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कश्मीर में जेहादियों द्वारा सैनिकों को थप्पड़-लात मार कर अपमानित करने पर एक सैनिक की सरकार से अपील को बंया करती मेरी नयी कविता- गौरव चौहान

(कश्मीर में जेहादियों द्वारा सैनिकों को थप्पड़-लात मार कर अपमानित करने पर एक सैनिक की सरकार से अपील को बंया करती मेरी नयी कविता)
रचनाकार-कवि गौरव चौहान उ प्र
9557062060

दिल्ली में बैठे शेरों को सत्ता का लकवा मार गया,
इस राजनीति के चक्कर में सैनिक का साहस हार गया,

मैं हूँ जवान उस भारत का,जो “जय जवान” का पोषक है,
जो स्वाभिमान का वाहक है जो दृढ़ता का उद्घोषक है,

मैं हूँ जवान उस भारत का, जो शक्ति शौर्य की भाषा है,
जो संप्रभुता का रक्षक है,जो संबल की परिभाषा है,

उस भारत की ही धरती पर ये फिर कैसी लाचारी है,
हम सैनिक कैसे दीन हुए,अब कहाँ गयी खुद्दारी है?

“कश्मीर हमारा” कहते हो,पर याचक जैसे दिखते हो,
तुम राष्ट्रवाद के थैले में,गठबंधन करके बिकते हो,

वर्दी सौंपी,हथियार दिए,पर अधिकारों से रीते हैं,
हम सैनिक घुट घुट रहते है,कायर का जीवन जीते हैं,

छप्पन इंची वालों ने कुछ ऐसे हमको सम्मान दिए,
कागज़ की कश्ती सौंपी है,अंगारो के तूफ़ान दिए,

हर हर मोदी घर घर मोदी,यह नारा सिर के पार गया,
इक दो कौड़ी का जेहादी,सैनिक को थप्पड़ मार गया,

अब वक्ष ठोंकना बंद करो,घाटी में खड़े सवालों पर,
ये थप्पड़ नही तमाचा है भारत माता के गालों पर,

सच तो ये है दिल्ली वालों,साहस संयम से हार गया,
इक पत्थरबाज तुम्हारे सब,कपड़ों को आज उतार गया,

इस नौबत को लाने वालों,थोड़ा सा शर्म किये होते,
तुम काश्मीर में सैनिक बन,केवल इक दिवस जिए होते,

इस राजनीती ने घाटी को,सरदर्द बनाकर छोड़ा है,
भारत के वीर जवानों को नामर्द बना कर छोड़ा है,

अब और नही लाचार करो,हम जीते जी मर जायेंगे,
दर्पण में देख न पाएंगे,निज वर्दी पर शर्मायेंगे,

या तो कश्मीर उन्हें दे दो,या आर पार का काम करो,
सेना को दो ज़िम्मेदारी,तुम दिल्ली में आराम करो,

थप्पड़ खाएं गद्दारों के,हम इतने भी मजबूर नही,
हम भारत माँ के सैनिक हैं,कोई बंधुआ मजदूर नहीं,

मत छुट्टी दो,मत भत्ता दो,बस काम यही अब करने दो,
वेतन आधा कर दो,लेकिन कुत्तों में गोली भरने दो,

भारत का आँचल स्वच्छ रहे ,हम दागी भी हो सकते है,
दिल्ली गर यूँ ही मौन रही,हम बागी भी हो सकते हैं,
——कवि गौरव चौहान

