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क्या भारत धीरे-धीरे घुसपैठ से इस्लामी राष्ट्र में बदल जायेगा?

कुछ अटपटा लगा होगा पढ़ कर, पहली बार ऐसा कोई पोस्ट कर रहा हूँ । क्या है कि एक सर्वे किया , लोगो से यही सवाल पूछा तो उन्होंने कुछ इस अंदाज में जवाब दिया – 

राजस्थान विश्वविद्यालय, पी एच डी हिंदी साहित्य की सुमन विष्ट का कहना है कि – वर्तमान मे ये सबसे ज्वलंत प्रश्न है। मै TV मे समाचार देख रही थी कि किस प्रकार से बंग्लादेश देश निर्माण के पश्चात असम मे घुसपैठ द्वारा मुस्लिम आ्बादी मे 30प्रतिशत इजाफा हुआ है जो कि चिन्तन के साथ चिन्तनीय है | ये तो एक राज्य की स्थिति है.आगे अन्य राज्यों के आकड़े आना तो बाकी है।
मुस्लिम आबादी का बढ़ने मे घुसपैठ का बहुत बड़ा योगदान रहा है ये भी कटु सत्य है। अब आगे इसका क्या स्वरूप होगा? ये पूरी तरह से प्रशासनिक नितियों व सरकारी कार्यवाही पर ही निर्भर करेगा।
भूतपूर्व सैनिक पुष्पेंद्र जी का कहना है कि – ऐसा लगातार हुआ है | इस्लाम के अनुयायी आज भी देश से प्यार नही करते | वे इस देश में केवल अपना प्रभुत्व चाहते है | वे हिन्दुओ को देखना नही चाहते | पाकिस्तान इसकी सबसे बड़ी मिसाल है |
वही नवीन गौड़ कहते है कि – इसका सीधा साधा जवाब हैं “नही”
घुसपैठ से हो रहा था लेकिन अब मोदी जी की सरकार हैं और सरकार,सरकार में फर्क हैं. क्योकि जिस तरह से हर रोज कांग्रेस के काले राज को लेकर खुलासे हो रहे हैं उससे हर हिन्दू को जागना ही होगा और अपने धर्म के लिए सोचना ही होगा. हिन्दू धर्म इतना सुदृढ़ हैं की इसे ख़त्म करना इतना आसन नही हैं किसी भी गलत धारणा वाले धर्म के लिए.
एक और बात की हम धन्य हैं की हमें मोदी जी जैसे प्रधानमंत्री मिले जिन्होंने हमेशा देश की सुरक्षा को महत्व दिया. और उन लोगो में अब बौखलाहट हैं जो कांग्रेस सरकार के काले शासन के चलते अपने मंसूबो में कामयाब होते रहे लेकिन अब ऐसा नही हो रहा हैं.
आजकल उत्तरप्रदेश में जिस तरह से पिछली सरकारों में सरकारी विद्यालयों का किया जाने वाला इस्लामीकरण पकड़ में आ रहा हैं उसे देखकर यही लगता हैं की यदि 2014 में मोदी जी की सरकार नही बनी होती तो जो ये प्रश्न पूछा गया हैं वो हकीकत बन रहा होता. क्योकि ऐसा नही की ये कारनामे पिछली गैरबीजेपी सरकारों को पता नही थी, पता होने के बावजूद भी ऐसा होने दिया जा रहा था केवल और केवल वोट और राजसुख के लिए, लेकिन जनता जगी और मोदी और योगी को सता सौपी जिसके परिणाम सामने आ रहे हैं , धर्म परिवर्तन के लिए दी जा रहे अवैध फंडिंग बंद कर दी गई हैं. इस्लामिक राष्ट्र तो क्या कोई भी शैतानी सोच हिन्दू धर्म और हिंदुस्तान का बाल भी बांका नही कर सकती हैं. जय हिन्द
तरह तरह के लोग और उनकी अपनी अपनी राय । पर सवाल का सही जवाब तो सही समय आपने पर ही पता चलेगा , इसी के साथ नए सवालों के साथ फिर हाज़िर होऊंगा तब तक के लिए नमस्कार । 

आपका एम के पाण्डेय निल्को

Padmaavat Movie Review : इतनी विवादों के बाद आखिरकार पद्मावत रिलीज हो ही गई

रानी पद्मिनी की बहादुरी और राजपूतों की शौर्य को बयां करती फिल्म पद्मावती जिसको हाल में पद्मावत कर दिया गया है । संजय लीला भंसाली द्वारा निर्मित इस फिल्म में दीपिका पादुकोण , रणवीर सिंह और शाहिद कपूर मुख़्य किरदार के रूप में है । मेवाड़ का गौरव और राजपूताना शौर्य की कथाएं इतनी कमजोर नहीं है कि किसी के तीन घंटे की फ़िल्म बना लेने से उनका इतिहास धूमिल हो जाए । फिर भी पद्मावत को लेकर हंगामा क्यों बरस रहा ? पूरे देश में करणी सेना इस फिल्म का विरोध कर रही है कई जगह आगजनी तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आ रही हैं  । राजपूत सुरक्षा के लिए होते थे वह सुरक्षा प्रदान करते थे लेकिन कुछ राजनीति लाभ के लिए यह सब करना ठीक नहीं । जितनी फिल्म विवादित रही उतना ही चर्चा में बनी रही और इस फिल्म की मार्केटिंग फ्री में ही पूरे देश में हो गई । संजय लीला भंसाली को बहुत बड़े-बड़े बैनर नहीं बनवाने पड़े । सबसे मजे की बात है यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दे दी फिर भी राज्य सरकार अपने राज्य में इस फिल्म को दिखाने के लिए मना कर दी । सेंसर बोर्ड सुप्रीम कोर्ट दोनों ने फिल्म को पास कर दिया जो विवादित सीन था उसे  हटा दिया गया उसके बाद भी इसको रिलीज न होने दिया जाए इसका क्या मतलब ठीक है । कोई भी फिल्म आने वाली पीढ़ी के लिए एक कहानी के रूप में एक इतिहास को बयां करती हुई नजर आती है यदि हम उसको ठीक तरीके से प्रस्तुत ना करें तो हम अपनी पीढ़ी को गलत चीज की जानकारी देते रहते हैं इसलिए सभी फिल्म निर्माता से निवेदन आग्रह है कि सही दिखाए क्या चीज सही है गलत है वह बहुत अच्छे ढंग से समझते भी है शायद इसीलिए पद्मावती या पद्मावत बहुत ज्यादा विवादित रही है । पता नहीं आप लोग की क्यो फिल्म का विरोध कर रहे है । मैं तो यह भी नहीं जानता कि आप लोगों ने फ़िल्म देखी भी है या नहीं । वैसे बता दे कि यदि किसी ने फिल्म देखी है वो यही कहता सुनाई दे रहा है कि फ़िल्म को देखने के बाद खिलजी के खिलाफ नफरत और बढ़ जाएगी यही नहीं राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती को इतने बेहतरीन तरीके में दर्शाया गया है की इन दोनों की वीरता की कहानी जैसी आपको इतिहास में दिखाइए पढ़ाई गई थी वैसा ही कुछ फिल्म में भी दर्शाया गया है । चाहे गोरा बादल हो चाहे राजा रतन सिंह रानी पद्मावती तक  किसी की भी सम्मान के साथ फिल्में में कोई समझौता नहीं किया गया है और हां आप का डर था की इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी को हीरो की तरह दर्शाया गया है माफ कीजिएगा ऐसा कुछ नहीं है अलाउद्दीन खिलजी को एक बड़ा किरदार के रूप में जरूर दिखाए गया है बाकी अब तो फ़िल्म रिलीज हो ही चुकी है देखते है की करनी सेना और सुप्रीम कोर्ट में कौन सम्मानीय है ।

