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पुण्य और परिवर्तन का पर्व – मकर सक्रांति

मकर संक्रांति अनेकता में एकता का पर्व

मकर सक्रांति के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं अतः इस दिन को मकर सक्रांति के नाम से जाना जाता है | महाभारत काल में भीशमपितामा ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर सक्रांति का ही चयन किया था | मकर सक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरत के पीछे -पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी | शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवतायों की रात्री अर्थात मकरात्मकता का प्रतीक तथा उतरायन को देवतायों का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है इसलिए इस दिन जप , तप , दान , स्नान , श्राद्ध ,तर्पण आदि धार्मिक क्रिया कलापों का विशेष महत्त्व है

भारतीयों का प्रमुख पर्व मकर संक्रांति आज भी अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों में वहां की परंपराओं के अनुसार ही मनाया जा रहा है। साथ ही इसी दिन से भिन्न-भिन्न राज्यों में गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है।  विज्ञान के अनुसार भी मकर संक्रांति पर्व स्वास्थ्य की दृष्टि से विशेष फायदेमंद होता है। सूर्य के मकर राशि में आने से ठंड का असर कम होने लगता है। रंग-बिरंगी पतंगों से सजा खिला-खिला आकाश, उत्तरायण में खिलते नारंगी सूर्य देवता, तिल-गुड़ की मीठी-भीनी महक और दान-पुण्य करने की उदार धर्मपरायणता। यही पहचान है भारत के अनूठे और उमंग भरे पर्व मकर संक्रांति की। मकर संक्रांति यानी सूर्य का दिशा परिवर्तन, मौसम परिवर्तन, हवा परिवर्तन और मन का परिवर्तन। मन का मौसम से बड़ा गहरा रिश्ता होता है। यही कारण है कि जब मौसम करवट लेता है तो मन में तरंगे उठना बड़ा स्वाभाविक है। इन तरंगों की उड़ान को ही आसमान में ऊंची उठती पतंगों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।
पतंग और रिश्तों का गणित
ये पतंगे जीवन के सरल-कठिन पेंच सिखाती है। रिश्तों में इतनी ढील ना रहे कि सामने वाला लहराता ही रहे और ना ही इतनी खींचतान या तनाव कि वह आगे बढ़ ही न सके। ये पतंगे उन्नति, उमंग और उल्लास का लहराता प्रतीक है। ये पतंगे बच्चों की किलकती-चहकती खुशियों का सबब है। ये पतंगे आसमान को छू लेने का रंगों भरा हौसला देती है। ये पतंगे ही तो होती है जो सिर पर तनी मायावी छत को जी भर कर देख लेने का मौका देती है वरना रोजमर्रा के कामों में भला कहां फुरसत कि ऊंचे गगन को बैठकर निहारा जाए?

मीठे स्वाद में जावो घुल मिल

उड़ावो पंतग ऐसे की खिल जाये दिल
मकर सक्रांति की खुशियों में भर दो मिठास
VMW Team के मजेदार लेखो के साथ…..

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें

‘मेक इन इण्डिया’….. अच्छा है।

मेक इन इण्डिया का नारा अच्छा है। 
काम भी होगा यह विश्वास अच्छा है।
जैसे ही घोषणा हुई दिल्ली के विज्ञान भवन में
मिलेगी नौकरी बेराजगारो को, यह विचार अच्छा है
विश्व स्तर पर निवेश पटल का नया चेहरा 
अर्थव्यवस्था का दिल धडकना अच्छा है
आयेगे अब गौर इस भारत में,
किस्तमत के कारखानों का चरमराना अच्छा है
माना कि हम थोडी देर से आये
किन्तु बिना भरोसे का चाइनीज नही
मंगल मिशन की कामयाबी का ताजा उदाहरण अच्छा है
दुनिया को शून्य हमने दिया है।
अन्तर्राष्ट्र्ीय स्तर पर यह पहचान अच्छा है। 
पहली बार देश को प्रधानमंत्री ऐसा मिला है।
जिस पर लोगों का विश्वाश अच्छा है।
दिमाग में उठती है जब इन बातों की गुफ्तगु
तो ‘निल्को’ ने कहा कि इनको कागज पर मूर्तरूप देना ही अच्छा है
                                                       
