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आज लिखने को कुछ नहीं – एम के पाण्डेय निल्को

सुना है तुम्हारे चाहने वाले बहुत हैं

ये मोहब्बत की मिठाई सब में बांट देती हो क्या

कई गिर चुके हैं तुम्हारे इश्क के मंजर में

अंखियों से गोली मार देती हो क्या

पुरानी बातों को इस लॉक डाउन में फिर से सजाना है

आज हमारे पास बस यादों का खजाना है

कभी लिखा था तुम्हारें जुल्फों पर शेर

पर आज पूरी गजल तुम पर बनाना है

पर ग़ज़ल लिखे तो लिखे कैसे

मुझे नहीं पता तुम हो कैसे

मैं हूं यहां निभा रहा हूं जिम्मेदारियां

पूरे देश में जमातियों को मैंने ही बुलाया हो जैसे

ये महामारी है इसका सामना करो

घर बैठो और मेरी यादों को ताजा करो

सोचो कब मिले थे हम दोनों

एक बार फिर से बातों को साझा करो

– एम के पाण्डेय निल्को

राम पर लिखना कठिन हैं….

पहले उसे छला गया । फिर वो वन चला गया ।।
एक वचन की लाज रखने । भाई के सर ताज रखने।।
माँ की ममता छोड़ कर । सारे बंधन तोड़ कर।।
राम पर लिखना कठिन है ।।


न थी लालसा वैभव की । न थी सत्ता की पिपासा ।। रखा ठोकर पर सिंहासन । और दी
पिता को दिलासा ।।
जानते थे वे प्रभु है । और वैभव सारे लघु है।।
सोचो तुम तनिक ये । अवतार लेकर मानव में ।।
आम रहना कितना कठिन है । राम पर लिखना कठिन है ।।

सूखा सकते थे वे सागर। फिर भी उन्होंने हाथ जोड़े।।
जीत लेते लंका को । फिर भी वानर साथ जोड़े।।

राम हो जब दुख ही देखो । सोच कर तुम ख़ुद ही देखो।।
पास हो जब सारी शक्ति। और जिसकी होती हो भक्ति।।
काम करना कितना कठिन है। राम पर लिखना कठिन है ।।
राम पर लिखना कठिन है ।।

Anshu Pathak

चांद अपनी चांदनी की रंगतों से डर गया

दिल हमारा जब तुम्हारी चाहतों से भर गया ।
चांद अपनी चांदनी की रंगतों से डर गया ।।

तेरी यादों में मेरे दिन रात कटते थे मगर।
मेरी नजरों में मेरे महबूब अब तू मर गया।।

आंख में पानी है होंठों पर मचलता है सवाल।
तुझसे पूछुं क्या तेरा एहसास इतना मर गया।।

मेरे चारों सिम्त सन्नाटों का इतना शोर है।
मेरा कमरा चीख के लम्हों से पल में भर गया।।

इन्तज़ार -ऐ-यार करना मेरी मजबूरी हुआ।
मैं अभी आता हूं ऐसा बोल कर दिलबर गया।।.

अलविदा कहकर गया वो फिर भी मेरे साथ है।
कैसे कह दूं दिल सजन की चाहतों से भर गया ।।

