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इक दो कौड़ी का जेहादी,सैनिक को थप्पड़ मार गया

कश्मीर घाटी में अक्सर सुरक्षाबलों पर ताकत के बेतहाशा प्रयोग और मानवाधिकारों के हनन के आरोप लगते हैं। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। सुरक्षाकर्मी ही अपने मान-सम्मान, जान को खतरे में डाल संयम बरतते हैं। इस हकीकत का खुलासा सुरक्षाबलों ने नहीं किया, इस कड़वे सच से पर्दा अलगाववादियों की समर्थक

हिंसक भीड़ ने अपनी उपलब्धियों का बखान करने के लिए सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो अपलोड कर उठाया। डियो में हिंसक भीड़ दो सुरक्षाकर्मियों को बुरी तरह पीटती हुई नजर आती है तथा सुरक्षाकर्मी भीड़ का प्रतिरोध करने की बजाए निरीह प्राणियों की तरह मार खा रहे हैं। एक अन्य वीडियो में कुछ लडक़े एक सीआरपीएफ जवान को लातों से पीट रहे हैं और जवान है कि मार खा रहा है। एक वीडियो है जिसमें डयूटी से लौट रहे जवानों के लडक़ों की भीड़ चल रही है। लडक़े बार-बार जवानों को उकसाते हुए कह रहे हैं कि गो इंडिया गो, जालिमों कश्मीर छोड़ दो। कुछ लडक़े जवानों की हेल्मेट उतार रहे हैं तो कुछ लडक़ों ने उनकी शील्ड तक छीन ली। एक लडक़े ने एक जवान का स्लीपिंग बैग भी नीचे गिरा दिया। भीड़ में शामिल एक लडक़ा उत्तेजित हो जवानों को गाली देते हुए मारपीट करने लगता है,लेकिन उसका दूसरा साथी उसे रोक लेता है। जवान देश की रक्षा के लिए हैं अपमान का घूंट पीने के लिए नहीं लेकिन कश्मीर जैसे संवेदनशील जगह पर शांति बनी रहे इसलिए हमारे देश के जवान अदम्य साहस के साथ अटूट धैर्य का परिचय देते हैं

मास्टर सिद्धेश पाण्डेय उर्फ यश को देवरिया रत्न अवार्ड से मुख्य अतिथि अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व बच्चालाल मौर्य ने सम्मानित किया

देवरिया, लार थाना के हरखौली निवासी मास्टर सिद्धेश पाण्डेय उर्फ यश बाबा को शहर के कार्यक्रम देवरिया महोत्सव 2017 में देवरिया रत्न अवार्ड प्रदान कर सम्मानित किया गया। VMW Team के सिद्धेश के जयपुर में होने के कारण अवार्ड उनके बड़े भाई बैंक मैनेजर योगेश पाण्डेय ने ग्रहण किया। कराटे में राष्टीय फलक पर नाम रोशन करने वाले 10 वर्षीय यश बाबा अमरेश कुमार पाण्डेय के पुत्र और वरिष्ठ पत्रकार एन डी देहाती के भतीजे है। आचार्य व्यास मिश्र स्मृति समिति ने देवरिया रत्न अवार्ड के लिए सिद्देश का चयन किया था। समिति के अध्यक्ष पवन मिश्र ने बताया कि सिद्धेश को देवरिया स्थित एस एस बी एल इंटर कॉलेज के समारोह में विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य के लिए राज्य के कई व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। सिद्धेश का चयन राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए किया गया था। इस अवसर पर टाइगर्स मार्शल आर्ट के कोच जय सूद ने सिद्धेश के इस उपलब्धि पर बधाई दी है तथा केंद्रीय विद्यालय क्रमांक चार के अध्यापक को भी इस बालक पर गर्व है।  

मास्टर सिद्धेश पाण्डेय उर्फ़ यश बाबा की कुछ तस्वीरे 

कैंसर पीड़ितों की मदद के लिये हमारे साथ हाथ मिलाये

लिखने में भी हाथ कई बार काप जाते है , किस्मत के बारे में क्या कहे , यह बालक उम्र महज 13 साल बचपन में ही पिता जी छोड़ कर चले गए , दादा जी क्या होते है पता ही नहीं ऊपर से कोई भाई नहीं केवल 3 बहने और डॉक्टर ने कहा कि आपको कैंसर है । हे भगवान इतनी सी उम्र में क्या क्या दिखाया आपने इस परिवार को । नाना जी अपने सामर्थ्य के अनुसार इलाज करवा तो रहे है किंतु मानवता के नाते हमारा भी हक़ बनता है कि हो सके तो आप भी मदद के लिए आगे आये । यदि कुछ मदद करने को दिल चाहता हो तो  8890553555 या 9024589902 पर संपर्क करे ।

