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कौन है यह चोटीकटवा ? जानें पूरा सच…!

बीते कई दिनों से चर्चाओं में आए चोटी कटवा को लेकर हर कोई सच्चाई जानना चाहता है । हर कोई जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा?  इसको लेकर बड़े-बड़े टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और वेब मीडिया में भी सुर्खियां बनी हुई है । तो वही सरकार से लेकर पुलिस प्रशासन भी चोटी कटवा को लेकर हैरान है, और जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा? सर्च करने पर पता चला कि राजस्थान से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली, गुडगांव, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित अलग-अलग जगहों से भी आ रही हैं, समझ आया कि मसला मास हिस्टीरियाका है ।
राजस्थान के एक छोटे से गांव से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली हरियाणा चंडीगढ़ पंजाब होते होते देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश जा पहुंची है। यहां के मथुरा, आगरा, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, देवरिया समेत कई शहर चोटी कटवा से दहशत जदां है । यहां के कई गांवों से चोटी कटवा नाम की अफवाह से सनसनी मची हुई है । इससे सबसे ज्यादा दहशत में महिलाएं हैं, और अपनी चोटी बचाने को लेकर हैरान हैं। क्योंकि उसकी किसी ना किसी पड़ोसी गांव में या पड़ोसी की चोटी कट गई है , और अब वह भी दहशत में है। सच तो यह है कि 2017 में भी हम ऐसे हैं कि हमारे बीच मास हिस्टीरिया फैलाना बहुत आसान है।  आप सोचिए कि कौन सा भूत ऐसे लोगों की चोटी काटते फिरेगा?  कैमरे के सामने आने के लिए क्या लोग ये नहीं कर सकते?  या फिर बस डर के मारे?  मैं नहीं कह रहा कि ऐसा ही है, पर ऐसा भी हो सकता है। यूजीन इनस्को (फ्रेंच लेखक) की किताब राइनोसोर्स  की कहानी याद आ गई, ऐसा होता है कि एक आदमी शहर में राइनोसोर्स बन जाता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और धीरे-धीरे बाकी सब। ये चोटीकटवा की कहानी कुछ ऐसी ही लगती है. इसके कई तर्क हो सकते हैं,  पब्लिसिटी,  धार्मिक संवेदना फैलाना,  मास हिस्टीरिया फैलाना। कुछ भी हो सकता है, मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि हम जरा सोचे कि कहीं हम सब राइनोसोर्स तो नहीं बन रहे?
अपने आसपास के माहौल में अफवाहों की चपेट में आकर लोग एक्यूट साइकोसिस (मेनिया) की जद में आकर मास हिस्टीरिया का शिकार हो रहे हैं। इसमें कोई अंजान डर एक से दूसरे में पहुंचकर अफवाहों को बढ़ावा देता है। मास हिस्टीरिया की उन जगहों पर होने की आशंका ज्यादा रहती है जहां परिवार या समाज में भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इसमें पीड़ित को देखकर परिवार या अन्य आसपास के सदस्य खुद को उसी में ढालने की कोशिश करते हैं।  मास हिस्टीरिया एक सामान्य समस्या है। इसमें यदि एक बच्चा शिकायत करता है कि उसे पेट दर्द हो रहा है तो अन्य बच्चों को भी लगता है कि उनके साथ भी वैसा ही हो रहा है। जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं होता। हिस्टीरिया (Hysteria) की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। बहुधा ऐसा कहा जाता है, हिस्टीरिया अवचेतन अभिप्रेरणा का परिणाम है। अवचेतन अंतर्द्वंद्र से चिंता उत्पन्न होती है और यह चिंता विभिन्न शारीरिक, शरीरक्रिया संबंधी एवं मनोवैज्ञानिक लक्षणों में परिवर्तित हो जाती है। 

एम के पाण्डेय निल्को

शोध छात्र 


इस बरसात के मौसम मे

आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।
v मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मैं फिर से ‘नज़र निल्को की’ ये शीर्षक ले कर आया हूँ

