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ट्रैफिक सिग्नल पर भारत के कर्णधार

एक लावारिश बिना मां-बाप का बच्चा क्या खुद ही भिखारी बनने का फैसला कर लेता है? बिना किसी छत के भूखे पेट खुले आसमान के नीचे गुजारने वालों की तकदीर में जिल्लत और तिरस्कार के सिवा और क्या होता है तिस पर हमारी मरी हुई संवेदनाओं से निकले लफ़्ज जब उन्हें नसीहत देते हैं तो शायद एक बार उन्हें बनाने वाले भगवान भी कह उठते होंगे “वाह रे इंसान” – Tamanna

भिक्षावृत्ति एक अपराध, यह वे पंक्तियां हैं जो कभी पोस्टरों तो कभी विज्ञापनों द्वारा अकसर दिखाई दे जाती हैं, इन पंक्तियों को पढ़कर हम भिखारियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि हमारी घृणा का वास्तविक हकदार आखिर है कौन, वो जो अपनी भूख मिटाने के लिए 1-1 रुपए के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाते हैं, धूप, बारिश, तूफान हर मौसम में आसमान को ही अपनी छत समझकर रहते हैं, कूड़े के ढेर से खाने का सामान एकत्रित कर खाते हैं या फिर वो लोग जो इनकी ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार हैं? विकसित देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा भारत देश आज एक अहम समस्या समस्या का शिकार बना हुआ है। हालांकि सांस्कृतिक देश भारत में यह कोई नई बात नहीं है। इतिहास के पन्नों को उलटकर देखें तो पता चलेगा कि पहले भी हमारे देश में ‘भिक्षावृत्ति होती थी। सांसारिक मोह-माया त्यागकर ज्ञान प्राप्ति के लिए निकले महापुरुष भिक्षा मांगकर अपना जीवन-यापन करते थे। उनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ज्ञान प्राप्ति होता था। तत्कालीन समाज में भिक्षावृत्ति को सामाजिक बुराई नहीं मानी जाती थी। बल्कि भिक्षुओं का आदर-सत्कार किया जाता था।दूसरी ओर समय के साथ-साथ हर ची बदल गई। देश विकास की राह में बढ़ा, इसके साथ ही बाजारवाद को बढ़ावा मिला, लेकिन साथ ही बढ़ी भिखारियों की संख्या। हालांकि इसे रोकने के लिए काफी कोशिशें की गईं लेकिन यह महज जीवन-यापन का जरिया नहीं बल्कि एक नए कारोबार के रूप में समाज के सामने सीना तानकर खड़ा हो गया। 

इस सामाजिक कुरीति के बढऩे का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है। एक तरफ जहां सरकार सर्वशिक्षा अभियान के तहत सभी को शिक्षित करना चाहती है, तों महंगी होती शिक्षा से गरीब तबका कोसों दूर होता जा रहा है। ऐसे में यह तबका मजबूर हो जाता है कि जितना वक्त पढ़ाई में बर्बाद किया जाएगा, उतने वक्त में भविष्य के लिए भीख मांगकर अच्छी खासी रकम इकट्ठा की जा सकती है। भारत जैसे विकासशील देश में रोजगार के पर्याप्त साधन न होने के चलते इस पेशे को बढ़ावा मिलता है। यहां तक कि कभी-कभी ऐसे लोग भी दिख जाते हैं जो शिक्षित तो हैं पर उनके पास रोजगार नहीं है, थक-हार कर वो इस पेशें से जुडऩे में तनिक भी संकोच नहीं करते।
कुछ देर के लिए जिस जगह से गुजरने पर हम अपनी नाक रुमाल से ढक लेते हैं वहां यह लोग अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं, लेकिन जब किसी को दोषी ठहराने की बात आती है तो हम इन्हें ही साफ-सुधरे शहर की गंदगी समझ लेते हैं. इनके जीवन को सुधारने के स्थान पर हम इनके जीवन को ही कोसते रहते हैं.
सरकार की नजर में भिक्षावृति एक अपराध है और भीख मांगने वाले लोग एक अपराधी, लेकिन हैरत की बात तो यह है कि इन अपराधियों के लिए तो जेलों में भी कोई जगह नहीं है. उन्हें यूं ही सड़कों पर सड-अने के लिए छोड़ दिया जाता है. भिक्षावृत्ति को आपराधिक दर्जा देने के अलावा हमारी सरकार ने कभी उनकी ओर, उनके जीवन में व्याप्त मर्म की ओर ना तो कभी ध्यान दिया और ना ही उनके लिए किसी भी प्रकार की कोई योजना बनाई. सरकार ही क्यों हम अपनी ही बात कर लेते हैं, समाजिक व्यवस्था को ताने देने के अलावा हम करते भी क्या है. सड़क पर कोई भीख मांगता है तो हम उसे लेक्चर सुना देते हैं कि कुछ काम कर लो, लेकिन आप ही बताइए क्या कोई खुशी से अपने आत्म-सम्मान को किनारे रखकर कटोरा हाथ में उठाता है? हम उन्हें यह समझाते हैं कि कुछ काम करो भीख मांगना अच्छी बात नहीं है तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें दुत्कार कर अपनी शान बढ़ाते हैं . समाज की गंदगी समझे जाने वाले यह भिखारी सड़क पर ही पैदा होते हैं, वहीं अपने रिश्ते बनाते हैं और कभी बीमारी से तो कभी भूख से वहीं मर जाते हैं. लेकिन इनकी ओर कभी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है और भविष्य में भी ऐसी उम्मीद करना आसमान छूने जैसा ही है. बड़ी-बड़ी बातें करने वाले सरकारी नुमाइंदों के साथ-साथ शायद अन्य लोग भी जिन्हें आजकल हम समाज सुधारक कहते नहीं थक रहे उनके सामने भी जब कोई भिखारी भीख मांगने आता है तो वह उसे कभी पैसे देकर तो कभी दुत्कार कर अपनी गाड़ी के शीशे बंद कर लेते हैं. लेकिन शोहरत और संपन्नता से भरे अपने जीवन में वापस लौटने के बाद उन्हें कुछ याद नहीं रहता और बात फिर वहीं की वहीं रह जाती है कि भिक्षावृत्ति अपराध है और भीख मांगने वाले अपराधी . 

