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499/500 अंक पाने वाले मेधावी कितने विशिष्ट हैं !

भारतवर्ष मेधा की खान है । आदि गुरु शंकराचार्य ,स्वामी विवेकानंद ,वीरबालक अभिमन्यु के नाम से सभी परिचित हैं । आज कल कई ऐसे बच्चे टीवी पर दिखाये जाते हैं जो असाधारण जानकारियाँ प्रस्तुत कर सबको चकित कर देते है । लेकिन इनकी अद्भूत क्षमता जन्म से संभवतः माता पिता के द्वारा वंशानुगत रूप से प्राप्त हुई । किसी विद्यालय या शिक्षा बोर्ड के कोर्स  पर आधारित नहीं पायी जाती । ये अतिविशिष्ट होते है जो विद्यालय या शिक्षा बोर्डों से हरदम ऊपर रहे ।

             अब 499/500 या 498/500 अंक प्राप्त कर परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं को किस कोटि मे रखा जाय ? इस घटना को पूर्णता का कौन सा नाम दिया जाय ? आश्चर्य होता है कि किसी एक को भी 500/500 क्यों नहीं मिला ?  फिर भी , मै 499 या 498 को  परफेक्ट कहना चाहता हूँ । इसका सीधा अर्थ यह होता है कि प्रश्नपत्र निर्माता, माडरेटर , परीक्षक यानी उत्तरपुस्तिकाओ़ का मूल्यांकन कर्ता और परीक्षार्थी अर्थात मेधावी  ये सभी एक ही  हैं । तभी तो पूरे पूरे अंक मिले । यह शैक्षिक दृष्टि से कितना महत्व रखता है , यह तो शिक्षा शास्त्री ही बेहतर जानेंगे लेकिन एक बात निश्चित है कि एक साथ 75 से अधिक बच्चों का लगभग परफेक्ट हो जाना यह बताता है कि पाठ्यक्रम, शिक्षण, प्रश्नपत्र निर्माण , उनका उत्तर और मूल्यांकन सबकुछ घिसा-पिटा हो गया है । बस्तुनिष्ठता के चक्कर मे सृजनात्मकता नदारत । पूरे अंक मिलने के बाद इन्होंने बोर्ड को पीछे छोड़ दिया है , वाकई सभी बधाई के पात्र हैं ।

                  लिखित परीक्षा प्रणाली की खामियों की चर्चा बहुत की जाती है । इसलिए प्रेक्टिकल और प्रोजेक्ट आदि को लागू किया जाता है ताकि हमारे बच्चे कार्यात्मक दृष्टि से अधिक से अधिक सक्षम हों । लेकिन लिखित में प्राप्त पूर्ण अंकों को पूर्ण सफलता का आधार कोई नहीं मानता , और यहीं पर परीक्षा पद्धति और प्राप्तांकों की विश्वसनीयता वैधता घटने लगती है ।और आगे चलकर बहुतों के लिए यह मृगमरीचिका सिद्ध होने लगती है । इस बात से सभी बच्चों को अवगत कराते रहना सभी का दायित्व है । अच्छा तो तब हो जब हमारी परीक्षा पद्धति वास्तविक मेधा और प्रगतिशील क्षमता की पहचान करे न कि केवल पूर्ण अंक लाने और देने को ही अपना लक्ष्य बना ले ।  मेधावी बच्चों को शुभकामनाओं सहित । शुभमस्तु ।
                             —  —  — हरि शरण ओझा ।

स्वच्छता अभियान पर दो टूक – ब्रजेश पाण्डेय

सबसे पहले देश के दो महान सपूत बापू और शास्त्री जी को नमन। बापू ने स्वछता के प्रति हमें जगाया तो शास्त्री जी ने जय जवान-जय किसान का नारा दिया। स्वच्छ्ता अभियान का शुभारम्भ आज ही के दिन आदरणीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने किया। उन्हें भी मेरा कोटि-कोटि प्रणाम। लेकिन मन में एक सवाल चुभता है कि हम कितना स्वच्छ हैं और देश का जवान-किसान कितना खुशहाल। स्वच्छता अभियान को लेकर झाड़ू लगाने का दौर पिछले चार साल से चल रहा है। तकरीबन 50 फीसद हम सफल भी हुए हैं। यह आंकड़ा और भी बढ़ता जब हम सिर्फ मीडिया में स्वच्छता का ढोंग न रचते। जैसा की अपने कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं की आदत है। पहले अपने घर की गंदगी साफ़ करनी होगी।तन-मन दोनों की सफाई जरूरी है। लेकिन यहां तो सफाई का बजट भी साफ़ करने में बंदे पीछे नहीं हैं। बजट पर नहीं जाऊँगा क्योंक़ि सफाई मद पर जितना प्रदेश को मिलना था, एक तिहाई मिला। जो मिला उसमें से भी तथाकथित लोगों ने कमीशन बनना शुरू कर दिया। मेरा अपना विचार है कि जब तक करप्शन की सफाई नहीं होगी। संसद की गंदगी दूर नहीं की जायेगी, संपूर्ण स्वच्छ्ता पर बात बेमानी होगी।