एम के पाण्डेय निल्को

इक दो कौड़ी का जेहादी,सैनिक को थप्पड़ मार गया

कश्मीर घाटी में अक्सर सुरक्षाबलों पर ताकत के बेतहाशा प्रयोग और मानवाधिकारों के हनन के आरोप लगते हैं। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। सुरक्षाकर्मी ही अपने मान-सम्मान, जान को खतरे में डाल संयम बरतते हैं। इस हकीकत का खुलासा सुरक्षाबलों ने नहीं किया, इस कड़वे सच से पर्दा अलगाववादियों की समर्थक

हिंसक भीड़ ने अपनी उपलब्धियों का बखान करने के लिए सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो अपलोड कर उठाया। डियो में हिंसक भीड़ दो सुरक्षाकर्मियों को बुरी तरह पीटती हुई नजर आती है तथा सुरक्षाकर्मी भीड़ का प्रतिरोध करने की बजाए निरीह प्राणियों की तरह मार खा रहे हैं। एक अन्य वीडियो में कुछ लडक़े एक सीआरपीएफ जवान को लातों से पीट रहे हैं और जवान है कि मार खा रहा है। एक वीडियो है जिसमें डयूटी से लौट रहे जवानों के लडक़ों की भीड़ चल रही है। लडक़े बार-बार जवानों को उकसाते हुए कह रहे हैं कि गो इंडिया गो, जालिमों कश्मीर छोड़ दो। कुछ लडक़े जवानों की हेल्मेट उतार रहे हैं तो कुछ लडक़ों ने उनकी शील्ड तक छीन ली। एक लडक़े ने एक जवान का स्लीपिंग बैग भी नीचे गिरा दिया। भीड़ में शामिल एक लडक़ा उत्तेजित हो जवानों को गाली देते हुए मारपीट करने लगता है,लेकिन उसका दूसरा साथी उसे रोक लेता है। जवान देश की रक्षा के लिए हैं अपमान का घूंट पीने के लिए नहीं लेकिन कश्मीर जैसे संवेदनशील जगह पर शांति बनी रहे इसलिए हमारे देश के जवान अदम्य साहस के साथ अटूट धैर्य का परिचय देते हैं

Why do dogs run after the bikes ??

आखिर कुत्ते मोटर साइकिल के पीछे भागते क्यों है ? 

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Call Free होने से क्या होता है

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भूत-प्रेत क्या होते हैं ?

भूत-प्रेत के नाम से एक अनजाना भय लोगो की मन को सताता है।  इसके किस्से भी सुनने को मिल जाते है और लोग बहुत रुचि व विस्मय के साथ इन्हें सुनते है और इन पर बनें सीरियल, फिल्मे देखते है व कहानियाँ पढ़ते हैं। भूत-प्रेत का काल्पनिक मनः चित्रण भी लोगों को भयभीत करता है-रात्रि के बारह बजे के बाद, अँधेरे में, रात्रि के सुनसान में भूत-प्रेत के होने के भय से लोग़ डरते हैं। क्या सचमुच भूत-प्रेत होते है ? यह प्रशन लोगों के मन में आता है ? क्योंकि इनके दर्शन दुर्लभ होते है, लेकिन ये होते है। जिस तरह से हम वायु को नहीं देख सकते, उसे महसूस कर सकते हैं, उसी तरह हम भूत को नहीं देख सकते पर कभी-कभी ये अचानक देखे भी जाते है।  भूतों का अस्तित्व आज भी रह्स्य बना हुआ है।  इसलिए इनके बारे में कोई भी जानकारी हमें रोमांच से भर देती है। आखिर भूत है क्या ? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है।  परंपरागत तौर पर यही माना जाता है कि भूत उन मृतको की आत्माएँ हैं, जिनकी किसी दुर्घटना, हिंसा, आत्महत्या या किसी अन्य तरह के आघात  आकस्मिक मृत्यु हुई है।  मृत्यु हो जाने के कारण इनका अपने स्थुल शरीर से कोई संबंध नहीं होता।  इस कारण ये भूत-प्रेत देखे नहीं जा सकते।  चूँकि हमारी पहचान हमारे शरीर से होती हैं और जब शरीर ही नहिं है तो मृतक आत्मा को देख पाना और पहचान पाना मुश्किल होता हैं। भूत-प्रेतों को ऐसी नकारात्मक सत्ताएं माना गया है, जो कुछ कारणों से पृथ्वी और दूसरे लोक  बीच फँसी रहती हैं।  इन्हे बेचैन व चंचल माना गाया है, जो अपनी अप्रत्याशित मौत के कारण अतृप्त हैं।  ये मृतक आत्माएँ  कई बार छाया, भूतादि के रूप में  स्थानों  के पीछे लॉग जाती हैं, जिनसे जीवितावस्था में इनका संबन्ध या मोह था।

तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने

बस यही दौड़ है इस दौर के इन्सानो की
तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने
तू रहे पीछे और मैं सदा आगे
ऐसी कोई बात या करामात बने
निंदा हो या हो आलोचना
करता तू है यही आराधना
की मैं न आगे निकलु तेरे से
इसके लिए ही करुगा साधना
गया जमाना मदद , सहयोग का
लगता है ये कुछ हठयोग सा
अगर न माना इनकी बात
तो करते है ये काम लठयोग का
कैसे होगा दूर ये सब
कौन कराएगा नैया पार
गर यही चलता रहा तो निल्को
फस जाएगे बीच मझधार
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एम के पाण्डेय निल्को
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‘सुर-तरंग’ संगीत प्रतियोगिता संपन्न

