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VMW Team – झांसी की रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाई ने अपने अद्भुत शौर्य और पराक्रम से न सिर्फ अंग्रेजों को नतमस्तक किया बल्कि पूरे विश्व मे भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित किया। रानी लक्ष्मीबाई ने भारतीय इतिहास में वीरता और स्वाभिमान का ऐसा अध्याय जोड़ा है जो सदियों तक देशवासियों को प्रेरित करता रहेगा। ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ अदम्य साहस के साथ बोला गया यह वाक्य बचपन से लेकर अब तक हमारे साथ है . रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को बनारस के एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ. उन्हें मणिकर्णिका नाम दिया गया और घर में मनु कहकर बुलाया गया. 4 बरस की थीं, जब मां गुजर गईं. पिता मोरोपंत तांबे बिठूर जिले के पेशवा के यहां काम करते थे और पेशवा ने उन्हें अपनी बेटी की तरह पाला. प्यार से नाम दिया छबीली . मणिकर्णिका का ब्याह झांसी के महाराजा राजा गंगाधर राव नेवलकर से हुआ और देवी लक्ष्मी पर उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा. बेटे को जन्म दिया, लेकिन 4 माह का होते ही उसका निधन हो गया. राजा गंगाधर ने अपने चचेरे भाई का बच्चा गोद लिया और उसे दामोदार राव नाम दिया गया. ग्वालियर के फूल बाग इलाके में मौजूद उनकी समाधि आज भी मर्दानी की कहानी बयां कर रही है. हम सभी ने लक्ष्मीबाई की कहानी सुनी है, लेकिन सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी कलम के जरिए उनकी जो बहादुरी हमारे सामने रखी, उसकी मिसाल दूसरी कोई नहीं.

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, 

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, 

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। 


चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 


कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, 

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, 

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, 

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।


वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, 

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, 

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, 

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़। 


महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 


हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, 

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, 

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में, 

सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।


चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई, 

किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, 

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई, 

रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।


निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया, 

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया, 

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, 

लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया। 


अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 


अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया, 

व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, 

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया, 

राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया। 


रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 


छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात, 

कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात, 

उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात? 

जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात। 


बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार, 

उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार, 

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार, 

‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’। 


यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान, 

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान, 

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, 

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान। 


हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, 

यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी, 

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी, 

मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी, 


जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम, 

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, 

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम, 

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम। 


लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में, 

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में, 

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में, 

रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में। 


ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, 

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार, 

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार, 

विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार। 


अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी, 

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी, 

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी, 

युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी। 


पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार, 

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार, 

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार, 

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार। 


घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, 

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, 

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, 

हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, 


दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, 

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी, 

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, 

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी। 


तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी, 

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा

स्वतंत्रता अभियान के एक और महान क्रान्तिकारियो में सुभाष चंद्र बोस  का नाम भी आता है, नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रिय सेना का निर्माण किया था. जो विशेषतः “आजाद हिन्द फ़ौज़” के नाम से प्रसिद्ध थी.
“तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा” सुभाष चंद्र बोस का ये प्रसिद्ध नारा था, उन्होंने अपने स्वतंत्रता अभियान में बहुत से प्रेरणादायक भाषण दिये और भारत के लोगो को आज़ादी के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा दी.

