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जवानों के काफिले पर हमला कई जवान शहीद, आखिर कब तक??

मेरी अश्रुपूरित श्रदांजलि उन अमर शहीद सैनिकों को ,और उनके परिवारजनों की ओर से सुनी कोखों और कलाइयों का दर्द आपके सामने , शेयर करें अगर देश से प्यार है ताकि फिर एक सर्जीकल स्ट्राइक हो

बहुत हो रहा समझौता इन दो कौड़ी के नागों से।
फिर कहता हूँ न हल निकलेगा मीठी मीठी बातों से।।
घर मे घुसकर इनको मारो दम दिखलाओ मोदी जी।
या फिर सत्ता करो हवाले सैनिक को तुम मोदी जी।।
राजनीति के बस में कुछ न राजनीति ही दिखती है।
देश भूलकर सारी कोशिस मुद्दों पर ही टिकती है।।
समझौता क्यों मुद्दों खातिर सैनिक की है लाशों से।
रोज रोज है कोख उजड़ती चरण चाटती बातों से।।
कुछ कुत्ते दाखिल हो जाते सीमा के दरवाजों से।
तेरे cctv कँहा गए क्या लगे हुए दरबारों में।।
कहते थे सीमा पर कोई नहीं परिंदा पर मारे।
एक के बदले 10 सर लेंगे लगते थे ऐसे नारे।।
कोख पूछती तुमसे है क्यों बार बार सैनिक मरता।
कहते रहते हो मोदी से अखिल विश्व हलहल कँपता।।
अगर इंच है 56 वाला तो दिखला दो मोदी जी।
दूध छठी का नामर्दों को चलो पिला दो मोदी जी।।
आगे आगे मैं जाऊँगा कसम सैन्य की खाता हूँ।
पाकिस्तान पर गर हमले का एक निमंत्रण पाता हूँ।।
एक बार घर मे घुस करके इनका दमन जरूरी है।
इनके काले मंसूबों पर काला कफन जरूरी है।।
बस इक मौका सेना को दो पाकिस्तान मिटाने का।
माँ का जितना दूध पिया है उसका कर्ज निभाने का।।

जय हिंद! जय भारत
योगेश योगी किसान
9755454999

पुलवामा में हुये शहीदों को नमन बंदे मातरम् – सरिता कोहिनूर

भारत माता पर न्यौछावर, वीर सपूत हुये बलिदान।
उनकी शहादत याद रखेगा,युगों युगों तक हिंदुस्तान।
पुलवामा में आंतकी ने,जो हरकत दिख लाई है,
भारत माता के सीने में, दर्द कि आग जलाई है।
खैर नहीं अब ओ नापाकी,तू तो अपनी गिनती गिन
होगें अनाथ बच्चे भी तेरे,बालिद और आका के बिन।
इस दहशत गर्दी से भारत,अब न डरने वाला है,
भारत माता का हर बेटा,सरहद पर मरने वाला है
काश्मीर की पावन धरती भारत का स्वाभिमान है।
जब तक तन में साँसे बाकी,वो पोरुष का अभिमान है।
तुमने अठरह मारे है हम भी अठ्ठाइस ले लेगें।
खून का बदला खून ही होगा,अब हम गम को न झेलेगें।

बंदे मातरम्

सरिता कोहिनूर

कुछ और हो गए तुम – सोनू जैन

शेर  से  शोर  हो   गये  हो  तुम,
कितने कमज़ोर हो गये हो तुम।

हमको  पहचानते  नहीं  साहब,
आज कुछ ओर हो गये हो तुम।

बात  करते  नहीं ख़ुदा  से भी,
क्या कोई चोर हो गये हो तुम।

तुमको मालूम  ही नहीं  शायद,
ख़ुद से भी बोर हो गये हो तुम।

“सोनू” तुमसे हमें ये कहना है,
मैं पतंग, डोर  हो गये हो तुम।

✍सोनू कुमार जैन

ग़ज़ल – सरिता कोहिनूर

देश के उपकार पर अभिसार होना चाहिए
आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए

कौन कहता है,यहाँ है देश भक्तों की कमी
देखने वाली ऩज़र में धार होना चाहिए

सरहदों पर सैनिकों की क्यों शहादत रोज हो
आधुनिक और तेज सब हथियार होना चाहिए

पाक की नापाक कोशिश, चीन का अभिमान भी
तोड़ कर सीमा हमें अब पार होना चाहिए

देश की रोटी हैं खाते और बजाते पाक की
दोगले घोषित यहाँ गद्दार होना चाहिए

आज भी जिसको यहाँ माँ भारती से प्रेम है
उन जियालों का यहाँ सत्कार होना चाहिए

बह रहा है रक्त में हम सबके भारत का नमक
इसलिए माँ भारती पे वार होना चाहिए

देखती है ख़्वाब सरिता देश की तरुणाइ का
विश्व गुरु का अर्थ अब साकार होना चाहिए

सरिता कोहिनूर 💎

भारत महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश


एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट में भारत को महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश बताया गया है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की सर्वे में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा, मानव तस्करी और यौन व्यापार में ढकेले जाने के आधार पर भारत को महिलाओं के लिए खतरनाक बताया गया है । 

इस सर्वे के अनुसार महिलाओं के मुद्दे पर युद्धग्रस्त अफगानिस्तान और सीरिया क्रमश: दूसरे और तीसरे सोमालिया चौथे और सउदी अरब पांचवें स्थान पर हैं । सात साल पहले इसी सर्वे में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश बताया गया था।

दुनिया भर से केवल 548 जानकारों से 26 मार्च से 4 मई के बीच ऑनलाइन फोन और व्यक्तिगत तौर पर रायशुमारी की गई और बना दी गई एक ऐसा रिपोर्ट जिस पर विश्वास हो भी तो क्यो और कैसे ? 


जो फिरंगी आजतक एक आदर्श परिवार न बसा सके वो खुद के बनाए मापदंड के अनुसार भारत का सर्वे कर रहे है ? इस मुद्दे पर महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा है कि भारत के बाद रखे गए देशों में महिलाओं को बोलने का हक भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों से सर्वे किया गया उनकी संख्या बहुत कम है। उनकी राय के आधार पर दुनिया की राय नहीं बनाई जा सकती। 

भारत से ज्यादा सुरक्षा जिन देशो में है इस सर्वे के मुताबिक , उनका नाम लिखुंगा तो हसते हसते पेट मे दर्द हो जाएगा । आज भी भारत की महिलाएं और देशो की महिलाओं की तुलना में बहुत सभ्य संस्कारी और सुरक्षित है हाँ कुछ अपवाद हो सकते है इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता लेकिन इस तरह की रिपोर्ट तो बस पूर्व प्रायोजित ही है । महिलाएं ही नहीं किसी भी श्रेणी के लोगो के लिए भारत ही सबसे सुरक्षित देश है , इसके लिए कोई भी इतिहास का सहारा ले सकता है ।

एम के पाण्डेय निल्को

भारत और महाभारत

*दुर्योधन और राहुल गांधी* –
                           दोनों ही अयोग्य होने पर भी सिर्फ राजपरिवार में पैदा होने के कारन शासन पर अपना अधिकार समझते हैं।