दशहरा – by TRIPURENDRA OJHA

                
आज दशहरा है , मै अपने घर से हजार किलोमीटर दूर जॉब करता हूँ जिस वजह से हर दशहरा ,दीपावली और अन्य त्यौहार मै अपने घर वालों के साथ बिताऊं ऐसा संभव नही हो पाता लेकिन आने वाला हर त्यौहार अपने परिवार के साथ बताये गये पलों की याद से रंगीन जरूर हो जाता है ! जरा सी स्मृति की भंगिमाएं चेहरे पर हजार भाव एक साथ नृत्य कराने लगतीं हैं ! यकीनन बड़ा ही शानदार अनुभव होता है जब आपको चाहने वाला , आपके साथ खुशियों के पल बाँट रहा होता है और आप का उसके साथ बिताया गया एक एक क्षण अपने आप में बड़ा ही अनमोल और ह्रदय को सुकून देने वाला होता है जो शायद आज जिन्दगी के भागमभाग , और खुशियाँ खरीदने चक्कर में खो सा रहा है !
भला हो तमाम सोशल साइट्स का जिनकी वजह से आज हम एक दुसरे को देख सकते हैं,सुन सकते है, बात कर सकते है एक छद्म मुलाकात कर सकते है सबसे बड़ी बात एक साथ रह सकते हैं ,कितने महान थे वो लोग जो महीनों महीनो चिठ्ठियों का इन्तेजार किया करते थे और और फिर उन चिठ्ठियों का जवाब आने का सालों..इन्तेजार |
वैसे तो हमारा बचपन बहुत नवाबों जैसा नहीं गुजरा लेकिन उस उम्र में भी अपनी अमीरी कुछ कम नहीं थी ,हम मेला जाने के लिए इतने दीवाने हुआ करते थे कि पुराने मंदिर के पास गिनी चुनी लकठा ,गट्टा,बताशा , मूंगफली,बेर जलेबी कि टोकरियों को देखकर वो आनंद आता था जो आज macD,शौपिंग मॉल और पीवीआर में भी नहीं आता ! सामान खरीदने के चक्कर में जलेबियाँ चखना , बेर चखना , मूंगफली ऐसे ही खा लेते थे कि कुछ खरीदने कि जरूरत ही नहीं पड़ती और पेट भर जाता और साथ में ले गये तीनो रुपयों में से डेढ़ रूपये वापस भी ले आते , एक अठन्नी खो जाने का इतना टेंशन होता था कि एक एक घंटे उसको खोजते ही रहते !
उम्र बढ़ने के साथ साथ मेले के प्रति दीवानगी बनी रही, दशहरा में हमारे यहाँ दुर्गा जी कि मूर्तियाँ रखीं जाती है हर गली मुहल्लों नुक्कड़ों कस्बों और शहरों में मूर्तियों के साथ तेज आवाज में बजता लाउडस्पीकर ह्रदय में जो उमंग कि कम्पन पैदा करता था उसकी अनुभूति शब्दों में वर्णित नहीं कि जा सकती , मन अन्दर ही अन्दर हिलकोरें लेने लगता  और अगर कोई मूर्ती विशाल दिख जाती तो बाप रे …. अब तो हम यहाँ से एक घंटा से पहले हटने वाले नहीं ..एकटक बिना पलक झपकाए तब तक माँ दुर्गा को निहारते रहेंगे जब तक कि महिषासुर के एडी को काटने वाले सांप कि जीभ तक न दिख जाए !
वास्तव में बड़ा आनंदित करने वाला होता था मेला , तरह तरह के खिलौने ,तरह तरह के खाने वाले व्यंजन, तरह तरह की  मूर्तियाँ मानो लगता था माँ दुर्गा के साथ साथ पूरा स्वर्ग उतर आया हो !
हजारो ख्वाहिशों और उत्कंठाओं को दबाये हुए जब हम बड़े हुए तो वो हर चीज , हर शौक ,हर मजे करने कि सोची जिसके लिए बचपन में माँ कि अनुमति, मन कि अनुमति या फिर जेब कि अनुमति नही मिलीं थी ! बड़े भाई साहब डिफेन्स ट्रेनिंग कर के ६ महीने बाद घर आये हुए थे जिन्होंने समय से कुछ पहले ही घर कि सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने कन्धों पर उठा लिया था और उम्र से पहले ही बड़े हो गये थे सो कहने का तात्पर्य ये है कि अभी वो उम्र थी जिनमे बचपना और परिपक्वता के मसाले से जिन्दगी कि नींव और वो दीवार खड़ी हो रही होती है जिसपे जिन्दगी तमाम परीक्षाओ कि छत पड़नी होती है !
खैर हमने दशहरा मेला घूमने जाने को सोचा और वो भी यहाँ वहां नहीं , सीधे शहर कि तरफ जो लगभग 100 किलोमीटर पड़ता था जो ट्रेन की सुविधा होने कि वजह से 1.5 घंटे मालूम नही पड़ता था , उमंग में भरे दोनों भाई माता जी की आसान सी स्वीकृति पाकर( जो कि पहले बड़ा ही दुर्लभ हुआ करती थी ) निकल पड़े दशहरा मनाने |
ट्रेन का टाइम हो रहा था दोनों लोग जल्दी जल्दी तैयार हो रहे थे ,मेरा कपडा कहाँ है मेरी चड्डी मेरा तौलिया , अम्मा रूमाल है क्या ..अब बड़े हो गये थे न सो रुमाल रखने कि आदत डालनी अच्छी बात है जो आज तक नही पड़ी अलग बात है , जैसे तैसे तैयार होकर हम लोग बाहर निकले ,भैया ने अपनी पसंदीदा पेंट शर्ट पहना और मैंने अपना , भड़भडा के साइकिल निकाला और सवार होकर भागे | हमारी प्यारी साइकिल जो जिसने हम दोनों भाइयों कि  शिक्षा पूरी करने में खुद को खपा दिया , हमारे संघर्षों की मूक गवाह , रोज लगभग 30 किलोमीटर  बिना कोई तेल,पेट्रोल खाए अनवरत चलने वाली हमारी सदाबहार एटलस साइकिल जिसे बहुत जाम चलने कि वजह से एक बार बेइज्जत भी होना पड़ा था हमारे रिश्तेदार से ,हमें काफी दुःख हुआ था जब भैया हमारे फूफा जी को छोड़ने उसी साइकिल से लेकर स्टेशन छोड़ने गये थे |
साइकिल चलाने का भी अपना एक प्रोटोकाल होता है कोई बहुत बड़ा और वजनी जब अपने छोटी उम्र लड़के के के साइकिल पर बैठता है तो उसकी जगह करियर पर नही बल्कि सीट पर होती है और ऐसा न करने वाले को समाज निर्दयी ,और संस्कार हीन घोषित कर देता है जिससे अगला अपना वो भरोसा खो देता है कि  वो पुनः उस बच्चे के पुष्पक विमान के सवारी का सुख ले पाए तो इसी प्रोटोकाल के तहत फूफा जी साइकिल चला रहे थे और भैया पीछे बैठे थे आगे से मंद मंद बहती पछुवा हवा और जाम साइकिल उनकी नसे ढीली कर रही थी ,फेफड़े अपनी ताकत से ज्यादा काम कर रहे थे और धड़कन बीच बीच में रुक सी जाती थी जैसे तैसे वो चेहरा लाल किये अपने गंतव्य से थोडा पहले उतरे और और कुछ रुपये थमाते हुए बोले थे भाई इसकी सर्विसिंग करा लेना ,भैया ने कहा क्यों कुछ खराबी तो है नहीं इसमें!!! इस पर उन्होंने ऐसी बात कही जो आज भी ज्यों कि त्यों हमारे कानो में गूंजती है , उन्होंने कहा था “ जिस चीज के लिए साइकिल का अविष्कार हुआ वो चीज इसमें कहीं दूर दूर तक दिखाई नहीं देती”| किसी साइकिल के लिए इससे बड़ी बेइज्जती कि बात क्या हो सकती है जब उसने अपनी तमाम उम्र निस्वार्थ हमारी सेवा में लगा दी हो |
