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कौन है यह चोटीकटवा ? जानें पूरा सच…!

बीते कई दिनों से चर्चाओं में आए चोटी कटवा को लेकर हर कोई सच्चाई जानना चाहता है । हर कोई जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा?  इसको लेकर बड़े-बड़े टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और वेब मीडिया में भी सुर्खियां बनी हुई है । तो वही सरकार से लेकर पुलिस प्रशासन भी चोटी कटवा को लेकर हैरान है, और जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा? सर्च करने पर पता चला कि राजस्थान से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली, गुडगांव, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित अलग-अलग जगहों से भी आ रही हैं, समझ आया कि मसला मास हिस्टीरियाका है ।
राजस्थान के एक छोटे से गांव से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली हरियाणा चंडीगढ़ पंजाब होते होते देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश जा पहुंची है। यहां के मथुरा, आगरा, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, देवरिया समेत कई शहर चोटी कटवा से दहशत जदां है । यहां के कई गांवों से चोटी कटवा नाम की अफवाह से सनसनी मची हुई है । इससे सबसे ज्यादा दहशत में महिलाएं हैं, और अपनी चोटी बचाने को लेकर हैरान हैं। क्योंकि उसकी किसी ना किसी पड़ोसी गांव में या पड़ोसी की चोटी कट गई है , और अब वह भी दहशत में है। सच तो यह है कि 2017 में भी हम ऐसे हैं कि हमारे बीच मास हिस्टीरिया फैलाना बहुत आसान है।  आप सोचिए कि कौन सा भूत ऐसे लोगों की चोटी काटते फिरेगा?  कैमरे के सामने आने के लिए क्या लोग ये नहीं कर सकते?  या फिर बस डर के मारे?  मैं नहीं कह रहा कि ऐसा ही है, पर ऐसा भी हो सकता है। यूजीन इनस्को (फ्रेंच लेखक) की किताब राइनोसोर्स  की कहानी याद आ गई, ऐसा होता है कि एक आदमी शहर में राइनोसोर्स बन जाता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और धीरे-धीरे बाकी सब। ये चोटीकटवा की कहानी कुछ ऐसी ही लगती है. इसके कई तर्क हो सकते हैं,  पब्लिसिटी,  धार्मिक संवेदना फैलाना,  मास हिस्टीरिया फैलाना। कुछ भी हो सकता है, मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि हम जरा सोचे कि कहीं हम सब राइनोसोर्स तो नहीं बन रहे?
अपने आसपास के माहौल में अफवाहों की चपेट में आकर लोग एक्यूट साइकोसिस (मेनिया) की जद में आकर मास हिस्टीरिया का शिकार हो रहे हैं। इसमें कोई अंजान डर एक से दूसरे में पहुंचकर अफवाहों को बढ़ावा देता है। मास हिस्टीरिया की उन जगहों पर होने की आशंका ज्यादा रहती है जहां परिवार या समाज में भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इसमें पीड़ित को देखकर परिवार या अन्य आसपास के सदस्य खुद को उसी में ढालने की कोशिश करते हैं।  मास हिस्टीरिया एक सामान्य समस्या है। इसमें यदि एक बच्चा शिकायत करता है कि उसे पेट दर्द हो रहा है तो अन्य बच्चों को भी लगता है कि उनके साथ भी वैसा ही हो रहा है। जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं होता। हिस्टीरिया (Hysteria) की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। बहुधा ऐसा कहा जाता है, हिस्टीरिया अवचेतन अभिप्रेरणा का परिणाम है। अवचेतन अंतर्द्वंद्र से चिंता उत्पन्न होती है और यह चिंता विभिन्न शारीरिक, शरीरक्रिया संबंधी एवं मनोवैज्ञानिक लक्षणों में परिवर्तित हो जाती है। 

एम के पाण्डेय निल्को

शोध छात्र 


भूत-प्रेत क्या होते हैं ?

