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रुद्रपुर – भगवान रुद्र की दूसरी काशी – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

भारत में वैसे तो अनेकानेक मंदिर शिवालय हैं परन्तु उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर में 11वीं सदी में अष्टकोण में बने प्रसिद्ध दुग्धेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी अनूठी विशेषता के लिए विश्वविख्यात है। यहां शिवलिंग जमीन से अपने आप निकला था। इस शिवलिंग का आधार कहां तक है इसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग की लम्बाई पाताल तक है। देवरिया जनपद मुख्यालय से लगभग बीस किमी दूर स्थित रुद्रपुर नगरी को काशी का दर्जा प्राप्त है। यहां भगवान शिव, दुग्धेश्वरनाथ के नाम से जाने जाते है। इस मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त ईट बौद्ध कालीन है। इस क्षेत्र की जनता जनार्दन इनको बाबा दुधनाथ के नाम से भी पुकारती है । उप ज्योतिर्लिंगों की स्थापना के संबंध में पद्म पुराण की निम्न पंक्तियां उल्लिखित हैं- 
खड़ग धारद दक्षिण तस्तीर्ण दुग्धेश्वरमिति ख्याति सर्वपाप:,
 प्राणाशकम यत्र स्नान च दानं च जप: 
पूजा तपस्या सर्वे मक्षयंता यान्ति दुग्धतीर्थ प्रभावत:। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल दधीचि व गर्ग आदि ऋषि-मुनियों की तपस्थली भी है। इतिहास की माने तो रुद्रपुर में रुद्रसेन नामक राजा का किला था और इसी कारण यह रुद्रपुर कहलाया पर मेरे विचार से भगवान रुद्र (शिव) की पुरी (नगरी) होने के कारण इसका नाम रुद्रपुर पड़ा होगा । महाशिवरात्रि के दिन एवं श्रावण मास में यहां भारी भीड़ होती है। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव, ॐ नम: शिवाय और बाबा भोलेनाथ की जयकारों से गुंजायमान रहता है। जनश्रुतियों के अनुसार, मंदिर बनने से पहले यहां घना जंगल था। बताते है कि उस समय दिन में गाय, भैंस चराने के लिए कुछ लोग आया करते थे। आज जहां शिवलिंग है, वहां नित्य प्रतिदिन एक गाय प्राय: आकर खड़ी हो जाती थी तथा उसके थन से अपने आप वहां दूध गिरना शुरू हो जाता था। इस बात की जानकारी धीरे-धीरे तत्कालीन रुद्रपुर नरेश हरी सिंह के कानों तक पहुंची तो उन्होंने वहां खुदाई करवाई। खुदाई में शिवलिंग निकला। राजा ने सोचा कि इस घने जंगल से शिवलिंग को निकाल कर अपने महल के आस-पास मंदिर बनवाकर इसकी स्थापना की जाए।  कहा जाता है कि जैसे-जैसे मजदूर शिवलिंग निकालने के लिए खुदाई करते जाते वैसे-वैसे जमीन में धंसता चला जाता। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। शिवलिंग तो नहीं निकला वहां एक कुआं जरूर बन गया। सोमनाथ के अतिरिक्त सामान्य धरातल से नीचे का शिवलिंग भारत में संभवत: अन्यत्र कहीं नहीं है। बाद में राजा को भगवान शंकर ने स्वप्न में वहीं पर मंदिर स्थापना करने का आदेश दिया। भगवान के आदेश के बाद राजा ने वहां धूमधाम से काशी के विद्धान पंडितों को बुलवाकर भगवान शंकर के इस लिंग की विधिवत स्थापना करवाई। जब तक वह जीवित रहे, भगवान दुग्धेश्वरनाथ की पूजा-अर्चना और श्रावण मास में मेला आयोजित करवाते थे। मंदिर में आज भी भक्तों को लिंग स्पर्श के लिए 14 सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। यहां भगवान का लिंग सदैव भक्तों के दूध और जल के चढ़ावे में डूबा रहता है। कहा जाता है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी जब भारत की यात्रा की थी तब वह देवरिया के रुद्रपुर में भी आए थे। उस समय मंदिर की विशालता एवं धार्मिक महत्व को देखते हुए उन्होंने चीनी भाषा में मंदिर परिसर में ही एक स्थान पर दीवार पर कुछ चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित थी, जो आज भी अस्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है। 

एम के पाण्डेय निल्को

 


अंतरराष्ट्रीय कराटे मे पूर्वाञ्चल का प्रतिनिधितव करेगा मास्टर सिद्धेश

अंतरराष्ट्रीय कराटे मे खेलेगा, देवरिया का सिद्धेश
6 देशो के खिलाड़ी लेगे हिस्सा,पूर्वाञ्चल का प्रतिनिधितव करेगा मास्टर सिद्धेश
जयपुर में 22 जुलाई से 24 जुलाई तक होने वाली पहली अंतरराष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता में देवरिया का सिद्धेश भाग लेगा। प्रतियोगिता में 6 देशों की कराटे टीम भाग लेंगी। पूर्वाञ्चल से एक मात्र खिलाड़ी सिद्धेश है । इससे पहले मई मे भी राज्यस्त्रीय प्रतियोगिता मे सिल्वर मैडल के साथ सिद्धेश ने किया था देवरिया का नाम रौशन । इंडियनमार्शल आर्ट संस्थान के बैनर तले जयपुर में अंतरराष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा है। शुक्रवार से आयोजित होने वाली इस प्रतियोगिता में भारत सहित छह देश हिस्सा ले रहे हैं। 24 जुलाई तक चलने वाली इस प्रतियोगिता में करीब 1100 बच्चे हिस्सा लेंगे। उद्घाटन भारतीय कॉमनवेल्थ चयनकर्ता अजय कुमार शेट्टी करेंगे। प्रतियोगिता में 5 से 18 साल तक के बच्चे हिस्सा लेंगे। पहले भारत के 19 राज्यों के खिलाड़ियों के बीच प्रतियोगिता होगी। इसके आधार पर भारतीय टीम का चयन होगा। यह टीम श्रीलंका, बंगलादेश, भूटान, नेपाल और अफगानिस्तान के खिलाड़ियों को चुनौती देगी। 
किस देश से कितने खिलाड़ी 
नेपाल45 
अफगानिस्तान 33 
बंगलादेश 07 
श्रीलंका 17 
भूटान 09 
भारत 24 

इस ज़माने में जब ढूढने निकला – योगेश पाण्डेय

माना की थोड़ी देर से आया हूँ
नाराज होने का गम भी मैं पाया हूँ
आज उसके शहर में अजनबियों की तरह
पता पूछने की भीड़ में शामिल हूँ
सही पता सही लोग
इस ज़माने में जब ढूढने निकला
पता चला की गलत लेके पता मैं भी निकला
उसके बनने सवरने के याद में मैं आया हूँ
पर उसके नाराज़ होने का गम भी मैं पाया हूँ
उसकी निगाहे जब भी मुझे देखती है
दुविधा की लाइन में सबसे पहले आया हूँ
उसके जुल्फों की तारीफ में
कविता की लाइन उड़ जाया करती है
उसको समेटने की भीड़ में मैं खुद को पाया हूँ
उसके साथ जब घुमने निकला
उसके आगे ही खुद को पाया हूँ
उसकी झील सी आँखों में
खुद को तैरता हुवा पाया हूँ
जब प्यार से योगेश मैं देखता हूँ
कविता की हर एक लाइन उसमें पाया हूँ
फुर्सत में लिखुगा उसके बारे
अभी छुट्टिया मनाने अपने गाँव आया हूँ
शहर की कोई याद नहीं यहाँ
हर जगह सुकून ही यहाँ पाया हूँ
गाँव की गोरी कहु या शहर की तितली
उसकी आँखों में प्यार ही पाया हूँ

योगेश पाण्डेय
(योगेश की युग से साभार)

देवरिया जिले में नया मीडिया मंच के बैनर तले नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी, सतीश मिश्रा, एन डी देहाती , डॉ सौरभ मालवीय, राजीव कुमार यादव और जय प्रकाश पाठक को मोती बी.ए नया मीडिया सम्मान से सम्मानित किया गया

देवरिया संगोष्ठी की कथा-गाथा : प्रारंभ से प्रारब्ध तक : कुछ सीखा, कुछ सिखा गए…

(पूरे कार्यक्रम की शुरुआत से अंत तक शिवानन्द द्विवेदी सहर की नजर से ये रिपोर्ट)

17 नवंबर को दिल्ली के कॉफी हाउस दिल्ली में कुछ लोग यूँ ही बैठ लिए और तय कर लिए कि आगामी २१ दिसंबर को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में नया मीडिया मंच के बैनर तले नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा. हालाकि इससे पहले अनौपचारिक तौर पर एक बार इसी मुद्दे पर प्रवीन शुक्ल, संजीव सिन्हा, सौरभ मालवीय और मै पहले भी बैठ चुके थे. लेकिन इस बैठक में सर्व सम्मति से कार्यक्रम के संयोजक के तौर पर प्रवीण शुक्ल पृथक एवं सह-संयोजक के तौर पर शिवानन्द द्विवेदी सहर (यानी मेरा) नाम तय किया गया.