आज कई दिनो बाद फिर यहाँ पर आया हूँ

इतने दिन व्यस्त रहा वो बताने आया हूँ

आप याद किए या न किए हो पर

मैं फिर से नज़र निल्को की ये शीर्षक ले कर आया हूँ

सादर वंदे

एम के पाण्डेय निल्को 

हमारे जैसा कोई दूसरा इस दुनिया है ही नहीं।

जब हमारे जैसा कोई दूसरा इस दुनिया है ही नहीं। फिर किसी से क्या तुलना। अपना आलस्य अपनी गप्पे अपनी बाते अपनी हार अपनी असफलता सब कुछ अपना है। एक दम यूनिक !! एकदम अलग !! यानि न कोई अपने से आगे और न अपने किसी से पीछे। सब के रास्ते अलग अलग है। सबकी मंजिले अलग अलग है। जो कुछ हमारे पास है वो किसी दूसरे के पास नहीं। लिहाजा….जो भी हमारे पास है। वह सिर्फ हमारे ही पास है। जो बेशकीमती है। शायद हम भी। और आप भी और ये दुनिया भी। ये ग़लत है की दुनिया बड़ी होती है, सच तो ये है की दुनिया से बड़ी दुनिया में रहने वाले मनुष्य का अपना मन होता है । सोचने पर किसी का जोर नही !! इसीलिए आज जी भर के सोचा है !! बस यंही कुछ लोचा है !!

भूत-प्रेत क्या होते हैं ?

भूत-प्रेत के नाम से एक अनजाना भय लोगो की मन को सताता है।  इसके किस्से भी सुनने को मिल जाते है और लोग बहुत रुचि व विस्मय के साथ इन्हें सुनते है और इन पर बनें सीरियल, फिल्मे देखते है व कहानियाँ पढ़ते हैं। भूत-प्रेत का काल्पनिक मनः चित्रण भी लोगों को भयभीत करता है-रात्रि के बारह बजे के बाद, अँधेरे में, रात्रि के सुनसान में भूत-प्रेत के होने के भय से लोग़ डरते हैं। क्या सचमुच भूत-प्रेत होते है ? यह प्रशन लोगों के मन में आता है ? क्योंकि इनके दर्शन दुर्लभ होते है, लेकिन ये होते है। जिस तरह से हम वायु को नहीं देख सकते, उसे महसूस कर सकते हैं, उसी तरह हम भूत को नहीं देख सकते पर कभी-कभी ये अचानक देखे भी जाते है।  भूतों का अस्तित्व आज भी रह्स्य बना हुआ है।  इसलिए इनके बारे में कोई भी जानकारी हमें रोमांच से भर देती है। आखिर भूत है क्या ? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है।  परंपरागत तौर पर यही माना जाता है कि भूत उन मृतको की आत्माएँ हैं, जिनकी किसी दुर्घटना, हिंसा, आत्महत्या या किसी अन्य तरह के आघात  आकस्मिक मृत्यु हुई है।  मृत्यु हो जाने के कारण इनका अपने स्थुल शरीर से कोई संबंध नहीं होता।  इस कारण ये भूत-प्रेत देखे नहीं जा सकते।  चूँकि हमारी पहचान हमारे शरीर से होती हैं और जब शरीर ही नहिं है तो मृतक आत्मा को देख पाना और पहचान पाना मुश्किल होता हैं। भूत-प्रेतों को ऐसी नकारात्मक सत्ताएं माना गया है, जो कुछ कारणों से पृथ्वी और दूसरे लोक  बीच फँसी रहती हैं।  इन्हे बेचैन व चंचल माना गाया है, जो अपनी अप्रत्याशित मौत के कारण अतृप्त हैं।  ये मृतक आत्माएँ  कई बार छाया, भूतादि के रूप में  स्थानों  के पीछे लॉग जाती हैं, जिनसे जीवितावस्था में इनका संबन्ध या मोह था।

