Tag Archives: व्यंग

Why do dogs run after the bikes ??

आखिर कुत्ते मोटर साइकिल के पीछे भागते क्यों है ? 

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जौ के ठेकाने ना, सतुआने के तैयारी – भोजपुरी व्यंग्य -एन डी देहाती

14 अप्रेल 17 के सतुआन ह। अब लखनऊआ , दिल्लिहिया कहि दिहे सतुआन का होला। पुरबिहन से पूछ ल। सतुआन के पुरवर परिभाषा बता दीहें। सतुआ भी एगो संस्कृति ह, सादगी के, समानता के, सहजता के। पुरनिया लोग बहुत पहिले से सतुआन मनावेलन। हमहुँ मनाईलन। लोग जौ बोअल छोड़ दिहल जेकरा चलते सतुआ पर संकट आ गईल बा।
हिन्दू पतरा परम्परा में सौर मास के हिसाब से सुरूज देवता जहिआ कर्क रेखा से दखिन के ओर जाले तहिये मेष संक्राति लागेला। ओहि के सतुआन कहल जाला। एहि दिन से खरमास के भी समाप्ति हो जाला आ रडूहन के शादी विवाह होखल शुरू हो जाला।
जवन असकतिहा सालों साल ना नहात होइहैं उहो सतूआन के दिन जरूर नहा लेलन। एही से कहल गईल- असकतिहन के तीन नहान।
खिचड़ी, फगुआ औ सतुआन।।
सतुआन के बहुत तरह से बनावल जाला, सामान्य रूप से आज के दिन जौ के सत्तू गरीब असहाय के दान करे के प्रचलन बा। आज के दिन लोग स्नान पावन नदी गंगा में करे ला, पूजा आदि के बाद जौ के सत्तू, गुर, कच्चा आम के टिकोरा आदि गरीब असहाय के दान कइल जाला आ इष्ट देवता, ब्रह्मबाबा आदि के चढ़ा के प्रसाद के रूप में ग्रहण कइल जाला। ई काल बोधक पर्व संस्कृति के सचेतना, मानव जीवन के उल्लास आ सामाजिक प्रेम प्रदान करेला। पूर्वांचल में चाहे केहू केतनो अमीर होखे आज के दिन सादगी में मनावे खातिर सतुआ के ही भोग लगायी। गावँ से उजड़त गोनसार( भूजा भुजने का चूल्हा , जो गोंड जाति का परम्परागत पेशा रहा), समहुत में जौ के बुआई, नेवान में जौ के भुनल बालि के परसादी अब दुलम होत बा। भाई हो जौ ना बोआई त सतुआ कहा से आयी। सतुआन के पर्व हमे याद दिलावेला। सतुआ के। सतुआ खातित जौ जरूरी बा। जौ के जय जय कार कईल जा। डॉक्टर की कहला पर ना, अपनों विचार से थोड़ा बहुत जौ बोअल जा।
फेरू कबो भेंट होई त दूसरे टॉपिक पर बतकुचन होई। जय राम जी के।

बड़ा महत्त्व है

” बड़ा महत्त्व  है ”
—————————-
👉 ससुराल में साली का
👉 बाग  में  माली     का
👉 होठों  में  लाली    का
👉 पुलिस में  गाली   का
👉 मकान  में  नाली   का
👉 कान   में   बाली   का
👉 पूजा   में   थाली   का
👉 खुशी  में  ताली   का…. बड़ा महत्त्व है…
:
👉 फलों  में  आम  का
👉 भगवान में  राम  का
👉 मयखाने में  जाम का
👉 फैक्ट्री  में  काम  का
👉 सुर्खियों में  नाम  का
👉 बाजार  में  दाम  का
👉 मोहब्बत में शाम  का……. बड़ा महत्त्व है.
👉 व्यापार  में  घाटा  का
👉 लड़ाई  में  चांटा   का
👉 रईसों  में   टाटा   का
👉 जूत्तों  में  बाटा   का….. बड़ा  महत्त्व  है

👉 फिल्म  में  गाने  का
👉 झगड़े   में  थाने  का
👉 प्यार   में  पाने    का
👉 अंधों   में  काने   का
👉 परिंदों  में  दाने   का…….. बड़ा  महत्त्व है