बैठक में कार्यक्रम के संरक्षक के तौर पर डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी का नाम प्रस्तावित किया गया जिसे सभी लोगों ने मान लिया. बैठक में सबकुछ तय होने के बाद अब नया मीडिया एवं सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार-प्रसार की शुरुआत मैंने अपने फेसबुक वाल से शुरू की. तमाम लोग जो शुरू में कार्यक्रम की योजना से उत्साहित होकर कॉफी हाउस की बैठक में आयोजन के साथ जुड़े, अंत तक जुड़े रहे. तमाम ऐसे भी लोग थे जो जुड़े तो जोश के साथ लेकिन मझधार में अपनी मजबूरियों की भेंट चढ़ते हुए अलग  हो गए. सवाल अतिथितियों का था, सों दिल्ली से मै आगे आया और चर्चा बढ़ाया.

अतिथि वक्ता के तौर पर श्री अमिताभ ठाकुर (आईजी), प्रो. रामदेव शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार श्री शंभूनाथ शुक्ल, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री पंकज झा, श्री संजीव सिन्हा, श्री यशवंत सिंह से आने का अनुरोध खुद मैंने किया. वहीँ भोपाल से डॉ श्रीकांत सिंह का प्रोग्राम डॉ सौरभ मालवीय ने तय कराया. हालाकि इनसे भी मेरी बात हुई थी. देवरिया की माटी से जुड़े पाँच गणमान्यो को सम्मानित कराये जाने की योजना कॉफी हाउस बैठक में तय हुई थी सों तमाम लोगों से पूछ कर, जांच कर श्री संजय मिश्र (दैनिक जागरण), डॉ जय प्रकाश पाठक, श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती (सहारा), डॉ सौरभ मालवीय, श्री राजीव यादव (हिन्दुस्तान) के नामों का चयन किया गया था. चयनित नामो की घोषणा भी की गयी बाद में.

इस कार्यक्रम को लेकर मेरा सुझाव था कि यह कार्यक्रम बिना प्रायोजक के किया जाय और क्षेत्रीय लोगों से चंदा इकठ्ठा करके किया जाय. कई लोग इस फार्मूले को नकार भी दिये थे लेकिन मैं कायम रहा. धन जुटाना वो भी दिल्ली में बैठकर देवरिया के लोगों से, किसी लोहे चने चबाने से कम न तब था और न आज है, ये बात मैं हाल ही में मिले निजी अनुभव के आधार पर लिख रहा हूँ. खैर, मैं इसी फार्मूले पर चला. मैंने धन जुटाने के लिए तमाम लोगों से संपर्क किया और तमाम लोगों ने स्वीकृति भी. ये अलग बात है कि कार्यक्रम के दिन ११ बजे तक मेरे हाथ में किसी भी स्थानीय द्वारा जुटाया गया एक रुपया भी नहीं आया था.

इस दौरान दिल्ली में रहकर मैंने निजी प्रयास किया था जिसमें सिंगापुर से चुन्नू सिंगापुरी जी द्वारा तीन हजार और आशुतोष कुमार द्वारा एक हजार, मतलब चार हजार का सहयोग मिल सका था. लेकिन बताना चाहूँगा कि मेरे स्थिति को कुछ अतिथि भांप गए थे जिसमे श्री पंकज झा और श्री पंकज चतुर्वेदी, भाई आशुतोष सिंह सहित डॉ धीरेन्द्र मिश्र एवं अलका सिंह जी का नाम ले रहा हूँ. श्री पंकज झा जी ने अपने खर्चे से आने का वादा कर मुझे राहत दिया तो वहीँ पंकज चतुर्वेदी जी ने अपना टिकट खुद कराया (मेरे द्वारा कराया गया टिकट कैंसल कराकर). तमाम उतार-चढाव के साथ कार्यक्रम की तारीख नजदीक आई और १८ की शाम वैशाली से मैं निकल गया देवरिया के लिए. बताता चलूँ कि देवरिया में सतह पर जो लोग इस आयोजन के लिए लगे हुए थे उनमे श्री रामकुमार सिंह (दैनिक जागरण), विद्यानंद पाण्डेय, श्री दिलीप मल्ल, रामदास मिश्र, संतोष उपाध्याय, अभिनव पाठक,कपीन्द्र मिश्र, राहुल तिवारी, आदर्श तिवारी, श्री नवनीत मालवीय सहित तमाम अन्य लोगों के नाम प्रमुख हैं. इनके सहयोग से कार्यक्रम अपनी सफलता तक पहुंचा.

खैर, वो तारीख भी आई जब मैं १९ तारीख को देवरिया पहुंचा. स्टेशन उतरते ही वहाँ रामकुमार सिंह और विद्द्यानंद पाण्डेय अपनी बोलेरो और आदर्श अपनी बाइक लेकर आये थे. रामकुमार सिंह और विद्यानंद के साथ मिलकर मैंने कार्यक्रम से सम्बन्धी होटल-अतिथि आवास, फुल-माला, माइक-साउंड, फोटो-फ्रेमिंग, आदि का ऑर्डर किया. स्मृति-चिन्ह और बैनर तो मैं खुद दिल्ली से ले गया था. अंतिम लड़ाई २० तारीख की सुबह की थी. बीस की सुबह मै अकेला ही घर से निकला लेकिन तभी आदर्श भी साथ आ लिए. हम लोग निमंत्रण-पत्र वितरण से लेकर, दो सौ लोगों के नाश्ते पानी तक के इन्तजामो में लग गए (बता दूँ कि अभी तक कुछ भी हुआ नहीं था). शाम तक बिना रुके काम करने के बाद ये भी हो गया.

अब मेरा ध्यान दिल्ली की तरफ गया. शाम ४:५० पर दिल्ली स्टेशन से पूर्बिया एक्सप्रेस में शंभूनाथ जी, पंकज चतुर्वेदी जी, पृथक जी, धीरेन्द्र जी, उमेश जी, यशवंत जी, जनार्दन जी, अलका जी, संजीव जी, उमेश चतुर्वेदी जी का टिकट था. कुल आठ अतिथियों का आगमन एक ही ट्रेन से दिल्ली से होना था. हालाकि पंकज झा जी और डॉ श्रीकांत सिंह जी एकदिन पूर्व ही देवरिया एवं गोरखपुर पहुच चुके थे. अपने दो महत्वपूर्ण अतिथियों की उपस्थिति मेरे आत्मबल को बढ़ा रही थी. शाम चार बजे के बाद उमेश चतुर्वेदी जी का फोन आता है कि यह ट्रेन कई घंटे लेट हो सकती है और फिलहाल दो घंटे लेट है.

यह खबर मेरे माथे के बल पहाड़ का भार लेकर पडी. पूरे कार्यक्रम के लगभग सभी अतिथि उसी ट्रेन से आने वाले थे. पृथक जी और शंभूनाथ जी स्टेशन पहुंचे फिर पंकज चतुर्वेदी जी और अलका सिंह जी पहुंचे. धीरेन्द्र मिश्र का फोन आया कि वो भी स्टेशन पहुंच चुके हैं. यहाँ दिल्ली से सबके फोन आने शुरू हुए और मेरी धड़कनें बढ़नी शुरू हुई. ऐसा होना लाजिमी था क्योंकि कल कार्यक्रम और आज अतिथियों का आना ही संशय में. इसके अलावा कई सूत्रों से यह खबर भी आ रही थी कि देवरिया के तमाम पत्रकार संगठनों द्वारा इस कार्यक्रम का बहिष्कार भी किया गया है. इस बहिष्कार की वजह मेरी समझ से बाहर थी लेकिन लोगों की माने तो शायद यही वजह थी कि उनके जमे-जमाये मठ में यह शिवानन्द सहर और नया मीडिया मंच जैसी चीजें उनकी इजाजत के बिना कैसे आ गयी हैं.

