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शैक्षणिक उपलब्धि का नया चलन 500/500

मेरी जानकारी मे पहले ऐसा नहीं था । अब शिक्षा बोर्डों मे पूर्णांक 500/500 देकर या इसके आस-पास अंक देकर पास करने का कम्पटीशन शुरू हो गया है । यह शिक्षा के बाजारीकरण का नया रूप है । हो सकता है कि ऐसा रिजल्ट देने वाले बोर्ड इसे अपनी भी उपलब्धि मानकर इतरा रहे ह़ों ।जबकि मेरी दृष्टि में यह  सम्बन्धित शिक्षा बोर्डों की पराजय है। पेपरसेटर और माडरेटर का सेट किया हुआ अवैज्ञानिक पेपर का प्रतिफल है या फिर शैक्षणिक प्रक्रिया में ग्यान और विषयवस्तु को केवल पूर्णांक पा लेने के हिसाब से ही निहित करके रखने का दोष है जो शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्ध्यांतों से मेल नहीं खाता । शिक्षा व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया है न कि ग्यान की पूर्णता का सर्टिफिकेट देकर इसे सीज करने की प्रक्रिया ।इसी लिए शैक्षणिक परफेक्शन तय करने या परफेक्शन मे एक या दो अंक काट लेने को लेकर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है ।

         बोर्ड और जनसामान्य इन्हें बधाइयाँ देता है जिसके वे हकदार हैं । लेकिन एनसीईआरटी नई दिल्ली द्वारा आयोजित राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा मे इनमें से बहुत कम शायदही बच्चे चयनित हो पाते हैं । सर्वे करके देख ले तो यह बिडंम्बना समझ मे आ जायेगी और शिक्षा का मापदण्ड भी समझ मे आ जायेगा । धन्य हैं परफेक्ट पाठ्यक्रम, परफेक्ट शिक्षण, परफेक्ट पेपरसेटिंग, परफेक्ट उत्तरलिखने वाला और परफेक्ट यानि पूरे 500/500 देने वाला या परफेक्ट मे से एकाध अंक काट लेने वाला । मेरी समझ से अगर यह सब कार्य एक ही व्यक्ति करे और वह अपने को परफेक्ट मानता हो तभी सम्भव है ,अन्यथा नहीं । क्योंकि हर लेवेल पर एरर की संभावना है । यह शिक्षा प्रक्रिया की प्रकृति मे है ।

              बोर्ड मे परफेक्ट अंक लाकर विद्यार्थी और अभिभावक खुश तो बहुत होंगे , अचम्भित भी । मेहनत के अनुसार वे इस उपलब्धि पर बधाई के पात्र हैं । लेकिन जाने अनजाने एक भारी तनाव दबाव उन पर आ गया है अपनी परफेक्ट वाली पोजीशन मेन्टेन करने का । सभी जानते हैं कि पूर्ण अंक पाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता । अतः इस बिंदु पर आगे बढ़ने की              अभिप्रेरणा( मोटिवेशन) काम नहीं करती बल्कि तनाव-दबाव को मैनैज करने की काउन्सेल़िग जरूरी होती है
और असफल होने पर विघटन भी हो सकता है । अतः एक सिस्टम की खामी से उन्हें अनावश्क तनाव-दबाव मिल गया है जिसकी जिम्मेदारी कोई बोर्ड नहीं लेगा । और यह भी हो सकता है वही बोर्ड आगे भिन्न मूल्यांकन प्रस्तुत करके अपना पल्ला झाड़ लेगा  । कुलमिलाकर, मूल्यांकन की यह परंपरा मेधावी विद्यार्थियों पर पूर्णांक लाने का अनावश्यक बोझ लादती है । शिक्षा शास्त्रियों को इस पर चिन्तन करके निराकरण प्रस्तुत करना चाहिए । शुभमस्तु ।
                           —  —  —    हरि शरण ओझा ।

