Tag Archives: समीक्षा

तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने

बस यही दौड़ है इस दौर के इन्सानो की
तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने
तू रहे पीछे और मैं सदा आगे
ऐसी कोई बात या करामात बने
निंदा हो या हो आलोचना
करता तू है यही आराधना
की मैं न आगे निकलु तेरे से
इसके लिए ही करुगा साधना
गया जमाना मदद , सहयोग का
लगता है ये कुछ हठयोग सा
अगर न माना इनकी बात
तो करते है ये काम लठयोग का
कैसे होगा दूर ये सब
कौन कराएगा नैया पार
गर यही चलता रहा तो निल्को
फस जाएगे बीच मझधार
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एम के पाण्डेय निल्को
आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!

‘सुर-तरंग’ संगीत प्रतियोगिता संपन्न

राजस्थान की प्रतिभाओ को एक मंच प्रदान करने वाली राज्य स्तरीय संगीत प्रतियोगिता ‘सुर-तरंग’ आज जयपुर में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ | इस दौरान बड़ी संख्या में प्रतिभागियों हिस्सा ने लिया और संगीत विधा में प्रतिभागियों ने अपनी-अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेरा | बच्चों में साहित्य, संगीत और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संचालित रविन्द कला मंच और संगम कला ग्रुप कि ओर से आयोजित यह कार्यक्रम द रूट्स पब्लिक स्कूल शिव कॉलोनी लक्ष्मी नगर जयपुर में संपन्न हुआ | कार्यक्रम की शुरुआत अवंतिका ग्रुप के राष्टीय अध्यक्ष श्री आनंद अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर किया उनके साथ श्रीमती मधु सूद , श्री आर सी सूद मौजूद रहे | जज के रूप में श्री शिवाजी शिव, श्री सुनील जयपुरी, श्रीमती उषा जोया और श्री सुदेश शर्मा जी नज़र आये |

गायन के सब जूनियर वर्ग (फ़िल्मी) में अनन्या गौतम, वस्सु और नमन क्रमशः प्रथम, द्दितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया वही गैर फ़िल्मी में क्रिशन बालूदा और मोनिका को क्रमशः प्रथम और द्दितीय स्थान मिला | जूनियर वर्ग (फ़िल्मी) में नंदिनी,साना, और मोहक विजयी हुए तथा गैर फ़िल्मी में आर्यन ने अपना लोहा मनवाया | सीनियर वर्ग (फ़िल्मी) में राहुल भालिया , सुनील शर्मा विक्रम सैन ने क्रमशः प्रथम, द्दितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया वही सीनियर वर्ग (गैर फ़िल्मी) में मोसिन खान और बादल पारिक ने अपने गीतों से जजों को खुश किया | विजेताओं के साथ-साथ सैकड़ों अन्य छात्र-छात्राओं और गणमान्य नागरिकों ने भी सुगम संगीत का आनंद लिया | विजेताओ को श्री डी वी नेहरा मेमोरियल अवार्ड से सम्मानित भी किया गया |

प्रतियोगिता के मुख्य आयोजक श्री अलोक सूद ने बताया कि विजयी टीम को राष्टीय स्तर पर दिल्ली में राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया जायेगा | संस्था के राजस्थान अध्यक्ष श्री आर सी सूद ने कहा की इसी मंच से सोनू निगम, श्रेया धोसले, सुनिधि चौहान, आनंद राज, पीनाज़, जैसे कई हीरे तरासे गए है | इस अवसर पर एम के पाण्डेय निल्को, अरविन्द सिंह, अशोक गुप्ता, प्रमोद शर्मा, पूजा राठी, मधुकर तिवारी, सुधीर, सुखविंदर, मनन सूद, स्वाति अग्रवाल आदि भी मौजूद रहे | अंत में कार्यक्रम संचालक श्री जय सूद ने सामारोह में उपस्थिति सभी लोगो के लिए का आभार व्यक्त किया |