जौ के ठेकाने ना, सतुआने के तैयारी – भोजपुरी व्यंग्य -एन डी देहाती

14 अप्रेल 17 के सतुआन ह। अब लखनऊआ , दिल्लिहिया कहि दिहे सतुआन का होला। पुरबिहन से पूछ ल। सतुआन के पुरवर परिभाषा बता दीहें। सतुआ भी एगो संस्कृति ह, सादगी के, समानता के, सहजता के। पुरनिया लोग बहुत पहिले से सतुआन मनावेलन। हमहुँ मनाईलन। लोग जौ बोअल छोड़ दिहल जेकरा चलते सतुआ पर संकट आ गईल बा।
हिन्दू पतरा परम्परा में सौर मास के हिसाब से सुरूज देवता जहिआ कर्क रेखा से दखिन के ओर जाले तहिये मेष संक्राति लागेला। ओहि के सतुआन कहल जाला। एहि दिन से खरमास के भी समाप्ति हो जाला आ रडूहन के शादी विवाह होखल शुरू हो जाला।
जवन असकतिहा सालों साल ना नहात होइहैं उहो सतूआन के दिन जरूर नहा लेलन। एही से कहल गईल- असकतिहन के तीन नहान।
खिचड़ी, फगुआ औ सतुआन।।
सतुआन के बहुत तरह से बनावल जाला, सामान्य रूप से आज के दिन जौ के सत्तू गरीब असहाय के दान करे के प्रचलन बा। आज के दिन लोग स्नान पावन नदी गंगा में करे ला, पूजा आदि के बाद जौ के सत्तू, गुर, कच्चा आम के टिकोरा आदि गरीब असहाय के दान कइल जाला आ इष्ट देवता, ब्रह्मबाबा आदि के चढ़ा के प्रसाद के रूप में ग्रहण कइल जाला। ई काल बोधक पर्व संस्कृति के सचेतना, मानव जीवन के उल्लास आ सामाजिक प्रेम प्रदान करेला। पूर्वांचल में चाहे केहू केतनो अमीर होखे आज के दिन सादगी में मनावे खातिर सतुआ के ही भोग लगायी। गावँ से उजड़त गोनसार( भूजा भुजने का चूल्हा , जो गोंड जाति का परम्परागत पेशा रहा), समहुत में जौ के बुआई, नेवान में जौ के भुनल बालि के परसादी अब दुलम होत बा। भाई हो जौ ना बोआई त सतुआ कहा से आयी। सतुआन के पर्व हमे याद दिलावेला। सतुआ के। सतुआ खातित जौ जरूरी बा। जौ के जय जय कार कईल जा। डॉक्टर की कहला पर ना, अपनों विचार से थोड़ा बहुत जौ बोअल जा।
फेरू कबो भेंट होई त दूसरे टॉपिक पर बतकुचन होई। जय राम जी के।