एम. के. पाण्डेय निल्को

बात बात पर अवरोध क्यों की हम स्वतंत्र है – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

बात-बात पर अवरोध,क्योकि हम स्वतंत्र हैं।
 एम.के.पाण्डेय “निल्को”

      नगर निगम ने कई दिनों से मोहल्लों का कचड़ा नहीं उठाया,लोगो ने रोड जाम कर दिया। गुस्सा बहुत था,इसलिए वाहनो पर पथराव किया गया । स्कूल मे मिड डे मील नहीं बना, छोटे बच्चों को लेकर अभिभावक सड़क पर आ गये । परिवहन विभाग के बसों के शीशे तोड़ दिये। शहर मे शोहदों ने किसी से छेड़खानी की। किसी शरीफ से नहीं देखा गया ,वह मना करने लगा तो विवाद हो गया । विवाद बढ़ा तो बात चक्काजाम पर आ गई। सिटी मजिस्ट्रेट ने समझाबुझा कर जाम समाप्त कराया । महाविद्यालय मे एडमिशन नहीं तो जाम ……. । बात-बात पर अवरोध, क्योकि हम स्वतंत्र हैं। हालत यह है की –
कुछ घरों मे मुश्किल है
सुबह-शाम चूल्हे जलाना,
बड़ा आसान हो गया है
बात-बात पर बस्ती जलाना।
      सामान्‍य रूप में आजादी का अर्थ पूर्ण तौर पर स्‍वतंत्र होना है , जिसमें किसी का भी कोई हस्‍तक्षेप न हो। पर मनुष्‍य के जीवन में वैसी आजादी किसी काम की नहीं , क्‍यूंकि इसमें उसके समुचित विकास की कोई संभावना नहीं बनती।  लेकिन आज स्वतंत्रता का मतलब बदल गया है। हम स्वच्छंद होते जा रहे है। 15 अगस्त 1947 से आज तक की राष्ट्रीय यात्रा का विश्लेषण करे तो बहुत कुछ अपेक्षित नहीं दिखाई दे रहा है। यहा अंग्रेज़ नहीं है,न उनकी व्यवस्था है। सब कुछ हमारा है, लेकिन हम संतुष्ट नहीं है। सत्ता के स्तर पर सबसे पहले तो केंद्र और राज्य सरकारें ही स्वतंत्र नहीं हैं। आज सब गोलमाल हो गया है। राज्य सरकारे उन मामलों में भी केंद्र पर निर्भर हैं, जिनमें उन्हें स्वतंत्र होना चाहिए। शरीर से हम भारतीय, दिल और दिमाग से पश्चिमी धारा के गुलाम हो गए। यह सब आज हमारे खान-पान,रीति-रिवाज़,बोल-चाल तथा पहनावे में साफ दिख रहा है। हमारे स्वतंत्र व्यवहार के कारण चहुंओर क्या दीख रहा है? अपने घर से ही शुरुआत करें? पढ़ाईलिखाई के कारण आत्मनिर्भरता आती है, आर्थिक उन्नति होती है। पर इस आत्मनिर्भरता ने व्यक्ति को स्वच्छंद बना दिया है। स्वच्छंदता स्वतंत्रता नहीं है।  स्वच्छंदता का आलम यह है कि देश की सामूहिक स्वतंत्रता को ध्वस्त करने के लिए न जाने कितने आतंकी, अलगाववादी और विध्वसंक संगठन खड़े हो गए। इन संगठनों के कारण समाज जितना तबाह हो रहा है, शायद साम्राच्यवाद के समय भी न हुआ हो।
      अंग्रेज़ो को केवल गालिया देकर स्वतंत्रा की जयकार करने से पहले यदि अपने आस-पास के पुलो,भवनो पर नज़र दौड़ाए, तो देखते है की इतने सालो पहले की बनी इमारत खड़ी होकर इठला रही है और जिस भवन, पुल को आज़ाद भारत के कमीशनबाज नेताओ,ठेकेदारो ने बनवाया है वह धराशायी हो गए । जबसे देश आजाद हुआ है हमने केवल अपने बारे में सोचा है. मेरा भारत महान कहने वाले कई लोग मिल जाते है परउसमे उनका क्या योगदान है ये वो नहीं बता पाते. मानो उनके यहाँ पैदा होने से ही ये देश महान हुआ हो. इस देश के लिए जो लोग कुर्बान हो गए उनके सपनोके भारत को हमने कही खो दिया है।  स्वतंत्रा के मतलब इतना बदल गए हैं कि किसी कवि कि यह लाइन बहुत ही सटीक बैठ रही है –
