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रुद्रपुर – भगवान रुद्र की दूसरी काशी – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

भारत में वैसे तो अनेकानेक मंदिर शिवालय हैं परन्तु उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर में 11वीं सदी में अष्टकोण में बने प्रसिद्ध दुग्धेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी अनूठी विशेषता के लिए विश्वविख्यात है। यहां शिवलिंग जमीन से अपने आप निकला था। इस शिवलिंग का आधार कहां तक है इसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग की लम्बाई पाताल तक है। देवरिया जनपद मुख्यालय से लगभग बीस किमी दूर स्थित रुद्रपुर नगरी को काशी का दर्जा प्राप्त है। यहां भगवान शिव, दुग्धेश्वरनाथ के नाम से जाने जाते है। इस मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त ईट बौद्ध कालीन है। इस क्षेत्र की जनता जनार्दन इनको बाबा दुधनाथ के नाम से भी पुकारती है । उप ज्योतिर्लिंगों की स्थापना के संबंध में पद्म पुराण की निम्न पंक्तियां उल्लिखित हैं- 
खड़ग धारद दक्षिण तस्तीर्ण दुग्धेश्वरमिति ख्याति सर्वपाप:,
 प्राणाशकम यत्र स्नान च दानं च जप: 
पूजा तपस्या सर्वे मक्षयंता यान्ति दुग्धतीर्थ प्रभावत:। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल दधीचि व गर्ग आदि ऋषि-मुनियों की तपस्थली भी है। इतिहास की माने तो रुद्रपुर में रुद्रसेन नामक राजा का किला था और इसी कारण यह रुद्रपुर कहलाया पर मेरे विचार से भगवान रुद्र (शिव) की पुरी (नगरी) होने के कारण इसका नाम रुद्रपुर पड़ा होगा । महाशिवरात्रि के दिन एवं श्रावण मास में यहां भारी भीड़ होती है। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव, ॐ नम: शिवाय और बाबा भोलेनाथ की जयकारों से गुंजायमान रहता है। जनश्रुतियों के अनुसार, मंदिर बनने से पहले यहां घना जंगल था। बताते है कि उस समय दिन में गाय, भैंस चराने के लिए कुछ लोग आया करते थे। आज जहां शिवलिंग है, वहां नित्य प्रतिदिन एक गाय प्राय: आकर खड़ी हो जाती थी तथा उसके थन से अपने आप वहां दूध गिरना शुरू हो जाता था। इस बात की जानकारी धीरे-धीरे तत्कालीन रुद्रपुर नरेश हरी सिंह के कानों तक पहुंची तो उन्होंने वहां खुदाई करवाई। खुदाई में शिवलिंग निकला। राजा ने सोचा कि इस घने जंगल से शिवलिंग को निकाल कर अपने महल के आस-पास मंदिर बनवाकर इसकी स्थापना की जाए।  कहा जाता है कि जैसे-जैसे मजदूर शिवलिंग निकालने के लिए खुदाई करते जाते वैसे-वैसे जमीन में धंसता चला जाता। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। शिवलिंग तो नहीं निकला वहां एक कुआं जरूर बन गया। सोमनाथ के अतिरिक्त सामान्य धरातल से नीचे का शिवलिंग भारत में संभवत: अन्यत्र कहीं नहीं है। बाद में राजा को भगवान शंकर ने स्वप्न में वहीं पर मंदिर स्थापना करने का आदेश दिया। भगवान के आदेश के बाद राजा ने वहां धूमधाम से काशी के विद्धान पंडितों को बुलवाकर भगवान शंकर के इस लिंग की विधिवत स्थापना करवाई। जब तक वह जीवित रहे, भगवान दुग्धेश्वरनाथ की पूजा-अर्चना और श्रावण मास में मेला आयोजित करवाते थे। मंदिर में आज भी भक्तों को लिंग स्पर्श के लिए 14 सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। यहां भगवान का लिंग सदैव भक्तों के दूध और जल के चढ़ावे में डूबा रहता है। कहा जाता है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी जब भारत की यात्रा की थी तब वह देवरिया के रुद्रपुर में भी आए थे। उस समय मंदिर की विशालता एवं धार्मिक महत्व को देखते हुए उन्होंने चीनी भाषा में मंदिर परिसर में ही एक स्थान पर दीवार पर कुछ चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित थी, जो आज भी अस्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है। 

