Tag Archives: ‘देहाती’

Congres’s Shivir in Jaipur


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अपने हि देश मे हक के लिऐ संघर्ष करती एक भाषा कि दास्तान

जिसे बोलते है 22 करोङ हिन्दूस्तानी,जिसे चाहने वालो कि संख्या है अधिक,मारीशस जैसे राष्ट्र कि एक प्रमुख भाषा है यह,हाँलैँड मे भी बोली जाती है यह,अब त आप लोग समझ गईल होईब जा काहेँ से कि ऊ भाषा ह भोजपुरी,भोजपुरी के नाम पर कई उठापटक बैठके भी हुईँ हैँ पर केहु भी भोजपुरी के रक्षा के संकल्प लेने के बाद क्यो नही करता है जन आंदोलन,भारतिय सियासत मे प्रमुख भुमीका निभावे वाली इ भाषा अपने देश मे हक पावे के खातिर संघर्ष कर रही है । महाराष्ट्र,गुजरात,असम जैसे प्रदेशो मे उन भारतियोँ को खास कर निशाना बनाया जाता है जो उत्तर भारत के होँ,वो भी बिहार और उत्तर प्रदेश के,क्योँकी ये लोग भोजपुरी से प्रेम करते हैँ । भोजपुरी को चाहते है । आज तक ये भाषा संविधान कि आठवीँ अनसुची मे सामिल नही हो पाई है । इसके जिम्मेदार हम भोजपुरी भाषी ही हैँ हमारे नेता जो वोट मागने आते हैँ उन्होने भी इस दिशा मे कोई उल्लेखनिय कार्य नही किया है । हाँ इंटरनेट पर कुछ वेबसाईट और ब्लागोँ ने इसे आगे बढाने का कार्य जरूर किया है । अभी भी समय है भाईयोँ जाग जाओ अपने मातृ भाषा और राष्ट्र भाषा को आगे बढाओँ,पर किसी भी अन्य भाषा का निरादर मत करो ।
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CWG, 2G, कोयला और न जाने कितने जी…..जा……जी

 

एक बार की बात है,
वोट देते ही पड़ गई लात है|
थोड़े देर सकपकाने के बाद,
बोले निल्को भाई
वोट देने का क्या यही परिणाम है ?
मैंने कहा भाई,
तुम तो बहुत कमात हो
लेकिन मनमोहन सब खाए जात है
फिर वोट कांग्रेस को देकर
क्या संदेश देत जात हो ।
मैंने कहा सही है भाई,
लेकिन यह मौन का
क्या राज है ?
अरे जनाब,
CWG,2G, कोयला
और न जाने
कितने जी…..जा……जी
तो इनके पास है।
खाने के वक्त बोलना नहीं चाहिए,
और पचाने के लिए विपक्ष को
जगाना नहीं चाहिए ।
इतने मे ही भाई नीलेश आए,
और बोले की
ये नोट मेरे पास
आया था,
देखने मे सफ़ेद पर अंदर से
काला था,
आप की बात सुनकर
समझ आया यह तो कांग्रेस का
छापा था,
गलती से यह मेरे पास
आया था ।

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ईमानदारी को बनाएं हथियार

जानकारी और ज्ञान में वही फर्क है, जो आंख और प्रकाश में है। प्रकाश यानी दृष्टि। दृष्टि न हो तो आंख किस काम की और ज्ञान न हो तो जानकारियों का वजन भी मनुष्य की चाल को बिगाड़ देगा। इन बातों का असर हमारे दो अभियानों पर भी पड़ा। भ्रष्टाचार और अपराध, देश के ये दो कलंक बिंदिया बनकर चिपक गए। जब दुर्गुण ही शृंगार बन जाए, तब चेहरे को विकृत होना ही है। भ्रष्टाचार मिटेगा ईमानदारी से। हमारे पास ईमानदारी जानकारी की शक्ल में है, ज्ञान के रूप में नहीं। इसलिए ईमानदारी को समझदारी से जोडऩा होगा। एक गहरी समझ के साथ इसे शस्त्र बनाकर बेईमानों पर प्रहार करना होगा। लोगों ने ईमानदारी को ढाल बना लिया, अब हथियार बनाना होगा। इसी तरह अपराध के मुकाबले के लिए जिम्मेदारी को बहादुरी से जोडऩा होगा। कर्तव्यनिष्ठ लोग साहस दिखाने के मामले में रिजर्व हो जाते हैं। यह बिल्कुल ऐसा है कि हमारे पास जिम्मेदारी की आंख है, पर बहादुरी की दृष्टि नहीं। अंधे होकर आखिर कितनी लंबी यात्राएं कर पाएंगे। इसीलिए बेईमानों की जानकारी भी ईमानदारों के ज्ञान पर भारी पड़ जाती है और अपराधियों की दृष्टि जिम्मेदारों की आंख पर हावी हो जाती है। आध्यात्मिकता ही इस गड़बड़ाए तालमेल को ठीक कर पाएगी।

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यूपी ने देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री……..