Padmaavat Movie Review : इतनी विवादों के बाद आखिरकार पद्मावत रिलीज हो ही गई

रानी पद्मिनी की बहादुरी और राजपूतों की शौर्य को बयां करती फिल्म पद्मावती जिसको हाल में पद्मावत कर दिया गया है । संजय लीला भंसाली द्वारा निर्मित इस फिल्म में दीपिका पादुकोण , रणवीर सिंह और शाहिद कपूर मुख़्य किरदार के रूप में है । मेवाड़ का गौरव और राजपूताना शौर्य की कथाएं इतनी कमजोर नहीं है कि किसी के तीन घंटे की फ़िल्म बना लेने से उनका इतिहास धूमिल हो जाए । फिर भी पद्मावत को लेकर हंगामा क्यों बरस रहा ? पूरे देश में करणी सेना इस फिल्म का विरोध कर रही है कई जगह आगजनी तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आ रही हैं  । राजपूत सुरक्षा के लिए होते थे वह सुरक्षा प्रदान करते थे लेकिन कुछ राजनीति लाभ के लिए यह सब करना ठीक नहीं । जितनी फिल्म विवादित रही उतना ही चर्चा में बनी रही और इस फिल्म की मार्केटिंग फ्री में ही पूरे देश में हो गई । संजय लीला भंसाली को बहुत बड़े-बड़े बैनर नहीं बनवाने पड़े । सबसे मजे की बात है यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दे दी फिर भी राज्य सरकार अपने राज्य में इस फिल्म को दिखाने के लिए मना कर दी । सेंसर बोर्ड सुप्रीम कोर्ट दोनों ने फिल्म को पास कर दिया जो विवादित सीन था उसे  हटा दिया गया उसके बाद भी इसको रिलीज न होने दिया जाए इसका क्या मतलब ठीक है । कोई भी फिल्म आने वाली पीढ़ी के लिए एक कहानी के रूप में एक इतिहास को बयां करती हुई नजर आती है यदि हम उसको ठीक तरीके से प्रस्तुत ना करें तो हम अपनी पीढ़ी को गलत चीज की जानकारी देते रहते हैं इसलिए सभी फिल्म निर्माता से निवेदन आग्रह है कि सही दिखाए क्या चीज सही है गलत है वह बहुत अच्छे ढंग से समझते भी है शायद इसीलिए पद्मावती या पद्मावत बहुत ज्यादा विवादित रही है । पता नहीं आप लोग की क्यो फिल्म का विरोध कर रहे है । मैं तो यह भी नहीं जानता कि आप लोगों ने फ़िल्म देखी भी है या नहीं । वैसे बता दे कि यदि किसी ने फिल्म देखी है वो यही कहता सुनाई दे रहा है कि फ़िल्म को देखने के बाद खिलजी के खिलाफ नफरत और बढ़ जाएगी यही नहीं राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती को इतने बेहतरीन तरीके में दर्शाया गया है की इन दोनों की वीरता की कहानी जैसी आपको इतिहास में दिखाइए पढ़ाई गई थी वैसा ही कुछ फिल्म में भी दर्शाया गया है । चाहे गोरा बादल हो चाहे राजा रतन सिंह रानी पद्मावती तक  किसी की भी सम्मान के साथ फिल्में में कोई समझौता नहीं किया गया है और हां आप का डर था की इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी को हीरो की तरह दर्शाया गया है माफ कीजिएगा ऐसा कुछ नहीं है अलाउद्दीन खिलजी को एक बड़ा किरदार के रूप में जरूर दिखाए गया है बाकी अब तो फ़िल्म रिलीज हो ही चुकी है देखते है की करनी सेना और सुप्रीम कोर्ट में कौन सम्मानीय है ।

एम के पाण्डेय निल्को

अम्बेडकर जयंती – 14 अप्रैल

सामाजिक आज़ादी के बिना क़ानूनी स्वतंत्रता बेमानी होती है – बी आर अम्बेडकर
काशǃ भारत के एक धर्म जो की क़ानूनी रूप से अल्पसंख्यक है उनके पास भी एक अम्बेडकर होते।
सदर नमन
सादर वंदे
एम के पाण्डेय निल्को

मुझ पर एहसान करती है – एम के पाण्डेय ‘निल्कों’

मुझ पर एहसान करती है

ये कह कर बदनाम करती है

किसी रोज पढ़ेगा कोई इन चन्द लाइनों को

तो कोई कहेगा की तुमसे ही प्यार करती है

पर कभी नहीं वो एक़रार करती है

बस हर पल ही तकरार करती है

छेड़ा था किसी रोज दूर से ही उसको 

आज तक वो मुझसे सवाल करती है

शाम की वो क्लास करती है

सरे बाज़ार श्रंगार करती है

क्या मजाल जो कोई कह दे कुछ उसको

वही पर वो उसको हलाल करती है

गुस्से से चेहरा जब वो अपना लाल करती है

पूरे मोहल्ले मे फिर बवाल करती है

निल्को एक टक देखता है उसको

जब जब वो आखे चार करती है

एम के पाण्डेय निल्कों


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मुक्तक : आँख


आंखो मे सुरमा लगाती क्यू है

आईना देख इतराती क्यू है

तुझ पर जाऊ मैं वारि वारि

पर मुझे तू बार बार आजमाती क्यू है

एम के पाण्डेय निल्को

 

