बना लेते हैं सरकार हमारे वोट से ,

और घोट देते हैं गला विश्वासों का,


नेताओं की इस तृष्णा को ख़त्म कर दो,

वोट राजनीति को संसद में बंद कर दो ,

हमारा और दोहन हो ना पाएगा

तुम ये नारा और भी बुलंद कर दो ,


वक्त है यंही हमारी एकजुटता का,

अपने विरोध स्वर के सदिश प्रसारता का,

राज रक्षक वहीं जो बन बैठे हैं भक्षक ,

समय हैं यंही उनके सर्वानाषता का ,


वोट नीति की गली आज अन्धकार कर दो ,

जोश और अटलता का आज तुम हुंकार भर दो ,

हे युवाओं ! उठो और बहिष्कार कर दो,

आरक्षण के उत्थान को तुम खाक़ कर दो 
(एक अजनबी के मैसेज से प्राप्त )
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नेट न्यूट्रेलिटी बिना शर्त अमल हो |

नेट न्यूट्रेलिटी के बारे में दूरसंचार विभाग की बहु-प्रतीक्षित रिपोर्ट पर मोबाइल इंटरनेट उपभोक्ताओं के नजरिए से गौर करें तो उसमें अच्छे और बुरे दोनों संकेत हैं। अच्छी बात तो यह है कि इसमें नेट न्यूट्रेलिटी का समर्थन किया गया है। लेकिन साथ ही ओवर टॉप (ओटीटी) कहे जाने वाले वाॅट्सएप, वाइबर, वीचैट, स्काइप जैसी सेवाओं पर मुफ्त ऑडियो/वीडियो कॉल की दी जा रही सेवाओं को विनियमित करने की जरूरत भी बताई गई है। रिपोर्ट तैयार करने वाली समिति की राय है कि ओटीटी सेवाओं की वजह से मोबाइल सेवा देने वाली एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया जैसी कंपनियों को नुकसान हो रहा है। ये कंपनियां सरकार से मिले लाइसेंस की शर्तों के मुताबिक फोन सेवा देती हैं, जबकि ओटीटी सेवाएं किसी ऐसी शर्त का पालन नहीं करतीं। बेशक कमेटी की यह राय अपनी जगह सही है। लेकिन मुद्दा है कि तकनीक की उन्नति के साथ विकसित होने वाली सुविधाओं को नियंत्रित या सीमित करने का प्रयास आखिर कितना वाजिब होगा? अगर इंटरनेट से जुड़ी किसी सेवा के साथ ऐसा किया जाता है, तो क्या उसके बाद भी यह मानने का आधार बचेगा कि नेट न्यूट्रेलिटी का समग्र रूप से पालन किया जा रहा है? नेट न्यूट्रेलिटी संबंधी बहस दो प्रवृत्तियों की वजह से उठी। ऐसा देखा गया कि इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां (आईएसपी) कुछ वेबसाइटों/एप्स के लिए अनुकूल स्थितियां पैदा कर रही हैं, जबकि दूसरों तक पहुंच वे रोक देती हैं अथवा उनकी रफ्तार को सुस्त कर देती हैं। माना गया कि वे ऐसा करके इंटरनेट सेवा-प्रदाता के रूप में अपेक्षित तटस्थता को भंग कर रही हैं। अमेरिका का संघीय दूरसंचार आयोग इसके विरुद्ध निर्णय दे चुका है। अपने देश में ये बहस कुछ महीने पहले भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) द्वारा इस विषय पर लोगों की राय मांगने के साथ खड़ी हुई। तब लाखों लोगों ने ट्राई को भेजे पत्र में नेट न्यूट्रेलिटी का पक्ष लिया। एनडीए सरकार ने भी इस सिद्धांत का समर्थन किया है, लेकिन अंतिम रुख घोषित करने से पहले वह ट्राई द्वारा बनाई गई समिति की रिपोर्ट का इंतजार कर रही थी। अब जबकि यह रिपोर्ट गई है, सरकार से अपेक्षा रहेगी कि यथाशीघ्र वह अपनी राय बताए। बेशक उससे ऐसी नीति की आशा है, जिसमें उपभोक्ताओं के हितों का संपूर्ण संरक्षण हो। निर्विवाद रूप से नेट न्यूट्रेलिटी के सिद्धांत को बिना शर्त और अविभाज्य रूप से लागू करके ही ऐसा किया जा सकता है। 

