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मन की बात – एम के पाण्डेय निल्को

हम में से ज्यादातर लोगों का कोई टाईम टेबल नहीं होता, जब मन किया पढने बैठ जाते हैं, जो मन किया किताब उठा लेते हैं और पढने लगते हैं, कोई भी टॉपिक बीच से ही पढ्ने लग जाते हैं, इससे सिवाय confusion के कुछ हाथ नहीं लगता हमें ये तक पता नहीं रहता कि हमने कौन सा विषय कितना पढ लिया है, और लोग बेवजह ही अपनी meomory को दोष देते हैं, एक बेहतर रणनीति ही बेहतर जीत दिला सकती है, और रणनीति का पहला हिस्सा जो कि यहाँ पर टाईम टेबल है, यदि यह कमजोर है तो आप जीत की आशा कैसे कर सकते हैं, तो बेहतर सफलता के लिये एक बेहतर टाईम टेबल बनाईये

एम के पाण्डेय निल्को
ब्लॉगर

अपने लिए भी जियें…..!

ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं.! फिर शुरू होती है नौकरी की खोज.!
ये नहीं वो, दूर नहीं पास.
ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते,
अंत में एक तय होती है, और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है. !
और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक, वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है… अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल..!
इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ.!
‘वो’ स्थिर होता है.
बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं.
इतने में अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.!
विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.!
शादी के पहले 2-3 साल नर्म, गुलाबी, रसीले और सपनीले गुज़रते हैं.!
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने.!
पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं.!
क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमना फिरना, खरीदी होती है.!
और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.!
सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है.! उसका खाना पीना , उठना बैठना, शु-शु, पाॅटी, उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार.!
समय कैसे फटाफट निकल जाता है, पता ही नहीं चलता.!
इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना, घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला..?
इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और बच्चा बड़ा होता गया…
वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में.!
घर की किस्त, गाड़ी की किस्त और बच्चे की ज़िम्मेदारी, उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शून्य  बढ़ाने का टेंशन.!
उसने पूरी तरह से अपने आपको काम में झोंक दिया.!
बच्चे का स्कूल में एॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा.!
उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.!
इतने में वो पैंतीस का हो गया.!
खूद का घर, गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य.!
फिर भी कुछ कमी है..?
पर वो क्या है समझ में नहीं आता..!
इस तरह उसकी चिड़-चिड़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगता है।
दिन पर दिन बीतते गए, बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया.! उसकी दसवीं आई और चली गयी.!
तब तक दोनों ही चालीस के हो गए.!
बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.!
एक नितांत एकांत क्षण में उसे वो गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है,
“अरे ज़रा यहां आओ,
पास बैठो.!”
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें, कहीं घूम के आएं…! उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहती है,
“तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है. मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है..!” कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल जाती है.!
और फिर आता है पैंतालीसवां साल,
आंखों पर चश्मा लग गया,
बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे,
दिमाग में कुछ उलझनें शुरू हो जाती हैं,
बेटा अब काॅलेज में है,
बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं, उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और…
बेटे का कालेज खत्म हो गया,
अपने पैरों पर खड़ा हो गया.!
अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया…!!!
अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा…!
उसे भी चश्मा लग गया.!
अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा  हो रहा था..!
पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू हो गया.!
बैंक में अब कितने शून्य हो गए,
उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे..!
गोली-दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा.!
डाॅक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं.!
बच्चे बड़े होंगे….
ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा.
बच्चे कब वापस आएंगे,
अब बस यही हाथ रह गया था.!
और फिर वो एक दिन आता है.!
वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था.!
वो शाम की दिया-बाती कर रही थी.!
वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है.!
इतने में फोन की घंटी बजी,
उसने लपक के फोन उठाया,
उस तरफ बेटा था.!
बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा..!
उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा..?
अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी..!”
एक काम करिये, इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहिये.!”
कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया..!
वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी.
उसने उसे आवाज़ दी,
“चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें.!”
वो तुरंत बोली,
“बस अभी आई.!”
उसे विश्वास नहीं हुआ,
चेहरा खुशी से चमक उठा,
आंखें भर आईं,
उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए,
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया..!!
उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा,
“बोलो क्या बोल रहे थे.?”
पर उसने कुछ नहीं कहा.!
उसने उसके शरीर को छू कर देखा, शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था..!
क्षण भर को वो शून्य हो गई,
“क्या करूं” उसे समझ में नहीं आया..!
लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई,  धीरे से उठी और पूजाघर में गई.!
एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई..!
उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली,
“चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे.!”
बोलो…!! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं..!
वो एकटक उसे देखती रही,
आंखों से अश्रुधारा बह निकली.!
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया.!
ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था….!!
यही जिंदगी है…??
नहीं….!!!
संसाधनों का अधिक संचय न करें,
ज्यादा चिंता न करें,
सब अपना अपना नसीब ले कर आते हैं.!
अपने लिए भी जियो, वक्त निकालो..!
सुव्यवस्थित जीवन की कामना…!!
जीवन आपका है, जीना आपने ही है…!
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

