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बहुत कठिन है पत्रकारिता की डगर, फिर भी निभाना होगा अपना दायित्व

राष्ट्रीय प्रेस परिषद जनपद महराजगंज की इकाई का प्रथम वार्षिक अधिवेशन मंगलवार को स्थानीय अंबेडकर पार्क में संपंन हुआ। इस दौरान वरिष्ठ कांग्रेस नेता और गोरखपुर के पूर्व सांसद हरिकेश बहादुर ने कहा कि पत्रकारिता की डगर कठिन है। उसमें अपने लिए कम किंतु देश और समाज के लिए अधिक करने की जरूरत होती है। मीडिया इस काम को बखूबी कर रही है। यही कारण है कि उसे तरह तरह के आलोचनाओं और कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इन सब पर पत्रकारों को विजय पानी होगी। चाहे कितनी भी परेशानियों का सामना करना पडे़ अपने दायित्व को निभाना होगा। खुद को भले ही जलाना पडे़, लेकिन आम लोगों में अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सजगता और जागरूकता की ज्योति जलानी पडे़गी।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर हुआ। इसके बाद तत्काल रक्तदान कार्यक्रम शुरू हुआ। मुख्य अतिथि चिकित्सक डा. सीपी सिंह ने रक्तदान किया। ब्लड निकालने का कार्य गोरखपुर मेडिकल कालेज से आई डा. मंजीता मिश्रा की नेतृत्व वाली टीम ने किया। इस दौरान तीन दर्जन से अधिक लोगों ने रक्तदान किया।
अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार नर्वदेश्वर पांडेय देहाती ने की। कार्यक्रम के दौरान संरक्षक केदार शरण मिश्र द्वारा मुख्य अतिथि के साथ आए इंका नेता सूर्यनाथ पांडेय तथा अन्य को अंग वस्त्र भेंट कर स्मृति चिन्ह प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन बसंतपुर इंटर कालेज के समाज शास्त्र के प्रवक्ता डा. कृष्ण कुमार ने किया। अंत में अध्यक्ष अमित कुमार तिवारी ने सभी के प्रति आभार ज्ञापित किया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

देवरिया जिले में नया मीडिया मंच के बैनर तले नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी, सतीश मिश्रा, एन डी देहाती , डॉ सौरभ मालवीय, राजीव कुमार यादव और जय प्रकाश पाठक को मोती बी.ए नया मीडिया सम्मान से सम्मानित किया गया

देवरिया संगोष्ठी की कथा-गाथा : प्रारंभ से प्रारब्ध तक : कुछ सीखा, कुछ सिखा गए…

(पूरे कार्यक्रम की शुरुआत से अंत तक शिवानन्द द्विवेदी सहर की नजर से ये रिपोर्ट)

17 नवंबर को दिल्ली के कॉफी हाउस दिल्ली में कुछ लोग यूँ ही बैठ लिए और तय कर लिए कि आगामी २१ दिसंबर को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में नया मीडिया मंच के बैनर तले नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा. हालाकि इससे पहले अनौपचारिक तौर पर एक बार इसी मुद्दे पर प्रवीन शुक्ल, संजीव सिन्हा, सौरभ मालवीय और मै पहले भी बैठ चुके थे. लेकिन इस बैठक में सर्व सम्मति से कार्यक्रम के संयोजक के तौर पर प्रवीण शुक्ल पृथक एवं सह-संयोजक के तौर पर शिवानन्द द्विवेदी सहर (यानी मेरा) नाम तय किया गया.

बैठक में कार्यक्रम के संरक्षक के तौर पर डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी का नाम प्रस्तावित किया गया जिसे सभी लोगों ने मान लिया. बैठक में सबकुछ तय होने के बाद अब नया मीडिया एवं सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार-प्रसार की शुरुआत मैंने अपने फेसबुक वाल से शुरू की. तमाम लोग जो शुरू में कार्यक्रम की योजना से उत्साहित होकर कॉफी हाउस की बैठक में आयोजन के साथ जुड़े, अंत तक जुड़े रहे. तमाम ऐसे भी लोग थे जो जुड़े तो जोश के साथ लेकिन मझधार में अपनी मजबूरियों की भेंट चढ़ते हुए अलग  हो गए. सवाल अतिथितियों का था, सों दिल्ली से मै आगे आया और चर्चा बढ़ाया.

अतिथि वक्ता के तौर पर श्री अमिताभ ठाकुर (आईजी), प्रो. रामदेव शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार श्री शंभूनाथ शुक्ल, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री पंकज झा, श्री संजीव सिन्हा, श्री यशवंत सिंह से आने का अनुरोध खुद मैंने किया. वहीँ भोपाल से डॉ श्रीकांत सिंह का प्रोग्राम डॉ सौरभ मालवीय ने तय कराया. हालाकि इनसे भी मेरी बात हुई थी. देवरिया की माटी से जुड़े पाँच गणमान्यो को सम्मानित कराये जाने की योजना कॉफी हाउस बैठक में तय हुई थी सों तमाम लोगों से पूछ कर, जांच कर श्री संजय मिश्र (दैनिक जागरण), डॉ जय प्रकाश पाठक, श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती (सहारा), डॉ सौरभ मालवीय, श्री राजीव यादव (हिन्दुस्तान) के नामों का चयन किया गया था. चयनित नामो की घोषणा भी की गयी बाद में.

इस कार्यक्रम को लेकर मेरा सुझाव था कि यह कार्यक्रम बिना प्रायोजक के किया जाय और क्षेत्रीय लोगों से चंदा इकठ्ठा करके किया जाय. कई लोग इस फार्मूले को नकार भी दिये थे लेकिन मैं कायम रहा. धन जुटाना वो भी दिल्ली में बैठकर देवरिया के लोगों से, किसी लोहे चने चबाने से कम न तब था और न आज है, ये बात मैं हाल ही में मिले निजी अनुभव के आधार पर लिख रहा हूँ. खैर, मैं इसी फार्मूले पर चला. मैंने धन जुटाने के लिए तमाम लोगों से संपर्क किया और तमाम लोगों ने स्वीकृति भी. ये अलग बात है कि कार्यक्रम के दिन ११ बजे तक मेरे हाथ में किसी भी स्थानीय द्वारा जुटाया गया एक रुपया भी नहीं आया था.

इस दौरान दिल्ली में रहकर मैंने निजी प्रयास किया था जिसमें सिंगापुर से चुन्नू सिंगापुरी जी द्वारा तीन हजार और आशुतोष कुमार द्वारा एक हजार, मतलब चार हजार का सहयोग मिल सका था. लेकिन बताना चाहूँगा कि मेरे स्थिति को कुछ अतिथि भांप गए थे जिसमे श्री पंकज झा और श्री पंकज चतुर्वेदी, भाई आशुतोष सिंह सहित डॉ धीरेन्द्र मिश्र एवं अलका सिंह जी का नाम ले रहा हूँ. श्री पंकज झा जी ने अपने खर्चे से आने का वादा कर मुझे राहत दिया तो वहीँ पंकज चतुर्वेदी जी ने अपना टिकट खुद कराया (मेरे द्वारा कराया गया टिकट कैंसल कराकर). तमाम उतार-चढाव के साथ कार्यक्रम की तारीख नजदीक आई और १८ की शाम वैशाली से मैं निकल गया देवरिया के लिए. बताता चलूँ कि देवरिया में सतह पर जो लोग इस आयोजन के लिए लगे हुए थे उनमे श्री रामकुमार सिंह (दैनिक जागरण), विद्यानंद पाण्डेय, श्री दिलीप मल्ल, रामदास मिश्र, संतोष उपाध्याय, अभिनव पाठक,कपीन्द्र मिश्र, राहुल तिवारी, आदर्श तिवारी, श्री नवनीत मालवीय सहित तमाम अन्य लोगों के नाम प्रमुख हैं. इनके सहयोग से कार्यक्रम अपनी सफलता तक पहुंचा.