भूत-प्रेत के नाम से एक अनजाना भय लोगो की मन को सताता है।  इसके किस्से भी सुनने को मिल जाते है और लोग बहुत रुचि व विस्मय के साथ इन्हें सुनते है और इन पर बनें सीरियल, फिल्मे देखते है व कहानियाँ पढ़ते हैं। भूत-प्रेत का काल्पनिक मनः चित्रण भी लोगों को भयभीत करता है-रात्रि के बारह बजे के बाद, अँधेरे में, रात्रि के सुनसान में भूत-प्रेत के होने के भय से लोग़ डरते हैं। क्या सचमुच भूत-प्रेत होते है ? यह प्रशन लोगों के मन में आता है ? क्योंकि इनके दर्शन दुर्लभ होते है, लेकिन ये होते है। जिस तरह से हम वायु को नहीं देख सकते, उसे महसूस कर सकते हैं, उसी तरह हम भूत को नहीं देख सकते पर कभी-कभी ये अचानक देखे भी जाते है।  भूतों का अस्तित्व आज भी रह्स्य बना हुआ है।  इसलिए इनके बारे में कोई भी जानकारी हमें रोमांच से भर देती है। आखिर भूत है क्या ? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है।  परंपरागत तौर पर यही माना जाता है कि भूत उन मृतको की आत्माएँ हैं, जिनकी किसी दुर्घटना, हिंसा, आत्महत्या या किसी अन्य तरह के आघात  आकस्मिक मृत्यु हुई है।  मृत्यु हो जाने के कारण इनका अपने स्थुल शरीर से कोई संबंध नहीं होता।  इस कारण ये भूत-प्रेत देखे नहीं जा सकते।  चूँकि हमारी पहचान हमारे शरीर से होती हैं और जब शरीर ही नहिं है तो मृतक आत्मा को देख पाना और पहचान पाना मुश्किल होता हैं। भूत-प्रेतों को ऐसी नकारात्मक सत्ताएं माना गया है, जो कुछ कारणों से पृथ्वी और दूसरे लोक  बीच फँसी रहती हैं।  इन्हे बेचैन व चंचल माना गाया है, जो अपनी अप्रत्याशित मौत के कारण अतृप्त हैं।  ये मृतक आत्माएँ  कई बार छाया, भूतादि के रूप में  स्थानों  के पीछे लॉग जाती हैं, जिनसे जीवितावस्था में इनका संबन्ध या मोह था।

हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।

भारत देश एक बहुभाषी राष्ट्र है। जहाँ अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा के अतिरिक्त अनेक प्रकार की भारतीय भाषाएँ , उपभाषाएँ , आंचलिक भाषाएँ , बोलियाँ ,उपबोलियाँ आदि बोली जाती हैं। इन भाषाओं में हिंदी एकता की कड़ी है।  हमारे सन्तों, समाज सुधारकों और राष्ट्रनायकों ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिंदी को अपनाया।  क्योंकि यही एक भाषा है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक और राजस्थान से असम तक समान रूप से समझी जाती है।  हिंदी ही एकमात्र भाषा है जो समस्त भारतीय को एकता के सूत्र में जोड़ने का कार्य सम्पन्न करती है।   हिंदी सहज , सरल एवं वैज्ञानिक भाषा है ,जिसने बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के उदारता का परिचय देते हुए अपनी वैज्ञानिकता को क्षति पहुँचाए बिना सहज ही समस्त विदेशी , देशी , आगत ,तत्सम आदि शब्दों को अपने भीतर सुगंध की तरह समा लिया है।  हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। सरलता से कहें तो हिन्दी उस माँ की तरह है जो अपने पुत्र के मित्रों को भी वही स्नेह और सम्मान देती है। वह अपने – पराये का भेद नहीं करती। वर्तमान युग हिंदी मीडिया का युग है।  हिंदी भाषा का निर्माण और आगे बढ़ाने का कार्य मीडिया ने किया है। इंटरनेट और मोबाइल ने हिंदी को और विस्तार दिया, हिंदी में संप्रेषण की ताकत है।  हिंदी यूनिकोड हुई तो ब्लॉगगिंग में बहार आ गई।  चिट्ठा लिखनेवालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई।  गूगल का मोबाइल और वेब विज्ञापन नेटवर्क एडसेंस हिंदी को सपोर्ट कर रहा है।  इंटरनेट पर 15 से ज्याद हिंदी सर्च इंजन मौजूद हैं।  सोशल साइट में हिंदी छाई हुई है।  21फीसदी भारतीय हिंदी में इंटरनेट का उपयोग करते हैं।हिंदी राजभाषा के बाद अब वैश्विक भाषा बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है। डिजिटल दुनिया में हिंदी की मांग अंग्रेजी की तुलना में पाँच गुना तेज है।  हिंदी मातृभाषा और राजभाषा से एक नई वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी बदल रही है। वह नई प्रौद्योगिकी, वैश्विक विपणन तंत्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा बन रही है। आज मोबाइल की पहुँच ने गाँव-गाँव के कोने-कोने में संवाद और संपर्क को आसान बना दिया है।  इस वजह से बाजार में आ रहे नित नवीन मोबाइल उपकरण हर सुविधा हिंदी में देने के लिए बाध्य हैं। हिंदी की इस समृद्ध, शक्ति और प्रसार पर किसी भी हिंदी भाषी को गर्व हो सकता है।  हिन्दी की शुद्धता को लेकर तर्क दिए जाएँ परन्तु कोई ये बताये कि नई पीढ़ी शुद्ध व्याकरण वाली हिन्दी सीखे कहाँ से ? अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं सरकारी पाठशालाओं की स्थिति जग जाहिर है। जो हिन्दी के ज्ञाता हैं वे अधिकांशतः लेखन आदि कार्य से जुड़े हुए हैं ।  कुशल शिक्षकों के अभाव में बताइये भला किस मार्ग से आप शुद्ध हिन्दी प्रचारित – प्रसारित करेंगे? दूरसंचार के समस्त माध्यमों ने वैसे भी भाषा की एक नई परिभाषा गढ़ दी है।
प्रत्येक भाषा में अन्य भाषा के शब्द शुद्ध व विकृत रूप में आ गए हैं जिन्हें उनकी सरलता और बोधगम्यता के कारण अपना लिया गया है। अब हमारे पास पीछे मुढ़कर देखने का समय नहीं है। यदि हम चाहते हैं हिन्दी भाषा आगे बढे तो ख़ुशी-ख़ुशी उसे अपने अंदर सहजता से आये दूसरी भाषा के शब्दों के साथ आगे बढ़ने देना चाहिए उसके मार्ग में अनावश्यक रुकावट नहीं डालना चाहिए। अधिक से अधिक युवाओं को हिन्दी भाषा से जोड़ने के लिये और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने के लिये हमें कूपमंडूकता से ऊपर उठना ही होगा। इससे न हिन्दी भाषा की प्रगति रुकेगी और न विकास। बल्कि इस कदम से ये अंतर्राष्ट्रीय महत्तव की भाषा हो जाएगी। संसार में ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती है। जो लोग हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों विशेषकर अंग्रेजी से नाखुश हैं मैं हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए पूछना चाहूँगा क्या उनके पुत्र – पुत्री हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं  क्या उनकी संतति भी उनकी तरह भाषा शुद्धता अभियान को आगे बढ़ा पायेगी ? अपवाद छोड़ दिए जाएँ तो उत्तर सबको पता है। जब सब कुछ देश काल वातावरण की बाध्यता है तो फिर हिन्दी की शुद्धिकरण की तटस्थता को त्याग यहाँ भी उदार होना ही पड़ेगा।
वैश्वीकरण का दौर है। हिंदी के समक्ष भी बहुत अधिक चुनौतियाँ हैं। आज उसे फ़ैलाने से ज्यादा बनाये रखना आवश्यक है और ये कोई बहुत आसान कार्य नहीं है। जब लाखों शब्दों को बाहर से लेने पर भी अंग्रेजी का स्वरुप बिगड़ने के स्थान पर दिन ब दिन बढ़ रहा है तो हम हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों को लेकर क्यों विचलित हो रहे हैं ? डर रहे हैं ? अंग्रेजी ने शायद ही कोई भाषा हो जिससे कुछ न कुछ लिया ना हो। इस तरह तो हम हिंदी का समस्त क्षेत्रीय भाषाओं से भी वैमनस्य बढ़ा देंगे। यदि हिंदी को बाजारीकरण से परे भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से ज़माना है तो अन्य भाषा के शब्दों को जो सहज ही आते चले जा रहे हैं उनको तिरस्कृत करने से बचना होगा। अकेला चलो की नीति छोड़नी होगी , नहीं तो हिंदी को सिमटने में देर नहीं लगेगी।