कैंसर पीड़ितों की मदद के लिये हमारे साथ हाथ मिलाये

लिखने में भी हाथ कई बार काप जाते है , किस्मत के बारे में क्या कहे , यह बालक उम्र महज 13 साल बचपन में ही पिता जी छोड़ कर चले गए , दादा जी क्या होते है पता ही नहीं ऊपर से कोई भाई नहीं केवल 3 बहने और डॉक्टर ने कहा कि आपको कैंसर है । हे भगवान इतनी सी उम्र में क्या क्या दिखाया आपने इस परिवार को । नाना जी अपने सामर्थ्य के अनुसार इलाज करवा तो रहे है किंतु मानवता के नाते हमारा भी हक़ बनता है कि हो सके तो आप भी मदद के लिए आगे आये । यदि कुछ मदद करने को दिल चाहता हो तो  8890553555 या 9024589902 पर संपर्क करे ।

VMW Team के सक्रीय सदस्य एम के पाण्डेय निल्को बताया की कई लोग हमारी मदद को आगे आ रहे हैं। हम उन दोस्तों के शुक्रगुजार हैं, जिनकी आर्थिक सहायता से हम इनकी कुछ आर्थिक मदद कर पा रहे है जिससे इनको इलाज़ में आसानी हो रही है , हमारी टीम के आनंद उपाध्याय जो की मेडिकल क्षेत्र से है उन्होंने बताया की हम उनकी जाँच करने भी कसार नहीं छोड़ते है , खासकर कैंसर पीड़ितों के लिए हम उनका विशेष ध्यान रखते है। यदि आप उन कैंसर पीड़ितों हमारे साथ करना चाहते है, तो उपरोक्त नम्बर संपर्क कर सकते है।

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आलू पर कविता नहीं होता

कृपया ध्यान दे …!
मधुलेश पाण्डेय निल्को की यह एक वयंगात्मक रचना है, इसका उद्देशय किसी तो ठेस पहुचाना बिलकुल नहीं है।
ये कविता पढ़ना माना एक जुर्म है, पर इस जुर्म में किसी का मुंह काला नहीं होता | (डोंट वरी)

यह एक करारा जवाब है जो कहते है की आलू पर कविता नहीं होता |

तो पढ़िये यह शीषर्कहीन रचना और अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें।
आख़िर फूट ही गया आलू बम
निकाल दिया है सबका दम
दिखा दिया की हम नहीं है कम
और फोड़ दिया अनोखा बम
जैसे ही ये बम फूटा
लगा जैसे कुछ टूटा
निकला वही खोटा
जो था सबसे छोटा
बात आलू की करता हूँ
नहीं किसी से डरता हूँ
निल्को जब मैं लिखता हूँ
व्यंगों की वर्षा करता हूँ
शीषर्कहीन ये सूक्तिया है
विष्णु ने भरी बची रिक्तिया है
आलू की जो शक्तिया है
कम पड़ी मेरी पंक्तिया है
ये ब्लैक स्टोन की जो पूजा है
नहीं इनसा कोई दूजा है
बिलावल ने भी अब ठाना है
सुनाना अपना ही ताना बाना है  
मधुलेश पाण्डेय निल्को
एक आलू सेवनकर्ता

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ये चन्द लाइने लिखने से क्या फ़ायदा- एम के पाण्डेय ‘निल्को’

ए दोस्त ज़रा मुझ पर
रहमत की नज़र रखना
मै भी तुंहरा ही हूँ
इसकी तो खबर रखना 
मुझ जैसे डूबने वालों को
अब तेरा सहारा है
निल्को ने देख लिया सबको
अब तुझको पुकारा है 
कही डूब न जाऊ मैं
मेरा हाथ पकड़ रखना
तेरी ज़िंदगी के इतिहास में
मेरी भी एक कहानी लिखना 
प्रेम की गर न हो निशानी
ऐसी मीरा की क्या जो न हो दीवानी
ये चन्द लाइने लिखने से क्या फ़ायदा
जिसमे न हो तेरी मेरी कहानी

