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…वो कहर बरसाती है – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

वह पायल नहीं पहनती पांव में
 बस एक काले धागे से कहर बरसाती है
उसकी यही अदा तो ‘निल्को’
मुझे उसका दीवाना बनाती है
बहुत मजे से इठलाती है
 गूढ़ व्यंग की मीन बहुत बनाती है
माथे पर जब बिंदी लगाती है
तो पूरे विश्व को सुंदर बनाती है
‘मधुलेश’ का ख्याल आए तो
वह भी कविता बनाती है
जीवन की गहन अनुभूतियों पर
लिखने का प्रयास कर रचना वो बनाती है
मौसम बेईमान हो जाए जो तपाक से
रसोई में जाकर पकोड़े वो बनाती है
बस कुछ ही यूं ही आए हैं बड़े दिनों बाद इस ब्लॉग पर
पढ़कर वह भी इसे सार्थक बनाती है
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एम केपाण्डेयनिल्को

जौ के ठेकाने ना, सतुआने के तैयारी – भोजपुरी व्यंग्य -एन डी देहाती

14 अप्रेल 17 के सतुआन ह। अब लखनऊआ , दिल्लिहिया कहि दिहे सतुआन का होला। पुरबिहन से पूछ ल। सतुआन के पुरवर परिभाषा बता दीहें। सतुआ भी एगो संस्कृति ह, सादगी के, समानता के, सहजता के। पुरनिया लोग बहुत पहिले से सतुआन मनावेलन। हमहुँ मनाईलन। लोग जौ बोअल छोड़ दिहल जेकरा चलते सतुआ पर संकट आ गईल बा।
हिन्दू पतरा परम्परा में सौर मास के हिसाब से सुरूज देवता जहिआ कर्क रेखा से दखिन के ओर जाले तहिये मेष संक्राति लागेला। ओहि के सतुआन कहल जाला। एहि दिन से खरमास के भी समाप्ति हो जाला आ रडूहन के शादी विवाह होखल शुरू हो जाला।
जवन असकतिहा सालों साल ना नहात होइहैं उहो सतूआन के दिन जरूर नहा लेलन। एही से कहल गईल- असकतिहन के तीन नहान।
खिचड़ी, फगुआ औ सतुआन।।
सतुआन के बहुत तरह से बनावल जाला, सामान्य रूप से आज के दिन जौ के सत्तू गरीब असहाय के दान करे के प्रचलन बा। आज के दिन लोग स्नान पावन नदी गंगा में करे ला, पूजा आदि के बाद जौ के सत्तू, गुर, कच्चा आम के टिकोरा आदि गरीब असहाय के दान कइल जाला आ इष्ट देवता, ब्रह्मबाबा आदि के चढ़ा के प्रसाद के रूप में ग्रहण कइल जाला। ई काल बोधक पर्व संस्कृति के सचेतना, मानव जीवन के उल्लास आ सामाजिक प्रेम प्रदान करेला। पूर्वांचल में चाहे केहू केतनो अमीर होखे आज के दिन सादगी में मनावे खातिर सतुआ के ही भोग लगायी। गावँ से उजड़त गोनसार( भूजा भुजने का चूल्हा , जो गोंड जाति का परम्परागत पेशा रहा), समहुत में जौ के बुआई, नेवान में जौ के भुनल बालि के परसादी अब दुलम होत बा। भाई हो जौ ना बोआई त सतुआ कहा से आयी। सतुआन के पर्व हमे याद दिलावेला। सतुआ के। सतुआ खातित जौ जरूरी बा। जौ के जय जय कार कईल जा। डॉक्टर की कहला पर ना, अपनों विचार से थोड़ा बहुत जौ बोअल जा।
फेरू कबो भेंट होई त दूसरे टॉपिक पर बतकुचन होई। जय राम जी के।