प्राचार्य सेवाभावी शिक्षाकर्मी सम्मानित

 जयपुर|अवंतिका संस्था,नई दिल्ली द्वारा शुक्रवार को समाज के विशिष्ट गुणीजनों को रवींद्र कला केंद्र सभागार में सम्मानित किया गया। संस्था के राष्ट्रीय निदेशक आनंद अग्रवाल ने शिक्षा क्षेत्र से जुड़े निम्न प्राचार्यों सेवाभावी शिक्षा कर्मियों में सुमन वार्ष्णेय, मधु सूद, उषा जोया, सुखविंदर कौर, अरविंदर सिंह टक्कर, वीरेंद्र कुमार शर्मा, डॉ. स्नेहलता भटनागर, किरण पाल, स्नेहलता शर्मा, आलोक सूद, प्रद्युम्न कुमार शर्मा रेखा कोटवानी को ‘स्वामी विवेकानंद अवार्ड’ प्रदान किया गया

रविवारीय ज्ञान द्वारा एम के पाण्डेय निल्को

आज रविवार है आलस्य से भरा यह दिन मेरे लिए बातों की खिचड़ी पकाता है,  रविवार का दिन मेरे लिए शेयर मार्केट जैसा होता है कुछ भी निश्चित नहीं , कुछ भी कभी भी हो सकता है । जैसे अभी अभी ये विचार मन मे आया की……………………………………….

23 मार्च 1931 बलिदान दिवस

भारत की शान बढ़ाई है,
देकर अपनी कुर्बानी को।
है नाम उसी का भगत सिंह,
उसकी है नमन जवानी को।।

वो है महान माता जिसने,
ऐसे सपूत को जन्म दिया।
हम याद रखेंगे सदियों तक,
जिसने गोरों को तंग किया।।

मेरा रंग दे बसन्ती चोला,
जब किया तो गाके उमंग किया।
सच्चा जाबाज़ था भारत का,
जिसने आजीवन जंग किया।।

आज़ाद कराना है भारत,
ये बात कभी न वो भूला।
इक भगत मरा सौ आयेंगे,
ये कहकर ही फाँसी झूला।।

23 मार्च 1931 बलिदान दिवस पर भगत सिंह,सुखदेव व राजगुरु को कोटि कोटि प्रणाम।शत शत नमन….!!

Valentine Special – आग लगे इस वेलेंटाइन डे को

क्या रोज डे
क्या प्रपोज डे
क्या करे प्रॉमिस डे को
किसे किस करे किस डे को
जब गर्ल फ्रेंड ही नहीं हमारी तो
आग लगे इस वेलेंटाइन डे को
जिस के नीचे बया करते है प्यार अपना
थोड़ा प्यार करे उस पेड़ को
अक्सर धोखा खा जाते है इश्क मे लोग
क्योकि दिल की जगह जिस्म चाहने लगे है लोग
प्यार का प्रदर्शन कुछ इस तरह करते है लोग
जैसे लाज हया बेच आए है वे लोग
विरोधी नहीं है निल्को प्रेम का
मिलता है मुझे भी भेट सप्रेम का
किन्तु प्यार का प्रदर्शन न हो कुछ इस तरह
की लोग कहे की बेशर्म है ये देश का
राज तो अपना भी चला करता है
पसंद करने वालो के दिल मे
और नापसन्द करने वालो के दिमाग मे बसा करता है
देखो अपना तो सीधा सा फंडा है यार
7 days मनाओ वेलेंटाइन का प्यार
आप लोगो से विनीति है बार बार
ध्यान रखे प्यार के लिए न हो वार
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एम के पाण्डेय निल्को


हिन्दी भाषा मे हो रही मिलावट – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