अब बात जवानों और किसानों की। जवान सीमा पर कितना सुरक्षित हैं, आप जानते हैं। आपको यह भी पता होगा कि बापू, नेहरू और शास्त्री जी जैसे लोग कभी सुरक्षा में जवानों की फौज नहीं लेकर चलते थे। उनकी दृढ इच्छा शक्ति ही, उनके लिए ढाल का काम करता था। जब अच्छे-बुरे कर्मो का हिसाब-किताब करके इस दुनिया से सबको चले जाना है तो फिर नेताओं और मंत्रियों की सुरक्षा पर करोड़ो रुपये जनता का क्यों खर्च हो रहा। इस रकम से तो देश की सीमा को और भी मजबूत किया जा सकता है। किसान जिंदगी भर मेहनत करते-करते सिर्फ दो जून की रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा और रहने के लिए दो कमरे बना लेता है, लेकिन वह तो कभी लक्जरी गाडी में बैठने का भी सपना नहीं देख पाता। तो फिर क्या शास्त्री जी का नारा अधूरा नहीं लगता। बात कड़वी जरूर लगेगी मित्रों, लेकिन सही मायने में सबका साथ, सबका विकास का दंभ भरने वाली अपनी सरकार सिर्फ अपने नेताओं और पूंजीपतियों के लिए ही कार्य कर रही है।
यदि मेरी बातें आपको बुरा लगे तो क्षमा कीजियेगा।
सादर
ब्रजेश पाण्डेय
दैनिक जागरण गोरखपुर

सरकार, छोड़िये ब्लैकमेल की राजनीति, जनता तो हिसाब मांगेगी।

लूला-लँगड़ा हो चुके विपक्ष से आप यह उम्मीद लगाकर बैठेंगे, कि सरकारी लूट का ए विरोध करेंगे तो इस मुग़ालते में मत रहिए। सरकार का विरोध करने के लिए किसी के पास कूबत नहीं है। थोड़ी कूबत राहुल ने दिखा दी तो आपने उसे मानसिक बीमार बता डाला। मुलायम सिंह यादव, मायावती बोलेंगे नहीं, क्योंकि आय से अधिक सम्पप्ति का मामला सरकार उछाल कर इन्हें अंदर कर सकती है। जब प्रेस कांफ्रेंस में नथुने बहुत जोर-जोर से फड़क रहे हों तो इसका मतलब यही होता है कि दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा है। रविशंकर प्रसाद नथुने फड़काते हुए प्रेस काँफ्रेंस में आये। ठीक उसी तरह जैसे अमित शाह जी के लाडले जय शाह के बचाव में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल आये थे।
वैसे दोनों मामलों में एक अंतर है। पीयूष गोयल देश के पहले ऐसे केंद्रीय मंत्री बने थे जो किसी प्राइवेट सिटीजन पर लगे चार-बीसी के इल्जामों का बचाव करने आये हों। प्रसाद जी मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री हैं, इस नाते उन्हे प्रधानमंत्री की ओर से बोलने का पूरा हक है। आप पूछ सकते हैं कि मामला रक्षा मंत्रालय का था, तो फिर निर्मला सीतारमन क्यों नही, नथुने तो उनके भी बराबर फड़कते हैं।
आपका पता होना चाहिए कि यह सर्जिकल स्ट्राइक वाली सरकार है। कब कहां से स्ट्राइक हो जाएगा पता नहीं। कृषि मामलों में गृह मंत्री, गृह संबंधित मामलों पर रक्षा मंत्री और रक्षा से जुड़े मामलों पर आईटी मंत्री। जैसे टोटल हॉकी के नये फॉरमेंट में कभी डिफेंडर आगे बढ़ जाता है और कभी फॉरवर्ड गोल बचाने के लिए पीछे चला आता है। पात्रा जी तो मैनेजर हैं ही।
रविशंकर प्रसाद बहुत तगड़े डिफेंडर हैं। वकालत में कोई सानी नहीं है। आंखे निकालकर चंगू-मंगुओं को डराना भी जानते हैं।
  हद देखिये,  रवि बाबू ने राफेल सौदे पर लगे अति गंभीर इल्जामों के जवाब में पहले पूरे नेहरू-गांधी खानदान की कुंडली बांची। मैं इंतज़ार कर रहा था कि वे कहेंगे कि हम लोगों ने मोहन जी के सामने शपथ ली है कि अगली सात पीढ़ियों तक इस घटिया खानदान में बेटे या बेटी का ब्याह नहीं करेंगे। लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं कहा। यह मास्टर स्ट्रोक आगे लिए बचा लिया।
देश इंतज़ार कर रहा था कि रवि बाबू राफेल विमान की कीमत निकालकर कांग्रेसियों के मुंह पर दे मारेंगे। पर कुछ न हुआ न होगा क्योंकि चोर चोर मौसेरे भाई