देखता हूं चलन सियासत का,
हर कहीं बैर के बवंडर हैं।
फर्क ऊंचाइयों मे है लेकिन,
नीचता मे सभी बराबर हैं।
      बहुत दुःख का विषय है कि स्वराज्यप्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी सामाजिक और राजनैतिक हालत इतने अधिक चिंताजनक हैं। समाज में स्वार्थ लगातार बढ़ रहा है। अपराध की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। आतंकवाद, नक्सलवाद, विदेशी घुसपैठ इत्यादि खतरे देश को चारों ओर से घेर रहे हैं। देश के किसी न किसी भाग से प्रतिदिन किसी आतंकवादी घटना,नक्सली हमले या किसी बम विस्फोट का समाचार अवश्य मिलता है और ऐसे कठिन समय में सरे मतभेद भुलाकर एक होने और इन हमलावरों को कुचलने कि बजाय हमभाषावाद, प्रांतवाद और मजहबी उन्माद से ग्रस्त होकर आपस में ही लड़ रहे हैं। या तो हमें सत्य दिखाई नहीं देता, या हम देखना ही नहीं चाहते। किसी को केवल अपनी जाति की चिंता है और कोई राष्ट्र की बजाय केवल किसी समुदायविशेष के हित को ही प्राथमिकता देता है।  जिस देश में युवावस्था का अर्थ बल, बुद्धि एवं विद्या होना चाहिए, वहाँ अधिकांश युवा इसके विपरीत धूम्रपान, मद्यपान और ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थों की चपेट में हैं। उनके जीवन में संयम, धैर्य तथा शान्ति का स्थान स्वच्छंदता, उन्मुक्त जीवन शैली तथा विवेकहीन उन्माद ने ले लिया है। अधिकांश युवाओं को क्रांतिकारियों की कम और क्रिकेट की जानकारी अधिक है। विदेशी वस्तुओं तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर, खादी को प्रतीक बनाकर स्वदेशी के प्रयोग का संदेश देने वाले महात्मा गाँधी के देश में आज कोने कोने तक विदेशी वस्तुओं के विक्रेता पुनः पहुँच गए हैं। जिस देश में कभीजय जवानजय किसानका मंत्र गूंजता था, वहाँ शासन की नीतियों से व्यथित होकर शहीद सैनिकों के परिजन सरकार को सभी पदक लौटा रहे हैं और किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं। सोने की चिडिया कहलने वाला देश छोटेछोटे कार्यों में आर्थिक सहायता के लिए कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, तो कभी विश्व बैंक की और देखता है। हमारी आर्थिक नीतियों से आज भी भारत की बजाय बाहरी देशों को ही अधिक लाभ हो रहा है। ऐसी स्थिति में हम कैसे कह सकते हैं की हम स्वतंत्र हैं?
      आज यह आवश्यक है कि देश आत्मविश्लेषण करे। देश, राज्य और व्यक्ति को स्वतंत्र बनाया जाए स्वच्छंद नहीं। सर्वधर्म समभाव, सर्वे भवंतु सुखिन: और तेन त्यक्तेन भुंजीथ: जैसे संबल हमारे पास हैं। अंत कि चार लाइनों को भी ध्यान से पढ़ कर आप अपने सुझाव या शिकायत VMW Team को लिखने के लिए स्वतंत्र है ।
हम तो स्वतंत्र होते हुए भी परतंत्र हैं
यहाँ ना खुशियाँ हैं, ना खिलखिलाहट
यहाँ तो चलता है बस आतंकवादी तंत्र
यह कैसा प्रजातंत्र है, यह कैसा लोकतंत्र
कोई हमें बतलाये तो
क्या यही स्वतंत्र है?
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 एम.के.पाण्डेय “निल्को”
+91-9024589902

