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इस बरसात के मौसम मे

आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।
v मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

रुद्रपुर – भगवान रुद्र की दूसरी काशी – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

भारत में वैसे तो अनेकानेक मंदिर शिवालय हैं परन्तु उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर में 11वीं सदी में अष्टकोण में बने प्रसिद्ध दुग्धेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी अनूठी विशेषता के लिए विश्वविख्यात है। यहां शिवलिंग जमीन से अपने आप निकला था। इस शिवलिंग का आधार कहां तक है इसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग की लम्बाई पाताल तक है। देवरिया जनपद मुख्यालय से लगभग बीस किमी दूर स्थित रुद्रपुर नगरी को काशी का दर्जा प्राप्त है। यहां भगवान शिव, दुग्धेश्वरनाथ के नाम से जाने जाते है। इस मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त ईट बौद्ध कालीन है। इस क्षेत्र की जनता जनार्दन इनको बाबा दुधनाथ के नाम से भी पुकारती है । उप ज्योतिर्लिंगों की स्थापना के संबंध में पद्म पुराण की निम्न पंक्तियां उल्लिखित हैं- 
खड़ग धारद दक्षिण तस्तीर्ण दुग्धेश्वरमिति ख्याति सर्वपाप:,
 प्राणाशकम यत्र स्नान च दानं च जप: 
पूजा तपस्या सर्वे मक्षयंता यान्ति दुग्धतीर्थ प्रभावत:। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल दधीचि व गर्ग आदि ऋषि-मुनियों की तपस्थली भी है। इतिहास की माने तो रुद्रपुर में रुद्रसेन नामक राजा का किला था और इसी कारण यह रुद्रपुर कहलाया पर मेरे विचार से भगवान रुद्र (शिव) की पुरी (नगरी) होने के कारण इसका नाम रुद्रपुर पड़ा होगा । महाशिवरात्रि के दिन एवं श्रावण मास में यहां भारी भीड़ होती है। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव, ॐ नम: शिवाय और बाबा भोलेनाथ की जयकारों से गुंजायमान रहता है। जनश्रुतियों के अनुसार, मंदिर बनने से पहले यहां घना जंगल था। बताते है कि उस समय दिन में गाय, भैंस चराने के लिए कुछ लोग आया करते थे। आज जहां शिवलिंग है, वहां नित्य प्रतिदिन एक गाय प्राय: आकर खड़ी हो जाती थी तथा उसके थन से अपने आप वहां दूध गिरना शुरू हो जाता था। इस बात की जानकारी धीरे-धीरे तत्कालीन रुद्रपुर नरेश हरी सिंह के कानों तक पहुंची तो उन्होंने वहां खुदाई करवाई। खुदाई में शिवलिंग निकला। राजा ने सोचा कि इस घने जंगल से शिवलिंग को निकाल कर अपने महल के आस-पास मंदिर बनवाकर इसकी स्थापना की जाए।  कहा जाता है कि जैसे-जैसे मजदूर शिवलिंग निकालने के लिए खुदाई करते जाते वैसे-वैसे जमीन में धंसता चला जाता। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। शिवलिंग तो नहीं निकला वहां एक कुआं जरूर बन गया। सोमनाथ के अतिरिक्त सामान्य धरातल से नीचे का शिवलिंग भारत में संभवत: अन्यत्र कहीं नहीं है। बाद में राजा को भगवान शंकर ने स्वप्न में वहीं पर मंदिर स्थापना करने का आदेश दिया। भगवान के आदेश के बाद राजा ने वहां धूमधाम से काशी के विद्धान पंडितों को बुलवाकर भगवान शंकर के इस लिंग की विधिवत स्थापना करवाई। जब तक वह जीवित रहे, भगवान दुग्धेश्वरनाथ की पूजा-अर्चना और श्रावण मास में मेला आयोजित करवाते थे। मंदिर में आज भी भक्तों को लिंग स्पर्श के लिए 14 सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। यहां भगवान का लिंग सदैव भक्तों के दूध और जल के चढ़ावे में डूबा रहता है। कहा जाता है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी जब भारत की यात्रा की थी तब वह देवरिया के रुद्रपुर में भी आए थे। उस समय मंदिर की विशालता एवं धार्मिक महत्व को देखते हुए उन्होंने चीनी भाषा में मंदिर परिसर में ही एक स्थान पर दीवार पर कुछ चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित थी, जो आज भी अस्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है। 

एम के पाण्डेय निल्को

 


इक दो कौड़ी का जेहादी,सैनिक को थप्पड़ मार गया

कश्मीर घाटी में अक्सर सुरक्षाबलों पर ताकत के बेतहाशा प्रयोग और मानवाधिकारों के हनन के आरोप लगते हैं। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। सुरक्षाकर्मी ही अपने मान-सम्मान, जान को खतरे में डाल संयम बरतते हैं। इस हकीकत का खुलासा सुरक्षाबलों ने नहीं किया, इस कड़वे सच से पर्दा अलगाववादियों की समर्थक