2015 Scripps Spelling Bee Crowns Two Winners…Again

स्पेलिंग बी प्रतियोगिता – लगातार आठवीं बार भारतीय-अमेरिकी बच्चों ने जीती 

भारतीय मूल के अमेरिकी बच्चों ने वार्षिस्क्रिप्स नेशनल स्पेलिंग बीप्रतियोगिता में अपना वर्चस्व बरकरार रखते हुए लगातार आठवें साल यह प्रतिष्ठित प्रतियोगिता जीत ली। इस कॉम्पिटीशन में वन्या शिवशंकर और गोकुल वेंकटाचलम संयुक्त रूप से विजेता चुने गए हैं। यह लगातार दूसरी बार है, जब भारतीयअमेरिकियों ने ऐसी साझा जीत हासिल की है। पिछले आठ साल से लगातार भारतीय मूल के बच्चे ये प्रतियोगिता जीतते आ रहे हैं। 2014 में भी इस प्रतियोगिता को दो भारतीय बच्चों श्रीराम हठवार और अन्सुन सुजॉय ने संयुक्त रूप से जीता था
14 वर्षीय गोकुल वेंकटचलम मिसूरी के सेंट लुई और 13 वर्षीय वन्या शिवशंकर कंसास की रहने वाली हैं। गोकुल और वन्या दोनों स्पेलिंग बी में पहले भी शामिल हो चुके हैं। वन्या 2010 और 2012 में इस प्रतियोगिता में 10वां स्थान हासिल किया था। उनकी बहन काव्या 2009 की विजेता थी। वन्या ने यह पुरस्कार अपनी दिवंगत दादी को समर्पित करते हुए कहा, ऐसा लगता है मानो एक सपना सच हो गया हो। वन्या को अभिनय के अलावा टुबा और पियानो बजाने का शौक है और उसने हाल ही में मिड अमेरिका म्यूजिक एसोसिएशन की ओर से दिया जाने वाला उत्कृष्ट पियानोवादक एवं जैज़ पियानोवादक का पुरस्कार जीता है। वहीं, गोकुल 2012 में 10वें और 2013 में 19 स्थान पर थे। गोकुल ने कहा कि वह इस प्रतियोगिता के लिए पिछले कई वर्ष से कड़ी मेहनत कर रहा है। उसका और स्पेलिंग का रिश्ता ठीक वैसा ही है, जैसा उसके आदर्श लीब्रोन जेम्स का बास्केटबॉल से है। बास्केटबॉल खेलने के अलावा गोकुल को संगीत पसंद है। जब वह संगीत नहीं सुन रहा होता तब उसे किताबें पढ़ना और अपनी पसंदीदा फिल्म एक्स मेन : डेज़ ऑफ फ्यूचर पास्टदेखना पसंद है। स्कूल में उसे गणित और अर्थशास्त्र विशेष तौर पर पसंद हैं। इस साल के विजेताओं को पुरस्कार के रूप में 35 हजार डॉलर यानी करीब 22 लाख रुपए की नकद राशि दी गई। अंतिम चरण के 49 प्रतिभागियों में से 25 भारतीय मूल के अमेरिकी थे। अंतिम 10 प्रतिभागियों में सात भारतीयअमेरिकी थे।


पिछले कुछ वर्षों से भारतीय मूल के अमेरिकियों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों के समक्ष इस प्रतियोगिता में कड़ी चुनौती पेश की है और अमेरिका में अयोजित होने वाली अधिकतर स्पेलिंग प्रतियोगिताओं में जीत हासिल की है।

