Tag Archives: निल्को जी

ट्रेन मे पड़ी जब नज़र

ट्रेन मे पड़ी जब नज़र
जैसे हो गई वो ब्रेकिंग ख़बर
पहली मुलाक़ात मे ही जच गई थी वो
और निल्को पर था उसका अब तक असर
qएम के पाण्डेय ‘निल्कों’


थोड़ा तो ठहर – एम के पाण्डेय निल्को

चेतावनी – दोस्तो आज एक मनगढ़त रचना आप के सामने पेश कर रहा हूँ इसका किसी भी जीवित व्यक्ति से कोई भी सम्बंध नहीं है यदि ऐसा पाया जाता है तो उसे मात्र एक संयोग ही कहा जाएगा । 


गई थी वो दूसरे शहर 

बरपा रही थी कही वो कहर 

जब मुड़ कर देखि वो मुझको 

तो निल्को ने कहा – थोड़ा तो ठहर 

शुरू हुआ एक अनोखा सफर 

आए और बीते कई पहर 

मन मे बसी तस्वीर उसकी 

और उठ रही थी कई लहर 

रेलगाड़ी के सफर मे पड़ी जब नज़र 

जा रही थी वो अपने घर 

क्षण भर के मुलाक़ात मे ही 

वो लगी गणित की अंश और मैं हर 

छोड़ गई आधे रास्ते मे ही वो 

और हंस कर कह गई – यू केन गो 

देखता रहा मधुलेश जब तक पड़ी नज़र 

और लगा समय गया था कुछ पल ठहर 

एम के पाण्डेय निल्को
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तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने

बस यही दौड़ है इस दौर के इन्सानो की
तेरी दीवार से ऊची मेरी दीवार बने
तू रहे पीछे और मैं सदा आगे
ऐसी कोई बात या करामात बने
निंदा हो या हो आलोचना
करता तू है यही आराधना
की मैं न आगे निकलु तेरे से
इसके लिए ही करुगा साधना
गया जमाना मदद , सहयोग का
लगता है ये कुछ हठयोग सा
अगर न माना इनकी बात
तो करते है ये काम लठयोग का
कैसे होगा दूर ये सब
कौन कराएगा नैया पार
गर यही चलता रहा तो निल्को
फस जाएगे बीच मझधार
*****************

एम के पाण्डेय निल्को
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मैं अपनी पहचान कैसे छोड़ दूं!

तेरी गलिया भी करती है यही पुकार
मुझे छोड़ , कहाँ चले गए यार
जब तू आया था पहली बार
सब लोगो से पता पूछा बार बार
और कई दिन तक लगातार
बाहर करता था इन्तजार
आज तू बड़ा हो गया
इसलिए दूर हो गया
जब तू धीरे – धीरे चलता था
गली के बच्चो के साथ खेलता था
शायद अब तू बड़ा खेल खेलता है
इसलिए दूर हो गया
सोचता हूँ निल्को
तेरी चर्चा छोड़ दूँ
तेरी गलिया
तेरा चौबारा
छोड़ दूँ
दिन गया बहुत गुजर
कट गया यह भी सफर
तुम लाख बार कुछ भी कहो
पर यह याद रखना की
मैं अपनी पहचान कैसे छोड़ दूं!
*******************
मधुलेश पाण्डेय निल्को
 
  

अच्छा लगता है बनाम अच्छा नहीं लगता – मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मधुलेश पाण्डेय निल्को
दोस्तो, आज पहली बार युग्म मे रचना प्रकाशित कर रहा हूँ , दोनों रचना एक ही सिक्के के दोनों पहलू है। आप अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से मुझे अवगत करा कर कृतार्थ करे , आप की इन प्रतिक्रियाओ से मुझे एक अलग प्रकार के आनंद की प्राप्ति होती है, यूं ही आपका स्नेह मिलता रहे, आप लोगो के इस हौसला अफजाई से एक नई रचना आप के सामने प्रस्तुत है 

