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प्रकृति का सफाई अभियान


गाँव शहर और सड़क तक भर गया पानी
और याद आ गई सबको अपनी नानी
तो निल्को ने कहा –
परेशान मत हो मेरे बाबू
क्योकि यंहा प्रकृति का सफाई अभियान है चालू
नदियो का पानी आपे से बाहर हो रहा
लोगो का जीवन इससे दुसवार हो रहा
जिसे लोग बाढ़ कह कर परेशान है
वह तो प्रकृति का सफाई अभियान है
प्रकृति अपनी सफाई अलग तरीके से करती है
यही बात तो लोगो को अखरती है
प्रकृति के इस बर्ताव से
मानवता घायल हो जाती है
और इस बरसात के मौसम मे
नदिया पागल हो जाती है
प्रकृति जब नि:शुल्क सब देती है
तो ब्याज सहित वसूलती है
प्रकृति कभी भी जेल बना देती है
और आगे विज्ञान भी फेल हो जाती है
जब – जब प्रकृति से छेड़-छाड़ हुई
नुकसान मनुष्य का होता है
यह अटल सत्य है
जिस पर विश्वास सभी का होता है
गर प्रकृति को किया परेशान
तो खुद परेशान हो जाओगे
नहीं बचेगा नामो-निशान
और आदिवासी कहलाओगे
कर रहा मधुलेश निवेदन
मत काटो हरियाली को
गर फिरा इसका दिमाग तो
नहीं दिखेगा यह बागवानी तो
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मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

Happy Father’s Day

हर पिता चाहता है कि उसके बच्चे अच्छे इंसान बने. आमतौर पर हम सभी के बचपन में अपनी अनुशासनप्रियता सख्ती के चलते पिता हमें क्रूर नजर आते हैं। लेकिन जैसेजैसे उम्र बढ़ती है और हम जीवन की कठिन डगर पर चलने की तैयारी करने लगते हैं, हमें अनुभव होता है कि पिता की वो डाँट और सख्ती हमारे भले के लिए ही थी।यह सामाजिक निष्कर्ष है। पिता बेटी को अधिक प्यार करते हैं और मां बेटे को। कारण साफ है। पिता को पता है कि बेटी पराया धन है। वह कुछ साल ही उनके पास रहेगी, जबकि बेटा सदा। बेटी की बिदाई की सोच में ही पिता की आंखें सावनभादौ हो जाती है। बस एक ही बात निकलती है, बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिलें।बदलते समय के बदलते दौर में अब पिता की छवि बदल गई है। आज पिता अपने बच्चों के लिए केवल प्रेरणास्रोत बने हैं बल्कि जीवन में ऐसा मूलमंत्र दे रहे हैं जिसे जपकर उनके बच्चे कामयाबी की नई इबारतें लिख रहे हैं। पिता यह शब्द सुनते ही जेहन में एक दृढ़ व्यक्तित्व की छवि उभरती है। ऐसा व्यक्ति जो हमारा सबसे बड़ा आदर्श होता है, मर्यादा जिसके रिश्ते की पहचान है।कहा जाता है कि फादर्स डे पहली बार एक अमेरिकी महिला सोनारा लुई स्मार्ट के मन विचार आया। सोनारा ने सोचा कि क्यों नहीं मदर्स डे की तरह फादर्स डे भी मनाया जाए। जिस दिन लोग अपने पिताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें

सोनारा अपने पिता से बहुत प्रभावित थी। मां की छत्रछाया तो वह किशोरावस्था में ही खो चुकी थीं और उनके जीवन का अधिकांश भाग पिता के ही संरक्षण एवं सान्निध्य में बीता था।
सोनारा के पिता विलियम जैकसन स्मार्ट थे, जिन्होंने 1862 के अमेरिकी गृहयुद्ध में एक प्रमुख योद्धा के तौर पर कार्य किया था सोनारा की मां एलन विक्टोरिया स्मार्टका असामयिक निधन तब हो गया था जब वह करीब सोलह वर्ष की थीं उसके बाद उन्होंने अपने सभी छोटे भाइयों की परवरिश में अपने पिता का हाथ बंटाया था सोनारा ने अपने पिता के त्याग, प्रेम और साहस के प्रति अपनी श्रद्धा जताने के लिए उनके जन्मदिन, 19 जून 1810, पर सबसे पहला फादर्स डे का समारोह मनाया था. लेकिन मैं इस बात से १०० % सहमत नहीं हु की पिता के लिए केवल एक दिन ………..? 

त्रिपुरेन्द्र ओझा “नीशु”