खैर, वो तारीख भी आई जब मैं १९ तारीख को देवरिया पहुंचा. स्टेशन उतरते ही वहाँ रामकुमार सिंह और विद्द्यानंद पाण्डेय अपनी बोलेरो और आदर्श अपनी बाइक लेकर आये थे. रामकुमार सिंह और विद्यानंद के साथ मिलकर मैंने कार्यक्रम से सम्बन्धी होटल-अतिथि आवास, फुल-माला, माइक-साउंड, फोटो-फ्रेमिंग, आदि का ऑर्डर किया. स्मृति-चिन्ह और बैनर तो मैं खुद दिल्ली से ले गया था. अंतिम लड़ाई २० तारीख की सुबह की थी. बीस की सुबह मै अकेला ही घर से निकला लेकिन तभी आदर्श भी साथ आ लिए. हम लोग निमंत्रण-पत्र वितरण से लेकर, दो सौ लोगों के नाश्ते पानी तक के इन्तजामो में लग गए (बता दूँ कि अभी तक कुछ भी हुआ नहीं था). शाम तक बिना रुके काम करने के बाद ये भी हो गया.

अब मेरा ध्यान दिल्ली की तरफ गया. शाम ४:५० पर दिल्ली स्टेशन से पूर्बिया एक्सप्रेस में शंभूनाथ जी, पंकज चतुर्वेदी जी, पृथक जी, धीरेन्द्र जी, उमेश जी, यशवंत जी, जनार्दन जी, अलका जी, संजीव जी, उमेश चतुर्वेदी जी का टिकट था. कुल आठ अतिथियों का आगमन एक ही ट्रेन से दिल्ली से होना था. हालाकि पंकज झा जी और डॉ श्रीकांत सिंह जी एकदिन पूर्व ही देवरिया एवं गोरखपुर पहुच चुके थे. अपने दो महत्वपूर्ण अतिथियों की उपस्थिति मेरे आत्मबल को बढ़ा रही थी. शाम चार बजे के बाद उमेश चतुर्वेदी जी का फोन आता है कि यह ट्रेन कई घंटे लेट हो सकती है और फिलहाल दो घंटे लेट है.

यह खबर मेरे माथे के बल पहाड़ का भार लेकर पडी. पूरे कार्यक्रम के लगभग सभी अतिथि उसी ट्रेन से आने वाले थे. पृथक जी और शंभूनाथ जी स्टेशन पहुंचे फिर पंकज चतुर्वेदी जी और अलका सिंह जी पहुंचे. धीरेन्द्र मिश्र का फोन आया कि वो भी स्टेशन पहुंच चुके हैं. यहाँ दिल्ली से सबके फोन आने शुरू हुए और मेरी धड़कनें बढ़नी शुरू हुई. ऐसा होना लाजिमी था क्योंकि कल कार्यक्रम और आज अतिथियों का आना ही संशय में. इसके अलावा कई सूत्रों से यह खबर भी आ रही थी कि देवरिया के तमाम पत्रकार संगठनों द्वारा इस कार्यक्रम का बहिष्कार भी किया गया है. इस बहिष्कार की वजह मेरी समझ से बाहर थी लेकिन लोगों की माने तो शायद यही वजह थी कि उनके जमे-जमाये मठ में यह शिवानन्द सहर और नया मीडिया मंच जैसी चीजें उनकी इजाजत के बिना कैसे आ गयी हैं.

मैं कार्यक्रम में आने का निमंत्रण देने के लिए जिलाधिकारी देवरिया श्री मनिप्रसाद मिश्र से रात आठ बजे मिला. हालाकि वो कार्यक्रम में जाने क्यों स्वीकृति के बावजूद नहीं आये. जिलाधिकारी महोदय के न आने की बात एक दिन पहले ही मुझे तब स्थानीय लोग बता दिये थे जब मैं उनसे (जिलाधिकारी) निमंत्रण के लिए मिलने जा रहा था. लोगों ने मुझसे कहा कि जिलाधिकारी महोदय को तमाम लोगों ने कार्यक्रम के खिलाफ समझा दिया है, अत: वो नहीं आयेंगे. हालांकि मुझे आज भी इस पर व्यक्तिगत रूप से विश्वास नहीं है. जिलाधिकारी से मिलकर आठ सवा आठ बजे बाहर निकला तो सूचना मिली कि श्री शंभूनाथ शुक्ल, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री प्रवीण शुक्ल (संयोजक) ट्रेन छोड़कर घर लौट गए हैं और अलका सिंह, धीरेन्द्र मिश्र, यशवंत सिंह ट्रेन में बैठ गए हैं.

हालात ऐसे थे के किसी को भी मैं जबरन आने को कह नहीं सकता था और उनके नहीं आने की स्थिति में यहाँ रातो-रात कोई विकल्प भी नहीं खड़ा कर सकता था. खैर, हालाकि मुझे इस बात की संतुष्टि जरूर थी कि वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल और पंकज चतुर्वेदी सरीखे लोग मेरे कहने पर कम से कम चार घंटे से ज्यादा स्टेशन पर तो खड़े रहे. वाकई मैं इसके लिए उनका आभार व्यक्त करूँगा कि वो तब तक स्टेशन पर जमे रहे जब तक ट्रेन के समय से देवरिया पहुंचने की अंतिम उम्मीद बनी रही. इस मामले में संजीव सिन्हा बहुत निराश किये. चार बजे उन्होंने आने की पुष्टि की और साढ़े चार बजे उनका फोन आता है कि उन्हें छुट्टी नहीं मिल रही और प्रभात झा मना कर रहे हैं.

उमेश जी ने बताया कि वो बैग लेकर संजीव जी के यहाँ गए लेकिन उनके मना करने के बाद वो भी लौट रहे हैं. सबकी बातें मेरी समझ में आ रहीं थीं लेकिन संजीव जी द्वारा न आने का कारण बेहद लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना और मजाकिया लग रहा था. जिस कार्यक्रम का टिकट डेढ़ महीने पहले हो चुका हो उसकी छुट्टी भला आधे घंटे पहले मांगने जाना मजाकिया नहीं तो क्या लगना चाहिए. जब संजीव सिन्हा ने मना किया तब टिकट कैंसल नहीं हो सकता था क्योंकि चार्ट बन चुका था. एक अनुज के नाते माफी के साथ एक सुझाव संजीव सिन्हा के लिए है कि “आगे से अगर कोई कार्यक्रम बनाये तो कम से कम छुट्टी थोड़ा पहले ले लें और नहीं आ पाने की पुष्टि इतना पहले कर दें कि आयोजक आपका टिकट कैंसल करवा सकें. कई बार कार्यक्रमों के पास कोई बड़ा प्रायोजक नहीं होता है”.
ट्रेन से बेपरवाह अब २१ दिसंबर के मंच योजना में लगते हुए मै अपना ध्यान कार्यक्रम की तरफ लगा दिया. दूसरे दिन ग्यारह बजे ही हम सात आठ लोग जिला पंचायत सभागार पहुचे और बैनर आदि लगा दिये. जिलापंचायत सभागार बुक करवाया था सतीश मणि और जिलापंचायत सदस्य राणा प्रताप ने, अत: यहाँ भी हमें आर्थिक राहत मिली थी. नियत समय पर दो बजे लोग जुटने शुरू हो गए. मुख्य अतिथि श्री अमिताभ ठाकुर भी देवरिया पहुच चुके थे. अपने तय समय से आधे घंटे देर से यानी ढाई बजे कार्यक्रम शुरू हुआ. बतौर मुख्यातिथि आईजी गोरखपुर श्री अमिताभ ठाकुर, सभाध्य्क्ष प्रो. रामदेव शुक्ल,मुख्य वक्ता डॉ श्रीकांत सिंह, श्री पंकज कुमार झा एवं संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी मंच पर उपस्थित हुए.