(1)       अच्छा लगता है…..
वर्षा के मौसम में,
और घर के बालकनी में,
भीगना, अच्छा लगता है
शाम के समय में
और ‘निल्को’ के साथ में
कलम चलाना  अच्छा लगता है
रविवार के दिन मैं
और बाज़ार के भीड़ में
पहचान बनाना अच्छा लगता है
चांदनी रात में
और उनके साथ में
बातें करना अच्छा लगता है
सावन के महीने में,
और गर्मी के पसीने में
कूलर के आगे बैठना ही अच्छा लगता है
(२) अच्छा नहीं लगता…..
बाज़ार की भीड़ में
मैं भी खो जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता
अपने ही शहर में
घूम कर घर नहीं जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता
काम-काज के क्षेत्र में
उनकी तरह चुगली करना
मुझे अच्छा नहीं लगता
रचना प्रकाशित होने के बाद
पाठको की प्रतिक्रिया न मिलना
मुझे अच्छा नहीं लगता
इस भीड़ तंत्र में
गुमनाम सा ‘निल्को’ को जीना
मुझे अच्छा नहीं लगता

             मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’ 

यह जरूरी तो नहीं…… – मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

दोस्तो पिछली रचना (तुम्हें दुनिया में जन्नत नज़र आएगी)  को सम्माननीय डॉ. रूप चंद मयंक जी के द्वारा चर्चामंच पर चर्चा की गई । उम्मीद से ज्यादा लोगो द्वारा द्वारा पढ़ी गई इस के लिए सभी पाठको का दिल से शुक्रिया…. आप की प्रतिक्रियाओं से मुझे हमेशा ही उर्जा और चिंतन की दिशा मिलती है, यूं ही आपका स्नेह मिलता रहे, आप लोगो के इस हौसला अफजाई से एक नई रचना आप के सामने प्रस्तुत है, शब्दो को समेटने की कोशिश की है ज़रा आप ही बताए की कितनी सिमटी है या नहीं ?

 

उनके दर पर ही खड़ा हूँ
पर वह अन्दर बुलाये यह जरूरी तो नहीं
मैं अपनी बात कहने की कोशिश की
पर वह मेरी भी सुने यह जरूरी तो नहीं
माना की शब्दो को समेटने की कोशिश की
पर वह सिमट जाए यह जरूरी तो नहीं
जानता हूँ की लोग हसेंगे इस पर भी
पर मैं किसी को रुलाऊ यह जरूरी तो नहीं
चर्चा मंच पर होती है कई लोगो की चर्चा
मधुलेश की भी हो यह जरूरी तो नहीं
नीद तो बिस्तर पे भी आ सकती है
मगर सिर उनकी गोद मे हो ये जरूरी तो नहीं
निल्को की नज़र मे सभी अच्छे है
पर उनकी नज़र मे मैं अच्छा हूँ ये जरूरी तो नहीं
मेरी कलम मे स्याही चाहे हो जितना
हमेशा चलेगी यह जरूरी तो नहीं
रचने की कोशिश की है मैंने भी
पर दुनिया मुझको ही पढ़ेगी यह जरूरी तो नहीं
माना कि खिले हुए फूलों से महक उठताहै गुलशन सारा
दिन और रात मे एक ही खुशबू हो  यह जरूरी तो नहीं
बीमार को मर्ज़ की दवा देनी ही चाहिए
पर वह दवा पिले यह जरूरी तो नहीं
बड़ी मुद्दत से रची है ये रचना
लेकिन ठीक से परोसी जाए यह जरूरी तो नहीं
नदी के किनारे चुप-चाप बैठा हूँ दोस्तो
प्यास मेरी भी मिटेगी यह जरूरी तो नहीं
विराम देने के लिए अंतिम पंक्ति की तलाश मे हूँ
पर वह आज ही मिलेगी यह जरूरी तो नहीं
ज़िंदगी के सफर मे थक जाते है लोग कई
पर मैं अभी थका सा महसूस करू यह जरूरी तो नहीं
*********************
मधुलेश पाण्डेय निल्को

Madhulesh Pandey ‘Nilco’

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प्रधानमंत्री- श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी


भारत की महान परम्पराओं एवं संस्कारों का पालन करने करने वाले नेता “श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी” को देश के “प्रधानमंत्री” बनने पर बहुत बहुत बधाईया !! – VMW Team

आपको एवं आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.

होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है।यह प्रमुखता से भारत तथा नेपाल में मनाया जाता हैं ! यह त्यौहार कई अन्य देशों जिनमें अल्पसंख्यक हिन्दू लोग रहते हैं वहां भी धूम धाम के साथ मनाया जाता हैं! पहलेदिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुरड्डी, धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं। 

आपको एवं आपके परिवार को होली की बहुत मुबारकबाद एवं शुभकामनाएँ.






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लोकतन्त्र की दिवाली – एम के पाण्डेय निल्को

हम करेगे जब मतदान

तब बचेगी लोकतन्त्र की शान

नहीं गलेगी नेतावों की दाल

जनता समझ चुकी है इन की चाल

जो होगा सबसे लायक

वही बनेगा अपना नायक

करो मतदान , लाओ खुशहाली

यही तो है लोकतन्त्र की दिवाली

सब तक पहुचे निल्को का पैगाम

वोटिंग करना है पहला काम

अगर जीना है मान सम्मान से

तो मत जी चुराओ मतदान से

जो नहीं करेगा मतदान

समझो नहीं उसे देश का ध्यान

लोग देते है बहुत से ज्ञान

पर अपनी समझ से करना जरूर मतदान

**********

एम के पाण्डेय निल्को

मतदान करते समय एतना जरुर याद रहे।
हर मतदाता भारत का भाग्य विधाता है।
आप मतदान करें।

और भारत के भाग्य विधाता बनें।
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देश को नया प्रधानमंत्री चाहिए

आज इस दौर मे
आजादी के मायने बादल गए
नेता-नागल और लोग बादल गए
नीति बदली रीति बदली
और बदला नजरिया
गाँव तो गाँव और
नगर भी हो गया सहरिया
जब इस भीड़ मे मैं गया तो
 लोगो के तरीके भी बादल गए
कुछ एसा बदला की लोग हैरान है
बात बात पर परेशान है
और प्रकृति ने खूब भी साथ दिया
बदलाव का नया रूप दिया
जब सब कुछ बदल ही रहा है
तो यह सरकार भी बदलनी चाहिए
बहुत पी चुके यह धीमा ज़हर
अब आजादी की सांस चाहिए
गए महात्मा पर रीति बना गए
गांधी ही कांग्रे की नीति बना गए
अब सोचता हूँ कुछ बदलाव चाहिए
केन्द्र मे दूसरी सरकार चाहिए
आजादी की सांस चाहिए
बेघर को मकान  चाहिए
भूखे को रोटी चाहिए
देश को नया प्रधानमंत्री चाहिए
मुझको आपका कमेंट चाहिए
ढेर सारा प्यार चाहिए
और लाइक तो चाहिए ही चाहिए……
*******************

                 मधुलेश पाण्डेय  “निल्को”