जौ के ठेकाने ना, सतुआने के तैयारी – भोजपुरी व्यंग्य -एन डी देहाती

14 अप्रेल 17 के सतुआन ह। अब लखनऊआ , दिल्लिहिया कहि दिहे सतुआन का होला। पुरबिहन से पूछ ल। सतुआन के पुरवर परिभाषा बता दीहें। सतुआ भी एगो संस्कृति ह, सादगी के, समानता के, सहजता के। पुरनिया लोग बहुत पहिले से सतुआन मनावेलन। हमहुँ मनाईलन। लोग जौ बोअल छोड़ दिहल जेकरा चलते सतुआ पर संकट आ गईल बा।
हिन्दू पतरा परम्परा में सौर मास के हिसाब से सुरूज देवता जहिआ कर्क रेखा से दखिन के ओर जाले तहिये मेष संक्राति लागेला। ओहि के सतुआन कहल जाला। एहि दिन से खरमास के भी समाप्ति हो जाला आ रडूहन के शादी विवाह होखल शुरू हो जाला।
जवन असकतिहा सालों साल ना नहात होइहैं उहो सतूआन के दिन जरूर नहा लेलन। एही से कहल गईल- असकतिहन के तीन नहान।
खिचड़ी, फगुआ औ सतुआन।।
सतुआन के बहुत तरह से बनावल जाला, सामान्य रूप से आज के दिन जौ के सत्तू गरीब असहाय के दान करे के प्रचलन बा। आज के दिन लोग स्नान पावन नदी गंगा में करे ला, पूजा आदि के बाद जौ के सत्तू, गुर, कच्चा आम के टिकोरा आदि गरीब असहाय के दान कइल जाला आ इष्ट देवता, ब्रह्मबाबा आदि के चढ़ा के प्रसाद के रूप में ग्रहण कइल जाला। ई काल बोधक पर्व संस्कृति के सचेतना, मानव जीवन के उल्लास आ सामाजिक प्रेम प्रदान करेला। पूर्वांचल में चाहे केहू केतनो अमीर होखे आज के दिन सादगी में मनावे खातिर सतुआ के ही भोग लगायी। गावँ से उजड़त गोनसार( भूजा भुजने का चूल्हा , जो गोंड जाति का परम्परागत पेशा रहा), समहुत में जौ के बुआई, नेवान में जौ के भुनल बालि के परसादी अब दुलम होत बा। भाई हो जौ ना बोआई त सतुआ कहा से आयी। सतुआन के पर्व हमे याद दिलावेला। सतुआ के। सतुआ खातित जौ जरूरी बा। जौ के जय जय कार कईल जा। डॉक्टर की कहला पर ना, अपनों विचार से थोड़ा बहुत जौ बोअल जा।
फेरू कबो भेंट होई त दूसरे टॉपिक पर बतकुचन होई। जय राम जी के।