यात्रा वर्णन द्वारा एम के पाण्डेय निल्को

घड़ी में करीब सुबह के सात बज रहे थे, डैडी को सिद्धेश उर्फ़ यश के स्कूल में मीटिंग में शामिल होने जाना था तभी उनकी नज़र बालकनी से रोड पर खड़ी अपनी कार पर गई । उन्होंने कहा की, मधुलेश कार बहुत गन्दी हो गई है इतना सुनते ही मधुलेश बाल्टी और मग उठाये और छत से नीचे आ गए । पानी से भरी बाल्टी पूरे मोहल्ले की नज़र में थी कारण एक मात्र की मोहल्ले में कई दिन से पानी कम आ रहा था और मैं इस समय अपनी कार साफ कर रहा था । तभी मंदिर से गुड्डू चाचा लौट रहे थे। अभिवादन हुआ फिर उन्होंने मथुरा जाने का प्रोग्राम बनाया , बोला की कल एकादशी है चलते है गोवर्धन पर्वत की प्रक्रिमा करने । ऑफिस जाना है , बहुत काम है ये दलीले पेश हुई किन्तु उस मुरली वाले के आगे किसकी चलती है । प्रोग्राम फिक्स हो गया मैंने बोला की मैं ऑफिस से 1 बजे आ जाऊँगा। 3 बजे करीब ट्रेन थी बिना आरक्षण की यात्रा करनी थी , मन में संदेह था की सीट मिलेगी या नहीं किन्तु दिल ने कहा देखा जायेगा । ऑफिस में जल्दी जल्दी काम निपटा रहा था तब तक गुड्डू चाचा का फोन बजा बोले की 1 बजे घर आ जाना , स्टेशन भी टाइम पर जाना है । मैंने भी उत्साह पूर्वक बोला की ठीक है ।
एक बज कर 10 मिनट पर मैं अपने घर पर था । सामान पैक और चलने को मन बेकरार । 2 बजते है गुड्डू चाचा शुभम के साथ आये और बोले की नीलेश नहीं चलेगा क्या? नीलेश स्कूल से 2 बजकर 20 मिनट तक घर आता है , इंतज़ार करते तब तक लेट हो जाती । हम तीन लोग घर से निकल पड़े । पेलटफ़ॉर्म पर ट्रेन का इंतज़ार तभी फोन की घंटी बजती है और डैडी कहते है की ट्रेन कब तक आएगी समय है तो बताओ नीलेश भी जायेगा । मैंने भी कहा की अभी लगभग एक घंटा है । थोड़ी ही देर में नीलेश को लेकर डैडी स्टेशन आ गए , मैं उसे लेने के लिए पेलटफ़ॉर्म से बाहर आया और उसे उस जगह पर ले आया जहा गुड्डू चाचा और शुभम खड़े थे ।
जयपुर जंक्शन का पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 , खचाखच लोगो की भीड़ ट्रेन में और पेलटफ़ॉर्म पर , सब लोग एक उम्मीद से आती हुई जयपुर इलाहाबाद एक्सप्रेस को देख रहे है , तभी कान के पास चाय वाला बोलता है – चाय चाय गरमा गर्म चाय । पारा वैसे ही गर्म हो रहा है, जयपुर का तापमान वैसे ही 42 है ऊपर से लोगो भी भीड़ उसमे चार चाँद लगा रही है । जैसे ही ट्रेन पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 पर रूकती है सवारिया उतरने और चढ़ने के लिए कोशिश कर रहे है वही पर मैं भी गेट पर हाथ लगा कर नीलेश और शुभम को आगे आने के लिए बुला रहा हूँ । दोनों बालक ट्रेन में बड़ी ही मुश्किल से चढ़ते है और पहले ही सीट पर कब्ज़ा।
चार लोग एक सीट जायज है किन्तु यदि डिब्बा अनारक्षित हो तो ये ठीक नहीं । इसी नियम को पालन करते हुए एक और महिला जो की एक 3 वर्षीय बच्ची के साथ अकेले यात्रा कर रही थी उसको जगह दी माफ़ी चाहूँगा जगह दी नहीं , जगह बनाई । बैठने के लगभग 40 मिनट बाद ट्रेन चली और 5 मिनट में ही दूसरा स्टेशन आ गया जिसका नाम है गांधी नगर जयपुर । भीड़ अपने आप में ही सब कुछ बया कर रही थी फिर भी जनता आज रिकॉर्ड तोड़ने के मूड में दिख रही थी । जैसे तैसे ट्रेन चली , कुछ खड़े, कुछ अड़े और कुछ है बैठे । छोटे छोटे कई स्टेशन निकल रहे थे , ट्रेन अपनी अधितम रफ़्तार में थी । गरमा गर्म हवा मुझे और भी गर्म कर रहा था , मन तो कविता लिखने का था किन्तु शांत वातावरण मिला ही नहीं और कविता गिर गई ठन्डे बस्ते में । दौसा स्टेशन आया , प्यास बढ़ रही थी पर पेलटफ़ॉर्म दूसरी तरफ आया कोई बेचने वाला भी नहीं आया , मन को मनाया की थोड़ी देर रुके  और वो मान भी गया , ट्रेन चल दी भीड़ और बढ़ गई।
मैं  बैठ के बोर हो रहा था तभी दिमाग की बत्ती जली और जेब से अपना स्मार्ट फोन निकाला और बैठे बैठे ही लिखने लगा यात्रा वर्णन । ट्रेन बांदीकुई पहुँच रही है कुछ लोग उतर रहे है कुछ उलटी साइड से चढ़ रहे है । पानी आया , सभी अपनी अपनी प्यास बुझाए । एक छोटा बालक पानी की ज़िद करने लगा किन्तु उसकी दादी के पास पानी नहीं था उस समय । बच्चा कई बार पानी के लिए बोला , रोने की शक्ल भी बनाई । जब ये बात गुड्डू चाचा सुने तो उसे अपनी बोतल दिलवाई जिसमे थोडा पानी बचा था बच्चा आव देखा न ताव मुँह लगाया और पानी ……..गले के नीचे जैसे ही पानी उतरी उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी । ट्रेन में सब लोग बैठने और बैठाने की बात कर रहे है किन्तु ये ठोस कदम उठाये कौन ?
एक सज्जन ऊपर की सीट पर बैठने की ज़िद करने लगे । लाख मना करने पर भी नहीं माने कोशिश की ऊपर चढ़ने की , सफल भी हुए पर एक दो मिनट के लिए ही । पैर फिसल रहा था उनका पर मेरा दिल धड़क रहा था की कही वो मेरे ऊपर न गिर जाये । उनके दिल तक मेरी बात पहुची और वो पूरे 5 मिनट में  नीचे उतर आये । ट्रेन अलवर पहुँच रही थी , मुझे अपना इतिहास याद आ रहा था , आखिर राजस्थान की शुरुआत मैंने यही से की थी । बहुत ही मनोरम और ऐतिहासिक जगह है अलग । महाभारत के कई किस्से यहाँ की माटी में मिलते है । हसन खा मेवात नगर , जैन साहब का मकान, कैलाश पब्लिक स्कूल सब कुछ याद आ रहा था , मन रोम रोम खिल रहा था । तभी अचानक से नज़र दूसरी सीट पर बैठे दो आदमी पर पड़ी उम्र से वो नवयुवक लग रहे थे किन्तु बात वो धर्म की कहानियो पर कह रहे थे , कुछ पुरानी कहानी सुना रहे थे । बगल वाली सीट पर कुछ महिलाये भजन कीर्तन कर रही थी वो भी इस भीड़ में । उनकी इस ईश्वरी प्रेम को मैं प्रणाम करता हूँ जिस पर भीड़ का कोई भी असर नहीं पड़ रहा था ।
एम के पाण्डेय निल्को