कार्यक्रम शुरू होते-होते सभागार पूरा भर गया था जिनमे महिला और पुरुष दोनों की उपस्थिति थी. बतौर संचालक मैंने कार्यक्रम देर से शुरू होने की माफी मांगते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की. माँ सरस्वती की तस्वीर पर पुष्पांजली के बाद अतिथि स्वागत का क्रम चला. इसी क्रम में श्री संजय मिश्र,डॉ जय प्रकाश पाठक, श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती, डॉ सौरभ मालवीय एवं श्री राजीव यादव को मोती बीए नया मीडिया सम्मान प्रो. रामदेव शुक्ल के हाथों दिया गया. सभी सम्मानित गणमान्यों ने सभा को संबोधित करते हुए अपने विचार रखे. सभा को संबोधित करते हुए सम्मान प्राप्त अतिथि डॉ जय प्रकाश पाठक ने शंभूनाथ शुक्ल जी का एक फेसबुक स्टेट्स पढ़कर सबको सुनाया जिसमे शुक्ला जी ने “लौट के बुद्धू घर को आये” वाला मुहावरा इस्तेमाल किये थे.

संबोधन के क्रम में श्री देहाती जी ने नयम मीडिया मंच को ग्रामीण पत्रकारों की जरुरत बताते हुए कहा कि जो लोग बाहर बैठ कि इस कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं, बेहतर है कि वो अंदर सभागार में आयें और खुली बहस करे. बकौल देहाती जी “देवरिया के पत्रकारिता इतिहास में हुए कार्यक्रमों में यह पहला मंच है जहाँ विरोधियों को भी अपनी बात रखने के लिए आजादी दी जा रही है”. सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री संजय मिश्र ने नया मीडिया की जरुरत एवं जवाबदेही से सम्बंधित सवाल उठाया. सम्मान समारोह एवं सम्मनित व्यक्तियों के संबोधन के बाद माइक पर आये वक्ता श्री पंकज कुमार झा ने बेहद शालीनता से अपनी बात रखा. नया मीडिया के विकास एवं जरुरत पर बोलते हुए श्री झा ने कहा कि हमें अभी इसकी शुचिता की बजाय इसके विकास पर बल देने की जरूरत है.

वहीँ मुख्य वक्ता डॉ श्रीकांत सिंह ने कहा “ कोई भी मीडिया नयी नहीं होती है अत: इसे नया मीडिया की बजाय डिजिटल मीडिया कहना ज्यादा प्रासंगिक होगा. इस मीडिया पर भी अनुशासन की जरूरत है और इसे भी अपनी जवाबदेही तय करनी होगी.”. इस क्रम में डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी ने कार्यक्रम का प्रस्तावन भाषण देते हुए इस आयोजन को अद्भुत बताया तो वहीँ ग्रामीण अंचल से आये पत्रकार श्री सिद्धार्थ मणि त्रिपाठी. श्री राघव तिवारी, श्री अरुण पाण्डेय. श्री सतीश सिंह आदि ने न्यू मीडिया को को ग्रामीण पत्रकारों के सशक्तीकरण के लिए सबसे जरूरी हथियार के रूप में स्वीकार किया. कार्यक्रम खतम होने में अभी आधे घंटे शेष थे और सभा में मौजूद भीड़ ज्यों की त्यों टिकी थी. तभी सूचना मिली कि यशवंत सिंह, कुमार सौवीर, जनार्दन यादव, अलका सिंह, डॉ धीरेन्द्र मिश्र भी पहुंच गए हैं. बिना देर किये संचालक द्वारा श्री यशवंत सिंह (भड़ास) एवं श्रीमती अलका सिंह (आकाशवाणी) को मंच पर आमंत्रित किया गया.

यशवंत सिंह द्वारा अपने संबोधन में उसी तेवर को कायम रखते हुए मुख्यधारा मीडिया पर प्रहार एवं नया मीडिया के सशक्तीकरण की बात की गयी. वहीँ अलका सिंह ने संक्षिप्त में ही ऐसे कार्यक्रमों पर अपना पक्ष रखा. सभा की अध्यक्षता कर रहे प्रो. रामदेव शुक्ल ने मुख्यधारा मीडिया के जवाब के रूप में नया मीडिया के विकास पर बात करते कहा कि इस नए माध्यम पर और अधिक प्रशिक्षण शिविर आदि लगाकर उन लोगों को खड़ा करने की जरुरत है जो इस माध्यम से अनभिग्य हैं.

अंत में कार्यक्रम के संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी ने सभी तमाम अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया. शुरुआत में कार्यक्रम को हल्के में लेने एवं उपेक्षित नजर से देखने के बावजूद कार्यक्रम की सफलता ने तमाम राष्ट्रीय अख़बारों को कवरेज करने पर मजबूर किया और तमाम अखबारों के देवरिया ब्यूरो प्रमुखों ने देर रात इस कार्यक्रम को संज्ञान में लेकर जानकारी ली. ये वही अखबार के ब्यूरो प्रमुख थे जो इस कार्यक्रम की सुचना तक छापने से बच रहे थे. दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख ने तो पूरे कार्यक्रम के ढांचे को ही अपूर्ण बता दिया था लेकिन यह अंत तक नहीं बता पाए कि क्या अपूर्ण था? मुझे उम्मीद थी कि वो इसकी अपूर्णता बताने मंच तक आयेंगे लेकिन नहीं आये.

खैर, सबकी नजर में कार्यक्रम सफल रहा.
आयोजन और इसके दाएं-बाएं की कुछ तस्वीरें…

साहित्यकार प्रोफेसर रामदेव शुक्ल ने कहा कि पारंपरिक मीडिया में जो चीजें छूट जाती हैं उसे नया मीडिया उठाता है। ग्रामीण अंचल के पत्रकारों के लिए नया मीडिया सशक्त माध्यम है। शुक्ल शनिवार को जिला पंचायत सभागार में नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ग्रामीण पत्रकारिता के इस तरह के प्रयोग को व्यापक स्तर पर बढ़ाकर लोगों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। इसकी चुनौतियां भी बहुत है जिससे लड़ने के लिए पत्रकार को जिम्मेदारियों के साथ रहना पड़ेगा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रानिक मीडिया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. श्रीकांत सिंह ने कहा कि कोई भी मीडिया नई नहीं होती है। इसलिए इसे डिजीटलमीडिया कहना ज्यादा प्रासंगिक लगता है। नया मीडिया को एक समय बाद मुख्य धारा के मीडिया के रूप में जाना जाने लगेगा। आईजी अमिताभ ठाकुर ने कहा कि सोशल मीडिया ने आम व्यक्ति को ताकतवर बनाया। लोग अपनी बात को आसानी से पहुंचा रहे हैं। सभी बड़े राजनैतिक लोग फेसबुक और ट्यूटर पर हैं। हालांकि इसका दुरुपयोग भी हो रहा है, इसे रोकने की जरूरत है। वरिष्ठ पत्रकार पंकज झा ने कहा कि नया मीडिया मुख्य धारा की मीडिया के विकल्प के रूप में सामने आ रहा है। इसमें सूचनाओं को रोकना संभव नहीं हो सकेगा। पत्रकार यशवंत सिंह ने ग्रामीण पत्रकारिता व वर्तमान पत्रकारिता की दशा पर अपना विचार व्यक्त किया। इस दौरान माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रकाशन अधिकारी सौरभ मालवीय, वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्र, एनडी देहाती, राजीय यादव, संत विनोबा पीजी कॉलेज के अध्यापक प्रो. जयप्रकाश पाठक को मोती बीए सम्मान से नवाजा गया। इस मौके पर शिवानंद िद्ववेदी ‘सहर’ आल इण्डिया रेडियो दिल्ली की समाचार वाचिका अलका सिंह, डॉ. दिनेश मणि, रामदास मिश्र, राम कुमार सिंह, दिलीप मल्ल, उदय प्रताप आदि मौजूद रहे।

आना हे राजनीति में तो……………….