रात ढलकर सुबह आई कल्पना सपने धुले।
घर से निकली तो सफर में याद का लश्कर गया।।

“कल्पना गागडा़” शिमला, हिमाचल प्रदेश ।

स्वच्छता अभियान पर दो टूक – ब्रजेश पाण्डेय

सबसे पहले देश के दो महान सपूत बापू और शास्त्री जी को नमन। बापू ने स्वछता के प्रति हमें जगाया तो शास्त्री जी ने जय जवान-जय किसान का नारा दिया। स्वच्छ्ता अभियान का शुभारम्भ आज ही के दिन आदरणीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने किया। उन्हें भी मेरा कोटि-कोटि प्रणाम। लेकिन मन में एक सवाल चुभता है कि हम कितना स्वच्छ हैं और देश का जवान-किसान कितना खुशहाल। स्वच्छता अभियान को लेकर झाड़ू लगाने का दौर पिछले चार साल से चल रहा है। तकरीबन 50 फीसद हम सफल भी हुए हैं। यह आंकड़ा और भी बढ़ता जब हम सिर्फ मीडिया में स्वच्छता का ढोंग न रचते। जैसा की अपने कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं की आदत है। पहले अपने घर की गंदगी साफ़ करनी होगी।तन-मन दोनों की सफाई जरूरी है। लेकिन यहां तो सफाई का बजट भी साफ़ करने में बंदे पीछे नहीं हैं। बजट पर नहीं जाऊँगा क्योंक़ि सफाई मद पर जितना प्रदेश को मिलना था, एक तिहाई मिला। जो मिला उसमें से भी तथाकथित लोगों ने कमीशन बनना शुरू कर दिया। मेरा अपना विचार है कि जब तक करप्शन की सफाई नहीं होगी। संसद की गंदगी दूर नहीं की जायेगी, संपूर्ण स्वच्छ्ता पर बात बेमानी होगी।

अब बात जवानों और किसानों की। जवान सीमा पर कितना सुरक्षित हैं, आप जानते हैं। आपको यह भी पता होगा कि बापू, नेहरू और शास्त्री जी जैसे लोग कभी सुरक्षा में जवानों की फौज नहीं लेकर चलते थे। उनकी दृढ इच्छा शक्ति ही, उनके लिए ढाल का काम करता था। जब अच्छे-बुरे कर्मो का हिसाब-किताब करके इस दुनिया से सबको चले जाना है तो फिर नेताओं और मंत्रियों की सुरक्षा पर करोड़ो रुपये जनता का क्यों खर्च हो रहा। इस रकम से तो देश की सीमा को और भी मजबूत किया जा सकता है। किसान जिंदगी भर मेहनत करते-करते सिर्फ दो जून की रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा और रहने के लिए दो कमरे बना लेता है, लेकिन वह तो कभी लक्जरी गाडी में बैठने का भी सपना नहीं देख पाता। तो फिर क्या शास्त्री जी का नारा अधूरा नहीं लगता। बात कड़वी जरूर लगेगी मित्रों, लेकिन सही मायने में सबका साथ, सबका विकास का दंभ भरने वाली अपनी सरकार सिर्फ अपने नेताओं और पूंजीपतियों के लिए ही कार्य कर रही है।
यदि मेरी बातें आपको बुरा लगे तो क्षमा कीजियेगा।
सादर
ब्रजेश पाण्डेय
दैनिक जागरण गोरखपुर

देख लैला तेरे मजनू का कलेजा क्या है ? – अनुज शुक्ला

देख लैला तेरे मजनू का कलेजा क्या है ?
खाक में मिल कर भी कहता है , अभी बिगड़ा क्या है ?
देख लैला तेरे मजनू का कलेजा क्या है ।।
मैं तो तेरे मस्त निगाहों की मजे लेता हूँ
वरना साकी तेरे मयखाने में रखा क्या है ?
देख लैला तेरे मजनू का कलेजा क्या है ?
जिनकी जनाज़ों को हसीनों ने दिए हो कांधे
वो तो बारात है बारात, जनाजा क्या है?
देख लैला तेरे मजनू का कलेजा क्या है ?
अपनी तस्वीर लड़कपन की जवानी में न देख
चाँद के सामने, वो चाँद का टुकड़ा क्या है?
देख लैला तेरे मजनू का कलेजा क्या है ?
ये इंसान, तेरे घरवाले, तेरे दोस्त, तेरे अहबाद
तुझको गंगा किनारे जला देगे, समझता क्या है?
देख लैला तेरे मजनू का कलेजा क्या है ?
अपने होठों से मेरे हाथों को छूने दो न यार
एक दो घूंट से बोतल का बिगड़ता क्या है ?
खाक में मिल कर भी कहता है , अभी बिगड़ा क्या है ?
देख लैला तेरे मजनू का कलेजा क्या है ?

अनुज शुक्ला

क्या भारत धीरे-धीरे घुसपैठ से इस्लामी राष्ट्र में बदल जायेगा?