यात्रा वर्णन द्वारा एम के पाण्डेय निल्को

घड़ी में करीब सुबह के सात बज रहे थे, डैडी को सिद्धेश उर्फ़ यश के स्कूल में मीटिंग में शामिल होने जाना था तभी उनकी नज़र बालकनी से रोड पर खड़ी अपनी कार पर गई । उन्होंने कहा की, मधुलेश कार बहुत गन्दी हो गई है इतना सुनते ही मधुलेश बाल्टी और मग उठाये और छत से नीचे आ गए । पानी से भरी बाल्टी पूरे मोहल्ले की नज़र में थी कारण एक मात्र की मोहल्ले में कई दिन से पानी कम आ रहा था और मैं इस समय अपनी कार साफ कर रहा था । तभी मंदिर से गुड्डू चाचा लौट रहे थे। अभिवादन हुआ फिर उन्होंने मथुरा जाने का प्रोग्राम बनाया , बोला की कल एकादशी है चलते है गोवर्धन पर्वत की प्रक्रिमा करने । ऑफिस जाना है , बहुत काम है ये दलीले पेश हुई किन्तु उस मुरली वाले के आगे किसकी चलती है । प्रोग्राम फिक्स हो गया मैंने बोला की मैं ऑफिस से 1 बजे आ जाऊँगा। 3 बजे करीब ट्रेन थी बिना आरक्षण की यात्रा करनी थी , मन में संदेह था की सीट मिलेगी या नहीं किन्तु दिल ने कहा देखा जायेगा । ऑफिस में जल्दी जल्दी काम निपटा रहा था तब तक गुड्डू चाचा का फोन बजा बोले की 1 बजे घर आ जाना , स्टेशन भी टाइम पर जाना है । मैंने भी उत्साह पूर्वक बोला की ठीक है ।
एक बज कर 10 मिनट पर मैं अपने घर पर था । सामान पैक और चलने को मन बेकरार । 2 बजते है गुड्डू चाचा शुभम के साथ आये और बोले की नीलेश नहीं चलेगा क्या? नीलेश स्कूल से 2 बजकर 20 मिनट तक घर आता है , इंतज़ार करते तब तक लेट हो जाती । हम तीन लोग घर से निकल पड़े । पेलटफ़ॉर्म पर ट्रेन का इंतज़ार तभी फोन की घंटी बजती है और डैडी कहते है की ट्रेन कब तक आएगी समय है तो बताओ नीलेश भी जायेगा । मैंने भी कहा की अभी लगभग एक घंटा है । थोड़ी ही देर में नीलेश को लेकर डैडी स्टेशन आ गए , मैं उसे लेने के लिए पेलटफ़ॉर्म से बाहर आया और उसे उस जगह पर ले आया जहा गुड्डू चाचा और शुभम खड़े थे ।
जयपुर जंक्शन का पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 , खचाखच लोगो की भीड़ ट्रेन में और पेलटफ़ॉर्म पर , सब लोग एक उम्मीद से आती हुई जयपुर इलाहाबाद एक्सप्रेस को देख रहे है , तभी कान के पास चाय वाला बोलता है – चाय चाय गरमा गर्म चाय । पारा वैसे ही गर्म हो रहा है, जयपुर का तापमान वैसे ही 42 है ऊपर से लोगो भी भीड़ उसमे चार चाँद लगा रही है । जैसे ही ट्रेन पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 पर रूकती है सवारिया उतरने और चढ़ने के लिए कोशिश कर रहे है वही पर मैं भी गेट पर हाथ लगा कर नीलेश और शुभम को आगे आने के लिए बुला रहा हूँ । दोनों बालक ट्रेन में बड़ी ही मुश्किल से चढ़ते है और पहले ही सीट पर कब्ज़ा।
चार लोग एक सीट जायज है किन्तु यदि डिब्बा अनारक्षित हो तो ये ठीक नहीं । इसी नियम को पालन करते हुए एक और महिला जो की एक 3 वर्षीय बच्ची के साथ अकेले यात्रा कर रही थी उसको जगह दी माफ़ी चाहूँगा जगह दी नहीं , जगह बनाई । बैठने के लगभग 40 मिनट बाद ट्रेन चली और 5 मिनट में ही दूसरा स्टेशन आ गया जिसका नाम है गांधी नगर जयपुर । भीड़ अपने आप में ही सब कुछ बया कर रही थी फिर भी जनता आज रिकॉर्ड तोड़ने के मूड में दिख रही थी । जैसे तैसे ट्रेन चली , कुछ खड़े, कुछ अड़े और कुछ है बैठे । छोटे छोटे कई स्टेशन निकल रहे थे , ट्रेन अपनी अधितम रफ़्तार में थी । गरमा गर्म हवा मुझे और भी गर्म कर रहा था , मन तो कविता लिखने का था किन्तु शांत वातावरण मिला ही नहीं और कविता गिर गई ठन्डे बस्ते में । दौसा स्टेशन आया , प्यास बढ़ रही थी पर पेलटफ़ॉर्म दूसरी तरफ आया कोई बेचने वाला भी नहीं आया , मन को मनाया की थोड़ी देर रुके  और वो मान भी गया , ट्रेन चल दी भीड़ और बढ़ गई।
मैं  बैठ के बोर हो रहा था तभी दिमाग की बत्ती जली और जेब से अपना स्मार्ट फोन निकाला और बैठे बैठे ही लिखने लगा यात्रा वर्णन । ट्रेन बांदीकुई पहुँच रही है कुछ लोग उतर रहे है कुछ उलटी साइड से चढ़ रहे है । पानी आया , सभी अपनी अपनी प्यास बुझाए । एक छोटा बालक पानी की ज़िद करने लगा किन्तु उसकी दादी के पास पानी नहीं था उस समय । बच्चा कई बार पानी के लिए बोला , रोने की शक्ल भी बनाई । जब ये बात गुड्डू चाचा सुने तो उसे अपनी बोतल दिलवाई जिसमे थोडा पानी बचा था बच्चा आव देखा न ताव मुँह लगाया और पानी ……..गले के नीचे जैसे ही पानी उतरी उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी । ट्रेन में सब लोग बैठने और बैठाने की बात कर रहे है किन्तु ये ठोस कदम उठाये कौन ?
एक सज्जन ऊपर की सीट पर बैठने की ज़िद करने लगे । लाख मना करने पर भी नहीं माने कोशिश की ऊपर चढ़ने की , सफल भी हुए पर एक दो मिनट के लिए ही । पैर फिसल रहा था उनका पर मेरा दिल धड़क रहा था की कही वो मेरे ऊपर न गिर जाये । उनके दिल तक मेरी बात पहुची और वो पूरे 5 मिनट में  नीचे उतर आये । ट्रेन अलवर पहुँच रही थी , मुझे अपना इतिहास याद आ रहा था , आखिर राजस्थान की शुरुआत मैंने यही से की थी । बहुत ही मनोरम और ऐतिहासिक जगह है अलग । महाभारत के कई किस्से यहाँ की माटी में मिलते है । हसन खा मेवात नगर , जैन साहब का मकान, कैलाश पब्लिक स्कूल सब कुछ याद आ रहा था , मन रोम रोम खिल रहा था । तभी अचानक से नज़र दूसरी सीट पर बैठे दो आदमी पर पड़ी उम्र से वो नवयुवक लग रहे थे किन्तु बात वो धर्म की कहानियो पर कह रहे थे , कुछ पुरानी कहानी सुना रहे थे । बगल वाली सीट पर कुछ महिलाये भजन कीर्तन कर रही थी वो भी इस भीड़ में । उनकी इस ईश्वरी प्रेम को मैं प्रणाम करता हूँ जिस पर भीड़ का कोई भी असर नहीं पड़ रहा था ।
एम के पाण्डेय निल्को