एम के पाण्डेय ‘निल्को’

आलू पर कविता नहीं होता

कृपया ध्यान दे …!
मधुलेश पाण्डेय निल्को की यह एक वयंगात्मक रचना है, इसका उद्देशय किसी तो ठेस पहुचाना बिलकुल नहीं है।
ये कविता पढ़ना माना एक जुर्म है, पर इस जुर्म में किसी का मुंह काला नहीं होता | (डोंट वरी)

यह एक करारा जवाब है जो कहते है की आलू पर कविता नहीं होता |

तो पढ़िये यह शीषर्कहीन रचना और अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें।
आख़िर फूट ही गया आलू बम
निकाल दिया है सबका दम
दिखा दिया की हम नहीं है कम
और फोड़ दिया अनोखा बम
जैसे ही ये बम फूटा
लगा जैसे कुछ टूटा
निकला वही खोटा
जो था सबसे छोटा
बात आलू की करता हूँ
नहीं किसी से डरता हूँ
निल्को जब मैं लिखता हूँ
व्यंगों की वर्षा करता हूँ
शीषर्कहीन ये सूक्तिया है
विष्णु ने भरी बची रिक्तिया है
आलू की जो शक्तिया है
कम पड़ी मेरी पंक्तिया है
ये ब्लैक स्टोन की जो पूजा है
नहीं इनसा कोई दूजा है
बिलावल ने भी अब ठाना है
सुनाना अपना ही ताना बाना है  
मधुलेश पाण्डेय निल्को
एक आलू सेवनकर्ता

आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!

‘सुर-तरंग’ संगीत प्रतियोगिता संपन्न

राजस्थान की प्रतिभाओ को एक मंच प्रदान करने वाली राज्य स्तरीय संगीत प्रतियोगिता ‘सुर-तरंग’ आज जयपुर में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ | इस दौरान बड़ी संख्या में प्रतिभागियों हिस्सा ने लिया और संगीत विधा में प्रतिभागियों ने अपनी-अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेरा | बच्चों में साहित्य, संगीत और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संचालित रविन्द कला मंच और संगम कला ग्रुप कि ओर से आयोजित यह कार्यक्रम द रूट्स पब्लिक स्कूल शिव कॉलोनी लक्ष्मी नगर जयपुर में संपन्न हुआ | कार्यक्रम की शुरुआत अवंतिका ग्रुप के राष्टीय अध्यक्ष श्री आनंद अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर किया उनके साथ श्रीमती मधु सूद , श्री आर सी सूद मौजूद रहे | जज के रूप में श्री शिवाजी शिव, श्री सुनील जयपुरी, श्रीमती उषा जोया और श्री सुदेश शर्मा जी नज़र आये |

गायन के सब जूनियर वर्ग (फ़िल्मी) में अनन्या गौतम, वस्सु और नमन क्रमशः प्रथम, द्दितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया वही गैर फ़िल्मी में क्रिशन बालूदा और मोनिका को क्रमशः प्रथम और द्दितीय स्थान मिला | जूनियर वर्ग (फ़िल्मी) में नंदिनी,साना, और मोहक विजयी हुए तथा गैर फ़िल्मी में आर्यन ने अपना लोहा मनवाया | सीनियर वर्ग (फ़िल्मी) में राहुल भालिया , सुनील शर्मा विक्रम सैन ने क्रमशः प्रथम, द्दितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया वही सीनियर वर्ग (गैर फ़िल्मी) में मोसिन खान और बादल पारिक ने अपने गीतों से जजों को खुश किया | विजेताओं के साथ-साथ सैकड़ों अन्य छात्र-छात्राओं और गणमान्य नागरिकों ने भी सुगम संगीत का आनंद लिया | विजेताओ को श्री डी वी नेहरा मेमोरियल अवार्ड से सम्मानित भी किया गया |