राजस्थान की प्रतिभाओ को एक मंच प्रदान करने वाली राज्य स्तरीय संगीत प्रतियोगिता ‘सुर-तरंग’ आज जयपुर में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ | इस दौरान बड़ी संख्या में प्रतिभागियों हिस्सा ने लिया और संगीत विधा में प्रतिभागियों ने अपनी-अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेरा | बच्चों में साहित्य, संगीत और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संचालित रविन्द कला मंच और संगम कला ग्रुप कि ओर से आयोजित यह कार्यक्रम द रूट्स पब्लिक स्कूल शिव कॉलोनी लक्ष्मी नगर जयपुर में संपन्न हुआ | कार्यक्रम की शुरुआत अवंतिका ग्रुप के राष्टीय अध्यक्ष श्री आनंद अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर किया उनके साथ श्रीमती मधु सूद , श्री आर सी सूद मौजूद रहे | जज के रूप में श्री शिवाजी शिव, श्री सुनील जयपुरी, श्रीमती उषा जोया और श्री सुदेश शर्मा जी नज़र आये |

गायन के सब जूनियर वर्ग (फ़िल्मी) में अनन्या गौतम, वस्सु और नमन क्रमशः प्रथम, द्दितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया वही गैर फ़िल्मी में क्रिशन बालूदा और मोनिका को क्रमशः प्रथम और द्दितीय स्थान मिला | जूनियर वर्ग (फ़िल्मी) में नंदिनी,साना, और मोहक विजयी हुए तथा गैर फ़िल्मी में आर्यन ने अपना लोहा मनवाया | सीनियर वर्ग (फ़िल्मी) में राहुल भालिया , सुनील शर्मा विक्रम सैन ने क्रमशः प्रथम, द्दितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया वही सीनियर वर्ग (गैर फ़िल्मी) में मोसिन खान और बादल पारिक ने अपने गीतों से जजों को खुश किया | विजेताओं के साथ-साथ सैकड़ों अन्य छात्र-छात्राओं और गणमान्य नागरिकों ने भी सुगम संगीत का आनंद लिया | विजेताओ को श्री डी वी नेहरा मेमोरियल अवार्ड से सम्मानित भी किया गया |

प्रतियोगिता के मुख्य आयोजक श्री अलोक सूद ने बताया कि विजयी टीम को राष्टीय स्तर पर दिल्ली में राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया जायेगा | संस्था के राजस्थान अध्यक्ष श्री आर सी सूद ने कहा की इसी मंच से सोनू निगम, श्रेया धोसले, सुनिधि चौहान, आनंद राज, पीनाज़, जैसे कई हीरे तरासे गए है | इस अवसर पर एम के पाण्डेय निल्को, अरविन्द सिंह, अशोक गुप्ता, प्रमोद शर्मा, पूजा राठी, मधुकर तिवारी, सुधीर, सुखविंदर, मनन सूद, स्वाति अग्रवाल आदि भी मौजूद रहे | अंत में कार्यक्रम संचालक श्री जय सूद ने सामारोह में उपस्थिति सभी लोगो के लिए का आभार व्यक्त किया |

प्राचार्य सेवाभावी शिक्षाकर्मी सम्मानित

 जयपुर|अवंतिका संस्था,नई दिल्ली द्वारा शुक्रवार को समाज के विशिष्ट गुणीजनों को रवींद्र कला केंद्र सभागार में सम्मानित किया गया। संस्था के राष्ट्रीय निदेशक आनंद अग्रवाल ने शिक्षा क्षेत्र से जुड़े निम्न प्राचार्यों सेवाभावी शिक्षा कर्मियों में सुमन वार्ष्णेय, मधु सूद, उषा जोया, सुखविंदर कौर, अरविंदर सिंह टक्कर, वीरेंद्र कुमार शर्मा, डॉ. स्नेहलता भटनागर, किरण पाल, स्नेहलता शर्मा, आलोक सूद, प्रद्युम्न कुमार शर्मा रेखा कोटवानी को ‘स्वामी विवेकानंद अवार्ड’ प्रदान किया गया

रविवारीय ज्ञान द्वारा एम के पाण्डेय निल्को

आज रविवार है आलस्य से भरा यह दिन मेरे लिए बातों की खिचड़ी पकाता है,  रविवार का दिन मेरे लिए शेयर मार्केट जैसा होता है कुछ भी निश्चित नहीं , कुछ भी कभी भी हो सकता है । जैसे अभी अभी ये विचार मन मे आया की……………………………………….

23 मार्च 1931 बलिदान दिवस

भारत की शान बढ़ाई है,
देकर अपनी कुर्बानी को।
है नाम उसी का भगत सिंह,
उसकी है नमन जवानी को।।

वो है महान माता जिसने,
ऐसे सपूत को जन्म दिया।
हम याद रखेंगे सदियों तक,
जिसने गोरों को तंग किया।।

मेरा रंग दे बसन्ती चोला,
जब किया तो गाके उमंग किया।
सच्चा जाबाज़ था भारत का,
जिसने आजीवन जंग किया।।

आज़ाद कराना है भारत,
ये बात कभी न वो भूला।
इक भगत मरा सौ आयेंगे,
ये कहकर ही फाँसी झूला।।

23 मार्च 1931 बलिदान दिवस पर भगत सिंह,सुखदेव व राजगुरु को कोटि कोटि प्रणाम।शत शत नमन….!!

Valentine Special – आग लगे इस वेलेंटाइन डे को

क्या रोज डे
क्या प्रपोज डे
क्या करे प्रॉमिस डे को
किसे किस करे किस डे को
जब गर्ल फ्रेंड ही नहीं हमारी तो
आग लगे इस वेलेंटाइन डे को
जिस के नीचे बया करते है प्यार अपना
थोड़ा प्यार करे उस पेड़ को
अक्सर धोखा खा जाते है इश्क मे लोग
क्योकि दिल की जगह जिस्म चाहने लगे है लोग
प्यार का प्रदर्शन कुछ इस तरह करते है लोग
जैसे लाज हया बेच आए है वे लोग
विरोधी नहीं है निल्को प्रेम का
मिलता है मुझे भी भेट सप्रेम का
किन्तु प्यार का प्रदर्शन न हो कुछ इस तरह
की लोग कहे की बेशर्म है ये देश का
राज तो अपना भी चला करता है
पसंद करने वालो के दिल मे
और नापसन्द करने वालो के दिमाग मे बसा करता है
देखो अपना तो सीधा सा फंडा है यार
7 days मनाओ वेलेंटाइन का प्यार
आप लोगो से विनीति है बार बार
ध्यान रखे प्यार के लिए न हो वार
********************
एम के पाण्डेय निल्को