👉जिंदगी में मोहब्बत का
👉 परिवार में इज्जत का
👉तरक्की में किस्मत का
👉 दीवानों में हसरत  का……. बड़ा महत्त्व है

👉 पंछियों में बसेरे  का
👉 दुनिया में सवेरे   का
👉 डगर   में  उजेरे  का
👉 शादी  में  फेरे   का…… बड़ा महत्त्व  है

👉 खेलों  में  क्रिकेट   का
👉 विमानों में   जेट    का
👉 शरीर    में   पेट   का
👉 दूरसंचार में  नेट  का…… बड़ा महत्त्व है

👉 मौजों  में  किनारों का
👉 गुर्वतों  में  सहारों   का
👉 दुनिया  में  नजारों का
👉 प्यार   में   इशारों  का…… बड़ा महत्त्व है

👉 खेत  में  फसल   का
👉 तालाब में कमल  का
👉 उधार  में  असल  का
👉 परीक्षा में  नकल  का….. बड़ा महत्त्व है

👉 ससुराल में जमाई का
👉 परदेश  में  कमाई का
👉 जाड़े  में  रजाई   का
👉 दूध   में  मलाई  का…….. बड़ा महत्त्व है

👉 बंदूक  में  गोली   का
👉 पूजा   में  रोली  का
👉 समाज में बोली  का
👉 त्योहारों में होली का
👉 श्रृंगार में रूप का……. बड़ा महत्त्व है

👉 बारात  में  दूल्हे  का
👉 रसोई  में  चूल्हे  का….. बड़ा महत्त्व है

👉 सब्जियों में  आलू का
👉 बिहाऱ   में   लालू  का
👉 मशाले में   बालू   का
👉 जंगल   में  भालू  का
👉 बोलने   में  तालू  का….. बड़ा महत्त्व है

👉 मौसम में सामण  का
👉 घर   में   आँगण  का
👉 दुआ  में  माँगण   का
👉 लंका  में  रावण   का….. बड़ा महत्त्व है

👉 चमन  में  बहार   का
👉 डोली  में  कहार   का
👉 खाने   में  अचार  का
👉 मकान में  दीवार  का…… बड़ा महत्त्व है

👉 सलाद  में   मूली  का
👉 फूलों    में  जूली   का
👉 सजा   में  सूली   का
👉 स्टेशन  में  कूली  का…… बड़ा महत्त्व है

👉 पकवानों  में  पूरी  का
👉 रिश्तों  में    दूरी   का
👉 आँखों  में   भूरी   का
👉 रसोई   में   छूरी   का…….. बड़ा महत्त्व है

👉 माँ    की   गोदी  का
👉 देश   में     मोदी  का…… बड़ा महत्त्व है

रावण को ही क्यों मारे?

सिर्फ पुरुष ही अपने अन्दर के रावण को क्यों मारें…?
स्त्रियों को भी चाहिये कि वो भी अपने अन्दर की कैकई, ताड़का, मंथरा और शूर्पणखा को मारें !

सादर
एम के पाण्डेय निल्को

हाल – ए – दिल क्या सुनाऊ

कहाँ छुपा के रख दूँ मैं अपने हिस्से की शराफत,
जिधर भी देखता हूँ उधर बेईमान खड़े हैं..
क्या खूब तरक्की कर रहा है अब देश देखिये,
खेतों में बिल्डर, सड़क पर किसान खड़े हैं….!!

तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने

बस यही दौड़ है इस दौर के इन्सानो की
तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने
तू रहे पीछे और मैं सदा आगे
ऐसी कोई बात या करामात बने
निंदा हो या हो आलोचना
करता तू है यही आराधना
की मैं न आगे निकलु तेरे से
इसके लिए ही करुगा साधना
गया जमाना मदद , सहयोग का
लगता है ये कुछ हठयोग सा
अगर न माना इनकी बात
तो करते है ये काम लठयोग का
कैसे होगा दूर ये सब
कौन कराएगा नैया पार
गर यही चलता रहा तो निल्को
फस जाएगे बीच मझधार
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एम के पाण्डेय निल्को
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रविवारीय ज्ञान द्वारा एम के पाण्डेय निल्को

आज रविवार है आलस्य से भरा यह दिन मेरे लिए बातों की खिचड़ी पकाता है,  रविवार का दिन मेरे लिए शेयर मार्केट जैसा होता है कुछ भी निश्चित नहीं , कुछ भी कभी भी हो सकता है । जैसे अभी अभी ये विचार मन मे आया की……………………………………….