One year of Narendra Modi Government

 आज से करीब एक साल पहले देश में हुए आम चुनावों में यहां की आवाम ने ऐसा फैसला सुनाया जो वाकई चौंकाने वाला था। भारतीय जनता ने एकजुट होकर सत्ता की बागडोर किसी एक पार्टी को या कहें कि एक इंसान को ही सौंप दी। वो शख्स कोई और नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे।

लोकसभा चुनावों में मोदी ने जिस तरह से अच्छे दिनके सपने जनता के सामने संजोए उससे जनता को उन पर अटूट विश्वास सा जग गया। इसीलिए तो देश में 1984 के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब किसी एक पार्टी ने केंद्र में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। इन चुनावों में मोदी फैक्टर ने जमकर अपना असर दिखाया।
यूपीए सरकार के दौरान हुई गलतियों, घोटालों और सरकार के उठाए गए कदमों को मोदी ने जमकर भुनाया। मोदी ने तत्कालीन मनमोहन सरकार को घोटालों की सरकारकह के संबोधित किया। इतना ही नहीं उन्होंने चुनावों में कांग्रेस मुक्त भारतका नारा दे दिया।
चाहे आम चुनावों के दौरान की बात हो या फिर सत्ता संभालने के बाद की स्थिति हो। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बातों से लोगों के दिलों पर राज जरूर किया। उन्होंने लगभग सभी मुद्दों पर अपने बयानों से जनता के बीच जगह बनाई। जनता ने उनमें अपने नायक की छवि देखी।
शायद यही वजह थी कि लोकसभा चुनावों में उन्हें पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का मौका दिया। लेकिन जिस अंदाज में पीएम मोदी ने जनता के बीच अपनी बातें रखी सत्ता में आने के बाद ये सरकार उससे उलट काम करती दिखाई दी। शायद यही वजह थी कि धीरेधीरे ही सही लेकिन महज एक साल लोगों की धारणा बदलने लगी। आज परिस्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं।
एक साल के भीतर आखिर ऐसा क्या हो गया कि जिस शख्स को देश की जनता ने भारीभरकम बहुमत से सत्ता दी। उससे भरोसा उठने सा लगा है। इसके पीछे वजह और कोई नहीं खुद प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की कार्यशैली है।
जिन मुद्दों की वजह से पीएम मोदी सत्ता में आए अब वो उन्हीं मुद्दों से पीछे हटने लगे। एक के बाद एक यूटर्न से जनता में उनकी छवि को गहरा धक्का लगा। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कटाक्ष से सामने आता है। जिसमें उन्होंने इस सरकार को सूटबूट की सरकार कह कर संबोधित करना शुरू किया है।
राहुल गांधी ने ना केवल मोदी सरकार को इस जुमले से घेरने की कोशिश की है। बल्कि उस सच्चाई को भी बताया है जिसे जनता भी समझने लगी है।
ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को ये समझने की जरूरत है कि जिस जनता ने उन्हें चुना है अगर जल्दी ही इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो हालात बिगड़ भी सकते हैं। जनता का मोहभंग होने में समय नहीं लगता। इसलिए जरूरी यही है कि अब प्रधानमंत्री मोदी बातों और वादों की जगह कुछ ऐसा करें कि जनता को उन पर फिर से विश्वास कायम हो जाए।

प्रधानमंत्री मोदी ने जब देश की सत्ता संभाली तो उन्होंने किसानों के लेकर कई ऐलान किए। लेकिन उन दावों की पोल एक साल में ही खुल गई। इस दौरान में देश के अलगअलग हिस्सों में किसानों ने आत्महत्याएं की। एक अनुमान के मुताबिक देश में हर आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या करता है। साल 2014 में भी आत्महत्या की दर में तेजी आई है।