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प्रकृति का सफाई अभियान


गाँव शहर और सड़क तक भर गया पानी
और याद आ गई सबको अपनी नानी
तो निल्को ने कहा –
परेशान मत हो मेरे बाबू
क्योकि यंहा प्रकृति का सफाई अभियान है चालू
नदियो का पानी आपे से बाहर हो रहा
लोगो का जीवन इससे दुसवार हो रहा
जिसे लोग बाढ़ कह कर परेशान है
वह तो प्रकृति का सफाई अभियान है
प्रकृति अपनी सफाई अलग तरीके से करती है
यही बात तो लोगो को अखरती है
प्रकृति के इस बर्ताव से
मानवता घायल हो जाती है
और इस बरसात के मौसम मे
नदिया पागल हो जाती है
प्रकृति जब नि:शुल्क सब देती है
तो ब्याज सहित वसूलती है
प्रकृति कभी भी जेल बना देती है
और आगे विज्ञान भी फेल हो जाती है
जब – जब प्रकृति से छेड़-छाड़ हुई
नुकसान मनुष्य का होता है
यह अटल सत्य है
जिस पर विश्वास सभी का होता है
गर प्रकृति को किया परेशान
तो खुद परेशान हो जाओगे
नहीं बचेगा नामो-निशान
और आदिवासी कहलाओगे
कर रहा मधुलेश निवेदन
मत काटो हरियाली को
गर फिरा इसका दिमाग तो
नहीं दिखेगा यह बागवानी तो
###########################
 
मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

इस बरसात के मौसम मे …..


इस बरसात के मौसम मे …..
आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।

***************
मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

भारतीय राष्ट्र जीता जागता ‘राष्ट्र पुरुष’ है।

मधुलेश पाण्डेय “निल्को”
दोस्तो, हम पाते हैं कि भारतीय राष्ट्र जीता जागता राष्ट्र पुरुषहै।हमें भारत देश के साथ अपने आप पर भी गर्व करना चाहिए, क्योंकि हमने भारत में जन्म लिया है । भारत की संस्कृति में विभिन्न युगों में समयकालपरिस्थिति तथा उन युगों के रीतिरिवाज, परंपरा, लोगों के विचारधाराओं एवं मान्यताओंको ध्यान में रखते हुए अनेक बार बदलाव हुआ है। यही कारण है कि आज भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह की संस्कृतियाँ, भाषायें, परंपराएँ, रीति रिवाज और मान्यताएँ बरकरार हैं ।राष्ट्रीय एकता प्रत्येक देश के लिए महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है सांस्कृतिक एकता और सांस्कृतिक एकता का सबसे प्रबल माध्यम साहित्य की परिधि के अन्तर्गत महाकाव्यों का विशेष महत्व है, लेकिन मुझे लगता है की आजकल भारतदेश वाकई कई समाजिक उथल पुथल से गुज़र रही है। बहुत प्रयास के बाद हम अंग्रेजों को भारत से निकलने में सफल हो गए थे। लेकिन अभी भी ये देश भाषाएँ , प्रदेशों , प्रान्तों ,उत्तर, दक्षिण ,मज़हब,धर्म , जाती आदि के तौर पर बंट कर ही रह गया है। इस देश में गरीबी , बेरोज़गारी आदि बहुत जटिल समस्याएँ है। मगर पड़े लिखे लोग भी इस मद्दे पर ध्यान देने से ज्यादा अपने जाती के लोगों को ही तरक्की करते हुए देखने में मज़ा लेते हैं। बहुत अफ़सोस की बात है। केवल अफ़सोस ही नहीं मुझे तो ऐसे लोगों से घ्रणा है। जो काले गोरे का भेद करते है
इस विशिष्टता के आधार पर एक कवि कहता है
बोली कोयल मैं हूँ काली
मुझसे रहे देश की लाली।
काले कृष्ण, राम भी काले
भारतवासी भी हैं काले।
काले होकर मीठा बोलो
वाणी में मिश्री-सी घोलो।
सच तो यह है कि जब-जब देश पर विपत्ति पड़ी, भारत के लोगों ने धर्म-जाति के भेदभाव को भुलाकर अपनी हिन्दवी-एकता प्रदर्शित की है। जब चीनी आक्रमण हुआ तो घर-घर से महिला-पुरुषों ने अपने जेवरात् निकाल कर सरकार को सौंप दिये।
      