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को VMW Team का खुला पत्र

सेवा में ,
        माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी,
              प्रधानमंत्री ,
              भारत सरकार ,
                         नई दिल्ली

विषय- भारत में आरक्षण को   समाप्त किये जाने एवं पदोन्नति में आरक्षण हेतु 117वें संबिधान संशोधन बिल को निरस्त किये जाने विषयक |

  माननीय महोदय ,
      सौभाग्य की बात है कि बहुत समय बाद भारत में आपके कुशल नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की केन्द्रीय सरकार विद्यमान है।
आपके मेक इन इंडिया , स्वच्छता अभियान व नोट बंदी जैसी कई योजनाओं का हम ह्रदय से पूर्ण समर्थन करते हैं ।
*माननीय महोदय* ,
जैसा कि आप जानते हैं कि समाज के पिछडे वर्गों के लिये संविधान में मात्र *दस वर्षों के लिये आरक्षण* की व्यवस्था की गयी थी, किन्तु जातिवादी व निहित कारणों से जाति आधारित आरक्षण की अवधि व क्रीमीलेयर की सीमा को बारंबार बिना समीचीन समीक्षा के बढाया जाता रहा है ,
जिसे कि 10–  10 वर्ष करते करते आज 67 वर्ष पूरे हो गए हैं ।
*आज तक ऐसे आरक्षण प्राप्त डॉक्टर, इंजीनियर , प्रोफेसर , शिक्षक, कर्मचारी किसी ने नहीं कहा कि अब वह दलित या पिछड़ा नहीं रहा व अब उसे जातिगत आरक्षण की जरुरत नहीं है।*
  *इससे सिद्ध होता है कि आरक्षण का आधार पिछड़ा वर्ग या समूह के बजाय जाति किये जाने से इन 67 सालों में कोई लाभ नहीं हुआ है।*
महोदय ,
*इस जाति आरक्षण का लाभ जहां कुछ खास लोग परिवार समेत पीढी दर पीढी लेते जा रहें हैं वहीं वे इसे निम्नतम स्तर वाले अपने ही जरूरतमंदों लोगों तक भी नहीं पहुंचने दे रहे हैं। अन्यथा इन 67 वर्षों में हर आरक्षित वर्ग के व्यक्ति तक इसका लाभ पहुँच चुका होता।*
*ऐसे तबके को वे केवल अपने बार बार लाभ हेतु संख्या या गिनती तक ही सीमित कर दे रहे हैं।*
महोदय,
*गरीबी जाती देखकर नहीं आती*
*आरक्षण का आधार जाति किये जाने से जहाँ सामान्य वर्ग के तमाम निर्धन व जरूरतमंद युवा बेरोजगार व हतोत्साहित हैं , कर्मचारी कुंठित व उत्साहहीन हो रहे हैं,*
*वहीं समाज में जातिवाद का जहर बड़ी तेज़ी से बढ़ता जा रहा है।*
  अत: आपसे निवेदन है कि राष्ट्र के समुत्थान व विकास के लिये संविधान में संशोधन करते हुये आरक्षण को समाप्त करने का कष्ट करेंगे ।
किसी भी जाति – धर्म के असल जरूरतमंद निर्धन व्यक्ति को *आरक्षण नहीं बल्कि संरक्षण* देना सरकार को   सुनिश्चित करना चाहिए ।

*आरक्षण को पूर्ण रूप से समाप्त करने से पहले अगर वंचित वर्ग तक इसका ईमानदारी से वास्तव में सरकार लाभ पहुँचाना चाहती है तो इस आरक्षण को एक परिवार से एक ही व्यक्ति , केवल बिना विशेष योग्यता / कार्यकुशलता वाली समूह ग व घ की नौकरियों में मूल नियुक्ति के समय ही दिया जा सकता है।*