दूसरों को बिगाड़ने की लिये, अनेकों मिल जायेंगे,

गंदे पानी के उपयोग को सार्थक किया

सामान्य तौर से गंदगी पानी की आक्सीजन छीन लेती है। गंदे पानी को वैज्ञानिक तरीके से शोधित कर उपयोग किया जाये तो आश्चर्यजनक नतीजे हासिल हो सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि शोध, अध्ययन और वैज्ञानिकों की राय पर अमल किया जाये। विशेषज्ञों की मानें तो कूड़ा भी बेकार नहीं होता। कूड़े को नया आकार-आयाम देकर उसका बेहतर उपयोग किया जा सकता है। गत दिनों चण्डीगढ़ के वरिष्ठ नागरिक ने कूड़े से उपयोगी वस्तुएं निकालकर एक पार्क को बड़े बेहतर ढंग से सजाया था। कूड़ा-कचरा व करकट का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है। महानगरों में गाब्रेज (कूड़ा) डम्पिंग ग्राउण्ड की समस्या तेजी से बढ़ रही है। शहरों से जुड़े हाईवे के किनारे कूड़ा-कचरे के पहाड़ शहर के सौन्दर्य को नष्ट कर रहे हैं। कई जगह सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के तहत कूड़े से खाद बनाने से लेकर बिजली तक की परियोजनाओं पर काम हो रहा है। जाहिर है कि गंदगी का भी जनहित में बेहतर उपयोग किया जा सकता है। बात चाहे कूड़े की हो, या फिर संड़ाध भरे पानी की, वैज्ञानिक तरीका अपनाकर उसका बेहतर उपयोग किया जा सकता। अमेरिका के शोधकर्ताओं व वैज्ञानिकों ने हाल ही में मल-मूत्र व अन्य गंदे पानी के उपयोग को सार्थक किया है। नाला-नालियों, पोखरों व नदियों में अरबों गैलन बह जाने वाले गंदे व बदबूदार पानी का उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि साफ सुथरे पानी की तुलना में गंदे पानी से 20 प्रतिशत अधिक ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। सीवर के पानी का सर्वाधिक उपयोग अमेरिका में करके बिजली बनायी जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका में हर साल औसतन 14 ट्रिलियन गैलन गंदे पानी का उपयोग ऊर्जा बनाने के लिए किया जा रहा है। अमेरिकी शोधकर्ता एलिजाबेथ एस. हैड्रिक कहती हैं ‘गंदे पानी का उपयोग ऊर्जा बनाने में बेहतर साबित हुआ है।’ अमेरिका में बिजली की कुल खपत में करीब डेढ़ प्रतिशत सीवर व अन्य गंदे पानी से बन रही बिजली से पूर्त की जा रही है। शोध व अध्ययन केातीजे बताते हैं, एक गैलन गंदे व बेकार पानी से पांच मिनट तक सौ वॉट का बल्ब आसानी से जलाया जा सकता है। इतना ही नहीं, सीवरेज व गंदे पानी में मौजूद कार्बनिक अणुओं को ईधन में भी बदला जा सकता है जिसका उपयोग अन्य कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। यह शोध देश दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। आज भी अरबों गैलन सीवरेज व अन्य गंदा पानी नाला-नालियों, तालाबों व नदियों में बहाया जाता है क्योंकि इसे व्यर्थ समझा जाता है। गंदे जल के शुद्धीकरण में वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग होने से नदियों का प्रदूषण भी काफी हद तक कम हो सकता है। साथ ही पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा। इसके लिए सरकार, सामाजिक संस्थाओं व वैज्ञानिकों को सार्थक पहल करनी होगी ताकि घरेलू गंदे पानी का उपयोग बिजली बनाने व अन्य उपयोग के लिए किया जा सके। अपने देश में केवल दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार व पश्चिम बंगाल को ही देखें तो अरबों गैलन सीवरेज हर दिन सीधे गंगा व यमुना नदियों में गिरता है जिससे इन नदियों का प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। गंदे जल का शोधन किया जाये तो गंगा-यमुना जैसी नदियों का प्रदूषण ता रोका ही जा सकता है, इससे अरबों की धनराशि बचेगी।

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गुम हुए नेताजी

विजय पाण्डेय 

आजाद हिन्द फौज के जरिए अंग्रेजों की नाक में दम कर देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत का सच आज भी सामने नहीं आ पाया है और यह रहस्य साधु-संन्यासियों के मिथकों तथा गोपनीय फाइलों में गुम हो गया है।बता रहे है विजय पाण्डेय ……….
 कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ऊपर हुए एक विमान हादसे में भारत के इस महान सपूत की मौत हो गई थी लेकिन इस कहानी पर बहुत से सवालिया निशान है। मिशन नेताजी से जुड़े अनुज धर ने जब सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सरकार से नेताजी की कथित मौत से संबंधित फाइल मांगी तो इसे देने से इंकार कर दिया गया। नेताजी के रहस्य पर पुस्तक लिख चुके अनुज धर का मानना है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ऊपर विमान हादसे और उसमें नेताजी की मौत की कहानी मनगढ़ंत है तथा ऐसा कोई सबूत नहीं है जो इसकी पुष्टि करता हो। उनका आरोप है कि नेताजी की मौत का सच जानबूझकर छिपाया जा रहा है। आजाद हिन्द फौज में शामिल रहे बहुत से सैनिक और अधिकारी दावा कर चुके है कि विमान हादसे में नेताजी की मौत नहीं हुई थी और वह आजादी के बाद भी जीवित रहे। उनका कहना है कि सुभाष चंद्र बोस आजादी के बाद देश में जन्मी घटिया राजनीति की वजह से सामने नहीं आ पाए और उन्होंने गुमनामी का जीवन जीना ही श्रेष्ठ समझा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित मौत की जांच के लिए बनाई गई शाहनवाज समिति ने जहां विमान हादसे की बात को सच बताया था, वहीं इस समिति में शामिल नेताजी सुभाष चंद्र के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था और कहा था कि विमान हादसे की घटना को जानबूझकर सच बताने की कोशिश की जा रही है। 1999 में गठित मुखर्जी आयोग ने 18 अगस्त 1945 को विमान हादसे में नेताजी की मौत को खारिज कर दिया तथा कहा कि इस मामले में आगे और जांच की जरूरत है। आयोग ने आठ नवम्बर 2005 को अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौपी थी। 17 मई 2006 को इसे संसद में पेश किया गया जिसे सरकार ने मानने से इंकार कर दिया ।

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विजय पाण्डेय 
विनायक नर्सरी (VINAYAK NURSERY), जयपुर 
+91-8952021604

॥ गगन में लहरता है भगवा हमारा ॥

त्रिपुरेन्द्र ओझा
गगन मे लहरता है भगवा हमारा ।
घिरे घोर घन दासताँ के भयंकर
गवाँ बैठे सर्वस्व आपस में लडकर
बुझे दीप घर-घर हुआ शून्य अंबर
निराशा निशा ने जो डेरा जमाया
ये जयचंद के द्रोह का दुष्ट फल है
जो अब तक अंधेरा सबेरा न आया
मगर घोर तम मे पराजय के गम में विजय की विभा ले
अंधेरे गगन में उषा के वसन दुष्मनो के नयन में
चमकता रहा पूज्य भगवा हमारा॥
भगावा है पद्मिनी के जौहर की ज्वाला
मिटाती अमावस लुटाती उजाला
नया एक इतिहास क्या रच न डाला
चिता एक जलने हजारों खडी थी
पुरुष तो मिटे नारियाँ सब हवन की
समिध बन ननल के पगों पर चढी थी
मगर जौहरों में घिरे कोहरो में
धुएँ के घनो में कि बलि के क्षणों में
धधकता रहा पूज्य भगवा हमारा ॥
मिटे देवाता मिट गए शुभ्र मंदिर
लुटी देवियाँ लुट गए सब नगर घर
स्वयं फूट की अग्नि में घर जला कर
पुरस्कार हाथों में लोंहे की कडियाँ
कपूतों की माता खडी आज भी है
भरें अपनी आंखो में आंसू की लडियाँ
मगर दासताँ के भयानक भँवर में पराजय समर में
अखीरी क्षणों तक शुभाशा बंधाता कि इच्छा जगाता
कि सब कुछ लुटाकर ही सब कुछ दिलाने
बुलाता रहा प्राण भगवा हमारा॥
कभी थे अकेले हुए आज इतने
नही तब डरे तो भला अब डरेंगे
विरोधों के सागर में चट्टान है हम
जो टकराएंगे मौत अपनी मरेंगे
लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा
कदम बढ रहा है कभी न रुकेगा
न सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगा
निडर है सभी हम अमर है सभी हम
के सर पर हमारे वरदहस्त करता
गगन में लहरता है भगवा हमारा॥
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प्रस्तुति : त्रिपुरेन्द्र ओझा 
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हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