हिन्दी भाषा मे हो रही मिलावट – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

     एम के पाण्डेय निल्को

हिन्दी विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। हिन्दी अपने आप में एक समर्थ भाषा है। इस देश में भाषा के मसले पर हमेशा विवाद रहा है। भारत एक बहुभाषी देश है। हिन्दी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली तथा समझे जाने वाली भाषा है इसीलिए वह राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकृत है। लेकिन आजकल अन्य भाषाओ जो हिन्दी के साथ घुसपैठ कर रही है यह एक विचारक बिन्दु है । जब से प्रिंट मीडिया खुल के सामने आई है तब से हिन्दी का अन्य भाषाओ के साथ मिलाप बढ़ गया है, ये शब्द ऐसे नहीं कि इनकी जगह अपनी भाषा के सीधे साधे बोलचाल के शब्द लिखे ही न जा सकते हों। जो अर्थ इन मिश्रित शब्दो से निकलता है उसी अर्थ को देने वाले अपनी हिन्दी की भाषा के शब्द आसानी से मिल सकते हैं। पर कुछ चाल ही ऐसी पड गई है कि हिन्दी के शब्द लोगों को पसंद नहीं आते । वे यथा संभव मिश्रित भाषा के शब्द लिखना ही ज़रूरी समझते हैं। फल इसका यह हुआ है कि हिन्दी दो तरह की हो गई है। एक तो वह जो सर्वसाधारण में बोली जाती हैए दूसरी वह जो पुस्तकों और अखबारों में लिखी जाती है। पुस्तकें या अखबारे लिखने का सिर्फ इतना ही मतलब होता है कि जो कुछ उसमें लिखा गया है वह पढ़ने वालों की समझ में आ जाय । जितने ही अधिक लोग उन्हें पढ़ेगे उतना ही अधिक लिखने का मतलब सिद्ध होगा । तब क्या ज़रूरत है कि भाषा क्लिष्ट कर के पढ़ने वालों की संख्या कम की जाय, मिश्रित भाषा के शब्दो से घ्रणा करना उचित नहीं किन्तु इससे खुद का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है । यह एक बड़ी विडंबना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो उस भाषा के प्रति घोर उपेक्षा व अवज्ञा का भाव हमारे राष्ट्रीय हितों की सिद्धि में कहाँ तक सहायक होंगे ? हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी प्रत्येक स्तर पर इसकी इतनी उपेक्षा क्यों ?

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या इस मुल्क में बिना भाषा के मिलावट के काम नही चला सकते । सफेदपोश लोगों का उत्तर है – हिन्दी में सामर्थ कहा है ? शब्द कहाँ है ? ऐसी हालत में मेरा मानना है कि विज्ञान, तकनीक, विधि, प्रशासन आदि पुस्तकों के सन्दर्भ में हिन्दी भाषा के क्षमता पर प्रश्न खड़े करने वालों को यह ध्यान देना होगा कि भाषा को बनाया नही जाता बल्कि वह हमें बनाती है। आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है। हिन्दी में हमें नए शब्द गढ़ने पड़ेंगे । भाषा एक कल्पवृक्ष के सामान होती है, उसका दोहन करना होता है। हिन्दी भाषा को प्रत्येक क्षेत्र में उत्तरोत्तर विकसित करना है। लेकिन इस तरफ़ कम ही ध्यान दिया गया है और अन्य भाषा को हिन्दी में मिलाकर आसान बनाने की कोशिश की गई । टीवी के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे धकेलना शुरू कर दिया और वहां प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी की जैसे नीम के पेड़ पर करेला चढ़ गया हो। इसी प्रकार से रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होता चला गया। लेकिन आज जो हिन्दी का स्तर गिरता दिखाई दे रहा है वह पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव के कारण हो रहा है। आज हर जगह लोग अंग्रेजी के प्रयोग को अपना भाषाई प्रतीक बनाते जा रहे हैं। अगर आज आप किसी को बोलते है कि यंत्र तो शायद उसे समझ न आए लेकिन मशीन शब्द हर किसी की समझ में आएगा। इसी प्रकार आज अंग्रेजी के कुछ शब्द प्रचलन में हैं जो सबके समझ में है। इसलिए यह कहना कि पूर्णतया हिन्दी पत्रकारिता या अन्य जगहो में सिर्फ हिन्दी भाषा का प्रयोग ही हो यह तर्क संगत नहीं है। हां यह जरूर है कि हमें अपनी मातृभाषा का सम्मान अवश्य करना चाहिए और उसे अधिक से अधिक प्रयोग में लाने का प्रयास करना चाहिए। भाषा के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग अपनी सहूलियत के हिसाब से होता रहा है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हम अभी भी यही मानते हैं कि अंग्रेजी हिंदी से बेहतर है। इसलिए जान बूझकर हिंदी को हिंगलिश बना कर काम करना पसंद करते हैं और ऐसा मानते हैं कि अगर मुझे अंग्रेजी नहीं आती तो मेरी तरक्की की राह दोगुनी मुश्किल है। भाषा आम समाज से अलग नहीं है, उसने भी अन्य बोलियों के साथ – साथ विदेशी भाषा के शब्दों को अपना लिया है। इसके साथ ही यह भी सही है कि विचारों की भाषा वही नहीं हो सकती जो बाज़ार में बोली जाती है। भाषा वही विकसित होती है जिसका हाजमा दुरुस्त होए जो अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने भीतर शामिल करके उन्हें पचा सके और अपना बना सके। हिन्दी में भी अनेक शब्द ऐसे हैं जिनके विदेशी स्रोत का हमें पता ही नहीं। शुद्ध हिन्दी वाले भले ही कक्ष कहें पर आम आदमी तो कमरा ही कहता है। भाषा में जितना प्रवाह होगा, वह लोगों की जुबान पर उतना जल्दी चढेगी भी , रोजमर्रा के जितनी करीब होगी लोगों का उसकी ओर आकर्षण उतना ही ज्यादा होगा और वह उतनी ही जल्दी अपनाई जाएगी । हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर हुए सर्वे में एक सुखद तथ्य सामने आया कि तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ी है। स्वीकार्यता बढ़ने के साथ – साथ इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी लोगों ने खुलकर राय व्यक्त की, मसलन लोगों का मानना है कि हिन्दी के अखबारों में अँग्रेजी के प्रयोग का जो प्रचलन बढ़ रहा है वह उचित नहीं है लेकिन ऐसे लोगों की भी तादाद भी कम नहीं है जो भाषा के प्रवाह और सरलता के लिए इस तरह के प्रयोग को सही मानते हैं। कुछ लोगो को ऐसे शब्दों का बढ़ता प्रचलन रास आ रहा है और कुछ लोग शब्दों की मिली – जुली इस खिच़ड़ी को मजबूरी में खा रहे हैं। 