*भीष्म और आडवाणी* –
                       कभी भी सत्तारूढ़ नही हो सके फिर भी सबसे ज्यादा सम्मान मिला। उसके बाद भी जीवन के अंतिम पड़ाव पे सबसे ज्यादा असहाय दिखते हैं।

*अर्जुन और नरेंद्र मोदी*-
                     दोनों योग्यता से धर्मं के मार्ग पर चलते हुए शीर्ष पर पहुचे जहाँ उनको एहसास हुआ की धर्म का पालन कर पाना कितना कठिन होता है।

*कर्ण और मनमोहन सिंह* –
                      बुद्धिमान और योग्य होते हुए भी अधर्म का पक्ष लेने के कारण जीवन में वांछित सफलता न पा सके।

*जयद्रथ और केजरीवाल*-
                           दोनों अति महत्वाकांक्षी एक ने अर्जुन का विरोध किया दूसरे ने मोदी का। हालांकि इनको राज्य तो प्राप्त हुआ लेकिन घटिया राजनीतिक सोच के कारण बाद में इनकी बुराई ही हुयी।

*शकुनि और दिग्विजय-*
                    दोनों ही अपने स्वार्थ के लिए अयोग्य मालिको की जीवनभर चाटुकारिता करते रहे।

*धृतराष्ट्र और सोनिया* –
                      अपने पुत्र प्रेम में अंधे है।

*श्रीकृष्ण और कलाम-*
                     भारत में दोनों को बहुत सम्मान दिया जाता है परन्तु न उनकी शिक्षाओं को कोई मानता है और न उनके बताये रास्ते का अनुसरण करता है।

–यह है *भारत और महाभारत*

विक्रम संवत और शक संबत

ये दोनों ही संवत शकों पर भारतीय चक्रवर्ती राजाओं की विजय के स्मारक हैं। विक्रम संवत 57 ईपू सम्राट विक्रमादित्य द्वारा शकों पर जीत के उपलक्ष में माना जाता है जबकि शक संवत 78 ई. में सातवाहनों द्वारा शकों पर विजय के रूप में मनाया जाता है या शक सम्राट कनिष्क द्वारा प्रारंभ किया बताया जाता है।
शक संवत भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर है जबकि विक्रम संबत हिन्दुओं का धार्मिक कलेन्डर है।
बारह महीने का एक वर्ष और सात दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ | महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है | यह बारह राशियाँ बारह सौर मास हैं | जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है | पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है | उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है | चंद्र वर्ष सौर वर्ष से 11 दिन 3 घाटी 48 पल छोटा है | इसीलिए हर 3 वर्ष में इसमें 1 महीना जोड़ दिया जाता है |
यह चैत्र शुक्ल पक्ष प्रथम नवरात्रि के प्रथम दिन से शुरू होता है।
बर्तमान में प्रचलित ईसा सन में +57 करने पर विक्रम संबत और -78 करने पर शक सबंत निकल आता है।

ग़ज़ल का विश्लेषण

ग़ज़ल शेरों से बनती हैं। हर शेर में दो पंक्तियां होती हैं। शेर की हर पंक्ति को मिसरा कहते हैं। ग़ज़ल की ख़ास बात यह हैं कि उसका प्रत्येक शेर अपने आप में एक संपूर्ण कविता होता हैं और उसका संबंध ग़ज़ल में आने वाले अगले पिछले अथवा अन्य शेरों से हो, यह ज़रूरी नहीं हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी ग़ज़ल में अगर २५ शेर हों तो यह कहना ग़लत न होगा कि उसमें २५ स्वतंत्र कविताएं हैं। शेर के पहले मिसरे को ‘मिसर-ए-ऊला’ और दूसरे को ‘मिसर-ए-सानी’ कहते हैं।

मत्ला-
ग़ज़ल के पहले शेर को ‘मत्ला’ कहते हैं। इसके दोनों मिसरों में यानि पंक्तियों में ‘क़ाफिया’ होता हैं। अगर ग़ज़ल के दूसरे सेर की दोनों पंक्तियों में भी क़ाफिया हो तो उसे ‘हुस्ने-मत्ला’ या ‘मत्ला-ए-सानी’ कहा जाता हैं।

क़ाफिया-
वह शब्द जो मत्ले की दोनों पंक्तियों में और हर शेर की दूसरी पंक्ति में रदीफ के पहले आये उसे ‘क़ाफिया’ कहते हैं। क़ाफिया बदले हुए रूप में आ सकता हैं। लेकिन यह ज़रूरी हैं कि उसका उच्चारण समान हो, जैसे बर, गर तर, मर, डर, अथवा मकां, जहां, समां इत्यादि।

रदीफ-
प्रत्येक शेर में ‘क़ाफिये’ के बाद जो शब्द आता हैं उसे ‘रदीफ’ कहते हैं। पूरी ग़ज़ल में रदीफ एक होती हैं। कुछ ग़ज़लों में रदीफ नहीं होती। ऐसी ग़ज़लों को ‘ग़ैर-मुरद्दफ ग़ज़ल’ कहा जाता हैं।

मक़्ता-
ग़ज़ल के आखरी शेर को जिसमें शायर का नाम अथवा उपनाम हो उसे ‘मक़्ता’ कहते हैं। अगर नाम न हो तो उसे केवल ग़ज़ल का ‘आख़री शेर’ ही कहा जाता हैं। शायर के उपनाम को ‘तख़ल्लुस’ कहते हैं। प्रो0 वसीम बरेलवी साहब की इस ग़ज़ल के माध्यम से अभी तक ग़ज़ल के बारे में लिखी गयी बातें आसान हो जायेंगी।

तुम्हें ग़मों का समझना अगर न आएगा
तो मेरी आँख में आंसू नज़र न आएगा

ये ज़िन्दगी का मुसाफिर ये बेवफा लम्हा
चला गया तो कभी लौटकर न आएगा

बनेंगे ऊंचे मकानों में बैठकर नक़्शे
तो अपने हिस्से में मिट्टी का घर न आएगा

मना रहे हैं बहुत दिनों से जश्न ए तिश्ना लबी
हमें पता था ये बादल इधर न आएगा

लगेगी आग तो सम्त-ए-सफ़र न देखेगी
मकान शहर में कोई नज़र न आएगा

‘वसीम’ अपने अन्धेरों का खुद इलाज करो
कोई चराग जलाने इधर न आएगा

इस ग़ज़ल का ‘क़ाफिया’ अगर, नज़र, कर, घर, इधर, नज़र, इधर हैं। इस ग़ज़ल की ‘रदीफ’ “न आएगा” है। यह हर शेर की दूसरी पंक्ति के आख़िर में आयी हैं। ग़ज़ल के लिये यह अनिवार्य हैं। इस ग़ज़ल के प्रथम शेर को ‘मत्ला’ कहेंगे क्योंकि इसकी दोनों पंक्तियों में ‘रदीफ’ और ‘क़ाफिया’ हैं। सब से आख़री शेर ग़ज़ल का ‘मक़्ता’ कहलाएगा क्योंकि इसमें ‘तख़ल्लुस’ हैं।