आना हे राजनीति में तो आ जाओ चाकरी करके। 
रात दिन सेवा करनी हे हमारी, भगवान  समझ के!! 
हम कहे दिन में रात तो , कहना पड़ेगा रात !
अगर ना  कहा तो छोड़ देंगे , हम तुम्हारा साथ!! 
साथ देंगे सोगात तुम्हारे , घोटालो का हाथ !
सोने नही देंगे तुम्हे, दिन और रात !!
“डराते हुए:-………………..”
सी बी आई हे हमारी , बचके कहा तुम जाओगे?
रात दिन सिर्फ , तुम पछताओगे !!
कुछ ही दिनों में तुम, सलाखों के पीछे नजर आओगे 
जेल में सलाखे कितनी? , ये भी नही गिनवायेंगे!
सिर्फ वहा हम , कुछ गेहू और कुछ बाजरा  पिसवाएँगे 
और उसी गेहू को एक दिन, गरीबो को खिलवाएंगे 
“दबाव डालते हुए:-……..” 
उनको डराएँगे , धमकाएंगे ।
और सन्देश यह दिलवाएँगे
“अगर रहना हे यहाँ जमके , तो रहना पड़ेगा हमसे डर के “
“करना सिर्फ हुजूरी  , आगे ना बढ़ना “
“अगर बढाया कदम तो, महंगा पड़ सकता हे जीना “

अपराध की समाचार से भरल अखबार

मनबोध मास्टर बिहाने-बिहाने अखबार खोलते माथा पीट लिहलन। अपराध की समाचार से भरल अखबार देख के दिमाग चकरा गइल। देवरिया की एम पी साहब की मुनीब से भी दु लाख छिना गइल। कूड़ाघाट में सत्या के गहना छिना गइल। रेलवे के जीएम आफिस की समनवे बैंक से पैसा निकाल के आवत रिटायर रेलकर्मी लुटा गइलें। दिव्यनगर में रंगदारी खातिर घर पर चढ़ के बदमाश फायरिंग कइलें। रेती चौक पर रिक्शा से जात बैंककर्मी पर तमंचा तान के बदमाश नकदी लूट लिहलन। सिसवा आ कप्तानगंज की बीचे जननायक ट्रेन में जीआरपी वाला एगो व्यापारी के लूट लिहलन। बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर, कुशीनगर में लूट-छिनैती के तमाम समाचार से अखबार अंड़सल रहे। लगत बा लूट के छूट मिल गइल बा। कुशीनगर वाला स्वर्गीय धरीक्षण बाबा के कविता याद आ गइल-‘ गुंडा स्वतंत्र, गोली स्वतंत्र/ बदमाशन के टोली स्वतंत्र/ छूरा स्वतंत्र, कट्टा स्वतंत्र, हिस्ट्रीशीटर पट्ठा स्वतंत्र..।’ एतना लुटात-पिटात, मरात-कुचात मनई की मन में एक बात के संतोष बा। संतोष येह बात के की बाबुजी (नेताजी)के वयान भी आजुए की अखबार में आइल बा। वयान के लब्बोलुआब इ बा कि बाबुजी के कहनाम बा कि हम राजा रहतिन त 15 दिन में व्यवस्था सुधार देतीं। मतलब साफ बा कि राज-काज ठीक नेइखे चलत। इ बाबुजी के भलमनसहित बा कि बेटा के कसत हवें कि पुत्तर पेंच कस दें। बाबुजी के नराजगी मीडिया से बा। कहत हवें- सरकार ने अच्छा काम ना लउकत बा। बाबुजी! माफ करब, कइसे समझावल जा। सफेद चकाचक कमीज पर यदि कहीं दाग लउकी त निगाह ओहीं न पहिले जाई। येह में निगाह के कवन दोष बा। दागदार कमीज पहने वाला के चाहीं कि दाग धोआ दें। राजनीतिक दल जहां एक ओर सूचना अधिकार अधिनियम के खुल्लमखुला विरोध करत हवें वहीं बाबुजी सीना ठोंक के कहत हवें कि पुत्तर के राज-काज ठीक ना चलत बा। येह के कहल जाला पारदर्शिता, ईमानदारी से स्वीकारोक्ति। बाबुजी का ठीक से पता बा कि कानून -व्यवस्था के चुनौती देबे वालन तत्वन पर लगाम ना लगावला की चलते ही 2007 की चुनाव में उनकी पार्टी से सरकार में गइला के ही लगाम लाग गइल रहे। लेकिन एगो सवाल सीना में चुभत अइसन लागत बा, उ इ कि जब बाबुजी के पार्टी सरकार में आवेले तबे बदमाशी काहें बढ़ि जाला? 
लूट के छूट मिलल जइसे, रोज लुटात हवें नर-नारी। 
अइसे ही राज चलि यदि भाय, त उत्तम प्रदेश होय गुणकारी।।
 ढील बा पेंच, की मिस बा चूड़ी, की मूड़ी पर कइलें शनिचर सवारी।
 बाप कहें हम ठीक कर देतीं, बेटवा तूहीं दिहलù ह राज बिगारी।।

एतना घोटाला की बाद भी देश चल रहल बा, इ सब कुछ पुण्यप्रतापी लोग के देन बा।

मनबोध मास्टर का नेता नाम से ही घिन हो गइल बा। एतना घिन जइसे नेता ना नेटा(पोंटा) होखें। घोटाला पर घोटाला होत देख बोल पड़लें- ‘ साग घोटाला, पात घोटाला। सुबह-शाम और रात घोटाला।
पाथर के हाथी बा खइलसि, 15 अरब के डाढ़ा।
 मंत्री जी लोग गटक रहल बा, घोटाला के काढ़ा।। 
लोकायुक्त किये खुलासा, बात कहत हैं पक्की।
 दो सौ जने आरोपित भइलें, कब पिसिहें जेल में चक्की।। 



पापा के आज जन्मदिन पर ……….

पूर्वाञ्चल का भोजपुरिया लाल – एन.डी. देहाती

  नर्वदेश्वर पाण्डेय (एन.डी. देहाती)

पूर्वाञ्चल की धरती पर अनेक ऐसे लाल हुये है जो देश के साहित्यिक  क्षैतिज पर ध्रुवतारे की तरह चमके है | ऐसे ही माटी मे पैदा हुए खाटी देहाती जी  ने बुलन्दियो को छूते हुये अपने गाँव देहात को हमेशा सुर्ख़ियो मे रखा | 1 अप्रैल 1960 को पूर्वाञ्चल के देवरिया जिले मे लार थाना क्षेत्र के हरखौली गाँव मे जन्मे नर्वदेश्वर पाण्डेय की प्रारम्भिक शिक्षा पास के गाँव रुच्चापार मे हुई | स्नातक तक की पढ़ाई पास के कस्बे लार के मठ डिग्री कॉलेज मे हुई | पढ़ाई के दौरान शौक से “देहाती” टाइटिल क्या लगाया देहाती बन कर रह गए | भोजपुरी साहित्य की सेवा मे उन्होने विभिन्न पत्र पत्रिकाओ के माध्यम से भूल रही लोक-संस्कृति, लोक-परंपरा, रीति-रिवाज,को समय-समय पर याद कराया है |