एम के पाण्डेय ‘निल्को’

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हिंदी के मुहावरे

हिंदी के मुहावरे ,बड़े ही बावरे हैं
खाने पीने की चीजों से भरे हैं
कहीं पर फल है तो कहीं आटा दालें हैं
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले हैं
फलों की ही बात लेलो ,
आम के आम,गुठलियों के भी दाम मिलते हैं
तो कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे,खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं
कहीं दाल में काला है,
कोई डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाता है
तो कहीं किसी की दाल नहीं गलती,
कोई लोहे के चने चबाता है
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है
मुफलिसी में जब आटा गीला होता है ,
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है
सफलता के लिए पापड़ बेलना पड़ते हैं कई पापड आटे में नमक तो जाता है चल
पर गेंहू के साथ,घुन भी पिस जाता है
अपना हाल तो बेहाल है
ये मियां मुंह और मसूर की दाल है
गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं
और गुड़ का गोबर कर बैठते हैं
कभी तिल का ताड़,कभी राई का पर्वत बनता है
कभी ऊँट के मुंह में जीरा होता है ,
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है
किसी के दांत दूध के होते हैं ,
तो किसी को छटी का दूध याद आ जाता है
दूध का जला छांछ को भी फूंक फूंक पीता है ,
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है
शादी बूरे का लड्डू वो है ,
जो खाए वो भी पछताए,
और जो नहीं खाए, वो भी पछताता है
पर शादी की बात सुन ,मन में लड्डू फूटते हैं,
और शादी के बाद ,दोनों हाथों में लड्डू आते हैं
कोई जलेबी की तरह सीधा है , तो कोई टेढ़ी खीर है
किसी के मुंह में घी शक्कर है ,
सबकी अपनी अपनी तकदीर है
कभी कोई चाय पानी करवाता है ,
कोई मक्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है ,
तो सभी के मुंह में पानी आता है
भाई साहब अब कुछ भी हो ,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है
जितने मुंह हैं, उतनी बातें हैं
सब अपनी अपनी बीन बजाते हैं
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ,
सभी बहरे है, बावरें हैं।।

ये सब हिंदी के मुहावरे हैं।
VMW Group

बात बात पर अवरोध क्यों की हम स्वतंत्र है – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

बात-बात पर अवरोध,क्योकि हम स्वतंत्र हैं।
 एम.के.पाण्डेय “निल्को”

      नगर निगम ने कई दिनों से मोहल्लों का कचड़ा नहीं उठाया,लोगो ने रोड जाम कर दिया। गुस्सा बहुत था,इसलिए वाहनो पर पथराव किया गया । स्कूल मे मिड डे मील नहीं बना, छोटे बच्चों को लेकर अभिभावक सड़क पर आ गये । परिवहन विभाग के बसों के शीशे तोड़ दिये। शहर मे शोहदों ने किसी से छेड़खानी की। किसी शरीफ से नहीं देखा गया ,वह मना करने लगा तो विवाद हो गया । विवाद बढ़ा तो बात चक्काजाम पर आ गई। सिटी मजिस्ट्रेट ने समझाबुझा कर जाम समाप्त कराया । महाविद्यालय मे एडमिशन नहीं तो जाम ……. । बात-बात पर अवरोध, क्योकि हम स्वतंत्र हैं। हालत यह है की –
कुछ घरों मे मुश्किल है
सुबह-शाम चूल्हे जलाना,
बड़ा आसान हो गया है
बात-बात पर बस्ती जलाना।
      सामान्‍य रूप में आजादी का अर्थ पूर्ण तौर पर स्‍वतंत्र होना है , जिसमें किसी का भी कोई हस्‍तक्षेप न हो। पर मनुष्‍य के जीवन में वैसी आजादी किसी काम की नहीं , क्‍यूंकि इसमें उसके समुचित विकास की कोई संभावना नहीं बनती।  लेकिन आज स्वतंत्रता का मतलब बदल गया है। हम स्वच्छंद होते जा रहे है। 15 अगस्त 1947 से आज तक की राष्ट्रीय यात्रा का विश्लेषण करे तो बहुत कुछ अपेक्षित नहीं दिखाई दे रहा है। यहा अंग्रेज़ नहीं है,न उनकी व्यवस्था है। सब कुछ हमारा है, लेकिन हम संतुष्ट नहीं है। सत्ता के स्तर पर सबसे पहले तो केंद्र और राज्य सरकारें ही स्वतंत्र नहीं हैं। आज सब गोलमाल हो गया है। राज्य सरकारे उन मामलों में भी केंद्र पर निर्भर हैं, जिनमें उन्हें स्वतंत्र होना चाहिए। शरीर से हम भारतीय, दिल और दिमाग से पश्चिमी धारा के गुलाम हो गए। यह सब आज हमारे खान-पान,रीति-रिवाज़,बोल-चाल तथा पहनावे में साफ दिख रहा है। हमारे स्वतंत्र व्यवहार के कारण चहुंओर क्या दीख रहा है? अपने घर से ही शुरुआत करें? पढ़ाईलिखाई के कारण आत्मनिर्भरता आती है, आर्थिक उन्नति होती है। पर इस आत्मनिर्भरता ने व्यक्ति को स्वच्छंद बना दिया है। स्वच्छंदता स्वतंत्रता नहीं है।  स्वच्छंदता का आलम यह है कि देश की सामूहिक स्वतंत्रता को ध्वस्त करने के लिए न जाने कितने आतंकी, अलगाववादी और विध्वसंक संगठन खड़े हो गए। इन संगठनों के कारण समाज जितना तबाह हो रहा है, शायद साम्राच्यवाद के समय भी न हुआ हो।
      अंग्रेज़ो को केवल गालिया देकर स्वतंत्रा की जयकार करने से पहले यदि अपने आस-पास के पुलो,भवनो पर नज़र दौड़ाए, तो देखते है की इतने सालो पहले की बनी इमारत खड़ी होकर इठला रही है और जिस भवन, पुल को आज़ाद भारत के कमीशनबाज नेताओ,ठेकेदारो ने बनवाया है वह धराशायी हो गए । जबसे देश आजाद हुआ है हमने केवल अपने बारे में सोचा है. मेरा भारत महान कहने वाले कई लोग मिल जाते है परउसमे उनका क्या योगदान है ये वो नहीं बता पाते. मानो उनके यहाँ पैदा होने से ही ये देश महान हुआ हो. इस देश के लिए जो लोग कुर्बान हो गए उनके सपनोके भारत को हमने कही खो दिया है।  स्वतंत्रा के मतलब इतना बदल गए हैं कि किसी कवि कि यह लाइन बहुत ही सटीक बैठ रही है –
देखता हूं चलन सियासत का,
हर कहीं बैर के बवंडर हैं।
फर्क ऊंचाइयों मे है लेकिन,
नीचता मे सभी बराबर हैं।
      बहुत दुःख का विषय है कि स्वराज्यप्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी सामाजिक और राजनैतिक हालत इतने अधिक चिंताजनक हैं। समाज में स्वार्थ लगातार बढ़ रहा है। अपराध की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। आतंकवाद, नक्सलवाद, विदेशी घुसपैठ इत्यादि खतरे देश को चारों ओर से घेर रहे हैं। देश के किसी न किसी भाग से प्रतिदिन किसी आतंकवादी घटना,नक्सली हमले या किसी बम विस्फोट का समाचार अवश्य मिलता है और ऐसे कठिन समय में सरे मतभेद भुलाकर एक होने और इन हमलावरों को कुचलने कि बजाय हमभाषावाद, प्रांतवाद और मजहबी उन्माद से ग्रस्त होकर आपस में ही लड़ रहे हैं। या तो हमें सत्य दिखाई नहीं देता, या हम देखना ही नहीं चाहते। किसी को केवल अपनी जाति की चिंता है और कोई राष्ट्र की बजाय केवल किसी समुदायविशेष के हित को ही प्राथमिकता देता है।  जिस देश में युवावस्था का अर्थ बल, बुद्धि एवं विद्या होना चाहिए, वहाँ अधिकांश युवा इसके विपरीत धूम्रपान, मद्यपान और ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थों की चपेट में हैं। उनके जीवन में संयम, धैर्य तथा शान्ति का स्थान स्वच्छंदता, उन्मुक्त जीवन शैली तथा विवेकहीन उन्माद ने ले लिया है। अधिकांश युवाओं को क्रांतिकारियों की कम और क्रिकेट की जानकारी अधिक है। विदेशी वस्तुओं तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर, खादी को प्रतीक बनाकर स्वदेशी के प्रयोग का संदेश देने वाले महात्मा गाँधी के देश में आज कोने कोने तक विदेशी वस्तुओं के विक्रेता पुनः पहुँच गए हैं। जिस देश में कभीजय जवानजय किसानका मंत्र गूंजता था, वहाँ शासन की नीतियों से व्यथित होकर शहीद सैनिकों के परिजन सरकार को सभी पदक लौटा रहे हैं और किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं। सोने की चिडिया कहलने वाला देश छोटेछोटे कार्यों में आर्थिक सहायता के लिए कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, तो कभी विश्व बैंक की और देखता है। हमारी आर्थिक नीतियों से आज भी भारत की बजाय बाहरी देशों को ही अधिक लाभ हो रहा है। ऐसी स्थिति में हम कैसे कह सकते हैं की हम स्वतंत्र हैं?
      आज यह आवश्यक है कि देश आत्मविश्लेषण करे। देश, राज्य और व्यक्ति को स्वतंत्र बनाया जाए स्वच्छंद नहीं। सर्वधर्म समभाव, सर्वे भवंतु सुखिन: और तेन त्यक्तेन भुंजीथ: जैसे संबल हमारे पास हैं। अंत कि चार लाइनों को भी ध्यान से पढ़ कर आप अपने सुझाव या शिकायत VMW Team को लिखने के लिए स्वतंत्र है ।
हम तो स्वतंत्र होते हुए भी परतंत्र हैं
यहाँ ना खुशियाँ हैं, ना खिलखिलाहट
यहाँ तो चलता है बस आतंकवादी तंत्र
यह कैसा प्रजातंत्र है, यह कैसा लोकतंत्र
कोई हमें बतलाये तो
क्या यही स्वतंत्र है?
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 एम.के.पाण्डेय “निल्को”
+91-9024589902