इन सबके बीच केंद्रीय खुफिया विभाग ने हाल ही किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। जिसमें कहा गया था कि किसानों की आत्महत्या की वजह प्राकृतिक भी है और कृत्रिम भी। इसमें बारिश, ओलावृष्टि, सिंचाई की दिक्कतें, सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक वजहें शामिल हैं। हालांकि इस रिपोर्ट में कहीं भी इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि आखिर किसानों की समस्या पर अंकुश कैसे और कब लगेगा? इन सबके बीच अब ये मोदी सरकार को सोचना है कि आखिर कैसे वो देश के अन्नदाताको बचाते हैं? आखिर वादों की जो फेहरिस्त चुनाव में नजर आई थी उसकी बानगी देखना बाकी है।




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गीत ग़ज़ल हो या हो कविता – एम के पाण्डेय निल्को


गीत ग़ज़ल हो या हो कविता 
नज़र है उस पर चोरो की 
सेंध लगाये बैठे तैयार 
कॉपी पेस्ट को मन बेक़रार 
लिखे कोई और, पढ़े कोई और 
नाम किसी और का चलता है 
कुछ इस तरह इन चोरो का 
ताना बना भी चलता रहता है 
सोच सोच कर लिखे गजल जो
प्रसंशा वो नहीं पाता है 
पर चुराए हुए रचना पर 
वाह वाही खूब कमाता है 
मन हो जाता उदास निल्को 
किसी और का गुल खिलाये जाते है 
वो खुश होता किन्तु 
मन से पछताए जाये है 
***************
एम के पाण्डेय निल्को 

तेरी याद मुझे क्यों सताती है

तेरी याद मुझे क्यों सताती है
तन्हाई में क्यों रुलाती है
जब जब मिलते है हम
पता नहीं क्या आखो से वो पिलाती है
उसका नशा जैसे बोतल शराब की
लगती है वो हरदम बवाल सी
चाल है  उसकी जैसे मतवाली
कहती है बना लो घरवाली
जब बाज़ार में निकले वो शाम
लगती है भीड़ जैसे हो आम
दुपट्टे का कोना मुंह में दबाये
जैसे हो वो बनारसी पान
तेरा बनना और सवरना
जैसे समुन्द्र में हो तैरना
तेरी आखो में देखकर मुझे
मिलता सकूँ जैसे देख झरना
जब अपने मीठे होठो से
कहती है मेरे हो तुम ‘अनुज’
बस यह सुन कर मैं
भूल जाता की मैं हूँ मनु
झील सी नयन में उसके
तैरने का मन करता है
पर कही डूब न जाऊ
दिल इस बात से डरता है
लाख प्रसंशा उसकी लिखू पर
पानी फेर देती है वो
जब शाम को मिलने को
कहती है की बिजी है वो
मेरे बारे में चाहे वो कुछ सोचे
या तुम से कुछ भी न बोले
हर बार मैं यही समझाऊ की
तेरे आगे कोई न डोले
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अनुज शुक्ला

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नाम, गौ हत्या पर पाबंदी और गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के सन्दर्भ में VMW Team का सार्वजनिक पत्र

