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नीचों का गठबंधन है

सारे  कौरव  हुए  इकट्ठे, नीचों  का  गठबंधन है
सूपनखा की नाक कटी है, चोरों के घर कृन्दन है

पड़ी है पीछे सीबीआई जगह कहाँ अब जाने को
मिल कर एक हुए हैं गीदड़ अपनी लाज बचाने को

मफलर वाला गिरगिट आया अपनी शान दिखायेगा
टोंटी चोर बुआ को लाया वो भी गाल बजायेगा

संविधान की रक्षा करने आया है एक  नौवीं फेल
जिसके अब्बा खाकर चारा भुगत रहे वर्षों से जेल

राफेल वाला पप्पू आया, दिखा रहा है अपना जोश 
खुद बेचारा बेल पे बाहर कोई दिलाये इसको होश

वो अब्दुल्ला जिसका जीवन गीत पाक के गाते गुजरा
उसको भी अब ये लगता है देश पे सच में आया खतरा

कई और छुटभैये नेता जिनकी कहीं नहीं है पूछ
चोरों के संग सीना ताने ऐंठ रहे है अपनी मूछ

कहे समीक्षा राष्ट्र विरोधी ख्वाबों की ताबीर नहीं
बंगाल हमारा सूपनखा के अब्बा की जागीर नहीं

एक साथ हैं गिद्ध और गीदड़,कुत्ते,और बिलाब सभी
एक  शेर  को  घेरेंगे  क्या नीच  निक्कमे घाघ  कभी

संविधान खतरे में होता जब भी इनकी पोल खुले
सच तो ये है डर है इनको कहीं न इनके झोल खुले

सीधी सच्ची बात है कि ये तभी तो मिलकर खायेंगे
जब  ये  चोर उचक्के मिलकर खुद सरकार बनायेंगे

देख  रहे  सब  भारतवासी इन सब झूठे मक्कारों को
उन्निस में सबक सिखाएंगे इन लोकतंत्र हत्यारों को

समीक्षा सिंह जादौन

ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है


ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है 

क्यों तुम्हे दर्द से इतना प्यार है 

कलम लिखने को बहुत बेक़रार है 

क्योंकि इश्क खुद ही आज बीमार है 

ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है

प्रकृति ने खुद किया तुम्हारा शृंगार है 

उनकी चाहत भी बेशुमार है 

मैसेज के साथ साथ ऑडियो भी भेज दिया 

पर किया नहीं आज  तक इजहार है 

ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है

लेकिन तेरा आशिक बहुत दिलदार है 

प्यार ही जीवन का आधार है 

सोच रहा हूँ क्या लिखू तुम पर ‘निल्को’

वो कहती है तुम्हारी कलम,कैमरा, कम्प्यूटर सब लाजवाब है 

ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है

एम के पाण्डेय निल्को 

मुक्तक – जो भी तेरे पास आता है ।

जो भी तेरे पास आता है
वो तेरा ही हो जाता है
तेरी उलझी सुलझी ये जुल्फ़े
मद मस्त होकर लहराता है

एम के पाण्डेय निल्को

मुक्तक – सुबह जैसे ही आँख खुलती है

सुबह जैसे ही आँख खुलती है
मानो एक शिकायत किया करती है
भोर होते ही क्यू छोड़ देता है मुझको
मेरी तनहाई मुझसे यही सवाल किया करती है

एम के पाण्डेय निल्को

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मुक्तक – तेरे चाहने वालों की बहुत आबादी है

तेरे चाहने वालों की बहुत आबादी है
पर निल्को को कहा लिखने पर पाबंदी है
ये टूटे फूटे मन के भावो को पढ़कर भी
लोग कहते है मधुलेश तेरी भी तो चाँदी है
एम के पाण्डेय निल्को


 

मुक्तक – नज़र निल्को की मैंने शीर्षक ही रख लिया

दिल मे कोई प्रेम रत्न धन रख लिया
उनके लिए लिख , उनका भी मन रख लिया
ऐसी नजरों से घूरते है वो मुझको
की नज़र निल्को की’ मैंने शीर्षक ही रख लिया