मैं कार्यक्रम में आने का निमंत्रण देने के लिए जिलाधिकारी देवरिया श्री मनिप्रसाद मिश्र से रात आठ बजे मिला. हालाकि वो कार्यक्रम में जाने क्यों स्वीकृति के बावजूद नहीं आये. जिलाधिकारी महोदय के न आने की बात एक दिन पहले ही मुझे तब स्थानीय लोग बता दिये थे जब मैं उनसे (जिलाधिकारी) निमंत्रण के लिए मिलने जा रहा था. लोगों ने मुझसे कहा कि जिलाधिकारी महोदय को तमाम लोगों ने कार्यक्रम के खिलाफ समझा दिया है, अत: वो नहीं आयेंगे. हालांकि मुझे आज भी इस पर व्यक्तिगत रूप से विश्वास नहीं है. जिलाधिकारी से मिलकर आठ सवा आठ बजे बाहर निकला तो सूचना मिली कि श्री शंभूनाथ शुक्ल, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री प्रवीण शुक्ल (संयोजक) ट्रेन छोड़कर घर लौट गए हैं और अलका सिंह, धीरेन्द्र मिश्र, यशवंत सिंह ट्रेन में बैठ गए हैं.

हालात ऐसे थे के किसी को भी मैं जबरन आने को कह नहीं सकता था और उनके नहीं आने की स्थिति में यहाँ रातो-रात कोई विकल्प भी नहीं खड़ा कर सकता था. खैर, हालाकि मुझे इस बात की संतुष्टि जरूर थी कि वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल और पंकज चतुर्वेदी सरीखे लोग मेरे कहने पर कम से कम चार घंटे से ज्यादा स्टेशन पर तो खड़े रहे. वाकई मैं इसके लिए उनका आभार व्यक्त करूँगा कि वो तब तक स्टेशन पर जमे रहे जब तक ट्रेन के समय से देवरिया पहुंचने की अंतिम उम्मीद बनी रही. इस मामले में संजीव सिन्हा बहुत निराश किये. चार बजे उन्होंने आने की पुष्टि की और साढ़े चार बजे उनका फोन आता है कि उन्हें छुट्टी नहीं मिल रही और प्रभात झा मना कर रहे हैं.

उमेश जी ने बताया कि वो बैग लेकर संजीव जी के यहाँ गए लेकिन उनके मना करने के बाद वो भी लौट रहे हैं. सबकी बातें मेरी समझ में आ रहीं थीं लेकिन संजीव जी द्वारा न आने का कारण बेहद लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना और मजाकिया लग रहा था. जिस कार्यक्रम का टिकट डेढ़ महीने पहले हो चुका हो उसकी छुट्टी भला आधे घंटे पहले मांगने जाना मजाकिया नहीं तो क्या लगना चाहिए. जब संजीव सिन्हा ने मना किया तब टिकट कैंसल नहीं हो सकता था क्योंकि चार्ट बन चुका था. एक अनुज के नाते माफी के साथ एक सुझाव संजीव सिन्हा के लिए है कि “आगे से अगर कोई कार्यक्रम बनाये तो कम से कम छुट्टी थोड़ा पहले ले लें और नहीं आ पाने की पुष्टि इतना पहले कर दें कि आयोजक आपका टिकट कैंसल करवा सकें. कई बार कार्यक्रमों के पास कोई बड़ा प्रायोजक नहीं होता है”.
ट्रेन से बेपरवाह अब २१ दिसंबर के मंच योजना में लगते हुए मै अपना ध्यान कार्यक्रम की तरफ लगा दिया. दूसरे दिन ग्यारह बजे ही हम सात आठ लोग जिला पंचायत सभागार पहुचे और बैनर आदि लगा दिये. जिलापंचायत सभागार बुक करवाया था सतीश मणि और जिलापंचायत सदस्य राणा प्रताप ने, अत: यहाँ भी हमें आर्थिक राहत मिली थी. नियत समय पर दो बजे लोग जुटने शुरू हो गए. मुख्य अतिथि श्री अमिताभ ठाकुर भी देवरिया पहुच चुके थे. अपने तय समय से आधे घंटे देर से यानी ढाई बजे कार्यक्रम शुरू हुआ. बतौर मुख्यातिथि आईजी गोरखपुर श्री अमिताभ ठाकुर, सभाध्य्क्ष प्रो. रामदेव शुक्ल,मुख्य वक्ता डॉ श्रीकांत सिंह, श्री पंकज कुमार झा एवं संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी मंच पर उपस्थित हुए.

कार्यक्रम शुरू होते-होते सभागार पूरा भर गया था जिनमे महिला और पुरुष दोनों की उपस्थिति थी. बतौर संचालक मैंने कार्यक्रम देर से शुरू होने की माफी मांगते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की. माँ सरस्वती की तस्वीर पर पुष्पांजली के बाद अतिथि स्वागत का क्रम चला. इसी क्रम में श्री संजय मिश्र,डॉ जय प्रकाश पाठक, श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती, डॉ सौरभ मालवीय एवं श्री राजीव यादव को मोती बीए नया मीडिया सम्मान प्रो. रामदेव शुक्ल के हाथों दिया गया. सभी सम्मानित गणमान्यों ने सभा को संबोधित करते हुए अपने विचार रखे. सभा को संबोधित करते हुए सम्मान प्राप्त अतिथि डॉ जय प्रकाश पाठक ने शंभूनाथ शुक्ल जी का एक फेसबुक स्टेट्स पढ़कर सबको सुनाया जिसमे शुक्ला जी ने “लौट के बुद्धू घर को आये” वाला मुहावरा इस्तेमाल किये थे.

संबोधन के क्रम में श्री देहाती जी ने नयम मीडिया मंच को ग्रामीण पत्रकारों की जरुरत बताते हुए कहा कि जो लोग बाहर बैठ कि इस कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं, बेहतर है कि वो अंदर सभागार में आयें और खुली बहस करे. बकौल देहाती जी “देवरिया के पत्रकारिता इतिहास में हुए कार्यक्रमों में यह पहला मंच है जहाँ विरोधियों को भी अपनी बात रखने के लिए आजादी दी जा रही है”. सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री संजय मिश्र ने नया मीडिया की जरुरत एवं जवाबदेही से सम्बंधित सवाल उठाया. सम्मान समारोह एवं सम्मनित व्यक्तियों के संबोधन के बाद माइक पर आये वक्ता श्री पंकज कुमार झा ने बेहद शालीनता से अपनी बात रखा. नया मीडिया के विकास एवं जरुरत पर बोलते हुए श्री झा ने कहा कि हमें अभी इसकी शुचिता की बजाय इसके विकास पर बल देने की जरूरत है.

वहीँ मुख्य वक्ता डॉ श्रीकांत सिंह ने कहा “ कोई भी मीडिया नयी नहीं होती है अत: इसे नया मीडिया की बजाय डिजिटल मीडिया कहना ज्यादा प्रासंगिक होगा. इस मीडिया पर भी अनुशासन की जरूरत है और इसे भी अपनी जवाबदेही तय करनी होगी.”. इस क्रम में डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी ने कार्यक्रम का प्रस्तावन भाषण देते हुए इस आयोजन को अद्भुत बताया तो वहीँ ग्रामीण अंचल से आये पत्रकार श्री सिद्धार्थ मणि त्रिपाठी. श्री राघव तिवारी, श्री अरुण पाण्डेय. श्री सतीश सिंह आदि ने न्यू मीडिया को को ग्रामीण पत्रकारों के सशक्तीकरण के लिए सबसे जरूरी हथियार के रूप में स्वीकार किया. कार्यक्रम खतम होने में अभी आधे घंटे शेष थे और सभा में मौजूद भीड़ ज्यों की त्यों टिकी थी. तभी सूचना मिली कि यशवंत सिंह, कुमार सौवीर, जनार्दन यादव, अलका सिंह, डॉ धीरेन्द्र मिश्र भी पहुंच गए हैं. बिना देर किये संचालक द्वारा श्री यशवंत सिंह (भड़ास) एवं श्रीमती अलका सिंह (आकाशवाणी) को मंच पर आमंत्रित किया गया.

यशवंत सिंह द्वारा अपने संबोधन में उसी तेवर को कायम रखते हुए मुख्यधारा मीडिया पर प्रहार एवं नया मीडिया के सशक्तीकरण की बात की गयी. वहीँ अलका सिंह ने संक्षिप्त में ही ऐसे कार्यक्रमों पर अपना पक्ष रखा. सभा की अध्यक्षता कर रहे प्रो. रामदेव शुक्ल ने मुख्यधारा मीडिया के जवाब के रूप में नया मीडिया के विकास पर बात करते कहा कि इस नए माध्यम पर और अधिक प्रशिक्षण शिविर आदि लगाकर उन लोगों को खड़ा करने की जरुरत है जो इस माध्यम से अनभिग्य हैं.