रंग तो इसका कुछ और चढ़ा होता
प्रेम का यदि व्याकरण तुमने पढ़ा होता
तुम्हारे साथ मिलकर मधुलेश
इक नया आचरण गढ़ा होता
अपनी तो क्या लिखू ए दोस्त
कुछ कम,कुछ गम और कुछ नम लिखते है
एक डायरी रखता हूँ दिल के अंदर
जिस पर सिर्फ़ और सिर्फ तुम्हारा नाम लिखते है
 एम के पाण्डेय निल्को
(युवा ब्लॉगर और कवि)

तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने

बस यही दौड़ है इस दौर के इन्सानो की
तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने
तू रहे पीछे और मैं सदा आगे
ऐसी कोई बात या करामात बने
निंदा हो या हो आलोचना
करता तू है यही आराधना
की मैं न आगे निकलु तेरे से
इसके लिए ही करुगा साधना
गया जमाना मदद , सहयोग का
लगता है ये कुछ हठयोग सा
अगर न माना इनकी बात
तो करते है ये काम लठयोग का
कैसे होगा दूर ये सब
कौन कराएगा नैया पार
गर यही चलता रहा तो निल्को
फस जाएगे बीच मझधार
*****************

एम के पाण्डेय निल्को
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राम नवमी की सभी दोस्त पाठकों को अनेक शुभकामनायें!

त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च  त्रिसमस्त्रिपु चोन्नतः 
त्रिताम्रस्त्रिपु च स्निग्धो गंभीरस्त्रिषु नित्यशः 
त्रिवली मांस्त्रयंवतः ………………….सुन्दरकाण्ड ३५/१७-१८
आप सभी को भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव रामनवमी की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाये.

VMW Team का होली मिलन समारोह सम्पन्न

आज के इस भागमभाग भरी जिन्दगी में किसी के पास भी समय नहीं है लेकिन पुछो की क्या करते है तो उनका जवाब यही होता है की – कुछ खास नहीं या कुछ भी तो नहीं । हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है एक साथ मिलना बड़ा मुश्किल हो गया है लेकिन तकनीक के इस समय मे हम हमेसा एक दूसरे से जुड़े रहते है । इस बार का होली मिलन समारोह फोन पर ही हुआ किन्तु मजेदार और रसदार था सभी लोग एक से बढ़ कर एक रगीली बाते अपनी पिचकारी से एक दूसरे पर छोड़ रहे थे और आश्चर्य की बात की कोई भी इसका बुरा नहीं मन रहा था क्योकि सबको पता है की माहौल तो फगुआ का है । इसी क्रम मे एम के पाण्डेय निल्को ने रची एक रंगभरी रचना, अब आप को ही बताना है की कितनी रंगी है और कितनी गुजियादार, मसालेदार है ये रचना………..