मन सुधरेगा तो जीवन भी सुधरेगा

किसी राजा के पास एक बकरा था ।
एक बार उसने एलान किया की जो कोई
इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा मैं उसे आधा राज्य दे दूंगा।
किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं
इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा।
इस एलान को सुनकर एक मनुष्य राजा के पास
आकर कहने लगा कि बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है।
वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारे दिन
उसे घास चराता रहा,, शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई
और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है
अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ,,
बकरे के साथ वह राजा के पास गया,,
राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा।
इस पर राजा ने उस मनुष्य से कहा की तूने
उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों खाने लगता।
बहुत जनो ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया
किंतु ज्यों ही दरबार में उसके सामने घास डाली जाती तो
वह फिर से खाने लगता।
एक विद्वान् ब्राह्मण ने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है,,
मैं युक्ति से काम लूँगा,, वह बकरे को चराने के लिए ले गया।
जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से मारता,,
सारे दिन में ऐसा कई बार हुआ,, अंत में बकरे ने सोचा की यदि
मैं घास खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी।
शाम को वह ब्राह्मण बकरे को लेकर राजदरबार में लौटा,,
बकरे को तो उसने बिलकुल घास नहीं खिलाई थी
फिर भी राजा से कहा मैंने इसको भरपेट खिलाया है।
अत: यह अब बिलकुल घास नहीं खायेगा,,
लो कर लीजिये परीक्षा….
राजा ने घास डाली लेकिन उस बकरे ने उसे खाया तो क्या
देखा और सूंघा तक नहीं….
बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी कि अगर
घास खाऊंगा तो मार पड़ेगी….अत: उसने घास नहीं खाई….

मित्रों ” यह बकरा हमारा मन ही है “

बकरे को घास चराने ले जाने वाला ब्राह्मण ” आत्मा” है।

राजा “परमात्मा” है।

मन को मारो नहीं,,, मन पर अंकुश रखो….
मन सुधरेगा तो जीवन भी सुधरेगा।

अतः मन को विवेक रूपी लकड़ी से रोज पीटो..
कमाई छोटी या बड़ी हो सकती है…
पर रोटी की साईज़ लगभग सब घर में 
एक जैसी ही होती है…!!

 बहुत सुन्दर सन्देश -::

अगर आप किसी को छोटा देख रहे हो, तो आप उसे;

या तो “दूर” से देख रहे हो,
या अपने “गुरुर” से देख रहे हो !…
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता

एम के पाण्डेय ‘निल्को’  

कुछ मेरे मित्र मेरे परिचय के बारे में ज्रिक कर रहे थे , उनकी शिकायत थी की कभी मैंने अपना परिचय ठीक से नहीं दिया | बताना चाहूगा की यह मेरी कमजोरी है की मैं अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता कई बार कोशिश की किन्तु सफल पूरी तरह से न हो सका , एक बार पुनः संक्षिप्त में कोशिश कर रहा हूँ ज़रा आप की बताइए कहा तक यह कोशिश सफल हुई | लेकिन इस बात का अफ़सोस है की कुछ लोग – 

हज़ारों ऐब ढूँढ़ते है वो निल्को में इस तरह,

अपने किरदारों में वो फरिश्तें हो जैसे …..!