*आयकर की सीमा में आने वाले व्यक्ति के परिवार को आरक्षण से वंचित किया जाना चाहिये ताकि राष्ट्र के बहुमूल्य संसाधनों का सदुपयोग सुनिश्चित हो सके।*

*पदोन्नति में आरक्षण तो पूर्णत: बंद कराया ही जाना चाहिये जिससे कि योग्यता, कार्यकुशलता व वरिष्ठता का निरादर न हो।*

   आशा है कि महोदय राष्ट्र व आमजन के हित में इन सुझावों पर ध्यान देते हुये समुचित कार्यवाही करने व इस हेतु जन जागरण अभियान प्रारंभ कर मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने  का कष्ट करेंगे |

🙏 *विशेष निवेदन /आग्रह*🙏
*जन जागृति* के लिए आपको सिर्फ 10 लोगो को ये मेसेज फॉरवर्ड करना है और वो 10 लोग भी दूसरे 10 लोगों को ये मेसेज करें ।
इस प्रकार
1 = 10 लोग
यह 10 लोग अन्य 10 लोगों को मेसेज करेंगे
इस प्रकार :-
10 x10 = 100
100×10=1000
1000×10=10000
10000×10=100000
100000×10=1000000
1000000×10=10000000
10000000×10=100000000
100000000×10=1000000000
                            (100 करोड़ )
बस आपको तो एक कड़ी जोड़नी है देखते ही देखते सिर्फ आठ steps में पूरा देश जुड़ जायेगा।

मन की बात – एम के पाण्डेय निल्को

हम में से ज्यादातर लोगों का कोई टाईम टेबल नहीं होता, जब मन किया पढने बैठ जाते हैं, जो मन किया किताब उठा लेते हैं और पढने लगते हैं, कोई भी टॉपिक बीच से ही पढ्ने लग जाते हैं, इससे सिवाय confusion के कुछ हाथ नहीं लगता हमें ये तक पता नहीं रहता कि हमने कौन सा विषय कितना पढ लिया है, और लोग बेवजह ही अपनी meomory को दोष देते हैं, एक बेहतर रणनीति ही बेहतर जीत दिला सकती है, और रणनीति का पहला हिस्सा जो कि यहाँ पर टाईम टेबल है, यदि यह कमजोर है तो आप जीत की आशा कैसे कर सकते हैं, तो बेहतर सफलता के लिये एक बेहतर टाईम टेबल बनाईये