एम. के. पाण्डेय “निल्को”

मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार क्षार

डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार
रणचंडी की अतृप्त प्यास मै दुर्गा का उन्मत्त हास
मै यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूं मै
यदि धधक उठे जल थल अंबर जड चेतन तो कैसा विस्मय
अटल बिहारी वाजपेयी

हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भूपर
पय पीकर सब मरते आए मै अमर हुवा लो विष पीकर
अधरोंकी प्यास बुझाई है मैने पीकर वह आग प्रखर
हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको पल भर मे ही छूकर
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन
मै नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग मैने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सकठका सेहर
मेरा स्वर्णभ मे गेहर गेहेर सागर के जल मे चेहेर चेहेर
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मै
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै तेजःपुन्ज तम लीन जगत मे फैलाया मैने प्रकाश
जगती का रच करके विनाश कब चाहा है निज का विकास
शरणागत की रक्षा की है मैने अपना जीवन देकर
विश्वास नही यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर
यदि आज देहलि के खण्डहर सदियोंकी निद्रा से जगकर
गुंजार उठे उनके स्वर से हिन्दु की जय तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

दुनिया के वीराने पथ पर जब जब नर ने खाई ठोकर
दो आँसू शेष बचा पाया जब जब मानव सब कुछ खोकर
मै आया तभि द्रवित होकर मै आया ज्ञान दीप लेकर
भूला भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर
पथ के आवर्तोंसे थककर जो बैठ गया आधे पथ पर
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढनिश्चय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मैने छाती का लहु पिला पाले विदेश के सुजित लाल
मुझको मानव मे भेद नही मेरा अन्तःस्थल वर विशाल
जग से ठुकराए लोगोंको लो मेरे घर का खुला द्वार
अपना सब कुछ हूं लुटा चुका पर अक्षय है धनागार
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयोंका वह राज मुकुट
यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरिट तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै वीरपुत्र मेरि जननी के जगती मे जौहर अपार
अकबर के पुत्रोंसे पूछो क्या याद उन्हे मीना बझार
क्या याद उन्हे चित्तोड दुर्ग मे जलनेवाली आग प्रखर
जब हाय सहस्त्रो माताए तिल तिल कर जल कर हो गई अमर
वह बुझनेवाली आग नही रग रग मे उसे समाए हूं
यदि कभि अचानक फूट पडे विप्लव लेकर तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम
मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम
गोपाल राम के नामोंपर कब मैने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिन्दु करने घर घर मे नरसंहार किया
कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी
भूभाग नही शत शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज
मेरा इसका संबन्ध अमर मै व्यक्ति और यह है समाज
इससे मैने पाया तन मन इससे मैने पाया जीवन
मेरा तो बस कर्तव्य यही कर दू सब कुछ इसके अर्पण
मै तो समाज की थाति हूं मै तो समाज का हूं सेवक
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥
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प्रस्तुति : एम. के. पाण्डेय “निल्को ”

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पूर्वाञ्चल का भोजपुरिया लाल – एन.डी. देहाती

 नर्वदेश्वर पाण्डेय (एन.डी. देहाती)

पूर्वाञ्चल की धरती पर अनेक ऐसे लाल हुये है जो देश के साहित्यिक  क्षैतिज पर ध्रुवतारे की तरह चमके है | ऐसे ही माटी मे पैदा हुए खाटी देहाती जी  ने बुलन्दियो को छूते हुये अपने गाँव देहात को हमेशा सुर्ख़ियो मे रखा | 1 अप्रैल 1960 को पूर्वाञ्चल के देवरिया जिले मे लार थाना क्षेत्र के हरखौली गाँव मे जन्मे नर्वदेश्वर पाण्डेय की प्रारम्भिक शिक्षा पास के गाँव रुच्चापार मे हुई | स्नातक तक की पढ़ाई पास के कस्बे लार के मठ डिग्री कॉलेज मे हुई | पढ़ाई के दौरान शौक से “देहाती” टाइटिल क्या लगाया देहाती बन कर रह गए | भोजपुरी साहित्य की सेवा मे उन्होने विभिन्न पत्र पत्रिकाओ के माध्यम से भूल रही लोक-संस्कृति, लोक-परंपरा,रीति-रिवाज,को समय-समय पर याद कराया है |