 

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जब तुम्हारी याद आती है ……. योगेश पाण्डेय


जब तुम्हारी याद आती है
, तस्वीरे मै देखता हूँ ।
जो तुम न मुस्कुराती हो
, तो बगीचे के फूल सुख जाते है ।
योगेश जब भी लिखता हूँ , शब्द कम पड़ जाते है ।
सुबह दोपहर शाम तक
, चर्चा तुम्हारी होती है ।
एक तरफा तो नहीं है ये
, हिचकिया मुझे भी आती है ।
शब्दो से क्या बया करू , ऐसा कोई शब्दकोश मे ही नहीं ।
तुम्हारी याद मे जब कलम चलती है, तो पन्ने ही कम पड़ जाते है ।
जब तुम्हारे साथ चलता हूँ , तो लोग जल कर रह जाते है ।
अगर तुम अकेले जाओ तो , मेरा मन बेचैन होता है ।
कभी चेहरा तो कभी ,  मुस्कान मै भी पढ़ता हूँ ।
शायद इसी विषय को लेकर , पी एच डी मै भी करता हूँ ।
बहुत बात होती है पर , न मुलाक़ात हो पाती है ।
यह मै कैसे लिखू कि , तुम्हारी ही इंतज़ार होती है ।
गीले शिकवे सब मीट जाते है , जब तुम साथ होती हो
जो तुम साथ न हो तो
, साँसे रुक सी जाती है ।
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Yogesh Pandey

World Environment Day – 5 June (विश्व पर्यावरण दिवस)

अपनी आवाज़ उठाइये, समुद्र तल नहीं

World Environment Day (WED) celebrates its 12th Anniversary on Tuesday, 5th June 2011. World Environment Day (WED) is a day that spread awareness of the environment and enhances political attention and public action. Every year WED is celebrated on 5 June. It was the day that United Nations Conference on the Human Environment began. The United Nations Conference on the Human Environment was from 5–16 June 1972. It was established by the United Nations General Assembly in 1972. The first World Environment Day was on 1973. World Environment Day is similar to Earth Day. 


The 2014 theme for World Environment Day will focus on ‘Small Islands and Climate Change’, the official slogan for the year 2014 is ‘Raise Your Voice Not The Sea Level.


World Environment Day Quotes & Saying

“Give a man a fish, and he can eat for a day.  But teach a man how to fish, and he’ll be dead of mercury poisoning inside of three years.”
– Charles Haas
“When you use a manual push mower, you’re “cutting”down on pollution and the only thing in danger of running out of gas is you!  ”
– Grey Livingston
“It appears to be a law that you cannot have a deep sympathy with both man and nature.”
– Henry David Thoreau
“We have been god-like in the planned breeding of our domesticated plants, but rabbit-like in the unplanned breeding of ourselves.”
– Arnold Toynbee
“Human destiny is bound to remain a gamble, because at some unpredictable time and in some unforeseeable manner nature will strike back.”
– Rene Dubos