एम के पाण्डेय निल्को

 


अंतरराष्ट्रीय कराटे मे पूर्वाञ्चल का प्रतिनिधितव करेगा मास्टर सिद्धेश

अंतरराष्ट्रीय कराटे मे खेलेगा, देवरिया का सिद्धेश
6 देशो के खिलाड़ी लेगे हिस्सा,पूर्वाञ्चल का प्रतिनिधितव करेगा मास्टर सिद्धेश
जयपुर में 22 जुलाई से 24 जुलाई तक होने वाली पहली अंतरराष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता में देवरिया का सिद्धेश भाग लेगा। प्रतियोगिता में 6 देशों की कराटे टीम भाग लेंगी। पूर्वाञ्चल से एक मात्र खिलाड़ी सिद्धेश है । इससे पहले मई मे भी राज्यस्त्रीय प्रतियोगिता मे सिल्वर मैडल के साथ सिद्धेश ने किया था देवरिया का नाम रौशन । इंडियनमार्शल आर्ट संस्थान के बैनर तले जयपुर में अंतरराष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा है। शुक्रवार से आयोजित होने वाली इस प्रतियोगिता में भारत सहित छह देश हिस्सा ले रहे हैं। 24 जुलाई तक चलने वाली इस प्रतियोगिता में करीब 1100 बच्चे हिस्सा लेंगे। उद्घाटन भारतीय कॉमनवेल्थ चयनकर्ता अजय कुमार शेट्टी करेंगे। प्रतियोगिता में 5 से 18 साल तक के बच्चे हिस्सा लेंगे। पहले भारत के 19 राज्यों के खिलाड़ियों के बीच प्रतियोगिता होगी। इसके आधार पर भारतीय टीम का चयन होगा। यह टीम श्रीलंका, बंगलादेश, भूटान, नेपाल और अफगानिस्तान के खिलाड़ियों को चुनौती देगी। 
किस देश से कितने खिलाड़ी 
नेपाल45 
अफगानिस्तान 33 
बंगलादेश 07 
श्रीलंका 17 
भूटान 09 
भारत 24 

इस ज़माने में जब ढूढने निकला – योगेश पाण्डेय

माना की थोड़ी देर से आया हूँ
नाराज होने का गम भी मैं पाया हूँ
आज उसके शहर में अजनबियों की तरह
पता पूछने की भीड़ में शामिल हूँ
सही पता सही लोग
इस ज़माने में जब ढूढने निकला
पता चला की गलत लेके पता मैं भी निकला
उसके बनने सवरने के याद में मैं आया हूँ
पर उसके नाराज़ होने का गम भी मैं पाया हूँ
उसकी निगाहे जब भी मुझे देखती है
दुविधा की लाइन में सबसे पहले आया हूँ
उसके जुल्फों की तारीफ में
कविता की लाइन उड़ जाया करती है
उसको समेटने की भीड़ में मैं खुद को पाया हूँ
उसके साथ जब घुमने निकला
उसके आगे ही खुद को पाया हूँ
उसकी झील सी आँखों में
खुद को तैरता हुवा पाया हूँ
जब प्यार से योगेश मैं देखता हूँ
कविता की हर एक लाइन उसमें पाया हूँ
फुर्सत में लिखुगा उसके बारे
अभी छुट्टिया मनाने अपने गाँव आया हूँ
शहर की कोई याद नहीं यहाँ
हर जगह सुकून ही यहाँ पाया हूँ
गाँव की गोरी कहु या शहर की तितली
उसकी आँखों में प्यार ही पाया हूँ