अंत में कार्यक्रम के संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी ने सभी तमाम अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया. शुरुआत में कार्यक्रम को हल्के में लेने एवं उपेक्षित नजर से देखने के बावजूद कार्यक्रम की सफलता ने तमाम राष्ट्रीय अख़बारों को कवरेज करने पर मजबूर किया और तमाम अखबारों के देवरिया ब्यूरो प्रमुखों ने देर रात इस कार्यक्रम को संज्ञान में लेकर जानकारी ली. ये वही अखबार के ब्यूरो प्रमुख थे जो इस कार्यक्रम की सुचना तक छापने से बच रहे थे. दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख ने तो पूरे कार्यक्रम के ढांचे को ही अपूर्ण बता दिया था लेकिन यह अंत तक नहीं बता पाए कि क्या अपूर्ण था? मुझे उम्मीद थी कि वो इसकी अपूर्णता बताने मंच तक आयेंगे लेकिन नहीं आये.

खैर, सबकी नजर में कार्यक्रम सफल रहा.
आयोजन और इसके दाएं-बाएं की कुछ तस्वीरें…

साहित्यकार प्रोफेसर रामदेव शुक्ल ने कहा कि पारंपरिक मीडिया में जो चीजें छूट जाती हैं उसे नया मीडिया उठाता है। ग्रामीण अंचल के पत्रकारों के लिए नया मीडिया सशक्त माध्यम है। शुक्ल शनिवार को जिला पंचायत सभागार में नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ग्रामीण पत्रकारिता के इस तरह के प्रयोग को व्यापक स्तर पर बढ़ाकर लोगों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। इसकी चुनौतियां भी बहुत है जिससे लड़ने के लिए पत्रकार को जिम्मेदारियों के साथ रहना पड़ेगा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रानिक मीडिया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. श्रीकांत सिंह ने कहा कि कोई भी मीडिया नई नहीं होती है। इसलिए इसे डिजीटलमीडिया कहना ज्यादा प्रासंगिक लगता है। नया मीडिया को एक समय बाद मुख्य धारा के मीडिया के रूप में जाना जाने लगेगा। आईजी अमिताभ ठाकुर ने कहा कि सोशल मीडिया ने आम व्यक्ति को ताकतवर बनाया। लोग अपनी बात को आसानी से पहुंचा रहे हैं। सभी बड़े राजनैतिक लोग फेसबुक और ट्यूटर पर हैं। हालांकि इसका दुरुपयोग भी हो रहा है, इसे रोकने की जरूरत है। वरिष्ठ पत्रकार पंकज झा ने कहा कि नया मीडिया मुख्य धारा की मीडिया के विकल्प के रूप में सामने आ रहा है। इसमें सूचनाओं को रोकना संभव नहीं हो सकेगा। पत्रकार यशवंत सिंह ने ग्रामीण पत्रकारिता व वर्तमान पत्रकारिता की दशा पर अपना विचार व्यक्त किया। इस दौरान माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रकाशन अधिकारी सौरभ मालवीय, वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्र, एनडी देहाती, राजीय यादव, संत विनोबा पीजी कॉलेज के अध्यापक प्रो. जयप्रकाश पाठक को मोती बीए सम्मान से नवाजा गया। इस मौके पर शिवानंद िद्ववेदी ‘सहर’ आल इण्डिया रेडियो दिल्ली की समाचार वाचिका अलका सिंह, डॉ. दिनेश मणि, रामदास मिश्र, राम कुमार सिंह, दिलीप मल्ल, उदय प्रताप आदि मौजूद रहे।

भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए ही होती हैं

भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए ही होती हैं इसलिए उन्हें छुपाना नहीं जाहिर करना चाहिए। बिना प्रयास करे हारने से कोशिश करके हारना बेहतर है क्योंकि खामोशी ज्यादा दर्द देती है…. एम के पाण्डेय “निल्को”


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एतना घोटाला की बाद भी देश चल रहल बा, इ सब कुछ पुण्यप्रतापी लोग के देन बा।

मनबोध मास्टर का नेता नाम से ही घिन हो गइल बा। एतना घिन जइसे नेता ना नेटा(पोंटा) होखें। घोटाला पर घोटाला होत देख बोल पड़लें- ‘ साग घोटाला, पात घोटाला। सुबह-शाम और रात घोटाला।
पाथर के हाथी बा खइलसि, 15 अरब के डाढ़ा।
 मंत्री जी लोग गटक रहल बा, घोटाला के काढ़ा।। 
लोकायुक्त किये खुलासा, बात कहत हैं पक्की।
 दो सौ जने आरोपित भइलें, कब पिसिहें जेल में चक्की।। 