    देहाती जी का सृजन क्षेत्र काफी समृद्ध है | आत्म प्रचार के इस युग मे वह गुमनाम सा जीवन जीते है | पूर्वाञ्चल मे भोजपुरी साहित्य के सृजन मे उन्होने अपनी परंपरावों व धरोहरों के बारे मे खूब लिखा है | भोजपुरी साहित्य के लेखन मे उन्होने खूब नाम भी कमाया | फिर भी मंच और मुकाम के मामलो मे वह काफी पीछे रह गए है | उन्हे जो सम्मान मिलना चाहिए, जिसके वह हकदार हैं वह नहीं मिला । इसके पीछे की वजह यह है की बाजारीकरण के इस दौर में वह मार्केटिंग से दूर रहते हैं।  स्वाभिमानी देहाती जी ने भोजपुरी साहित्य रचना के साथ खेतीबारी को ही प्राथमिकता दी |भोजपुरी के प्रति उनके समपर्ण ने उन्हे लोक भाषा के महाकवि कबीर के मार्ग का राहगीर बना दिया।
श्री देहाती जी का रचना संसार व्यंग से आच्छादित है । उन्होने सामाजिक व राजनीतिक मुद्दो पर बहुत व्यंग लिखा । गोरखपुर से प्रकाशित होने वाले सभी  समाचार पत्रों ने देहाती जी के व्यंगों को अपने यहाँ स्थायी कॉलम में स्थान दिया । आज में “लखेदुआ के चिट्ठी”, दैनिक जागरण में “देहाती जी के दिलग्गी”, अमर उजाला में “देहाती के पाती” व राष्ट्रीय सहारा में “देहाती क बहुबकी” उनके चर्चित कॉलम रहे हैं । यद्द्पि देहाती जी ने कोई खंडकाव्य या महाकाव्य नहीं रचा लेकिन उनकी चिंतन प्रधान रचनाओं को एकत्रित किया जाए तो किसी मोटे ग्रंथ से कम नहीं होगी । 1980 से लगातार भोजपुरी की धुन में रमे देहाती जी ने तीस वर्षो से साहित्य सेवा में भोजपुरी के प्रचार प्रसार के लिए खूब लिखा । भोजपुरी की अस्मिता के लिए, संस्कृति की रक्षा के लिए भोजपुरी कला कोहबर से भी सम्मानित किया गया है | मगहर महोत्सव व सरयू महोत्सव मे भी इन्होने अनेकों बार अपने भोजपुरी कविताओ से लोगो के मन को हर्षित किया है | होली समारोह, खेल कूद व विभिन्न कार्यक्रमों मे बतौर मुख्य अतिथि श्री देहाती जी को भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ व अन्य विभिन्न संगठनो द्वारा सम्मान पत्र व स्मृति चिन्ह से अनेकों बार सम्मानित किया जा चुका है | उत्तर प्रदेश सरकार के धर्मार्थ राज्य मंत्री राजेश त्रिपाठी ने सलेमपुर में आयोजित एक समहरोह में उन्हे भोजपुरी रत्न से सम्मानित किया है ।
 ब्राह्मण जाति मे जन्मे देहाती जी ने अपने धर्म को भी प्राथमिकता दी है | इन्होने जन्माष्टमी, होली, दीपावली, मकर-संक्रांति, नवरात्रि, आदि सभी त्यौहारो को बहुत है अच्छे ढंग से मनाया है | इन्होने अपने गाँव हरखौली मे फरवरी 1992 को ऐसा रुद्र माहयज्ञ का आयोजन कराया, जिसको लोग अभी तक भूले नहीं है | इन्होने गाय माता की रक्षा के लिए 1992 मे गोरक्षा समिति की स्थापना की | श्री देहाती जी ने अपनी कला को विरहा के रूप मे भी लोगो तक पहुचाया है | लोगो मे शांति, आस्था,भाईचारा, सहयोग की भावना बनाए रखने का संदेश 11 प्रान्तो मे अस्सी दिवसीय साइकिल यात्रा से दी है |
अपनी माटी से प्यार करने वाले संवेदनशील देहाती जी ने अपनी पूरी ऊर्जा भोजपुरी साहित्य सर्जना में लगाया | हम उनके बहुमूल्य योगदान को कभी भुला नहीं सकते, जिस छोटे स्थान से उन्होने पूर्वाञ्चल में इतना बड़ा नाम कमाया उनकी रचनाओ का सम्यक व संतुलित मूल्यांकन होना चाहिए था लेकिन भोजपुरी के लिए काम कर रही तमाम संस्थाओं में से किसी ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया । इसका कारण यह भी है की सभी संस्थाएं किसी न किसी की कृपा पर चलती हैं और देहाती ऐसा अक्खड़मिजाज रचनाकार किसी का कृपापात्र नहीं बनना चाहता । वह व्यवस्था विरोधी रचनकर हैं | मेहनतकशों के लिए संघर्ष उनका ध्येय है । चमक-दमक से दूर गाँव में बैठा यह रचनाकार कभी थका नहीं |लगातार तीस वर्षो से अधिक लिख रहा है । अपने लेखो में किसी को छोड़ा भी नहीं है । जो भी निशाने पर चढ़ा व्यंगवाण का शिकार हुआ | भोजपुरी के विद्वान देहाती जी को सरस्वती सिद्ध माना जाता है ।
पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पूर्वाञ्चल के लोग देहाती के नाम व उनकी रचना से खूब परिचित हुए हैं । आकाशवाणी गोरखपुर से प्रसारित विभिन्न भोजपुरी कार्यक्रमों में उनकी आवाज़ भी सुनी गयी है । भोजपुरी के इस रचनाकार को गाँव में ही अच्छा लगता है । उनके लेखों में तेलवान, भतवान,साइत, नेवान, सतुआन  आदि भूल रही परम्पराओं को कई बार याद दिलाया गया है । देहाती जी अपने साहित्य रचना के जरिये एक जंग लड़ रहे हैं । भोजपुरी की अस्मिता के लिए, संस्कृति की रक्षा के लिए, परम्पराओं व रीति-रिवाजों और भाईचारा को जीवित रखने की जंग ।
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‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वमम देव देवः।।’

‘‘माँ !’’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘माँ’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘माँ’ की ममता और उसके आँचल की महिमा का को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात-रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी-मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अटखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकड़कर चलना सिखाना, प्यार से डांटना-फटकारना, रूठना-मनाना, दूध-दही-मक्खन का लाड़-लड़ाकर खिलाना-पिलाना, बच्चे के लिए अच्छे-अच्छे सपने बुनना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार…..ये सब ही तो हर ‘माँ’ की मूल पहचान है। इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की ‘माँ’ की यही मूल पहचान है।
हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बावजूद ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है।
हमारे देश भारत में ‘माँ’ को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है और वेदों में ‘माँ’ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम ‘माँ’ के रूप में की उद्बोधित किया गया है:
‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वमम देव देवः।।’

वेदों में ‘माँ’ को ‘अंबा’, ‘अम्बिका’, ‘दुर्गा’, ‘देवी’, ‘सरस्वती’, ‘शक्ति’, ‘ज्योति’, ‘पृथ्वी’ आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसके अलावा ‘माँ’ को ‘माता’, ‘मात’, ‘मातृ’, ‘अम्मा’, ‘अम्मी’, ‘जननी’, ‘जन्मदात्री’, ‘जीवनदायिनी’, ‘जनयत्री’, ‘धात्री’, ‘प्रसू’ आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है।
ऋग्वेद में ‘माँ’ की महिमा का यशोगान कुछ इस प्रकार से किया गया है, ‘हे उषा के समान प्राणदायिनी माँ ! हमें महान सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करो। तुम हमें नियम-परायण बनाओं। हमें यश और अद्धत ऐश्वर्य प्रदान करो।’
सामवेद में एक प्रेरणादायक मंत्र मिलता है, जिसका अभिप्राय है, ‘हे जिज्ञासु पुत्र! तू माता की आज्ञा का पालन कर, अपने दुराचरण से माता को कष्ट मत दे। अपनी माता को अपने समीप रख, मन को शुद्ध कर और आचरण की ज्योति को प्रकाशित कर।’
प्राचीन ग्रन्थों में कई औषधियों के अनुपम गुणों की तुलना ‘माँ’ से की गई है। एक प्राचीन ग्रन्थ में आंवला को ‘शिवा’ (कल्याणकारी), ‘वयस्था’ (अवस्था को बनाए रखने वाला) और ‘धात्री’ (माता के समान रक्षा करने वाला) कहा गया है। राजा बल्लभ निघन्टु ने भी एक जगह ‘हरीतकी’ (हरड़) के गुणों की तुलना ‘माँ’ से कुछ इस प्रकार की है:
‘यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरितकी।’
(अर्थात, हरीतकी (हरड़) मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली होती है।)
श्रीमदभागवत पुराण में उल्लेख मिलता है कि ‘माताओं की सेवा से मिला आशिष, सात जन्मों के कष्टों व पापांे को भी दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा का कवच का काम करती है।’ इसके साथ ही श्रीमदभागवत में कहा गया है कि ‘माँ’ बच्चे की प्रथम गुरू होती है।‘
रामायण में श्रीराम अपने श्रीमुख से ‘माँ’ को स्वर्ग से भी बढ़कर मानते हैं। वे कहते हैं कि:
‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।’
(अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।)
महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि ‘भूमि से भारी कौन?’ तब युधिष्ठर जवाब देते हैं:
‘माता गुरूतरा भूमेः।’
(अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।)
महाभारत में अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म कहते हैं कि ‘भूमि के समान कोई दान नहीं, माता के समान कोई गुरू नहीं, सत्य के समान कोई धर्म नहीं और दान के समान को पुण्य नहीं है।’
इसके साथ ही महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने ‘माँ’ के बारे में लिखा है कि:
‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’

(अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।)
तैतरीय उपनिषद में ‘माँ’ के बारे में इस प्रकार उल्लेख मिलता है:
‘मातृ देवो भवः।’
(अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।)
संतो का भी स्पष्ट मानना है कि ‘माँ’ के चरणों में स्वर्ग होता है।’ आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी कालजयी रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रारंभिक चरण में ‘शतपथ ब्राहा्रण’ की इस सूक्ति का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया है:
‘अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः
मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।’

(अर्थात, जब तीन उत्तम शिक्ष अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा।)
‘माँ’ के गुणों का उल्लेख करते हुए आगे कहा गया है कि:
‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।’

(अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।)
‘चाणक्य-नीति’ के प्रथम अध्याय में भी ‘माँ’ की महिमा का बखूबी उल्लेख मिलता है। यथा:
‘रजतिम ओ गुरू तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।’

(अर्थात, जिस प्रकार संसार में पाँच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पाँच प्रकार की माँ होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरू की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।)
‘चाणक्य नीति’ में कौटिल्य स्पष्ट रूप से कहते हैं कि, ‘माता के समान कोई देवता नहीं है। ‘माँ’  परम देवी होती है।’
महर्षि मनु ने ‘माँ’ का यशोगान इस प्रकार किया है:
 ‘दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य होता है। सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण ‘माँ’ होती है।’
विश्व के महान साहित्यकारों और दार्शनिकों ने ‘माँ’ की महिमा का गौरवपूर्ण बखान किया है। एच.डब्लू बीचर के अनुसार, ‘जननी का हृदय शिशु की पाठशाला है।’ कालरिज का मानना है, ‘जननी जननी है, जीवित वस्तुओं में वह सबसे अधिक पवित्र है।’ इसी सन्दर्भ में विद्या तिवारी ने लिखा है, ‘माता और पिता स्वर्ग से महान् हैं।’ विश्व प्रसिद्ध नेपोलियन बोनापार्ट के अनुसार, ‘शिशु का भाग्य सदैव उसकी जननी द्वारा निर्मित होता है।’ महान भारतीय कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना में ‘माँ’ की महिम कुछ इस तरह बयां की:
‘स्वर्ग से भी श्रेष्ठ जननी जन्मभूमि कही गई।
सेवनिया है सभी को वहा महा महिमामयी’।।

(अर्थात, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ कही गई हैं। इस महा महिमामयी जननी और जन्मभूमि की सेवा सभी लोगों को करनी चाहिए।)
इसके अलावा श्री गुप्त ने ‘माँ’ की महिमा में लिखा है:
‘जननी तेरे जात सभी हम,
जननी तेरी जय है।’

इसी क्रम में रामचरित उपाध्याय ने अपनी रचना ‘मातृभूमि’ में कुछ इस प्रकार ‘माँ’ की महिमा का उल्लेख किया है:
‘है पिता से मान्य माता दशगुनी, इस मर्म को,
जानते हैं वे सुधी जो जानते हैं धर्म को।’

(जो बुद्धिमान लोग धर्म को मानते हैं, वे जानते हैं कि माता पिता से दस गुनी मान्य होती है।)
इसके साथ ही ‘माँ’ के बारे में एक महाविद्वान ने क्या खूब कहा है, ‘कोमलता में जिसका हृदय गुलाब सी कलियों से भी अधिक कोमल है तथा दयामय है। पवित्रता में जो यज्ञ के धुएं के समान है और कर्त्तव्य में जो वज्र की तरह कठोर है-वही दिव्य जननी है।’सिनेमा में भी ‘माँ’ पर आधारित बहुत सारी फिल्में और गाने बनाए गए हैं। कई गीत तो इतने मार्मिक बन पड़े हैं, जिनको सुनकर व्यक्ति एकदम द्रवित हो उठता है। मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा फिल्म ‘दादी माँ’ (1966) के लिए लिखा गया यह गीत आज भी ल���गों के हृदय पटल पर अपनी अमिट छाप बनाए हुए है:
‘उसको नहीं देखा हमने कभी,
पर इसकी जरूरत क्या होगी!
ऐ माँ…ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग,
भगवान की सूरत क्या होगी!!’

‘माँ’ के बारे में लिखी गई ये हृदयस्पर्शी पंक्तियां हर किसी को प्रभावित किए बिना नहीं रहतीं:
‘कौन सी है वो चीज जो यहां नहीं मिलती।
सबकुछ मिल जाता है, लेकिन,
 हाँ…! ‘माँ’  नहीं मिलती।’

जो नारी ‘माँ’ नहीं बन पाती, वह जीवन भर स्वयं को अधूरा मानती है और जीवन भर तड़पती रहती है। समाज में ऐसी औरत को ‘बांझ’ कहा जाता है और उसकी कदम-कदम पर उपेक्षा की जाती है। नारी की इसी मनोदशा को हरियाणा के ‘सूर्यकवि’ पं. लखमीचन्द ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘पूर्ण भगत’ में कुछ इस तरह चित्रित किया है:
‘बांझ दोष की बीर नै के बेरा,
सन्तान होण का किसा दर्द हो सै।’