खैर जो भी हो हम दोनों भाई उसी साइकिल पर निकल पड़े ट्रेन पकड़ने ,आपको बता दूं कि साइकिल के करियर में एक पतली सी छड ढीली हो गई थी जो सदृश दिशा में क्षैतिज रूप से थोड़ी बाहर सरक जाती थी जो मौके बेमौके दोनों तरफ से पैर करके बैठने वालों के जांघ के पास पैंट फाड़ देती थी और दुर्भाग्यवश भैया पीछे बैठे थे साइकिल का बैलेंस बिगड़ा और रंग में भंग पड गया !!!
सबसे नई , सबसे शानदार , सबसे प्यारी वाली पैंट पहनी थी भैया ने जो उस रोमांचक होने वाली यात्रा के भेंट चढ़ गई और हमारा उत्साह ठंडा पड़ गया,सबसे बड़ी मुसीबत कि अब करें क्या ,फटा पैन्ट पहन कर जा नहीं सकते और इतना टाइम नहीं कि वापस जा कर फिर चेंज करके वो ट्रेन पकड़ लें , अब लगा कि हमारे अरमानों पर पानी फिर जायेगा तब तक एक उपाय आया |
दो ट्रेन आधे घंटे के अंतर पर आती थी शहर जाने को जिसमें एक पैसेंजर होती थी जो हर छोटे बड़े स्टेशन रुकते हुए जाती थी और एक्सप्रेस और टाइम दोनों. का हो चुका था हमारे घर के २० मिनट की दूरी पर एक छोटा सा स्टेशन है जिसपर केवल पैसेंजर ट्रेन्स मिलती है लेकिन हम बड़े वाले स्टेशन पर जाना पसंद करते है क्योंकि पैसेंजर ट्रेन का कोई ठिकाना नही होता और बड़े वाले स्टेशन से एक्सप्रेस भी ट्रेन मिल जाती है सो हमने सोचा कि गाँव के बाहर वाले स्टेशन से वो पैसेंजर पकड़ लें,  सो भाग के आये और चेंज करके स्टेशन कि तरफ पैदल भागे स्टेशन पर पहुँचते तब तक एक और त्रासदी हुई ,आँखों के सामने से वो ट्रेन निकल गई अब मुसीबत और बढ़ गई अब क्या करें घर वापस जाना मंजूर नहीं था और 5 किलोमीटर पैदल बड़े स्टेशन जाना आसान  नहीं था , समय हमें जाने नहीं देना चाहता था और हम ऐसे समय को जाने नहीं देना चाहते थे ,फिर हम लोग पैदल ही रेल कि पटरियों को पकड़ के अगले स्टेशन जाना शुरू कर दिए  ताकि वो एक्सप्रेस पकड़ सकें जो पिछले स्टेशन पर नहीं रूकती थी और जो कभी भी आ सकती थी क्योंकि समय हो चुका था|
जल्दी जल्दी चलते चलते मस्ती भी करते जा रहे थे रेलवे लाइन के किनारे के बेरियों को तोडना , पत्थर उठा के गेंदबाजी करना , डंडे तोड़ कर इधर उधर मारते चलना | अब स्टेशन का आउटर दिखना शुरू हो गया था कि अचानक हमारे कान उस खरगोश के कान की मानिंद खड़े हो गये जो खतरा भांपने का सेंसर होता है , पटरियों में से घिसने कि आवाज आ रही थी कान दिया तो लगा कि कोई ट्रेन आ रही है ,हालाँकि कोई ट्रेन दिखाई नहीं दे रही थी भैया ने तुरंत अपनी पदार्थ भौतिकी विज्ञानं लगा के दौड़ लगानी शुरू कर दी हम पूछे क्या हुआ ? बोले भाग ट्रेन आ रही है जल्दी चल नहीं तो छूट जायेगी ..भैया आगे आगे हम पीछे पीछे रह रह के मैं पीछे घूम के देख लेता था कि ऐसा तो नहीं जो मजे ले रहे हों तब तक हमें इंजन दिखा और हमारी धड़कन बढ़ गई ..मैंने अब अपना शत प्रतिशत लगाना शुरू कर दिया फॉर्मल चमड़े के जूते पत्थरों पर ठोकर खा खा कर बेहाल हो रहे थे भैया स्पोर्ट्स वाले जूते पहने अपने ट्रेनिग के जलवे दिखा रहे थे ..एक लम्बा फासला बढ़ता जा रहा था भैया और हमारे बीच जबकि ट्रेन का फासला नजदीक होता जा रहा था अब स्टेशन दिखने लगा था ट्रेन कि गति धीमी हो रही थी फिर भी हमारी तरफ तेजी से बढ़ रही थी |
हमारा गला सूख रहा था फिर भी जान लगा के दौड़े जा रहे थे कोशिश मेले में जाने कि नहीं बल्कि समय पर विजय पाने की हो रही थी किसी भी कीमत पर असफल होना हम दोनों भाइयों में से किसी को मंजूर नहीं था चाहे वो लक्ष्य गिल्ली डंडा के स्कोर का हो या क्रिकेट मैच का या फिर ट्रेन के साथ दौड़ लगा कर उसी ट्रेन को पकड़ने का , हारना मंजूर नहीं था |
ट्रेन के इंजन ने पहले हमें पीछे किया फिर भैया को, कम से कम एक किलो मीटर की दूरी बची थी और ट्रेन हमें पूरी पार
कर के स्टेशन जाकर खड़ी हो गई , हमने सारी शक्ति लगा के फिर दौड़ना शुरू किया भैया जैसे ही गार्ड के डिब्बे के पास पहुंचे कि सिग्नल ग्रीन हो गया , भैया इस उम्मीद में हाँफते हुए मुझे देख रहे थे कि तुम पहुँचो तो मैं चढ़ूँ वरना मैं भी छोड़ दूंगा |
ट्रेन खुल गई और मैं प्लेटफ़ॉर्म पर चढ़ गया भैया बोगी का हैंडल पकड के चलने लगे मैं भी करीब पहुँच गया ट्रेन ने गति पकडनी शुरू की और हम दोनों भाई चलती ट्रेन में घुस गये |
हमने कर दिखाया, जो चीज हमें चाहिए थी वो मिल गयी हम बेतहाशा हँसे जा रहे थे , वो ख़ुशी थी कोशिश को कामयाबी में बदलने की , वो ख़ुशी थी जीत की, वो ख़ुशी थी साथ मिल कर विजय हासिल करने की ……
हांफते हांफते ही हम 70किमी से ज्यादा दूर निकल आये पता नहीं चला ..हमें सामान्य होते होते शहर आ गया और हम उतर गये मेला करने ..
पहली बार मॉल का मजा ,एस्केलेटर और लिफ्ट में बेवजह ऊपर नीचे…बाहर बड़ी बड़ी मूर्तियाँ , यूनिवर्सिटी के पार्क का झूला , गोलगप्पे , और उस रात खूब घूमे जिंदगी  का उतना मजा शायद ही अब मिले कभी ..
रात में दो बजे वापसी कि ट्रेन थी , स्टेशन पर पहुँचते पहुँचते थकान अपने चरम पर थी …ट्रेन के इन्तेजार में किसी के भारी भरकम डबल बेड साइज़ के लगेज पर आँख लग गई तब तक भैया ने हडबडा के उठाया ट्रेन आ गई थी ..हम बैठ गये और अब अपने स्टेशन उतरे जिस कसबे में पूरा बचपन बीता था दशहरा का मेला करते करते …|