 

यूपी में जातियों के ब्लूप्रिंट पर नजर डालें तो प्रदेश में 49 जिले ऐसे हैं, जहां सबसे ज्यादा संख्या दलित मतदाताओं की है. कुछ जिले छोड़ दें तो बाकी जगहों पर दलित दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक है. वहीं 20 जिले ऐसे हैं, जहां मुस्लिम वोटर सबसे ज्यादा हैं और 20 जिलों में वे दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक है

अगड़ी जाति

16 फीसदी वोट बैंक
ब्राहमण – 8 फीसदी
ठाकुर – 5 फीसदी
बनिया – 3 फीसदी

पिछड़ी जाति

35 फीसदी वोट बैंक
यादव – 13 फीसदी
कुर्मी – 12 फीसदी
अन्य – 10 फीसदी

इसके अलावा

दलित – 25 फीसदी
मुस्लिम -18 फीसदी
जाट – 5 फीसदी
और अन्य – 1 फीसदी

कहते हैं यूपी देश की राजनीती की दशा और दिशा तय करता है लेकिन 18 मंडल, 75 जनपद, 312 तहसील, 80 लोकसभा, 30 राज्यसभा के साथ 403 सदस्यीय विधानसभा वाला यह राज्य बीमारू राज्यों की श्रेणी में खड़ा है | विकास कहीं पीछे छूट गया है और जाने-अनजाने में यह सूबा धर्म व जाति आधारित राजनीति की प्रयोगशाला बन गया है। जिस यूपी ने देश को सर्वाधिक आठ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में दिए हों, वहां धर्म व जाति आधारित राजनीति का बोलबाला है |  और यही यूपी और इस देश का दुर्भाग्य है |

एह पर करियो मतदान

चुनाव आयोग बहुत कडाई कईले बा . प्रत्यासी भी बहुत चालाकी देखावत हवे . गाव गाव लक्जरी गाडी  घूमत हई. कवनो साहब शुब्बा राही में  चेकिंग – ओकिंग करत में मिळत  हवे त इहे जवाब देत हवे – हम बरदेखुआ हईं . फलाने की घरे जात हई . अब फलाने की दुआरी तिल्कहरून  के भीड़ देख के अटिदार- पटीदार, पास -पड़ोस के लोग बटुरा जाता . फलाने भी तिल्कहरून के खूब आव -भगत करत हवे . मर -मिठाई , नर -नमकीन , अकौड़ी- पकौड़ी चापि के ऊपर से चाह-चुह पी- पा के जब राहि धरे जात हवे त घर की मुखिया की हाथ में हज़ार – दू हज़ार थमा के कान में धीरे से कहत हवे . अरे भईया ! हम साचो के तिलकहरू न हई, हम फलाने के समर्थक हई आ वोट मांगे घूमत हई . यह चिन्ह पर बटन दबा दिहा . दरअसल बात इ बा की यह  बार जैसन  चनाव आयोग के  खौफ पहले कभी न देखे के मिलल रहे । अधिकारी हों, अथवा कर्मचारी या प्रत्याशी सजो  लोग  चुनाव आयोग की डंडे के खौफ से सहम गईल बा । चुनाव में  जनता के बीच जा के   अपनी प्रत्याशिता क प्रचार कईल  उनकी मजबूरी बा , सो तरह -तरह के हथ कंडा अपनावल जता ,चुनाव आयोग क फरमान बा  कि तीन गाडी से अधिका वाहन न चली , सो लोग तिलकहरू बनी के घूमत हवे , अपन  प्रचार करत हवे । इ सब आयोग के छकावे के जोगार ह।  हमरी देवरिया जिला की बरहज में त अयिसन तिल्कहरून के बाढ़ आ गईल बा , बिना बिआहे तय कईले खूब गोड़ लगायी , राह धराई मिळत बा . एगो प्रत्यासी त साठ गो  बेलोरो आ इस्कर्पियो उतार देले हवे , कही बरछा , त कही बर देखाई . कही बर छेकाई . सब फर्जी चलता ये भाई . अब यह हालत पर एगो कविता सुन ली –