(अर्थात, जो औरत ‘माँ’ न बनी हो यानी जो बांझ हो, भला उसे प्रसव-पीड़ा का क्या पता हो सकता है।)
नारी इस सृष्टि और प्रकृति की ‘जननी’ है। नारी के बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी शाश्वत सत्य को हरियाणा के सिरमौर कवि पं. मांगे राम ने अपने प्रख्यात साँग ‘शकुन्तला-दुष्यन्त’ में कुछ इस प्रकार समाहित किया है:
‘स्त्री ना होती जग म्हं, सृष्टि को रचावै कौण।
ब्रहा्रा विष्णु शिवजी तीनों, मन म्हं धारें बैठे मौन।
एक ब्रहा्रा नैं शतरूपा रच दी, जबसे लागी सृष्टि हौण।’

(अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रहा्रा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ बैठे थे। जब ब्रहा्रा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई।)
कुल मिलाकर, संसार का हर धर्म जननी ‘माँ’ की अपार महिमा का यशोगान करता है। हर धर्म और संस्कृति में ‘माँ’ के अलौकिक गुणों और रूपों का उल्लेखनीय वर्णन मिलता है। हिन्दू धर्म में देवियों को ‘माँ’ कहकर पुकारा गया है। धार्मिक परम्परा के अनुसार धन की देवी ‘लक्ष्मी माँ’, ज्ञान की देवी ‘सरस्वती माँ’ और शक्ति की देवी ‘दुर्गा माँ’ मानीं गई हैं। नवरात्रों में ‘माँ’ को नौ विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। मुस्लिम धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोपरि और पवित्र स्थान दिया गया है। हजरत मोहम्मद कहते हैं कि ‘‘माँ’  के चरणों के नीचे स्वर्ग है।’ ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ में स्पष्ट लिखा गया है कि ‘माता के बिना जीवन होता ही नहीं है।’ ईसाई धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसके साथ ही भगवान यीशु की ‘माँ’ मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है। बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया गया है। यहुदी लोग भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं। यहुदियों की मान्यता के अनुसार उनके 55 पैगम्बर हैं, जिनमें से सात महिलाएं भी शामिल हैं। सिख धर्म में भी ‘माँ’ का स्थान सबसे ऊँचा रखा गया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि चाहे कोई भी देश हो, कोई भी संस्कृति या सभ्यता हो और कोई भी भाषा अथवा बोली हो, ‘माँ’ के प्रति अटूट, अगाध और अपार सम्मान देखने को मिलेगा। ‘माँ’ को अंग्रेजी भाषा में ‘मदर’ ‘मम्मी’ या ‘मॉम’, हिन्दी में ‘माँ’, स��स्कृत में ‘माता’, फारसी में ‘मादर’ और चीनी में ‘माकून’ कहकर पुकारा जाता है। भाषायी दृष्टि से ‘माँ’ के भले ही विभिन्न रूप हों, लेकिन ‘ममत्व’ और ‘वात्सल्य’ की दृष्टि में सभी एक समान ही होती हैं। ‘मातृ दिवस’ संसार भर में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। यूरोपीय देशों में ‘मदरिंग सनडे’ के रूप में मनाया जाता है। चीन में दार्शनिक मेंग जाई की माँ के जन्मदिन को ‘मातृ-दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। नेपाल में वैशाख कृष्ण पक्ष में ‘माता तीर्थ उत्सव’ मनाया जाता है। अमेरिका व भारत सहित कई कई अन्य देशों में मई के दूसरे रविवार को ‘मातृ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इंडोनेशिया में प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को ‘मातृ-दिवस’ मनाने की परंपरा है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार है।)

(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BURILAGEYALAGEBHALI/entry/%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A8-%E0%A4%A4-%E0%A4%B0-%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%B9 

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देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा?

देशकाअगलाराष्ट्रपतिकौनहोगा? इससवालकाजवाबअभीस्पष् नहीं है। 19 जुलाई को राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव के लिए नामांकन इसी महीने होना है। लेकिन किसी पार्टी ने उम्मीदवारी को लेकर पत्ते नहीं खोले हैं। केवल बयानबाजी चल रही है। इनके आधार पर कुछ नाम दौड़ में आते लग रहे हैं। ऐसे में हम आपसे आपकी पंसद पूछ रहे हैं। 
 
अब तक जो चार प्रमुख नामरायसीना हिल्सकी रेस में सामने रहे हैं, उनके सकारात्मकनकारात्मक पहलू बताते हुए हम आपसे आपकी पसंद जानना चाहेंगे। अभी केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति के नाम चर्चा में हैं।प्रणब, हामिद, कलाम या मूर्ति में से कौन आपकी नज़र में राष्ट्रपति के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार है  और क्यों? अगर आपकी नज़र में इन नामों से अलग कोई नाम है, तो भी बताएं। नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी पसंद और उसकी वजह लिखकर सबमिट करें। 
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2,900 करोड़ रूपए का शौचालय घोटाला

उत्तर प्रदेश घोटालों का प्रदेश बन चुका है। एनआरएचम घोटाले से लेकर जमीन घोटाले तक केवल घोटाले और भ्रष्टाचार। प्रदेश में अब एक नया घोटाला सामने आ रहा है, शौचालय घोटाला। यह वाकई में शर्मनाक है।

