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मन की बात – एम के पाण्डेय निल्को

हम में से ज्यादातर लोगों का कोई टाईम टेबल नहीं होता, जब मन किया पढने बैठ जाते हैं, जो मन किया किताब उठा लेते हैं और पढने लगते हैं, कोई भी टॉपिक बीच से ही पढ्ने लग जाते हैं, इससे सिवाय confusion के कुछ हाथ नहीं लगता हमें ये तक पता नहीं रहता कि हमने कौन सा विषय कितना पढ लिया है, और लोग बेवजह ही अपनी meomory को दोष देते हैं, एक बेहतर रणनीति ही बेहतर जीत दिला सकती है, और रणनीति का पहला हिस्सा जो कि यहाँ पर टाईम टेबल है, यदि यह कमजोर है तो आप जीत की आशा कैसे कर सकते हैं, तो बेहतर सफलता के लिये एक बेहतर टाईम टेबल बनाईये

एम के पाण्डेय निल्को
ब्लॉगर

अपने लिए भी जियें…..!

ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं.! फिर शुरू होती है नौकरी की खोज.!
ये नहीं वो, दूर नहीं पास.
ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते,
अंत में एक तय होती है, और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है. !
और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक, वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है… अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल..!
इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ.!
‘वो’ स्थिर होता है.
बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं.
इतने में अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.!
विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.!
शादी के पहले 2-3 साल नर्म, गुलाबी, रसीले और सपनीले गुज़रते हैं.!
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने.!
पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं.!
क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमना फिरना, खरीदी होती है.!
और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.!
सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है.! उसका खाना पीना , उठना बैठना, शु-शु, पाॅटी, उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार.!
समय कैसे फटाफट निकल जाता है, पता ही नहीं चलता.!
इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना, घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला..?
इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और बच्चा बड़ा होता गया…
वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में.!
घर की किस्त, गाड़ी की किस्त और बच्चे की ज़िम्मेदारी, उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शून्य  बढ़ाने का टेंशन.!
उसने पूरी तरह से अपने आपको काम में झोंक दिया.!
बच्चे का स्कूल में एॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा.!
उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.!
इतने में वो पैंतीस का हो गया.!
खूद का घर, गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य.!
फिर भी कुछ कमी है..?
पर वो क्या है समझ में नहीं आता..!
इस तरह उसकी चिड़-चिड़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगता है।
दिन पर दिन बीतते गए, बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया.! उसकी दसवीं आई और चली गयी.!
तब तक दोनों ही चालीस के हो गए.!
बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.!
एक नितांत एकांत क्षण में उसे वो गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है,
“अरे ज़रा यहां आओ,
पास बैठो.!”
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें, कहीं घूम के आएं…! उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहती है,
“तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है. मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है..!” कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल जाती है.!
और फिर आता है पैंतालीसवां साल,
आंखों पर चश्मा लग गया,
बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे,
दिमाग में कुछ उलझनें शुरू हो जाती हैं,
बेटा अब काॅलेज में है,
बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं, उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और…
बेटे का कालेज खत्म हो गया,
अपने पैरों पर खड़ा हो गया.!
अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया…!!!
अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा…!
उसे भी चश्मा लग गया.!
अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा  हो रहा था..!
पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू हो गया.!
बैंक में अब कितने शून्य हो गए,
उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे..!
गोली-दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा.!
डाॅक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं.!
बच्चे बड़े होंगे….
ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा.
बच्चे कब वापस आएंगे,
अब बस यही हाथ रह गया था.!
और फिर वो एक दिन आता है.!
वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था.!
वो शाम की दिया-बाती कर रही थी.!
वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है.!
इतने में फोन की घंटी बजी,
उसने लपक के फोन उठाया,
उस तरफ बेटा था.!
बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा..!
उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा..?
अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी..!”
एक काम करिये, इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहिये.!”
कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया..!
वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी.
उसने उसे आवाज़ दी,
“चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें.!”
वो तुरंत बोली,
“बस अभी आई.!”
उसे विश्वास नहीं हुआ,
चेहरा खुशी से चमक उठा,
आंखें भर आईं,
उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए,
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया..!!
उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा,
“बोलो क्या बोल रहे थे.?”
पर उसने कुछ नहीं कहा.!
उसने उसके शरीर को छू कर देखा, शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था..!
क्षण भर को वो शून्य हो गई,
“क्या करूं” उसे समझ में नहीं आया..!
लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई,  धीरे से उठी और पूजाघर में गई.!
एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई..!
उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली,
“चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे.!”
बोलो…!! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं..!
वो एकटक उसे देखती रही,
आंखों से अश्रुधारा बह निकली.!
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया.!
ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था….!!
यही जिंदगी है…??
नहीं….!!!
संसाधनों का अधिक संचय न करें,
ज्यादा चिंता न करें,
सब अपना अपना नसीब ले कर आते हैं.!
अपने लिए भी जियो, वक्त निकालो..!
सुव्यवस्थित जीवन की कामना…!!
जीवन आपका है, जीना आपने ही है…!
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

