Tag Archives: हिन्दी

मैं सुबह का अख़बार नहीं होता

मंगलवार की सुबह
जल्दी ही नीद खुली
लगा हुआ किसी मुद्दे पर सुबह
और किसी को जीत मिली
रूप का
रंग का
बाजार नहीं होता
भले कमज़ोर हूँ
पर लाचार नहीं होता
निल्को को पढ़ना है तो
उसकी नज़र से पढ़िए
किसी के लिए भी
मैं सुबह का अख़बार नहीं होता
न जाने क्यू बैठे बैठे ही
कही दर्द हुआ करता है
कौन दुखता हुआ
मेरे घाव छुआ करता है
जो सामने की भीड़ में शामिल है
वह शख्स भी किसी का कातिल है
टूटते ये अजीबोगरीब रिश्ते
बस कलम,कैमरा और कीबोर्ड
यही निल्को के सिपाही है

तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने

बस यही दौड़ है इस दौर के इन्सानो की
तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने
तू रहे पीछे और मैं सदा आगे
ऐसी कोई बात या करामात बने
निंदा हो या हो आलोचना
करता तू है यही आराधना
की मैं न आगे निकलु तेरे से
इसके लिए ही करुगा साधना
गया जमाना मदद , सहयोग का
लगता है ये कुछ हठयोग सा
अगर न माना इनकी बात
तो करते है ये काम लठयोग का
कैसे होगा दूर ये सब
कौन कराएगा नैया पार
गर यही चलता रहा तो निल्को
फस जाएगे बीच मझधार
*****************

एम के पाण्डेय निल्को
आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!

तेरी याद मुझे क्यों सताती है

तेरी याद मुझे क्यों सताती है
तन्हाई में क्यों रुलाती है
जब जब मिलते है हम
पता नहीं क्या आखो से वो पिलाती है
उसका नशा जैसे बोतल शराब की
लगती है वो हरदम बवाल सी
चाल है  उसकी जैसे मतवाली
कहती है बना लो घरवाली
जब बाज़ार में निकले वो शाम
लगती है भीड़ जैसे हो आम
दुपट्टे का कोना मुंह में दबाये
जैसे हो वो बनारसी पान
तेरा बनना और सवरना
जैसे समुन्द्र में हो तैरना
तेरी आखो में देखकर मुझे
मिलता सकूँ जैसे देख झरना
जब अपने मीठे होठो से
कहती है मेरे हो तुम ‘अनुज’
बस यह सुन कर मैं
भूल जाता की मैं हूँ मनु
झील सी नयन में उसके
तैरने का मन करता है
पर कही डूब न जाऊ
दिल इस बात से डरता है
लाख प्रसंशा उसकी लिखू पर
पानी फेर देती है वो
जब शाम को मिलने को
कहती है की बिजी है वो
मेरे बारे में चाहे वो कुछ सोचे
या तुम से कुछ भी न बोले
हर बार मैं यही समझाऊ की
तेरे आगे कोई न डोले
***********
अनुज शुक्ला

पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को “भारत रत्न”

भारतीय राजनीति के पितामाह, करिश्माई नेता, ओजस्वी वक्ता एवं सुशासन के प्रतिक पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को “भारत रत्न” से सम्मानित करने पर हार्दिक बधाई |
मैं ईश्वर से अटल जी के उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की प्रार्थना करता हूँ |
 आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!

राम नवमी की सभी दोस्त पाठकों को अनेक शुभकामनायें!

त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च  त्रिसमस्त्रिपु चोन्नतः 
त्रिताम्रस्त्रिपु च स्निग्धो गंभीरस्त्रिषु नित्यशः 
त्रिवली मांस्त्रयंवतः ………………….सुन्दरकाण्ड ३५/१७-१८
आप सभी को भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव रामनवमी की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाये.

हिन्दी भाषा मे हो रही मिलावट – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

     एम के पाण्डेय निल्को

हिन्दी विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। हिन्दी अपने आप में एक समर्थ भाषा है। इस देश में भाषा के मसले पर हमेशा विवाद रहा है। भारत एक बहुभाषी देश है। हिन्दी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली तथा समझे जाने वाली भाषा है इसीलिए वह राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकृत है। लेकिन आजकल अन्य भाषाओ जो हिन्दी के साथ घुसपैठ कर रही है यह एक विचारक बिन्दु है । जब से प्रिंट मीडिया खुल के सामने आई है तब से हिन्दी का अन्य भाषाओ के साथ मिलाप बढ़ गया है, ये शब्द ऐसे नहीं कि इनकी जगह अपनी भाषा के सीधे साधे बोलचाल के शब्द लिखे ही न जा सकते हों। जो अर्थ इन मिश्रित शब्दो से निकलता है उसी अर्थ को देने वाले अपनी हिन्दी की भाषा के शब्द आसानी से मिल सकते हैं। पर कुछ चाल ही ऐसी पड गई है कि हिन्दी के शब्द लोगों को पसंद नहीं आते । वे यथा संभव मिश्रित भाषा के शब्द लिखना ही ज़रूरी समझते हैं। फल इसका यह हुआ है कि हिन्दी दो तरह की हो गई है। एक तो वह जो सर्वसाधारण में बोली जाती हैए दूसरी वह जो पुस्तकों और अखबारों में लिखी जाती है। पुस्तकें या अखबारे लिखने का सिर्फ इतना ही मतलब होता है कि जो कुछ उसमें लिखा गया है वह पढ़ने वालों की समझ में आ जाय । जितने ही अधिक लोग उन्हें पढ़ेगे उतना ही अधिक लिखने का मतलब सिद्ध होगा । तब क्या ज़रूरत है कि भाषा क्लिष्ट कर के पढ़ने वालों की संख्या कम की जाय, मिश्रित भाषा के शब्दो से घ्रणा करना उचित नहीं किन्तु इससे खुद का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है । यह एक बड़ी विडंबना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो उस भाषा के प्रति घोर उपेक्षा व अवज्ञा का भाव हमारे राष्ट्रीय हितों की सिद्धि में कहाँ तक सहायक होंगे ? हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी प्रत्येक स्तर पर इसकी इतनी उपेक्षा क्यों ?