सब्जी मंडी पहुंचें तो घुप्प अँधेरा था और दुर्गा जी का पंडाल जगमगा रहा था और वहां लोगों का जनसमूह सुबह के ४ बजे प्रोजेक्टर पर अजय देवगन के मूवी का मजा ले रहा था …हम भी वो फिल्म देखने बैठ गये और जब हल्का हल्का उजाला होना शुरू हुआ वहां से घर को निकल लिए …. इस घटना को  सात आठ वर्ष बीत चुके हैं पर जब भी दशहरा आता है और भैया से बात होती है तो बरबस ही हंसी छूट जाती है |

– TRIPURENDRA KUMAR OJHA
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मास्टर सिद्धेश पाण्डेय उर्फ यश को देवरिया रत्न अवार्ड से मुख्य अतिथि अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व बच्चालाल मौर्य ने सम्मानित किया

देवरिया, लार थाना के हरखौली निवासी मास्टर सिद्धेश पाण्डेय उर्फ यश बाबा को शहर के कार्यक्रम देवरिया महोत्सव 2017 में देवरिया रत्न अवार्ड प्रदान कर सम्मानित किया गया। VMW Team के सिद्धेश के जयपुर में होने के कारण अवार्ड उनके बड़े भाई बैंक मैनेजर योगेश पाण्डेय ने ग्रहण किया। कराटे में राष्टीय फलक पर नाम रोशन करने वाले 10 वर्षीय यश बाबा अमरेश कुमार पाण्डेय के पुत्र और वरिष्ठ पत्रकार एन डी देहाती के भतीजे है। आचार्य व्यास मिश्र स्मृति समिति ने देवरिया रत्न अवार्ड के लिए सिद्देश का चयन किया था। समिति के अध्यक्ष पवन मिश्र ने बताया कि सिद्धेश को देवरिया स्थित एस एस बी एल इंटर कॉलेज के समारोह में विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य के लिए राज्य के कई व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। सिद्धेश का चयन राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए किया गया था। इस अवसर पर टाइगर्स मार्शल आर्ट के कोच जय सूद ने सिद्धेश के इस उपलब्धि पर बधाई दी है तथा केंद्रीय विद्यालय क्रमांक चार के अध्यापक को भी इस बालक पर गर्व है।  

मास्टर सिद्धेश पाण्डेय उर्फ़ यश बाबा की कुछ तस्वीरे 

आलू पर कविता नहीं होता

कृपया ध्यान दे …!
मधुलेश पाण्डेय निल्को की यह एक वयंगात्मक रचना है, इसका उद्देशय किसी तो ठेस पहुचाना बिलकुल नहीं है।
ये कविता पढ़ना माना एक जुर्म है, पर इस जुर्म में किसी का मुंह काला नहीं होता | (डोंट वरी)