     एम के पाण्डेय निल्को

हिन्दी विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। हिन्दी अपने आप में एक समर्थ भाषा है। इस देश में भाषा के मसले पर हमेशा विवाद रहा है। भारत एक बहुभाषी देश है। हिन्दी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली तथा समझे जाने वाली भाषा है इसीलिए वह राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकृत है। लेकिन आजकल अन्य भाषाओ जो हिन्दी के साथ घुसपैठ कर रही है यह एक विचारक बिन्दु है । जब से प्रिंट मीडिया खुल के सामने आई है तब से हिन्दी का अन्य भाषाओ के साथ मिलाप बढ़ गया है, ये शब्द ऐसे नहीं कि इनकी जगह अपनी भाषा के सीधे साधे बोलचाल के शब्द लिखे ही न जा सकते हों। जो अर्थ इन मिश्रित शब्दो से निकलता है उसी अर्थ को देने वाले अपनी हिन्दी की भाषा के शब्द आसानी से मिल सकते हैं। पर कुछ चाल ही ऐसी पड गई है कि हिन्दी के शब्द लोगों को पसंद नहीं आते । वे यथा संभव मिश्रित भाषा के शब्द लिखना ही ज़रूरी समझते हैं। फल इसका यह हुआ है कि हिन्दी दो तरह की हो गई है। एक तो वह जो सर्वसाधारण में बोली जाती हैए दूसरी वह जो पुस्तकों और अखबारों में लिखी जाती है। पुस्तकें या अखबारे लिखने का सिर्फ इतना ही मतलब होता है कि जो कुछ उसमें लिखा गया है वह पढ़ने वालों की समझ में आ जाय । जितने ही अधिक लोग उन्हें पढ़ेगे उतना ही अधिक लिखने का मतलब सिद्ध होगा । तब क्या ज़रूरत है कि भाषा क्लिष्ट कर के पढ़ने वालों की संख्या कम की जाय, मिश्रित भाषा के शब्दो से घ्रणा करना उचित नहीं किन्तु इससे खुद का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है । यह एक बड़ी विडंबना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो उस भाषा के प्रति घोर उपेक्षा व अवज्ञा का भाव हमारे राष्ट्रीय हितों की सिद्धि में कहाँ तक सहायक होंगे ? हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी प्रत्येक स्तर पर इसकी इतनी उपेक्षा क्यों ?

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या इस मुल्क में बिना भाषा के मिलावट के काम नही चला सकते । सफेदपोश लोगों का उत्तर है – हिन्दी में सामर्थ कहा है ? शब्द कहाँ है ? ऐसी हालत में मेरा मानना है कि विज्ञान, तकनीक, विधि, प्रशासन आदि पुस्तकों के सन्दर्भ में हिन्दी भाषा के क्षमता पर प्रश्न खड़े करने वालों को यह ध्यान देना होगा कि भाषा को बनाया नही जाता बल्कि वह हमें बनाती है। आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है। हिन्दी में हमें नए शब्द गढ़ने पड़ेंगे । भाषा एक कल्पवृक्ष के सामान होती है, उसका दोहन करना होता है। हिन्दी भाषा को प्रत्येक क्षेत्र में उत्तरोत्तर विकसित करना है। लेकिन इस तरफ़ कम ही ध्यान दिया गया है और अन्य भाषा को हिन्दी में मिलाकर आसान बनाने की कोशिश की गई । टीवी के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे धकेलना शुरू कर दिया और वहां प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी की जैसे नीम के पेड़ पर करेला चढ़ गया हो। इसी प्रकार से रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होता चला गया। लेकिन आज जो हिन्दी का स्तर गिरता दिखाई दे रहा है वह पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव के कारण हो रहा है। आज हर जगह लोग अंग्रेजी के प्रयोग को अपना भाषाई प्रतीक बनाते जा रहे हैं। अगर आज आप किसी को बोलते है कि यंत्र तो शायद उसे समझ न आए लेकिन मशीन शब्द हर किसी की समझ में आएगा। इसी प्रकार आज अंग्रेजी के कुछ शब्द प्रचलन में हैं जो सबके समझ में है। इसलिए यह कहना कि पूर्णतया हिन्दी पत्रकारिता या अन्य जगहो में सिर्फ हिन्दी भाषा का प्रयोग ही हो यह तर्क संगत नहीं है। हां यह जरूर है कि हमें अपनी मातृभाषा का सम्मान अवश्य करना चाहिए और उसे अधिक से अधिक प्रयोग में लाने का प्रयास करना चाहिए। भाषा के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग अपनी सहूलियत के हिसाब से होता रहा है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हम अभी भी यही मानते हैं कि अंग्रेजी हिंदी से बेहतर है। इसलिए जान बूझकर हिंदी को हिंगलिश बना कर काम करना पसंद करते हैं और ऐसा मानते हैं कि अगर मुझे अंग्रेजी नहीं आती तो मेरी तरक्की की राह दोगुनी मुश्किल है। भाषा आम समाज से अलग नहीं है, उसने भी अन्य बोलियों के साथ – साथ विदेशी भाषा के शब्दों को अपना लिया है। इसके साथ ही यह भी सही है कि विचारों की भाषा वही नहीं हो सकती जो बाज़ार में बोली जाती है। भाषा वही विकसित होती है जिसका हाजमा दुरुस्त होए जो अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने भीतर शामिल करके उन्हें पचा सके और अपना बना सके। हिन्दी में भी अनेक शब्द ऐसे हैं जिनके विदेशी स्रोत का हमें पता ही नहीं। शुद्ध हिन्दी वाले भले ही कक्ष कहें पर आम आदमी तो कमरा ही कहता है। भाषा में जितना प्रवाह होगा, वह लोगों की जुबान पर उतना जल्दी चढेगी भी , रोजमर्रा के जितनी करीब होगी लोगों का उसकी ओर आकर्षण उतना ही ज्यादा होगा और वह उतनी ही जल्दी अपनाई जाएगी । हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर हुए सर्वे में एक सुखद तथ्य सामने आया कि तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ी है। स्वीकार्यता बढ़ने के साथ – साथ इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी लोगों ने खुलकर राय व्यक्त की, मसलन लोगों का मानना है कि हिन्दी के अखबारों में अँग्रेजी के प्रयोग का जो प्रचलन बढ़ रहा है वह उचित नहीं है लेकिन ऐसे लोगों की भी तादाद भी कम नहीं है जो भाषा के प्रवाह और सरलता के लिए इस तरह के प्रयोग को सही मानते हैं। कुछ लोगो को ऐसे शब्दों का बढ़ता प्रचलन रास आ रहा है और कुछ लोग शब्दों की मिली – जुली इस खिच़ड़ी को मजबूरी में खा रहे हैं। 