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होंठ उसके जैसे गुलाब की पंखुड़िया

होंठ उसके चेहरे पर
कुछ यूँ नज़र आते है
जैसे कुछ गुलाब की पंखुड़िया
पानी में नज़र आते है
उसे देख कर तो कुछ
लड़के भी शरमाते है
नंबर लेना देना, आगे पीछे घूमना
सब उसे देख अपनी
किस्मत आजमाते है
वो कहती है कैसे कैसे गीत
मुझे देख कर लोग गाते है
शक्ल सूरत में मुझे
अपनी प्रेमिका को को पाते है
कह दे वो यदि वो सच
और दिल की बात तो ‘निल्को’
सबसे पहले तुम्हारे जैसे लोग ही
अपना मुँह फुलाते है

एम के पाण्डेय निल्को

 

मुक्तक – नज़र निल्को की

अपने सर को बोलो की हद में रहे
चादर उनकी कद में रहे
बड़े होंगे पद में, तो क्या हुआ
बोलो अपने सरहद में रहे
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

नज़र निल्को की…….

न दुपट्टा गिरा और न उसकी उम्मीदों के दुपट्टे गिरे,
पर कुछ लोग उसके दुपट्टे गिराने मे कई बार गिरे
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

मुलाक़ात ……!

 बाते और मुलाकते दोनों जरूरी है रिश्ते निभाने के लिए, लगा के भूल जाने से तो पौधे भी सुख जाते है

चार महीने से सोच रहे थे
अखबारो मे उनको पढ़ रहे थे
जैसे ही धन्वन्तरी के कमरा 302 का गेट खोला
वो मेरे लेख पर ही सोच रहे थे

नाम है उनका ज्ञान
चेहरे पर अजीब सा विज्ञान
मिले है जबसे , सुना है उनको
ले रहा निल्को उनकी बातो का संज्ञान

सरनेम उनका कामरा
हुआ मेरा उनसे सामना
स्वस्थ रहे, प्रसन्न रहे
ईश्वर से यही कामना

राष्ट्र ध्वज के है सिपाही
कई लोग है उनके पनाही
मिलकर सुकून मिला कुछ यूं
जैसे पानी और छाव मिल गया हो राही
 एम के पाण्डेय ‘निल्को’

मुक्तक – औकात

बात बात पर वो औकात की बात करते है
और हम है कि मुलाकात की बात करते है
लड़ते है, झगड़ते है और मनाते भी है
और निल्को चोरी छुपे तेरी हर सौगात की बात करते है

सादर
*एम के पाण्डेय निल्को*

निल्को का ये उद्दघोष है

आप के समक्ष प्रस्तुत है ‘उद्दघोष’ पर एम के पाण्डेय निल्को का एक प्रयास
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मैंने खोया अब होश है
देखोगो अब वो मेरा जोश है
बंद करो इन सापो को दूध पिलाना
पूरी दुनिया को निल्को का ये उद्दघोष है
*****************************
एम के पाण्डेय निल्को

मुक्तक विषय : आवारगी

मेरी ताज़ा मुक्तक विषय : आवारगी

आवारगी होता क्या है
मेरी तरफ देख तेरा जाता क्या है
तुझे देख कर दिल डोले और बोले
मेरी बनने में तुझे होता क्या है

सादर वंदे
एम के पाण्डेय निल्को

माँ

माँ जब मैं कहता था 

या जब कुछ रटता था

सबसे पहले याद भी हुई तुम
सबसे जल्दी भूल भी गई तुम 
इसमें तेरे संस्कार की नहीं कमी
सोचने पर होते आँखे भी नमी 
माँ आज तेरे बिना कुछ भी नहीं
जो कहता था तूँ ही सब सही 
एक बार मुझे लगे तो लगा ले
या मुझे अपने पास ही बुला ले 
सादर वंदे
एम के पाण्डेय निल्को

आलू पर कविता नहीं होता

कृपया ध्यान दे …!
मधुलेश पाण्डेय निल्को की यह एक वयंगात्मक रचना है, इसका उद्देशय किसी तो ठेस पहुचाना बिलकुल नहीं है।
ये कविता पढ़ना माना एक जुर्म है, पर इस जुर्म में किसी का मुंह काला नहीं होता | (डोंट वरी)