सबसे पहले मतदान फिर करें और काम

आओ चलें मतदान करें, सबसे पहले मतदान, फिर करें और काम, आपका एक-एक वोट महत्वपूर्ण है, 
मतदान अवश्य करें, मतदान प्रतिशत बढ़ाएं।

सारे काम छोड़ दो सबसे पहले वोट दो 
मतदान आपका हक है और जिम्मेदारी भी

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मन की बात – एम के पाण्डेय निल्को

हम में से ज्यादातर लोगों का कोई टाईम टेबल नहीं होता, जब मन किया पढने बैठ जाते हैं, जो मन किया किताब उठा लेते हैं और पढने लगते हैं, कोई भी टॉपिक बीच से ही पढ्ने लग जाते हैं, इससे सिवाय confusion के कुछ हाथ नहीं लगता हमें ये तक पता नहीं रहता कि हमने कौन सा विषय कितना पढ लिया है, और लोग बेवजह ही अपनी meomory को दोष देते हैं, एक बेहतर रणनीति ही बेहतर जीत दिला सकती है, और रणनीति का पहला हिस्सा जो कि यहाँ पर टाईम टेबल है, यदि यह कमजोर है तो आप जीत की आशा कैसे कर सकते हैं, तो बेहतर सफलता के लिये एक बेहतर टाईम टेबल बनाईये