एम के पाण्डेय निल्को

मुक्तक – चाँद की चादनी मे नहाती रही

चाँद की चादनी मे नहाती रही

सारी रात मुझे वो जगाती रही

प्यार से ज़रा छु लिया था होठो को उसके

और निल्को की धुन वो अब तक गाती रही

एम के पाण्डेय निल्को


आतंकियों का समर्थन करने वालों का विरोध करती मेरी नयी रचना

(आठ आतंकियों के एनकाउंटर के लिए पुलिस का समर्थन और आतंकियों का समर्थन करने वालों का विरोध करती मेरी नयी रचना)
कवि – मयंक शर्मा (09302222285)

खूब मनाई दीवाली क्या खूब पटाखे फोड़े हैं
आठ फ़रिश्ते धरती से सीधे जन्नत को छोड़े हैं

जेल का दाना पानी खाकर जो अक्सर इतराते थे
संविधान को कोस कोस मस्ती में नाचे जाते थे

खाकी को गाली देते थे तुम कुछ ना कर पाओगे
बस हमको बिरयानी देते देते ही मर जाओगे

खाकी ने दिखलाया दम और नया सवेरा कर डाला
कतरा कतरा आतंकी का बारूदों से भर डाला

अंधकार को दूर भगाने नयी पहल कर  डाली है
दीवाली के अगले ही दिन चहल पहल कर डाली है

कुछ लोगों ने इसको फिर से जल्दी ही एक मोड़ दिया
वोटों की खातिर लाशों को फिर मज़हब से जोड़ दिया

आतंकी से हमदर्दी की फिर आवाज़े आती हैं
अंधकार के हक़ में लड़ने काली रातें आती हैं

कुछ कहते है गुंडागर्दी कुछ कहते मनमर्जी है
कुछ को फिर से पीड़ा है कि ये मुठभेड़ भी फर्जी है

कुछ लोगों को आठ वोट की कमी दिखाई देती है
कुछ की आँखों में मज़हब की नमी दिखाई देती है

कुछ चैनल के पत्रकार का पत्थर दिल भी पिघल गया
कैसे कोई अंधकार को इतनी जल्दी निगल गया

अपना भी एक दीप बुझ गया अंधकार से लड़ने में
लेकिन कोई कमी नहीं की उनके आगे अड़ने में

असली है मुठभेड़ अगर तो नमन हज़ारों है खाकी
नकली भी है तो उनको निपटाओ जितने हैं बाकी.

कवि – मयंक शर्मा (09302222285)
          दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
       
  

आप सभी को नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं।

चतुर्दश वार।
मिला सुतवार।।
बढे धन कीर्ति।
रहे यश शांति।।

                गजानन हाँथ।
                सदा उर साथ।।
                कटे सब कष्ट।
                रहे  प्रभु  दृष्ट।।

प्रदीप सुपर्व।
मिले अमरत्व।।
प्रकाश अपार।
प्रहर्ष हजार।।

                 जले जब प्रकाश।
                 सदा तम नाश।।
                 मिले तब प्रमोद।
                 रहे अनुमोद।।

करें सब विनोद।
सदैव प्रमोद।
बने क्षण अखर्व।
सदा बस अपूर्व।।
   
                 रहे प्रभु वास।
                 धनेश निवास।।
                 रहे बस हर्ष।
                 नही अपकर्ष।।
सौम्या मिश्रा

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" की एक रचना

इन मीठे-मीठे पकवानों का किसको भोग लगाऊं मैं
मेरे प्रभुजी हैं सीमा पर फ़िर कैसे खुशी मनाऊँ मैं

दुश्मन की लंका जली नहीँ संहार अभी तक बाकी है
प्रत्यंचा के आघातों की टंकार अभी तक बाकी है

सीता सी भूमी गिलगित सिंध बलूचिस्तानी रोती है
अगणित लाशें अपने सीने पर निर्दोषों की ढोती है

जेहादी रावण करता अट्टाहास इधर विस्फोटों से
सेना अपनी घायल होती रहती है असुरी चोटों से

लगता है जैसे खंडित हों माता के धड़ से अंग-अंग
लंकेश कोशिशें करता माँ की पावनता हो भंग-भंग

लेकिन अंगद से वीर हमारे गिरि बनकर के अड़े रहे
बलिदान दिया है प्राणों का रक्षक बनकर के खड़े रहे

दुश्मन को धूल चटाने वाले वीर जितेंदर बलिदानी
वो नितिन चौबिया चम्बल वाला अल्हड़ सिंह स्वाभिमानी