योगेश पाण्डेय
(योगेश की युग से साभार)

देवरिया जिले में नया मीडिया मंच के बैनर तले नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी, सतीश मिश्रा, एन डी देहाती , डॉ सौरभ मालवीय, राजीव कुमार यादव और जय प्रकाश पाठक को मोती बी.ए नया मीडिया सम्मान से सम्मानित किया गया

देवरिया संगोष्ठी की कथा-गाथा : प्रारंभ से प्रारब्ध तक : कुछ सीखा, कुछ सिखा गए…

(पूरे कार्यक्रम की शुरुआत से अंत तक शिवानन्द द्विवेदी सहर की नजर से ये रिपोर्ट)

17 नवंबर को दिल्ली के कॉफी हाउस दिल्ली में कुछ लोग यूँ ही बैठ लिए और तय कर लिए कि आगामी २१ दिसंबर को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में नया मीडिया मंच के बैनर तले नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा. हालाकि इससे पहले अनौपचारिक तौर पर एक बार इसी मुद्दे पर प्रवीन शुक्ल, संजीव सिन्हा, सौरभ मालवीय और मै पहले भी बैठ चुके थे. लेकिन इस बैठक में सर्व सम्मति से कार्यक्रम के संयोजक के तौर पर प्रवीण शुक्ल पृथक एवं सह-संयोजक के तौर पर शिवानन्द द्विवेदी सहर (यानी मेरा) नाम तय किया गया.

बैठक में कार्यक्रम के संरक्षक के तौर पर डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी का नाम प्रस्तावित किया गया जिसे सभी लोगों ने मान लिया. बैठक में सबकुछ तय होने के बाद अब नया मीडिया एवं सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार-प्रसार की शुरुआत मैंने अपने फेसबुक वाल से शुरू की. तमाम लोग जो शुरू में कार्यक्रम की योजना से उत्साहित होकर कॉफी हाउस की बैठक में आयोजन के साथ जुड़े, अंत तक जुड़े रहे. तमाम ऐसे भी लोग थे जो जुड़े तो जोश के साथ लेकिन मझधार में अपनी मजबूरियों की भेंट चढ़ते हुए अलग  हो गए. सवाल अतिथितियों का था, सों दिल्ली से मै आगे आया और चर्चा बढ़ाया.

अतिथि वक्ता के तौर पर श्री अमिताभ ठाकुर (आईजी), प्रो. रामदेव शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार श्री शंभूनाथ शुक्ल, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री पंकज झा, श्री संजीव सिन्हा, श्री यशवंत सिंह से आने का अनुरोध खुद मैंने किया. वहीँ भोपाल से डॉ श्रीकांत सिंह का प्रोग्राम डॉ सौरभ मालवीय ने तय कराया. हालाकि इनसे भी मेरी बात हुई थी. देवरिया की माटी से जुड़े पाँच गणमान्यो को सम्मानित कराये जाने की योजना कॉफी हाउस बैठक में तय हुई थी सों तमाम लोगों से पूछ कर, जांच कर श्री संजय मिश्र (दैनिक जागरण), डॉ जय प्रकाश पाठक, श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती (सहारा), डॉ सौरभ मालवीय, श्री राजीव यादव (हिन्दुस्तान) के नामों का चयन किया गया था. चयनित नामो की घोषणा भी की गयी बाद में.