एम के पाण्डेय निल्को
ब्लॉगर

हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।

भारत देश एक बहुभाषी राष्ट्र है। जहाँ अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा के अतिरिक्त अनेक प्रकार की भारतीय भाषाएँ , उपभाषाएँ , आंचलिक भाषाएँ , बोलियाँ ,उपबोलियाँ आदि बोली जाती हैं। इन भाषाओं में हिंदी एकता की कड़ी है।  हमारे सन्तों, समाज सुधारकों और राष्ट्रनायकों ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिंदी को अपनाया।  क्योंकि यही एक भाषा है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक और राजस्थान से असम तक समान रूप से समझी जाती है।  हिंदी ही एकमात्र भाषा है जो समस्त भारतीय को एकता के सूत्र में जोड़ने का कार्य सम्पन्न करती है।   हिंदी सहज , सरल एवं वैज्ञानिक भाषा है ,जिसने बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के उदारता का परिचय देते हुए अपनी वैज्ञानिकता को क्षति पहुँचाए बिना सहज ही समस्त विदेशी , देशी , आगत ,तत्सम आदि शब्दों को अपने भीतर सुगंध की तरह समा लिया है।  हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। सरलता से कहें तो हिन्दी उस माँ की तरह है जो अपने पुत्र के मित्रों को भी वही स्नेह और सम्मान देती है। वह अपने – पराये का भेद नहीं करती। वर्तमान युग हिंदी मीडिया का युग है।  हिंदी भाषा का निर्माण और आगे बढ़ाने का कार्य मीडिया ने किया है। इंटरनेट और मोबाइल ने हिंदी को और विस्तार दिया, हिंदी में संप्रेषण की ताकत है।  हिंदी यूनिकोड हुई तो ब्लॉगगिंग में बहार आ गई।  चिट्ठा लिखनेवालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई।  गूगल का मोबाइल और वेब विज्ञापन नेटवर्क एडसेंस हिंदी को सपोर्ट कर रहा है।  इंटरनेट पर 15 से ज्याद हिंदी सर्च इंजन मौजूद हैं।  सोशल साइट में हिंदी छाई हुई है।  21फीसदी भारतीय हिंदी में इंटरनेट का उपयोग करते हैं।हिंदी राजभाषा के बाद अब वैश्विक भाषा बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है। डिजिटल दुनिया में हिंदी की मांग अंग्रेजी की तुलना में पाँच गुना तेज है।  हिंदी मातृभाषा और राजभाषा से एक नई वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी बदल रही है। वह नई प्रौद्योगिकी, वैश्विक विपणन तंत्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा बन रही है। आज मोबाइल की पहुँच ने गाँव-गाँव के कोने-कोने में संवाद और संपर्क को आसान बना दिया है।  इस वजह से बाजार में आ रहे नित नवीन मोबाइल उपकरण हर सुविधा हिंदी में देने के लिए बाध्य हैं। हिंदी की इस समृद्ध, शक्ति और प्रसार पर किसी भी हिंदी भाषी को गर्व हो सकता है।  हिन्दी की शुद्धता को लेकर तर्क दिए जाएँ परन्तु कोई ये बताये कि नई पीढ़ी शुद्ध व्याकरण वाली हिन्दी सीखे कहाँ से ? अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं सरकारी पाठशालाओं की स्थिति जग जाहिर है। जो हिन्दी के ज्ञाता हैं वे अधिकांशतः लेखन आदि कार्य से जुड़े हुए हैं ।  कुशल शिक्षकों के अभाव में बताइये भला किस मार्ग से आप शुद्ध हिन्दी प्रचारित – प्रसारित करेंगे? दूरसंचार के समस्त माध्यमों ने वैसे भी भाषा की एक नई परिभाषा गढ़ दी है।
प्रत्येक भाषा में अन्य भाषा के शब्द शुद्ध व विकृत रूप में आ गए हैं जिन्हें उनकी सरलता और बोधगम्यता के कारण अपना लिया गया है। अब हमारे पास पीछे मुढ़कर देखने का समय नहीं है। यदि हम चाहते हैं हिन्दी भाषा आगे बढे तो ख़ुशी-ख़ुशी उसे अपने अंदर सहजता से आये दूसरी भाषा के शब्दों के साथ आगे बढ़ने देना चाहिए उसके मार्ग में अनावश्यक रुकावट नहीं डालना चाहिए। अधिक से अधिक युवाओं को हिन्दी भाषा से जोड़ने के लिये और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने के लिये हमें कूपमंडूकता से ऊपर उठना ही होगा। इससे न हिन्दी भाषा की प्रगति रुकेगी और न विकास। बल्कि इस कदम से ये अंतर्राष्ट्रीय महत्तव की भाषा हो जाएगी। संसार में ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती है। जो लोग हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों विशेषकर अंग्रेजी से नाखुश हैं मैं हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए पूछना चाहूँगा क्या उनके पुत्र – पुत्री हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं  क्या उनकी संतति भी उनकी तरह भाषा शुद्धता अभियान को आगे बढ़ा पायेगी ? अपवाद छोड़ दिए जाएँ तो उत्तर सबको पता है। जब सब कुछ देश काल वातावरण की बाध्यता है तो फिर हिन्दी की शुद्धिकरण की तटस्थता को त्याग यहाँ भी उदार होना ही पड़ेगा।
वैश्वीकरण का दौर है। हिंदी के समक्ष भी बहुत अधिक चुनौतियाँ हैं। आज उसे फ़ैलाने से ज्यादा बनाये रखना आवश्यक है और ये कोई बहुत आसान कार्य नहीं है। जब लाखों शब्दों को बाहर से लेने पर भी अंग्रेजी का स्वरुप बिगड़ने के स्थान पर दिन ब दिन बढ़ रहा है तो हम हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों को लेकर क्यों विचलित हो रहे हैं ? डर रहे हैं ? अंग्रेजी ने शायद ही कोई भाषा हो जिससे कुछ न कुछ लिया ना हो। इस तरह तो हम हिंदी का समस्त क्षेत्रीय भाषाओं से भी वैमनस्य बढ़ा देंगे। यदि हिंदी को बाजारीकरण से परे भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से ज़माना है तो अन्य भाषा के शब्दों को जो सहज ही आते चले जा रहे हैं उनको तिरस्कृत करने से बचना होगा। अकेला चलो की नीति छोड़नी होगी , नहीं तो हिंदी को सिमटने में देर नहीं लगेगी।