बहर, वज़्न या मीटर (meter)
शेर की पंक्तियों की लंबाई के अनुसार ग़ज़ल की बहर नापी जाती हैं। इसे वज़्न या मीटर भी कहते हैं। हर ग़ज़ल उन्नीस प्रचलित बहरों में से किसी एक पर आधारित होती हैं। बोलचाल की भाषा में सर्वसाधारण ग़ज़ल तीन बहरों में से किसी एक में होती हैं-
१. छोटी बहर-
रोशनी से हैं दामन बचाए
कितने खुद्दार होते हैं साए

२. मध्यम बहर–
कुछ इतना देखा है ज़माने में ये तेरा मेरा
के दोस्ती से भरोसा ही उठ गया मेरा

३. लंबी बहर-
मेरी तन्हाईयाँ भी शायर हैं , नज़रे अशआर-ए-जाम रहती हैं
अपनी यादों का सिलसिला रोको , मेरी नींदे हराम रहती हैं

हासिले-ग़ज़ल शेर-
ग़ज़ल का सबसे अच्छा शेर ‘हासिले-ग़ज़ल शेर’ कहलाता हैं।

हासिलें-मुशायरा ग़ज़ल-
मुशायरे में जो सब से अच्छी ग़ज़ल हो उसे ‘हासिले-मुशायरा ग़ज़ल’ कहते हैं।

बुलेट ट्रेन

जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई, एक औरत और उस का पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़। दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था। जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है। टीसी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए।

“ये जनरल टिकट है। अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना। वरना आठ सौ की रसीद बनेगी।” कह टीसी आगे चला गया।

पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे।

सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे। बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे। लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे।

“साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते। हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे। बड़ी मेहरबानी होगी।”

टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा।

“सौ में कुछ नहीं होता।आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।”

“आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे साब। नाती को देखने जा रहे हैं। गरीब लोग हैं, जाने दो न साब।” अब कि बार पत्नी ने कहा।

“तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो। एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहो।”

“ये लो साब, रसीद रहने दो।दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला।

“नहीं-नहीं रसीद दो बनानी ही पड़ेगी। देश में बुलेट ट्रेन जो आ रही है। एक लाख करोड़ का खर्च है। कहाँ से आयेगा इतना पैसा? रसीद बना-बना कर ही तो जमा करना है। ऊपर से आर्डर है।रसीद तो बनेगी ही। चलो, जल्दी चार सौ निकालो वरना स्टेशन आ रहा है, उतर कर जनरल बोगी में चले जाओ।” इस बार कुछ डांटते हुए टीसी बोला।

आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानो अपना कलेजा निकाल कर दे रहा हो। पास ही खड़े दो यात्री बतिया रहे थे। “ये बुलेट ट्रेन क्या बला है ?”

“बला नहीं जादू है जादू। बिना पासपोर्ट के जापान की सैर। जमीन पर चलने वाला हवाई जहाज है, और इसका किराया भी हबाई सफ़र के बराबर होगा, बिना रिजर्वेशन उसे देख भी लो तो चालान हो जाएगा। एक लाख करोड़ का प्रोजेक्ट है। राजा हरिश्चंद्र को भी ठेका मिले तो बिना एक पैसा खाये खाते में करोड़ों जमा हो जाए।
सुना है, “अच्छे दिन” इसी ट्रेन में बैठकर आनेवाले हैं।”

उन की इन बातों पर आस पास के लोग मजा ले रहे थे। मगर वे दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे ऐसे बैठे थे मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके सोग में जा रहे हो। कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए? क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा?

नहीं-नहीं।

आखिर में पति बोला- “सौ- डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था। गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे। शाम को खाना नहीं खायेंगे। दो सौ तो एडजस्ट हो गए। और हाँ, आते वक्त पैसिंजर से आयेंगे। सौ रूपए बचेंगे। एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा। सेठ भी चिल्लायेगा। मगर मुन्ने के लिए सब सह लूंगा। मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए।”

“ऐसा करते हैं, नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न, अब दोनों मिलकर सौ देंगे। हम अलग थोड़े ही हैं। हो गए न चार सौ एडजस्ट।”

पत्नी के कहा। “मगर मुन्ने के कम करना और पति की आँख छलक पड़ी।

“मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे।” कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी।
फिर आँख पोंछते हुए बोली- “अगर मुझे कहीं मोदीजी मिले तो कहूंगी-” इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय, इतने पैसों से हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो, जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो। उसकी आँख फिर छलके पड़ी।

“अरी पगली, हम गरीब आदमी हैं, हमें मोदीजी को वोट देने का तो अधिकार है, पर सलाह देने का नहीं। रो मत”

किस ऑफ लव – Kiss of Love

प्यार फैलाने का अनोखा तरीका ’किस आफ लव’ का आगाज हो चुका है। कोच्ची, कलकत्ता, नई दिल्ली के बाद देश  के अन्य शहरो मे फैल रहा प्यार के इजहार करने का अनोखा तरीका। ’किस आफ लव’ प्यार का इजहार है या विरोध का तरीका कुछ स्पष्ट नही हो रहा। पुलिस और आयोजक रोज एक दूसरे से भीड रहे। आयोजको का कहना है कि पुलिस इनको आए दिन परेषान करते है इसलिए वे अपना विरोध इस माध्यम से कर रहे है। कुछ लोग/समुदाय इसका घोर विरोध कर रहे है। सभ्यता और संस्कृति का हवाला दे रहे है। एक बात तो सही है कि –
प्यार को शालीनता से जताए
क्योकि हमारा प्यार सडको का मोहताज नही

प्यार को अश्लीलता में मत बदलो। रोड पर जब इस तरह के आयोजन होते है तो कई तरह के लोग/देश  आपको देखते है। आजादी का यह मतलब नही होता कि आप हमारी धरोहर, संस्कृति का मजाक बनाए। प्यार अगर रोड पर ही करना है तो उस गरीब को गले लगाओ जो सुबह से शाम तक रोड के किनारे अपना समान बेचता है। उस प्यार की अनुभूति शायद सबसे अच्छी होगी।


भारतीय संस्कृति में कामसूत्र है लेकिन इसका यह मतलब नही की आप सडक पर अश्लील हरकते करे। क्या कोई आपने माता-पिता के सामने एक दूसरे को चूमेगा। हम किसी के प्यार के खिलाफ नही लेकिन सडक पर यह किस आफ लव किस हद तक जायज है ?  जिसको जो करना है वह अपने घर के अन्दर बन्द कमरे मे करे।
 