लड़का BY : TRIPURENDRA OJHA

लड़का:
हमारे इस पुरुषप्रधान समाज में लड़का पैदा होना अच्छा माना जाता है लेकिन उस लड़के को ये बात साबित करने में जो दुश्वारियां , जो त्याग , जो संघर्ष करना पड़ता है ये समाज को नहीं दिखता।
एक लड़का लाड़,प्यार,दुलार,फटकार,लात,जूतों ,मार आदि का झंझवात झेल कर जैसे तैसे बड़ा होता है..माँ बाप शुरू से ही अपनी उम्मीदों का बड़ा सा बोझ डाल देते है, डॉक्टर ,इंजीनियर साइंटिस्ट पता न क्या क्या..
+2 तक जाते जाते लड़का indication दे देता है कि मां बाप का investment कैसा return देने वाला है.
+2 के बाद क्या करना है ये guide करने वाले कम पूछने वाले ज्यादा होते हैं, कुछ प्रतिभाएं यहाँ से ITI और POLYTECHNIC कर के certified मजदूर बन जातीं हैं,तो कुछ IIT,PMT की PREPARATION की अग्निपरीक्षा को खड़ीं होतीं हैं। तो किसी का शुरू होता है वो दौर जब graduation pursuing कॉलेज से आकर बिना खाये पिए किसी बुकस्टाल पर vacancy देख रहा होता है, फॉर्म खरीदना ,भरना और पढाई के साथ साथ तैयारी नौकरी की…कहीं भी जाओ सबसे ज्यादा दिमाग झंड करने वाला सवाल लोग पूछते हैं क्या कर रहे हो आज कल?
कुछ नहीं graduation चल रहा है..(मन में चल क्या रहा घिसट रहा है.)..
जवाब दे दे कर ‘लड़का’ झंड हो रहा होता है कि %कितना है का दूसरा गोला धम्म।
Graduation के तीन साल में लड़के से लगभग 1095×10 बार हित-रिश्तेदार पूछ ही लेते कि बेटा क्या कर रहे हो?
कुछ लोग तो कसम से इतने खडूस होते हैं कि खुद की जिंदगी में भले कुछ न कर पाएं हो लेकिन मिलते ही अपने बड़े होने का अहसास दिलाते रहते हैं..
लड़के का सबसे मुश्किल दौर जब graduation complete हो जाता है और अब उसे किसी के सहारे की जरूरत है ..मार्गदर्शन की। बजाय उसके उसपे लोग और हमलावर हो जाते हैं। अब आगे की कहानी उसकी है जो ये झेल कर आगे बढ़ रहे हैं अधिकतर तो यहीं give up कर जातें है और एक विशेष ठप्पे के साथ जिंदगी काटने लगते हैं ।
लड़का असुरक्षा की भावना के साथ,समाज से अलग..रिश्तों से अलग तमाम परीक्षाओं की तैयारी करता हैं अब उसके माँ बाप भी उसका सपोर्ट छोड़ने लगते हैं ..थोड़े थोड़े पैसे के लिए कीच कीच..बात बात पर खुद का खर्च निकालने की नसीहत ..यहाँ लड़का कुछ भी करने को ठानता है ..कुछ भी।
छोटे लेवल की नौकरी, प्राइवेट नौकरी, अपने सारे सपनों को दरकिनार कर…अपने अरमानों को कुचल कर ,अपनी प्रतिभाओं के साथ समझौता करने को तैयार..
‘माँ 10हजार की नौकरी है’
‘तो क्या बेटा 5000 भी खर्च करोगे तो 5000 बचेंगे ही न’
साथ साथ तैयारी भी करते रहना अच्छी नौकरी का तब तक ये करो..
……..*************************************************************************************************….
अब तक आपने पढ़ा कि एक लड़का अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में कैसा कैसा अनुभव लेता है रोजगार पाने के पहले..अब आगे