यात्रा वर्णन द्वारा एम के पाण्डेय निल्को

घड़ी में करीब सुबह के सात बज रहे थे, डैडी को सिद्धेश उर्फ़ यश के स्कूल में मीटिंग में शामिल होने जाना था तभी उनकी नज़र बालकनी से रोड पर खड़ी अपनी कार पर गई । उन्होंने कहा की, मधुलेश कार बहुत गन्दी हो गई है इतना सुनते ही मधुलेश बाल्टी और मग उठाये और छत से नीचे आ गए । पानी से भरी बाल्टी पूरे मोहल्ले की नज़र में थी कारण एक मात्र की मोहल्ले में कई दिन से पानी कम आ रहा था और मैं इस समय अपनी कार साफ कर रहा था । तभी मंदिर से गुड्डू चाचा लौट रहे थे। अभिवादन हुआ फिर उन्होंने मथुरा जाने का प्रोग्राम बनाया , बोला की कल एकादशी है चलते है गोवर्धन पर्वत की प्रक्रिमा करने । ऑफिस जाना है , बहुत काम है ये दलीले पेश हुई किन्तु उस मुरली वाले के आगे किसकी चलती है । प्रोग्राम फिक्स हो गया मैंने बोला की मैं ऑफिस से 1 बजे आ जाऊँगा। 3 बजे करीब ट्रेन थी बिना आरक्षण की यात्रा करनी थी , मन में संदेह था की सीट मिलेगी या नहीं किन्तु दिल ने कहा देखा जायेगा । ऑफिस में जल्दी जल्दी काम निपटा रहा था तब तक गुड्डू चाचा का फोन बजा बोले की 1 बजे घर आ जाना , स्टेशन भी टाइम पर जाना है । मैंने भी उत्साह पूर्वक बोला की ठीक है ।
एक बज कर 10 मिनट पर मैं अपने घर पर था । सामान पैक और चलने को मन बेकरार । 2 बजते है गुड्डू चाचा शुभम के साथ आये और बोले की नीलेश नहीं चलेगा क्या? नीलेश स्कूल से 2 बजकर 20 मिनट तक घर आता है , इंतज़ार करते तब तक लेट हो जाती । हम तीन लोग घर से निकल पड़े । पेलटफ़ॉर्म पर ट्रेन का इंतज़ार तभी फोन की घंटी बजती है और डैडी कहते है की ट्रेन कब तक आएगी समय है तो बताओ नीलेश भी जायेगा । मैंने भी कहा की अभी लगभग एक घंटा है । थोड़ी ही देर में नीलेश को लेकर डैडी स्टेशन आ गए , मैं उसे लेने के लिए पेलटफ़ॉर्म से बाहर आया और उसे उस जगह पर ले आया जहा गुड्डू चाचा और शुभम खड़े थे ।
जयपुर जंक्शन का पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 , खचाखच लोगो की भीड़ ट्रेन में और पेलटफ़ॉर्म पर , सब लोग एक उम्मीद से आती हुई जयपुर इलाहाबाद एक्सप्रेस को देख रहे है , तभी कान के पास चाय वाला बोलता है – चाय चाय गरमा गर्म चाय । पारा वैसे ही गर्म हो रहा है, जयपुर का तापमान वैसे ही 42 है ऊपर से लोगो भी भीड़ उसमे चार चाँद लगा रही है । जैसे ही ट्रेन पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 पर रूकती है सवारिया उतरने और चढ़ने के लिए कोशिश कर रहे है वही पर मैं भी गेट पर हाथ लगा कर नीलेश और शुभम को आगे आने के लिए बुला रहा हूँ । दोनों बालक ट्रेन में बड़ी ही मुश्किल से चढ़ते है और पहले ही सीट पर कब्ज़ा।