मन सुधरेगा तो जीवन भी सुधरेगा

किसी राजा के पास एक बकरा था ।
एक बार उसने एलान किया की जो कोई
इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा मैं उसे आधा राज्य दे दूंगा।
किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं
इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा।
इस एलान को सुनकर एक मनुष्य राजा के पास
आकर कहने लगा कि बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है।
वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारे दिन
उसे घास चराता रहा,, शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई
और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है
अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ,,
बकरे के साथ वह राजा के पास गया,,
राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा।
इस पर राजा ने उस मनुष्य से कहा की तूने
उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों खाने लगता।
बहुत जनो ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया
किंतु ज्यों ही दरबार में उसके सामने घास डाली जाती तो
वह फिर से खाने लगता।
एक विद्वान् ब्राह्मण ने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है,,
मैं युक्ति से काम लूँगा,, वह बकरे को चराने के लिए ले गया।
जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से मारता,,
सारे दिन में ऐसा कई बार हुआ,, अंत में बकरे ने सोचा की यदि
मैं घास खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी।
शाम को वह ब्राह्मण बकरे को लेकर राजदरबार में लौटा,,
बकरे को तो उसने बिलकुल घास नहीं खिलाई थी
फिर भी राजा से कहा मैंने इसको भरपेट खिलाया है।
अत: यह अब बिलकुल घास नहीं खायेगा,,
लो कर लीजिये परीक्षा….
राजा ने घास डाली लेकिन उस बकरे ने उसे खाया तो क्या
देखा और सूंघा तक नहीं….
बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी कि अगर
घास खाऊंगा तो मार पड़ेगी….अत: उसने घास नहीं खाई….

मित्रों ” यह बकरा हमारा मन ही है “

बकरे को घास चराने ले जाने वाला ब्राह्मण ” आत्मा” है।

राजा “परमात्मा” है।

मन को मारो नहीं,,, मन पर अंकुश रखो….
मन सुधरेगा तो जीवन भी सुधरेगा।

अतः मन को विवेक रूपी लकड़ी से रोज पीटो..
कमाई छोटी या बड़ी हो सकती है…
पर रोटी की साईज़ लगभग सब घर में 
एक जैसी ही होती है…!!

 बहुत सुन्दर सन्देश -::

अगर आप किसी को छोटा देख रहे हो, तो आप उसे;

या तो “दूर” से देख रहे हो,
या अपने “गुरुर” से देख रहे हो !…
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता

एम के पाण्डेय ‘निल्को’  

कुछ मेरे मित्र मेरे परिचय के बारे में ज्रिक कर रहे थे , उनकी शिकायत थी की कभी मैंने अपना परिचय ठीक से नहीं दिया | बताना चाहूगा की यह मेरी कमजोरी है की मैं अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता कई बार कोशिश की किन्तु सफल पूरी तरह से न हो सका , एक बार पुनः संक्षिप्त में कोशिश कर रहा हूँ ज़रा आप की बताइए कहा तक यह कोशिश सफल हुई | लेकिन इस बात का अफ़सोस है की कुछ लोग – 

हज़ारों ऐब ढूँढ़ते है वो निल्को में इस तरह,

अपने किरदारों में वो फरिश्तें हो जैसे …..!


और मैं हर बार यही कहता हूँ की –

जैसा भी हूँ अच्छा या बुरा अपने लिए हूँ 
मैं ख़ुद को नहीं देखता औरो की नज़र से ….!
वैसे 
ख़ामोशी भी  बहुत कुछ कहती है
कान लगाकर नहीं ,

दिल लगाकर सुनो ….

मै कोई बहुत बड़ा लेखक या कवि नहीं , बस यूं ही अपने मन के भावों को अपनी कलम के जरिये कागज़ पर उतार लेता हूँ जो कहीं कविताओं के रूप मे, कहीं लेखो के रूप मे अपनी जगह बना लेते है । मैं इस विश्व के जीवन मंच पर अदना सा किरदार हूँ जो अपनी भूमिका न्यायपूर्वक और मन लगाकर निभाने का प्रयत्न कर रहा है। पढ़ाई लिखाई के हिसाब से बुद्धू डिब्बा (कम्प्युटर) से स्नातक हूँ और प्रबंधन से परास्नातक। कई मासिक पत्रिका और वैबसाइट पर स्वतंत्र लेखन में कविता, टिप्पणी, आलोचना आदि में विशेष रुचि है उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िला के हरखौली गाँव मे जन्म और राजस्थान मे पढ़ाई की और आगे गांवो के लिए कुछ सरकारी – गैर सरकारी , सामाजिक परियोजनाओ का संचालन करने का इरादा । अपनी रचनाओ के माध्यम से गांवो/लोगो में जागरुकता लाना चाहता हूं ऒर समाज के लोगों का ध्यान उनकी समस्याओं की ऒर खीचना चाहता हूं। ताकि उनको भी स्वतंत्र पहचान एवं उडान भरने के लिए खुला आसमान मिल सके। बस यही मेरे जीवन का लक्ष्य है । बस इतनी सी बातें है मेरे बारे में।