यह एक करारा जवाब है जो कहते है की आलू पर कविता नहीं होता |

तो पढ़िये यह शीषर्कहीन रचना और अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें।
आख़िर फूट ही गया आलू बम
निकाल दिया है सबका दम
दिखा दिया की हम नहीं है कम
और फोड़ दिया अनोखा बम
जैसे ही ये बम फूटा
लगा जैसे कुछ टूटा
निकला वही खोटा
जो था सबसे छोटा
बात आलू की करता हूँ
नहीं किसी से डरता हूँ
निल्को जब मैं लिखता हूँ
व्यंगों की वर्षा करता हूँ
शीषर्कहीन ये सूक्तिया है
विष्णु ने भरी बची रिक्तिया है
आलू की जो शक्तिया है
कम पड़ी मेरी पंक्तिया है
ये ब्लैक स्टोन की जो पूजा है
नहीं इनसा कोई दूजा है
बिलावल ने भी अब ठाना है
सुनाना अपना ही ताना बाना है  
मधुलेश पाण्डेय निल्को
एक आलू सेवनकर्ता

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खुले मंच पर देता हूँ चुनौती

हमारे मेसेज को पढ़कर के
ग्रुप में आया एक तूफान
कुछ लोगो के दिल में
उठ गई एक उफान
पलटकर दिया उन्होंने जवाब
जैसे हड्डी बीच कवाब
खुले मंच पर देता हूँ चुनौती
क्यू की वो भी है लाज़वाब
स्वर एक साथ हुए खड़े
प्रयोग हुए शब्द कड़े
बीचबचाव में आये एडमिन
नहीं तो अपनी बात पर हम भी अड़े
मन में रह गई है कसक
हो गया था भेजा सरक
पर शुक्रिया उस शख्स की
जिसने बना आँखो का पलक
पर अब खींच गई है तलवारे
अब इनको कौन सुधारे
जब मिलगे फिर सभी
तो ही दूर होगी तकरारे

सादर वंदे
एम के पाण्डेय निल्को

विश्व महिला दिवस – 8 मार्च

आज महिला दिवस है देखा जाये तो हर दिन महिलाओ के बिना अधूरा है । सूरज उगने के साथ माँ की आरती के मीठे बोल या बहन की खट्टी सी झिड़की । बेटियो की ढेर सी बातें पत्नी के साथ सुबह की चाय  । वो खास लम्हा क्यू खास है? किसी न किसी रूप में उस लम्हे में शामिल महिलाओ की वजह से । सच ही जहाँ पर वो नहीं वो वहाँ मुमकिन हो ही नहीं सकता । वह जोड़ती है सर्जती है क्यू की जानती है की टूटना क्या होता है तभी तो उसका सृजन मानव आस्तित्व का आधार  है । तुम्हारी क्षेष्ठ कथाये तुम्हारे संघर्ष में निहित है । तुम्हारी सफलता के बीज अवरोधों में समाए है तुम्हारी सराहना पीडाओ से फूटेगी डटी रहो – क्योकि इस दुनिया ने कभी स्थायी तूफान नहीं देखा । विश्व महिला दिवस पर हर महिला को इस शुभेच्छा के साथ
तुम वही हो जिसका तुम्हे इंतज़ार था ।
असंख्य भावी सफलताओ की अग्रिम शुभकामनाये ।
सादर
योगेश पाण्डेय

भगवान श्री कृष्ण के जीवन सी जुड़ी 24 अनसुनी बातें

1. भगवान श्री कृष्ण के खड्ग का नाम ‘नंदक’, गदा
का नाम ‘कौमौदकी’ और शंख का नाम ‘पांचजन्य’ था जो गुलाबी रंग का था।

2. भगवान् श्री कॄष्ण के परमधामगमन के समय ना तो
उनका एक भी केश श्वेत था और ना ही उनके शरीर पर कोई झुर्री थीं।

3.भगवान् श्री कॄष्ण के धनुष का नाम शारंग व मुख्य
आयुध चक्र का नाम ‘ सुदर्शन’ था। वह लौकिक , दिव्यास्त्र व देवास्त्र तीनों रूपों में कार्य कर सकता था
उसकी बराबरी के विध्वंसक केवल दो अस्त्र और थे पाशुपतास्त्र ( शिव , कॄष्ण और अर्जुन के पास
थे) और प्रस्वपास्त्र ( शिव , वसुगण , भीष्म और
कॄष्ण के पास थे) ।

4. भगवान् श्री कॄष्ण की परदादी ‘मारिषा’ व सौतेली मां रोहिणी( बलराम की मां) ‘नाग’ जनजाति
की थीं.

5. भगवान श्री कॄष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं।

6. भगवान् श्री कॄष्ण की प्रेमिका ‘राधा’ का वर्णन महाभारत, हरिवंशपुराण, विष्णुपुराण व भागवतपुराण में नहीं है। उनका उल्लेख बॄम्हवैवर्त पुराण, गीत गोविंद व प्रचलित जनश्रुतियों में रहा है।

7. जैन परंपरा के मुताबिक, भगवान श्री कॄष्ण के
चचेरे भाई तीर्थंकर नेमिनाथ थे जो हिंदू परंपरा में ‘घोर
अंगिरस’ के नाम से प्रसिद्ध हैं.