इस कार्यक्रम को लेकर मेरा सुझाव था कि यह कार्यक्रम बिना प्रायोजक के किया जाय और क्षेत्रीय लोगों से चंदा इकठ्ठा करके किया जाय. कई लोग इस फार्मूले को नकार भी दिये थे लेकिन मैं कायम रहा. धन जुटाना वो भी दिल्ली में बैठकर देवरिया के लोगों से, किसी लोहे चने चबाने से कम न तब था और न आज है, ये बात मैं हाल ही में मिले निजी अनुभव के आधार पर लिख रहा हूँ. खैर, मैं इसी फार्मूले पर चला. मैंने धन जुटाने के लिए तमाम लोगों से संपर्क किया और तमाम लोगों ने स्वीकृति भी. ये अलग बात है कि कार्यक्रम के दिन ११ बजे तक मेरे हाथ में किसी भी स्थानीय द्वारा जुटाया गया एक रुपया भी नहीं आया था.

इस दौरान दिल्ली में रहकर मैंने निजी प्रयास किया था जिसमें सिंगापुर से चुन्नू सिंगापुरी जी द्वारा तीन हजार और आशुतोष कुमार द्वारा एक हजार, मतलब चार हजार का सहयोग मिल सका था. लेकिन बताना चाहूँगा कि मेरे स्थिति को कुछ अतिथि भांप गए थे जिसमे श्री पंकज झा और श्री पंकज चतुर्वेदी, भाई आशुतोष सिंह सहित डॉ धीरेन्द्र मिश्र एवं अलका सिंह जी का नाम ले रहा हूँ. श्री पंकज झा जी ने अपने खर्चे से आने का वादा कर मुझे राहत दिया तो वहीँ पंकज चतुर्वेदी जी ने अपना टिकट खुद कराया (मेरे द्वारा कराया गया टिकट कैंसल कराकर). तमाम उतार-चढाव के साथ कार्यक्रम की तारीख नजदीक आई और १८ की शाम वैशाली से मैं निकल गया देवरिया के लिए. बताता चलूँ कि देवरिया में सतह पर जो लोग इस आयोजन के लिए लगे हुए थे उनमे श्री रामकुमार सिंह (दैनिक जागरण), विद्यानंद पाण्डेय, श्री दिलीप मल्ल, रामदास मिश्र, संतोष उपाध्याय, अभिनव पाठक,कपीन्द्र मिश्र, राहुल तिवारी, आदर्श तिवारी, श्री नवनीत मालवीय सहित तमाम अन्य लोगों के नाम प्रमुख हैं. इनके सहयोग से कार्यक्रम अपनी सफलता तक पहुंचा.

खैर, वो तारीख भी आई जब मैं १९ तारीख को देवरिया पहुंचा. स्टेशन उतरते ही वहाँ रामकुमार सिंह और विद्द्यानंद पाण्डेय अपनी बोलेरो और आदर्श अपनी बाइक लेकर आये थे. रामकुमार सिंह और विद्यानंद के साथ मिलकर मैंने कार्यक्रम से सम्बन्धी होटल-अतिथि आवास, फुल-माला, माइक-साउंड, फोटो-फ्रेमिंग, आदि का ऑर्डर किया. स्मृति-चिन्ह और बैनर तो मैं खुद दिल्ली से ले गया था. अंतिम लड़ाई २० तारीख की सुबह की थी. बीस की सुबह मै अकेला ही घर से निकला लेकिन तभी आदर्श भी साथ आ लिए. हम लोग निमंत्रण-पत्र वितरण से लेकर, दो सौ लोगों के नाश्ते पानी तक के इन्तजामो में लग गए (बता दूँ कि अभी तक कुछ भी हुआ नहीं था). शाम तक बिना रुके काम करने के बाद ये भी हो गया.