यह भी नशा, वह भी नशा – प्रेमचंद

 होली के दिन राय साहब पण्डित घसीटेलाल की बारहदरी में भंग छन रही थी कि सहसा मालूम हुआ, जिलाधीश मिस्टर बुल आ रहे हैं। बुल साहब बहुत ही मिलनसार आदमी थे और अभी हाल ही में विलायत से आये थे। भारतीय रीति-नीति के जिज्ञासु थे, बहुधा मेले-ठेलों में जाते थे। शायद इस विषय पर कोई बड़ी किताब लिख रहे थे। उनकी खबर पाते ही यहाँ बड़ी खलबली मच गयी। सब-के-सब नंग-धिड़ंग, मूसरचन्द बने भंग छान रहे थे। कौन जानता था कि इस वक्त साहब आएँगे। फुर-से भागे, कोई ऊपर जा छिपा, कोई घर में भागा, पर बिचारे राय साहब जहाँ के तहाँ निश्चल बैठे रह गये। आधा घण्टे में तो आप काँखकर उठते थे और घण्टे भर में एक कदम रखते थे, इस भगदड़ में कैसे भागते। जब देखा कि अब प्राण बचने का कोई उपाय नहीं है, तो ऐसा मुँह बना लिया मानो वह जान बूझकर इस स्वदेशी ठाट से साहब का स्वागत करने को बैठे हैं। साहब ने बरामदे में आते ही कहा-हलो राय साहब, आज तो आपका होली है?
राय साहब ने हाथ बाँधकर कहा-हाँ सरकार, होली है।
बुल-खूब लाल रंग खेलता है?
राय साहब-हाँ सरकार, आज के दिन की यही बहार है।
साहब ने पिचकारी उठा ली। सामने मटकों में गुलाल रखा हुआ था। बुल ने पिचकारी भरकर पण्डितजी के मुँह पर छोड़ दी तो पण्डितजी नहीं उठे। धन्य भाग! कैसे यह सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। वाह रे हाकिम! इसे प्रजावात्सल्य कहते हैं। आह! इस वक्त सेठ जोखनराम होते तो दिखा देता कि यहाँ जिला में अफसर इतनी कृपा करते हैं। बताएँ आकर कि उन पर किसी गोरे ने भी पिचकारी छोड़ी है, जिलाधीश का कहना ही क्या। यह पूर्व-तपस्या का फल है, और कुछ नहीं। कोई पहले एक सहस्र वर्ष तपस्या करे, तब यह परम पद पा सकता है। हाथ जोडक़र बोले-धर्मावतार, आज जीवन सफल हो गया। जब सरकार ने होली खेली है तो मुझे भी हुक्म मिले कि अपने हृदय की अभिलाषा पूरी कर लूँ।
यह कहकर राय साहब ने गुलाल का एक टीका साहब के माथे पर लगा दिया।
बुल-इस बड़े बरतन में क्या रखा है, राय साहब?
राय-सरकार, यह भंग है। बहुत विधिपूर्वक बनाई गयी है हुजूर!
बुल-इसके पीने से क्या होगा?
राय-हुजूर की आँखें खुल जाएँगी। बड़ी विलक्षण वस्तु है सरकार।
बुल-हम भी पीएगा।
राय साहब को जान पड़ा मानो स्वर्ग के द्वार खुल गये हैं और वह पुष्पक विमान पर बैठे ऊपर उड़े चले जा रहे हैं। ग्लास तो साहब को देना उचित न था, पर कुल्हड़ में देते संकोच होता था। आखिर बहुत ऊँच-नीच सोचकर ग्लास में भंग उँड़ेली और साहब को दी। साहब पी गये। मारे सुगन्ध के चित्त प्रसन्न हो गया।
दूसरे दिन राय साहब इस मुलाकात का जवाब देने चले। प्रात:काल ज्योतिषी से मुहूर्त पूछा। पहर रात गये साइत बनती थी, अतएव दिन-भर खूब तैयारियाँ कीं। ठीक समय पर चले। साहब उस समय भोजन कर रहे थे। खबर पाते ही सलाम दिया। राय साहब अन्दर गये तो शराब की दुर्गन्ध से नाक फटने लगी। बेचारे अंग्रेजी दवा न पीते थे, अपनी उम्र में शराब कभी न छुई थी। जी में आया कि नाक बन्द कर लें, मगर डरे कि साहब बुरा न मान जाएँ। जी मचला रहा था, पर साँस रोके बैठे हुए थे। साहब ने एक चुस्की ली और ग्लास मेज पर रखते हुए बोले-राय साहब हम कल आप का बंग पी गया, आज आपको हमारा बंग पीना पड़ेगा। आपका बंग बहुत अच्छा था। हम बहुत-सा खाना खा गया।
राय-हुजूर, हम लोग मदिरा हाथ से भी नहीं छूते। हमारे शास्त्रों में इसको छूना पाप कहा गया है।
बुल-(हँसकर) नहीं, नहीं, आपको पीना पड़ेगा राय साहब! पाप-पुन कुछ नहीं है। यह हमारा बंग है, वह आपका बंग है। कोई फरक नहीं है। उससे भी नशा होता है, इससे भी नशा होता है, फिर फरक कैसा?
राय-नहीं, धर्मावतार, मदिरा को हमारे यहाँ वर्जित किया गया है।
बुल-ऐसा कभी होने नहीं सकता। शास्त्र मना करेगा तो इसको भी मना करेगा, उसको भी मना करेगा। अफीम को भी मना करेगा। आप इसको पिएँ, डरें नहीं। बहुत अच्छा है।
यह कहते हुए साहब ने एक ग्लास में शराब उँड़ेलकर राय साहब के मुँह से लगा ही तो दी। राय साहब ने मुँह फेर लिया और आँखें बन्द करके दोनों हाथों से साहब का हाथ हटाने लगे। साहब की समझ में यह रहस्य न आता था। वह यही समझ रहे थे कि यह डर के मारे नहीं पी रहे हैं। अपने मजबूत हाथों से राय साहब की गरदन पकड़ी और ग्लास मुँह की तरफ बढ़ाया। राय साहब को अब क्रोध आ गया। साहब खातिर से सब कुछ कर सकते थे; पर धर्म नहीं छोड़ सकते थे। जरा कठोर स्वर में बोले-हुजूर, हम वैष्णव हैं। हम इसे छूना भी पाप समझते हैं।
राय साहब इसके आगे और कुछ न कह सके। मारे आवेश में कण्ठावरोध हो गया। एक क्षण बाद जरा स्वर को संयत करके फिर बोले-हुजूर, भंग पवित्र वस्तु है। ऋषि, मुनि, साधु, महात्मा, देवी, देवता सब इसका सेवन करते हैं। सरकार, हमारे यहाँ इसकी बड़ी महिमा लिखी है। कौन ऐसा पण्डित है, जो बूटी न छानता हो। लेकिन मदिरा का तो सरकार, हम नाम लेना भी पाप समझते हैं।
बुल ने ग्लास हटा लिया और कुरसी पर बैठकर बोला-तुम पागल का माफिक बात करता है। धरम का किताब बंग और शराब दोनों को बुरा कहता है। तुम उसको ठीक नहीं समझता। नशा को इसलिए सारा दुनिया बुरा कहता है कि इससे आदमी का अकल खत्म हो जाता है। तो बंग पीने से पण्डित और देवता लोग का अकल कैसे खप्त नहीं होगा, यह हम नहीं समझ सकता। तुम्हारा पण्डित लोग बंग पीकर राक्षस क्यों नहीं होता! हम समझता है कि तुम्हारा पण्डित लोग बंग पीकर खप्त हो गया है, तभी तो वह कहता है, यह अछूत है, वह नापाक है, रोटी नहीं खाएगा, मिठाई खाएगा। हम छू लें तो तुम पानी नहीं पीएगा। यह सब खप्त लोगों का बात। अच्छा सलाम!
राय साहब की जान-में-जान आयी। गिरते-पड़ते बरामदे में आये, गाड़ी पर बैठे और घर की राह ली।

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नववर्ष की आप सभी को हार्दिक बधाई |

पवन बाबा 

आज 2011 का आखिरी दिन है. एक और साल हमारी जिंदगी से गुजर जाएगा. जिंदगी के बसंत में एक और बसंत जोड़ 2011 का यह साल न जानें कितनी यादें दे अपनी छाप छोड़ हमारी जिंदगी से विदा लेने को है और जाते जाते हमें 2012 के रुप में एक नया साथी देता जा रहा है जो आने वाले 365 दिन तक हमारा साथी रहेगा.
किसी के लिए यह साल बहुत जल्दी बीत गया तो किसी के लिए यह साल बहुत लंबा रहा. विश्व पटल पर कई हलचलें पैदा कर और भारतीय खेल जगत के नए दबंगों को हमारे सामने रख यह साल अपने आप में बेमिसाल बन चुका है. हमें आशा है कि आप सब ने भी व्यक्तिगत रुप से इस वर्ष जरुर कुछ विशेष पाया होगा. लेकिन जो बीत गया उसे भूल जाएं और जो आने वाला है उसका उत्सव मनाएं. पुराने साल को एक बेहतरीन विदाई दीजिए और पूरी गर्मजोशी से नए साल का स्वागत करें. 
अंत में आप सभी को नए साल 2012 के लिए हार्दिक मंगलकामनाएं. आशा है आपके लिए नया साल नई उम्मीदें, नई आशाएं और अवसरों की बहार लेकर आएगा. 

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 पवन पाठक 
ॐ शांति मेडिकल स्टोर
पिपरा चौराहा , लार 
देवरिया 

500 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार

प्रशांत यादव
रवि गुप्ता

चीन ने पिछले हफ्ते ऐसी ट्रेन दौड़ा दी, जिसने देखते ही देखते 500 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ ली. यानी भारत में चली तो दिल्ली से लखनऊ का सफर एक घंटे का रह जाएगा. VMW Team के रवि गुप्ता और प्रशांत यादव की एक रिपोर्ट ..
“सस्ती तकनीक, कम उम्र और भरोसे की कमी” के साथ ही अलग से नुकसान भारत में चीन से आए सामानों की सामान्य रूप से यही पहचान रहती है पर इन सबके बावजूद भारत के बाजार चीनी माल से भरे पड़े हैं. इनमें अगर यह ट्रेन भी शामिल हो जाए तो लोगों का काफी वक्त बच जाएगा.

यह नई ट्रेन चीन में ट्रेन बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी सीएसआर कॉर्प लिमिटेड की महत्वाकांक्षी परियोजना है. ट्रेन सीएसआर की एक सहयोगी कंपनी ने बनाई है. इसकी आकृति एक पुराने चीनी तलवार जैसी है. चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने यह जानकारी दी. ट्रेन के जानकार शेन जियुन ने इसके बारे में कहा है, “यह ट्रेन हाई स्पीड रेल नेटवर्क को नई और उपयोगी दृष्टि देगी.” हालांकि इस ट्रेन के परीक्षण का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि अब भविष्य में चीन की ट्रेनें इतनी तेज गति से चलेंगी. सीएसआर के चेयरमैन जाओ जियाओगांग ने बीजिंग मॉर्निंग न्यूज से कहा, “हम ट्रेन यातायात में पहले सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहते हैं.” ट्रेन का परीक्षण ऐसे समय में किया गया है जब देश के हाईस्पीड नेटवर्क पर सवाल उठ रहे हैं. कई हादसे हुए हैं और उनकी जांच अभी चल ही रही है. चीन के रेल उद्योग के लिए यह साल काफी मुश्किल रहा है. जुलाई में हाईस्पीड ट्रेनों की टक्कर में 40 लोगों की जान गई और देश के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस हादसे ने आलोचना बटोरी. इस हादसे के बाद से हाईस्पीड नेटवर्क को बनाने का काम लगभग रुका पड़ा है. चीन के रेल उद्योग में हुए विस्तार के पीछे रेल मंत्री लिऊ झिजुन की बड़ी भूमिका रही है. लिऊ झिजुन को इसी साल फरवरी में भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद बर्खास्त कर दिया गया हालांकि उन पर अब तक कोर्ट में कोई मुकदमा नहीं चलाया गया है. चीन में औसतन 200 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा की रफ्तार से चलने वाली ट्रेनों को हाईस्पीड नेटवर्क के दायरे में रखा गया है. चीन के पास दुनिया का सबसे लंबा हाईस्पीड रेल नेटवर्क है जिसकी लंबाई करीब 9,767 किलोमीटर है. जून 2011 तक इसमें 3,515 किलोमीटर का नेटवर्क ऐसा था जिसमें ट्रेनों की रफ्तार 300 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा रहती है.