यह एक करारा जवाब है जो कहते है की आलू पर कविता नहीं होता |

तो पढ़िये यह शीषर्कहीन रचना और अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें।
आख़िर फूट ही गया आलू बम
निकाल दिया है सबका दम
दिखा दिया की हम नहीं है कम
और फोड़ दिया अनोखा बम
जैसे ही ये बम फूटा
लगा जैसे कुछ टूटा
निकला वही खोटा
जो था सबसे छोटा
बात आलू की करता हूँ
नहीं किसी से डरता हूँ
निल्को जब मैं लिखता हूँ
व्यंगों की वर्षा करता हूँ
शीषर्कहीन ये सूक्तिया है
विष्णु ने भरी बची रिक्तिया है
आलू की जो शक्तिया है
कम पड़ी मेरी पंक्तिया है
ये ब्लैक स्टोन की जो पूजा है
नहीं इनसा कोई दूजा है
बिलावल ने भी अब ठाना है
सुनाना अपना ही ताना बाना है  
मधुलेश पाण्डेय निल्को
एक आलू सेवनकर्ता

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पुण्य और परिवर्तन का पर्व – मकर सक्रांति

मकर संक्रांति अनेकता में एकता का पर्व

मकर सक्रांति के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं अतः इस दिन को मकर सक्रांति के नाम से जाना जाता है | महाभारत काल में भीशमपितामा ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर सक्रांति का ही चयन किया था | मकर सक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरत के पीछे -पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी | शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवतायों की रात्री अर्थात मकरात्मकता का प्रतीक तथा उतरायन को देवतायों का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है इसलिए इस दिन जप , तप , दान , स्नान , श्राद्ध ,तर्पण आदि धार्मिक क्रिया कलापों का विशेष महत्त्व है

भारतीयों का प्रमुख पर्व मकर संक्रांति आज भी अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों में वहां की परंपराओं के अनुसार ही मनाया जा रहा है। साथ ही इसी दिन से भिन्न-भिन्न राज्यों में गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है।  विज्ञान के अनुसार भी मकर संक्रांति पर्व स्वास्थ्य की दृष्टि से विशेष फायदेमंद होता है। सूर्य के मकर राशि में आने से ठंड का असर कम होने लगता है। रंग-बिरंगी पतंगों से सजा खिला-खिला आकाश, उत्तरायण में खिलते नारंगी सूर्य देवता, तिल-गुड़ की मीठी-भीनी महक और दान-पुण्य करने की उदार धर्मपरायणता। यही पहचान है भारत के अनूठे और उमंग भरे पर्व मकर संक्रांति की। मकर संक्रांति यानी सूर्य का दिशा परिवर्तन, मौसम परिवर्तन, हवा परिवर्तन और मन का परिवर्तन। मन का मौसम से बड़ा गहरा रिश्ता होता है। यही कारण है कि जब मौसम करवट लेता है तो मन में तरंगे उठना बड़ा स्वाभाविक है। इन तरंगों की उड़ान को ही आसमान में ऊंची उठती पतंगों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।
पतंग और रिश्तों का गणित
ये पतंगे जीवन के सरल-कठिन पेंच सिखाती है। रिश्तों में इतनी ढील ना रहे कि सामने वाला लहराता ही रहे और ना ही इतनी खींचतान या तनाव कि वह आगे बढ़ ही न सके। ये पतंगे उन्नति, उमंग और उल्लास का लहराता प्रतीक है। ये पतंगे बच्चों की किलकती-चहकती खुशियों का सबब है। ये पतंगे आसमान को छू लेने का रंगों भरा हौसला देती है। ये पतंगे ही तो होती है जो सिर पर तनी मायावी छत को जी भर कर देख लेने का मौका देती है वरना रोजमर्रा के कामों में भला कहां फुरसत कि ऊंचे गगन को बैठकर निहारा जाए?

मीठे स्वाद में जावो घुल मिल

उड़ावो पंतग ऐसे की खिल जाये दिल
मकर सक्रांति की खुशियों में भर दो मिठास
VMW Team के मजेदार लेखो के साथ…..

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें

पेशावर – खून के नापाक ये धब्बे


खून के नापाक ये धब्बे ,

खुदा से कैसे छिपाओगे ?

मासूमो के कब्र पर चढ़कर

कौन सा जन्नत पाओगे ?

अल्लाह की भी रूह काप गई होगी

शांति दूतो के इस कृत्य से ?

कैसी होगी उस माँ की हालत

जिसके बच्चे ने कहा होगा –

माँ, मैं आज स्कूल नहीं जाऊंगा

पर माँ ने उसे डाट कर

जबरजस्ती स्कूल भेजा होगा |

आतंक के खिलाफ गर

पाकिस्तान ने आवाज़ उठाई होती

तो मासूमो की जान

आज यू न जाई होती |

अब स्कूल मदरसे भी डरे हुए है

किसी अनजान डर से सहमे हुए है

क्यों इंसानियत होती है हर बार शर्मशार ?

क्या इसका जवाब कोई देगा…..&%*#$@$……..?

किसी ने सच ही कहा है –

आज दिन में एक अजीब सा दर्द है मेरे मौला

ये तेरी दुनिया है , तो यहाँ इंसानियत क्यों मरी है …?

हिंदुस्तानी होना क्या होता है

ये तब पता चलता है जब गाढ़े वक़्त में

पाकिस्तान के लिए भी दुःख होता है

पेशावर में मासूम परिंदों के लहू से

भरे पंखों को पेशा बना डाला…

लगा ऐसा जैसा शैतान ने खुदा को

भी अपने जैसा बना डाला..