दिनाक : 18 जनवरी 2015
प्रतिष्ठा में
            माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी,
            प्रधानमंत्री भारत सरकार
            साउथ ब्लॉक रेसकोर्स रोड
            नई दिल्ली- 110001
विषय : गौ हत्या पर पाबंदी  और गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के सन्दर्भ में
माननीय प्रधानमंत्री महोदय
            मैं यहां परेशान हूं तथा आपकी कुशलता की खबरें पढ़ता-सुनता-देखता रहता हूं। आप मुझे नहीं पहचानते लेकिन मैं आपको जानता हूं अच्छी तरह से जानता हूं क्योंकि आपको तो बच्चा-बच्चा जानता है। आपको फुर्सत ही कहां? हम जैसे आम-जामुन लोगों को जानने की, अब आप अकबर तो हैं नहीं कि भेष बदलकर जनता के बारे में जान सकें। खैर छोड़िए इन बातों से क्या लाभ। अगर मैं अपना परिचय थोड़े शब्दों में दूं तो मैं वही वोटर हूं जिसे कुछ समय पहले तक आप भगवान मानते थे और आज केवल भोली जनता, जो देख-सुन तो सकती है लेकिन बोलने का साहस नहीं है उसमें। किन्तु आज मैं आप का ध्यान गौ हत्या की तरफ ले जाना चाहुगा । भारत में गौ हत्या को लेकर कई आंदोलन हुए हैं और कई आज भी जारी हैं, लेकिन किसी में भी कोई ख़ास कामयाबी हासिल नहीं हो सकी. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्हें जनांदोलन का रूप नहीं दिया गया यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि ज़्यादातर आंदोलन स़िर्फ अपनी सियासत चमकाने या चंदा उगाही तक सीमित रहे,  अल कबीर स्लास्टर हाउस में रोज़ हज़ारों गाय काटी जाती हैं, कुछ साल पहले हिंदुत्ववादी संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ मुहिम भी छेड़ी थी, लेकिन जैसे ही यह बात सामने आई कि इसका मालिक ग़ैर मुसलमान है तो अभियान को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया जगज़ाहिर है, गौ हत्या से सबसे बड़ा फ़ायदा तस्करों एवं गाय के चमड़े का कारोबार करने वालों को होता है, इनके दबाव के कारण ही सरकार गौ हत्या पर पाबंदी लगाने से गुरेज़ करती है वरना क्या वजह है कि जिस देश में गाय को माता के रूप में पूजा जाता हो, वहां सरकार गौ हत्या रोकने में नाकाम है। गावो विश्वस्य मातरःअर्थात गौ केवल हिन्दुओं की ही नहीं इस सम्पूर्ण विश्व की माता है ! गाय के अस्तित्व पर इस जगत का अस्तित्व है वेदों में गोघ्नया गायों के वध के संदर्भ हैं और गाय का मांस परोसने वाले को महापापी और अति दुष्ट कहा गया है वेदों में गाय को अघन्या या अदिती अर्थात् कभी न मारने योग्य कहा गया है और गोहत्यारे के लिए अत्यंत कठोर दण्ड के विधान भी है ,गाय का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है।  
 आज हमारे देश में गंगा मैया, यमुना मैया, गौ माता कुछ भी सुरक्षित नहीं है क्यों…?
हैरत की बात यह है कि गौ हत्या पर पाबंदी लगाने की मांग लंबे समय से चली आ रही है, इसके बावजूद अभी तक इस पर कोई विशेष अमल नहीं किया गया, भारत में गौ हत्या को बढ़ावा देने में अंग्रेज़ों ने अहम भूमिका निभाई  । जब 1700 ई. में अंग्रेज़ भारत आए थे, उस वक़्त यहां गाय और सुअर का वध नहीं किया जाता था, हिंदू गाय को पूजनीय मानते थे और मुसलमान सुअर का नाम तक लेना पसंद नहीं करते थे, लेकिन अंग्रेजों को इन दोनों ही पशुओं के मांस की ज़रूरत थी, इसके अलावा वे भारत पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे, उन्होंने मुसलमानों को भड़काया कि क़ुरआन में कहीं भी नहीं लिखा है कि गाय की क़ुर्बानी हराम है, इसलिए उन्हें गाय की क़ुर्बानी करनी चाहिए, उन्होंने मुसलमानों को लालच भी दिया और कुछ लोग उनके झांसे में आ गए, इसी तरह उन्होंने दलित हिंदुओं को सुअर के मांस की बिक्री कर मोटी रकम कमाने का झांसा दिया ग़ौरतलब है कि यूरोप दो हज़ार बरसों से गाय के मांस का प्रमुख उपभोक्ता रहा है भारत में अपने आगमन के साथ ही अंग्रेज़ों ने यहां गौ हत्या शुरू करा दी, 18वीं सदी के आख़िर तक बड़े पैमाने पर गौ हत्या होने लगी, अंग्रेज़ों की बंगाल, मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी सेना के रसद विभागों ने देश भर में कसाईखाने बनवाएजैसे-जैसे यहां अंग्रेज़ी सेना और अधिकारियों की तादाद बढ़ने लगी, वैसे-वैसे गौ हत्या में भी बढ़ोत्तरी होती गई, गौ हत्या और सुअर हत्या की आड़ में