रवि गुप्ता और प्रशांत यादव 
भटनी, देवरिया

महाशतक से रोकना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।

आर. के. शुक्ला “अनुज”

सचिन लगाएंगे सर डॉन की धरती पर महाशतक। यह बात हर सचिन फ़ैन तो कह ही रहा था, अब ऑस्ट्रेलिया का सट्टा बाज़ार और मैं (आर. के. शुक्ला “अनुज) भी यही कह रहा हू कि मास्टर को सीरीज़ में महाशतक से रोकना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
सचिन की ऑस्ट्रेलिया में सौंवी सेचुरी का इंतज़ार तो हर कोई कर रहा है, लेकिन शायद यह पहली बार हो रहा है कि सचिन को हर हाल में नीचा दिखाने वाले कंगारु भी कर रहे हैं मास्टर के महाशतक का बेसब्री से इंतज़ार है। ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट फ़ैंस को भी है उम्मीद की सचिन डाउन-अंडर पर ही पूरा करेंगे शतकों का शतक। यही नहीं, सचिन के महाशतक की उम्मीद तो मेलबर्न के पहले टेस्ट में ही जताई जा रही है। यह कह रहा है ऑस्ट्रेलिया का सट्टा बाज़ार, जहां पर मेलबर्न में ही सचिन की सेंचुरी पर खेले जा रहे हैं करोडों के दांव। ऑनलाइन बैटिंग साईट sportsbet.com.au की मानें, तो सचिन की मेलबर्न में सेंचूरी के लिए सट्टा बाज़ार 9 के मुक़ाबले 4 का भाव दे रहा है। यानि सट्टा बाज़ार को लगता है कि सचिम मेलबर्न में ही मारेंगे महाशतक। कुल मिलाकर सट्टा बाज़ार के इस रुख़ से साफ़ है कि मास्टर के महाशतक की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है अब बस इंतज़ार है, तो सचिन के मैदान में उतरने का।

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R.K.Shukla “Anuj”
VMW Team (India’s New Invention)
vmwteam@live.com

कोलावेरी डी का हिंदी संस्करण

टी. के. ओझा “नीशू” 

दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुपरस्टार धनुष अपने सुपरहिट गीत कोलावेरी डी का हिंदी संस्करण तैयार कर रहे हैं। अभी तक डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोगों ने इस गाने को वीडियो शेयरिंग साइट यू-ट्यूब पर सुना है।

रजनीकांत के दामाद धनुष ने यह गीत अपनी पत्‍‌नी ऐश्वर्या की फिल्म 3 के लिए तैयार किया है। सूत्रों केमुताबिक पहले इस गीत के हिंदी संस्करण को अभिषेक बच्चन और अक्षय कुमार अपनी आवाज देने वाले थे मगर गाने की लोकप्रियता को देखते हुए धनुष ने खुद ही इसे हिंदी में गाने का फैसला किया है। इस गाने की पंक्तियां होगी, डिस्टेंस पर मेरे चांद चांद, मर गई मेरी नींद..।
धनुष ने बताया कि उन्हें हिंदी नहीं आती है इसलिए उन्होंने अपने दोस्त की मदद से कोलावेरी डी के तमिल शब्दों का हिंदी में अनुवाद कराया और संगीत के अनुसार उसे ढाला। यह गाना हिंदी और अंग्रेजी में गाया गया है। जल्द ही इसका रीमिक्स संस्करण भी आएगा। देखना यह है कि कोलावेरी का हिंदी संस्करण हिट हो पाता है या नहीं।

कछुए की पीठ पर सवार ओवरब्रिज निर्माण सलेमपुर



ओवरब्रिज निर्माण में देरी से लोग झेल रहे परेशानी।



कछुआ गति से चल रहा ओवरब्रिज निर्माण कार्य।
 फाटक पर रुक जाती है वाहनों की रफ्तार,
जाम से निजात पाने को अभी डेढ़ साल का इंतजार
 जाम की दुश्वारियों से जूझते सलेमपुरवासियों को इससे निजात पाने के लिए फिलहाल अभी डेढ़ साल और इंतजार करना पड़ेगा। रेलवे के आठ सी फाटक पर बन रहे ओवरब्रिज निर्माण की धीमी गति में फिलहाल तेजी आती नहीं दिख रही है। यहां आकर हर रोज जाम में फंसकर सैकड़ों वाहनों की रफ्तार थम जाती है। विभागीय अधिकारी जहां कुशल मजदूरों की खासी किल्लत बता रहे हैं तो दूसरी तरफ लोग विलंब की वजह अधिकारियों की उदासीनता बता रहे हैं। देवरियाबलिया सड़क मार्ग पर स्थित सलेमपुर रेलवे स्टेशन के दक्षिणी फाटक पर ओवरब्रिज को लेकर स्थानीय जनता लंबे समय से मांग करती रही थी। रेलवे फाटक पर यातायात के बढ़ते दबाव को देखते हुए वर्ष 2009 में ओवरब्रिज निर्माण स्वीकृत हुआ। इसकी कुल लागत 14.41 करोड़ रुपये है, जिसमें प्रदेश सरकार द्वारा 12.20 करोड़ एवं रेलवे द्वारा 2.20 करोड़ रुपये स्वीकृत हुआ। शुरू में काम की गति काफी तेज रही परंतु विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के चलते काम अत्यंत मंद गति से चल रहा है। ब्रिज को इस वर्ष जून तक पूरा होना था, परंतु विलंब की वजह से मार्च 2012 तक समयावधि बढ़ा दी गई। अब हालत यह है कि कार्यदायी संस्था उप्र राज्य सेतु निगम के देवरिया इकाई द्वारा कार्य में देरी से लोगों की मुश्किलें बढ़ती जा रही है। खुद सेतु निगम के जिम्मेदार अधिकारी स्वीकार कर रहे हैं कि निर्धारित समयावधि में काम पूरा होना संभव नहीं है। सेतु निगम के अवर अभियंता एसएस श्रीवास्तव ने बताया कि मजदूरों की कमी से प्रोजेक्ट में विलंब हो रहा है। बंगाल के कुशल मजदूर इंटीरियर में बिजली, पानी और रहने की असुविधा के चलते आने को तैयार नहीं। स्थानीय मजदूरों से किसी तरह काम कराया जा रहा है। जिस गति से काम हो रहा है, उसके हिसाब से दिसंबर 2012 से पहले ओवरब्रिज निर्माण कार्य पूरा होने की उम्मीद नहीं है। अवर अभियंता आरएन सिंह ने बताया कि करीब 25-30 अनट्रेंड मजदूरों से कंकरीट का काम करवाया जा रहा है। भारी संख्या में कुशल मजदूरों की जरूरत है। क्या कहते हैं जिम्मेदार करोड़ रुपये प्रोजेक्ट की लागत करोड़ रुपये प्रदेश का हिस्सा
में शुरू हुआ था काम पुल के समीप संपर्क मार्ग का 1 मार्च को टेण्डर हो गया था। ठेकेदार ने गांधी चौक से 25 नंबर पीयर तक सड़क पिच करा दी। इसके आगे पोल तार पड़ रहे हैं। जिसे हटाने के लिए सेतु निगम ने बिजली विभाग को 42.18 लाख रुपये 11 फरवरी को दे दिया।पर तार हटे पोल। इससे संपर्क मार्ग और ओवरब्रिज का काम रुका है। नगर पंचायत भी अतिक्रमण नहीं हटवा रहा है ताकि निर्माण हो सके।
आरएन सिंह सेतु निगम के जेई बिजली विभाग के अधिशासी अभियंता ने कहा 31 मई से तार पोल हटवाने का काम शुरू करा दूंगा।
एसबी राम, अधिशासी अभियंता सेतु निगम बताए कि उसे किस प्लेस की जरूरत है। वहां से अतिक्रमण हटा दिया जाएगा, हम तैयार हैं।
राधेश्याम सोनकर, अधिशासी अधिकारी नगर पंचायत अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर डाल रहे सलेमपुर में विभागों के अधिकारियों के झाम में आखिर जनता पिस रही है। सेतु निगम, नगर पंचायत, बिजली विभाग, आरटीओ विभाग अपनी जिम्मेदारियों से बच रहे है। अपनी जिम्मेदारी दूसरे के कंधे पर डाल रहे हैं, जिससे समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। ऐसे दूर होगा जाम
देवरियाबलिया की कम हो जाएगी दूरी, रेलवे क्रासिंग से मिलेगी निजात, बचेगा समय क्या हैं दिक्कतें आए दिन लग रहा है लंबा जाम,
पश्चिमी डाइवर्जन रूट की पुलिया टूटी। मजदूरों की कमी से प्रोजेक्ट में विलंब हो रहा है। बंगाल के कुशल मजदूर असुविधा के चलते आने को तैयार नहीं। जिस गति से काम हो रहा है, उसके हिसाब से 2012 से पहले ओवरब्रिज निर्माण कार्य पूरा होने की उम्मीद नहीं है। अवर अभियंता, एसएस श्रीवास्तव 2009 जून 2011 में पूरा होना था काम पूर्ण होने की नई तिथि 2012 बिलंब का कारण मजदूरों की कमी  |
VMW Team के लिए अमर उजाळा के रिपोर्टर पवन मिश्रा की रिपोर्ट