VMW Team के सक्रीय सदस्य एम के पाण्डेय निल्को बताया की कई लोग हमारी मदद को आगे आ रहे हैं। हम उन दोस्तों के शुक्रगुजार हैं, जिनकी आर्थिक सहायता से हम इनकी कुछ आर्थिक मदद कर पा रहे है जिससे इनको इलाज़ में आसानी हो रही है , हमारी टीम के आनंद उपाध्याय जो की मेडिकल क्षेत्र से है उन्होंने बताया की हम उनकी जाँच करने भी कसार नहीं छोड़ते है , खासकर कैंसर पीड़ितों के लिए हम उनका विशेष ध्यान रखते है। यदि आप उन कैंसर पीड़ितों हमारे साथ करना चाहते है, तो उपरोक्त नम्बर संपर्क कर सकते है।

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मन की बात – एम के पाण्डेय निल्को

हम में से ज्यादातर लोगों का कोई टाईम टेबल नहीं होता, जब मन किया पढने बैठ जाते हैं, जो मन किया किताब उठा लेते हैं और पढने लगते हैं, कोई भी टॉपिक बीच से ही पढ्ने लग जाते हैं, इससे सिवाय confusion के कुछ हाथ नहीं लगता हमें ये तक पता नहीं रहता कि हमने कौन सा विषय कितना पढ लिया है, और लोग बेवजह ही अपनी meomory को दोष देते हैं, एक बेहतर रणनीति ही बेहतर जीत दिला सकती है, और रणनीति का पहला हिस्सा जो कि यहाँ पर टाईम टेबल है, यदि यह कमजोर है तो आप जीत की आशा कैसे कर सकते हैं, तो बेहतर सफलता के लिये एक बेहतर टाईम टेबल बनाईये