गाव गाव तिलकहरू घुमे  , खूब करे जलपान / 
जाये की बेरी कान में कहले, एह पर करियो मतदान/
हाथ जोड़ के नगद थम्हावे, बार बार प्रणाम /
अबकी रउरा न बिसरायिब,इहे  ह मोर निशान/
आफत कईले बा आयोगवा, बहुत बा घामासान / 
येही बहाने प्रचार चलत बा, हमरो साझ -बिहान / 
बरहज में मतदाता मगन बा, खूब मिळत बा दाम /
खीच के सेवा तिल्कहरून के, अपनों मान-सम्मान / 
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राहुल कोई भगवान राम नहीं है

 राहुल कोई भगवान्  राम नहीं है . लेकिन गोरखपुर में आये तो आमी के प्र्दुसन से त्रस्त लोगो ने उसी तरह गुहार लगाई  <उतराई नाहीं चाही, पनिए शुद्ध करा देईं>  मीडिया ने केवटराम सवाद का सहारा लिया और दाग दी भोजपुरी की हेडिंग से एक खबर . और बना दिया राहुल को हीरो .

एक अख़बार ने लिखा अयोध्या से जितनी दूर दक्षिण श्रृंगबेरपुर है लगभग उतनी ही दूरी पर पूरब दिशा मे बसा है गोरखपुर का कटका गांव। श्रृंगबेरपुर में भगवान श्रीराम ने केवट को सुई नदी पार कराने एवज में उतराई देने की कोशिश की थी। आज राहुल ने कटका में आमी नदी पार कराने के एवज में केवट को उतराई देनी चाही। राहुल के कटका दौरे में गांव के हर बड़े बुजुर्ग की जबान पर राम केवट संवाद बरबस चर्चा में गया था।दो नामों में अक्षर ने इस चर्चा को और भी आगे बढ़ा दिया। तब तो केवट ने कहा था
कहेउ कृपालु लेहु उतराई,केवट चरन गहे अकुलाई.

नाथ आजु मैं काह पावा,तिटे दोष, दुख, दारिद दावा।

आज कटका गांव के दो मल्लाहों ने सपने में नहीं सोचा था कि उनकी नाव पर राहुल गांधी बैठेंगे। बाढ़ के सीजन में नदी में तीन माह तक नाव चलाने वाले जीतू निषाद एवं रमेश निषाद ने जब राहुल गांधी को नदी के पार उतारा तो राहुल ने उतराई देनी चाही बस क्या था तपाक से जीतू ने कहा, साहब पइसा नाहीं चाही, आमी के पनिए शुद्ध करा देईं।
बतौर जीतू एवं रमेश अजीब संयोग था। जब राहुल गांधी का काफिला नदी के किनारे छताई पुल के पास पहुंचा तो वे सुर्ती मल रहे थे। जब वे उनके पास आये तो वे पहचान नहीं पाये कि यह लोग कौन हैं। नाव में पूछकर वे लोग बैठ गये नदी पार करने के दौरान जीतू से उसे परिवार के बारे में रीता बहुगुणा जोशी ने पूछा। जीतू ने उन्हें बताया कि उसके चार बेटे एवं दो बेटी हैं। बीस वर्ष से बाढ़ के वक्त नाव चलाने वाले जीतू के मन में एक व्यक्तिगत मुराद (बेटो को नौकरी) पूरी कर लेने की इच्छा हुई लेकिन उसने सामाजिक हित को महत्व दिया। वह कहता है कि मन में एक बार आया कि कि कह दे लेकिन आत्मा ने गवाही नहीं दी। जीतू कहता है कि नदी का पानी जब शुद्ध हो जाएगा तो कई लोगों के बेटे का जीवन संकट से बचेगा। रमेश निषाद कहता है कि उसकी जाति के पूर्वजों ने भगवान राम को नदी पार कराया था। वह अपने जीवन में इतने बड़ी हस्ती को पार कराकर काफी खुश है। सपने में भी उसने नहीं सोचा था कि ऐसा अवसर कभी उसके जीवन में आएगा। 

 दुसरे अख़बार ने लिखाहैण्ड पम्प ले के  पानी जहर उगालत बा .पानी पि के लरिका बीमार हो जाट हवे .

 एक  ने लिखा राहुल ने खरीदी  700 में तीन किलो प् कौ डी….

पढ़िए और इस राजनितिक ड्रामा पर अपनी प्रतिक्रिया भी दीजिये



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