अंग्रेज़ों को हिंदू और मुसलमानों में फूट डालने का भी मौक़ा मिल गया, इस दौरान हिंदू संगठनों ने गौ हत्या के ख़िला़फ मुहिम छेड़ दी, आख़िरकार महारानी विक्टोरिया ने वायसराय लैंस डाउन को पत्र लिखा, महारानी ने कहा, हालांकि मुसलमानों द्वारा की जा रही गौ हत्या आंदोलन का कारण बनी है, लेकिन हक़ीक़त में यह हमारे ख़िलाफ़ है, क्योंकि मुसलमानों से कहीं ज़्यादा गौ वध हम कराते हैं, इसके ज़रिए ही हमारे सैनिकों को गौ मांस मुहैया हो पाता है, आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने भी 28 जुलाई, 1857 को बकरीद के मौक़े पर गाय की क़ुर्बानी न करने का फ़रमान जारी किया था, साथ ही चेतावनी दी थी कि जो भी गौ वध करने या कराने का दोषी पाया जाएगा, उसे मौत की सज़ा दी जाएगी, इसके बाद 1892 में देश के विभिन्न हिस्सों से सरकार को हस्ताक्षरयुक्त पत्र भेजकर गौ वध पर रोक लगाने की मांग की जाने लगी इन पत्रों पर हिंदुओं के साथ मुसलमानों के भी हस्ताक्षर होते थेइस समय भी देशव्यापी अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें केंद्र सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और भारतीय गौवंश की रक्षा के लिए कठोर क़ानून बनाए जाने की मांग की जा रही है, गाय की रक्षा के लिए अपनी जान देने में भारतीय मुसलमान किसी से पीछे नहीं हैं, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले के गांव नंगला झंडा निवासी डॉ. राशिद अली ने गौ तस्करों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी, जिसके चलते 20 अक्टूबर, 2003 को उन पर जानलेवा हमला किया गया और उनकी मौत हो गई उन्होंने 1998 में गौ रक्षा का संकल्प लिया था और तभी से डॉक्टरी का पेशा छोड़कर वह अपनी मुहिम में जुट गए थे, गौ वध को रोकने के लिए विभिन्न मुस्लिम संगठन भी सामने आए हैं, दारूल उलूम देवबंद ने एक फ़तवा जारी करके मुसलमानों से गौ वध न करने की अपील की है, दारूल उलूम देवबंद के फतवा विभाग के अध्यक्ष मुती हबीबुर्रहमान का कहना है कि भारत में गाय को माता के रूप में पूजा जाता है, इसलिए मुसलमानों को उनकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए गौ वध से ख़ुद को दूर रखना चाहिए, उन्होंने कहा कि शरीयत किसी देश के क़ानून को तोड़ने का समर्थन नहीं करती, क़ाबिले ग़ौर है कि इस फ़तवे की पाकिस्तान में कड़ी आलोचना की गई थी, इसके बाद भारत में भी इस फ़तवे को लेकर ख़ामोशी अख्तियार कर ली गई
गाय भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है, यहां गाय की पूजा की जाती है. यह भारतीय संस्कृति से जुड़ी है, महात्मा गांधी कहते थे कि अगर निस्वार्थ भाव से सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहीं देखने को मिलता है तो वह गौ माता है, गाय का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं, गौ माता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ है, हमारी माता हमें कई वर्ष दुग्धपान कराती है और यह आशा करती है कि हम बड़े होकर उसकी सेवा करेंगे, गाय हमसे चारे और दाने के अलावा किसी और चीज़ की आशा नहीं करती हमारी मां प्राय: रूग्ण हो जाती है और हमसे सेवा की अपेक्षा करती है, गौ माता शायद ही कभी बीमार पड़ती है, वह हमारी सेवा आजीवन ही नहीं करती, अपितु मृत्यु के बाद भी करती है अपनी मां की मृत्यु होने पर हमें उसका दाह संस्कार करने पर भी धनराशि व्यय करनी पड़ती है, गौ माता मर जाने पर भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होती है, जितनी अपने जीवनकाल में थी हम उसके शरीर के हर अंग-मांस, अस्थियां, आंतों, सींग और चर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं, यह बात जन्म देने वाली मां की निंदा के विचार से नहीं कह रहा हूं, बल्कि यह दिखाने के लिए कह रहा हूं कि मैं गाय की पूजा क्यों करता हूंदरअसल भारत में गौ वध रोकने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए जाने की ज़रूरत है, मुसलमान तो गाय का गोश्त खाना छोड़ देंगे, लेकिन गाय के चमड़े का कारोबार करने वाले क्या इससे हो रही मोटी कमाई छोड़ने के लिए तैयार हैं,  इस बात में कोई दो राय नहीं कि गौ हत्या से सबसे ज़्यादा फ़ायदा ग़ैर मुसलमानों को है और उन्हीं के दबाव में सरकार गौ हत्या पर पाबंदी नहीं लगाना चाहती