    देहाती जी का सृजन क्षेत्र काफी समृद्ध है | आत्म प्रचार के इस युग मे वह गुमनाम सा जीवन जीते है | पूर्वाञ्चल मे भोजपुरी साहित्य के सृजन मे उन्होने अपनी परंपरावों व धरोहरों के बारे मे खूब लिखा है | भोजपुरी साहित्य के लेखन मे उन्होने खूब नाम भी कमाया | फिर भी मंच और मुकाम के मामलो मे वह काफी पीछे रह गए है | उन्हे जो सम्मान मिलना चाहिए, जिसके वह हकदार हैं वह नहीं मिला । इसके पीछे की वजह यह है की बाजारीकरण के इस दौर में वह मार्केटिंग से दूर रहते हैं।  स्वाभिमानी देहाती जी ने भोजपुरी साहित्य रचना के साथ खेतीबारी को ही प्राथमिकता दी | भोजपुरी के प्रति उनके समपर्ण ने उन्हे लोक भाषा के महाकवि कबीर के मार्ग का राहगीर बना दिया।
श्री देहाती जी का रचना संसार व्यंग से आच्छादित है । उन्होने सामाजिक व राजनीतिक मुद्दो पर बहुत व्यंग लिखा । गोरखपुर से प्रकाशित होने वाले सभी  समाचार पत्रों ने देहाती जी के व्यंगों को अपने यहाँ स्थायी कॉलम में स्थान दिया । आज में “लखेदुआ के चिट्ठी”, दैनिक जागरण में “देहाती जी के दिलग्गी”, अमर उजाला में “देहाती के पाती” व राष्ट्रीय सहारा में “देहाती क बहुबकी” उनके चर्चित कॉलम रहे हैं । यद्द्पि देहाती जी ने कोई खंडकाव्य या महाकाव्य नहीं रचा लेकिन उनकी चिंतन प्रधान रचनाओं को एकत्रित किया जाए तो किसी मोटे ग्रंथ से कम नहीं होगी । 1980 से लगातार भोजपुरी की धुन में रमे देहाती जी ने तीस वर्षो से साहित्य सेवा में भोजपुरी के प्रचार प्रसार के लिए खूब लिखा । भोजपुरी की अस्मिता के लिए, संस्कृति की रक्षा के लिए भोजपुरी कला कोहबर से भी सम्मानित किया गया है | मगहर महोत्सव व सरयू महोत्सव मे भी इन्होने अनेकों बार अपने भोजपुरी कविताओ से लोगो के मन को हर्षित किया है | होली समारोह, खेल कूद व विभिन्न कार्यक्रमों मे बतौर मुख्य अतिथि श्री देहाती जी को भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ व अन्य विभिन्न संगठनो द्वारा सम्मान पत्र व स्मृति चिन्ह से अनेकों बार सम्मानित किया जा चुका है | उत्तर प्रदेश सरकार के धर्मार्थ राज्य मंत्री राजेश त्रिपाठी ने सलेमपुर में आयोजित एक समहरोह में उन्हे भोजपुरी रत्न से सम्मानित किया है ।
 ब्राह्मण जाति मे जन्मे देहाती जी ने अपने धर्म को भी प्राथमिकता दी है | इन्होने जन्माष्टमी, होली, दीपावली, मकर-संक्रांति, नवरात्रि, आदि सभी त्यौहारो को बहुत है अच्छे ढंग से मनाया है | इन्होने अपने गाँव हरखौली मे फरवरी 1992 को ऐसा रुद्र माहयज्ञ का आयोजन कराया, जिसको लोग अभी तक भूले नहीं है | इन्होने गाय माता की रक्षा के लिए 1992 मे गोरक्षा समिति की स्थापना की | श्री देहाती जी ने अपनी कला को विरहा के रूप मे भी लोगो तक पहुचाया है | लोगो मे शांति, आस्था, भाईचारा, सहयोग की भावना बनाए रखने का संदेश 11 प्रान्तो मे अस्सी दिवसीय साइकिल यात्रा से दी है |
अपनी माटी से प्यार करने वाले संवेदनशील देहाती जी ने अपनी पूरी ऊर्जा भोजपुरी साहित्य सर्जना में लगाया | हम उनके बहुमूल्य योगदान को कभी भुला नहीं सकते, जिस छोटे स्थान से उन्होने पूर्वाञ्चल में इतना बड़ा नाम कमाया उनकी रचनाओ का सम्यक व संतुलित मूल्यांकन होना चाहिए था लेकिन भोजपुरी के लिए काम कर रही तमाम संस्थाओं में से किसी ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया । इसका कारण यह भी है की सभी संस्थाएं किसी न किसी की कृपा पर चलती हैं और देहाती ऐसा अक्खड़मिजाज रचनाकार किसी का कृपापात्र नहीं बनना चाहता । वह व्यवस्था विरोधी रचनकर हैं | मेहनतकशों के लिए संघर्ष उनका ध्येय है । चमक-दमक से दूर गाँव में बैठा यह रचनाकार कभी थका नहीं | लगातार तीस वर्षो से अधिक लिख रहा है । अपने लेखो में किसी को छोड़ा भी नहीं है । जो भी निशाने पर चढ़ा व्यंगवाण का शिकार हुआ | भोजपुरी के विद्वान देहाती जी को सरस्वती सिद्ध माना जाता है ।
पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पूर्वाञ्चल के लोग देहाती के नाम व उनकी रचना से खूब परिचित हुए हैं । आकाशवाणी गोरखपुर से प्रसारित विभिन्न भोजपुरी कार्यक्रमों में उनकी आवाज़ भी सुनी गयी है । भोजपुरी के इस रचनाकार को गाँव में ही अच्छा लगता है । उनके लेखों में तेलवान, भतवान, साइत, नेवान, सतुआन  आदि भूल रही परम्पराओं को कई बार याद दिलाया गया है । देहाती जी अपने साहित्य रचना के जरिये एक जंग लड़ रहे हैं । भोजपुरी की अस्मिता के लिए, संस्कृति की रक्षा के लिए, परम्पराओं व रीति-रिवाजों और भाईचारा को जीवित रखने की जंग ।

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एक कविता जो

 

एक कविता जो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई …!

एक कविता जो शुरू होने से पहले
 ही खत्म हो गई !
शाम ढलने से पहले
 ही सुबह हो गई
बैठा था किसी के आदेश के इंतजार में
और बैठा ही रह गया
उस आदेश की इंतजार मे जो
 कभी तो मिलेगी ,
 किसी काम को पूरा करने के लिए
लेकिन आदेश से पहले
ही वह पूरी हो गई ।
कभी – कभी तो लोग
 कुछ कहते है निल्को ,
और आप करते हुये भी
 न करते है उसको ॥
इन सब बातों से लगा की
एक बार फिर ज़िंदगी
 नई से पुरानी हो गई ।
लेकिन ये
एक बुरे सपने जैसा था
और मैं समझा की यही
अपनी कहानी हो गई ।
रात के बाद एक
 नई सुबह फिर आई
और
मुझे इन बेकार की बातों से
 अलग कर गई ।
इन सब बातों को
 कविता के माध्यम से लिखने की
कोशिश की तो
कविता शुरू हो ने से पहले ही
 खत्म हो गई ।
 मधुलेश कुमार पाण्डेय “निल्को”

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Congres’s Shivir in Jaipur


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अपने हि देश मे हक के लिऐ संघर्ष करती एक भाषा कि दास्तान

जिसे बोलते है 22 करोङ हिन्दूस्तानी,जिसे चाहने वालो कि संख्या है अधिक,मारीशस जैसे राष्ट्र कि एक प्रमुख भाषा है यह,हाँलैँड मे भी बोली जाती है यह,अब त आप लोग समझ गईल होईब जा काहेँ से कि ऊ भाषा ह भोजपुरी,भोजपुरी के नाम पर कई उठापटक बैठके भी हुईँ हैँ पर केहु भी भोजपुरी के रक्षा के संकल्प लेने के बाद क्यो नही करता है जन आंदोलन,भारतिय सियासत मे प्रमुख भुमीका निभावे वाली इ भाषा अपने देश मे हक पावे के खातिर संघर्ष कर रही है । महाराष्ट्र,गुजरात,असम जैसे प्रदेशो मे उन भारतियोँ को खास कर निशाना बनाया जाता है जो उत्तर भारत के होँ,वो भी बिहार और उत्तर प्रदेश के,क्योँकी ये लोग भोजपुरी से प्रेम करते हैँ । भोजपुरी को चाहते है । आज तक ये भाषा संविधान कि आठवीँ अनसुची मे सामिल नही हो पाई है । इसके जिम्मेदार हम भोजपुरी भाषी ही हैँ हमारे नेता जो वोट मागने आते हैँ उन्होने भी इस दिशा मे कोई उल्लेखनिय कार्य नही किया है । हाँ इंटरनेट पर कुछ वेबसाईट और ब्लागोँ ने इसे आगे बढाने का कार्य जरूर किया है । अभी भी समय है भाईयोँ जाग जाओ अपने मातृ भाषा और राष्ट्र भाषा को आगे बढाओँ,पर किसी भी अन्य भाषा का निरादर मत करो ।
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CWG, 2G, कोयला और न जाने कितने जी…..जा……जी