अब मेरा ध्यान दिल्ली की तरफ गया. शाम ४:५० पर दिल्ली स्टेशन से पूर्बिया एक्सप्रेस में शंभूनाथ जी, पंकज चतुर्वेदी जी, पृथक जी, धीरेन्द्र जी, उमेश जी, यशवंत जी, जनार्दन जी, अलका जी, संजीव जी, उमेश चतुर्वेदी जी का टिकट था. कुल आठ अतिथियों का आगमन एक ही ट्रेन से दिल्ली से होना था. हालाकि पंकज झा जी और डॉ श्रीकांत सिंह जी एकदिन पूर्व ही देवरिया एवं गोरखपुर पहुच चुके थे. अपने दो महत्वपूर्ण अतिथियों की उपस्थिति मेरे आत्मबल को बढ़ा रही थी. शाम चार बजे के बाद उमेश चतुर्वेदी जी का फोन आता है कि यह ट्रेन कई घंटे लेट हो सकती है और फिलहाल दो घंटे लेट है.

यह खबर मेरे माथे के बल पहाड़ का भार लेकर पडी. पूरे कार्यक्रम के लगभग सभी अतिथि उसी ट्रेन से आने वाले थे. पृथक जी और शंभूनाथ जी स्टेशन पहुंचे फिर पंकज चतुर्वेदी जी और अलका सिंह जी पहुंचे. धीरेन्द्र मिश्र का फोन आया कि वो भी स्टेशन पहुंच चुके हैं. यहाँ दिल्ली से सबके फोन आने शुरू हुए और मेरी धड़कनें बढ़नी शुरू हुई. ऐसा होना लाजिमी था क्योंकि कल कार्यक्रम और आज अतिथियों का आना ही संशय में. इसके अलावा कई सूत्रों से यह खबर भी आ रही थी कि देवरिया के तमाम पत्रकार संगठनों द्वारा इस कार्यक्रम का बहिष्कार भी किया गया है. इस बहिष्कार की वजह मेरी समझ से बाहर थी लेकिन लोगों की माने तो शायद यही वजह थी कि उनके जमे-जमाये मठ में यह शिवानन्द सहर और नया मीडिया मंच जैसी चीजें उनकी इजाजत के बिना कैसे आ गयी हैं.

मैं कार्यक्रम में आने का निमंत्रण देने के लिए जिलाधिकारी देवरिया श्री मनिप्रसाद मिश्र से रात आठ बजे मिला. हालाकि वो कार्यक्रम में जाने क्यों स्वीकृति के बावजूद नहीं आये. जिलाधिकारी महोदय के न आने की बात एक दिन पहले ही मुझे तब स्थानीय लोग बता दिये थे जब मैं उनसे (जिलाधिकारी) निमंत्रण के लिए मिलने जा रहा था. लोगों ने मुझसे कहा कि जिलाधिकारी महोदय को तमाम लोगों ने कार्यक्रम के खिलाफ समझा दिया है, अत: वो नहीं आयेंगे. हालांकि मुझे आज भी इस पर व्यक्तिगत रूप से विश्वास नहीं है. जिलाधिकारी से मिलकर आठ सवा आठ बजे बाहर निकला तो सूचना मिली कि श्री शंभूनाथ शुक्ल, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री प्रवीण शुक्ल (संयोजक) ट्रेन छोड़कर घर लौट गए हैं और अलका सिंह, धीरेन्द्र मिश्र, यशवंत सिंह ट्रेन में बैठ गए हैं.

हालात ऐसे थे के किसी को भी मैं जबरन आने को कह नहीं सकता था और उनके नहीं आने की स्थिति में यहाँ रातो-रात कोई विकल्प भी नहीं खड़ा कर सकता था. खैर, हालाकि मुझे इस बात की संतुष्टि जरूर थी कि वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल और पंकज चतुर्वेदी सरीखे लोग मेरे कहने पर कम से कम चार घंटे से ज्यादा स्टेशन पर तो खड़े रहे. वाकई मैं इसके लिए उनका आभार व्यक्त करूँगा कि वो तब तक स्टेशन पर जमे रहे जब तक ट्रेन के समय से देवरिया पहुंचने की अंतिम उम्मीद बनी रही. इस मामले में संजीव सिन्हा बहुत निराश किये. चार बजे उन्होंने आने की पुष्टि की और साढ़े चार बजे उनका फोन आता है कि उन्हें छुट्टी नहीं मिल रही और प्रभात झा मना कर रहे हैं.