चार लोग एक सीट जायज है किन्तु यदि डिब्बा अनारक्षित हो तो ये ठीक नहीं । इसी नियम को पालन करते हुए एक और महिला जो की एक 3 वर्षीय बच्ची के साथ अकेले यात्रा कर रही थी उसको जगह दी माफ़ी चाहूँगा जगह दी नहीं , जगह बनाई । बैठने के लगभग 40 मिनट बाद ट्रेन चली और 5 मिनट में ही दूसरा स्टेशन आ गया जिसका नाम है गांधी नगर जयपुर । भीड़ अपने आप में ही सब कुछ बया कर रही थी फिर भी जनता आज रिकॉर्ड तोड़ने के मूड में दिख रही थी । जैसे तैसे ट्रेन चली , कुछ खड़े, कुछ अड़े और कुछ है बैठे । छोटे छोटे कई स्टेशन निकल रहे थे , ट्रेन अपनी अधितम रफ़्तार में थी । गरमा गर्म हवा मुझे और भी गर्म कर रहा था , मन तो कविता लिखने का था किन्तु शांत वातावरण मिला ही नहीं और कविता गिर गई ठन्डे बस्ते में । दौसा स्टेशन आया , प्यास बढ़ रही थी पर पेलटफ़ॉर्म दूसरी तरफ आया कोई बेचने वाला भी नहीं आया , मन को मनाया की थोड़ी देर रुके  और वो मान भी गया , ट्रेन चल दी भीड़ और बढ़ गई।
मैं  बैठ के बोर हो रहा था तभी दिमाग की बत्ती जली और जेब से अपना स्मार्ट फोन निकाला और बैठे बैठे ही लिखने लगा यात्रा वर्णन । ट्रेन बांदीकुई पहुँच रही है कुछ लोग उतर रहे है कुछ उलटी साइड से चढ़ रहे है । पानी आया , सभी अपनी अपनी प्यास बुझाए । एक छोटा बालक पानी की ज़िद करने लगा किन्तु उसकी दादी के पास पानी नहीं था उस समय । बच्चा कई बार पानी के लिए बोला , रोने की शक्ल भी बनाई । जब ये बात गुड्डू चाचा सुने तो उसे अपनी बोतल दिलवाई जिसमे थोडा पानी बचा था बच्चा आव देखा न ताव मुँह लगाया और पानी ……..गले के नीचे जैसे ही पानी उतरी उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी । ट्रेन में सब लोग बैठने और बैठाने की बात कर रहे है किन्तु ये ठोस कदम उठाये कौन ?
एक सज्जन ऊपर की सीट पर बैठने की ज़िद करने लगे । लाख मना करने पर भी नहीं माने कोशिश की ऊपर चढ़ने की , सफल भी हुए पर एक दो मिनट के लिए ही । पैर फिसल रहा था उनका पर मेरा दिल धड़क रहा था की कही वो मेरे ऊपर न गिर जाये । उनके दिल तक मेरी बात पहुची और वो पूरे 5 मिनट में  नीचे उतर आये । ट्रेन अलवर पहुँच रही थी , मुझे अपना इतिहास याद आ रहा था , आखिर राजस्थान की शुरुआत मैंने यही से की थी । बहुत ही मनोरम और ऐतिहासिक जगह है अलग । महाभारत के कई किस्से यहाँ की माटी में मिलते है । हसन खा मेवात नगर , जैन साहब का मकान, कैलाश पब्लिक स्कूल सब कुछ याद आ रहा था , मन रोम रोम खिल रहा था । तभी अचानक से नज़र दूसरी सीट पर बैठे दो आदमी पर पड़ी उम्र से वो नवयुवक लग रहे थे किन्तु बात वो धर्म की कहानियो पर कह रहे थे , कुछ पुरानी कहानी सुना रहे थे । बगल वाली सीट पर कुछ महिलाये भजन कीर्तन कर रही थी वो भी इस भीड़ में । उनकी इस ईश्वरी प्रेम को मैं प्रणाम करता हूँ जिस पर भीड़ का कोई भी असर नहीं पड़ रहा था ।
एम के पाण्डेय निल्को