इस बेरोजगारी से जूझती दुनिया में जब एक लड़का घर की माली हालत को परख, अपने अरमानों की बलि चढ़ा के परिस्थितियों से समझौता कर बैठता है और घर छोड़ देता है चंद रुपयों के लिए, जिससे वो खुद भी संतुष्ट नहीं ये जानकर भी कि मेरी योग्यता कहीं इससे ज्यादा है ,मैं इससे भी अच्छा कर सकता हूँ लेकिन इतना परिस्थितियां इतना मोहलत कहाँ देती हैं ,आख़िरकार लड़के को नौकरी मिल जाती है।बैंक क्लर्क,शिक्षक,रेलवे,सेना,प्राइवेट नौकरियां तमाम तरह की सुरसायें गरीब विलक्षण प्रतिभाओं को निगल जाती है …इस बात की अनुभूति तब होती है जब वो लड़का खुद से कमजोर लेकिन आर्थिक रूप से मजबूत सहपाठी को तरह तरह के ऊंचाइयों को छूते देखता है ..ये नौकरियां पैसे और बेहतर जिंदगी तो देती हैं लेकिन जब बेमन की नौकरी हो तो वो सुकून नही दे पातीं खैर बंदा ये सोच के सन्तोष कर लेता है कि कुछ को तो ये भी नसीब नहीं।
नौकरी पाने के बाद कुछ लोग पूछते हैं सैलरी बढ़ी? कुछ पूछते हैं शादी कब कर रहे हो? कुछ पूछते हैं प्रमोशन कब होगा? लेकिन कोई ये नही पूछता खुश हो कि नहीं?
घर छोड़ देता है लड़का , नौकरी लग गई है अब जा रहा है अपने कर्मभूमि के तरफ .आज पहले से कुछ ज्यादा अनुभवी लग रहा है,आज कहीं बचपना नहीं झलक रहा।
चेहरे पर अजीब सी गंभीरता लिए हुए,दिमाग में तरह तरह के मूक प्रश्न और प्रत्युत्तरों का दौर चल रहा है
बैग पैक हो गया है दैनिक जरूरतों का सामान भर दिया गया है साथ में घर वालों का प्यार भी..अब यह वो समय है जब वो छोड़ जायेगा,अपनी प्यारी साइकिल जिसे कोई और छूता तक न था, अपना क्रिकेट बैट,अपनी पुरानी जीन्स, कुछ बॉल्स जो बक्से में थीं, वो ज्योमेट्री बॉक्स जिसमें रखे थे कुछ दुर्लभ चीजें,अपनी किताबें,अपने नोट्स…अपना बचपना..अपनी जिंदगी..।
मां की आँखे भर आईं है जो चिल्लाती थी देर तक सोने पर,बहन को पीटने पर ..उसके पिता जी आये हैं स्टेशन तक छोड़ने ..ट्रैन ने जैसे ही स्टेशन छोड़ा सीने में अजीब सा हो जाता है भींग जाती है बेडशीट की कुछ किनारियां जो ऊपरी बर्थ पर बिछा के लड़का सोने का अभिनय कर रहा है..सारी बातें याद आ रही है..तमाम विचारों के मकड़जाल में उलझा हुआ चला जाता है अपने घर से दूर अपने परिवार से दूर..
नौकरी में आने के बाद भी चुनौतियां कम नहीं हुई है..
तमाम असुविधाओं से लड़ना है जिसमे बाहर का खाना मुख्य है। खुद के सेहत पर कोई ध्यान कैसे दे ये तो आता ही नहीं ,कभी दिया ही नहीं..माँ रात को उठा के दूध जबरदस्ती पिलाती थी तो गुस्सा आता था लगता था ये तो बस खाना का एक हिस्सा है..वैसे ही लापरवाही होती है और लड़का बीमार हो जाता है..तब समझ में आता है खुद का खयाल कैसे रखना है…कैंटीन होटल का खाना खा खा के ऊबने के बाद..खुद बनाता है और खाता है ..घर में तरह तरह के नखरे दिखाने वाला ..आज बासी, आधी जली आधी कच्ची रोटियों को देख के हँसता हुआ लड़का भी जनाब बहुत संघर्ष करता है।