कुछ अटपटा लगा होगा पढ़ कर, पहली बार ऐसा कोई पोस्ट कर रहा हूँ । क्या है कि एक सर्वे किया , लोगो से यही सवाल पूछा तो उन्होंने कुछ इस अंदाज में जवाब दिया – 

राजस्थान विश्वविद्यालय, पी एच डी हिंदी साहित्य की सुमन विष्ट का कहना है कि – वर्तमान मे ये सबसे ज्वलंत प्रश्न है। मै TV मे समाचार देख रही थी कि किस प्रकार से बंग्लादेश देश निर्माण के पश्चात असम मे घुसपैठ द्वारा मुस्लिम आ्बादी मे 30प्रतिशत इजाफा हुआ है जो कि चिन्तन के साथ चिन्तनीय है | ये तो एक राज्य की स्थिति है.आगे अन्य राज्यों के आकड़े आना तो बाकी है।
मुस्लिम आबादी का बढ़ने मे घुसपैठ का बहुत बड़ा योगदान रहा है ये भी कटु सत्य है। अब आगे इसका क्या स्वरूप होगा? ये पूरी तरह से प्रशासनिक नितियों व सरकारी कार्यवाही पर ही निर्भर करेगा।
भूतपूर्व सैनिक पुष्पेंद्र जी का कहना है कि – ऐसा लगातार हुआ है | इस्लाम के अनुयायी आज भी देश से प्यार नही करते | वे इस देश में केवल अपना प्रभुत्व चाहते है | वे हिन्दुओ को देखना नही चाहते | पाकिस्तान इसकी सबसे बड़ी मिसाल है |
वही नवीन गौड़ कहते है कि – इसका सीधा साधा जवाब हैं “नही”
घुसपैठ से हो रहा था लेकिन अब मोदी जी की सरकार हैं और सरकार,सरकार में फर्क हैं. क्योकि जिस तरह से हर रोज कांग्रेस के काले राज को लेकर खुलासे हो रहे हैं उससे हर हिन्दू को जागना ही होगा और अपने धर्म के लिए सोचना ही होगा. हिन्दू धर्म इतना सुदृढ़ हैं की इसे ख़त्म करना इतना आसन नही हैं किसी भी गलत धारणा वाले धर्म के लिए.
एक और बात की हम धन्य हैं की हमें मोदी जी जैसे प्रधानमंत्री मिले जिन्होंने हमेशा देश की सुरक्षा को महत्व दिया. और उन लोगो में अब बौखलाहट हैं जो कांग्रेस सरकार के काले शासन के चलते अपने मंसूबो में कामयाब होते रहे लेकिन अब ऐसा नही हो रहा हैं.
आजकल उत्तरप्रदेश में जिस तरह से पिछली सरकारों में सरकारी विद्यालयों का किया जाने वाला इस्लामीकरण पकड़ में आ रहा हैं उसे देखकर यही लगता हैं की यदि 2014 में मोदी जी की सरकार नही बनी होती तो जो ये प्रश्न पूछा गया हैं वो हकीकत बन रहा होता. क्योकि ऐसा नही की ये कारनामे पिछली गैरबीजेपी सरकारों को पता नही थी, पता होने के बावजूद भी ऐसा होने दिया जा रहा था केवल और केवल वोट और राजसुख के लिए, लेकिन जनता जगी और मोदी और योगी को सता सौपी जिसके परिणाम सामने आ रहे हैं , धर्म परिवर्तन के लिए दी जा रहे अवैध फंडिंग बंद कर दी गई हैं. इस्लामिक राष्ट्र तो क्या कोई भी शैतानी सोच हिन्दू धर्म और हिंदुस्तान का बाल भी बांका नही कर सकती हैं. जय हिन्द
तरह तरह के लोग और उनकी अपनी अपनी राय । पर सवाल का सही जवाब तो सही समय आपने पर ही पता चलेगा , इसी के साथ नए सवालों के साथ फिर हाज़िर होऊंगा तब तक के लिए नमस्कार । 