8. भगवान् श्री कॄष्ण अंतिम वर्षों को छोड़कर कभी भी द्वारिका में 6 महीने से अधिक नहीं रहे।

9. भगवान श्री कृष्ण ने अपनी औपचारिक शिक्षा उज्जैन के संदीपनी आश्रम में मात्र कुछ महीनों में पूरी कर ली थी।

10. ऐसा माना जाता है कि घोर अंगिरस अर्थात नेमिनाथ के यहाँ रहकर भी उन्होंने साधना की
थी.

11. प्रचलित अनुश्रुतियों के अनुसार, भगवान श्री
कॄष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था और डांडिया रास उसी का नॄत्य रूप है।

’12. कलारीपट्टु’ का प्रथम आचार्य कॄष्ण को माना
जाता है। इसी कारण ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी।

13. भगवान श्रीकृष्ण के रथ का नाम ‘जैत्र’ था और
उनके सारथी का नाम दारुक/ बाहुक था। उनके घोड़ों
(अश्वों) के नाम थे शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक।

14. भगवान श्री कृष्ण की त्वचा का रंग मेघश्यामल था और उनके शरीर से एक मादक गंध
स्रावित होती थी.

15. भगवान श्री कॄष्ण की मांसपेशियां मृदु परंतु युद्ध के समय विस्तॄत हो जातीं थीं, इसलिए सामन्यतः लड़कियों के समान दिखने वाला उनका लावण्यमय
शरीर युद्ध के समय अत्यंत कठोर दिखाई देने लगता था ठीक ऐसे ही लक्ष्ण कर्ण, द्रौपदी व कॄष्ण के शरीर में देखने को मिलते थे।

16. जनसामान्य में यह भ्रांति स्थापित है कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे, परंतु वास्तव में कॄष्ण इस विधा में भी सर्वश्रेष्ठ थे और ऐसा सिद्ध हुआ मद्र राजकुमारी
लक्ष्मणा के स्वयंवर में जिसकी प्रतियोगिता द्रौपदी स्वयंवर के ही समान परंतु और कठिन थी।

17. यहां कर्ण व अर्जुन दोंनों असफल हो गये और तब श्री कॄष्ण ने लक्ष्यवेध कर लक्ष्मणा की इच्छा पूरी की, जो पहले से ही उन्हें अपना पति मान चुकीं
थीं।

18. भगवान् श्री युद्ध कृष्ण ने कई अभियान और
युद्धों का संचालन किया था, परंतु इनमे तीन सर्वाधिक
भयंकर थे। 1- महाभारत, 2- जरासंध और कालयवन के विरुद्ध, 3- नरकासुर के विरुद्ध

19. भगवान् श्री कृष्ण ने केवल 16 वर्ष की आयु में विश्वप्रसिद्ध चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया. मथुरा में दुष्ट रजक के सिर
को हथेली के प्रहार से काट दिया.

20. भगवान् श्री कॄष्ण ने असम में बाणासुर से युद्ध
के समय भगवान शिव से युद्ध के समय माहेश्वर ज्वर के विरुद्ध वैष्णव ज्वर का प्रयोग कर विश्व का प्रथम ‘जीवाणु युद्ध’ किया था।

21. भगवान् श्री कॄष्ण के जीवन का सबसे भयानक द्वंद युद्ध सुभुद्रा की प्रतिज्ञा के कारण अर्जुन के साथ हुआ था, जिसमें दोनों ने अपने अपने सबसे विनाशक शस्त्र क्रमशः सुदर्शन चक्र और पाशुपतास्त्र निकाल
लिए थे। बाद में देवताओं के हस्तक्षेप से दोंनों शांत हुए।

22. भगवान् श्री कृष्ण ने 2 नगरों की स्थापना की थी द्वारिका (पूर्व मे कुशावती) और पांडव पुत्रों के द्वारा इंद्रप्रस्थ ( पूर्व में खांडवप्रस्थ)।

23. भगवान् श्री कृष्ण ने कलारिपट्टू की नींव रखी जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई।

24. भगवान् श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता के रूप में आध्यात्मिकता की वैज्ञानिक व्याख्या दी, जो मानवता के लिए आशा का सबसे बडा संदेश थी, है और सदैव रहेगी.

प्रस्तुति
एम के पाण्डेय निल्को

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