 

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World Environment Day – 5 June (विश्व पर्यावरण दिवस)

अपनी आवाज़ उठाइये, समुद्र तल नहीं

World Environment Day (WED) celebrates its 12th Anniversary on Tuesday, 5th June 2011. World Environment Day (WED) is a day that spread awareness of the environment and enhances political attention and public action. Every year WED is celebrated on 5 June. It was the day that United Nations Conference on the Human Environment began. The United Nations Conference on the Human Environment was from 5–16 June 1972. It was established by the United Nations General Assembly in 1972. The first World Environment Day was on 1973. World Environment Day is similar to Earth Day. 


The 2014 theme for World Environment Day will focus on ‘Small Islands and Climate Change’, the official slogan for the year 2014 is ‘Raise Your Voice Not The Sea Level.


World Environment Day Quotes & Saying

“Give a man a fish, and he can eat for a day.  But teach a man how to fish, and he’ll be dead of mercury poisoning inside of three years.”
– Charles Haas
“When you use a manual push mower, you’re “cutting”down on pollution and the only thing in danger of running out of gas is you!  ”
– Grey Livingston
“It appears to be a law that you cannot have a deep sympathy with both man and nature.”
– Henry David Thoreau
“We have been god-like in the planned breeding of our domesticated plants, but rabbit-like in the unplanned breeding of ourselves.”
– Arnold Toynbee
“Human destiny is bound to remain a gamble, because at some unpredictable time and in some unforeseeable manner nature will strike back.”
– Rene Dubos


VMW Team और भूतो की हवेली भानगढ़ किला

हममें से कितने लोग भूतों में विश्वास करते हैं? क्या भूत वाकई में होते हैं? क्या भूतों को देखा जा सकता है? भूतों को मानने वाले तो इन प्रश्नों का जवाब हां में देंगे, मगर न मानने वाले इस धारणा को खारिज कर देंगे। लेकिन भूतों के ठिकाने देखना हर कोई चाहेगा और भानगढ़ जाना कुछ ऐसा ही है। इसे देश का सर्वाधिक डरावना स्थल माना जाता है। हिंदुस्तान को हमेशा से ही रहस्यों , आलौकिक शक्तियों, तंत्रविद्या का देश कहा गया है। जब बात तंत्र विद्या की हो और ऐसे में हम भूत प्रेतों का ज़िक्र न करें तो फिर कहे गए शब्द एक हद तक अधूरे लगते हैं। लेकिन आगे बढ़ने से पहले चंद सवाल। हम लोगों में से कितने ऐसे हैं जो ये मानते और विश्वास करते हैं कि आज भी इस दुनिया में बुरी आत्माओं और भूतों का अस्तित्त्व है? क्या हम किसी भी माध्यम से भूतों से मिल सकते हैं? क्या हम उन्हें देख सकते हैं, उन्हें महसूस कर सकते हैं?