सादर 

एम के पाण्डेय ‘निल्को’ 

शायद किसी की नज़र लग गई…

कुछ दिनों से परेशान हूँ
एक बात से हैरान हूँ
जिस तरह से रहते थे हम एक साथ
आज क्यों इतने दुराव हूँ
कल जब उनके चेहरे को देखा था
तभी से सोच कर हैरान हूँ
शायद किसी की नज़र लग गई
या सब बेगाने हो गए
किसी अनहोनी की डर से
आज मैं बहुत परेशान हूँ
सोचता हूँ की डांटू उनको
जोरदार से मारू उनको
पर उनके भोलेपन से
सोचता हूँ माफ करू उनको
तुमसे नाराज नहीं है निल्को
तुम्हारे दुखो से ही परेशान हूँ
शायद एक सुबह होगी
जो नई बात से शुरू होगी
ग़लतफ़हमी होगी दूर सबकी
मिलेगे किसी ठिकाने पर एक साथ
ऐसी मेरी सोच होगी

एम के पाण्डेय निल्को

‘मेक इन इण्डिया’….. अच्छा है।

मेक इन इण्डिया का नारा अच्छा है। 
काम भी होगा यह विश्वास अच्छा है।
जैसे ही घोषणा हुई दिल्ली के विज्ञान भवन में
मिलेगी नौकरी बेराजगारो को, यह विचार अच्छा है
विश्व स्तर पर निवेश पटल का नया चेहरा 
अर्थव्यवस्था का दिल धडकना अच्छा है
आयेगे अब गौर इस भारत में,
किस्तमत के कारखानों का चरमराना अच्छा है
माना कि हम थोडी देर से आये
किन्तु बिना भरोसे का चाइनीज नही
मंगल मिशन की कामयाबी का ताजा उदाहरण अच्छा है
दुनिया को शून्य हमने दिया है।
अन्तर्राष्ट्र्ीय स्तर पर यह पहचान अच्छा है। 
पहली बार देश को प्रधानमंत्री ऐसा मिला है।
जिस पर लोगों का विश्वाश अच्छा है।
दिमाग में उठती है जब इन बातों की गुफ्तगु
तो ‘निल्को’ ने कहा कि इनको कागज पर मूर्तरूप देना ही अच्छा है
                                                       
एम. के. पाण्डेय निल्को

प्रधानमंत्री के नाम, खुला पत्र

दिंनाक 27 सितम्बर 2014


सेवा मे,

       माननीय प्रधानमंत्री महोदय,

       भारत सरकार,

       रायसिना हील,

       नई दिल्ली।


विषय- संयुक्त राष्ट्र् संघ को अपनी भाषा में सम्बोधित करने के सन्दर्भ में।


मान्यवर,

     यह खुला पत्र लिखते हुए आपार हर्ष हो रहा है कि –


9 साल तक किया वीसा के इनकार

अब हुआ अमेरिका को मोदी से प्यार।


कहॉं गए भारत के सेक्युलर…… देखो मोदी बिना वीसा के अमेरिका में घुस गए और वहांॅ मोदी का रॉक स्टॉर जैसा क्रेज देखने लायक। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को संयुक्त राष्ट्र् महासभा को हिन्दी में सम्बोधित करने पर अन्नत शुभकामना और बधाई। आज पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को स्वास्थ्य ठीक होता और वह भी अमेरिका में होते तो सोने पे सुहागा होता।

     श्री नरेन्द्र मोदी दूसरे प्रधानमंत्री है जिन्होनें अमेरिका में अपनी भाषा में सम्बोधित किया इससे पहले हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी अपना लोहा मनवा चुके है। वर्तमान प्रधानमंत्री को पुन एक बार शुभकामनाए और बधाई। जब किसी को जरूरत होती है तो ही वह आप की सुनता है।

फिर चाहे किसी भाषा में बोले तो अनुवाद करे या समझे यह उनकी समस्या है। आज हम मंगल ग्रह पर भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर चुके है। किन्तु हमारी एक खास पहचान टांग खिचार्ड भी है।

भारत के अनुभवी पत्रकार कहते है कि मंगलयान को ऑर्बिट में रखना अपनी जगह है और अमेरिका से इन्वेस्टमेंट कराना अपनी जगह……!