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को VMW Team का खुला पत्र

सेवा में ,
        माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी,
              प्रधानमंत्री ,
              भारत सरकार ,
                         नई दिल्ली

विषय- भारत में आरक्षण को   समाप्त किये जाने एवं पदोन्नति में आरक्षण हेतु 117वें संबिधान संशोधन बिल को निरस्त किये जाने विषयक |

  माननीय महोदय ,
      सौभाग्य की बात है कि बहुत समय बाद भारत में आपके कुशल नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की केन्द्रीय सरकार विद्यमान है।
आपके मेक इन इंडिया , स्वच्छता अभियान व नोट बंदी जैसी कई योजनाओं का हम ह्रदय से पूर्ण समर्थन करते हैं ।
*माननीय महोदय* ,
जैसा कि आप जानते हैं कि समाज के पिछडे वर्गों के लिये संविधान में मात्र *दस वर्षों के लिये आरक्षण* की व्यवस्था की गयी थी, किन्तु जातिवादी व निहित कारणों से जाति आधारित आरक्षण की अवधि व क्रीमीलेयर की सीमा को बारंबार बिना समीचीन समीक्षा के बढाया जाता रहा है ,
जिसे कि 10–  10 वर्ष करते करते आज 67 वर्ष पूरे हो गए हैं ।
*आज तक ऐसे आरक्षण प्राप्त डॉक्टर, इंजीनियर , प्रोफेसर , शिक्षक, कर्मचारी किसी ने नहीं कहा कि अब वह दलित या पिछड़ा नहीं रहा व अब उसे जातिगत आरक्षण की जरुरत नहीं है।*
  *इससे सिद्ध होता है कि आरक्षण का आधार पिछड़ा वर्ग या समूह के बजाय जाति किये जाने से इन 67 सालों में कोई लाभ नहीं हुआ है।*
महोदय ,
*इस जाति आरक्षण का लाभ जहां कुछ खास लोग परिवार समेत पीढी दर पीढी लेते जा रहें हैं वहीं वे इसे निम्नतम स्तर वाले अपने ही जरूरतमंदों लोगों तक भी नहीं पहुंचने दे रहे हैं। अन्यथा इन 67 वर्षों में हर आरक्षित वर्ग के व्यक्ति तक इसका लाभ पहुँच चुका होता।*
*ऐसे तबके को वे केवल अपने बार बार लाभ हेतु संख्या या गिनती तक ही सीमित कर दे रहे हैं।*
महोदय,
*गरीबी जाती देखकर नहीं आती*
*आरक्षण का आधार जाति किये जाने से जहाँ सामान्य वर्ग के तमाम निर्धन व जरूरतमंद युवा बेरोजगार व हतोत्साहित हैं , कर्मचारी कुंठित व उत्साहहीन हो रहे हैं,*
*वहीं समाज में जातिवाद का जहर बड़ी तेज़ी से बढ़ता जा रहा है।*
  अत: आपसे निवेदन है कि राष्ट्र के समुत्थान व विकास के लिये संविधान में संशोधन करते हुये आरक्षण को समाप्त करने का कष्ट करेंगे ।
किसी भी जाति – धर्म के असल जरूरतमंद निर्धन व्यक्ति को *आरक्षण नहीं बल्कि संरक्षण* देना सरकार को   सुनिश्चित करना चाहिए ।

*आरक्षण को पूर्ण रूप से समाप्त करने से पहले अगर वंचित वर्ग तक इसका ईमानदारी से वास्तव में सरकार लाभ पहुँचाना चाहती है तो इस आरक्षण को एक परिवार से एक ही व्यक्ति , केवल बिना विशेष योग्यता / कार्यकुशलता वाली समूह ग व घ की नौकरियों में मूल नियुक्ति के समय ही दिया जा सकता है।*

*आयकर की सीमा में आने वाले व्यक्ति के परिवार को आरक्षण से वंचित किया जाना चाहिये ताकि राष्ट्र के बहुमूल्य संसाधनों का सदुपयोग सुनिश्चित हो सके।*

*पदोन्नति में आरक्षण तो पूर्णत: बंद कराया ही जाना चाहिये जिससे कि योग्यता, कार्यकुशलता व वरिष्ठता का निरादर न हो।*

   आशा है कि महोदय राष्ट्र व आमजन के हित में इन सुझावों पर ध्यान देते हुये समुचित कार्यवाही करने व इस हेतु जन जागरण अभियान प्रारंभ कर मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने  का कष्ट करेंगे |

🙏 *विशेष निवेदन /आग्रह*🙏
*जन जागृति* के लिए आपको सिर्फ 10 लोगो को ये मेसेज फॉरवर्ड करना है और वो 10 लोग भी दूसरे 10 लोगों को ये मेसेज करें ।
इस प्रकार
1 = 10 लोग
यह 10 लोग अन्य 10 लोगों को मेसेज करेंगे
इस प्रकार :-
10 x10 = 100
100×10=1000
1000×10=10000
10000×10=100000
100000×10=1000000
1000000×10=10000000
10000000×10=100000000
100000000×10=1000000000
                            (100 करोड़ )
बस आपको तो एक कड़ी जोड़नी है देखते ही देखते सिर्फ आठ steps में पूरा देश जुड़ जायेगा।