VMW Team का होली मिलन समारोह सम्पन्न
जिसमे से कुछ रंगभरी बाते हुई उत्पन्न
शुरुआत  की मुख्य आयोजक योगेश जी ने कुछ इस तरह
की सभी रंग गय , एक ही रंग में हमारी तरह
मुख्य अतिथि के रूप में हरिदयाल जी और रामसागर जी पधारे
और अपने रंगीन मिजाज से, हमको सुधारे
माइक मिला जब हमारे विजय भाई को
लेकिन छोड़ कर आए थे हमारी भौजाई को
सब लोगो ने किया इसका विरोध प्रदर्शन
दिलीप जी ने भी दिया भरपूर समर्थन
गोरखपुर से गजेन्द्र जी आए
होली की गुजिया भी लाए
साथ मे उनके देवेश हमारे
होली के वे गीत सुनाये
जब मौका मिला मधुलेश भाई को
मारा चौका और ले आए भौजाई को
होली पर कुछ रचना सुनाये
जो किसी को भी न सुहाए
इसी क्रम मे अभिषेक जी आए
क्या हाल सुनाए, क्या बात बताए
देव भूमि की हवा लगी है उनको
और ठण्ड लग रही है हम सबको
हिमाचल मे रहते ऋषिन्द्र जी
फगुआ मे बनाते सबको पगलेन्द्र जी
होली की उनकी बाते सुनकर
खड़े हो जाते सभी तनकर
त्रिपुरेन्द्र जी है आज कल अलवर
मचाते है अंदर ही ये खलबल
देसी इनका जो मिज़ाज रंगीला
कईयो का चेहरा हो जाता पीला
लाल गुलाल सिद्धार्थ जी  लाए
खुद को बाबू साहब कहलाए
बीच मे कूदना इनकी आदत
पर मिलता है इनको भी आदर
मोहक जी की मन मोहिनी सी छटा
मोहित कर गई, ऐसी हो गई घटा
गुल खिलाये ये जैसे गुलगुल्ले
और खिलाये हम सबको रसगुल्ले
आशुतोष हमारे लालू कहलाए
फागुन में किसी को भी भालू बनाए
साथ में इनके सुन्दर बाबू को लेकर
चल दिये रंग पिचकारी खरीदकर
नीलेश, सत्यम कम नहीं किसी ओर
रोज गढ़ते है ये मजेदार जोक
बात बात मे कहते है ये मर्द
सुनकर इनको होता है पेट दर्द
गिरिजेश बाबू का क्या कहना
सिद्धेश बाबा के साथ ही रहना
दोनों दक्ष है अपनी कक्षा में
पर आता नहीं कुछ इनके बक्से में
सर्वेश हमारे दबंग
होली मे मचाए हुड़दंग
निल्को ने किया पुनः अभिनन्दन
होली मनाए और ले आनन्दन
कुछ ऐसे मना मिलन समारोह
कोई नहीं यहा आरोह अवरोह
याद करेगी दुनिया हमको कुछ इस तरह
की इतिहास रचा जाता है जिस तरह
होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाये के साथ……
एम के पाण्डेय निल्को
VMW Team

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चेहरे की वो बात – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

चेहरे की वो बात
अधूरी रह गई थी रात
किनारे बैठे थे वे साथ
डाले एक दूसरे मे हाथ
कह रहे थे
सुन रहे थे
एक दूसरे को
बुन रहे थे
और चेहरा पढ़ने की कोशिश मे
एक दूसरे पर हस रहे थे
फिर झटके से टूटा सपना
सब कह रहे है अपना अपना
पर अनुभव भरे इस ज़िंदगी मे
दर्द कर रहा है मेरा टखना
रात रह गई
बात रह गई
सपना टूटा पर
वह साथ ही रह गई
जैसे आई वर्षा की बूंद
पी हो जैसे अमृत की घूट
मस्तिक मे हो रही शब्दो की युद्ध
और सब लग रहा था है ये शुद्ध
रच रहे थे निल्को डूब कर
कौन कराये उनको पार
पूरी कविता पढ़ समझ लो
इतना ही है बस मेरा सार
********************

एम के पाण्डेय निल्को

Valentine Special – आग लगे इस वेलेंटाइन डे को

क्या रोज डे
क्या प्रपोज डे
क्या करे प्रॉमिस डे को
किसे किस करे किस डे को
जब गर्ल फ्रेंड ही नहीं हमारी तो
आग लगे इस वेलेंटाइन डे को
जिस के नीचे बया करते है प्यार अपना
थोड़ा प्यार करे उस पेड़ को
अक्सर धोखा खा जाते है इश्क मे लोग
क्योकि दिल की जगह जिस्म चाहने लगे है लोग
प्यार का प्रदर्शन कुछ इस तरह करते है लोग
जैसे लाज हया बेच आए है वे लोग
विरोधी नहीं है निल्को प्रेम का
मिलता है मुझे भी भेट सप्रेम का
किन्तु प्यार का प्रदर्शन न हो कुछ इस तरह
की लोग कहे की बेशर्म है ये देश का
राज तो अपना भी चला करता है
पसंद करने वालो के दिल मे
और नापसन्द करने वालो के दिमाग मे बसा करता है
देखो अपना तो सीधा सा फंडा है यार
7 days मनाओ वेलेंटाइन का प्यार
आप लोगो से विनीति है बार बार
ध्यान रखे प्यार के लिए न हो वार
********************
एम के पाण्डेय निल्को