अब आप ही बताइए यह कोई तुलना हुई हमारे पत्रकार, चैनल वाले अमेरिका ऐसे भागे जैसे ओबामा ने मोदी की जगह इन्हे न्योता दिया है-

अमेरिका दौर के ऐन पहले दुनिया से अपील की आओ, बनाओ….. भारत में….. गजब की टाइमिंग….. आप सोच रहे होगे की पत्र लिखने वाला विषय से दूर हट रहा है पर यह नजरिये का दोष हो सकता है। सब एक दूसरे से जुडे हुए है। माहौल बनाया है चीन को गुजरात बुला दिया। जापान में ड्र्म बजा दिया और 55 विलियन डालर का दोनो से वादा ले आए अब अमेरिका की बारी……

प्रधानमंत्री की यात्राओ के भारी माहौल से हम साधारण नागरिकों को कोई सीधा लाभ मिले, यह असम्भव है। किन्तु करोडों नौजवानों के लिए विदेषी निवेश तभी होगा जब माहौल बनेगा।

जिस अमेरिका में छह-हजार की भीड जमा करने में अमेरिकी नेताओं के पसीने छूट जाते थे, वहॉ नरेन्द्र मोदी के कार्यक्रम के 20 हजार टिकट हाथो हाथ बिक गए…. तस्वीर कुछ कहती है। विचार करिएगा।

अंत में प्रधानमंत्री के इस दौरे के लिए सभी-देशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ अमेरिका को भी बधाई और अन्नत शुभकामनाए।


भवदीय

मधुलेश पाण्डेय निल्को

           


मैं अपनी पहचान कैसे छोड़ दूं!

तेरी गलिया भी करती है यही पुकार
मुझे छोड़ , कहाँ चले गए यार
जब तू आया था पहली बार
सब लोगो से पता पूछा बार बार
और कई दिन तक लगातार
बाहर करता था इन्तजार
आज तू बड़ा हो गया
इसलिए दूर हो गया
जब तू धीरे – धीरे चलता था
गली के बच्चो के साथ खेलता था
शायद अब तू बड़ा खेल खेलता है
इसलिए दूर हो गया
सोचता हूँ निल्को
तेरी चर्चा छोड़ दूँ
तेरी गलिया
तेरा चौबारा
छोड़ दूँ
दिन गया बहुत गुजर
कट गया यह भी सफर
तुम लाख बार कुछ भी कहो
पर यह याद रखना की
मैं अपनी पहचान कैसे छोड़ दूं!
*******************
मधुलेश पाण्डेय निल्को
 
  

….बंजारे को घर मिला

दोस्तो मेरे मित्र सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत कहते है की आज कल रचनाओ मे अलंकार का प्रयोग देखने को कम ही मिलता है , उनकी इस बात से कुछ हट तक सहमत मैं भी हूँ । बहुत कोशिश करने के बाद कुछ प्रयोग करने की कोशिश है, ज़रा आप लोग ही बताए की कोशिश कहा तक सफल रही । साथ मे पाठको की जानकारी के लिए अलंकार के बारे मे भी कुछ जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
अलंकार का शाब्दिक अर्थ है, ‘आभूषण। जिस प्रकार सुवर्ण आदि के आभूषणों से शरीर की शोभा बढ़ती है उसी प्रकार काव्य अलंकारों से काव्य की। काव्य में भाषा को शब्दार्थ से सुसज्जित तथा सुन्दर बनाने वाले चमत्कारपूर्ण मनोरंजन ढंग को अलंकार कहते हैं। भारतीय साहित्य में अनुप्रास, उपमा, रूपक, अनन्वय, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, संदेह, अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति आदि प्रमुख अलंकार हैं।

 

अब यह रचना आप के लिए …..

समय पर जब समय मिला

सागर मे भी गगन मिला
मुलाक़ात जब उनसे हुई
मानो बंजारे को घर मिला
खुशखबर जब यह सुना
उनके लिए ही गीत गुना
जिसको सर्च किया मैंने यहाँ वहाँ
वह तो मेरे ही करीब मिला
राजनीति पर जब यह कलम चली
काजनीति की लहर चली
गली मोहल्ले और चौराहे पर
मधुलेश की ही बात चली
कुछ सीखने की जब सीख मिली
नहीं किसी से भीख मिली
जब वह अकेले चले थे
तो नहीं यह भीड़ चली
बेशक कवियों की घनी आबादी है
पर लिखने की कहाँ पाबन्दी है
कभी-कभी तो चर्चा मंच पर भी
निल्को की भी लहर चली
****************
मधुलेश पाण्डेय निल्को

 

आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें!
 धन्यवाद ………!