प्रतियोगिता के मुख्य आयोजक श्री अलोक सूद ने बताया कि विजयी टीम को राष्टीय स्तर पर दिल्ली में राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया जायेगा | संस्था के राजस्थान अध्यक्ष श्री आर सी सूद ने कहा की इसी मंच से सोनू निगम, श्रेया धोसले, सुनिधि चौहान, आनंद राज, पीनाज़, जैसे कई हीरे तरासे गए है | इस अवसर पर एम के पाण्डेय निल्को, अरविन्द सिंह, अशोक गुप्ता, प्रमोद शर्मा, पूजा राठी, मधुकर तिवारी, सुधीर, सुखविंदर, मनन सूद, स्वाति अग्रवाल आदि भी मौजूद रहे | अंत में कार्यक्रम संचालक श्री जय सूद ने सामारोह में उपस्थिति सभी लोगो के लिए का आभार व्यक्त किया |

प्राचार्य सेवाभावी शिक्षाकर्मी सम्मानित

 जयपुर|अवंतिका संस्था,नई दिल्ली द्वारा शुक्रवार को समाज के विशिष्ट गुणीजनों को रवींद्र कला केंद्र सभागार में सम्मानित किया गया। संस्था के राष्ट्रीय निदेशक आनंद अग्रवाल ने शिक्षा क्षेत्र से जुड़े निम्न प्राचार्यों सेवाभावी शिक्षा कर्मियों में सुमन वार्ष्णेय, मधु सूद, उषा जोया, सुखविंदर कौर, अरविंदर सिंह टक्कर, वीरेंद्र कुमार शर्मा, डॉ. स्नेहलता भटनागर, किरण पाल, स्नेहलता शर्मा, आलोक सूद, प्रद्युम्न कुमार शर्मा रेखा कोटवानी को ‘स्वामी विवेकानंद अवार्ड’ प्रदान किया गया

हनुमान जयंती – आज भी जीवित हैं हनुमान

कहते है पवनपुत्र हनुमान जैसा कोई नहीं, भक्त तो कई है लेकिन जो बात रूद्र अवतार हनुमान जी में हैं वो किसी में नहीं। भगवान शिव के आठ रूद्रावतारों में एक हैं हनुमान जी। भगवान राम त्रेतायुग में धर्म की स्थापना करके पृथ्वी से अपने लोक बैकुण्ठ चले गये लेकिन धर्म की रक्षा के लिए हनुमान को अमरता का वरदान दिया। इस वरदान के कारण हनुमान जी आज भी जीवित हैं और भगवान के भक्तों और धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। 

हनुमानजी बुद्धि और बल के दाता हैं। उत्तरकांड में भगवान राम ने हनुमानजी को प्रज्ञा, धीर, वीर, राजनीति में निपुण आदि विशेषणों से संबोधित किया है। हनुमानजी बल और बुद्धि से संपन्न हैं। हनुमान को मनोकामना पूर्ण करने वाला देवता माना जाता है, इसलिए मन्नत मानने वाले अनेक स्त्री-पुरुष हनुमान की मूर्ति की श्रद्धापूर्वक निर्धारित प्रदक्षिणा करते हैं। शास्त्रों का ऐसा मत है कि जहां भी राम कथा होती है वहां हनुमान जी अवश्य होते हैं। इसलिए हनुमान की कृपा पाने के लिए श्री राम की भक्ति जरूरी है। जो राम के भक्त हैं हनुमान उनकी सदैव रक्षा करते हैं।

एम के पाण्डेय निल्को

 