भानगढ़, राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के एक छोर पर है। यहाँ का किला बहुत प्रसिद्ध है जो ‘भूतहा किला’ माना जाता है। इस किले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था। भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधो सिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया।
माधोसिंह के तीन बेटे थे। (१) सुजाणसिंह (२) छत्रसिंह (३) तेजसिंह। माधोसिंह के बाद छत्रसिंह भानगढ़ का शासक हुआ। छत्रसिंह के बेटा अजबसिंह थे। यह भी शाही मनसबदार थे। अजबसिंह ने आपने नाम पर अजबगढ़ बसाया था। अजबसिंह के बेटा काबिलसिंह और इस के बेटा जसवंतसिंह अजबगढ़ में रहे। अजबसिंह के बेटा हरीसिंह भानगढ़ में रहे (वि. सं. १७२२ माघ वदी भानगढ़ की गद्दी पर बैठे)। माधोसिंह के दो वंशज (हरीसिंह के बेटे)औरंग़ज़ेब के समय में मुसलमान हो गये थे। उन्हें भानगढ़ दे दिया गया था। मुगलों के कमज़ोर पड़ने पर महाराजा सवाई जयसिंह जी ने इन्हें मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया।

इस किले में प्रवेश करने वाले लोगों को पहले ही चेतावनी दे दी जाती है कि वे सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात् इस इस किले के आस पास समूचे क्षेत्र में प्रवेश ना करें अन्यथा किले के अन्दर उनके साथ कुछ भी भयानक घट सकता है। ऐसा कहा जाता है कि इस किले में भूत प्रेत का बसेरा है,भारतीय पुरातत्व के द्वारा इस खंडहर को संरक्षित कर दिया गया है।गौर करने वाली बात है जहाँ पुरात्तव विभाग ने हर संरक्षित क्षेत्र में अपने ऑफिस बनवाये है वहीँ इस किले के संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने अपना ऑफिस भानगढ़ से दूर बनाया है।

जयपुर और अलबर के बीच स्थित राजस्थान के भानगढ़ के इस किले के बारे में वहां के स्थानीय लोग कहते हैं कि रात्रि के समय इस किले से तरह तरह की भयानक आवाजें आती हैं और साथ ही यह भी कहते हैं कि इस किले के अन्दर जो भी गया वह आज तक वापस नहीं आया है,लेकिन इसका राज क्या है आज तक कोई नहीं जान पाया।
मिथकों के अनुसार भानगढ़ एक गुरु बालू नाथ द्वारा एक शापित स्थान है जिन्होंने इसके मूल निर्माण की मंज़ूरी दी थी लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी थी कि महल की ऊंचाई इतनी रखी जाये कि उसकी छाया उनके ध्यान स्थान से आगे ना निकले अन्यथा पूरा नगर ध्वस्त हो जायेगा लेकिन राजवंश के राजा अजब सिंह ने गुरु बालू नाथ की इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और उस महल की ऊंचाई बढ़ा दी जिससे की महल की छाया ने गुरु बालू नाथ के ध्यान स्थान को ढंक लिया और तभी से यह महल शापित हो गया।
एक अन्य कहानी के अनुसार राजकुमारी रत्नावती जिसकी खूबसूरती का राजस्थान में कोई सानी नहीं था।जब वह विवाह योग्य हो गई तो उसे जगह जगह से रिश्ते की बात आने लगी।

एक दिन एक तांत्रिक की नज़र उस पर पड़ी तो वह उस पर कला जादू करने की योजना बना बैठा और राजकुमारी के बारे में जासूसी करने लगा।
एक दिन उसने देखा कि राजकुमारी का नौकर राजकुमारी के लिए इत्र खरीद रहा है,तांत्रिक ने अपने काले जादू का मंत्र उस इत्र की बोतल में दाल दिया,लेकिन एक विश्वशनीय व्यक्ति ने राजकुमारी को इस राज के बारे में बता दिया।
राजकुमारी ने वह इत्र की बोतल को चट्टान पर रखा और तांत्रिक को मारने के लिए एक पत्थर लुढ़का दिया,लेकिन मरने से पहले वह समूचे भानगढ़ को श्राप दे गया जिससे कि राजकुमारी सहित सारे भानगढ़ बासियों की म्रत्यु हो गई।
इस तरह की और और भी कई कहानियां हैं जो भानगढ़ के रहस्य पर प्रकाश डालती हैं लेकिन हकीकत क्या है वह आज भी एक रहस्य है।
भानगढ़ का किला चहारदीवारी से घिरा है जिसके अंदर घुसते ही दाहिनी ओर कुछ हवेलियों के अवशेष दिखाई देते हैं। किले के आखिरी छोर पर दोहरे अहाते से घिरा चाार मंजिला महल है। किवदंतियों के अनुसार भानगढ़ का महल कभी सात मंजिला हुआ करता था लेकिन अब इसकी चार मंजिल ही सलामत हैं लेकिन उनमें भी ऊपरी मंजिल लगभग नष्ट हो चुकी है तथा तीसरी मंजिल भी इस कदर जर्जर हो चुकी हैं जो कभी भी भरभरा कर गिर सकती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग जिस तरह से इस महल का संरक्षण कर रहा है वह भी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है।