उमेश जी ने बताया कि वो बैग लेकर संजीव जी के यहाँ गए लेकिन उनके मना करने के बाद वो भी लौट रहे हैं. सबकी बातें मेरी समझ में आ रहीं थीं लेकिन संजीव जी द्वारा न आने का कारण बेहद लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना और मजाकिया लग रहा था. जिस कार्यक्रम का टिकट डेढ़ महीने पहले हो चुका हो उसकी छुट्टी भला आधे घंटे पहले मांगने जाना मजाकिया नहीं तो क्या लगना चाहिए. जब संजीव सिन्हा ने मना किया तब टिकट कैंसल नहीं हो सकता था क्योंकि चार्ट बन चुका था. एक अनुज के नाते माफी के साथ एक सुझाव संजीव सिन्हा के लिए है कि “आगे से अगर कोई कार्यक्रम बनाये तो कम से कम छुट्टी थोड़ा पहले ले लें और नहीं आ पाने की पुष्टि इतना पहले कर दें कि आयोजक आपका टिकट कैंसल करवा सकें. कई बार कार्यक्रमों के पास कोई बड़ा प्रायोजक नहीं होता है”.
ट्रेन से बेपरवाह अब २१ दिसंबर के मंच योजना में लगते हुए मै अपना ध्यान कार्यक्रम की तरफ लगा दिया. दूसरे दिन ग्यारह बजे ही हम सात आठ लोग जिला पंचायत सभागार पहुचे और बैनर आदि लगा दिये. जिलापंचायत सभागार बुक करवाया था सतीश मणि और जिलापंचायत सदस्य राणा प्रताप ने, अत: यहाँ भी हमें आर्थिक राहत मिली थी. नियत समय पर दो बजे लोग जुटने शुरू हो गए. मुख्य अतिथि श्री अमिताभ ठाकुर भी देवरिया पहुच चुके थे. अपने तय समय से आधे घंटे देर से यानी ढाई बजे कार्यक्रम शुरू हुआ. बतौर मुख्यातिथि आईजी गोरखपुर श्री अमिताभ ठाकुर, सभाध्य्क्ष प्रो. रामदेव शुक्ल,मुख्य वक्ता डॉ श्रीकांत सिंह, श्री पंकज कुमार झा एवं संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी मंच पर उपस्थित हुए.

कार्यक्रम शुरू होते-होते सभागार पूरा भर गया था जिनमे महिला और पुरुष दोनों की उपस्थिति थी. बतौर संचालक मैंने कार्यक्रम देर से शुरू होने की माफी मांगते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की. माँ सरस्वती की तस्वीर पर पुष्पांजली के बाद अतिथि स्वागत का क्रम चला. इसी क्रम में श्री संजय मिश्र,डॉ जय प्रकाश पाठक, श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती, डॉ सौरभ मालवीय एवं श्री राजीव यादव को मोती बीए नया मीडिया सम्मान प्रो. रामदेव शुक्ल के हाथों दिया गया. सभी सम्मानित गणमान्यों ने सभा को संबोधित करते हुए अपने विचार रखे. सभा को संबोधित करते हुए सम्मान प्राप्त अतिथि डॉ जय प्रकाश पाठक ने शंभूनाथ शुक्ल जी का एक फेसबुक स्टेट्स पढ़कर सबको सुनाया जिसमे शुक्ला जी ने “लौट के बुद्धू घर को आये” वाला मुहावरा इस्तेमाल किये थे.