एम के पाण्डेय ‘निल्को’

 आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!

हिंदी के मुहावरे

हिंदी के मुहावरे ,बड़े ही बावरे हैं
खाने पीने की चीजों से भरे हैं
कहीं पर फल है तो कहीं आटा दालें हैं
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले हैं
फलों की ही बात लेलो ,
आम के आम,गुठलियों के भी दाम मिलते हैं
तो कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे,खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं
कहीं दाल में काला है,
कोई डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाता है
तो कहीं किसी की दाल नहीं गलती,
कोई लोहे के चने चबाता है
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है
मुफलिसी में जब आटा गीला होता है ,
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है
सफलता के लिए पापड़ बेलना पड़ते हैं कई पापड आटे में नमक तो जाता है चल
पर गेंहू के साथ,घुन भी पिस जाता है
अपना हाल तो बेहाल है
ये मियां मुंह और मसूर की दाल है
गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं
और गुड़ का गोबर कर बैठते हैं
कभी तिल का ताड़,कभी राई का पर्वत बनता है
कभी ऊँट के मुंह में जीरा होता है ,
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है
किसी के दांत दूध के होते हैं ,
तो किसी को छटी का दूध याद आ जाता है
दूध का जला छांछ को भी फूंक फूंक पीता है ,
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है
शादी बूरे का लड्डू वो है ,
जो खाए वो भी पछताए,
और जो नहीं खाए, वो भी पछताता है
पर शादी की बात सुन ,मन में लड्डू फूटते हैं,
और शादी के बाद ,दोनों हाथों में लड्डू आते हैं
कोई जलेबी की तरह सीधा है , तो कोई टेढ़ी खीर है
किसी के मुंह में घी शक्कर है ,
सबकी अपनी अपनी तकदीर है
कभी कोई चाय पानी करवाता है ,
कोई मक्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है ,
तो सभी के मुंह में पानी आता है
भाई साहब अब कुछ भी हो ,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है
जितने मुंह हैं, उतनी बातें हैं
सब अपनी अपनी बीन बजाते हैं
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ,
सभी बहरे है, बावरें हैं।।

ये सब हिंदी के मुहावरे हैं।
VMW Group

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