जब इस पर हम लोगों ने बात करने की कोशिश की तो-
 
हिन्दु युवा वाहिनी, राजस्थान के सक्रिय सदस्य श्री सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत कहते है कि – मैं संस्कृति के रक्षा के नाम पर या सहज मानवीय भावनाओं पर पांबदी के सख्त खिलाफ हु ’किस आफ लव’ तो एक विरोध करने का तरीका था जो आई.आई.टी बाम्बे आदि के नामी छात्रो द्वारा उग्र संगठनो और पुलिस के गुंडा़गर्दी के खिलाफ अपना गुस्सा प्रकट करने के लिये किया गया था। चिन्ता न करे भारतीय संस्कृति अमर है, कोई पश्चमी संस्कृति हमारा बाल भी बाका नही कर सकती।
सभी संगठनो को आर.एस.एस से सिख लेनी चाहिए अनुशासन का पालन करना चाहिए। आखिर कब तक लोग खुद को समाज व देश और धर्म का ठेकेदार बताकर आम जन को गुमराह करते रहेगे। हमे उन ठेकेदारो की जरूरत नहीं। यह व्यक्तिगत स्वंत्रता का हनन है कृप्या इसे स्वंछदता की संज्ञा न दे।
Blackstone Ventures  के पार्टनर श्री मनीष शर्मा का कहना है की यह तरीका पूरी तरह से गलत है अगर आप को अपनी बात रखनी है तो आपको इस तरीके को बदलना पड़ेगा। आप स्वतंत्र हो सकते है लेकिन स्वछंद नहीं । आप युवा पीढ़ी है देश को आप से उम्मीद रहती है लेकिन कुछ इस तरफ की नहीं । जैसा देश वैसा भेष अपनाना चाहिए । भारत मे पश्चिमी सभ्यता का प्रचार करने का अधिकार तुम्हें किसने दिया । 
 VMW Group  के डायेरेक्टर श्री योगेश पाण्डेय का कहना है कि – भारत देश की संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ खिलवाड़ बर्दाष्त के बाहर है, आजादी के नाम पर इस तरह के अभियान के खिलाफ हुॅ माना की जमाना बदल रहा है किन्तु यह हमारी संस्कृति नही है। अगर चुमना ही है तो उसको चुमो जिनको पैदा होते है कि फैक दिया जाता है। अगर ये हालात देश के पढे लिखो का है तो देश की शिक्षा प्रणाली पर गंभीर चिंतन का  समय है  । शर्म नारी की इज्ज़त होती है इसे खत्म मत करो नहीं तो सोचो आने वाली पीढ़ी क्या करेगी …….?
गाजियाबाद के श्री शैलेन्द्र भारद्वाज कहते है कि ये तो बहुत ही भद्दा काम है और बेशरमी की हद है, ये संस्कृति के नाम पर भद्दा मजाक है।
 
वैशाली नगर जयपुर के यश गुप्ता कहते है कि – किसी भी देश के प्रगति मे युवाओ का विशेष योगदान होता है माना कि चुमा – चाटी सड़क पर नही करनी चाहिए। विदेश में ये सब कोई भारी मुद्दा नहीं है, यह समाजिक स्तर पर होता है तथा इससे सभी जागरूक है और अपना भला बुरा सब लोग जानते है। कुछ समय बाद वे लोग अपने भविष्य के निर्माण में लग जाते है किन्तु हमारे यहा आज का नौजवान अपने समय का सही उपयोग सही समय पर नहीं कर पाता है शायद इसलिये वे हमसे आगे है।
 
भाजपा पार्टी के सक्रिय सदस्य, शान्ति नगर सोडाला निवासी सुधीर दुबे का कहना है कि –  
गुलाब मुहब्बत का पैगाम नही होता,
चाद चांदनी का प्यार सरे आम नही होता,
प्यार होता है मन की निर्मल भावनाओं से,
वर्ना यू ही राधा-कृष्ण का नाम नहीं होता 

हम कहते है कि आप लोगों का प्रदर्शन अच्छी बात के लिये है लेकिन आप लोगो के प्रदर्शन का तरीका सरासर गलत है। क्योकि  

माना एक लड़का – लड़की का साथ बैठना प्यार नहीं होता
मगर हर मर्ज का इलाज तकरार नहीं होता।


आखिर हम किस दिशा में भाग रहे है? चुम्बन में कोई खराबी नही लेकिन यह भी देखना जरूरी है कि हमारी सोच की जमीनी हकीकत और भविष्य क्या है? इंसान को हमेषा आने वाली पीढ़ी को अच्छा सीख देनी चाहिए। अपने ज्ञान, बुद्धिमता, कार्यकुषलता से प्यार को शालीनता से जताए क्योकि हमारा प्यार सड़को का मोहताज नही जो सड़क पर ’किस’ करके जताया जाए या फिर ऐसी अश्लील हरकत करके।

मधुलेश पाण्डेय निल्को 

इस ज़माने में जब ढूढने निकला – योगेश पाण्डेय

माना की थोड़ी देर से आया हूँ
नाराज होने का गम भी मैं पाया हूँ
आज उसके शहर में अजनबियों की तरह
पता पूछने की भीड़ में शामिल हूँ
सही पता सही लोग
इस ज़माने में जब ढूढने निकला
पता चला की गलत लेके पता मैं भी निकला
उसके बनने सवरने के याद में मैं आया हूँ
पर उसके नाराज़ होने का गम भी मैं पाया हूँ
उसकी निगाहे जब भी मुझे देखती है
दुविधा की लाइन में सबसे पहले आया हूँ
उसके जुल्फों की तारीफ में
कविता की लाइन उड़ जाया करती है
उसको समेटने की भीड़ में मैं खुद को पाया हूँ
उसके साथ जब घुमने निकला
उसके आगे ही खुद को पाया हूँ
उसकी झील सी आँखों में
खुद को तैरता हुवा पाया हूँ
जब प्यार से योगेश मैं देखता हूँ
कविता की हर एक लाइन उसमें पाया हूँ
फुर्सत में लिखुगा उसके बारे
अभी छुट्टिया मनाने अपने गाँव आया हूँ
शहर की कोई याद नहीं यहाँ
हर जगह सुकून ही यहाँ पाया हूँ
गाँव की गोरी कहु या शहर की तितली
उसकी आँखों में प्यार ही पाया हूँ

योगेश पाण्डेय
(योगेश की युग से साभार)

अच्छा लगता है बनाम अच्छा नहीं लगता – मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मधुलेश पाण्डेय निल्को
दोस्तो, आज पहली बार युग्म मे रचना प्रकाशित कर रहा हूँ , दोनों रचना एक ही सिक्के के दोनों पहलू है। आप अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से मुझे अवगत करा कर कृतार्थ करे , आप की इन प्रतिक्रियाओ से मुझे एक अलग प्रकार के आनंद की प्राप्ति होती है, यूं ही आपका स्नेह मिलता रहे, आप लोगो के इस हौसला अफजाई से एक नई रचना आप के सामने प्रस्तुत है 

(1)       अच्छा लगता है…..
वर्षा के मौसम में,
और घर के बालकनी में,
भीगना, अच्छा लगता है
शाम के समय में
और ‘निल्को’ के साथ में
कलम चलाना  अच्छा लगता है
रविवार के दिन मैं
और बाज़ार के भीड़ में
पहचान बनाना अच्छा लगता है
चांदनी रात में
और उनके साथ में
बातें करना अच्छा लगता है
सावन के महीने में,
और गर्मी के पसीने में
कूलर के आगे बैठना ही अच्छा लगता है
(२) अच्छा नहीं लगता…..
बाज़ार की भीड़ में
मैं भी खो जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता
अपने ही शहर में
घूम कर घर नहीं जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता
काम-काज के क्षेत्र में
उनकी तरह चुगली करना
मुझे अच्छा नहीं लगता
रचना प्रकाशित होने के बाद
पाठको की प्रतिक्रिया न मिलना
मुझे अच्छा नहीं लगता
इस भीड़ तंत्र में
गुमनाम सा ‘निल्को’ को जीना
मुझे अच्छा नहीं लगता

             मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’ 

चीनी में भी मुस्लिम विखंडनवाद

भस्मासुर को संरक्षण दोगो, भस्मासुर पैदा करोगे तो उसका परिणाम भी तो भुगतोगे? कुएं दूसरे के लिए नहीं बल्कि अपने लिए खोदा जाता है। जिस पाकिस्तान आतंकवाद नाम के भस्मासुर को चीन ने संरक्षण दिया था-अप्रत्यक्ष समर्थन दिया था उसी आतंकवादी हिंसा से आज चीन खुद दग्ध है। इस्लामिक आतंकवाद आज चीन की राष्ट्रीय एकता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। चीन में भी कश्मीर-चैचन्या की तरह विखंडन-सहांरक आतंकवादी प्रक्रियाएं बेकसूर लोगों को लहूलुहान कर रही है। चीन को अगर इस्लामिक हिंसा और इस्लामिक विखंडन की प्रक्रिया से मुक्ति पानी है तो फिर उसे विश्व व्यापी इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ वैचारिक और अभियानी पथ पर चलना ही होगा, क्योंकि दुनिया भर के मुस्लिम आतंकवादी एक-दूसरे के पूरक हैं और सहयोगी भी है, सभी का लक्ष्य आतंकवादी हिंसा के बल पर दुनिया में इस्लाम का झंडा फहराना है और दुनिया में मुस्लिम मजहबी कानून लागू करवाना है।
दुनिया भर में जारी इस्लामिक आतंकवाद के मूल्यांकन पर यह तथ्य सामने आता है कि राजनीतिक-मजहबी विखंडनवाद की प्रक्रिया पहले शुरू होती है और उसके बाद आतंकवाद की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कश्मीर से लेकर रूस के चैचन्या तक एक लंबी फेहरिस्त है जहां पर पहले राजनीतिक -मजहबी विखंडनवाद की प्रक्रिया शुरू हुई और उसके बाद आतंकवाद की प्रक्रिया शुरू हुई। चीन के शिनजियांग में पहले राजनीतिक-मजहबी विखंडनवाद की प्रक्रिया चल रही थी और अब शिनजिंयाग आतंकवाद से लहूलुहान हो चुका है। कई मुस्लिम आतंकवादी हिंसा की घटनाओं मे तीन सौ से ज्यादा लोग मारे गये हैं, कई सौ लोग घायल हो चुके हैं। मुस्लिम आतंकवादी हिंसा के दमन के लिए चीन को कड़े और प्रहारक सैनिक-पुलिस कार्रवाई का सहारा लेना पड़ा है। चीन का कहना है कि उसके यहां जो मुस्लिम हिंसा-आतंकवाद की जड़ है उसके लिए वैश्विक मुस्लिम आतंकवादी सरगनाएं और मजहबी संस्थाएं जिम्मेदार रही हैं। चीन ने खासतौर पर पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मुवमेंट, और तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी को जिम्मेदार मानता है। पाकिस्तान का तालिबान और अलकायदा की उपस्थिति भी शिनजियांग में है। पाकिस्तान के वजरिस्तान में पूर्वी तुर्किस्तान,इस्लामिक मुवमेंट और तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी के आतंकवादियों की टैनिंग सेंटर है। आतंकवादी शिनजिंयाग मे आतंकवाद का कहर बरपा कर पाकिस्तान में शरण ले लेते हैं, इस कारण चीन प्रहारक तौर पर मुस्लिम आतंकवादियों के खिलाफ अभियान नहीं चला पाता है। 2003 में पाकिस्तान सेना के अभियान में पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मुवमेंट के सरगना हसन माहसूम की मौत हुई थी। हसन माहसूम के संबंध में कहा जाता है कि वह अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन का भी निकटवर्ती था। हसन माहसूद की मौत के बाद आतंकवादी संगठनों षिनजियांग को और अधिक निशाना बनाया है। आतंकवादी संगठनों की समझ है कि चीन के कहने पर पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी तुर्कीस्तान इस्लामिक मुवमेंट के नेता हसन माहसूद को सैनिक अभियान में मार गिराया था। इसी कारण आतंकवादी संरगनाएं शिनजियांग में आतंकवादी हिंसा की आग झोंक रहे हैं।
शिनजियांग में तुर्की मूल की मुस्लिम आबादी की बहुलता है। जिस देश में भी मुस्लिम आबादी की थोड़ी-बहुत भी उंची संख्या हो गयी, उस देश में अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग ही नहीं बल्कि इस्लामिक शासन लागू करने की मांग यानी विखंडन की राजनीतिक मजहबी-प्रकिया शुरू हो जाती है और फिर आतंकवादी हिंसा भी चरम पर पहुंच जाती है। कश्मीर में मुस्लिम बहुलता के कारण अलग देश की मांग हो रही है और इस निमित आतंकवादी राजनीतिक-मजहबी, विखंडन की हिंसा जारी है। रूस के चैचन्या में मुस्लिम आबादी बहुमत मे है वहां पर भी अलग मुस्लिम देश और मजहबी कानून को लागू करने के लिए आतंकवाद जारी है। म्यांमार के सिर्फ एक क्षेत्र में मुस्लिम आबादी वह बहुलता में नहीं है फिर भी वहां पर मुस्लिम आतंकवाद जारी है और मुस्लिम आतंकवाद से म्यांमार की बौद्ध संस्कृति लहू लुहान है। फिलीपींस में मुस्लिम आतंकवाद की जड़ में मुस्लिम देश की मांग है। नाईजीरिया में कड़े इस्लामिक कानून की मांग को लेकर बोको हरम ने मानवता को शर्मसार करने वाली हिंसा का खेल-खेल रहा है। बोको हरम ने 500 से अधिक ईसाई बच्चियों का अपहरण कर लिया जिनकी आयु आठ वर्ष से लेकर 14 वर्ष की थी। अपहरित ईसाई बच्चियो को बोको हरम ने अरब के षेखों और अफ्रीका धनाढंय वर्ग के लोगों को बेच कर जेहाद के लिए पैसे जुटाये हैं। अपहरित लड़कियो का पता लगाने में अमेरिकी खोजी विमान अभी तक अभियान पर है। इसी तरह चीन के शिगजियांग में तुर्की मूल की मुस्लिम आबादी की बहुलता है। तुर्की मूल की मुस्लिम आबादी चीन से अलग होकर एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए जेहाद कर रही हैं। शिनजियांग मे चीनी प्रतीको के सर्वनाश का भी जेहाद चला है। दो साल पूर्व शिनजियांग में मुस्लिम आबादी और चीन के समर्थकों के बीच में बड़ी हिंसा हुई थी, दंगे की आग मे शिनजियांग कई दिनों तक जला था। उस दंगे की आग को चीन ने सैनिक-पुलिस कार्रवाई कर बुझा दिया था।
चीन भस्मासुर है। चीन के सिर पर मुस्लिम आतंकवाद और मुस्लिम हिंसा का जो खेल जारी है उसके लिए चीन खुद जिम्मेदार है। चीन का सैनिक और कूटनीतिक साझेदार पाकिस्तान है। चीन ने ही पाकिस्तान को आणविक शक्ति बनाया है। भारत को दबा कर रखने की नीयत से चीन ने पाकिस्तान के मुस्लिम आतंकवाद पर न केवल मुंह मोड़ी थी बल्कि पाकिस्तान के तरफदारी भी की थी। जब भी भारत द्वारा पाकिस्तान पर आतंकवाद का कारखाना चलाने का आरोप लगाया जाता था या फिर विश्व समुदाय द्वारा पाकिस्तान पर कड़े कार्रवाई करने की मांग उठती थी तब चीन पाकिस्तान के संरक्षक के तौर पर खड़ा हो जाता था। उसकी समझ यह थी कि पाकिस्तान भारत और विष्व के अन्य क्षेत्रों में आतंकवाद का आउटसोर्सिंग जरूर कर सकता है पर उसके यहां पाकिस्तान आतंकवाद की आउटसोर्सिंग नहीं कर सकता है। चीन के सामने समस्या यह है कि आतंकवादी संगठन बेलगाम हैं, अनियंत्रित है, पाकिस्तान का नियंत्रण या फिर लगाम आतंकवादी संगठनों के उपर नहीं रहा। आतंकवादी खुद पाकिस्तान के लिए खतरा बने हुए है। हमें यह भी देखना होगा कि आतंकवादी संगठनों का लक्ष्य क्या है? आतंकवादी संगठनो का लक्ष्य दुनिया में आतंकवादी हिंसा के बल पर इस्लामिक राज्य की स्थापना और अन्य सभी धर्मो का नेस्तनाबुद करना है। ऐसी प्रक्रिया का हल भी सतही तौर पर नहीं हो सकता है। चीन को इन तथ्यों पर गौर करने की जरूरत है कि पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व हो सकता है कि आतंकवाद विरोधी हो पर पाकिस्तान की सेना और आईएसआई पूरी तरह से अभी भी आतंकवाद का खेल-खेल रही हैं। जब तक पाकिस्तान की सेना और आईएसआई का आतंकवादियों के नेटवर्किंग जारी रही तब तक चीन ही क्यों दुनिया के अंदर में आतंकवादी हिंसा कहर बरपाती रहेगी।
चीन अगर यह सोच रहा होगा कि वह शिनजिंयाग की मुस्लिम आबादी को थोड़ी बहुत राजनीतिक छुट और मजहबी अधिकार की छूट देकर वह मुस्लिम आतंकवादी हिंसा का समाधान कर लेगा तो यह उसकी खुषफहमी ही है। शिनजियांग की मुस्लिम आबादी को चीन ने कई सुविधाएं भी उपलब्ध करायी है, मजहबी अधिकारों की छूट दी है। एक नहीं बल्कि दो बच्चे पैदा करने की भी छूट दी है। मुस्लिम आबादी को छोटकर अन्य चीनी नागरिक सिर्फ एक ही बच्चे पैदा कर सकते हैं। अन्य चीनी नागरिक धर्म को मानने के अधिकार नहीं रखते हैं, अन्य चीनी नागरिकों को अपने धर्म प्रतीको की पूजा करने का अधिकार नहीं है। पर मुस्लिम आबादी मस्जिद जाकर नमाज पढ़ सकती हैं। सार्वजनिक तौर पर भी मुस्लिम आबादी अपने मजहबी त्यौहार मना सकती हैं। इन सभी राजनीतिक और मजहबी अधिकारों की छूट के बावजूद भी शिनजियांग में मुस्लिम अलगाव और मुस्लिम विखंडन की प्रकिया क्यों नहीं रूक रही है? इस पर चीन को विचार करने की जरूरत है।
सिर्फ सार्वजनिक सजा की सुनवायी करके दंड देने मात्र से मुस्लिम आतंकवाद या मुस्लिम विखंडन की प्रक्रिया बंद नहीं होगी। विष्वव्यापी मुस्लिम आतंकवाद के खिलाफ स्वार्थपरख कूटनीति जब तक जारी रहेगी तब तक मुस्लिम आतंकवाद और मुस्लिम विखंडन की प्रक्रिया जारी रहेगी। चीन को इस तथ्य को समझना होगा? 
विष्णुगुप्त