ईश्वर उन बच्चों की आत्मा को शांति प्रदान करे जिनका जीवन, जीवन बनने से पहले ही समाप्त कर दिया गया और प्रभु बाकी बचे बच्चों को साहस और हिम्मत दे कि वो इस ह्रदय विदारक घटना से खुद को उबार पाये। मासूम बच्चों की मौत का हमें बड़ा दुःख है और पाकिस्तान हमारा दुश्मन देश है मगर फिर भी हमें बच्चों की मौत का मजाक नहीं बनाना चाहिए, लेकिन ये बात #
जेहाद का समर्थन करने वाले मुसलमानों को समझनी चाहिए कि आज ये जेहादी बीमारी गैर- मुसलमानों से ज्यादा खुद मुसलमानों को ही निगल रही है, ये जेहाद सिर्फ और सिर्फ इंसानियत के खिलाफ है न की किसी समुदाय विशेष के खिलाफ।।

भगवान इस हादसे में मारे गए बच्चों की आत्मा को शांति दें।।

मैं अपनी पहचान कैसे छोड़ दूं!

तेरी गलिया भी करती है यही पुकार
मुझे छोड़ , कहाँ चले गए यार
जब तू आया था पहली बार
सब लोगो से पता पूछा बार बार
और कई दिन तक लगातार
बाहर करता था इन्तजार
आज तू बड़ा हो गया
इसलिए दूर हो गया
जब तू धीरे – धीरे चलता था
गली के बच्चो के साथ खेलता था
शायद अब तू बड़ा खेल खेलता है
इसलिए दूर हो गया
सोचता हूँ निल्को
तेरी चर्चा छोड़ दूँ
तेरी गलिया
तेरा चौबारा
छोड़ दूँ
दिन गया बहुत गुजर
कट गया यह भी सफर
तुम लाख बार कुछ भी कहो
पर यह याद रखना की
मैं अपनी पहचान कैसे छोड़ दूं!
*******************
मधुलेश पाण्डेय निल्को
 
  

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है (डॉ कुमार विश्वास – Dr Kumar Vishwas)

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को, बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है, या मेरा दिल समझता है
मोहब्बत एक एहसासो की, पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था, कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते है, मेरी आँखों में आंसू है
जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है
समंदर पीर के अंदर है, लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है , इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू, बना लेना मगर सुनले
जो मेरा हो नहीं पाया, वो तेरा हो नहीं सकता
भ्रमर कोई कुमुदनी पर, मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे, सब किस्सा मोहब्बत का
हम किस्से को, हकीक़त में, बदल बैठे तो हंगामा
तुम्हारे पास हूँ लेकिन, जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती , अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मै भूल जाऊँगा, ये मुमकिन है नही लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ
मैं जब भी तेज चलता हूँ ,नज़ारे छूट जाते हैं
कोई जब रूप धरता हूँ , तो साँसे टूट जाती है
मैं रोता हूँ तो आकार लोग कन्धा थपथपाते हैं
मैं हँसता हूँ तो अक्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं
बहुत टुटा बहुत बिखरा, थपेड़े सह नहीं पाया
हवाओं के इशारो पर मगर में बह नहीं पाया
अधुरा अनसुना ही रह गया, ये प्यार का किस्सा

कभी में कह नहीं पाया कभी तुम सुन नहीं पाई

डॉ कुमार विश्वास

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भाइयो तुम्हारी याद आती है

दुनिया की हर ख़ुशी मेरे पास बहुत हैं.
आज फिर भी मेरा दिल उदास बहुत हैं.
कुछ भी कर लु अकेलापन जाता नहीं
जबकि मेरे आसपास मेरे खास बहुत हैं
भाइयो तुम्हारी याद आती है
हर पल याद सताती है
जो बिताये कुछ दिन मई के महीने में
बस वही बात याद आती है
भाइयो तुम्हारी याद……….

3 मई से मिलना शुरु किया
१५ मई से बिछड़ना शुरू किया
इस बीच क्या – क्या बात हुई
यही बात सताती है
 भाइयो तुम्हारी याद……….

ऑफिस का केबिन हो
या कोचिंग की क्लास
घर का कमरा हो
या बाहर का बागवान
हर जगह तुम्हारी याद सताती है
भाइयो तुम्हारी याद……….

वो आम के बगीचे की
वो खेत और खलिहान की
दोपहर में छत की
हर बात सताती है
भाइयो तुम्हारी याद……….

निल्को की कलम भी कह रही
आँखे भी परिभाषा गढ़ रही
कब मुलाकात वापिस होगी
यही बात सताती है
भाइयो तुम्हारी याद……….
  
मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’









तेरी यादों के सल्तनत पे कोई जोर नहीं मेरा
गुजरे लम्हों के हर तह में इतिहास बहुत हैं
तेरी यादों के सल्तनत पे कोई जोर नहीं मेरा
गुजरे लम्हों के हर तह में इतिहास बहुत हैं.


बहुत आसाँ है रो देना, बहुत मुश्किल हँसाना है
कोई बिन बात हँस दे-लोग कहते हैं “दिवाना है”

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VMW Team और भूतो की हवेली भानगढ़ किला

हममें से कितने लोग भूतों में विश्वास करते हैं? क्या भूत वाकई में होते हैं? क्या भूतों को देखा जा सकता है? भूतों को मानने वाले तो इन प्रश्नों का जवाब हां में देंगे, मगर न मानने वाले इस धारणा को खारिज कर देंगे। लेकिन भूतों के ठिकाने देखना हर कोई चाहेगा और भानगढ़ जाना कुछ ऐसा ही है। इसे देश का सर्वाधिक डरावना स्थल माना जाता है। हिंदुस्तान को हमेशा से ही रहस्यों , आलौकिक शक्तियों, तंत्रविद्या का देश कहा गया है। जब बात तंत्र विद्या की हो और ऐसे में हम भूत प्रेतों का ज़िक्र न करें तो फिर कहे गए शब्द एक हद तक अधूरे लगते हैं। लेकिन आगे बढ़ने से पहले चंद सवाल। हम लोगों में से कितने ऐसे हैं जो ये मानते और विश्वास करते हैं कि आज भी इस दुनिया में बुरी आत्माओं और भूतों का अस्तित्त्व है? क्या हम किसी भी माध्यम से भूतों से मिल सकते हैं? क्या हम उन्हें देख सकते हैं, उन्हें महसूस कर सकते हैं?