संबोधन के क्रम में श्री देहाती जी ने नयम मीडिया मंच को ग्रामीण पत्रकारों की जरुरत बताते हुए कहा कि जो लोग बाहर बैठ कि इस कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं, बेहतर है कि वो अंदर सभागार में आयें और खुली बहस करे. बकौल देहाती जी “देवरिया के पत्रकारिता इतिहास में हुए कार्यक्रमों में यह पहला मंच है जहाँ विरोधियों को भी अपनी बात रखने के लिए आजादी दी जा रही है”. सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री संजय मिश्र ने नया मीडिया की जरुरत एवं जवाबदेही से सम्बंधित सवाल उठाया. सम्मान समारोह एवं सम्मनित व्यक्तियों के संबोधन के बाद माइक पर आये वक्ता श्री पंकज कुमार झा ने बेहद शालीनता से अपनी बात रखा. नया मीडिया के विकास एवं जरुरत पर बोलते हुए श्री झा ने कहा कि हमें अभी इसकी शुचिता की बजाय इसके विकास पर बल देने की जरूरत है.

वहीँ मुख्य वक्ता डॉ श्रीकांत सिंह ने कहा “ कोई भी मीडिया नयी नहीं होती है अत: इसे नया मीडिया की बजाय डिजिटल मीडिया कहना ज्यादा प्रासंगिक होगा. इस मीडिया पर भी अनुशासन की जरूरत है और इसे भी अपनी जवाबदेही तय करनी होगी.”. इस क्रम में डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी ने कार्यक्रम का प्रस्तावन भाषण देते हुए इस आयोजन को अद्भुत बताया तो वहीँ ग्रामीण अंचल से आये पत्रकार श्री सिद्धार्थ मणि त्रिपाठी. श्री राघव तिवारी, श्री अरुण पाण्डेय. श्री सतीश सिंह आदि ने न्यू मीडिया को को ग्रामीण पत्रकारों के सशक्तीकरण के लिए सबसे जरूरी हथियार के रूप में स्वीकार किया. कार्यक्रम खतम होने में अभी आधे घंटे शेष थे और सभा में मौजूद भीड़ ज्यों की त्यों टिकी थी. तभी सूचना मिली कि यशवंत सिंह, कुमार सौवीर, जनार्दन यादव, अलका सिंह, डॉ धीरेन्द्र मिश्र भी पहुंच गए हैं. बिना देर किये संचालक द्वारा श्री यशवंत सिंह (भड़ास) एवं श्रीमती अलका सिंह (आकाशवाणी) को मंच पर आमंत्रित किया गया.

यशवंत सिंह द्वारा अपने संबोधन में उसी तेवर को कायम रखते हुए मुख्यधारा मीडिया पर प्रहार एवं नया मीडिया के सशक्तीकरण की बात की गयी. वहीँ अलका सिंह ने संक्षिप्त में ही ऐसे कार्यक्रमों पर अपना पक्ष रखा. सभा की अध्यक्षता कर रहे प्रो. रामदेव शुक्ल ने मुख्यधारा मीडिया के जवाब के रूप में नया मीडिया के विकास पर बात करते कहा कि इस नए माध्यम पर और अधिक प्रशिक्षण शिविर आदि लगाकर उन लोगों को खड़ा करने की जरुरत है जो इस माध्यम से अनभिग्य हैं.

अंत में कार्यक्रम के संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी ने सभी तमाम अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया. शुरुआत में कार्यक्रम को हल्के में लेने एवं उपेक्षित नजर से देखने के बावजूद कार्यक्रम की सफलता ने तमाम राष्ट्रीय अख़बारों को कवरेज करने पर मजबूर किया और तमाम अखबारों के देवरिया ब्यूरो प्रमुखों ने देर रात इस कार्यक्रम को संज्ञान में लेकर जानकारी ली. ये वही अखबार के ब्यूरो प्रमुख थे जो इस कार्यक्रम की सुचना तक छापने से बच रहे थे. दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख ने तो पूरे कार्यक्रम के ढांचे को ही अपूर्ण बता दिया था लेकिन यह अंत तक नहीं बता पाए कि क्या अपूर्ण था? मुझे उम्मीद थी कि वो इसकी अपूर्णता बताने मंच तक आयेंगे लेकिन नहीं आये.