प्रधानमंत्री- श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी


भारत की महान परम्पराओं एवं संस्कारों का पालन करने करने वाले नेता “श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी” को देश के “प्रधानमंत्री” बनने पर बहुत बहुत बधाईया !! – VMW Team

क्या है धारा 370

स्वतंत्रता के बाद छोटी-छोटी रियासतों को भारतीय संघ शामिल किया गया। जम्मू-कश्मीर को भारत के संघ में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू करने के ‍पहले ही पाकिस्तान समर्थित कबिलाइयों ने उस पर आक्रमण कर दिया। उस समय कश्मीर के राजा हरि सिंह कश्मीर के राजा थे। उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय का प्रस्ताव रखा।  तब इतना समय नहीं था कि कश्मीर का भारत में विलय करने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी की जा सके। हालात को देखते हुए गोपालस्वामी आयंगर ने संघीय संविधान सभा में धारा 306-ए, जो बाद में धारा 370 बनी, का प्रारूप प्रस्तुत किया। इस तरह से जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों से अलग अधिकार मिल गए। धारा ३७० भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद (धारा) है जिसे अंग्रेजी में आर्टिकल 370 कहा जाता है। इस धारा के कारण ही जम्मू एवं कश्मीर राज्य को सम्पूर्ण भारत में अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष अधिकार अथवा (विशेष दर्ज़ा) प्राप्त है। देश को आज़ादी मिलने के बाद से लेकर अब तक यह धारा भारतीय राजनीति में बहुत विवादित रही है। भारतीय जनता पार्टी एवं कई राष्ट्रवादी दल इसे जम्मू एवं कश्मीर में व्याप्त अलगाववाद के लिये जिम्मेदार मानते हैं तथा इसे समाप्त करने की माँग करते रहे हैं। भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग २१ का अनुच्छेद ३७० जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था। स्वतन्त्र भारत के लिये कश्मीर का मुद्दा आज तक समस्या बना हुआ है

क्या हैं अधिकार : 
 
भारत के अन्य राज्यों के लोग जम्मू कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। 

 वित्तीय आपातकाल लगाने वाली धारा 360 भी जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होती। 

 जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा है। 

 भारत की संसद जम्मू-कश्मीर में रक्षा, विदेश मामले और संचार के अलावा कोई अन्य कानून नहीं बना सकती।

 धारा 356 लागू नहीं, राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं। 

 कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहरी से शादी करती है तो उसकी कश्मीर की नागरिकता छिन जाती है। 

 जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन नहीं लग सकता है।

विशेष अधिकार धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित क़ानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिये।
इसी विशेष दर्ज़े के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती।
इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्ख़ास्त करने का अधिकार नहीं है।
1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता।
इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते।
भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।
जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय करना ज़्यादा बड़ी ज़रूरत थी और इस काम को अंजाम देने के लिये धारा 370 के तहत कुछ विशेष अधिकार कश्मीर की जनता को उस समय दिये गये थे।

हर – हर मोदी, घर – घर मोदी

मधुलेश पाण्डेय निल्को
अब दिख रही है असर
हो गए सब बेखबर
जबसे चली अनोखी लहर
किसी को लगने लगी है जहर
हर हर मोदी
घर घर मोदी का नारा है

पूरा भारतवर्ष हमारा है
विदेशी बाहर  जायेगे
मोदी को ही लायेगे
पप्पू घर को जायेगा
मोदी दिल्ली आएगा
निल्को ने भी अब ठाना है
वोट देने जाना है
बाकि सब पुराना है
सिर्फ लोकतंत्र ही हमारा हैं. 