हिंदी के मुहावरे

हिंदी के मुहावरे ,बड़े ही बावरे हैं
खाने पीने की चीजों से भरे हैं
कहीं पर फल है तो कहीं आटा दालें हैं
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले हैं
फलों की ही बात लेलो ,
आम के आम,गुठलियों के भी दाम मिलते हैं
तो कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे,खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं
कहीं दाल में काला है,
कोई डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाता है
तो कहीं किसी की दाल नहीं गलती,
कोई लोहे के चने चबाता है
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है
मुफलिसी में जब आटा गीला होता है ,
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है
सफलता के लिए पापड़ बेलना पड़ते हैं कई पापड आटे में नमक तो जाता है चल
पर गेंहू के साथ,घुन भी पिस जाता है
अपना हाल तो बेहाल है
ये मियां मुंह और मसूर की दाल है
गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं
और गुड़ का गोबर कर बैठते हैं
कभी तिल का ताड़,कभी राई का पर्वत बनता है
कभी ऊँट के मुंह में जीरा होता है ,
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है
किसी के दांत दूध के होते हैं ,
तो किसी को छटी का दूध याद आ जाता है
दूध का जला छांछ को भी फूंक फूंक पीता है ,
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है
शादी बूरे का लड्डू वो है ,
जो खाए वो भी पछताए,
और जो नहीं खाए, वो भी पछताता है
पर शादी की बात सुन ,मन में लड्डू फूटते हैं,
और शादी के बाद ,दोनों हाथों में लड्डू आते हैं
कोई जलेबी की तरह सीधा है , तो कोई टेढ़ी खीर है
किसी के मुंह में घी शक्कर है ,
सबकी अपनी अपनी तकदीर है
कभी कोई चाय पानी करवाता है ,
कोई मक्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है ,
तो सभी के मुंह में पानी आता है
भाई साहब अब कुछ भी हो ,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है
जितने मुंह हैं, उतनी बातें हैं
सब अपनी अपनी बीन बजाते हैं
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ,
सभी बहरे है, बावरें हैं।।

ये सब हिंदी के मुहावरे हैं।
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अच्छा लगता है बनाम अच्छा नहीं लगता – मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मधुलेश पाण्डेय निल्को
दोस्तो, आज पहली बार युग्म मे रचना प्रकाशित कर रहा हूँ , दोनों रचना एक ही सिक्के के दोनों पहलू है। आप अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से मुझे अवगत करा कर कृतार्थ करे , आप की इन प्रतिक्रियाओ से मुझे एक अलग प्रकार के आनंद की प्राप्ति होती है, यूं ही आपका स्नेह मिलता रहे, आप लोगो के इस हौसला अफजाई से एक नई रचना आप के सामने प्रस्तुत है 

(1)       अच्छा लगता है…..
वर्षा के मौसम में,
और घर के बालकनी में,
भीगना, अच्छा लगता है
शाम के समय में
और ‘निल्को’ के साथ में
कलम चलाना  अच्छा लगता है
रविवार के दिन मैं
और बाज़ार के भीड़ में
पहचान बनाना अच्छा लगता है
चांदनी रात में
और उनके साथ में
बातें करना अच्छा लगता है
सावन के महीने में,
और गर्मी के पसीने में
कूलर के आगे बैठना ही अच्छा लगता है
(२) अच्छा नहीं लगता…..
बाज़ार की भीड़ में
मैं भी खो जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता
अपने ही शहर में
घूम कर घर नहीं जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता
काम-काज के क्षेत्र में
उनकी तरह चुगली करना
मुझे अच्छा नहीं लगता
रचना प्रकाशित होने के बाद
पाठको की प्रतिक्रिया न मिलना
मुझे अच्छा नहीं लगता
इस भीड़ तंत्र में
गुमनाम सा ‘निल्को’ को जीना
मुझे अच्छा नहीं लगता

             मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’ 