 

एक बार की बात है,
वोट देते ही पड़ गई लात है|
थोड़े देर सकपकाने के बाद,
बोले निल्को भाई
वोट देने का क्या यही परिणाम है ?
मैंने कहा भाई,
तुम तो बहुत कमात हो
लेकिन मनमोहन सब खाए जात है
फिर वोट कांग्रेस को देकर
क्या संदेश देत जात हो ।
मैंने कहा सही है भाई,
लेकिन यह मौन का
क्या राज है ?
अरे जनाब,
CWG,2G, कोयला
और न जाने
कितने जी…..जा……जी
तो इनके पास है।
खाने के वक्त बोलना नहीं चाहिए,
और पचाने के लिए विपक्ष को
जगाना नहीं चाहिए ।
इतने मे ही भाई नीलेश आए,
और बोले की
ये नोट मेरे पास
आया था,
देखने मे सफ़ेद पर अंदर से
काला था,
आप की बात सुनकर
समझ आया यह तो कांग्रेस का
छापा था,
गलती से यह मेरे पास
आया था ।

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ईमानदारी को बनाएं हथियार

जानकारी और ज्ञान में वही फर्क है, जो आंख और प्रकाश में है। प्रकाश यानी दृष्टि। दृष्टि न हो तो आंख किस काम की और ज्ञान न हो तो जानकारियों का वजन भी मनुष्य की चाल को बिगाड़ देगा। इन बातों का असर हमारे दो अभियानों पर भी पड़ा। भ्रष्टाचार और अपराध, देश के ये दो कलंक बिंदिया बनकर चिपक गए। जब दुर्गुण ही शृंगार बन जाए, तब चेहरे को विकृत होना ही है। भ्रष्टाचार मिटेगा ईमानदारी से। हमारे पास ईमानदारी जानकारी की शक्ल में है, ज्ञान के रूप में नहीं। इसलिए ईमानदारी को समझदारी से जोडऩा होगा। एक गहरी समझ के साथ इसे शस्त्र बनाकर बेईमानों पर प्रहार करना होगा। लोगों ने ईमानदारी को ढाल बना लिया, अब हथियार बनाना होगा। इसी तरह अपराध के मुकाबले के लिए जिम्मेदारी को बहादुरी से जोडऩा होगा। कर्तव्यनिष्ठ लोग साहस दिखाने के मामले में रिजर्व हो जाते हैं। यह बिल्कुल ऐसा है कि हमारे पास जिम्मेदारी की आंख है, पर बहादुरी की दृष्टि नहीं। अंधे होकर आखिर कितनी लंबी यात्राएं कर पाएंगे। इसीलिए बेईमानों की जानकारी भी ईमानदारों के ज्ञान पर भारी पड़ जाती है और अपराधियों की दृष्टि जिम्मेदारों की आंख पर हावी हो जाती है। आध्यात्मिकता ही इस गड़बड़ाए तालमेल को ठीक कर पाएगी।

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यूपी ने देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री……..

 

यूपी में जातियों के ब्लूप्रिंट पर नजर डालें तो प्रदेश में 49 जिले ऐसे हैं, जहां सबसे ज्यादा संख्या दलित मतदाताओं की है. कुछ जिले छोड़ दें तो बाकी जगहों पर दलित दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक है. वहीं 20 जिले ऐसे हैं, जहां मुस्लिम वोटर सबसे ज्यादा हैं और 20 जिलों में वे दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक है

अगड़ी जाति

16 फीसदी वोट बैंक
ब्राहमण – 8 फीसदी
ठाकुर – 5 फीसदी
बनिया – 3 फीसदी

पिछड़ी जाति

35 फीसदी वोट बैंक
यादव – 13 फीसदी
कुर्मी – 12 फीसदी
अन्य – 10 फीसदी

इसके अलावा

दलित – 25 फीसदी
मुस्लिम -18 फीसदी
जाट – 5 फीसदी
और अन्य – 1 फीसदी

कहते हैं यूपी देश की राजनीती की दशा और दिशा तय करता है लेकिन 18 मंडल, 75 जनपद, 312 तहसील, 80 लोकसभा, 30 राज्यसभा के साथ 403 सदस्यीय विधानसभा वाला यह राज्य बीमारू राज्यों की श्रेणी में खड़ा है | विकास कहीं पीछे छूट गया है और जाने-अनजाने में यह सूबा धर्म व जाति आधारित राजनीति की प्रयोगशाला बन गया है। जिस यूपी ने देश को सर्वाधिक आठ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में दिए हों, वहां धर्म व जाति आधारित राजनीति का बोलबाला है |  और यही यूपी और इस देश का दुर्भाग्य है |

एह पर करियो मतदान

चुनाव आयोग बहुत कडाई कईले बा . प्रत्यासी भी बहुत चालाकी देखावत हवे . गाव गाव लक्जरी गाडी  घूमत हई. कवनो साहब शुब्बा राही में  चेकिंग – ओकिंग करत में मिळत  हवे त इहे जवाब देत हवे – हम बरदेखुआ हईं . फलाने की घरे जात हई . अब फलाने की दुआरी तिल्कहरून  के भीड़ देख के अटिदार- पटीदार, पास -पड़ोस के लोग बटुरा जाता . फलाने भी तिल्कहरून के खूब आव -भगत करत हवे . मर -मिठाई , नर -नमकीन , अकौड़ी- पकौड़ी चापि के ऊपर से चाह-चुह पी- पा के जब राहि धरे जात हवे त घर की मुखिया की हाथ में हज़ार – दू हज़ार थमा के कान में धीरे से कहत हवे . अरे भईया ! हम साचो के तिलकहरू न हई, हम फलाने के समर्थक हई आ वोट मांगे घूमत हई . यह चिन्ह पर बटन दबा दिहा . दरअसल बात इ बा की यह  बार जैसन  चनाव आयोग के  खौफ पहले कभी न देखे के मिलल रहे । अधिकारी हों, अथवा कर्मचारी या प्रत्याशी सजो  लोग  चुनाव आयोग की डंडे के खौफ से सहम गईल बा । चुनाव में  जनता के बीच जा के   अपनी प्रत्याशिता क प्रचार कईल  उनकी मजबूरी बा , सो तरह -तरह के हथ कंडा अपनावल जता ,चुनाव आयोग क फरमान बा  कि तीन गाडी से अधिका वाहन न चली , सो लोग तिलकहरू बनी के घूमत हवे , अपन  प्रचार करत हवे । इ सब आयोग के छकावे के जोगार ह।  हमरी देवरिया जिला की बरहज में त अयिसन तिल्कहरून के बाढ़ आ गईल बा , बिना बिआहे तय कईले खूब गोड़ लगायी , राह धराई मिळत बा . एगो प्रत्यासी त साठ गो  बेलोरो आ इस्कर्पियो उतार देले हवे , कही बरछा , त कही बर देखाई . कही बर छेकाई . सब फर्जी चलता ये भाई . अब यह हालत पर एगो कविता सुन ली –

गाव गाव तिलकहरू घुमे  , खूब करे जलपान / 
जाये की बेरी कान में कहले, एह पर करियो मतदान/
हाथ जोड़ के नगद थम्हावे, बार बार प्रणाम /
अबकी रउरा न बिसरायिब,इहे  ह मोर निशान/
आफत कईले बा आयोगवा, बहुत बा घामासान / 
येही बहाने प्रचार चलत बा, हमरो साझ -बिहान / 
बरहज में मतदाता मगन बा, खूब मिळत बा दाम /
खीच के सेवा तिल्कहरून के, अपनों मान-सम्मान / 
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राहुल कोई भगवान राम नहीं है

 राहुल कोई भगवान्  राम नहीं है . लेकिन गोरखपुर में आये तो आमी के प्र्दुसन से त्रस्त लोगो ने उसी तरह गुहार लगाई  <उतराई नाहीं चाही, पनिए शुद्ध करा देईं>  मीडिया ने केवटराम सवाद का सहारा लिया और दाग दी भोजपुरी की हेडिंग से एक खबर . और बना दिया राहुल को हीरो .