# मधुलेश पाण्डेय निल्को 

 

आपको एवं आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.

होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है।यह प्रमुखता से भारत तथा नेपाल में मनाया जाता हैं ! यह त्यौहार कई अन्य देशों जिनमें अल्पसंख्यक हिन्दू लोग रहते हैं वहां भी धूम धाम के साथ मनाया जाता हैं! पहलेदिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुरड्डी, धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं। 

आपको एवं आपके परिवार को होली की बहुत मुबारकबाद एवं शुभकामनाएँ.






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आधार कार्ड बनाम सरकार – एम के पाण्डेय निल्को


आधार यानी विशेष पहचान के आधार को समझिए। लोगों को पहचान देने के नाम शुरू हुआ प्रयास महज 3 साल में ही लोगों के लिए विकास से बहिष्कार और योजनाओं से बेदखली का कारण बनने लगा। इसका मकसद सरकार के गरीबों पर किए जाने वाले खर्च को कम करना बन गया है और दूसरा मकसद है समुदाय को नकद धन देना ताकि वे बाज़ार को फायदे रोशन करें।
 जनवरी 2009 में विशेष पहचान प्राधिकरण की स्थापना हुई और जुलाई 2009 में श्री नंदन निलेकणी को इसका प्रमुख बना दिया गया। इसके दो मकसद थे-एक यह कि लोगों के पास एक स्थाई पहचान पत्र नहीं है, वह दिया जाएगा और दूसरा इसे योजनाओं से जोड़ा जाएगा, ताकि यदि एक व्यक्ति एक बार से ज्यादा किसी योजना का लाभ ले रहा है या नकली हितग्राही बनाए गए हैं, तो उन्हें पहचाना जा सके। यह पहचान पत्र या क्रमांक देने के लिए हर व्यक्ति को अपनी आंखों की पुतलियों और सभी उंगलियों के निशान देने होंगे।

इस प्राधिकरण ने यह हमेशा कहा कि आधार पंजीयन अनिवार्य नहीं है पर अन्य विभाग अपनी योजनाओं का लाभ देने के लिए इसे एक शर्त के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। हुआ भी यही। राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी क़ानून के तहत खाते खोलने के लिए इसे अनिवार्य कर दिया गया। पेट्रोलियम मंत्रालय गैस सेवा के तहत आधार क्रमांक की मांग करना शुरू कर चुका है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में भी इसका प्रावधान है। सस्ता राशन लेने के लिए भी इसे अनिवार्य बनाया जा रहा है।

हमारे प्रधानमंत्री ने वर्ष 2010 में नेशनल आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया विधेयक राज्यसभा में पेश किया, इसमें यह भी नहीं बताया गया था कि वे किस हैसियत से यह विधेयक पेश कर रहे हैं। इस विधेयक को वित्त विभाग की संसद की स्थाई समिति ने खारिज ही कर दिया पर प्राधिकरण को कोई फर्क नहीं पड़ा। वर्ष 2009-10 में इसके लिए 120 करोड़ रूपए के बजट का प्रावधान था, जो 20010-11 में बढ़ कर 1900 करोड़ कर दिया गया।

दिसंबर 2012 तक प्राधिकरण 2300.56 करोड़ रूपए खर्च कर चुका था। जानीमानी क़ानून विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर उषा रामनाथन कहती हैं कि बिना विभाग वाले और बिना किसी कानूनी प्रावधान के चल रहे इस प्राधिकारण और काम पर 45 हज़ार से डेढ़ लाख करोड़ रूपए तक खर्च होने का अनुमान है।

हम सब जानते हैं कि बैंक में खाता खोलते समय हम अपना फोटो भी लगाते हैं, हस्ताक्षर भी करते हैं और जरूरत पड़ने पर अंगूठे का निशान लगाते हैं। यानी हम जैविकीय पहचान चिन्ह बैंक को उपलब्ध करवाते ही हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इन चिन्हों का उपयोग केवल स्थानीय स्तर पर केवल बैंकिंग व्यवहार के लिए ही होता है; इसके विपरीत आधार पंजीयन के लिए आंखों की पुतली और सभी उंगलियों के निशान इसलिए लिए जा रहे हैं ताकि हर व्यक्ति एक किस्म की सरकारी निगरानी में आ सके। किसी भी तरह के नकद हस्तांतरण को आधार यानी विशेष पहचान पंजीयन को जरूरी शर्त के रूप में लागू नहीं किया जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि विशेष पहचान प्राधिकरण ने स्वयं यह घोषित किया है कि आधार पंजीयन अनिवार्य नहीं बल्कि स्वैच्छिक है। संसद की स्थाई समिति ने भी विशेष पहचान क्रमांक और प्राधिकरण पर लाए गए विधेयक को पूरी तरह से खारिज कर दिया है परन्तु फिर भी भारत सरकार इसे योजनाओं का लाभ लेने के लिए एक अनिवार्य शर्त के रूप में लागू कर रही है।

अलग-अलग तरीकों से यह सन्देश दिया जा रहा है कि यदि व्यक्ति ने विशेष पहचान क्रमांक नहीं लिया तो उसे सरकार की कोई योजना का लाभ नहीं मिलेगा।

आधार के विस्तार के लिए यह प्रचारित किया जा रहा है इससे गरीबों और झुग्गीवासियों के बैंक खाते खुलेंगे और उन्हें आवास-फोटो सहित पहचान पत्र मिल सकेगा, जबकि वास्तविकता यह है कि आवेदकों से यह कहा गया है कि वे आधार पंजीयन के लिए अपना निवास और फोटो पहचान पत्र लगाएं। यह कोई नहीं बता रहा है कि लाखों आश्रय विहीन लोग अपनी पहचान कहां से खोज कर लाएं! देश में अब तक हुए आधार पंजीयन में ऐसा कोई नहीं है जिसका पंजीयन बिना प्रमाण के हुआ हो।

यानी सच्चाई यह है कि भारत सरकार का मकसद लोगों को पहचान पत्र देना नहीं निगरानी के लिए एक डाटा बेस तैयार करना है। मुंबई, जहां देश की सबसे ज्यादा झुग्गीवासी जनसंख्या है, में गरीबों में यह सन्देश दिया गया है कि यदि आधार पंजीयन नहीं करवाया तो उन्हें बस्ती से बाहर निकाल दिया जाएगा और बिजली, पानी समेत हर सेवा वापस ली जा सकती है। एक तरह से देश में गरीबों को भयाक्रांत कर दिया गया है वे आधार की अदालत में अपराधी की तरह खड़े हों और हमेशा के लिए अपनी निजी नागरिक स्वतंत्रता राज्य के निगरानी तंत्र के सुपुर्द कर दें। और जन विरोधी नीतियों को लगातार लागू कर रही सरकार को अपने देश के सभी नागरिकों में अपराधी और आतंकवादी नज़र आता है; इंसान नहीं!