-त्रिपुरेंद्र ओझा ‘निशान’


(ये मेरे अपने निजी विचार हैं ये लेख किसी बात को सही और किसी बात को गलत नहीं ठहराता है)

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कश्मीर में जेहादियों द्वारा सैनिकों को थप्पड़-लात मार कर अपमानित करने पर एक सैनिक की सरकार से अपील को बंया करती मेरी नयी कविता- गौरव चौहान

(कश्मीर में जेहादियों द्वारा सैनिकों को थप्पड़-लात मार कर अपमानित करने पर एक सैनिक की सरकार से अपील को बंया करती मेरी नयी कविता)
रचनाकार-कवि गौरव चौहान उ प्र
9557062060

दिल्ली में बैठे शेरों को सत्ता का लकवा मार गया,
इस राजनीति के चक्कर में सैनिक का साहस हार गया,

मैं हूँ जवान उस भारत का,जो “जय जवान” का पोषक है,
जो स्वाभिमान का वाहक है जो दृढ़ता का उद्घोषक है,

मैं हूँ जवान उस भारत का, जो शक्ति शौर्य की भाषा है,
जो संप्रभुता का रक्षक है,जो संबल की परिभाषा है,

उस भारत की ही धरती पर ये फिर कैसी लाचारी है,
हम सैनिक कैसे दीन हुए,अब कहाँ गयी खुद्दारी है?

“कश्मीर हमारा” कहते हो,पर याचक जैसे दिखते हो,
तुम राष्ट्रवाद के थैले में,गठबंधन करके बिकते हो,

वर्दी सौंपी,हथियार दिए,पर अधिकारों से रीते हैं,
हम सैनिक घुट घुट रहते है,कायर का जीवन जीते हैं,

छप्पन इंची वालों ने कुछ ऐसे हमको सम्मान दिए,
कागज़ की कश्ती सौंपी है,अंगारो के तूफ़ान दिए,

हर हर मोदी घर घर मोदी,यह नारा सिर के पार गया,
इक दो कौड़ी का जेहादी,सैनिक को थप्पड़ मार गया,

अब वक्ष ठोंकना बंद करो,घाटी में खड़े सवालों पर,
ये थप्पड़ नही तमाचा है भारत माता के गालों पर,

सच तो ये है दिल्ली वालों,साहस संयम से हार गया,
इक पत्थरबाज तुम्हारे सब,कपड़ों को आज उतार गया,

इस नौबत को लाने वालों,थोड़ा सा शर्म किये होते,
तुम काश्मीर में सैनिक बन,केवल इक दिवस जिए होते,

इस राजनीती ने घाटी को,सरदर्द बनाकर छोड़ा है,
भारत के वीर जवानों को नामर्द बना कर छोड़ा है,

अब और नही लाचार करो,हम जीते जी मर जायेंगे,
दर्पण में देख न पाएंगे,निज वर्दी पर शर्मायेंगे,

या तो कश्मीर उन्हें दे दो,या आर पार का काम करो,
सेना को दो ज़िम्मेदारी,तुम दिल्ली में आराम करो,

थप्पड़ खाएं गद्दारों के,हम इतने भी मजबूर नही,
हम भारत माँ के सैनिक हैं,कोई बंधुआ मजदूर नहीं,

मत छुट्टी दो,मत भत्ता दो,बस काम यही अब करने दो,
वेतन आधा कर दो,लेकिन कुत्तों में गोली भरने दो,

भारत का आँचल स्वच्छ रहे ,हम दागी भी हो सकते है,
दिल्ली गर यूँ ही मौन रही,हम बागी भी हो सकते हैं,
——कवि गौरव चौहान

Why do dogs run after the bikes ??

आखिर कुत्ते मोटर साइकिल के पीछे भागते क्यों है ? 

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