गुरनाम वीर जैसे कितने ही जगमग होते बुझे दीप
सिंधू के रक्तिम जल में मोती वितरित करते रहे सीप

आओ हम सब मिलकर उनके नामों के दिये जलाएंगे
जिस घर में अंधियारा हो उसको जगमग करने जाएँगे

उन असहाय माताओं के दिल में उम्मीद जगाएगे
उन रोते बच्चों के मुख पर मुस्कानें वापस लाएंगे

जिस दिन पावन माटी दुश्मन से करके जंग छुड़ाएगे
हाँ उसी दिवस को दीवाली जैसा उल्लास मनाएंगे

लेकिन इतना भी याद रहे पन्ना फ़िर दर-दर ना भटके
जो किया उसी ने दीपदान वो उसके दिल में ना खटके

जिसके सुत प्राणों को न्यौछावर करने वाले सेवक हैं
उसको एहसास दिलायेंगे हम भी तो उसके दीपक हैं

ये देव कहे जिस-जिस घर से सरहद पर दीपक जाता है
उस घर में दिये जला देना उसमें भी भारत माता है

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080

दीपक – मुक्तक

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मैं   अँधेरों   से  लड़ा  हूँ
आँधियों से  भी खड़ा हूँ
तुच्छ मत कहना मुझे तू
मोतियों  से  मैं  जड़ा हूं  !!!
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मुरारि पचलंगिया

मुक्तक – नज़र निल्को की

अपने सर को बोलो की हद में रहे
चादर उनकी कद में रहे
बड़े होंगे पद में, तो क्या हुआ
बोलो अपने सरहद में रहे
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

नज़र निल्को की…….

न दुपट्टा गिरा और न उसकी उम्मीदों के दुपट्टे गिरे,
पर कुछ लोग उसके दुपट्टे गिराने मे कई बार गिरे
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

निल्को का ये उद्दघोष है

आप के समक्ष प्रस्तुत है ‘उद्दघोष’ पर एम के पाण्डेय निल्को का एक प्रयास
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मैंने खोया अब होश है
देखोगो अब वो मेरा जोश है
बंद करो इन सापो को दूध पिलाना
पूरी दुनिया को निल्को का ये उद्दघोष है
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एम के पाण्डेय निल्को

मुक्तक विषय : आवारगी

मेरी ताज़ा मुक्तक विषय : आवारगी

आवारगी होता क्या है
मेरी तरफ देख तेरा जाता क्या है
तुझे देख कर दिल डोले और बोले
मेरी बनने में तुझे होता क्या है

सादर वंदे
एम के पाण्डेय निल्को

माँ

माँ जब मैं कहता था 

या जब कुछ रटता था

सबसे पहले याद भी हुई तुम
सबसे जल्दी भूल भी गई तुम 
इसमें तेरे संस्कार की नहीं कमी
सोचने पर होते आँखे भी नमी 
माँ आज तेरे बिना कुछ भी नहीं
जो कहता था तूँ ही सब सही 
एक बार मुझे लगे तो लगा ले
या मुझे अपने पास ही बुला ले 
सादर वंदे
एम के पाण्डेय निल्को

ट्रेन मे पड़ी जब नज़र

ट्रेन मे पड़ी जब नज़र
जैसे हो गई वो ब्रेकिंग ख़बर
पहली मुलाक़ात मे ही जच गई थी वो
और निल्को पर था उसका अब तक असर
qएम के पाण्डेय ‘निल्कों’


शौक रहा दिल को उनके गुलाब लिखने का

“शौक रहा दिल को उनके गुलाब लिखने का
बेदम से गुलशन में बेबस शबाब लिखने का

“लकड़ियाँ चुन लाये मन की अलाव जलाने
फिर भी न मिटा खुमार किताब लिखने का

“आज जाना कीमत कलम की आंसू भी है
बेफिक्री के आलम में बेहिसाब लिखने का

“ले जाना कही अपने अरमान सहराओं में
वहां है गर्म धूप का मन खराब लिखने का

“हमें तो आता है ‘निशान’,बस शेर से अंदाजे-बयाँ
कहाँ है हुनर गुलाब से अजाब लिखने का

अजाब:यातना,पीड़ा

त्रिपुरेंद्र ओझा निशान

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