एम के पाण्डेय ‘निल्को’

ट्रेन मे पड़ी जब नज़र

ट्रेन मे पड़ी जब नज़र
जैसे हो गई वो ब्रेकिंग ख़बर
पहली मुलाक़ात मे ही जच गई थी वो
और निल्को पर था उसका अब तक असर
qएम के पाण्डेय ‘निल्कों’


सूखा लोगों द्वारा ही पैदा किया गया?

प्रकृति और प्राणी दोनों ही एक दूसरे के सहचर हैं। दोनों मे से किसी एक के भी द्वारा पैदा किए गए असन्तुलन से दोनों को ही अस्वाभाविक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। प्राणियों में खासकर मानव के द्वारा लिप्सा बस प्रकृति के साथ निरन्तर की जा रही नाजायज छेड़-छाड़ भीषण प्राकृतिक असंतुलन का सामना धरती के विभिन्न भागों को करना पड़ता है। ऐसे प्राकृतिक असंतुलन कभी अवर्षण (सूखा) तो कभी अतिवर्षण (बाढ़) तो कभी भूकम्प के रूप में तबाही मचाते रहे हैं।

  • जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। 
देश भर में पानी को लेकर हाहाकार है। विशेषज्ञों का कहना है कि सागर और बूंदें अलग हो जाएं तो न सागर बचा रहेगा और न बूंद बचेगी और देश में भीषण सूखे की यह एक बड़ी वजह है। हमारे देश में लाखों की तादाद में तालाब थे, कुएं थे लेकिन हमने उन्हें रहने नहीं दिया, परिणाम हमारे सामने है। इस समय भारत में सूखे की समस्या ने एक विकराल रूप ले लिया है। महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ऐसे राज्य हैं, जिनके कुछ हिस्से इस समय सूखे की समस्या से जूझ रहे हैं। सूखे की बात आते ही हर कोई भगवान को दोष देने लगता है और इसे एक प्राकृतिक आपदा का नाम दे दिया जाता है। लेकिन क्या सूखे के लिए सिर्फ प्रकृति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? या इसके लिए और भी कोई दोषी है?सूखे और जल संकट पर शीर्ष अदालत ने बड़े ही तल्ख लहजे में कहा है कि देश के नौ राज्य सूखाग्रस्त हैं और सरकार इस पर आंखें बंद नहीं कर सकती। यह बुनियादी जरूरतों में से एक है और सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रभावित लोगों को इस समस्या से निजात दिलाए। भारत में सूखा पड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन क्या इसके लिए पहले से तैयार नहीं रहा जा सकता है? अगर बात करें सूखा पड़ने के कारण की, तो इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है सरकार की पॉलिसी। भारत में हर साल किसी न किसी क्षेत्र में सूखा जरूर पड़ता है और कई ऐसी जगहें भी हैं, जहां साल दर साल कमोबेश सूखे की स्थिति पैदा हो ही जाती है। बावजूद इसके सराकार की तरफ से कोई कड़े कदम नहीं उठाए जा रहे।