हिंसक भीड़ ने अपनी उपलब्धियों का बखान करने के लिए सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो अपलोड कर उठाया। डियो में हिंसक भीड़ दो सुरक्षाकर्मियों को बुरी तरह पीटती हुई नजर आती है तथा सुरक्षाकर्मी भीड़ का प्रतिरोध करने की बजाए निरीह प्राणियों की तरह मार खा रहे हैं। एक अन्य वीडियो में कुछ लडक़े एक सीआरपीएफ जवान को लातों से पीट रहे हैं और जवान है कि मार खा रहा है। एक वीडियो है जिसमें डयूटी से लौट रहे जवानों के लडक़ों की भीड़ चल रही है। लडक़े बार-बार जवानों को उकसाते हुए कह रहे हैं कि गो इंडिया गो, जालिमों कश्मीर छोड़ दो। कुछ लडक़े जवानों की हेल्मेट उतार रहे हैं तो कुछ लडक़ों ने उनकी शील्ड तक छीन ली। एक लडक़े ने एक जवान का स्लीपिंग बैग भी नीचे गिरा दिया। भीड़ में शामिल एक लडक़ा उत्तेजित हो जवानों को गाली देते हुए मारपीट करने लगता है,लेकिन उसका दूसरा साथी उसे रोक लेता है। जवान देश की रक्षा के लिए हैं अपमान का घूंट पीने के लिए नहीं लेकिन कश्मीर जैसे संवेदनशील जगह पर शांति बनी रहे इसलिए हमारे देश के जवान अदम्य साहस के साथ अटूट धैर्य का परिचय देते हैं

मैं फिर से ‘नज़र निल्को की’ ये शीर्षक ले कर आया हूँ

आज कई दिनो बाद फिर यहाँ पर आया हूँ

इतने दिन व्यस्त रहा वो बताने आया हूँ

आप याद किए या न किए हो पर

मैं फिर से नज़र निल्को की ये शीर्षक ले कर आया हूँ

सादर वंदे

एम के पाण्डेय निल्को 

ट्रेन मे पड़ी जब नज़र

ट्रेन मे पड़ी जब नज़र
जैसे हो गई वो ब्रेकिंग ख़बर
पहली मुलाक़ात मे ही जच गई थी वो
और निल्को पर था उसका अब तक असर
qएम के पाण्डेय ‘निल्कों’


सूखा लोगों द्वारा ही पैदा किया गया?

प्रकृति और प्राणी दोनों ही एक दूसरे के सहचर हैं। दोनों मे से किसी एक के भी द्वारा पैदा किए गए असन्तुलन से दोनों को ही अस्वाभाविक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। प्राणियों में खासकर मानव के द्वारा लिप्सा बस प्रकृति के साथ निरन्तर की जा रही नाजायज छेड़-छाड़ भीषण प्राकृतिक असंतुलन का सामना धरती के विभिन्न भागों को करना पड़ता है। ऐसे प्राकृतिक असंतुलन कभी अवर्षण (सूखा) तो कभी अतिवर्षण (बाढ़) तो कभी भूकम्प के रूप में तबाही मचाते रहे हैं।

  • जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। 
देश भर में पानी को लेकर हाहाकार है। विशेषज्ञों का कहना है कि सागर और बूंदें अलग हो जाएं तो न सागर बचा रहेगा और न बूंद बचेगी और देश में भीषण सूखे की यह एक बड़ी वजह है। हमारे देश में लाखों की तादाद में तालाब थे, कुएं थे लेकिन हमने उन्हें रहने नहीं दिया, परिणाम हमारे सामने है। इस समय भारत में सूखे की समस्या ने एक विकराल रूप ले लिया है। महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ऐसे राज्य हैं, जिनके कुछ हिस्से इस समय सूखे की समस्या से जूझ रहे हैं। सूखे की बात आते ही हर कोई भगवान को दोष देने लगता है और इसे एक प्राकृतिक आपदा का नाम दे दिया जाता है। लेकिन क्या सूखे के लिए सिर्फ प्रकृति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? या इसके लिए और भी कोई दोषी है?सूखे और जल संकट पर शीर्ष अदालत ने बड़े ही तल्ख लहजे में कहा है कि देश के नौ राज्य सूखाग्रस्त हैं और सरकार इस पर आंखें बंद नहीं कर सकती। यह बुनियादी जरूरतों में से एक है और सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रभावित लोगों को इस समस्या से निजात दिलाए। भारत में सूखा पड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन क्या इसके लिए पहले से तैयार नहीं रहा जा सकता है? अगर बात करें सूखा पड़ने के कारण की, तो इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है सरकार की पॉलिसी। भारत में हर साल किसी न किसी क्षेत्र में सूखा जरूर पड़ता है और कई ऐसी जगहें भी हैं, जहां साल दर साल कमोबेश सूखे की स्थिति पैदा हो ही जाती है। बावजूद इसके सराकार की तरफ से कोई कड़े कदम नहीं उठाए जा रहे।