आधार या विशेष पहचान पंजीयन को प्रचारित करने के पीछे नंदन निलकेणी के नेतृत्व वाला प्राधिकरण यह तर्क देता है कि देश में करोड़ों लोगों के पास स्थाई पते और फोटो लगे पहचान पत्र नहीं हैं, आधार इस कमी को पूरा कर देगा। सवाल यह है कि पहचान के लिए ऐसे चिन्ह लिए जाने की क्या जरूरत है जो मूलतः अपराधियों की निगरानी के लिए लिए जाते हैं। इस काम के लिए आंखों की पुतलियों और हाथों की उंगलियों के सभी निशान लिए जा रहे हैं।

आधार प्राधिकरण का तर्क यह रहा है कि ये दोनों निशान कभी नहीं बदलते हैं जबकि वैज्ञानिक अध्ययन बता रहे हैं कि तीन से पांच सालों में आंखों की पुतलियों के निशान बदल जाते हैं। इसी तरह 5 सालों के बाद उंगलियों के निशान भी बदल जाते हैं। ऐसे में सवाल तो खड़ा होता ही है कि इस पूरी कवायद का मकसद क्या है?

भारत सरकार को यह पता चलने लगा है कि नागरिकों पर निगरानी रखने के लिए ये दो निशान पर्याप्त नहीं हैं, तो अब इसके लिए डीएनए का चित्र लिए जाने के प्रस्ताव पर बात हो रही है। इतना ही नहीं सरकार को यह भी पता नहीं है कि भारत में 1.20 करोड़ लोगों को कुपोषण जनित मोतियाबिंद है, उनकी आंखों की पुतलियों के निशान नहीं लिए जा सकते हैं और हर रोज मजदूरी करने वाले मजदूरों, जिनकी संख्या लगभग 15 करोड़ है, की उंगलियों के निशान भी लगभग घिस से गए हैं। क्या वे अपने सही जैविक चिन्ह दे पाएंगे और यदि उनका पंजीयन हो भी गया तो क्या उन्हें उन योजनाओं का लाभ मिल पाएगा, जिन्हें आधार से जोड़ा जा रहा है! जवाब हैं – नहीं!

क्योंकि 45 प्रतिशत संभाव्यता यह है कि किसी न किसी कारण से व्यक्ति की उंगलियों के निशान का आधार में दर्ज निशान से मिलान न हो। वास्तव में ऐसा नहीं है कि आधार से सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार होगा, सच यह है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आधार पंजीयन को अनिवार्य बना कर सरकार अपना मकसद पूरा करना चाहती है।

प्राधिकरण यह मानकर चल रहा है कि जैविक पहचान चिन्ह (बायोमेट्रिक चिन्ह) किसी एक व्यक्ति की खास और विशेष पहचान को सुनिश्चित करते हैं, यानी एक चिन्ह का एक ही व्यक्ति होगा। अमेरिका की सुरक्षा एजेंसी सीआईए और डिफेन्स एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी के लिए अमेरिका की नेशनल रिसर्च कौंसिल ने एक अध्ययन कर बताया कि बायोमेट्रिक चिन्ह प्राकृतिक रूप से बदलते हैं।

इस चिन्ह पर आधारित तकनीकें छोटे स्तर पर तो काम कर सकती हैं पर यदि इनका बड़े स्तर पर उपयोग किया गया तो यह बड़ी समस्याएं खड़ी कर सकती है। आज बायोमेट्रिक चिन्ह किसी की पहचान की संभाव्यता है, जबकि तकनीक इसके ठीक विपरीत चलती है और मानती है कि बायोमेट्रिक चिन्ह मानक स्थिर होते हैं। 17 जुलाई 2010 को इकोनोमिक टाइम्स ने लिखा कि आधार लाखों लोगों की उंगलियों के निशान उतने साफ़ तरीके से दर्ज नहीं कर सकेगा, जितना कि वह अपने प्राधिकरण के चिन्ह में दिखाता है क्योंकि कठोर श्रम करते हुए मजदूरों की उंगलियों के निशान ही खत्म हो गए हैं। इन निशानों को तकनीकी भाषा में कम गुणवत्ता वाले निशान कहा जाता है।

इनका यदि पंजीयन हो भी गया तो ये सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से बाहर हो जाएंगे; निश्चित रूप से भारत की सरकार चाहती भी यही है। प्राधिकरण की बायोमेट्रिक समिति ने भी यह चेतावनी दी है कि 5 करोड़ लोगों (अब तक बायोमेट्रिक चिन्ह लिए जाने वाले लोगों की यही अधिकतम संख्या है) के बायोमेट्रिक चिन्ह लिए जाने के बाद क्या ये चिन्ह विशेष रह जाते हैं, इसके कोई अध्ययन नहीं हुए हैं। भारतीय सन्दर्भ में निशानों की गुणवत्ता और सटीकता का कोई अध्ययन नहीं हुआ है।

यह अध्ययन जरूरी है क्योंकि यहां लोग चाय बागानों में काम करते हैं, समुद्र और नदियों में काम करते हैं, मजदूरी करते हैं, उनकी उंगलियों के निशान कितने सटीक होंगे, इस सवाल का उत्तर खोजा जाना जरूरी है।

पंजीयन के दौरान यह घोषणापत्र भरवाया जाता है कि आवेदक के द्वारा दी गयी सूचनाएं प्राधिकरण उपयोग में ला सकता है और इनका उपयोग जन-कल्याणकारी योजनाओं-वित्तीय सेवाओं के लिए किया जा सकता है। हर व्यक्ति की जानकारी हर उस विभाग के लिए उपलब्ध रहेगी जो अपनी योजनाओं में हितग्राहियों की जांच करना चाहता है और जो पंजीयन कर रहे हैं।

यह पूरी जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध रहेगी, जिसकी सुरक्षा करना कठिन ही होगा। यानी हमारी निजी जानकारियां गोपनीय नहीं रह पाएंगी। (वेब दुनिया से साभार )


आधार पर हमारे मधुलेश पाण्डेय जी का नज़रिया ……..
सरकारी योजनाओ के लाभ के लिए – आधार
सरकारी विभाग भी जनता से मांग रही – आधार
गैस सिलेन्डर वाले बोले चाहिए हमे आधार
बैंक बोले , दिखाओ अपना आधार
लेकिन आधार तो है दोहरी तलवार
इसके आड़ मे कंपनिया करेगी वार
थोड़ा करे विचार …..
आप के डेटा की कंपनिया कर रही प्रचार
इसी मे है उनका आधार
और आप हो रहे निराधार
देश मे निजी जानकारी इकठ्ठा करना कोई क़ानून नहीं
आँखें , हथेली हमारी है , कोई सरकार की नहीं
एक बात नहीं समझ रहा निल्को
आख़िर क्यो जरूरी है ये आधार
अप्रत्यक्ष रूप से बाध्य कर रही सरकार
ऐसा करना नहीं है उसका अधिकार
फिर आख़िर क्यो जरूरी है ये आधार ……!
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एम के पाण्डेय निल्को
एक आधार कार्ड धारक 

आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!

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