केंद्र सरकार की ओर से संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में शौचालय बनाए जाने थे। उत्तर प्रदेश पंचायती राज विभाग द्वारा ग्रामीण विकास मंत्रालय को बताया गया कि प्रदेश में 1.71 करोड शौचालयों का निर्माण करवाया गया है। लेकिन घरेलू जनगणना आंकड़ों में सामने आया कि प्रदेश में केवल 55 लाख ग्रामीणों के घर में ही शौचालय है। इससे साफ है कि उत्तर प्रदेश के 1.16 करोड़ ग्रामीणों के घर में शौचालय नहीं है।
पूर्ण स्वच्छता अभियान की शुरूआत वर्ष 1999 में हुई थी, जिसके तहत वर्ष 2017 तक संपूर्ण भारत को गंदगी मुक्त बनाना है। उत्तर प्रदेश में इस योजना की शुरूआत वर्ष 2002 में हुई। इस योजना के तहत समाज के विभिन्न वर्गों को अपने घरों में स्थायी शौचालय बनवाने के लिए सब्सिडी दी गई। वर्ष 2002 में यह सब्सिडी राशि 600 रूपए थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 4,500 रूपए कर दिया गया। एक नए शौचालय का निर्माण 2,500 रूपए में हो सकता है, जिसके आधार पर इस योजना में 2,900 करोड़े के हेरफेर की आशंका है।
टोटल सेनिटेशन कैंपेन के आंकड़ों की मानें तो उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में मात्र 17.50 प्रतिशत लोगों के घर में शौचालय नहीं है। जबकि जनसंख्या विभाग के आंकड़ों के अनुसार 78 प्रतिशत लोग शौचालय की सुविधा से महरूम हैं। टोटल सेनिटेशन कैंपेन के ऑनलाइन डाटा के अनुसार उत्तर प्रदेश के केवल दो जिलों लखीमपुर खीरी और फर्रूखाबाद में 100 फीसदी घरों में शौचालय हैं। इन आंकडों को भी जब जनसंख्या विभाग के आंकड़ों से क्रॉसचैक किया गया तो मालूम चला कि 2011 की जनसंख्या रिपोर्ट के आधार पर इन जिलों में 81.7 प्रतिशत और 76.10 प्रतिशत घरों में शौचालय हैं।
शौचालयों की संख्या के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए इस आकलन की चपेट में प्रदेश की राजधानी लखनऊ भी शामिल है। टीएससी रिपोर्ट्स के आधार पर लखनऊ के 89.84 प्रतिशत लोगों के घरों में शौचालय है, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या मात्र 65.6 प्रतिशत है।
ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वूमेन एसोसिएशन की सेकेट्री मधु गर्ग इस मामले में कहती हैं “उत्तर प्रदेश के अधिकांश ग्रामीणों के घरों में शौचालय न होने की बात से यह जाहिर है कि प्रदेश में महिलाओं की स्थिति कैसी है। अधिकतर महिलाओं को सुबह के समय खेतों में जाना पड़ता होगा और अगर बदकिस्मती से किसी महिला की तबियत खराब हो गई तो उसपर मुसीबतों का पहाड़ टूट जाता होगा। “

अलबेला त्यौहार

निले
रंग बिरंगा
बेहद प्यारा

होली का त्यौहार,

जम कर हस लो

और हसावो

कसो न मन के तार

रंग गुलाल

जम कर डालो

और जतलाओ प्यार,

घर से निकलो

बहार आओ

मत शरमाओ यार

मान शान की

बात छोड़कर

मारो व्यंग्य की मार,

कुछ इतराओ

कुछ मस्ताओ

यह अलबेला त्यौहार

जाड़े से मत घबराओ

चलती मस्त बयार,

गरमी तो अब

आने को है

हो जाओ स्वागत को तैयार 

****************
निलेश पाण्डेय 
VMW Team
India

सलमान का मुंह बंद करवाओ महामहिम

नोटिस और फटकार के बावजूद भी केंद्रीय कानून मंत्री की मुसलमानों के लिए आरक्षण पर बयानबाजी जारी रहने पर अब चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई है। चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर सलमान खुर्शीद के मामले में हस्तक्षेप का आग्रह किया है।
अपने पत्र में चुनाव आयोग ने कहा है कि नोटिस और फटकार लगाए जाने के बावजूद कानून मंत्री की बयानबाजी जारी है ऐसे में मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रपति को दखल देना चाहिए।
गौरतलब है कि मुस्लिम आरक्षण पर दिए गए बयान को लेकर चुनाव आयोग ने सलमान खुर्शीद को फटकार लगाई थी लेकिन इसके बावजूद भी सलमान खुर्शीद की इस मुद्दे पर बयानबाजी जारी रही।

सलमान ने अपने ताजा बयान में कहा है कि वो मुसलमानों को आरक्षण दिलवाने के लिए फांसी पर चढ़ने को भी तैयार हैं। सलमान  ने चुनाव आयोग को चुनौती देते हुए यह भी कहा है कि चुनाव आयोग रहे न रहे लेकिन मुसलमानों को आरक्षण मिलकर रहेगा।
सलमान के इस बयान के बाद ही चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की शिकायत की है। पत्र में राष्ट्रपति से हस्तक्षेप करने के लिए कहा है।
सलमान खुर्शीद के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा प्रवक्ता ने मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि कानून मंत्री डंके की चोट पर गैर कानूनी काम कर रहे हैं। अब प्रधानमंत्री को सीधे तौर पर इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए।

भगवद्ग गीता

पंडित नगनारायण पाठक
रूस में किसी संगठन ने भगवद्ग गीता  को प्रतिबंधित करने के लिए मुकदमा दायर किया, तो अपने देश में भी कई हलकों से विरोध के स्वर सुनाई पड़े। पर अजीब बात है कि जब भारत में ही अदालत जाकर गीता पढ़ाना बंद करने की मांग होती है, तो ऐसा प्रतिवाद नहीं दिखता! जब रूस में मुकदमा हुआ, लगभग उसी समय कर्नाटक के स्कूलों में गीता पढ़ाने को ‘असांविधानिक’ कहकर न्यायालय में चुनौती दी गई थी। कर्नाटक में गीता पढ़ाने का कार्यक्रम सरकारी नहीं था, न उसमें सरकारी धन लगने वाला था। वह एक प्रतिष्ठित मठ का प्रयास था, ताकि छात्रों को नैतिक शिक्षा मिले। सरकार ने केवल स्कूलों को इसके लिए सप्ताह में एक घंटा समय देने भर का निर्देश दिया था। इसी को न्यायालय से रोकने का आग्रह हुआ।