इस ओर न तो राज्य सरकार ध्यान देती है, न ही केन्द्र सरकार उस सूखी जमीन को हरा भरा करने की सोचती है। आलम ये है कि सूखे से परेशान होकर किसान आत्महत्या कर रहा है और नौजवान गांव छोड़कर शहरों की ओर रोजी रोटी की तलाश में निकल जा रहे हैं। गांव में बच रही हैं तो सिर्फ महिलाएं और लड़कियां।कई गांवों का तो ये हाल है कि लड़कियों की शादी भी नहीं हो रही है। सरकार पानी जमा करने का कोई इंतजाम नहीं करती है, बल्कि जब कहीं सूखा पड़ता है तो मदद के नाम पर चंद टैंकर पानी की भीख पहुंचा दी जाती है, जो उस गांव के प्यासे लोगों के बीच कुछ ऐसे गायब हो जाता है, जैसे बरसों से तपती जमीन पर पानी की बूंद पड़ते ही हवा हो जाती है।पूर्ववर्ती योजना आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश का 29 फीसदी इलाका पानी की समस्या से जूझ रहा है। वह भले ही जल संकट की सारी जिम्मेदारी कृषि क्षेत्र पर डाले, लेकिन हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की अहम भूमिका है। असल में फैक्टरियां ही अधिकाधिक पानी पी रही हैं। कई बार फैक्टरियां एक ही बार में उतना पानी जमीन से खींच लेती हैं, जितना एक गांव पूरे महीने में भी नहीं खींचता। जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। इसमें कहा गया है कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार में भी यह समस्या गंभीर है। परंपरागत कुएं और ट्यूबवेल में भूजल का स्तर काफी नीचे खिसक रहा है। तालाब बर्बाद हो रहे हैं और इन्हें अवैध रूप से खत्म किया जा रहा है।
  •  हमारे पास रिजर्व पुलिस है, रिजर्व आर्मी है, लेकिन रिजर्व पानी नहीं है। 

भारी वर्षा से आई भयंकर बाढ़ के लिए नुकसान का पैगाम बनकर आती है। लेकिन अनावृष्टि से उत्पन्न सूखा और उसका प्रभाव अधिक दुःखदाई होता है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल ऐसी दिक्कत होने के बावजूद हम बारिश के पानी पर ही निर्भर क्यों हैं? आखिर ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है कि इन क्षेत्रों में पानी की व्यवस्था हो सके।जिन क्षेत्रों में सूखे की सबसे अधिक परेशानी साल दर साल आ रही है, उन क्षेत्रों में बारिश के पानी को संरक्षित करने के तरीके बताए जाने चाहिए। साथ ही, ऐसे क्षेत्रों में सरकार की तरफ से जल संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि सूखे जैसी स्थिति पैदा होने से पहले ही लोगों को पानी मुहैया कराया जा सके। ऐसा करने से न केवल सूखे से निपटा जा सकता है, बल्कि उन सैकड़ों किसानों की जान बचाई जा सकती है, जो सूखे की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं।
अकाल में पैदो ले चार ही वंश
सासी, कुत्ता, गिद्ध और सरपंच।
बुंदेलखंड में कही जाने वाली ये लोकोक्ति कभी सूखे की त्रासदी को बयां करने के लिए कही गई होंगी। उस सूखे के लिए जिसके कारण आधे से ज्यादा भारत की आबादी पिछले तीन सालों से जूझ रही है। इस साल भी मानसून आने से पहले ही आधे भारत में सूखे के हालात बन रहे हैं। महाराष्ट्र के लातूर में पानी को बचाने के लिए धारा 144 लागू कर दी गई है तो मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में एक नहर के पानी की रखवाली के लिए दस से ज्यादा बंदूकधारी 24 घंटे तैनात रहते हैं। मध्यप्रदेश के ही छतरपुर में लोग शाम होते ही घर छोड़ देते हैं और कई कई किलोमीटर का सफर करने के बाद एक पहाड़ से बहने वाले झरने से बूंद बूंद पानी इकट्ठा कर सुबह घर लौटते हैं। हमेशा पानी से लबालब रहने वाला नासिक का पवित्र रामकुंड 130 सालों में पहली बार पूरी तरह सूख गया है।उत्तर प्रदेश का गंगा यमुना का दोआब क्षेत्र जहां दस साल पहले तक 30-40 फुट गहराई पर ही पर्याप्त पानी मिल जाता था वहां अब 100 फुट से ज्यादा खुदाई करने पर भी पानी नजर नहीं आता।
एम के पाण्डेय ‘निल्को’
(युवा ब्लॉगर)
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तुम अफज़ल का गुण गाते हों