जर्जर होती उऊपरी मंजिलों की दीवारों पर आधा-अधूरी लिपाई की गई है। तीसरी और चौथी मंजिल पर आज भी महल की राजशाही का गवाह रहे संगमरमर और पत्थरों के दरवाजे मौजूद हैं लेकिन उनकी सार-संभाल तक नहीं की जा रही है। 99 फीसदी कमरों की छतें गिर चुकी हैं और जो मौजूद हैं वे भी गिरने की कगार पर हैं। कमरों की ढह रही छतें उनकी प्राचीनता का अहसास तो कराती हैं लेकिन उनके संरक्षण में लापरवाही को भी उजागर करती हैं। महल की दीवारें जिस तरह से छलनी नजर आती हैं उससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि खजाने की तलाश में बीते दशकों में किस बेदर्दी से इन्हें खोदा गया है। ऊपरी मंजिल में महल की दीवारों और कमरों के मलबे का ढेर लगा है जिसमें मौजूद नक्काशीदार पत्थर इस बात का अहसास कराते हैं कि कभी यह महल कितना संपन्न रहा होगा। दूसरी मंजिल में बाहर से तो दीवारों और सीढिय़ों की मरम्मत की गई है लेकिन अंदर के कमरों की बदहाली देखने से ही नजर आती है। कमरों की दीवारें और छतें चमगादड़ों की बींट से खराब होती जा रही हैं लेकिन उनकी साफ-सफाई शायद सालों से नहीं की गई हैं। दिलचस्प बात यह है कि भानगढ़ के किले के अंदर मंदिरों में पूजा नहीं की जाती। गोपीनाथ मंदिर में तो कोई मूर्ति भी नहीं है। तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए अक्सर उन अंधेरे कोनों और तंग कोठरियों का इस्तेमाल किया जाता है जहां तक आम तौर पर सैलानियों की पहुंच नहीं होती। किले के बाहर पहाड़ पर बनी एक छतरी तांत्रिकों की साधना का प्रमुख अड्डा बताई जाती है। इस छतरी के बारे में कहा जाता है कि भानगढ़ की बरबादी का कारण रहा तांत्रिक सिंघिया वहीं रहा करता था। किले में स्थित महल तथा खंडहरों में सिंदूर, राख के ढेर, पूजा के सामान, चिमटों और त्रिशूलों के अलावा लोहे की मोटी जंजीरें भी मिलती हैं जो तांत्रिक अनुष्ठानों का सबूत हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने किले के द्वार पर एक बोर्ड लगा रखा है। इस पर लिखा है कि सूर्यास्त के बाद से लेकर सूर्योदय तक किले के अंदर पर्यटकों के रुकने पर मनाही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस भी व्यक्ति ने सूर्यास्त के बाद अंदर रुकने की कोशिश की है, वह लापता हो गया है। लिहाजा मन में कई सारे अनुत्तरित सवालों के साथ अन्य लोगों की तरह हमने भी ( योगेश जी, विजय जी, मधुलेश जी, अभिषेक जी,मोहक जी, सिद्धार्थ जी, निलेश जी, सुन्दरम जी) सूर्यास्त से पहले उस स्थान को छोड़ दिया।

Bhangarh is a town in India that is famous for its historical ruins

बज गई चुनावी रणभेरी- देश के इतिहास में अब तक का सबसे लंबा चुनाव

सोलहवीं लोकसभा के लिए होने जा रहा आम चुनाव देश के इतिहास में अब तक का सबसे लंबा होगा। कई मायनों में यह चुनाव ऐतिहासिक भी होगा क्योंकि इसमें कई प्रयोग पहली बार देखने को मिलेंगे।चुनाव 7 अप्रैल से शुरू होकर 9 चरणों 12 मई को संपन्न होंगे और वोटों की गिनती 16 मई को होगी। 

इस मौके पर संपत ने कहा कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं उन्हें नाम दर्ज कराने के लिए एक और मौका मिलेगा। संपत ने कहा कि 9 मार्च तक नए वोटरों को वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने का मौका दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए देश भर में करीब 9 लाख कैम्प लगाए जाएंगे।

सबको ध्यान में रखकर तारीखों का ऐलान मुख्य चुनाव आयुक्त वी.एस.संपत ने तारीखों का ऐलान करते हुए कहा कि पिछले 4 फरवरी को सभी दलों के साथ हुई बैठक में चुनाव से जुड़े सभी पहलुओं पर ध्यान दिया गया था। सभी पार्टियों की बातों को ध्यान में रखकर तारीखों का ऐलान किया गया है। उन्होंने तारीखों का ऐलान करते वक्त मॉनसून, त्योहारों परीक्षाओं सहित सभी बातों का ध्यान रखा गया है।

गौरतलब है कि 2009 में लोकसभा के चुनाव 16 अप्रैल से 13 मई के बीच 5 चरणों में हुए थे, यानी यह पहली बार होगा, जब देश में 9 चरणों में लोकसभा चुनाव होंगे।

कब कहां पड़ेंगे वोट

आंध्र प्रदेश: 30 अप्रैल, 7 मई
अरुणाचल प्रदेश: 9 अप्रैल
असम:12, 17 और 24 अप्रैल
बिहार: 10, 17, 24, 30 अप्रैल, मई 7 और 12 मई
छत्तीसगढ़: 10, 17 और 24 अप्रैल
गोवा: 17 अप्रैल
गुजरात: 30 अप्रैल
हरियाणा: 10 अप्रैल
हिमाचल प्रदेश: 7 मई
जम्मू-कश्मीर: 10, 17, 24, 30 अप्रैल और 7 मई
झारखंड: 10, 17 और 24 अप्रैल
कर्नाटक: 17 अप्रैल
केरल: 10 अप्रैल
मध्य प्रदेश: 10, 17 और 24 अप्रैल
महाराष्ट्र: 10, 17 और 24 अप्रैल
मणिपुर: 9 और 17 अप्रैल
मेघालय: 9 अप्रैल
मिजोरम: 9 अप्रैल
नगालैंड: 9 अप्रैल
ओडिशा: 10 और 17 अप्रैल
पंजाब: 30 अप्रैल
राजस्थान: 17 और 24 अप्रैल
सिक्कम: 12 अप्रैल
तमिलनाडु: 24 अप्रैल
त्रिपुरा: 7 और 12 अप्रैल
उत्तर प्रदेश: 10, 17, 24 और 30 अप्रैल, मई 7 और 12
उत्तराखांड : 7 मई
पश्चिम बंगाल: 17, 24, 30 अप्रैल, 7 और 12 मई
अंडमान और निकोबार: 10 अप्रैल
चंडीगढ़: 12 अप्रैल
दादर और नागर हवेली: 12 अप्रैल
दमन और दीव: 30 अप्रैल
लक्षद्वीप: 10 अप्रैल
पुड्डुचेरी: 24 अप्रैल

वोटिंग की रसीद
ईवीएम के नतीजों पर भी यदाकदा शक जताया जाता रहा है। इसका इलाज ढूंढ़ लिया गया है। वोटिंग के बाद ईवीएम से रसीद भी निकलेगी। हालांकि इस चुनाव में यह सुविधा हर किसी के लिए नहीं होगी। दरअसल फिलहाल ऐसी सिर्फ 600 मशीन है। जबकि 31 मार्च तक आयोग के पास अतिरिक्त 20 हजार मशीन आ जाएगी।
हवाई घोषणाओं पर पाबंदी
घोषणापत्र में मुफ्त उपहार बांटने से लेकर दिवास्वप्न दिखाने जैसी कई घोषणाएं वोटरों को लुभाती रही है। लेकिन इस बार चुनाव आयोग के दिशानिर्देश में ही घोषणापत्र बनाना होगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को दिशानिर्देश जारी कर दिया है।
नोटा का इस्तेमाल
हाल के विधानसभा चुनावों में तो नोटा (नन आफ द एबव) का इस्तेमाल हो चुका था। लेकिन पहली बार लोकसभा में भी वोटरों के पास अधिकार होगा कि वह सभी उम्मीदवारों के खिलाफ मतदान करें। 
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