जुनून —- डाक्टर वि.वी. तिवारी का

VMW Team   के लिए  सलेमपुर (देवरिया) के जागरण के पत्रकार जितेंद्र उप्पाधाय की रिपोर्ट..

       डावी वी   तिवारी की जमात में यदि लोग शामिल हो जाएं तो प्लास्टिक युक्त सामग्री के जलने से निकलने वाले कार्बन मोनोआक्साइड इससे ओजोन की परत में छिद्र होने की चिंता से विश्व समुदाय बच सकता है। पालीथिन के विरुद्ध पिछले 13 वर्षो से डा. व्यास तिवारी की जंग चल रही है। तहसील मुख्यालय सलेमपुर के टीचर्स कालोनी निवासी 54 वर्षीय चिकित्सक डा. तिवारी ने 13 वर्ष पूर्व 5 जून 1998 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ही डिस्पोजल निर्मित सामान के साथ पालीथिन का प्रयोग करने का संकल्प लिया। इस पर वे आज भी कायम हैं। तब विकास खंड क्षेत्र सलेमपुर के भरथुआं चौराहे पर आयोजित एक समारोह में जिला वन अधिकारी आरसी झा ने उन्हें प्रेरित किया और इस पर अमल करने का उन्होंने संकल्प लिया। हालांकि, इसके चलते उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। डाक्टर साहब कहते हैं कि जब कभी ऐसा मौका आता है, वे साफगोई से अपनी बात रखते हुए पालीथिन के इस्तेमाल से मना कर देते हैं। उनके इस प्रयास के लिए गणेश समाज कल्याण शिक्षा संस्थान सहित विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित भी किया है। डा. तिवारी कहते हैं कि इस 5 जून से वे इसके लिए युवाओं को प्रेरित करने का अभियान शुरू करने वाले हैं। डा. तिवारी को पर्यावरण संरक्षण के प्रति छात्र जीवन से ही प्रेरणा मिलती रही। नेहरू युवा केन्द्र से सामाजिक गतिविधियों की शुरुआत करते हुए उन्होंने विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण स्वास्थ्य क्षेत्र में हमेशा योगदान किया। कहते हैं, प्लास्टिक पालीथिन के खतरों से हर कोई चिंतित हैं। बावजूद इसके, ‘यूज ऐंड थ्रोवन टाइम यूजके कल्चर ने पालीथिन को हर आदमी के जीवन का हिस्सा बना दिया है। पर, अपने आसपास कचरों का पहाड़ बनने से रोकना है तो पालीथिन से तौबा करना ही होगा। उनके यहां विवाह अन्य उत्सवों में भी डिस्पोजल थाली गिलास का इस्तेमाल नहीं होता। वे कहते हैं कि इसमें उन्हें कोई दिक्कत भी नहीं आती।
जितेंद्र उप्पाधाय
 दैनिक जागरण देवरिया 
VMW Team 

बहादुरो की धरती ——– सरकारी उपेच्छावों का शिकार

एन. डी. देहाती
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला का गाव पैना बहादुरो की धरती है . आजादी की जंग मे इस गाव का बहुत योगदान रहा है . आज यह गाव सरकारी उपेच्छावों का शिकार हो गया है यह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रणबांकुरों की धरती है। जांबाजों ने इसे दो माह तक आजाद रखा। जब तक उनके शरीर में रक्त की अंतिम बूंद बची रही, फिरंगी इस धरती पर कदम नहीं रख पाए। शहीदों की याद में स्मारक बना। पर, अफसोस सरकारी उपेक्षा से यादें रो रही हैं। यह कहानी पैना गांव की है। यहां सतिहड़ा नाम से बना स्मारक जमींदारों, किसानों व स्ति्रयों की शहादत का प्रतीक है। 1997 में सितंबर माह में मुख्यमंत्री मायावती के हाथों शहीद स्मारक की आधारशिला रखवाई गयी थी। स्मारक बन तो गया, मगर उसके बाद किसी भी सरकार अथवा जनप्रतिनिधि को उसके रख-रखाव व विकास की सुधि नही आई। आज ही के दिन किया था आजादी का एलान : 10 मई 1857 को मेरठ में भड़की विद्रोह की चिंगारी पैना भी पहुंची। यहां के जमींदारों ने ठाकुर सिंह की अगुआई में 31 मई 1857 को ब्रिटिश हुकूमत को नकारते हुए आजादी का एलान कर दिया। बागियों ने गोरखपुर से पटना और गोरखपुर से आजमगढ़ जाने वाले नदी मार्ग पर बरहज के पास कब्जा कर लिया। आजमगढ़ जाने वाले अंग्रेजी कुमुक की रसद और खजाने का लूट लिया। उस समय आजमगढ़ ब्रिटिश फौज की प्रमुख छावनी था। लिहाजा आजमगढ़ में जाने वाली कुमुक को रोकने की रणनीति पैना के बागियों ने अपनाई। अंग्रेजों ने बोला जल और थल से हमला : घबराए अंग्रेजों ने 20 जून 1857 को मार्शल लॉ घोषित कर दिया। बावजूद इसके स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के हौसलों में कोई कमी नही आई। पैना में ठाकुर सिंह के नेतृत्व में 600 सैनिकों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। बौखलाए अंग्रेजों ने 31 जुलाई 1857 को पैना पर जल व थल मार्ग से हमला कर दिया। अंग्रेजी पलटन ने संयुक्त रूप से उत्तरी छोर से गांव पर हमला बोला। विद्रोही सेना ने सीमित संसाधनों के बावजूद मुंहतोड़ जवाब दिया। बौखलाई फिरंगी फौज ने होरंगोटा स्टीमर से पैना पर करीब तीन किमी के दायरे में चार जगह से तोप के गोले बरसाए। 395 शहीदों की धरती : गांव के बुजुर्ग नागरिक एवं जुबली इंटर कालेज गोरखपुर के पूर्व प्रधानाचार्य 88 वर्षीय अनिरुद्ध की जुटाई जानकारी के अनुसार कुल 395 लोग यहां शहीद हुए। इसमें 85 लोग तो तोप के गोलों और गोलियों से मारे गए थे।
 