प्रकृति का सफाई अभियान


गाँव शहर और सड़क तक भर गया पानी
और याद आ गई सबको अपनी नानी
तो निल्को ने कहा –
परेशान मत हो मेरे बाबू
क्योकि यंहा प्रकृति का सफाई अभियान है चालू
नदियो का पानी आपे से बाहर हो रहा
लोगो का जीवन इससे दुसवार हो रहा
जिसे लोग बाढ़ कह कर परेशान है
वह तो प्रकृति का सफाई अभियान है
प्रकृति अपनी सफाई अलग तरीके से करती है
यही बात तो लोगो को अखरती है
प्रकृति के इस बर्ताव से
मानवता घायल हो जाती है
और इस बरसात के मौसम मे
नदिया पागल हो जाती है
प्रकृति जब नि:शुल्क सब देती है
तो ब्याज सहित वसूलती है
प्रकृति कभी भी जेल बना देती है
और आगे विज्ञान भी फेल हो जाती है
जब – जब प्रकृति से छेड़-छाड़ हुई
नुकसान मनुष्य का होता है
यह अटल सत्य है
जिस पर विश्वास सभी का होता है
गर प्रकृति को किया परेशान
तो खुद परेशान हो जाओगे
नहीं बचेगा नामो-निशान
और आदिवासी कहलाओगे
कर रहा मधुलेश निवेदन
मत काटो हरियाली को
गर फिरा इसका दिमाग तो
नहीं दिखेगा यह बागवानी तो
###########################
 
मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

होली निकट आते ही कुछ …..


पानी बचाने के लिए अपना दैनिक व्यवहार बदलें, त्यौहार नहीं !!


होली निकट आते ही कुछ ……………… किस्म के लोग पानी बचाने का सन्देश देना शुरू कर देते हैं ! होली के अवसर पर पानी इनके लिए डीजल और पेट्रोल से भी ज्यादा कीमती हो जाता है ! होली ही क्यों भारतीय संस्कृति से जुड़ा हर त्यौहार इनके अनुसार पर्यावरण के लिए खतरा है ! दीपावली आने पर इन्हें सीधी ओजोन परत दिखाई देती है ! नदियों का प्रदुषण केवल गणेश चतुर्थी पर नजर आता है !


अब होली पर पुनः एक बार ऐसा माहोल बनाया जा रहा है कि पानी मिले रंग से होली खेलने पर पूरा देश सूखा और अकाल से ग्रस्त हो जाएगा ! इन ……………. में कुछ धूर्त गणितज्ञ भी होते हैं जो होली के दिन कितने लाख/करोड़ गैलेन पानी बर्बाद होगा, इसका भी हिसाब लगाकर अखबारों में छपवा देते हैं ! अब इन मूर्खों को कौन समझाए कि अपनी आवश्यकता के अनुसार पानी संग्रहण का काम बरसात में होता है ! उस समय ये प्राणी पता नहीं किस शाख पर बैठे रहते है ??

मेरा सभी मित्रों से अनुरोध है कि पानी बचाने के लिए अपने दैनिक व्यवहार को बदलें, त्यौहार को नहीं ! वर्ष पर पानी बचाएं लैकिन होली को होली की तरह मनाएँ !!

Congres’s Shivir in Jaipur


fpUru f’kfoj budh vkSj————–
lquk gS vkt ‘kgj esa
dkaxzls dk fpUru f’kfoj gS!
fpUru budh vkSj fpUrka, gekjh c<+h gS!
bu usrkvksa ds pDdj esa]
xkM+h gekjh tke esa [kM+h gS!
gksVy esa os ysVs gS!
vkSj i;ZVd jksM ij gS!
gkykr ,sls gS fd—-
Lokxr esa izÑfr us Hkh
vksys ,oa ckfj’k ls vfHkuUnu dh gS!
xj turk ds chp esa vk,
rks ‘kk;n blls vPNk gks——–
yksxksa us Lokxr es iksLVj ij dkfyd iksrh gS]
bu lc ckrksa ls fpUru de
fpUrk T;knk c<+h gS!
lekt dh fpUrk de
pquko dh fpUrk T;knk gS!
vHkh&vHkh xqtjkr ls gkj ds ykSVs gS!
vc jktLFkku dh ckjh gS!
dbZ izns’kksa esa fudy jgh budh gok lkjh gS!
fpUru esa lHkh feydj <+wa<saxs budh nok
vkSj vkxs D;k gksxk] fdldks D;k irk–
dgus dh ^fuYdks* dh ;gh gS viuh vnk!
 ,e-ds-ik.Ms; ^fuYdks*
gj[kkSyh] ykj jksM] lyseiqj] nsofj;k ¼m-iz-½