इस ओर न तो राज्य सरकार ध्यान देती है, न ही केन्द्र सरकार उस सूखी जमीन को हरा भरा करने की सोचती है। आलम ये है कि सूखे से परेशान होकर किसान आत्महत्या कर रहा है और नौजवान गांव छोड़कर शहरों की ओर रोजी रोटी की तलाश में निकल जा रहे हैं। गांव में बच रही हैं तो सिर्फ महिलाएं और लड़कियां।कई गांवों का तो ये हाल है कि लड़कियों की शादी भी नहीं हो रही है। सरकार पानी जमा करने का कोई इंतजाम नहीं करती है, बल्कि जब कहीं सूखा पड़ता है तो मदद के नाम पर चंद टैंकर पानी की भीख पहुंचा दी जाती है, जो उस गांव के प्यासे लोगों के बीच कुछ ऐसे गायब हो जाता है, जैसे बरसों से तपती जमीन पर पानी की बूंद पड़ते ही हवा हो जाती है।पूर्ववर्ती योजना आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश का 29 फीसदी इलाका पानी की समस्या से जूझ रहा है। वह भले ही जल संकट की सारी जिम्मेदारी कृषि क्षेत्र पर डाले, लेकिन हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की अहम भूमिका है। असल में फैक्टरियां ही अधिकाधिक पानी पी रही हैं। कई बार फैक्टरियां एक ही बार में उतना पानी जमीन से खींच लेती हैं, जितना एक गांव पूरे महीने में भी नहीं खींचता। जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। इसमें कहा गया है कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार में भी यह समस्या गंभीर है। परंपरागत कुएं और ट्यूबवेल में भूजल का स्तर काफी नीचे खिसक रहा है। तालाब बर्बाद हो रहे हैं और इन्हें अवैध रूप से खत्म किया जा रहा है।
  •  हमारे पास रिजर्व पुलिस है, रिजर्व आर्मी है, लेकिन रिजर्व पानी नहीं है। 

भारी वर्षा से आई भयंकर बाढ़ के लिए नुकसान का पैगाम बनकर आती है। लेकिन अनावृष्टि से उत्पन्न सूखा और उसका प्रभाव अधिक दुःखदाई होता है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल ऐसी दिक्कत होने के बावजूद हम बारिश के पानी पर ही निर्भर क्यों हैं? आखिर ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है कि इन क्षेत्रों में पानी की व्यवस्था हो सके।जिन क्षेत्रों में सूखे की सबसे अधिक परेशानी साल दर साल आ रही है, उन क्षेत्रों में बारिश के पानी को संरक्षित करने के तरीके बताए जाने चाहिए। साथ ही, ऐसे क्षेत्रों में सरकार की तरफ से जल संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि सूखे जैसी स्थिति पैदा होने से पहले ही लोगों को पानी मुहैया कराया जा सके। ऐसा करने से न केवल सूखे से निपटा जा सकता है, बल्कि उन सैकड़ों किसानों की जान बचाई जा सकती है, जो सूखे की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं।
अकाल में पैदो ले चार ही वंश
सासी, कुत्ता, गिद्ध और सरपंच।
बुंदेलखंड में कही जाने वाली ये लोकोक्ति कभी सूखे की त्रासदी को बयां करने के लिए कही गई होंगी। उस सूखे के लिए जिसके कारण आधे से ज्यादा भारत की आबादी पिछले तीन सालों से जूझ रही है। इस साल भी मानसून आने से पहले ही आधे भारत में सूखे के हालात बन रहे हैं। महाराष्ट्र के लातूर में पानी को बचाने के लिए धारा 144 लागू कर दी गई है तो मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में एक नहर के पानी की रखवाली के लिए दस से ज्यादा बंदूकधारी 24 घंटे तैनात रहते हैं। मध्यप्रदेश के ही छतरपुर में लोग शाम होते ही घर छोड़ देते हैं और कई कई किलोमीटर का सफर करने के बाद एक पहाड़ से बहने वाले झरने से बूंद बूंद पानी इकट्ठा कर सुबह घर लौटते हैं। हमेशा पानी से लबालब रहने वाला नासिक का पवित्र रामकुंड 130 सालों में पहली बार पूरी तरह सूख गया है।उत्तर प्रदेश का गंगा यमुना का दोआब क्षेत्र जहां दस साल पहले तक 30-40 फुट गहराई पर ही पर्याप्त पानी मिल जाता था वहां अब 100 फुट से ज्यादा खुदाई करने पर भी पानी नजर नहीं आता।
एम के पाण्डेय ‘निल्को’
(युवा ब्लॉगर)
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तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने

बस यही दौड़ है इस दौर के इन्सानो की
तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने
तू रहे पीछे और मैं सदा आगे
ऐसी कोई बात या करामात बने
निंदा हो या हो आलोचना
करता तू है यही आराधना
की मैं न आगे निकलु तेरे से
इसके लिए ही करुगा साधना
गया जमाना मदद , सहयोग का
लगता है ये कुछ हठयोग सा
अगर न माना इनकी बात
तो करते है ये काम लठयोग का
कैसे होगा दूर ये सब
कौन कराएगा नैया पार
गर यही चलता रहा तो निल्को
फस जाएगे बीच मझधार
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एम के पाण्डेय निल्को
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