गज़नी का है तुम में खून भरा जो तुम अफज़ल का गुण गाते हों,
जिस देश में तुमने जनम लिया उसको दुश्मन बतलाते हो!
भाषा की कैसी आज़ादी जो तुम भारत माँ का अपमान करो,
अभिव्यक्ति का ये कैसा रूप जो तुम देश की इज़्ज़त नीलाम करो!
अफज़ल को अगर शहीद कहते हो तो हनुमनथप्पा क्या कहलायेगा,
कोई इनके रहनुमाओं का मज़हब मुझको बतलायेगा!
अपनी माँ से जंग करके ये कैसी सत्ता पाओगे,
जिस देश के तुम गुण गाते हो, वहाँ बस काफिर कहलाओगे!
हम तो अफज़ल मारेंगे तुम अफज़ल फिर से पैदा कर लेना,
तुम जैसे नपुंसको पे भारी पड़ेगी ये भारत सेना!
तुम ललकारो और हम न आये ऐसे बुरे हालात नहीं
भारत को बर्बाद करो इतनी भी तुम्हारी औकात नहीं!
कलम पकड़ने वाले हाथों को बंदूक उठाना ना पड़ जाए,
अफज़ल के लिए लड़ने वाले कहीं हमारे हाथो न मर जाये!
भगत सिंह और आज़ाद की इस देश में कमी नहीं,
बस इक इंक़लाब होना चाहिए,
इस देश को बर्बाद करने वाली हर आवाज दबनी चाहिए!
ये देश तुम्हारा है ये देश हमारा है, हम सब इसका सम्मान करें,
जिस मिट्टी पे हैं जनम लिया उसपे हम अभिमान करें! जय हिंद ।

तीन बातें

√.तीन चीजों को कभी छोटी ना समझे – बीमारी, कर्जा, शत्रु।
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•√.तीनों चीजों को हमेशा वश में रखो – मन, काम और लोभ।
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•√.तीन चीज़ें निकलने पर वापिस नहीं आती – तीर कमान से, बात जुबान से और प्राण शरीर से।
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•√.तीन चीज़ें कमज़ोर बना देती है – बदचलनी, क्रोध और लालच।
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•√.तीन चीज़े असल उद्धेश्य से रोकता हैं – बदचलनी, क्रोध और लालच।
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•√.तीन चीज़ें कोई चुरा नहीं सकता – अकल, चरित्र, हुनर।
√.तीन चीजों में मन लगाने से उन्नति होती है – ईश्वर, परिश्रम और विद्या।
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•√.तीन व्यक्ति वक़्त पर पहचाने जाते हैं – स्त्री, भाई, दोस्त।
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•√.तीनों व्यक्ति का सम्मान करो – माता, पिता और गुरु।
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•√.तीनों व्यक्ति पर सदा दया करो – बालक, भूखे और पागल।
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•√.तीन चीज़े कभी नहीं भूलनी चाहिए – कर्ज़, मर्ज़ और फर्ज़।
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•√.तीन बातें कभी मत भूलें – उपकार, उपदेश और उदारता।
•√.तीन चीज़े याद रखना ज़रुरी हैं – सच्चाई, कर्तव्य और मृत्यु।
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•√.तीन बातें चरित्र को गिरा देती हैं – चोरी, निंदा और झूठ।
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•√.तीन चीज़ें हमेशा दिल में रखनी चाहिए – नम्रता, दया और माफ़ी।
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•√.तीन चीज़ों पर कब्ज़ा करो – ज़बान, आदत और गुस्सा।
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•√.तीन चीज़ों से दूर भागो – आलस्य, खुशामद और बकवास।
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•√.तीन चीज़ों के लिए मर मिटो – धेर्य, देश और मित्र।
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•√.तीन चीज़ें इंसान की अपनी होती हैं – रूप, भाग्य और स्वभाव।
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•√.तीन चीजों पर अभिमान मत करो – ताकत,सुन्दरता, यौवन।
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•√.तीन चीज़ें अगर चली गयी तो कभी वापस नहीं आती – समय, शब्द और अवसर।
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•√.तीन चीज़ें इन्सान कभी नहीं खो सकता – शान्ति, आशा और ईमानदार
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सादर
VMW Team