पलटना

पलटना एक शब्द नहीं
इसका एक ही अर्थ नहीं
समझ – समझ का अन्तर
और जो न समझे वो बंदर
कुछ लोग पलटा जाते है
धीरे से सरक जाते है
नहीं रहती अपनी ही बात याद उनको
और हमे भूल जाने की बात करते है
किन्तु पलटने से पहले सटना जरूरी है
और आगे बाद मे लिखूगा क्योकि
यह रचना अभी अधूरी है ……………..

एम के पाण्डेय निल्को


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लिखता हूँ बचपन की वो कहानी – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

बचपन की वो दुनिया
पचपन की उम्र में भी नहीं भूलती
क्योंकि जो की थी शरारते
वो भी कुछ नहीं कहती ।।  
न तो लोग बुरा मानते
और न ही मुझे मनाते
रूठे और मनाने के खेल से
हम किसी को नहीं सताते ।।
शाम को जब हम छत पर जाते
खेलते कूदते नहीं घबराते
पर आज के इस परिवेश में
हम बचपन को ही खोते पाते ।।
त्योहारों पर करते थे जो मस्ती
देखती रहती थी पूरी बस्ती
पर अब कोई साथ नहीं है
अकेलापन ही है अब सस्ती ।।
वो पेड़ों पर चड़ना और लटकना
मिट्टी में एक दूसरे को पटकना
छुपन छुपाई हो या हो सरकना
इसके लिए है अब तरसना ।।


लिखता हूँ बचपन की वो कहानी
खुद ही यानि निल्कोकी जुबानी
पर यह कलम अब नहीं चलती सुहानी
क्योंकि यह कविता शायद है अभी बाकी …….।।

एम के पाण्डेय निल्को

पुण्य और परिवर्तन का पर्व – मकर सक्रांति

मकर संक्रांति अनेकता में एकता का पर्व

मकर सक्रांति के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं अतः इस दिन को मकर सक्रांति के नाम से जाना जाता है | महाभारत काल में भीशमपितामा ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर सक्रांति का ही चयन किया था | मकर सक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरत के पीछे -पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी | शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवतायों की रात्री अर्थात मकरात्मकता का प्रतीक तथा उतरायन को देवतायों का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है इसलिए इस दिन जप , तप , दान , स्नान , श्राद्ध ,तर्पण आदि धार्मिक क्रिया कलापों का विशेष महत्त्व है