अच्छा लगता है बनाम अच्छा नहीं लगता – मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मधुलेश पाण्डेय निल्को
दोस्तो, आज पहली बार युग्म मे रचना प्रकाशित कर रहा हूँ , दोनों रचना एक ही सिक्के के दोनों पहलू है। आप अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से मुझे अवगत करा कर कृतार्थ करे , आप की इन प्रतिक्रियाओ से मुझे एक अलग प्रकार के आनंद की प्राप्ति होती है, यूं ही आपका स्नेह मिलता रहे, आप लोगो के इस हौसला अफजाई से एक नई रचना आप के सामने प्रस्तुत है 

(1)       अच्छा लगता है…..
वर्षा के मौसम में,
और घर के बालकनी में,
भीगना, अच्छा लगता है
शाम के समय में
और ‘निल्को’ के साथ में
कलम चलाना  अच्छा लगता है
रविवार के दिन मैं
और बाज़ार के भीड़ में
पहचान बनाना अच्छा लगता है
चांदनी रात में
और उनके साथ में
बातें करना अच्छा लगता है
सावन के महीने में,
और गर्मी के पसीने में
कूलर के आगे बैठना ही अच्छा लगता है
(२) अच्छा नहीं लगता…..
बाज़ार की भीड़ में
मैं भी खो जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता
अपने ही शहर में
घूम कर घर नहीं जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता
काम-काज के क्षेत्र में
उनकी तरह चुगली करना
मुझे अच्छा नहीं लगता
रचना प्रकाशित होने के बाद
पाठको की प्रतिक्रिया न मिलना
मुझे अच्छा नहीं लगता
इस भीड़ तंत्र में
गुमनाम सा ‘निल्को’ को जीना
मुझे अच्छा नहीं लगता

             मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’ 

यह जरूरी तो नहीं…… – मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

दोस्तो पिछली रचना (तुम्हें दुनिया में जन्नत नज़र आएगी)  को सम्माननीय डॉ. रूप चंद मयंक जी के द्वारा चर्चामंच पर चर्चा की गई । उम्मीद से ज्यादा लोगो द्वारा द्वारा पढ़ी गई इस के लिए सभी पाठको का दिल से शुक्रिया…. आप की प्रतिक्रियाओं से मुझे हमेशा ही उर्जा और चिंतन की दिशा मिलती है, यूं ही आपका स्नेह मिलता रहे, आप लोगो के इस हौसला अफजाई से एक नई रचना आप के सामने प्रस्तुत है, शब्दो को समेटने की कोशिश की है ज़रा आप ही बताए की कितनी सिमटी है या नहीं ?

 

उनके दर पर ही खड़ा हूँ
पर वह अन्दर बुलाये यह जरूरी तो नहीं
मैं अपनी बात कहने की कोशिश की
पर वह मेरी भी सुने यह जरूरी तो नहीं
माना की शब्दो को समेटने की कोशिश की
पर वह सिमट जाए यह जरूरी तो नहीं
जानता हूँ की लोग हसेंगे इस पर भी
पर मैं किसी को रुलाऊ यह जरूरी तो नहीं
चर्चा मंच पर होती है कई लोगो की चर्चा
मधुलेश की भी हो यह जरूरी तो नहीं
नीद तो बिस्तर पे भी आ सकती है
मगर सिर उनकी गोद मे हो ये जरूरी तो नहीं
निल्को की नज़र मे सभी अच्छे है
पर उनकी नज़र मे मैं अच्छा हूँ ये जरूरी तो नहीं
मेरी कलम मे स्याही चाहे हो जितना
हमेशा चलेगी यह जरूरी तो नहीं
रचने की कोशिश की है मैंने भी
पर दुनिया मुझको ही पढ़ेगी यह जरूरी तो नहीं
माना कि खिले हुए फूलों से महक उठताहै गुलशन सारा
दिन और रात मे एक ही खुशबू हो  यह जरूरी तो नहीं
बीमार को मर्ज़ की दवा देनी ही चाहिए
पर वह दवा पिले यह जरूरी तो नहीं
बड़ी मुद्दत से रची है ये रचना
लेकिन ठीक से परोसी जाए यह जरूरी तो नहीं
नदी के किनारे चुप-चाप बैठा हूँ दोस्तो
प्यास मेरी भी मिटेगी यह जरूरी तो नहीं
विराम देने के लिए अंतिम पंक्ति की तलाश मे हूँ
पर वह आज ही मिलेगी यह जरूरी तो नहीं
ज़िंदगी के सफर मे थक जाते है लोग कई
पर मैं अभी थका सा महसूस करू यह जरूरी तो नहीं
*********************
मधुलेश पाण्डेय निल्को

Madhulesh Pandey ‘Nilco’

VMW Team
 A Blog where available many articles on
 Politics, Bollywood, Cricket, Lifestyle, Education,
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तुम्हें दुनिया में जन्नत नज़र आएगी – मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

आईने के सामने न आया करो
जुल्फों को यू न सवारा करो
अपनी ही नज़र न लगाया करो
यू हंस – हंस कर न इशारा करो
अपनी अदाए यू ही न दिखाया करो
अगड़ाइया लेकर ये जुल्म न डाला करो
मार डालेगी यह अदा यू ही न दिखाया करो
तुम्हें दुनिया में जन्नत नज़र आएगी
निल्को की नज़र से जब तुम देखा करो
सताते हो जिस तरह तुम मुझको
किसी गैर को तो सता कर देखो
खुदा के लिए अब छोड़ तो यह पर्दा
तुम्हारा नहीं अब कोई है कर्जा
इस पर्दे को ज़रा उठा कर के देखो
किसी दिन ज़रा मुस्करा कर के देखो
तुम्हें दुनिया में जन्नत नज़र आएगी
किसी को अपना बना कर के देखो
मैंने दुनिया को आजमा कर के  देखा
अब तुम भी मुझे आजमा कर के देखो
गर वह नाराज़ है तुमसे
किसी दिन उसे मना कर के देखो ……..
 *************
मधुलेश पाण्डेय निल्को
 

Madhulesh Pandey ‘Nilco’

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धन्यवाद ………! 