आपका एम के पाण्डेय निल्को

कुछ और हो गए तुम – सोनू जैन

शेर  से  शोर  हो   गये  हो  तुम,
कितने कमज़ोर हो गये हो तुम।

हमको  पहचानते  नहीं  साहब,
आज कुछ ओर हो गये हो तुम।

बात  करते  नहीं ख़ुदा  से भी,
क्या कोई चोर हो गये हो तुम।

तुमको मालूम  ही नहीं  शायद,
ख़ुद से भी बोर हो गये हो तुम।

“सोनू” तुमसे हमें ये कहना है,
मैं पतंग, डोर  हो गये हो तुम।

✍सोनू कुमार जैन

मुझ पर एहसान करती है – एम के पाण्डेय ‘निल्कों’

मुझ पर एहसान करती है

ये कह कर बदनाम करती है

किसी रोज पढ़ेगा कोई इन चन्द लाइनों को

तो कोई कहेगा की तुमसे ही प्यार करती है

पर कभी नहीं वो एक़रार करती है

बस हर पल ही तकरार करती है

छेड़ा था किसी रोज दूर से ही उसको 

आज तक वो मुझसे सवाल करती है

शाम की वो क्लास करती है

सरे बाज़ार श्रंगार करती है

क्या मजाल जो कोई कह दे कुछ उसको

वही पर वो उसको हलाल करती है

गुस्से से चेहरा जब वो अपना लाल करती है

पूरे मोहल्ले मे फिर बवाल करती है

निल्को एक टक देखता है उसको

जब जब वो आखे चार करती है

एम के पाण्डेय निल्कों


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मुक्तक : आँख


आंखो मे सुरमा लगाती क्यू है

आईना देख इतराती क्यू है

तुझ पर जाऊ मैं वारि वारि

पर मुझे तू बार बार आजमाती क्यू है

एम के पाण्डेय निल्को

 

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होंठ उसके जैसे गुलाब की पंखुड़िया

होंठ उसके चेहरे पर
कुछ यूँ नज़र आते है
जैसे कुछ गुलाब की पंखुड़िया
पानी में नज़र आते है
उसे देख कर तो कुछ
लड़के भी शरमाते है
नंबर लेना देना, आगे पीछे घूमना
सब उसे देख अपनी
किस्मत आजमाते है
वो कहती है कैसे कैसे गीत
मुझे देख कर लोग गाते है
शक्ल सूरत में मुझे
अपनी प्रेमिका को को पाते है
कह दे वो यदि वो सच
और दिल की बात तो ‘निल्को’
सबसे पहले तुम्हारे जैसे लोग ही
अपना मुँह फुलाते है

एम के पाण्डेय निल्को

 

मुक्तक – जो भी तेरे पास आता है ।

जो भी तेरे पास आता है
वो तेरा ही हो जाता है
तेरी उलझी सुलझी ये जुल्फ़े
मद मस्त होकर लहराता है

एम के पाण्डेय निल्को

मन की बात – एम के पाण्डेय निल्को

हम में से ज्यादातर लोगों का कोई टाईम टेबल नहीं होता, जब मन किया पढने बैठ जाते हैं, जो मन किया किताब उठा लेते हैं और पढने लगते हैं, कोई भी टॉपिक बीच से ही पढ्ने लग जाते हैं, इससे सिवाय confusion के कुछ हाथ नहीं लगता हमें ये तक पता नहीं रहता कि हमने कौन सा विषय कितना पढ लिया है, और लोग बेवजह ही अपनी meomory को दोष देते हैं, एक बेहतर रणनीति ही बेहतर जीत दिला सकती है, और रणनीति का पहला हिस्सा जो कि यहाँ पर टाईम टेबल है, यदि यह कमजोर है तो आप जीत की आशा कैसे कर सकते हैं, तो बेहतर सफलता के लिये एक बेहतर टाईम टेबल बनाईये

