Tag Archives: मुक्तक

मुक्तक – जो भी तेरे पास आता है ।

जो भी तेरे पास आता है
वो तेरा ही हो जाता है
तेरी उलझी सुलझी ये जुल्फ़े
मद मस्त होकर लहराता है

एम के पाण्डेय निल्को

मुक्तक – सुबह जैसे ही आँख खुलती है

सुबह जैसे ही आँख खुलती है
मानो एक शिकायत किया करती है
भोर होते ही क्यू छोड़ देता है मुझको
मेरी तनहाई मुझसे यही सवाल किया करती है

एम के पाण्डेय निल्को

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मुक्तक – तेरे चाहने वालों की बहुत आबादी है

तेरे चाहने वालों की बहुत आबादी है
पर निल्को को कहा लिखने पर पाबंदी है
ये टूटे फूटे मन के भावो को पढ़कर भी
लोग कहते है मधुलेश तेरी भी तो चाँदी है
एम के पाण्डेय निल्को


 

मुक्तक – नज़र निल्को की मैंने शीर्षक ही रख लिया

दिल मे कोई प्रेम रत्न धन रख लिया
उनके लिए लिख , उनका भी मन रख लिया
ऐसी नजरों से घूरते है वो मुझको
की नज़र निल्को की’ मैंने शीर्षक ही रख लिया

एम के पाण्डेय निल्को

मुक्तक – चाँद की चादनी मे नहाती रही

चाँद की चादनी मे नहाती रही

सारी रात मुझे वो जगाती रही

प्यार से ज़रा छु लिया था होठो को उसके

और निल्को की धुन वो अब तक गाती रही

एम के पाण्डेय निल्को


आतंकियों का समर्थन करने वालों का विरोध करती मेरी नयी रचना

(आठ आतंकियों के एनकाउंटर के लिए पुलिस का समर्थन और आतंकियों का समर्थन करने वालों का विरोध करती मेरी नयी रचना)
कवि – मयंक शर्मा (09302222285)

खूब मनाई दीवाली क्या खूब पटाखे फोड़े हैं
आठ फ़रिश्ते धरती से सीधे जन्नत को छोड़े हैं

जेल का दाना पानी खाकर जो अक्सर इतराते थे
संविधान को कोस कोस मस्ती में नाचे जाते थे

खाकी को गाली देते थे तुम कुछ ना कर पाओगे
बस हमको बिरयानी देते देते ही मर जाओगे

खाकी ने दिखलाया दम और नया सवेरा कर डाला
कतरा कतरा आतंकी का बारूदों से भर डाला

अंधकार को दूर भगाने नयी पहल कर  डाली है
दीवाली के अगले ही दिन चहल पहल कर डाली है

कुछ लोगों ने इसको फिर से जल्दी ही एक मोड़ दिया
वोटों की खातिर लाशों को फिर मज़हब से जोड़ दिया

आतंकी से हमदर्दी की फिर आवाज़े आती हैं
अंधकार के हक़ में लड़ने काली रातें आती हैं

कुछ कहते है गुंडागर्दी कुछ कहते मनमर्जी है
कुछ को फिर से पीड़ा है कि ये मुठभेड़ भी फर्जी है

कुछ लोगों को आठ वोट की कमी दिखाई देती है
कुछ की आँखों में मज़हब की नमी दिखाई देती है

कुछ चैनल के पत्रकार का पत्थर दिल भी पिघल गया
कैसे कोई अंधकार को इतनी जल्दी निगल गया

अपना भी एक दीप बुझ गया अंधकार से लड़ने में
लेकिन कोई कमी नहीं की उनके आगे अड़ने में

असली है मुठभेड़ अगर तो नमन हज़ारों है खाकी
नकली भी है तो उनको निपटाओ जितने हैं बाकी.

कवि – मयंक शर्मा (09302222285)
          दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
       
  

आप सभी को नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं।

चतुर्दश वार।
मिला सुतवार।।
बढे धन कीर्ति।
रहे यश शांति।।

                गजानन हाँथ।
                सदा उर साथ।।
                कटे सब कष्ट।
                रहे  प्रभु  दृष्ट।।

प्रदीप सुपर्व।
मिले अमरत्व।।
प्रकाश अपार।
प्रहर्ष हजार।।

                 जले जब प्रकाश।
                 सदा तम नाश।।
                 मिले तब प्रमोद।
                 रहे अनुमोद।।

करें सब विनोद।
सदैव प्रमोद।
बने क्षण अखर्व।
सदा बस अपूर्व।।
   
                 रहे प्रभु वास।
                 धनेश निवास।।
                 रहे बस हर्ष।
                 नही अपकर्ष।।
सौम्या मिश्रा

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