एक अख़बार ने लिखा अयोध्या से जितनी दूर दक्षिण श्रृंगबेरपुर है लगभग उतनी ही दूरी पर पूरब दिशा मे बसा है गोरखपुर का कटका गांव। श्रृंगबेरपुर में भगवान श्रीराम ने केवट को सुई नदी पार कराने एवज में उतराई देने की कोशिश की थी। आज राहुल ने कटका में आमी नदी पार कराने के एवज में केवट को उतराई देनी चाही। राहुल के कटका दौरे में गांव के हर बड़े बुजुर्ग की जबान पर राम केवट संवाद बरबस चर्चा में गया था।दो नामों में अक्षर ने इस चर्चा को और भी आगे बढ़ा दिया। तब तो केवट ने कहा था
कहेउ कृपालु लेहु उतराई,केवट चरन गहे अकुलाई.

नाथ आजु मैं काह पावा,तिटे दोष, दुख, दारिद दावा।

आज कटका गांव के दो मल्लाहों ने सपने में नहीं सोचा था कि उनकी नाव पर राहुल गांधी बैठेंगे। बाढ़ के सीजन में नदी में तीन माह तक नाव चलाने वाले जीतू निषाद एवं रमेश निषाद ने जब राहुल गांधी को नदी के पार उतारा तो राहुल ने उतराई देनी चाही बस क्या था तपाक से जीतू ने कहा, साहब पइसा नाहीं चाही, आमी के पनिए शुद्ध करा देईं।
बतौर जीतू एवं रमेश अजीब संयोग था। जब राहुल गांधी का काफिला नदी के किनारे छताई पुल के पास पहुंचा तो वे सुर्ती मल रहे थे। जब वे उनके पास आये तो वे पहचान नहीं पाये कि यह लोग कौन हैं। नाव में पूछकर वे लोग बैठ गये नदी पार करने के दौरान जीतू से उसे परिवार के बारे में रीता बहुगुणा जोशी ने पूछा। जीतू ने उन्हें बताया कि उसके चार बेटे एवं दो बेटी हैं। बीस वर्ष से बाढ़ के वक्त नाव चलाने वाले जीतू के मन में एक व्यक्तिगत मुराद (बेटो को नौकरी) पूरी कर लेने की इच्छा हुई लेकिन उसने सामाजिक हित को महत्व दिया। वह कहता है कि मन में एक बार आया कि कि कह दे लेकिन आत्मा ने गवाही नहीं दी। जीतू कहता है कि नदी का पानी जब शुद्ध हो जाएगा तो कई लोगों के बेटे का जीवन संकट से बचेगा। रमेश निषाद कहता है कि उसकी जाति के पूर्वजों ने भगवान राम को नदी पार कराया था। वह अपने जीवन में इतने बड़ी हस्ती को पार कराकर काफी खुश है। सपने में भी उसने नहीं सोचा था कि ऐसा अवसर कभी उसके जीवन में आएगा। 

 दुसरे अख़बार ने लिखाहैण्ड पम्प ले के  पानी जहर उगालत बा .पानी पि के लरिका बीमार हो जाट हवे .

 एक  ने लिखा राहुल ने खरीदी  700 में तीन किलो प् कौ डी….

पढ़िए और इस राजनितिक ड्रामा पर अपनी प्रतिक्रिया भी दीजिये



सलवार समीज मे पकडे गये स्वामी रामदेव

बाबा रामदेव का सत्याग्रह सरकार के अनुलोम – विलोम  के बाद जंग मे बदल गया . सरकार ने पल्तासन  मारा तो बाबा को गेरुआ  की जगह सलवार समीज (महिला ड्रेस ) पहन कर जान बचना पड़ा . रामलीला मैदान में सत्याग्रह पर बैठे बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर  शनिवार मध्य रात्रि के बाद पुलिस बल ने लाठीचार्ज किया और अश्रुगैस के गोले फोड़े। इलेक्ट्रानिक चैनलों ने समर्थकों पर रबर की गोलियां भी चलाये जाने की खबर दी। बाद में पुलिस ने उस मंच पर कब्जा कर लिया जिस पर बैठकर योगी रामदेव बैठे हुए थे। इसके बाद बाबा मंच से कुदकर फरार हो गये . बाद मे महिला टीम मे शरण  लेकर बाबा ने सलवार समीज पहन लिया . तभी पुलिस ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया . उन्हे विमान से देहरादून लाया गया इसके बाद सड़क मार्ग से हरिद्वार उनके योग पीठ पर पहुचा दिया गया . हाई प्रोफाईल इस ड्रामे  मे भाजपा को एक बड़ा मुद्या मिल गया .बाबा रामदेव ने पुलिस से भी टकराव की स्थिति पैदा न करने की अपील की। प्रशासन ने रामलीला मैदान में तत्काल प्रभाव से निषेधाज्ञा लागू कर दी है। इसी के साथ योग शिविर की इजाजत को भी प्रशासन ने रद कर दिया।

अनाज सड़sता, लोग खइला बिना मरsता

आपन भारत देश केतना सुन्नर केतना सुघ्घर। लेकिन व्यवस्था केतना चौपट केतना खराब। देश में अनाज सड़sत। उ अनाज जवना के पैदा कइला में किसान भगवान आपन खुन पसीना एक क s दीहलें। फार्म हाउस वाला, सिलिंग वाला, सीमान्त वाला आ लघु कृषक कहाये वाला कई गो श्रेणी बा। खइला बिना मरे वाला में भूमिजोतक, खेतिहर, मजदुर टाइप के लोग बा। अइसन लोग जवन अपनी जांगर से धरती माई के करेजा चीर के अन्न उपजावत बा। एतना अन्न, जवना के धरे खातिर देश में सुरक्षित भंड़ार ना बा। अनाज सड़ला के चिन्ता जब अधिकारी से लेके मनिस्टर तक का ना भईल, तब सुप्रीम कोर्ट के रुख करेड़ भईल। कोर्ट पूछलसि-अनाज सड़ावे वाला जिम्मेदार अधिकारिन पर कवन कार्रवाई भइल? कोर्ट कहता अनाज गरीबन में बांट  दिहल जा। वित्त मंत्रालय कहता अनाज दूसरा देश में बेंच दिहल जा।
गांवन से खेती-बारी छोड़ के नौकरी रोजगार की तलाश में दर-दर भटकेवाला नवहन का एक बेर सोच के चाही। जेकरा लगे कवनो काम ना बा उ खेती में जुटल बा, जेकरा खेती बा उ ओमे लागल बा। खेती के उत्पाद क्षमता एतना बढ़ल बा कि भंड़ारड के समस्या आ खड़िआइल बा। भारत में जेतना गोदाम बा ओहसे तीन गुना अनाज उत्पादन बा। देश के कवनो फैक्ट्री एतना उत्पादन ना दे सकेलिन कि उनकर तीन गुना माल गोदाम की बहरा सड़ि जाव। ग्राम, किलोग्राम, पसेरी, मन, कुन्तल ना टन में अनाज सड़ला। सरकारी लेखा जोखा सात हजार टन अनाज सड़ला के बात कहत लेकिन मात्रा अधिक भी हो सकेला। देश के व्यवस्था जेकरा हाथ में बा ओकरा एक बेर फिर सोचे के चाहीं कि येह अनाज के उपयोगिता बढ़ा दिहल जा, सड़ला से बचा लिहल जा। अनाज वितरण के जवन वर्तमान व्यवस्था बा उ ठीक ना बा। स्कुलन में जवन खाद्यान्न दिहल जाता, का ओकर सही उपयोग होता? प्रधान, कोटेदार आ प्रधानाध्यापक के तिगड़ी खाद्यान्न के व्यापारी की हाथ में पंहुचा देत हवें। सस्ते रेट से  जब व्यापारी अनाज पा जाई तs कवनो गोदम से काहें उठाई। देश में वास्तविक लोग बीपीएल कार्ड की  अभाव से जुझता लेकिन प्रधान  अपनी चहेतन के ललका, उजरका कार्ड थमा देले हवे जवना पर मुफ्त चाहें सस्ता अनाज मिली। उ जरुरतमन्द ना हवें एहलिए कोटेदार उनकर खाद्यान्न बाजार में अनाज पंहुचा देत हवें। सस्ते दर पर जब बाजार में अनाज पंहुचा तs मंहगा दर पर गोदाम से काहें उठान होई। एह तरे कई गो कारण बा जवना से अनाज सड़त बा। जरुरत येह बात के बा कि असों की कार्तिक से किसान भाई खाये भर के ही गेँहु बोएंस। शेष खेत में दलहन , तिलहन आ सब्जी के खेती कइला के जरुरत बा। अनाज सड़लवा से बचाई सभे।, खेती के और उपयोगी बनाइ सभे। खेती ज्यादा बा तs कुछ बाग-बगीचा भी लगाई सभे। अनाज के रक्षा खाली किसान भगवान कs सकेलन। देश के सफेदपोश राजनेता आ कमीशनखोर अफसर अनाज के हाल का जनिहे। अनाज के हाल खाली किसान जानि सकेला। अनाज सड़ला के दर्द खाली किसान जानि सकेला। कहावत सही बा….. ‘जेकरा पांव नs फटी बेवाई, उ का जाने पीर पराई।‘