एम के पाण्डेय निल्को
ब्लॉगर

हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।

भारत देश एक बहुभाषी राष्ट्र है। जहाँ अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा के अतिरिक्त अनेक प्रकार की भारतीय भाषाएँ , उपभाषाएँ , आंचलिक भाषाएँ , बोलियाँ ,उपबोलियाँ आदि बोली जाती हैं। इन भाषाओं में हिंदी एकता की कड़ी है।  हमारे सन्तों, समाज सुधारकों और राष्ट्रनायकों ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिंदी को अपनाया।  क्योंकि यही एक भाषा है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक और राजस्थान से असम तक समान रूप से समझी जाती है।  हिंदी ही एकमात्र भाषा है जो समस्त भारतीय को एकता के सूत्र में जोड़ने का कार्य सम्पन्न करती है।   हिंदी सहज , सरल एवं वैज्ञानिक भाषा है ,जिसने बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के उदारता का परिचय देते हुए अपनी वैज्ञानिकता को क्षति पहुँचाए बिना सहज ही समस्त विदेशी , देशी , आगत ,तत्सम आदि शब्दों को अपने भीतर सुगंध की तरह समा लिया है।  हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। सरलता से कहें तो हिन्दी उस माँ की तरह है जो अपने पुत्र के मित्रों को भी वही स्नेह और सम्मान देती है। वह अपने – पराये का भेद नहीं करती। वर्तमान युग हिंदी मीडिया का युग है।  हिंदी भाषा का निर्माण और आगे बढ़ाने का कार्य मीडिया ने किया है। इंटरनेट और मोबाइल ने हिंदी को और विस्तार दिया, हिंदी में संप्रेषण की ताकत है।  हिंदी यूनिकोड हुई तो ब्लॉगगिंग में बहार आ गई।  चिट्ठा लिखनेवालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई।  गूगल का मोबाइल और वेब विज्ञापन नेटवर्क एडसेंस हिंदी को सपोर्ट कर रहा है।  इंटरनेट पर 15 से ज्याद हिंदी सर्च इंजन मौजूद हैं।  सोशल साइट में हिंदी छाई हुई है।  21फीसदी भारतीय हिंदी में इंटरनेट का उपयोग करते हैं।हिंदी राजभाषा के बाद अब वैश्विक भाषा बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है। डिजिटल दुनिया में हिंदी की मांग अंग्रेजी की तुलना में पाँच गुना तेज है।  हिंदी मातृभाषा और राजभाषा से एक नई वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी बदल रही है। वह नई प्रौद्योगिकी, वैश्विक विपणन तंत्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा बन रही है। आज मोबाइल की पहुँच ने गाँव-गाँव के कोने-कोने में संवाद और संपर्क को आसान बना दिया है।  इस वजह से बाजार में आ रहे नित नवीन मोबाइल उपकरण हर सुविधा हिंदी में देने के लिए बाध्य हैं। हिंदी की इस समृद्ध, शक्ति और प्रसार पर किसी भी हिंदी भाषी को गर्व हो सकता है।  हिन्दी की शुद्धता को लेकर तर्क दिए जाएँ परन्तु कोई ये बताये कि नई पीढ़ी शुद्ध व्याकरण वाली हिन्दी सीखे कहाँ से ? अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं सरकारी पाठशालाओं की स्थिति जग जाहिर है। जो हिन्दी के ज्ञाता हैं वे अधिकांशतः लेखन आदि कार्य से जुड़े हुए हैं ।  कुशल शिक्षकों के अभाव में बताइये भला किस मार्ग से आप शुद्ध हिन्दी प्रचारित – प्रसारित करेंगे? दूरसंचार के समस्त माध्यमों ने वैसे भी भाषा की एक नई परिभाषा गढ़ दी है।
प्रत्येक भाषा में अन्य भाषा के शब्द शुद्ध व विकृत रूप में आ गए हैं जिन्हें उनकी सरलता और बोधगम्यता के कारण अपना लिया गया है। अब हमारे पास पीछे मुढ़कर देखने का समय नहीं है। यदि हम चाहते हैं हिन्दी भाषा आगे बढे तो ख़ुशी-ख़ुशी उसे अपने अंदर सहजता से आये दूसरी भाषा के शब्दों के साथ आगे बढ़ने देना चाहिए उसके मार्ग में अनावश्यक रुकावट नहीं डालना चाहिए। अधिक से अधिक युवाओं को हिन्दी भाषा से जोड़ने के लिये और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने के लिये हमें कूपमंडूकता से ऊपर उठना ही होगा। इससे न हिन्दी भाषा की प्रगति रुकेगी और न विकास। बल्कि इस कदम से ये अंतर्राष्ट्रीय महत्तव की भाषा हो जाएगी। संसार में ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती है। जो लोग हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों विशेषकर अंग्रेजी से नाखुश हैं मैं हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए पूछना चाहूँगा क्या उनके पुत्र – पुत्री हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं  क्या उनकी संतति भी उनकी तरह भाषा शुद्धता अभियान को आगे बढ़ा पायेगी ? अपवाद छोड़ दिए जाएँ तो उत्तर सबको पता है। जब सब कुछ देश काल वातावरण की बाध्यता है तो फिर हिन्दी की शुद्धिकरण की तटस्थता को त्याग यहाँ भी उदार होना ही पड़ेगा।
वैश्वीकरण का दौर है। हिंदी के समक्ष भी बहुत अधिक चुनौतियाँ हैं। आज उसे फ़ैलाने से ज्यादा बनाये रखना आवश्यक है और ये कोई बहुत आसान कार्य नहीं है। जब लाखों शब्दों को बाहर से लेने पर भी अंग्रेजी का स्वरुप बिगड़ने के स्थान पर दिन ब दिन बढ़ रहा है तो हम हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों को लेकर क्यों विचलित हो रहे हैं ? डर रहे हैं ? अंग्रेजी ने शायद ही कोई भाषा हो जिससे कुछ न कुछ लिया ना हो। इस तरह तो हम हिंदी का समस्त क्षेत्रीय भाषाओं से भी वैमनस्य बढ़ा देंगे। यदि हिंदी को बाजारीकरण से परे भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से ज़माना है तो अन्य भाषा के शब्दों को जो सहज ही आते चले जा रहे हैं उनको तिरस्कृत करने से बचना होगा। अकेला चलो की नीति छोड़नी होगी , नहीं तो हिंदी को सिमटने में देर नहीं लगेगी।