प्रधानमंत्री- श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी


भारत की महान परम्पराओं एवं संस्कारों का पालन करने करने वाले नेता “श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी” को देश के “प्रधानमंत्री” बनने पर बहुत बहुत बधाईया !! – VMW Team

भाइयो तुम्हारी याद आती है

दुनिया की हर ख़ुशी मेरे पास बहुत हैं.
आज फिर भी मेरा दिल उदास बहुत हैं.
कुछ भी कर लु अकेलापन जाता नहीं
जबकि मेरे आसपास मेरे खास बहुत हैं
भाइयो तुम्हारी याद आती है
हर पल याद सताती है
जो बिताये कुछ दिन मई के महीने में
बस वही बात याद आती है
भाइयो तुम्हारी याद……….

3 मई से मिलना शुरु किया
१५ मई से बिछड़ना शुरू किया
इस बीच क्या – क्या बात हुई
यही बात सताती है
 भाइयो तुम्हारी याद……….

ऑफिस का केबिन हो
या कोचिंग की क्लास
घर का कमरा हो
या बाहर का बागवान
हर जगह तुम्हारी याद सताती है
भाइयो तुम्हारी याद……….

वो आम के बगीचे की
वो खेत और खलिहान की
दोपहर में छत की
हर बात सताती है
भाइयो तुम्हारी याद……….

निल्को की कलम भी कह रही
आँखे भी परिभाषा गढ़ रही
कब मुलाकात वापिस होगी
यही बात सताती है
भाइयो तुम्हारी याद……….
  
मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’









तेरी यादों के सल्तनत पे कोई जोर नहीं मेरा
गुजरे लम्हों के हर तह में इतिहास बहुत हैं
तेरी यादों के सल्तनत पे कोई जोर नहीं मेरा
गुजरे लम्हों के हर तह में इतिहास बहुत हैं.


बहुत आसाँ है रो देना, बहुत मुश्किल हँसाना है
कोई बिन बात हँस दे-लोग कहते हैं “दिवाना है”

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लोकतन्त्र की दिवाली – एम के पाण्डेय निल्को

हम करेगे जब मतदान

तब बचेगी लोकतन्त्र की शान

नहीं गलेगी नेतावों की दाल

जनता समझ चुकी है इन की चाल

जो होगा सबसे लायक

वही बनेगा अपना नायक

करो मतदान , लाओ खुशहाली

यही तो है लोकतन्त्र की दिवाली

सब तक पहुचे निल्को का पैगाम

वोटिंग करना है पहला काम

अगर जीना है मान सम्मान से

तो मत जी चुराओ मतदान से

जो नहीं करेगा मतदान

समझो नहीं उसे देश का ध्यान

लोग देते है बहुत से ज्ञान

पर अपनी समझ से करना जरूर मतदान

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एम के पाण्डेय निल्को

मतदान करते समय एतना जरुर याद रहे।
हर मतदाता भारत का भाग्य विधाता है।
आप मतदान करें।

और भारत के भाग्य विधाता बनें।
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प्रकृति का सफाई अभियान


गाँव शहर और सड़क तक भर गया पानी
और याद आ गई सबको अपनी नानी
तो निल्को ने कहा –
परेशान मत हो मेरे बाबू
क्योकि यंहा प्रकृति का सफाई अभियान है चालू
नदियो का पानी आपे से बाहर हो रहा
लोगो का जीवन इससे दुसवार हो रहा
जिसे लोग बाढ़ कह कर परेशान है
वह तो प्रकृति का सफाई अभियान है
प्रकृति अपनी सफाई अलग तरीके से करती है
यही बात तो लोगो को अखरती है
प्रकृति के इस बर्ताव से
मानवता घायल हो जाती है
और इस बरसात के मौसम मे
नदिया पागल हो जाती है
प्रकृति जब नि:शुल्क सब देती है
तो ब्याज सहित वसूलती है
प्रकृति कभी भी जेल बना देती है
और आगे विज्ञान भी फेल हो जाती है
जब – जब प्रकृति से छेड़-छाड़ हुई
नुकसान मनुष्य का होता है
यह अटल सत्य है
जिस पर विश्वास सभी का होता है
गर प्रकृति को किया परेशान
तो खुद परेशान हो जाओगे
नहीं बचेगा नामो-निशान
और आदिवासी कहलाओगे
कर रहा मधुलेश निवेदन
मत काटो हरियाली को
गर फिरा इसका दिमाग तो
नहीं दिखेगा यह बागवानी तो
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मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

इस बरसात के मौसम मे …..