और मैं हर बार यही कहता हूँ की –

जैसा भी हूँ अच्छा या बुरा अपने लिए हूँ 
मैं ख़ुद को नहीं देखता औरो की नज़र से ….!
वैसे 
ख़ामोशी भी  बहुत कुछ कहती है
कान लगाकर नहीं ,

दिल लगाकर सुनो ….

मै कोई बहुत बड़ा लेखक या कवि नहीं , बस यूं ही अपने मन के भावों को अपनी कलम के जरिये कागज़ पर उतार लेता हूँ जो कहीं कविताओं के रूप मे, कहीं लेखो के रूप मे अपनी जगह बना लेते है । मैं इस विश्व के जीवन मंच पर अदना सा किरदार हूँ जो अपनी भूमिका न्यायपूर्वक और मन लगाकर निभाने का प्रयत्न कर रहा है। पढ़ाई लिखाई के हिसाब से बुद्धू डिब्बा (कम्प्युटर) से स्नातक हूँ और प्रबंधन से परास्नातक। कई मासिक पत्रिका और वैबसाइट पर स्वतंत्र लेखन में कविता, टिप्पणी, आलोचना आदि में विशेष रुचि है उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िला के हरखौली गाँव मे जन्म और राजस्थान मे पढ़ाई की और आगे गांवो के लिए कुछ सरकारी – गैर सरकारी , सामाजिक परियोजनाओ का संचालन करने का इरादा । अपनी रचनाओ के माध्यम से गांवो/लोगो में जागरुकता लाना चाहता हूं ऒर समाज के लोगों का ध्यान उनकी समस्याओं की ऒर खीचना चाहता हूं। ताकि उनको भी स्वतंत्र पहचान एवं उडान भरने के लिए खुला आसमान मिल सके। बस यही मेरे जीवन का लक्ष्य है । बस इतनी सी बातें है मेरे बारे में।


सादर 

एम के पाण्डेय ‘निल्को’ 

शायद किसी की नज़र लग गई…

कुछ दिनों से परेशान हूँ
एक बात से हैरान हूँ
जिस तरह से रहते थे हम एक साथ
आज क्यों इतने दुराव हूँ
कल जब उनके चेहरे को देखा था
तभी से सोच कर हैरान हूँ
शायद किसी की नज़र लग गई
या सब बेगाने हो गए
किसी अनहोनी की डर से
आज मैं बहुत परेशान हूँ
सोचता हूँ की डांटू उनको
जोरदार से मारू उनको
पर उनके भोलेपन से
सोचता हूँ माफ करू उनको
तुमसे नाराज नहीं है निल्को
तुम्हारे दुखो से ही परेशान हूँ
शायद एक सुबह होगी
जो नई बात से शुरू होगी
ग़लतफ़हमी होगी दूर सबकी
मिलेगे किसी ठिकाने पर एक साथ
ऐसी मेरी सोच होगी

एम के पाण्डेय निल्को

‘मेक इन इण्डिया’….. अच्छा है।

मेक इन इण्डिया का नारा अच्छा है। 
काम भी होगा यह विश्वास अच्छा है।
जैसे ही घोषणा हुई दिल्ली के विज्ञान भवन में
मिलेगी नौकरी बेराजगारो को, यह विचार अच्छा है
विश्व स्तर पर निवेश पटल का नया चेहरा 
अर्थव्यवस्था का दिल धडकना अच्छा है
आयेगे अब गौर इस भारत में,
किस्तमत के कारखानों का चरमराना अच्छा है
माना कि हम थोडी देर से आये
किन्तु बिना भरोसे का चाइनीज नही
मंगल मिशन की कामयाबी का ताजा उदाहरण अच्छा है
दुनिया को शून्य हमने दिया है।
अन्तर्राष्ट्र्ीय स्तर पर यह पहचान अच्छा है। 
पहली बार देश को प्रधानमंत्री ऐसा मिला है।
जिस पर लोगों का विश्वाश अच्छा है।
दिमाग में उठती है जब इन बातों की गुफ्तगु
तो ‘निल्को’ ने कहा कि इनको कागज पर मूर्तरूप देना ही अच्छा है
                                                       