विद्युत उपकेन्द्र लार, है बहुत बेकार . भागलपूर फिडर का गाव हरखौली, रहता है अनहार

हरखौली गाँव 
जर्जर विद्युत उपकरण व पोल के बीच कर्मचारियों का संकट, कमोवेश सभी विद्युत उपकेन्द्रों की यही तस्वीर है। विद्युत उपकेन्द्र लार के द्वारा क्षेत्र के उपनगर सहित तकरीबन 300 गांवों को बिजली की आपूर्ति की जाती है। यह जिम्मेदारी मात्र चार कर्मचारियों के कंधे पर है, जिनके द्वारा सुचारू रूप से कार्य सम्पादित न कर पाने के चलते लोकल फाल्ट की शिकायतों से उपभोक्ताओं को कई दिनों तक जूझना पड़ रहा है।
मालूम हो कि विद्युत उपकेन्द्र लार 1974 में स्थापित की गई।  लार उपकेन्द्र पर क्षेत्र के तकरीबन 300 गांवों को बिजली की आपूर्ति करने के लिए चार फीडर लगाए गए हैं, जिनमें टाउन फीडर, साउथ-ईस्ट फीडर, साउथ-वेस्ट फीडर व नार्थ फीडर शामिल हैं। यहां लगे दो ट्रांसफार्मरों की क्षमता 5-5 एमबीए की है। लिहाजा ये फीडर मात्र 262.5 एम्पीयर का लोड ही ले पाते हैं, जबकि इससे तकरीबन दोगुनी विद्युत खपत जारी है। लिहाजा ओवरलोड के चलते अधिकांश क्षण आपूर्ति प्रभावित रहती है। खास बात यह है कि यहां तैनात 3 लाइनमैन व 1 पेट्रोलमैन सहित चार कर्मचारियों की औसत उम्र 55 वर्ष है, जिनके द्वारा विद्युत पोल पर चढ़कर फाल्ट ठीक कर पाने को उम्र ही गवाही नहीं देती। ये सभी विद्युतकर्मी अपने प्राइवेट लाइनमैन के सहारे अपना काम निपटाते हैं। इन्हीं प्राईवेट लाइनमैनों में से किसी के विद्युत हादसे का शिकार हो जाने पर विभाग भी मदद देने के बजाय उनसे पल्ला झाड़ लेता है। यहां तैनात एसएसओ मिथिलेश वर्मा ने कहा कि विद्युत कर्मचारियों के अभाव में आपूर्ति आएदिन प्रभावित होती है। इसके अलावा ओवरलोड के अनुसार विद्युत उपकरण न बदले जाने से भी परेशानियां हो रही हैं।
 
रिपोर्ट – पवन पाठक
पत्रकार आज
लार (देवरिया)

रेल बज़ट- दरियादिली नही दीदी की,यह दीदी की माया है

डॉ. आर. वी. चतुर्वेदी
  आज ममता बनर्जी  अपना रेलवे बजट पेश कर रही है, सुबह से ही मीडिया का फोकस रेलवे बजट पर था, न्यूज़ एंकर ग्राफिक्स की बनीं ट्रेनों में बैठकर एंकरिंग कर अपना मज़ाक उडवा रहे और संवाददाता रेलवे स्टेशनों में जा-जाकर लोगों से उनकी बजट पर राय ले रहे थे। न्यूज़ चैनलों में ममता उनकी दीदी बनकर छायीं रहीं रेल बज़ट पर VMW Team  के डॉ. आर. वी. चतुर्वेदी जी की एक रिपोर्ट…

    25 फरवरी जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे दिल की धड़कने तेज हो रही हैं। सांसें अटकी हैं। डर लग रहा है कहीं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पटना जाने वाली उसी ट्रेन की सेकेंड क्लास टिकट खरीदने के लिए जेब से ज्यादा पैसे तो खर्च नहीं करने पड़ेंगे। घर जाने से पहले 10 बार सोचने की नौबत तो नहीं आएगी। बड़े भाई देवरिया  में रहते हैं। कहीं उनके बुलावे पर बहाना तो नहीं बनाना पड़ेगा। जी हां रेल बजट आने वाला है। एक साल से घर का बजट आर्थिक मंदी ने बिगाड़ा है। घर के कुछ बर्तन संभाल के इकठ्ठा किए तो महंगाई ने उसे तितर-बितर कर दिया। शहर में रहने वालों को गांव के अनाज का सहारा था। लेकिन डर है कि कहीं रेलवे का बजट बिगड़ गया तो गांव जाने का हालत भी नहीं रहेगी। लालू यादव का रेलवे बजट लंदन के मैनेजमेंट वालों को भी भाया। लेकिन ममता बनर्जी का पिछला रेल बज़ट कुछ खास नहीं रहा, एक अदद रेलमंत्री हिमाचल से होगा तो वहां भी रेल चलेगी वरना यूं लगता है कि रेलों की ज़रूरत केवल बिहार ओर बंगाल में ही पड़ती है…
ममता बनर्जी अपने हर भाषण में खुद को गरीबों का मसिहा बताते हुए कहती है  कि ‘उन्होंने अपने पुरे कार्यकाल में न ही रेल किराया बढाकर आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डाला है और न ही घाटे का रेल बज़ट पेश किया़’.पर क्या रेलमंत्री लोगों को इस हद तक बेवकूफ समझते हैं कि आम जनता उनकी बातों का सही आकलन भी नहीं कर सकती?
उन्होंने लाभ का बज़ट पेश ज़रुर किया है पर भाड़े को पिछले दरबाजे से बढाकर.आज स्थिति यह है कि ट्रेनों की संख्या बढाने के बजाए, जनरल कोटे के सीट घटाकर तत्काल कोटे की सीट संख्या बढा दी गई है.ट्रेनों को सुपरफास्ट कर भाड़ा तो अधिक वसूला जा रहा है पर आज भी वे ट्रेनें सफ़र तय करने में उतना ही समय ले रही है जितना पहले लेती थी|

रेलवे की तरह नेता और बाबु का भी बज़ट भारी-भरकम होता है
तभी तो रेल मंत्रालय के लिए,मारा – मारी होता है।
 
डॉ. आर. वी. चतुर्वेदी
VMW Team (India’s New Invention)
+91-9044412246,45,27,23

देवरिया..मेरी पहचान

पाठक बाबा  

 

 ऐतिहासिक दृष्टि से देवरिया कौशल राज्य का भाग था जनपद के विभिन्न भागों में बहुत सारे पुरातात्विक अवशेष मिले हैं जैसे :- मंदिर, मूर्तियाँ, सिक्के, बौद्धस्तूप, मठ आदि बहुत सारी कथाएँ भी इसकी प्राचीन गतिशील जीवनता को सत्यापित करती हैं कुशीनगर जनपद जो कुछ साल पहले तक देवरिया जनपद का ही भाग था का पौराणिक नाम कुशावती था और भगवान राम के पुत्र कुश यहाँ राज्य करते थे और भगवान बुद्ध की परिनिर्वाण    स्थली भी यही है देवरिया का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है देवरिया जनपद के रुद्रपुर में प्रसिद्ध प्राचीन शिवलिंग है जो बाबा दुग्धेश्वर के नाम से ग्रंथों में वर्णित है और इस क्षेत्र की जनता जनार्दन इनको बाबा दुधनाथ के नाम से पुकारती है इतिहास की माने तो रुद्रपुर में रुद्रसेन नामक राजा का किला था और इसी कारण यह रुद्रपुर कहलाया पर मेरे विचार से भगवान रुद्र (शिव) की पुरी (नगरी) होने के कारण इसका नाम रुद्रपुर पड़ा होगा सरयू नदी के तट पर बसे बरहज की धार्मिक महत्ता है दूरदूर से श्रद्धालु यहाँ आते हैं
देवरिया जनपद देवरिया सदर, भाटपार रानी, रुद्रपुर,सलेमपुर और बरहज इन तहसीलों में विभाजित है विकास खंडों की संख्या १६ है:- देवरिया, भटनी, सलेमपुर, भाटपार रानी, बैतालपुर, रुद्रपुर, लार, गौरीबाजार, बनकटा, भागलपुर, देसही देवरिया, भलुवनी, बरहज, रामपुर कारखाना, पथरदेवा और  तरकुलवा
शहीद स्मारक, हनुमान मंदिर, सोमनाथ मंदिर और देवराही मंदिर, चौरीचौरा, फाजिलनगर और परशुराम धाम आदि यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से हैं। उत्तर प्रदेश का यह जिला 2,613 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। पहले इस जगह को देवरनया या देवपुरिया के नाम से जाना जाता था, लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर देवरिया रख दिया गया। माना जाता है कि यह जगह कौशल राज्य का एक हिस्सा था। इसका उल्लेख रामायण महाकाव् में भी मिलता है। यह क्षेत्र कई वंशों जैसे मौर्य, गुप्त, भार और गढ़वाल आदि के अधीन काफी लम्बे समय तक रहा है। यह जिला कुशीनगर के उत्तर, मऊ एवं बलिया के दक्षिण, गोरखपुर के पश्चिम और गोपालगंज एवं सिवान के पूर्व से घिरा हुआ है।
देवरिया मे एक और प्रसिद्ध स्थान हैदेवराहा बाबा का स्थानजो की लार रोड के पास  स्थित है , देशविदेश से लोग इस पवित्र स्थान को देखने और बाबा जो समाधी ले लिये हैं के अशीर्वाद प्राप्ति हेतु आते हैं

पंडित नगनारायण पाठक
संजाव, देवरिया

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