भारतीयों का प्रमुख पर्व मकर संक्रांति आज भी अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों में वहां की परंपराओं के अनुसार ही मनाया जा रहा है। साथ ही इसी दिन से भिन्न-भिन्न राज्यों में गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है।  विज्ञान के अनुसार भी मकर संक्रांति पर्व स्वास्थ्य की दृष्टि से विशेष फायदेमंद होता है। सूर्य के मकर राशि में आने से ठंड का असर कम होने लगता है। रंग-बिरंगी पतंगों से सजा खिला-खिला आकाश, उत्तरायण में खिलते नारंगी सूर्य देवता, तिल-गुड़ की मीठी-भीनी महक और दान-पुण्य करने की उदार धर्मपरायणता। यही पहचान है भारत के अनूठे और उमंग भरे पर्व मकर संक्रांति की। मकर संक्रांति यानी सूर्य का दिशा परिवर्तन, मौसम परिवर्तन, हवा परिवर्तन और मन का परिवर्तन। मन का मौसम से बड़ा गहरा रिश्ता होता है। यही कारण है कि जब मौसम करवट लेता है तो मन में तरंगे उठना बड़ा स्वाभाविक है। इन तरंगों की उड़ान को ही आसमान में ऊंची उठती पतंगों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।
पतंग और रिश्तों का गणित
ये पतंगे जीवन के सरल-कठिन पेंच सिखाती है। रिश्तों में इतनी ढील ना रहे कि सामने वाला लहराता ही रहे और ना ही इतनी खींचतान या तनाव कि वह आगे बढ़ ही न सके। ये पतंगे उन्नति, उमंग और उल्लास का लहराता प्रतीक है। ये पतंगे बच्चों की किलकती-चहकती खुशियों का सबब है। ये पतंगे आसमान को छू लेने का रंगों भरा हौसला देती है। ये पतंगे ही तो होती है जो सिर पर तनी मायावी छत को जी भर कर देख लेने का मौका देती है वरना रोजमर्रा के कामों में भला कहां फुरसत कि ऊंचे गगन को बैठकर निहारा जाए?

मीठे स्वाद में जावो घुल मिल

उड़ावो पंतग ऐसे की खिल जाये दिल
मकर सक्रांति की खुशियों में भर दो मिठास
VMW Team के मजेदार लेखो के साथ…..

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें

फ्रिज में रखे आटे के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी।

भोजन केवल शरीर को ही नहीं, अपितु मन-मस्तिष्क को भी गहरे तक प्रभावित करता है। दूषित अन्न-जल का सेवन न सिर्फ आफ शरीर-मन को बल्कि आपकी संतति तक में असर डालता है।
ऋषि- मुनियों ने दीर्घ जीवन के जो सूत्र बताये हैं उनमें ताजे भोजन पर विशेष जोर दिया है। ताजे भोजन से शरीर निरोगी होने के साथ-साथ तरोताजा रहता है और बीमारियों को पनपने से रोकता है। लेकिन जब से फ्रीज का चलन बढा है तब से घर-घर में बासी भोजन का प्रयोग भी तेजी से बढा है। यही कारण है कि परिवार और समाज में तामसिकता का बोलबाला है। ताजा भोजन ताजे विचारों और स्फूर्ति का आवाहन करता है जबकि बासी भोजन से क्रोध, आलस्य और उन्माद का ग्राफ तेजी से बढने लगा है। शास्त्रों में कहा गया है कि बासी भोजन भूत भोजन होता है और इसे ग्रहण करने वाला व्यक्ति जीवन में नैराश्य, रोगों और उद्विग्नताओं से घिरा रहता है। हम देखते हैं कि प्रायःतर गृहिणियां मात्र दो से पांच मिनट का समय बचाने के लिए रात को गूंथा हुआ आटा लोई बनाकर फ्रीज में रख देती हैं और अगले दो से पांच दिनों तक इसका प्रयोग होता है। गूंथे हुए आटेको उसी तरह पिण्ड के बराबर माना जाता है जो पिण्ड मृत्यु के बाद जीवात्मा के लिए समर्पित किए जाते हैं। किसी भी घर में जब गूंथा हुआ आटा फ्रीज में रखने की परम्परा बन जाती है तब वे भूत और पितर इस पिण्ड का भक्षण करने के लिए घर में आने शुरू हो जाते हैं जो पिण्ड पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे भूत और पितर फ्रीज में रखे इस पिण्ड से तृप्ति पाने का उपक्रम करते रहते हैं। जिन परिवारों में भी इस प्रकार की परम्परा बनी हुई है वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट, रोग-शोक और क्रोध तथा आलस्य का डेरा पसर जाता है। इस बासी और भूत भोजन का सेवन करने वाले लोगों को अनेक समस्याओं से घिरना पडता है। आप अपने इष्ट मित्रों, परिजनों व पडोसियों के घरों में इस प्रकार की स्थितियां देखें और उनकी जीवनचर्या का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे किसी न किसी उलझन से घिरे रहते हैं। आटा गूंथने में लगने वाले सिर्फ दो-चार मिनट बचाने के लिए की जाने वाली यह क्रिया किसी भी दृष्टि से सही नहीं मानी जा सकती।
पुराने जमाने से बुजुर्ग यही राय देते रहे हैं कि गूंथा हुआ आटा रात को नहीं रहना चाहिए। उस जमाने में फ्रीज का कोई अस्तित्व नहीं था फिर भी बुजुर्गों को इसके पीछे रहस्यों की पूरी जानकारी थी। यों भी बासी भोजन का सेवन शरीर के लिए हानिकारक है ही।