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या इस मुल्क में बिना भाषा के मिलावट के काम नही चला सकते । सफेदपोश लोगों का उत्तर है – हिन्दी में सामर्थ कहा है ? शब्द कहाँ है ? ऐसी हालत में मेरा मानना है कि विज्ञान, तकनीक, विधि, प्रशासन आदि पुस्तकों के सन्दर्भ में हिन्दी भाषा के क्षमता पर प्रश्न खड़े करने वालों को यह ध्यान देना होगा कि भाषा को बनाया नही जाता बल्कि वह हमें बनाती है। आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है। हिन्दी में हमें नए शब्द गढ़ने पड़ेंगे । भाषा एक कल्पवृक्ष के सामान होती है, उसका दोहन करना होता है। हिन्दी भाषा को प्रत्येक क्षेत्र में उत्तरोत्तर विकसित करना है। लेकिन इस तरफ़ कम ही ध्यान दिया गया है और अन्य भाषा को हिन्दी में मिलाकर आसान बनाने की कोशिश की गई । टीवी के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे धकेलना शुरू कर दिया और वहां प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी की जैसे नीम के पेड़ पर करेला चढ़ गया हो। इसी प्रकार से रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होता चला गया। लेकिन आज जो हिन्दी का स्तर गिरता दिखाई दे रहा है वह पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव के कारण हो रहा है। आज हर जगह लोग अंग्रेजी के प्रयोग को अपना भाषाई प्रतीक बनाते जा रहे हैं। अगर आज आप किसी को बोलते है कि यंत्र तो शायद उसे समझ न आए लेकिन मशीन शब्द हर किसी की समझ में आएगा। इसी प्रकार आज अंग्रेजी के कुछ शब्द प्रचलन में हैं जो सबके समझ में है। इसलिए यह कहना कि पूर्णतया हिन्दी पत्रकारिता या अन्य जगहो में सिर्फ हिन्दी भाषा का प्रयोग ही हो यह तर्क संगत नहीं है। हां यह जरूर है कि हमें अपनी मातृभाषा का सम्मान अवश्य करना चाहिए और उसे अधिक से अधिक प्रयोग में लाने का प्रयास करना चाहिए। भाषा के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग अपनी सहूलियत के हिसाब से होता रहा है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हम अभी भी यही मानते हैं कि अंग्रेजी हिंदी से बेहतर है। इसलिए जान बूझकर हिंदी को हिंगलिश बना कर काम करना पसंद करते हैं और ऐसा मानते हैं कि अगर मुझे अंग्रेजी नहीं आती तो मेरी तरक्की की राह दोगुनी मुश्किल है। भाषा आम समाज से अलग नहीं है, उसने भी अन्य बोलियों के साथ – साथ विदेशी भाषा के शब्दों को अपना लिया है। इसके साथ ही यह भी सही है कि विचारों की भाषा वही नहीं हो सकती जो बाज़ार में बोली जाती है। भाषा वही विकसित होती है जिसका हाजमा दुरुस्त होए जो अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने भीतर शामिल करके उन्हें पचा सके और अपना बना सके। हिन्दी में भी अनेक शब्द ऐसे हैं जिनके विदेशी स्रोत का हमें पता ही नहीं। शुद्ध हिन्दी वाले भले ही कक्ष कहें पर आम आदमी तो कमरा ही कहता है। भाषा में जितना प्रवाह होगा, वह लोगों की जुबान पर उतना जल्दी चढेगी भी , रोजमर्रा के जितनी करीब होगी लोगों का उसकी ओर आकर्षण उतना ही ज्यादा होगा और वह उतनी ही जल्दी अपनाई जाएगी । हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर हुए सर्वे में एक सुखद तथ्य सामने आया कि तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ी है। स्वीकार्यता बढ़ने के साथ – साथ इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी लोगों ने खुलकर राय व्यक्त की, मसलन लोगों का मानना है कि हिन्दी के अखबारों में अँग्रेजी के प्रयोग का जो प्रचलन बढ़ रहा है वह उचित नहीं है लेकिन ऐसे लोगों की भी तादाद भी कम नहीं है जो भाषा के प्रवाह और सरलता के लिए इस तरह के प्रयोग को सही मानते हैं। कुछ लोगो को ऐसे शब्दों का बढ़ता प्रचलन रास आ रहा है और कुछ लोग शब्दों की मिली – जुली इस खिच़ड़ी को मजबूरी में खा रहे हैं। 


एम के पाण्डेय ‘निल्को’

 आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!

पलटना

पलटना एक शब्द नहीं
इसका एक ही अर्थ नहीं
समझ – समझ का अन्तर
और जो न समझे वो बंदर
कुछ लोग पलटा जाते है
धीरे से सरक जाते है
नहीं रहती अपनी ही बात याद उनको
और हमे भूल जाने की बात करते है
किन्तु पलटने से पहले सटना जरूरी है
और आगे बाद मे लिखूगा क्योकि
यह रचना अभी अधूरी है ……………..

एम के पाण्डेय निल्को


आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!
« Older Entries Recent Entries »