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धन्यवाद ………! 
आपकी प्रतीक्षा में …. 
VMW Team 
The Team With Valuable Multipurpose Work
 vmwteam@live.com 
+91-9044412226;+91-9044412223 
+91-9024589902;+91-9261545777

दूसरों को बिगाड़ने की लिये, अनेकों मिल जायेंगे,

तेरी औकात भी है मेरी तरफ देखने की?

दानदाता ने एक रूपए का सिक्का फेंका तो वह बजाए भिखारी के डिब्बे में गिरने के सड़क पर जा गिरा। भिखारी ने दानदाता को दुआएं देते हुए सिक्का उठाकर डिब्बे में डाल लिया। तभी कहीं से हंसने की आवाज आई, खिलखिलाकर हंसने की! एक रूपए के सिक्के ने क्रोध से चौंककर आसपास देखा तो उसे पास की दुकान के शानदार शो-केस में रखा पांच सौ रूपए का नोट दिखा, खिलखिलाकर हंसता हुआ!  ‘गुस्से से क्या देख रहा है।’ पांच सौ रूपए का नोट गर्वोक्ति से बोला ‘तेरी औकात भी है मेरी तरफ देखने की? और जहां तक हंसने का सवाल है तो भिखारी को दी जाने वाली चीज सड़क पर गिर जाए तो हंसी आ ही जाती है।’
‘कोई बात नहीं, हंस लो, खूब हंस लो’ एक रूपए के सिक्के ने शांति से जवाब दिया ‘पर जरा बाद में अपने बारे में भी सोच लेना। हमें पाकर भिखारी दाता को दुआएं ही देता है। हमें या दाता को शक की नजर से नहीं देखता, हमारी असलियत नहीं परखता।’

हां जी, रंग बोलते हैं

हां जी, रंग बोलते हैं
रंग बोलते हैं, हां जी, रंग बोलते हैं।
रंग जाती गोरी
गोरी के अंग बोलते हैं।

बम भोले जय जय शिवशंकर
चकाचक्क बनती है,
लाल-लाल छन्ने में भैया
हरी-हरी छनती है। वैसे नहीं बोलते
पीकर भंग बोलते हैं।

रंग विहीन, हृदय सूने
और बड़े-बड़े बैरागी,
हृदयहीन, गमगीन, मीन
या वीतरागिये त्यागी, घट में पड़ी
कि साधू भुक्खड़ नंग बोलते हैं।

हल्ला ऐसा हल्ला दिल की
मनहूसी हिल जाए,
रूसी-रूसी फिरने वाली
कलियों-सी खिल जाए। आओ खेलें –
साली-जीजा संग बोलते हैं।

होली तो हो ली, अब
बोले रंग छुड़ाएं कैसे?
कैरोसिन मंगवाओ
बढ़ गए कैरोसिन के पैसे। होली हो ली
महंगाई के रंग बोलते हैं।

ढोलक नहीं बजाओ
खाली पेट बजाओ यारो,
दरवाजे पर खाली डिब्बे
टीन सजाओ यारो! कुचले हुए पेट के
कुचल रंग बोलते हैं।

रंग बोलते हैं,
हां जी, रंग बोलते हैं।
रंग जाती गोरी
गोरी के अंग बोलते हैं।
**************
अशोक चक्रधर 
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और लोकप्रिय कवि हैं…  