VMW Team का होली मिलन समारोह सम्पन्न

आज के इस भागमभाग भरी जिन्दगी में किसी के पास भी समय नहीं है लेकिन पुछो की क्या करते है तो उनका जवाब यही होता है की – कुछ खास नहीं या कुछ भी तो नहीं । हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है एक साथ मिलना बड़ा मुश्किल हो गया है लेकिन तकनीक के इस समय मे हम हमेसा एक दूसरे से जुड़े रहते है । इस बार का होली मिलन समारोह फोन पर ही हुआ किन्तु मजेदार और रसदार था सभी लोग एक से बढ़ कर एक रगीली बाते अपनी पिचकारी से एक दूसरे पर छोड़ रहे थे और आश्चर्य की बात की कोई भी इसका बुरा नहीं मन रहा था क्योकि सबको पता है की माहौल तो फगुआ का है । इसी क्रम मे एम के पाण्डेय निल्को ने रची एक रंगभरी रचना, अब आप को ही बताना है की कितनी रंगी है और कितनी गुजियादार, मसालेदार है ये रचना………..

VMW Team का होली मिलन समारोह सम्पन्न
जिसमे से कुछ रंगभरी बाते हुई उत्पन्न
शुरुआत  की मुख्य आयोजक योगेश जी ने कुछ इस तरह
की सभी रंग गय , एक ही रंग में हमारी तरह
मुख्य अतिथि के रूप में हरिदयाल जी और रामसागर जी पधारे
और अपने रंगीन मिजाज से, हमको सुधारे
माइक मिला जब हमारे विजय भाई को
लेकिन छोड़ कर आए थे हमारी भौजाई को
सब लोगो ने किया इसका विरोध प्रदर्शन
दिलीप जी ने भी दिया भरपूर समर्थन
गोरखपुर से गजेन्द्र जी आए
होली की गुजिया भी लाए
साथ मे उनके देवेश हमारे
होली के वे गीत सुनाये
जब मौका मिला मधुलेश भाई को
मारा चौका और ले आए भौजाई को
होली पर कुछ रचना सुनाये
जो किसी को भी न सुहाए
इसी क्रम मे अभिषेक जी आए
क्या हाल सुनाए, क्या बात बताए
देव भूमि की हवा लगी है उनको
और ठण्ड लग रही है हम सबको
हिमाचल मे रहते ऋषिन्द्र जी
फगुआ मे बनाते सबको पगलेन्द्र जी
होली की उनकी बाते सुनकर
खड़े हो जाते सभी तनकर
त्रिपुरेन्द्र जी है आज कल अलवर
मचाते है अंदर ही ये खलबल
देसी इनका जो मिज़ाज रंगीला
कईयो का चेहरा हो जाता पीला
लाल गुलाल सिद्धार्थ जी  लाए
खुद को बाबू साहब कहलाए
बीच मे कूदना इनकी आदत
पर मिलता है इनको भी आदर
मोहक जी की मन मोहिनी सी छटा
मोहित कर गई, ऐसी हो गई घटा
गुल खिलाये ये जैसे गुलगुल्ले
और खिलाये हम सबको रसगुल्ले
आशुतोष हमारे लालू कहलाए
फागुन में किसी को भी भालू बनाए
साथ में इनके सुन्दर बाबू को लेकर
चल दिये रंग पिचकारी खरीदकर
नीलेश, सत्यम कम नहीं किसी ओर
रोज गढ़ते है ये मजेदार जोक
बात बात मे कहते है ये मर्द
सुनकर इनको होता है पेट दर्द
गिरिजेश बाबू का क्या कहना
सिद्धेश बाबा के साथ ही रहना
दोनों दक्ष है अपनी कक्षा में
पर आता नहीं कुछ इनके बक्से में
सर्वेश हमारे दबंग
होली मे मचाए हुड़दंग
निल्को ने किया पुनः अभिनन्दन
होली मनाए और ले आनन्दन
कुछ ऐसे मना मिलन समारोह
कोई नहीं यहा आरोह अवरोह
याद करेगी दुनिया हमको कुछ इस तरह
की इतिहास रचा जाता है जिस तरह
होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाये के साथ……
एम के पाण्डेय निल्को
VMW Team

आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!
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