क्षीरसागर का कछुवा

क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेष शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मी जी उनके पैर दबा रही हैं। विष्णु जी के एक पैर का अंगूठा शैया के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं।
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क्षीरसागर के एक कछुवे ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार कर कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिव्ह्या से स्पर्श कर लूँ तो मेरा मोक्ष हो जायेगा उनकी ओर बढ़ा।
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उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग जी ने देख लिया और कछुवे को भगाने के लिये जोर से फुँफकारा। फुँफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया।
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कुछ समय पश्चात् जब शेष जी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया। इस बार लक्ष्मी देवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया।
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इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों प्रयास किये पर शेष जी और लक्ष्मी माता के कारण उसे कभी सफलता नहीं मिली। यहाँ तक कि सृष्टि की रचना हो गई और सत्युग बीत जाने के बाद त्रेता युग आ गया।
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इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों में जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहा। अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्टि को प्राप्त कर लिया था।
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कछुवे को पता था कि त्रेता युग में वही क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु राम का, वही शेष जी लक्ष्मण का और वही लक्ष्मी देवी सीता के रूप में अवतरित होंगे तथा वनवास के समय उन्हें गंगा पार उतरने की आवश्यकता पड़ेगी। इसीलिये वह भी केवट बन कर वहाँ आ गया था।
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एक युग से भी अधिक काल तक तपस्या करने के कारण उसने प्रभु के सारे मर्म जान लिये थे इसीलिये उसने राम से कहा था कि मैं आपका मर्म जानता हूँ।
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संत श्री तुलसी दास जी भी इस तथ्य को जानते थे इसलिये अपनी चौपाई में केवट के मुख से कहलवाया है कि
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“कहहि तुम्हार मरमु मैं जाना”।
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केवल इतना ही नहीं, इस बार केवट इस अवसर को किसी भी प्रकार हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। उसे याद था कि शेषनाग क्रोध कर के फुँफकारते थे और मैं डर जाता था।
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अबकी बार वे लक्ष्मण के रूप में मुझ पर अपना बाण भी चला सकते हैं पर इस बार उसने अपने भय को त्याग दिया था, लक्ष्मण के तीर से मर जाना उसे स्वीकार था पर इस अवसर को खो देना नहीं।
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इसीलिये विद्वान संत श्री तुलसी दास जी ने लिखा है –
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पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव
न नाथ उरराई चहौं।
मोहि राम राउरि आन
दसरथ सपथ सब साची कहौं॥
बरु तीर मारहु लखनु पै
जब लगि न पाय पखारिहौं।
तब लगि न तुलसीदास
नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥
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( हे नाथ ! मैं चरणकमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे उतराई भी नहीं चाहता। हे राम ! मुझे आपकी दुहाई और दशरथ जी की सौगंध है, मैं आपसे बिल्कुल सच कह रहा हूँ। भले ही लक्ष्मण जी मुझे तीर मार दें, पर जब तक मैं आपके पैरों को पखार नहीं लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ ! हे कृपालु ! मैं पार नहीं उतारूँगा। )
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तुलसीदास जी आगे और लिखते हैं –
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सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥
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केवट के प्रेम से लपेटे हुये अटपटे वचन को सुन कर करुणा के धाम श्री रामचन्द्र जी जानकी जी और लक्ष्मण जी की ओर देख कर हँसे। जैसे वे उनसे पूछ रहे हैं कहो अब क्या करूँ, उस समय तो केवल अँगूठे को स्पर्श करना चाहता था और तुम लोग इसे भगा देते थे पर अब तो यह दोनों पैर माँग रहा है।
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केवट बहुत चतुर था। उसने अपने साथ ही साथ अपने परिवार और पितरों को भी मोक्ष प्रदान करवा दिया। तुलसी दास जी लिखते हैं –
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पद पखारि जलु पान
करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि
पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥
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चरणों को धोकर पूरे परिवार सहित उस चरणामृत का पान करके उसी जल से पितरों का तर्पण करके अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्र को गंगा के पार ले गया।
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  श्री राम जय राम जय जय राम