       अभी हाल में ही हमने अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का स्वरूप देखा है। इसमें भी धर्म-जाति के भेदभाव को भुलाकर कर हिन्दवी-एकता का साकार स्वरूप प्रकट हो चुका है। इसप्रकार भारतीय जनमानस का अन्तर्मन अपनी परम्परागत संस्कृति एवं आध्यात्मिक चेतना के अनुरूप बारम्बार जाति-धर्म के भेदभाव को भुलाकर हिन्दवी-एकता को स्थापित करना चाहता है, लेकिन हमारी राजनीति इस जनचेतना को विश्रृंखलित करने का कुचक्र रच देती है।
भारतीय राजनीति में व्याप्त छलनात्मक चतुराई, स्वार्थ और पाखंड से सिंचित विषैली कूटनीति के बावजूद कुछ ऐसा भी है जो देश की सतत् रक्षा करता आ रहा है। इसमें तो पहली है हमारी आध्यात्मिक संस्कृति जो कभी राजनीतिज्ञों की पोषिता नहीं रही। दूसरी है राष्ट्रभाषा हिन्दी जिसका क्रेज निरन्तर बढ़ता जा रहा है। वैश्वीकरण के इस युग में शेष विश्व की तरह भारतीय समाज पर भी अंग्रेजी तथा यूरोपीय प्रभाव पड़ रहा है। बाहरी लोगों की खूबियों को अपनाने की भारतीय परंपरा का नया दौर कई भारतीयों की दृष्टि में अनुचित है। एक खुले समाज के जीवन का यत्न कर रहे लोगों को मध्यमवर्गीय तथा वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। कुछ लोग इसे भारतीय पारंपरिक मूल्यों का हनन मानते हैं। विज्ञान तथा साहित्य में अधिक प्रगति ना कर पाने की वजह से , भारतीय भारत की संस्कृति भारत की धरती की उपज है। उसकी चेतना की देन है। साधना की पूंजी है। उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है। भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है । उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है।
कोई राष्ट्र जब अपनी सांस्कृतिक जड़ों से उन्मूलित होने लगता है, तो भले ही ऊपर से बहुत सशक्त और स्वस्थ दिखाई दे….भीतर से मुरझाने लगता है। स्वतन्त्रता के बाद भारत के सामने यह सबसे दुर्गम चुनौती थी…..पाँच हज़ार वर्ष पुरानी परम्परा से क्या ऐसे राष्ट्रका जन्म हो सकता है, जो अपने में एकभारतीय सभ्यता के इस आध्यात्मिक सिद्धान्त को अनदेखा करने का ही यह दुष्परिणाम था कि पश्चिमी इतिहासकारों…और उनके भारतीय सबाल्टर्नअनुयायियों की आँखों में भारत की अपनी कोई सांस्कृतिक इयत्ता नहीं, वह तो सिर्फ़ कबीली जातियों सम्प्रदायों का महज एक पुँज मात्र है। वे इस बात को भूल जाते हैं कि यदि ऐसा होता, तो भारत की सत्ता और उसके अन्तर्गत रहनेवाले सांस्कृतिक समूहों की अस्मिता कब की नष्ट हो गई होतीहुआ भी उन अनेकस्रोतों से अपनी संजीवनी शक्ति खींच सके, जिसने भारतीय सभ्यता का रूप-गठन किया था ।
भारत की सभ्यता व संस्कृति का सानी नहीं कोई ,
विश्व के इतिहास में ऐसा स्वाभिमानी नहीं कोई !
वतन की सरज़मीं पर हुए शहीदों का बलिदान न व्यर्थ हो ,
उनकी कुर्बानी को याद कर युवाओं में देशभक्ति का संचार हो !
देश के नवयुवक जाग्रत हो देश का ऊँचा नाम कराएं ,
विश्व के मंच पर मिसाल बन भारत को महाशक्ति बनाएं !
मेरा सपना है कि भारत एक दिन विकसित देशों कि श्रेणी में आए ,
एक बार फिर से सोने कि चिडियां कहलाए !!!
     उस महान देश और उसके महान लोगों के बारे में देख, समझ और जानकर, किसी भी ईमानदार और होशमंद इंसान का सिर, उनके प्रति श्रध्दा और सम्मान से अपने आप झुक जाता है। चाहे वह इंसान किसी भी धर्म या देश का क्यों न हो। वह महान भारत और महान भारतीयों को नमस्कार करने से नहीं चूकता। भारत सचमुच महान है। उसके लोग सचमुच महान हैं। वे हर क्षेत्र में महान हैं। सिर से पाँव तक महान हैं मेरे ख़याल से एक राम, एक कृष्ण, एक गाँधी. सिर्फ इन नामों का सहारा लेकर हम आम तौर पर महानता का दावा नहीं कालजयी कवियों और साहित्यकारों के रूप में सूर्य और चंद्रमा पैदा करने की ताकत केवल हिन्दुस्तान की माटी में है, जिसने सूरदास जैसे साहित्य के सूर्य और तुलसीदास जैसे चंद्रमा को जन्म दिया। इस देश के साहित्य में वह ताकत है कि उसके बलबूते हमारी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता हजारों वर्षों से कायम है और आगे भी हजारों वर्षों तक कायम रहेगी।! 
जय हिंद, जय हिंदी, यह भारतीय एकता
* मधुलेश पाण्डेय “निल्को” *
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मेहनत मे है सफलता की मिठास