आइये आज से ही संकल्प लें कि आयन्दा यह स्थिति सामने नहीं आए। तभी आप और आपकी संतति स्वस्थ और प्रसन्न रह सकती है और औरों को भी खुश रखने लायक व्यक्तित्व का निर्माण कर सके । 

यह जरूरी तो नहीं…… – मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

दोस्तो पिछली रचना (तुम्हें दुनिया में जन्नत नज़र आएगी)  को सम्माननीय डॉ. रूप चंद मयंक जी के द्वारा चर्चामंच पर चर्चा की गई । उम्मीद से ज्यादा लोगो द्वारा द्वारा पढ़ी गई इस के लिए सभी पाठको का दिल से शुक्रिया…. आप की प्रतिक्रियाओं से मुझे हमेशा ही उर्जा और चिंतन की दिशा मिलती है, यूं ही आपका स्नेह मिलता रहे, आप लोगो के इस हौसला अफजाई से एक नई रचना आप के सामने प्रस्तुत है, शब्दो को समेटने की कोशिश की है ज़रा आप ही बताए की कितनी सिमटी है या नहीं ?

 

उनके दर पर ही खड़ा हूँ
पर वह अन्दर बुलाये यह जरूरी तो नहीं
मैं अपनी बात कहने की कोशिश की
पर वह मेरी भी सुने यह जरूरी तो नहीं
माना की शब्दो को समेटने की कोशिश की
पर वह सिमट जाए यह जरूरी तो नहीं
जानता हूँ की लोग हसेंगे इस पर भी
पर मैं किसी को रुलाऊ यह जरूरी तो नहीं
चर्चा मंच पर होती है कई लोगो की चर्चा
मधुलेश की भी हो यह जरूरी तो नहीं
नीद तो बिस्तर पे भी आ सकती है
मगर सिर उनकी गोद मे हो ये जरूरी तो नहीं
निल्को की नज़र मे सभी अच्छे है
पर उनकी नज़र मे मैं अच्छा हूँ ये जरूरी तो नहीं
मेरी कलम मे स्याही चाहे हो जितना
हमेशा चलेगी यह जरूरी तो नहीं
रचने की कोशिश की है मैंने भी
पर दुनिया मुझको ही पढ़ेगी यह जरूरी तो नहीं
माना कि खिले हुए फूलों से महक उठताहै गुलशन सारा
दिन और रात मे एक ही खुशबू हो  यह जरूरी तो नहीं
बीमार को मर्ज़ की दवा देनी ही चाहिए
पर वह दवा पिले यह जरूरी तो नहीं
बड़ी मुद्दत से रची है ये रचना
लेकिन ठीक से परोसी जाए यह जरूरी तो नहीं
नदी के किनारे चुप-चाप बैठा हूँ दोस्तो
प्यास मेरी भी मिटेगी यह जरूरी तो नहीं
विराम देने के लिए अंतिम पंक्ति की तलाश मे हूँ
पर वह आज ही मिलेगी यह जरूरी तो नहीं
ज़िंदगी के सफर मे थक जाते है लोग कई
पर मैं अभी थका सा महसूस करू यह जरूरी तो नहीं
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मधुलेश पाण्डेय निल्को

Madhulesh Pandey ‘Nilco’

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