एन.डी.देहाती

लौन्डा पहिले बदनाम भईल

मुन्नी आज बदनाम होत हई, लौन्डा पहिले बदनाम भईल..
घनेसर काका की मुंह से, बलेसर भइया की मुंह आ पिन्टुआ की मुंह से एकै गाना- ‘ मुन्नी बदनाम हुई… ।’ दरअसल आवे वाली फिल्म ‘दबंग’ के दबंगई के असर बा कि जन-जन की जुबान पर मुन्नी के चर्चा बा। मुन्नी की चर्चा पर घरघूमन लाल का एतराज बा। कहत हवें मुन्नी आज बदनाम होत हई, लौन्डा बहुत पहिले बदनाम हो गईल। अपनी जवानी के दिन के पन्ना पलटत बतवलें कि लौन्डा कइसे बदनाम भईल रहे नसीबन खातिर। चार दशक पहिले इ गाना नाच-नौटंकी में हल्फा मचवले रहे ‘ लौन्डा बदनाम हुआ, नसीबन तेरे लिए। सेर भर आटा होगा, जंगल की लकड़ी होगी, पकापक पकता होगा नसीबन तेरे लिए…।’ मुन्नी की आइटम सांग की पहिले बहुत गरमा-गरम मसाला के टेस्ट लोग ले लेले बा। याद ना होखे त बतावत हईं। 1975 में आइल ‘शोले’ में हेलन हिला के रखि दीहली, जब गवली- महबूबा-महबूबा…। 1993 में एगो फिल्म आइल रहे ‘खलनायक’। माधुरी दीक्षित डांस करत रहली। गाना बजत रहे ‘चोली के पीछे क्या है…। ’ 1999 में आइल ‘शूल’ में शिल्पा शेट्टी जब ‘आई हूं यूपी बिहार लूटने…।’ पर ठुमका लगावल शुरू कइली त बन्दा से बर्दास्त ना भइल आ सिनेमा हाल में अपनो ठुमका लगावे लागल। शिल्पा यूपी बिहार वालन के लूटत रही आ बन्दा के जेब कवनो जेबकतरी साफ क दिहलसि। 2005 में ‘बंटी-बबली’ एश्वर्या राय पर फिल्मावल गाना- ‘कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नैना…।’ घर मे गावत घुसलीं त पतोहिया हमरे मलिकाइन से कहलसि, बाबुजी के रहन ठीक ना बा। 2006 में ‘ओमकारा’  फिल्म के जयकारा हर जगह लागल। अबो लागत बा। बिपाशा बसु की जिगर में एतना आग रहल कि केतने बन्दा ‘बीड़ी जलइले, जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है…।’ से जरि गइलें। कहला के मतलब इ बा कि मुन्नी की बदनामी आ लौन्डा की बदनामी के बीच में बहुत लोग बदनाम हो चुकल बा। ‘दबंग’ के इ गाना कहिया ले हीट रही भगवान जाने। लेकिन शोले के ‘महबूबा-महबूबा’ जब भी कहीं बजेला त बुढ़ौती में हमार टंगरी ठुमका लगावला की पोजिशन में आ जाले। देहि में करंट आ जाला। घर में फजीहत भइला की बाद अब कभी कजरारे गावे के मन करेला त दहिने-बाएं देखि के तब गुनगुनालीं। खैर! आपन बतकही बन्द करत इहे कहब- लौन्डा बहुत पहिलहि बदनाम रहल नसीबन खातिर!
 
एन.डी.देहाती

हाय रे आगनबाड़ी………

भोजपुरी संगीत के समारोह में देवरिया जिला की नदौली गांव के सोनू शांडिल्य नाम के एगो लइका गवले रहे- “बारह सौ के नौकरी, पहिने पन्द्रह सौ के साड़ी, हाय रे आगनबाड़ी….”। गाने के लाइन व्यग्य भरल रहल। एगो सवाल भी उठावल गइल रहे कि बारह सौ रुपया पगार पाये वाली मेहरारु अगर डेढ़ हजार के साड़ी पहिरी तs घर-परिवार के और खर्चा कइसे चली। कुशीनगर की विशुनपुरा थाना की दुदही ब्लाक में घराइल 128 बोरी पोषाहार येह बात के साबित कs दिहलसि कि आगंनबाड़ी की साड़ी की पीछे इहे राज बा। दरअसल, सरकार गांव-गांव आगंनबाड़ी केन्द्र खोल के नौनिहालन के पोषाहार खियाके पट्ठा बनावला में पावनी अइसन पइसा बहावति बा। लेकिन येह विभाग में भष्टाचार के आलम इ बा कि गरीब लइका-लइकी, आ गर्भवती मेहरारु का हिस्सा वाला पोषाहार खुला बाजार में बेचल जाता। सोमवार य़ानि पहली नवंबर 2010 के एगो पिकप गाड़ी पर लदल 128 बोरा पोषाहार पडरौना- तमकुही मार्ग से बिहार की ओर जात रहे। कुछ जागरुक लोगन के नजर पड़ल। सोचले यूपी की माल से बिहार के लोग मोटाई। अइसन ना होखे दिहल जाई। जागरुक लोगन के पारा गरमाइल, पिकप रोकाइल। विशुनपुरा थाना के सौंप दिहल गईल।
गजब व्यवस्था बा। गांव-गांव आगंनबाड़ी केन्द्र खुलल बा। केन्द्र पर ना लइका लड़केलन ना मेहरारु। लेकिन हर महीना पोषाहार जरुर मिलेला। कागज पर चले वाला अइसन केन्द्र पर लाखौं के न्यारा-बारा होला। लइकन को पुष्ट बनाने वाला पोषाहार 125 से 150 रुपया बोरी बेचि दिहल जाता। एतना सस्ता तs अपने देश में नमक भी ना मिलेला। लइकन-बच्चन-मेहरारु के पोषाहार बाजार में बिकाइला की बाद फिर खगिददारी की माध्यम से गांव में पहुंचेला, जहां जानवार के आहार बनि जाला। भूसी, चोकर, खरी- खुद्दी. दाना-चारा की जगह पर पशुपालक अपनी जानवरन के पोषाहार खियावत। पन्द्रह सौ की साड़ी वाली आगंनबाड़ी की येह कमाई से ब्लाक मुख्यालय से लेके जिला स्तर तक के अधिकारी मलाई काटत हवें। का जरुरत बा? अइसन योजना के। जरुरतमन्दन की अइसन सरकारी योजना के बन्द कs देवे के चाहीं। नाहीं तs गीत के मथेला वाली लाइन गड़बडा के गावल जा- “बेचि के पोषाहार, लिपिस्टिक झारत बाड़ी, हाय रे! आगंनबाड़ी।
                                                                                                    एन .डी. देहाती
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