राहुल गांधी को प्रधानममंत्री बनाने की मांग

पार्टी के राजनीति में कब क्या हो जाए, कहना मुश्किल होता है। अब यही देखिए कि मुख्य विपक्षी दल बीजेपी ने राहुल गांधी को प्रधानममंत्री बनाने की मांग कर दी। अब तक यह मांग कांग्रेसी करते थे। हालांकि पार्टी की दलील यह है कि इससे साफ हो जाएगा कि राहुल गांधी में कितना दम है। कांग्रेस ने बिना देर किए इस बात का एलान कर दिया कि यह मांग बीजेपी की मानसिक पराजय का संकेत है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने रविवार को संवाददाताओं से बातचीत के दौरान एक सवाल के जवाब में कहा, ‘यूपीए सरकार के अभी 2 साल बाकी हैं। इसमें राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना देना चाहिए ताकि देश की जनता भी देख ले कि उनमें देश की समस्याओं की कितनी समझ और उनके समाधान की कितनी क्षमता है।’ उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने के लिए सिर्फ इतना ही तो कहना है कि ‘मनमोहन सिंह जी आप कुर्सी से उतरिए, हम बैठेंगे।’ यह सवाल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की इस टिप्पणी के बारे में पूछा गया था, जिसमें पवार ने कहा है कि राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान की कमान सौंपकर कांग्रेस ने एक जुआ खेला है, क्योंकि अगर कांग्रेस अच्छा नहीं कर पाई तो सारी जिम्मेदारी उनके सिर जाएगी। पवार ने यह भी कहा था कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का चुनाव परिणाम अच्छा भी हो तो भी राहुल गांधी को तुरंत प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट नहीं किया जा सकता।

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एह पर करियो मतदान

चुनाव आयोग बहुत कडाई कईले बा . प्रत्यासी भी बहुत चालाकी देखावत हवे . गाव गाव लक्जरी गाडी  घूमत हई. कवनो साहब शुब्बा राही में  चेकिंग – ओकिंग करत में मिळत  हवे त इहे जवाब देत हवे – हम बरदेखुआ हईं . फलाने की घरे जात हई . अब फलाने की दुआरी तिल्कहरून  के भीड़ देख के अटिदार- पटीदार, पास -पड़ोस के लोग बटुरा जाता . फलाने भी तिल्कहरून के खूब आव -भगत करत हवे . मर -मिठाई , नर -नमकीन , अकौड़ी- पकौड़ी चापि के ऊपर से चाह-चुह पी- पा के जब राहि धरे जात हवे त घर की मुखिया की हाथ में हज़ार – दू हज़ार थमा के कान में धीरे से कहत हवे . अरे भईया ! हम साचो के तिलकहरू न हई, हम फलाने के समर्थक हई आ वोट मांगे घूमत हई . यह चिन्ह पर बटन दबा दिहा . दरअसल बात इ बा की यह  बार जैसन  चनाव आयोग के  खौफ पहले कभी न देखे के मिलल रहे । अधिकारी हों, अथवा कर्मचारी या प्रत्याशी सजो  लोग  चुनाव आयोग की डंडे के खौफ से सहम गईल बा । चुनाव में  जनता के बीच जा के   अपनी प्रत्याशिता क प्रचार कईल  उनकी मजबूरी बा , सो तरह -तरह के हथ कंडा अपनावल जता ,चुनाव आयोग क फरमान बा  कि तीन गाडी से अधिका वाहन न चली , सो लोग तिलकहरू बनी के घूमत हवे , अपन  प्रचार करत हवे । इ सब आयोग के छकावे के जोगार ह।  हमरी देवरिया जिला की बरहज में त अयिसन तिल्कहरून के बाढ़ आ गईल बा , बिना बिआहे तय कईले खूब गोड़ लगायी , राह धराई मिळत बा . एगो प्रत्यासी त साठ गो  बेलोरो आ इस्कर्पियो उतार देले हवे , कही बरछा , त कही बर देखाई . कही बर छेकाई . सब फर्जी चलता ये भाई . अब यह हालत पर एगो कविता सुन ली –

गाव गाव तिलकहरू घुमे  , खूब करे जलपान / 
जाये की बेरी कान में कहले, एह पर करियो मतदान/
हाथ जोड़ के नगद थम्हावे, बार बार प्रणाम /
अबकी रउरा न बिसरायिब,इहे  ह मोर निशान/
आफत कईले बा आयोगवा, बहुत बा घामासान / 
येही बहाने प्रचार चलत बा, हमरो साझ -बिहान / 
बरहज में मतदाता मगन बा, खूब मिळत बा दाम /
खीच के सेवा तिल्कहरून के, अपनों मान-सम्मान / 
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