गीता के विरुद्ध न्यायालय जाने वाले संगठनों के अध्यक्ष की दलील थी, ‘तब तो कल कोई कुरान और बाइबिल भी पढ़ाना चाहेगा। यदि स्कूलों में मजहबी किताबें पढ़ाई जाने लगेंगी, तो विद्यार्थियों का क्या होगा?’ इस तर्क में दोहरी गलती थी। पहला यह कि गीता मजहबी पुस्तक नहीं है। और दूसरा यह कि जिनके प्रतिनिधि न्यायालय गए, उन्हीं अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में कुरान, हदीस पढ़ाए जा रहे हैं। उन संस्थाओं को न केवल अनुदान मिलता है, बल्कि उनके प्रमाणपत्रों को सामान्य शिक्षा संस्थानों के समकक्ष भी मान्यता दी जा रही है। फिर, विभिन्न ईसाई मिशनरी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों में बाइबिल भी पढ़नी जरूरी होती है। कई जगहों पर छात्रों को उसकी परीक्षा भी देनी होती है।
रूस वाले प्रसंग पर आपत्ति करने वालों को कभी अपने देश के इस दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य पर भी मुंह खोलना चाहिए। यहां गीता को शिक्षा से बाहर रखना एक सचेत जबर्दस्ती है। गैर-हिंदू मजहबी शिक्षण को प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों रूपों में आधिकारिक सहयोग और प्रोत्साहन तक दिया जाता रहा है, जबकि भारतीय ज्ञान-परंपरा की हर चीज से हिंदुओं समेत सबको वंचित रखने की जिद ठानी गई है। यह निर्विवाद है कि गीता कोई धार्मिक पुस्तक नहीं है। कई अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रबंधन संस्थानों में इसका अध्ययन पाठ सामग्री में शामिल है, ताकि काम को ठीक ढंग से करने की प्रेरणा, चरित्र और बुद्धि मिल सके। अल्बर्ट श्वाइतजर, अल्डस हक्सलेस, हेनरी थोरो, टॉल्सटॉय जैसे विश्व की अनेकानेक महान शख्सियतों ने इस पुस्तक को दुनिया का यथार्थ समझने के लिए अनमोल रचना माना है। लिहाजा इसका विरोध ही एक घातक सांप्रदायिक दृष्टि है।
विडंबना है कि स्वतंत्र भारत में वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि कालजयी ग्रंथों को न ज्ञान-भंडार का सम्मान मिला, न धर्म-पुस्तक का। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय में रामायण को जिस कुत्सित रूप में पढ़ाने की चेष्टा हो रही है, वह इसका लाक्षणिक उदाहरण है। केवल भर्त्सना करने, खिल्ली उड़ाने के लिए ही ‘मेनी रामायन्स’ और ‘३०० रामायण’ जैसे पाठ विषय वस्तु में डाले जाते हैं। किंतु जब गीता या रामायण को सहजता से पढ़ने-पढ़ाने का प्रस्ताव हो, तब उन्हें ‘रिलीजियस’ कहकर विद्यार्थियों को दूर रखने का प्रयत्न होता है। इस दोहरेपन को क्या कहें?
अपने देश में हो रहे इस दोहरे अन्याय को ईसाइयत के उदाहरण से भी समझा जा सकता है, जैसा द विंची कोड, एंजेल्स ऐंड डीमंस आदि पुस्तकों, फिल्मों से भी स्पष्ट है। पश्चिमी समाज बाइबिल और चर्च की कथाओं, भूमिकाओं की आलोचनात्मक व्याख्या करता है और सहता है। किंतु साथ ही ईसाइयत का पूरा चिंतन, चर्च और वेटिकन के विचार, भाषण, प्रस्ताव, आदि यूरोप की शिक्षा प्रणाली का अभिन्न अंग हैं। वहां ईसाइयत संबंधी शिक्षा-विषय उसी तरह स्थापित हैं, जैसे भौतिकी, रसायन, अर्थशास्त्र आदि विषय। अतः यदि यूरोपीय जगत ईसा और ईसाइयत की कथाओं, ग्रंथों की आलोचनात्मक व्याख्या करता है, तो उससे पहले उसके संपूर्ण अध्ययन को एक सहज विषय के रूप में मुख्य शिक्षा-प्रणाली में सम्मानित आसन भी देता है, लेकिन अपने देश में ऐसा नहीं है। आलम यह है कि हिंदू ग्रंथों को उपेक्षित करने के लिए ही इसे जब चाहे धर्म-पुस्तक मानकर बहिष्कृत किया जाता है, अथवा सामान्य साहित्य मानकर जैसे-तैसे चीरा-फाड़ा जाता है। यह दोहरापन हर हाल में बंद होना चाहिए।

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पंडित नगनारायण पाठक
संजाव, देवरिया
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ट्रस्ट का टर्नओवर करीब ११०० करोड़

भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे बाबा रामदेव ने विशाल कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर रखा है। उनके सबसे करीबी विश्वासपात्र आचार्य बालकृष्ण ३४ कंपनियों के डायरेक्टर हैं। ये सभी कंपनियां केवल पांच साल, याने २००६ से २०११ के बीच अस्तित्व में आईं। सीबीआई और आयकर विभाग ने अब अपनी नजर इन कंपनियों पर डाली है। जानकारी के अनुसार प्रारंभिक जांच में बाबा के दो ट्रस्ट पतांजलि योगपीठ ट्रस्ट और दिव्य योग मंदिर को निशाने पर लिया गया है। ये ट्रस्ट उत्तराखंड के हरिद्वार में करीब १००० एकड़ जमीन पर बने हुए हैं। २००९-२०१० में इन दोनों ट्रस्ट का टर्नओवर करीब ११०० करोड़ आंका गया। और यदि इन सभी ३४ कंपनियों का टर्न ओवर आंका जाए, तो यह कई करोड़ रुपए होगा। बाबा के विश्वसनीय सलाहकार आचार्य बालकृष्ण इन सभी कंपनियों के डायरेक्टर हैं। पतंजलि आयुर्वेद, जो इन सभी कंपनियों में सबसे बड़ी मानी जाती है की वेबसाइट पर भी बालकृष्ण की जबर्दस्त तारीफ है। इसके अनुसार आचार्य बालकृष्ण को प्रबंधन, प्रशासन और इंजीनियरिंग क्षेत्र का काफी व्यापक अनुभव है औऱ विश्व के कई जाने माने लोग उनसे संपर्क कर, सीखने की कोशिश करते हैं। केंद्र सरकार के कार्पोरेट मामलों के मंत्रालय में उपलब्ध जानकारी के अनुसार ये कंपनियां दवाएं, कॉस्मेटिक्स, उर्जा आदि क्षेत्रों की हैं। यही नहीं आचार्य रियल इस्टेट में भी सक्रिय हैं। आटार्य बालकृष्ण की कंपनियों में पतांजलि आयुर्वेद लिमिटेड, दिव्य फार्मेसी योग, आरोग्य हर्बल, झारखंड मेगा फुड पार्क, दिव्य फार्मा और डायनामिक बिल्डकॉम शामिल हैं। आचार्य बालकृष्ण जिन दूसरी कंपनियों के डायरेक्टर हैं उनमें टीवी प्रोडक्शन और ब्राडकास्टिंग के क्षेत्र में वैदिक आस्था भजन ब्राडकास्टिंग प्राइवेट लिमिटेड और वैदिक ब्राडकॉस्टिंग लिमिटेड भी हैं। इनके अलावा बालकृष्ण पतांजलि आयुर्वेद लिमिटेड, पतांजलि बिस्किस्ट्स प्राइवेट लिमिटेड, पतांजलि एरोमैटिक्स प्राइवेट लिमिटेड, पतांजलि टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड, पतंजलि फ्लेक्सीपार्क प्राइवेट लिमिटेड, पतंजलि परिवहन प्राइवेट लिमिटेड और पतंजलि हाइ़ड्रोपोनिक्स प्राइवेट लिमिटेड भी चला रहे हैं।

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