एम के पाण्डेय ‘निल्को’

आतंकियों का समर्थन करने वालों का विरोध करती मेरी नयी रचना

(आठ आतंकियों के एनकाउंटर के लिए पुलिस का समर्थन और आतंकियों का समर्थन करने वालों का विरोध करती मेरी नयी रचना)
कवि – मयंक शर्मा (09302222285)

खूब मनाई दीवाली क्या खूब पटाखे फोड़े हैं
आठ फ़रिश्ते धरती से सीधे जन्नत को छोड़े हैं

जेल का दाना पानी खाकर जो अक्सर इतराते थे
संविधान को कोस कोस मस्ती में नाचे जाते थे

खाकी को गाली देते थे तुम कुछ ना कर पाओगे
बस हमको बिरयानी देते देते ही मर जाओगे

खाकी ने दिखलाया दम और नया सवेरा कर डाला
कतरा कतरा आतंकी का बारूदों से भर डाला

अंधकार को दूर भगाने नयी पहल कर  डाली है
दीवाली के अगले ही दिन चहल पहल कर डाली है

कुछ लोगों ने इसको फिर से जल्दी ही एक मोड़ दिया
वोटों की खातिर लाशों को फिर मज़हब से जोड़ दिया

आतंकी से हमदर्दी की फिर आवाज़े आती हैं
अंधकार के हक़ में लड़ने काली रातें आती हैं

कुछ कहते है गुंडागर्दी कुछ कहते मनमर्जी है
कुछ को फिर से पीड़ा है कि ये मुठभेड़ भी फर्जी है

कुछ लोगों को आठ वोट की कमी दिखाई देती है
कुछ की आँखों में मज़हब की नमी दिखाई देती है

कुछ चैनल के पत्रकार का पत्थर दिल भी पिघल गया
कैसे कोई अंधकार को इतनी जल्दी निगल गया

अपना भी एक दीप बुझ गया अंधकार से लड़ने में
लेकिन कोई कमी नहीं की उनके आगे अड़ने में

असली है मुठभेड़ अगर तो नमन हज़ारों है खाकी
नकली भी है तो उनको निपटाओ जितने हैं बाकी.