एम के पाण्डेय निल्को
ब्लॉगर

हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।

भारत देश एक बहुभाषी राष्ट्र है। जहाँ अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा के अतिरिक्त अनेक प्रकार की भारतीय भाषाएँ , उपभाषाएँ , आंचलिक भाषाएँ , बोलियाँ ,उपबोलियाँ आदि बोली जाती हैं। इन भाषाओं में हिंदी एकता की कड़ी है।  हमारे सन्तों, समाज सुधारकों और राष्ट्रनायकों ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिंदी को अपनाया।  क्योंकि यही एक भाषा है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक और राजस्थान से असम तक समान रूप से समझी जाती है।  हिंदी ही एकमात्र भाषा है जो समस्त भारतीय को एकता के सूत्र में जोड़ने का कार्य सम्पन्न करती है।   हिंदी सहज , सरल एवं वैज्ञानिक भाषा है ,जिसने बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के उदारता का परिचय देते हुए अपनी वैज्ञानिकता को क्षति पहुँचाए बिना सहज ही समस्त विदेशी , देशी , आगत ,तत्सम आदि शब्दों को अपने भीतर सुगंध की तरह समा लिया है।  हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। सरलता से कहें तो हिन्दी उस माँ की तरह है जो अपने पुत्र के मित्रों को भी वही स्नेह और सम्मान देती है। वह अपने – पराये का भेद नहीं करती। वर्तमान युग हिंदी मीडिया का युग है।  हिंदी भाषा का निर्माण और आगे बढ़ाने का कार्य मीडिया ने किया है। इंटरनेट और मोबाइल ने हिंदी को और विस्तार दिया, हिंदी में संप्रेषण की ताकत है।  हिंदी यूनिकोड हुई तो ब्लॉगगिंग में बहार आ गई।  चिट्ठा लिखनेवालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई।  गूगल का मोबाइल और वेब विज्ञापन नेटवर्क एडसेंस हिंदी को सपोर्ट कर रहा है।  इंटरनेट पर 15 से ज्याद हिंदी सर्च इंजन मौजूद हैं।  सोशल साइट में हिंदी छाई हुई है।  21फीसदी भारतीय हिंदी में इंटरनेट का उपयोग करते हैं।हिंदी राजभाषा के बाद अब वैश्विक भाषा बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है। डिजिटल दुनिया में हिंदी की मांग अंग्रेजी की तुलना में पाँच गुना तेज है।  हिंदी मातृभाषा और राजभाषा से एक नई वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी बदल रही है। वह नई प्रौद्योगिकी, वैश्विक विपणन तंत्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा बन रही है। आज मोबाइल की पहुँच ने गाँव-गाँव के कोने-कोने में संवाद और संपर्क को आसान बना दिया है।  इस वजह से बाजार में आ रहे नित नवीन मोबाइल उपकरण हर सुविधा हिंदी में देने के लिए बाध्य हैं। हिंदी की इस समृद्ध, शक्ति और प्रसार पर किसी भी हिंदी भाषी को गर्व हो सकता है।  हिन्दी की शुद्धता को लेकर तर्क दिए जाएँ परन्तु कोई ये बताये कि नई पीढ़ी शुद्ध व्याकरण वाली हिन्दी सीखे कहाँ से ? अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं सरकारी पाठशालाओं की स्थिति जग जाहिर है। जो हिन्दी के ज्ञाता हैं वे अधिकांशतः लेखन आदि कार्य से जुड़े हुए हैं ।  कुशल शिक्षकों के अभाव में बताइये भला किस मार्ग से आप शुद्ध हिन्दी प्रचारित – प्रसारित करेंगे? दूरसंचार के समस्त माध्यमों ने वैसे भी भाषा की एक नई परिभाषा गढ़ दी है।
प्रत्येक भाषा में अन्य भाषा के शब्द शुद्ध व विकृत रूप में आ गए हैं जिन्हें उनकी सरलता और बोधगम्यता के कारण अपना लिया गया है। अब हमारे पास पीछे मुढ़कर देखने का समय नहीं है। यदि हम चाहते हैं हिन्दी भाषा आगे बढे तो ख़ुशी-ख़ुशी उसे अपने अंदर सहजता से आये दूसरी भाषा के शब्दों के साथ आगे बढ़ने देना चाहिए उसके मार्ग में अनावश्यक रुकावट नहीं डालना चाहिए। अधिक से अधिक युवाओं को हिन्दी भाषा से जोड़ने के लिये और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने के लिये हमें कूपमंडूकता से ऊपर उठना ही होगा। इससे न हिन्दी भाषा की प्रगति रुकेगी और न विकास। बल्कि इस कदम से ये अंतर्राष्ट्रीय महत्तव की भाषा हो जाएगी। संसार में ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती है। जो लोग हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों विशेषकर अंग्रेजी से नाखुश हैं मैं हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए पूछना चाहूँगा क्या उनके पुत्र – पुत्री हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं  क्या उनकी संतति भी उनकी तरह भाषा शुद्धता अभियान को आगे बढ़ा पायेगी ? अपवाद छोड़ दिए जाएँ तो उत्तर सबको पता है। जब सब कुछ देश काल वातावरण की बाध्यता है तो फिर हिन्दी की शुद्धिकरण की तटस्थता को त्याग यहाँ भी उदार होना ही पड़ेगा।
वैश्वीकरण का दौर है। हिंदी के समक्ष भी बहुत अधिक चुनौतियाँ हैं। आज उसे फ़ैलाने से ज्यादा बनाये रखना आवश्यक है और ये कोई बहुत आसान कार्य नहीं है। जब लाखों शब्दों को बाहर से लेने पर भी अंग्रेजी का स्वरुप बिगड़ने के स्थान पर दिन ब दिन बढ़ रहा है तो हम हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों को लेकर क्यों विचलित हो रहे हैं ? डर रहे हैं ? अंग्रेजी ने शायद ही कोई भाषा हो जिससे कुछ न कुछ लिया ना हो। इस तरह तो हम हिंदी का समस्त क्षेत्रीय भाषाओं से भी वैमनस्य बढ़ा देंगे। यदि हिंदी को बाजारीकरण से परे भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से ज़माना है तो अन्य भाषा के शब्दों को जो सहज ही आते चले जा रहे हैं उनको तिरस्कृत करने से बचना होगा। अकेला चलो की नीति छोड़नी होगी , नहीं तो हिंदी को सिमटने में देर नहीं लगेगी।

एम के पाण्डेय ‘निल्को’
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