खैर, सबकी नजर में कार्यक्रम सफल रहा.
आयोजन और इसके दाएं-बाएं की कुछ तस्वीरें…

साहित्यकार प्रोफेसर रामदेव शुक्ल ने कहा कि पारंपरिक मीडिया में जो चीजें छूट जाती हैं उसे नया मीडिया उठाता है। ग्रामीण अंचल के पत्रकारों के लिए नया मीडिया सशक्त माध्यम है। शुक्ल शनिवार को जिला पंचायत सभागार में नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ग्रामीण पत्रकारिता के इस तरह के प्रयोग को व्यापक स्तर पर बढ़ाकर लोगों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। इसकी चुनौतियां भी बहुत है जिससे लड़ने के लिए पत्रकार को जिम्मेदारियों के साथ रहना पड़ेगा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रानिक मीडिया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. श्रीकांत सिंह ने कहा कि कोई भी मीडिया नई नहीं होती है। इसलिए इसे डिजीटलमीडिया कहना ज्यादा प्रासंगिक लगता है। नया मीडिया को एक समय बाद मुख्य धारा के मीडिया के रूप में जाना जाने लगेगा। आईजी अमिताभ ठाकुर ने कहा कि सोशल मीडिया ने आम व्यक्ति को ताकतवर बनाया। लोग अपनी बात को आसानी से पहुंचा रहे हैं। सभी बड़े राजनैतिक लोग फेसबुक और ट्यूटर पर हैं। हालांकि इसका दुरुपयोग भी हो रहा है, इसे रोकने की जरूरत है। वरिष्ठ पत्रकार पंकज झा ने कहा कि नया मीडिया मुख्य धारा की मीडिया के विकल्प के रूप में सामने आ रहा है। इसमें सूचनाओं को रोकना संभव नहीं हो सकेगा। पत्रकार यशवंत सिंह ने ग्रामीण पत्रकारिता व वर्तमान पत्रकारिता की दशा पर अपना विचार व्यक्त किया। इस दौरान माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रकाशन अधिकारी सौरभ मालवीय, वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्र, एनडी देहाती, राजीय यादव, संत विनोबा पीजी कॉलेज के अध्यापक प्रो. जयप्रकाश पाठक को मोती बीए सम्मान से नवाजा गया। इस मौके पर शिवानंद िद्ववेदी ‘सहर’ आल इण्डिया रेडियो दिल्ली की समाचार वाचिका अलका सिंह, डॉ. दिनेश मणि, रामदास मिश्र, राम कुमार सिंह, दिलीप मल्ल, उदय प्रताप आदि मौजूद रहे।

भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए ही होती हैं

भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए ही होती हैं इसलिए उन्हें छुपाना नहीं जाहिर करना चाहिए। बिना प्रयास करे हारने से कोशिश करके हारना बेहतर है क्योंकि खामोशी ज्यादा दर्द देती है…. एम के पाण्डेय “निल्को”


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एतना घोटाला की बाद भी देश चल रहल बा, इ सब कुछ पुण्यप्रतापी लोग के देन बा।

मनबोध मास्टर का नेता नाम से ही घिन हो गइल बा। एतना घिन जइसे नेता ना नेटा(पोंटा) होखें। घोटाला पर घोटाला होत देख बोल पड़लें- ‘ साग घोटाला, पात घोटाला। सुबह-शाम और रात घोटाला।
पाथर के हाथी बा खइलसि, 15 अरब के डाढ़ा।
 मंत्री जी लोग गटक रहल बा, घोटाला के काढ़ा।। 
लोकायुक्त किये खुलासा, बात कहत हैं पक्की।
 दो सौ जने आरोपित भइलें, कब पिसिहें जेल में चक्की।। 



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