इस बरसात के मौसम मे …..
आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।

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मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

उत्तर प्रदेश

एम.के.पाण्डेय “निल्को जी”
दोस्तों इस बार VMW Team  के एम.के.पाण्डेय “निल्को जी” आप को भारत का सबसे बड़ा राज्य (जनसंख्या के आधार पर) के बारे में बताने जा रहे है अच्छा लगने पर अपने सुझाव मेल या कमेन्ट जरुर करे.. धन्यवाद !

उत्तर प्रदेश का इतिहास बहुत प्राचीन और दिलचस्‍प है। उत्तर वैदिक काल में इसे ब्रह्मर्षि देश या मध्‍य देश के नाम से जाना जाता था। यह वैदिक काल के कई महान ऋषि-मुनियों, जैसे – भारद्वाज, गौतम, याज्ञवल्‍क्‍य, वशिष्‍ठ, विश्‍वामित्र और वाल्‍मीकि आदि की तपोभूमि रहा। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा (जनसंख्या के आधार पर) राज्य है। करीब १६ करोड़ की जनसंख्या के साथ उत्तर प्रदेश विश्व का सर्वाधिक आबादी वाला उप राष्ट्रीय इकाई है। विश्व में केवल पाँच राष्ट्र चीन, स्वयं भारत, संराअमेरिका, इण्डोनिशिया, और ब्राज़ील की जनसंख्या प्रदेश की जनसंख्या से अधिक है उत्तर प्रदेश की राज्धानी लखनऊ है । रामायण में वर्णित तथा हिन्दुओं के एक मुख्य भगवान “भगवान राम” का प्राचीन राज्य कौशल इसी क्षेत्र में था, अयोध्या इस राज्य की राजधानी थी। हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान विष्णु के आठवे अवतार भगवान कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में हुआ था। संसार के प्राचीनतम शहरों में एक माना जाने वाला वाराणसी शहर भी यहीं पर स्थित है। वाराणसी के पास स्थित सारनाथ का चौखन्डी स्तूप भगवान बुद्ध के प्रथम प्रवचन की याद दिलाता है।
उत्तर प्रदेश का भारतीय एवं हिन्दू धर्म के इतिहास मे अहम योगदान रहा है। उत्तर प्रदेश आधुनिक भारत के इतिहास और राजनीति का केन्द्र बिन्दु रहा है और यहाँ के निवासियों ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम और पाकिस्तान पृथकता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। इलाहाबाद शहर प्रख्यात राष्ट्रवादी नेताओं जैसे मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टन्डन और लालबहादुर शास्त्री का घर था। यह शहर भारत देश के आठ प्रधान मन्त्रियों जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, लालबहादुर शास्त्री, चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह चन्द्रशेखर, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी का चुनाव क्षेत्र भी रहा है। इंदिरा गांधी के पुत्र स्वर्गीय संजय गांधी का चुनाव-क्षेत्र भी यहीं था और वर्तमान में सोनिया गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ रही हैं जबकि राहुल गांधी अमेठी से चुनाव लड़ रहे हैं। सन १९०२ में नार्थ वेस्ट प्रोविन्स का नाम बदल कर यूनाइटिड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे यूपी कहा गया। सन १९२० में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद से लखनऊ कर दिया गया। प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक् न्यायपीठ स्थापित की गयी। स्वतन्त्रता के बाद १२ जनवरी सन १९५० में इस क्षेत्र का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रख दिया गया। गोविंद वल्लभ पंत इस प्रदेश के प्रथम मुख्य मन्त्री बने। अक्टूबर १९६३ में सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश एवम भारत की प्रथम महिला मुख्य मन्त्री बनी।
उत्तर प्रदेश के उत्तर में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, पश्‍चिम में हरियाणा, दक्षिण में मध्‍य प्रदेश तथा पूर्व में बिहार राज्‍य है। सन २००० में पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र स्थित गढ़वाल और कुमाऊँ मण्डल को मिला कर एक नये राज्य उत्तरांचल का गठन किया गया जिसका नाम बाद में बदल कर उत्तराखण्ड कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा (जनसंख्या के आधार पर) राज्य है। लखनऊ प्रदेश की प्रशासनिक व विधायिक राजधानी है और इलाहाबाद न्यायिक राजधानी है। प्रदेश के अन्य महत्त्वपूर्ण शहर हैं आगरा, अलीगढ, अयोध्या, बरेली, मेरठ, वाराणसी( बनारस), गोरखपुर, गाज़ियाबाद, मुरादाबाद, सहारनपुर, फ़ैज़ाबाद, कानपुर। इसके पड़ोसी राज्य हैं उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार। उत्तर प्रदेश की पूर्वोत्तर दिशा में नेपाल देश है।