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Congres’s Shivir in Jaipur


fpUru f’kfoj budh vkSj————–
lquk gS vkt ‘kgj esa
dkaxzls dk fpUru f’kfoj gS!
fpUru budh vkSj fpUrka, gekjh c<+h gS!
bu usrkvksa ds pDdj esa]
xkM+h gekjh tke esa [kM+h gS!
gksVy esa os ysVs gS!
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gkykr ,sls gS fd—-
Lokxr esa izÑfr us Hkh
vksys ,oa ckfj’k ls vfHkuUnu dh gS!
xj turk ds chp esa vk,
rks ‘kk;n blls vPNk gks——–
yksxksa us Lokxr es iksLVj ij dkfyd iksrh gS]
bu lc ckrksa ls fpUru de
fpUrk T;knk c<+h gS!
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pquko dh fpUrk T;knk gS!
vHkh&vHkh xqtjkr ls gkj ds ykSVs gS!
vc jktLFkku dh ckjh gS!
dbZ izns’kksa esa fudy jgh budh gok lkjh gS!
fpUru esa lHkh feydj <+wa<saxs budh nok
vkSj vkxs D;k gksxk] fdldks D;k irk–
dgus dh ^fuYdks* dh ;gh gS viuh vnk!
 ,e-ds-ik.Ms; ^fuYdks*
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CWG, 2G, कोयला और न जाने कितने जी…..जा……जी

 

एक बार की बात है,
वोट देते ही पड़ गई लात है|
थोड़े देर सकपकाने के बाद,
बोले निल्को भाई
वोट देने का क्या यही परिणाम है ?
मैंने कहा भाई,
तुम तो बहुत कमात हो
लेकिन मनमोहन सब खाए जात है
फिर वोट कांग्रेस को देकर
क्या संदेश देत जात हो ।
मैंने कहा सही है भाई,
लेकिन यह मौन का
क्या राज है ?
अरे जनाब,
CWG,2G, कोयला
और न जाने
कितने जी…..जा……जी
तो इनके पास है।
खाने के वक्त बोलना नहीं चाहिए,
और पचाने के लिए विपक्ष को
जगाना नहीं चाहिए ।
इतने मे ही भाई नीलेश आए,
और बोले की
ये नोट मेरे पास
आया था,
देखने मे सफ़ेद पर अंदर से
काला था,
आप की बात सुनकर
समझ आया यह तो कांग्रेस का
छापा था,
गलती से यह मेरे पास
आया था ।

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