कवि – मयंक शर्मा (09302222285)
          दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
       
  

आप सभी को नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं।

चतुर्दश वार।
मिला सुतवार।।
बढे धन कीर्ति।
रहे यश शांति।।

                गजानन हाँथ।
                सदा उर साथ।।
                कटे सब कष्ट।
                रहे  प्रभु  दृष्ट।।

प्रदीप सुपर्व।
मिले अमरत्व।।
प्रकाश अपार।
प्रहर्ष हजार।।

                 जले जब प्रकाश।
                 सदा तम नाश।।
                 मिले तब प्रमोद।
                 रहे अनुमोद।।

करें सब विनोद।
सदैव प्रमोद।
बने क्षण अखर्व।
सदा बस अपूर्व।।
   
                 रहे प्रभु वास।
                 धनेश निवास।।
                 रहे बस हर्ष।
                 नही अपकर्ष।।
सौम्या मिश्रा

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" की एक रचना

इन मीठे-मीठे पकवानों का किसको भोग लगाऊं मैं
मेरे प्रभुजी हैं सीमा पर फ़िर कैसे खुशी मनाऊँ मैं

दुश्मन की लंका जली नहीँ संहार अभी तक बाकी है
प्रत्यंचा के आघातों की टंकार अभी तक बाकी है

सीता सी भूमी गिलगित सिंध बलूचिस्तानी रोती है
अगणित लाशें अपने सीने पर निर्दोषों की ढोती है

जेहादी रावण करता अट्टाहास इधर विस्फोटों से
सेना अपनी घायल होती रहती है असुरी चोटों से

लगता है जैसे खंडित हों माता के धड़ से अंग-अंग
लंकेश कोशिशें करता माँ की पावनता हो भंग-भंग

लेकिन अंगद से वीर हमारे गिरि बनकर के अड़े रहे
बलिदान दिया है प्राणों का रक्षक बनकर के खड़े रहे

दुश्मन को धूल चटाने वाले वीर जितेंदर बलिदानी
वो नितिन चौबिया चम्बल वाला अल्हड़ सिंह स्वाभिमानी

गुरनाम वीर जैसे कितने ही जगमग होते बुझे दीप
सिंधू के रक्तिम जल में मोती वितरित करते रहे सीप

आओ हम सब मिलकर उनके नामों के दिये जलाएंगे
जिस घर में अंधियारा हो उसको जगमग करने जाएँगे

उन असहाय माताओं के दिल में उम्मीद जगाएगे
उन रोते बच्चों के मुख पर मुस्कानें वापस लाएंगे

जिस दिन पावन माटी दुश्मन से करके जंग छुड़ाएगे
हाँ उसी दिवस को दीवाली जैसा उल्लास मनाएंगे

लेकिन इतना भी याद रहे पन्ना फ़िर दर-दर ना भटके
जो किया उसी ने दीपदान वो उसके दिल में ना खटके

जिसके सुत प्राणों को न्यौछावर करने वाले सेवक हैं
उसको एहसास दिलायेंगे हम भी तो उसके दीपक हैं

ये देव कहे जिस-जिस घर से सरहद पर दीपक जाता है
उस घर में दिये जला देना उसमें भी भारत माता है

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080

दीपक – मुक्तक

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मैं   अँधेरों   से  लड़ा  हूँ
आँधियों से  भी खड़ा हूँ
तुच्छ मत कहना मुझे तू
मोतियों  से  मैं  जड़ा हूं  !!!
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मुरारि पचलंगिया

मुक्तक – नज़र निल्को की

अपने सर को बोलो की हद में रहे
चादर उनकी कद में रहे
बड़े होंगे पद में, तो क्या हुआ
बोलो अपने सरहद में रहे
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

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