साहित्य के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश का स्थान सर्वोपरि है. साहित्य और भारतीय सेना दो ऐसे क्षेत्र हैं जिनमे उत्तर प्रदेश निवासी गर्व कर सकते हैं. आदि कवी वाल्मीकि , तुलसीदास , कबीरदास , सूरदास से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचर्य राम चन्द्र शुक्ल, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद , निराला, पन्त, बच्चन, महादेवी वर्मा, मासूम राजा, अज्ञये जैसे इतने महान कवि और लेखक हुए हैं उत्तर प्रदेश में कि पूरा पन्ना ही भर जाये. उर्दू साहित्य में भी बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है उत्तर प्रदेश का. फिराक़, जोश मलीहाबादी, चकबस्त जैसे अनगिनत शायर उत्तर प्रदेश ही नहीं वरन देश की शान रहे हैं.
संगीत उत्तर प्रदेश के व्यक्ति के जीवन में बहुत महतवपूर्ण स्थान रखता हैं यह तीन प्रकार में बांटा जा सकता है १- पारंपरिक संगीत एवं लोक संगीत : यह संगीत और गीत पारंपरिक मौको शादी विवाह, होली, त्योहारों आदि समय पर गया जाता है २- शास्त्रीय संगीत : उत्तर प्रदेश उत्तक्रिष्ठ गायन और वादन की परंपरा रही है. ३- हिंदी फ़िल्मी संगीत एवं भोजपुरी पॉप संगीत : इस प्रकार का संगीत उत्तर प्रदेश में सबसे लोकप्रिय है.
कत्थक उत्तर प्रदेश का एक परिष्कृत शास्त्रीय नृत्य है जो कि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ किया जाता है। कत्थक नाम ‘कथा’ शब्द से बना है, इस नृत्य में नर्तक किसी कहानी या संवाद को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करता है। कत्थक नृत्य के प्रमुख कलाकार पन्डित बिरजू महाराज हैं। फरी नृत्य, जांघिया नृत्य, पंवरिया नृत्य, कहरवा, जोगिरा, निर्गुन, कजरी, सोहर, चइता गायन उत्तर प्रदेश की लोकसंस्कृतियां हैं ।
इलाहाबाद में प्रत्‍येक बारहवें वर्ष कुंभ मेला आयोजित होता है जो कि संभवत: दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। इसके अलावा इलाहाबाद में प्रत्‍येक 6 साल में अर्द्ध कुंभ मेले का आयोजन भी होता है। इलाहाबाद में ही प्रत्‍येक वर्ष जनवरी में माघ मेला भी आयोजित होता है, जहां बड़ी संख्‍या में लोग संगम में डुबकी लगाते हैं। अन्‍य मेलों में मथुरा, वृंदावन व अयोध्‍या के झूला मेले शामिल हैं, जिनमें प्रतिमाओं को सोने एवं चांदी के झूलों में रखा जाता है। ये झूला मेले एक पखवाड़े तक चलते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा में डुबकी लगाना अत्‍यंत पवित्र माना जाता है और इसके लिए गढ़मुक्‍तेश्‍वर, सोरन, राजघाट, काकोरा, बिठूर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और अयोध्‍या में बड़ी संख्‍या में लोग एकत्रित होते हैं। आगरा जिले के बटेश्‍वर कस्‍बे में पशुओं का प्रसिद्ध मेला लगता है। बाराबंकी जिले का देवा मेला मुस्‍लिम संत वारिस अली शाह के कारण काफी प्रसिद्ध हो गया है। इसके अतिरिक्‍त यहां हिंदू तथा मुस्‍लिमों के सभी प्रमुख त्‍यौहारों को राज्‍य भर में मनाया जाता है।
उत्तर प्रदेश में सभी प्रकार के सैलानियों के लिए आकर्षण की कई चीजें हैं। प्राचीन तीर्थ स्थानों में वाराणसी, विंध्‍याचल, अयोध्‍या, चित्रकूट, प्रयाग, नैमिषारण्‍य, मथुरा, वृंदावन, देव शरीफ, फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्‍ती की दरगाह, सारनाथ, श्रावस्‍ती, कुशीनगर, संकिसा, कंपिल, पिपरावा और कौशांबी प्रमुख हैं। आगरा, अयोध्‍या, सारनाथ, वाराणसी, लखनऊ, झांसी, गोरखपुर, जौनपुर, कन्नौज, महोबा, देवगढ़, बिठूर और विंध्‍याचल में हिंदू एवं मुस्‍लिम वास्‍तुशिल्‍प और संस्‍कृति के महत्‍वपूर्ण खजाने हैं।
इसी के साथ अगले हफ्ते एक नई प्रदेश के बारे में जानेगे तब तक के लिए नमस्कार !
जय हिंद !

मधुलेश पाण्डेय “निल्को जी”
 

 
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