भानगढ़, राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के एक छोर पर है। यहाँ का किला बहुत प्रसिद्ध है जो ‘भूतहा किला’ माना जाता है। इस किले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था। भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधो सिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया।
माधोसिंह के तीन बेटे थे। (१) सुजाणसिंह (२) छत्रसिंह (३) तेजसिंह। माधोसिंह के बाद छत्रसिंह भानगढ़ का शासक हुआ। छत्रसिंह के बेटा अजबसिंह थे। यह भी शाही मनसबदार थे। अजबसिंह ने आपने नाम पर अजबगढ़ बसाया था। अजबसिंह के बेटा काबिलसिंह और इस के बेटा जसवंतसिंह अजबगढ़ में रहे। अजबसिंह के बेटा हरीसिंह भानगढ़ में रहे (वि. सं. १७२२ माघ वदी भानगढ़ की गद्दी पर बैठे)। माधोसिंह के दो वंशज (हरीसिंह के बेटे)औरंग़ज़ेब के समय में मुसलमान हो गये थे। उन्हें भानगढ़ दे दिया गया था। मुगलों के कमज़ोर पड़ने पर महाराजा सवाई जयसिंह जी ने इन्हें मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया।

इस किले में प्रवेश करने वाले लोगों को पहले ही चेतावनी दे दी जाती है कि वे सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात् इस इस किले के आस पास समूचे क्षेत्र में प्रवेश ना करें अन्यथा किले के अन्दर उनके साथ कुछ भी भयानक घट सकता है। ऐसा कहा जाता है कि इस किले में भूत प्रेत का बसेरा है,भारतीय पुरातत्व के द्वारा इस खंडहर को संरक्षित कर दिया गया है।गौर करने वाली बात है जहाँ पुरात्तव विभाग ने हर संरक्षित क्षेत्र में अपने ऑफिस बनवाये है वहीँ इस किले के संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने अपना ऑफिस भानगढ़ से दूर बनाया है।

जयपुर और अलबर के बीच स्थित राजस्थान के भानगढ़ के इस किले के बारे में वहां के स्थानीय लोग कहते हैं कि रात्रि के समय इस किले से तरह तरह की भयानक आवाजें आती हैं और साथ ही यह भी कहते हैं कि इस किले के अन्दर जो भी गया वह आज तक वापस नहीं आया है,लेकिन इसका राज क्या है आज तक कोई नहीं जान पाया।
मिथकों के अनुसार भानगढ़ एक गुरु बालू नाथ द्वारा एक शापित स्थान है जिन्होंने इसके मूल निर्माण की मंज़ूरी दी थी लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी थी कि महल की ऊंचाई इतनी रखी जाये कि उसकी छाया उनके ध्यान स्थान से आगे ना निकले अन्यथा पूरा नगर ध्वस्त हो जायेगा लेकिन राजवंश के राजा अजब सिंह ने गुरु बालू नाथ की इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और उस महल की ऊंचाई बढ़ा दी जिससे की महल की छाया ने गुरु बालू नाथ के ध्यान स्थान को ढंक लिया और तभी से यह महल शापित हो गया।
एक अन्य कहानी के अनुसार राजकुमारी रत्नावती जिसकी खूबसूरती का राजस्थान में कोई सानी नहीं था।जब वह विवाह योग्य हो गई तो उसे जगह जगह से रिश्ते की बात आने लगी।

एक दिन एक तांत्रिक की नज़र उस पर पड़ी तो वह उस पर कला जादू करने की योजना बना बैठा और राजकुमारी के बारे में जासूसी करने लगा।
एक दिन उसने देखा कि राजकुमारी का नौकर राजकुमारी के लिए इत्र खरीद रहा है,तांत्रिक ने अपने काले जादू का मंत्र उस इत्र की बोतल में दाल दिया,लेकिन एक विश्वशनीय व्यक्ति ने राजकुमारी को इस राज के बारे में बता दिया।
राजकुमारी ने वह इत्र की बोतल को चट्टान पर रखा और तांत्रिक को मारने के लिए एक पत्थर लुढ़का दिया,लेकिन मरने से पहले वह समूचे भानगढ़ को श्राप दे गया जिससे कि राजकुमारी सहित सारे भानगढ़ बासियों की म्रत्यु हो गई।
इस तरह की और और भी कई कहानियां हैं जो भानगढ़ के रहस्य पर प्रकाश डालती हैं लेकिन हकीकत क्या है वह आज भी एक रहस्य है।
भानगढ़ का किला चहारदीवारी से घिरा है जिसके अंदर घुसते ही दाहिनी ओर कुछ हवेलियों के अवशेष दिखाई देते हैं। किले के आखिरी छोर पर दोहरे अहाते से घिरा चाार मंजिला महल है। किवदंतियों के अनुसार भानगढ़ का महल कभी सात मंजिला हुआ करता था लेकिन अब इसकी चार मंजिल ही सलामत हैं लेकिन उनमें भी ऊपरी मंजिल लगभग नष्ट हो चुकी है तथा तीसरी मंजिल भी इस कदर जर्जर हो चुकी हैं जो कभी भी भरभरा कर गिर सकती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग जिस तरह से इस महल का संरक्षण कर रहा है वह भी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है।