एम. के. पाण्डेय निल्को

प्रधानमंत्री के नाम, खुला पत्र

दिंनाक 27 सितम्बर 2014


सेवा मे,

       माननीय प्रधानमंत्री महोदय,

       भारत सरकार,

       रायसिना हील,

       नई दिल्ली।


विषय- संयुक्त राष्ट्र् संघ को अपनी भाषा में सम्बोधित करने के सन्दर्भ में।


मान्यवर,

     यह खुला पत्र लिखते हुए आपार हर्ष हो रहा है कि –


9 साल तक किया वीसा के इनकार

अब हुआ अमेरिका को मोदी से प्यार।


कहॉं गए भारत के सेक्युलर…… देखो मोदी बिना वीसा के अमेरिका में घुस गए और वहांॅ मोदी का रॉक स्टॉर जैसा क्रेज देखने लायक। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को संयुक्त राष्ट्र् महासभा को हिन्दी में सम्बोधित करने पर अन्नत शुभकामना और बधाई। आज पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को स्वास्थ्य ठीक होता और वह भी अमेरिका में होते तो सोने पे सुहागा होता।

     श्री नरेन्द्र मोदी दूसरे प्रधानमंत्री है जिन्होनें अमेरिका में अपनी भाषा में सम्बोधित किया इससे पहले हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी अपना लोहा मनवा चुके है। वर्तमान प्रधानमंत्री को पुन एक बार शुभकामनाए और बधाई। जब किसी को जरूरत होती है तो ही वह आप की सुनता है।

फिर चाहे किसी भाषा में बोले तो अनुवाद करे या समझे यह उनकी समस्या है। आज हम मंगल ग्रह पर भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर चुके है। किन्तु हमारी एक खास पहचान टांग खिचार्ड भी है।

भारत के अनुभवी पत्रकार कहते है कि मंगलयान को ऑर्बिट में रखना अपनी जगह है और अमेरिका से इन्वेस्टमेंट कराना अपनी जगह……!

अब आप ही बताइए यह कोई तुलना हुई हमारे पत्रकार, चैनल वाले अमेरिका ऐसे भागे जैसे ओबामा ने मोदी की जगह इन्हे न्योता दिया है-

अमेरिका दौर के ऐन पहले दुनिया से अपील की आओ, बनाओ….. भारत में….. गजब की टाइमिंग….. आप सोच रहे होगे की पत्र लिखने वाला विषय से दूर हट रहा है पर यह नजरिये का दोष हो सकता है। सब एक दूसरे से जुडे हुए है। माहौल बनाया है चीन को गुजरात बुला दिया। जापान में ड्र्म बजा दिया और 55 विलियन डालर का दोनो से वादा ले आए अब अमेरिका की बारी……

प्रधानमंत्री की यात्राओ के भारी माहौल से हम साधारण नागरिकों को कोई सीधा लाभ मिले, यह असम्भव है। किन्तु करोडों नौजवानों के लिए विदेषी निवेश तभी होगा जब माहौल बनेगा।

जिस अमेरिका में छह-हजार की भीड जमा करने में अमेरिकी नेताओं के पसीने छूट जाते थे, वहॉ नरेन्द्र मोदी के कार्यक्रम के 20 हजार टिकट हाथो हाथ बिक गए…. तस्वीर कुछ कहती है। विचार करिएगा।

अंत में प्रधानमंत्री के इस दौरे के लिए सभी-देशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ अमेरिका को भी बधाई और अन्नत शुभकामनाए।


भवदीय

मधुलेश पाण्डेय निल्को

           


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