देश की करोड़ों जनता की भावनाओं की कद्र करते हुए आप से प्रार्थना है कि आप गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करके ऐसा विधान बना दें कि गौ हत्या करने वाले को कड़ी सजा हो जाये। आप की बड़ी मेहरबानी होगी। आपकी के सरकार की आंखें अब भी खुल जायें तो गौ माता की आप पर अति कृपा होगी ऐसा मेरा मानना है ।
राष्ट्रहित व जनहित में आपके सकारात्मक उत्तर की अपेक्षा के साथ आपको पुनः प्रणाम!
जय हिन्द ….!
भवदीय
एम के पाण्डेय निल्को
राकड़ी, सोडाला, जयपुर 302006

+91-9024589902 



लौट आओ हुआ सवेरा

 

लौट आओ, हुआ सवेरा ,
एक नयी उम्मीद के साथ
समय आया कुछ कर दिखाने को
बहुत ही दिनों के बाद
लौट आओ , हुआ सवेरा |

बीत गया जो बीतना था
एक पुराने एहसास के साथ
समय आया उसे भूल जाने को
बहुत ही दिनों के बाद
लौट आओ, हुआ सवेरा

एक नयी उम्मीद के साथ
वो समय , जो गलत था
जिसको हमने नहीं समझा ,
एक गलतफहमी के साथ
नया साल आया उसे भूल जाने को
बहुत ही दिनों के बाद
लौट आओ , हुआ सवेरा

एक नयी उम्मीद के साथ
सारी भूमिकाएं पीछें छुट गयी
एक नए वादों के साथ
वो सारे दिन चले गए छोड़ हमें
एक नयी कहानी के साथ
समय आया एक नए हौसलों का
बहुत ही दिनों के बाद
लौट आओ, हुआ सवेरा

एक नयी उम्मीद के साथ
कर गया अंकित हमें
पुरे अंजर-पंजर के साथ
कैसे निकलू इस अंतःकरण से
इस गंभीर कल्पना के साथ
लौट आओ ,हुआ सवेरा

एक नयी उम्मीद के साथ
समय आया कुछ कर दिखाने को
बहुत ही दिनों के बाद|
लौट आओ ,हुआ सवेरा
 

-सौम्या पाण्डेय (बिट्टू)
 

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