जर्जर होती उऊपरी मंजिलों की दीवारों पर आधा-अधूरी लिपाई की गई है। तीसरी और चौथी मंजिल पर आज भी महल की राजशाही का गवाह रहे संगमरमर और पत्थरों के दरवाजे मौजूद हैं लेकिन उनकी सार-संभाल तक नहीं की जा रही है। 99 फीसदी कमरों की छतें गिर चुकी हैं और जो मौजूद हैं वे भी गिरने की कगार पर हैं। कमरों की ढह रही छतें उनकी प्राचीनता का अहसास तो कराती हैं लेकिन उनके संरक्षण में लापरवाही को भी उजागर करती हैं। महल की दीवारें जिस तरह से छलनी नजर आती हैं उससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि खजाने की तलाश में बीते दशकों में किस बेदर्दी से इन्हें खोदा गया है। ऊपरी मंजिल में महल की दीवारों और कमरों के मलबे का ढेर लगा है जिसमें मौजूद नक्काशीदार पत्थर इस बात का अहसास कराते हैं कि कभी यह महल कितना संपन्न रहा होगा। दूसरी मंजिल में बाहर से तो दीवारों और सीढिय़ों की मरम्मत की गई है लेकिन अंदर के कमरों की बदहाली देखने से ही नजर आती है। कमरों की दीवारें और छतें चमगादड़ों की बींट से खराब होती जा रही हैं लेकिन उनकी साफ-सफाई शायद सालों से नहीं की गई हैं। दिलचस्प बात यह है कि भानगढ़ के किले के अंदर मंदिरों में पूजा नहीं की जाती। गोपीनाथ मंदिर में तो कोई मूर्ति भी नहीं है। तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए अक्सर उन अंधेरे कोनों और तंग कोठरियों का इस्तेमाल किया जाता है जहां तक आम तौर पर सैलानियों की पहुंच नहीं होती। किले के बाहर पहाड़ पर बनी एक छतरी तांत्रिकों की साधना का प्रमुख अड्डा बताई जाती है। इस छतरी के बारे में कहा जाता है कि भानगढ़ की बरबादी का कारण रहा तांत्रिक सिंघिया वहीं रहा करता था। किले में स्थित महल तथा खंडहरों में सिंदूर, राख के ढेर, पूजा के सामान, चिमटों और त्रिशूलों के अलावा लोहे की मोटी जंजीरें भी मिलती हैं जो तांत्रिक अनुष्ठानों का सबूत हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने किले के द्वार पर एक बोर्ड लगा रखा है। इस पर लिखा है कि सूर्यास्त के बाद से लेकर सूर्योदय तक किले के अंदर पर्यटकों के रुकने पर मनाही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस भी व्यक्ति ने सूर्यास्त के बाद अंदर रुकने की कोशिश की है, वह लापता हो गया है। लिहाजा मन में कई सारे अनुत्तरित सवालों के साथ अन्य लोगों की तरह हमने भी ( योगेश जी, विजय जी, मधुलेश जी, अभिषेक जी,मोहक जी, सिद्धार्थ जी, निलेश जी, सुन्दरम जी) सूर्यास्त से पहले उस स्थान को छोड़ दिया।

Bhangarh is a town in India that is famous for its historical ruins

भारत की लोक कथा – चिड़िया की दाल

एक थी चिड़िया चूं-चूं। एक दिन उसे कहीं से दाल का एक दाना मिला। वह गई चक्की के पास और दाना दलने को कहा। कहते-कहते ही वह दाना चक्की में जा गिरा। चिड़िया ने दाना मांगा तो चक्की बोली-
‘बढ़ई से चक्की चिरवा ले, अपना दाना वापस पा ले।’

चिड़िया बढ़ई के पास पहुंची। उसने बढ़ई से कहा-‘बढ़ई, तुम खूंटा चीरों, मेरी दाल वापस ला दो।’ बढ़ई के पास इतना समय कहां था कि वह छोटी-सी चिड़िया की बात सुनता? चिड़िया भागी राजा के पास। राजा घिरा बैठा था चापूलसों से।

उसने चूं-चूं को भगा दिया। वह भागी रानी के पास, रानी सोने की कंघी से बाल बना रही थी। उसने चूं-चूं से कहा। ‘भूल जा अपना दाना, आ मैं खिलाऊं तुझको मोती।’

‘मोती भी भला खाए जाते हैं? चिड़िया ने सांप से कहा, ‘सांप-सांप, रानी को डस ले।’

“रानी, राजा को नहीं मनाती
राजा बढ़ई को नहीं डांटता
बढ़ई खूंटा नहीं चीरता
मेरी दाल का दाना नहीं मिलता।”

सांप भी खा-पीकर मस्ती में पड़ा था। उसने सुनी-अनसुनी कर दी। चूं-चूं ने लाठी से कहा-‘लाठी-लाठी तोड़ दे सांप की गर्दन।’ अरे! यह क्या! लाठी तो उसी पर गिरने वाली थी।

चूं-चूं जान बचाकर भागी आग के पास। आग से बोली-‘जरा लाठी की ऐंठ निकाल दो। उसे जलाकर कोयला कर दो।’ आग न मानी। चूं-चूं का गुस्सा और भी बढ़ गया। उसने समुद्र से कहा-‘इतना पानी तेरे पास, जरा बुझा तो इस आग को।’ समुद्र तो अपनी ही दुनिया में मस्त था। उसकी लहरों के शोर में चूं-चूं की आवाज दबकर रह गई।

एक हाथी चूं-चूं का दोस्त था मोटूमल। वह भागी-भागी पहुंची उसके पास। मोटूमल ससुराल जाने की तैयारी में था। उसने तो चूं-चूं की राम-राम का जवाब तक न दिया। तब चूं-चूं को अपनी सहेली चींटी रानी की याद आई।

कहते हैं कि मुसीबत के समय दोस्त ही काम में आते हैं। चींटी रानी ने चूं-चूं को पानी पिलाया और अपनी सेना के साथ चल पड़ी। मोटूमल इतनी चींटियों को देखकर डर गया और बोला-‘हमें मारे-वारे न कोए, हम तो समुद्र सोखब लोए।’ (मुझे मत मारो, मैं अभी समुद्र को सुखाता हूं।)

इसी तरह समुद्र डरकर बोला-‘हमें सोखे-वोखे न कोए, हम तो आग बुझाएवे लोए।’ और देखते-ही-देखते सभी सीधे हो गए। आग ने लाठी को धमकाया, लाठी सांप पर लपकी, सांप रानी को काटने दौड़ा, रानी ने राजा को समझाया, राजा ने बढ़ई को डांटा, बढ़ई आरी लेकर दौड़ा।

अब तो चक्की के होश उड़ गए। छोटी-सी चूं-चूं ने अपनी हिम्मत के बल पर इतने लोगों को झुका दिया। चक्की आरी देखकर चिल्लाई-‘हमें चीरे-वीरे न कोए, हम तो दाना उगलिने लोए।’ (मुझे मत चीरों, मैं अभी दाना उगल देती हूं।)

चूं-चूं चिड़िया ने अपना दाना लिया और फुर्र से उड़ गई।

प्रस्तुति : गजेन्द्र ओझा