हनुमान जयंती – आज भी जीवित हैं हनुमान

कहते है पवनपुत्र हनुमान जैसा कोई नहीं, भक्त तो कई है लेकिन जो बात रूद्र अवतार हनुमान जी में हैं वो किसी में नहीं। भगवान शिव के आठ रूद्रावतारों में एक हैं हनुमान जी। भगवान राम त्रेतायुग में धर्म की स्थापना करके पृथ्वी से अपने लोक बैकुण्ठ चले गये लेकिन धर्म की रक्षा के लिए हनुमान को अमरता का वरदान दिया। इस वरदान के कारण हनुमान जी आज भी जीवित हैं और भगवान के भक्तों और धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। 

हनुमानजी बुद्धि और बल के दाता हैं। उत्तरकांड में भगवान राम ने हनुमानजी को प्रज्ञा, धीर, वीर, राजनीति में निपुण आदि विशेषणों से संबोधित किया है। हनुमानजी बल और बुद्धि से संपन्न हैं। हनुमान को मनोकामना पूर्ण करने वाला देवता माना जाता है, इसलिए मन्नत मानने वाले अनेक स्त्री-पुरुष हनुमान की मूर्ति की श्रद्धापूर्वक निर्धारित प्रदक्षिणा करते हैं। शास्त्रों का ऐसा मत है कि जहां भी राम कथा होती है वहां हनुमान जी अवश्य होते हैं। इसलिए हनुमान की कृपा पाने के लिए श्री राम की भक्ति जरूरी है। जो राम के भक्त हैं हनुमान उनकी सदैव रक्षा करते हैं।

एम के पाण्डेय निल्को

 

आना कभी मेरे देश मै आपको राजस्थान दिखाता हूँ

आँखों के दरमियान मैं
गुलिस्तां दिखाता हुँ,
आना कभी मेरे देश मैं आपको राजस्थान
दिखाता हुँ|
खेजड़ी के साखो पर लटके फूलो की कीमत
बताता हुँ,
मै साम्भर की झील से देखना कैसे नमक
उठाता हुँ|
मै शेखावाटी के रंगो से
पनपी चित्रकला दिखाता हुँ,
महाराणा प्रताप के शौर्य
की गाथा सुनाता हुँ|
पद्मावती और हाड़ी रानी का जोहर
बताता हुँ,
पग गुँघरु बाँध मीरा का मनोहर
दिखाता हुँ|
सोने सी माटी मे पानी का अरमान
बताता हुँ,
आना कभी मेरे देश मै आपको राजस्थान
दिखाता हुँ|
हिरन की पुतली मे चाँद के दर्शन कराता हुँ,
चंदरबरदाई के
शब्दों की व्याख्या सुनाता हुँ|
मीठी बोली, मीठे पानी मे जोधपुर की सैर
करता हुँ,
कोटा, बूंदी, बीकानेर और हाड़ोती की मै
मल्हार गाता हुँ|
पुष्कर तीरथ कर के मै चिश्ती को चाद्दर
चढ़ाता हुँ,
जयपुर के हवामहल मै, गीत मोहबत के गाता हुँ|
जीते सी इस धरती पर स्वर्ग का मैं वरदान
दिखाता हुँ,
आना कभी मेरे देश मै आपको राजस्थान
दिखाता हुँ||
कोठिया दिखाता हुँ, राज
हवेली दिखाता हुँ,
नज़्ज़रे ठहर न जाए कही मै आपको कुम्भलगढ़
दिखाता हुँ|
घूंघट में जीती मर्यादा और गंगानगर
का मतलब समझाता हुँ,
तनोट माता के मंदिर से मै विश्व
शांति की बात सुनाता हुँ|
राजिया के दोहो से लेके, जाम्भोजी के
उसूल पढ़ाता हुँ,
होठो पे मुस्कान लिए, मुछो पे ताव देते
राजपूत की परिभाषा बताता हुँ|
सिक्खो की बस्ती मे, पूजा के बाद अज़ान
सुनाता हुँ,
आना कभी मेरे देश मै आपको राजस्थान
दिखाता हुँ|| 
जय जय राजस्थान

राजस्थान दिवस की आप  सभी को हार्दिक शुभकामनाएं