एम के पाण्डेय निल्को
ब्लॉगर

हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।

भारत देश एक बहुभाषी राष्ट्र है। जहाँ अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा के अतिरिक्त अनेक प्रकार की भारतीय भाषाएँ , उपभाषाएँ , आंचलिक भाषाएँ , बोलियाँ ,उपबोलियाँ आदि बोली जाती हैं। इन भाषाओं में हिंदी एकता की कड़ी है।  हमारे सन्तों, समाज सुधारकों और राष्ट्रनायकों ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिंदी को अपनाया।  क्योंकि यही एक भाषा है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक और राजस्थान से असम तक समान रूप से समझी जाती है।  हिंदी ही एकमात्र भाषा है जो समस्त भारतीय को एकता के सूत्र में जोड़ने का कार्य सम्पन्न करती है।   हिंदी सहज , सरल एवं वैज्ञानिक भाषा है ,जिसने बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के उदारता का परिचय देते हुए अपनी वैज्ञानिकता को क्षति पहुँचाए बिना सहज ही समस्त विदेशी , देशी , आगत ,तत्सम आदि शब्दों को अपने भीतर सुगंध की तरह समा लिया है।  हिन्दी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है ,जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। सरलता से कहें तो हिन्दी उस माँ की तरह है जो अपने पुत्र के मित्रों को भी वही स्नेह और सम्मान देती है। वह अपने – पराये का भेद नहीं करती। वर्तमान युग हिंदी मीडिया का युग है।  हिंदी भाषा का निर्माण और आगे बढ़ाने का कार्य मीडिया ने किया है। इंटरनेट और मोबाइल ने हिंदी को और विस्तार दिया, हिंदी में संप्रेषण की ताकत है।  हिंदी यूनिकोड हुई तो ब्लॉगगिंग में बहार आ गई।  चिट्ठा लिखनेवालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई।  गूगल का मोबाइल और वेब विज्ञापन नेटवर्क एडसेंस हिंदी को सपोर्ट कर रहा है।  इंटरनेट पर 15 से ज्याद हिंदी सर्च इंजन मौजूद हैं।  सोशल साइट में हिंदी छाई हुई है।  21फीसदी भारतीय हिंदी में इंटरनेट का उपयोग करते हैं।हिंदी राजभाषा के बाद अब वैश्विक भाषा बनने की ओर तेजी से बढ़ रही है। डिजिटल दुनिया में हिंदी की मांग अंग्रेजी की तुलना में पाँच गुना तेज है।  हिंदी मातृभाषा और राजभाषा से एक नई वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी बदल रही है। वह नई प्रौद्योगिकी, वैश्विक विपणन तंत्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा बन रही है। आज मोबाइल की पहुँच ने गाँव-गाँव के कोने-कोने में संवाद और संपर्क को आसान बना दिया है।  इस वजह से बाजार में आ रहे नित नवीन मोबाइल उपकरण हर सुविधा हिंदी में देने के लिए बाध्य हैं। हिंदी की इस समृद्ध, शक्ति और प्रसार पर किसी भी हिंदी भाषी को गर्व हो सकता है।  हिन्दी की शुद्धता को लेकर तर्क दिए जाएँ परन्तु कोई ये बताये कि नई पीढ़ी शुद्ध व्याकरण वाली हिन्दी सीखे कहाँ से ? अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं सरकारी पाठशालाओं की स्थिति जग जाहिर है। जो हिन्दी के ज्ञाता हैं वे अधिकांशतः लेखन आदि कार्य से जुड़े हुए हैं ।  कुशल शिक्षकों के अभाव में बताइये भला किस मार्ग से आप शुद्ध हिन्दी प्रचारित – प्रसारित करेंगे? दूरसंचार के समस्त माध्यमों ने वैसे भी भाषा की एक नई परिभाषा गढ़ दी है।
प्रत्येक भाषा में अन्य भाषा के शब्द शुद्ध व विकृत रूप में आ गए हैं जिन्हें उनकी सरलता और बोधगम्यता के कारण अपना लिया गया है। अब हमारे पास पीछे मुढ़कर देखने का समय नहीं है। यदि हम चाहते हैं हिन्दी भाषा आगे बढे तो ख़ुशी-ख़ुशी उसे अपने अंदर सहजता से आये दूसरी भाषा के शब्दों के साथ आगे बढ़ने देना चाहिए उसके मार्ग में अनावश्यक रुकावट नहीं डालना चाहिए। अधिक से अधिक युवाओं को हिन्दी भाषा से जोड़ने के लिये और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने के लिये हमें कूपमंडूकता से ऊपर उठना ही होगा। इससे न हिन्दी भाषा की प्रगति रुकेगी और न विकास। बल्कि इस कदम से ये अंतर्राष्ट्रीय महत्तव की भाषा हो जाएगी। संसार में ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती है। जो लोग हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों विशेषकर अंग्रेजी से नाखुश हैं मैं हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए पूछना चाहूँगा क्या उनके पुत्र – पुत्री हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं  क्या उनकी संतति भी उनकी तरह भाषा शुद्धता अभियान को आगे बढ़ा पायेगी ? अपवाद छोड़ दिए जाएँ तो उत्तर सबको पता है। जब सब कुछ देश काल वातावरण की बाध्यता है तो फिर हिन्दी की शुद्धिकरण की तटस्थता को त्याग यहाँ भी उदार होना ही पड़ेगा।
वैश्वीकरण का दौर है। हिंदी के समक्ष भी बहुत अधिक चुनौतियाँ हैं। आज उसे फ़ैलाने से ज्यादा बनाये रखना आवश्यक है और ये कोई बहुत आसान कार्य नहीं है। जब लाखों शब्दों को बाहर से लेने पर भी अंग्रेजी का स्वरुप बिगड़ने के स्थान पर दिन ब दिन बढ़ रहा है तो हम हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों को लेकर क्यों विचलित हो रहे हैं ? डर रहे हैं ? अंग्रेजी ने शायद ही कोई भाषा हो जिससे कुछ न कुछ लिया ना हो। इस तरह तो हम हिंदी का समस्त क्षेत्रीय भाषाओं से भी वैमनस्य बढ़ा देंगे। यदि हिंदी को बाजारीकरण से परे भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से ज़माना है तो अन्य भाषा के शब्दों को जो सहज ही आते चले जा रहे हैं उनको तिरस्कृत करने से बचना होगा। अकेला चलो की नीति छोड़नी होगी , नहीं तो हिंदी को सिमटने में देर नहीं लगेगी।

एम के पाण्डेय ‘निल्को’

सूखा लोगों द्वारा ही पैदा किया गया?

प्रकृति और प्राणी दोनों ही एक दूसरे के सहचर हैं। दोनों मे से किसी एक के भी द्वारा पैदा किए गए असन्तुलन से दोनों को ही अस्वाभाविक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। प्राणियों में खासकर मानव के द्वारा लिप्सा बस प्रकृति के साथ निरन्तर की जा रही नाजायज छेड़-छाड़ भीषण प्राकृतिक असंतुलन का सामना धरती के विभिन्न भागों को करना पड़ता है। ऐसे प्राकृतिक असंतुलन कभी अवर्षण (सूखा) तो कभी अतिवर्षण (बाढ़) तो कभी भूकम्प के रूप में तबाही मचाते रहे हैं।

  • जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। 
देश भर में पानी को लेकर हाहाकार है। विशेषज्ञों का कहना है कि सागर और बूंदें अलग हो जाएं तो न सागर बचा रहेगा और न बूंद बचेगी और देश में भीषण सूखे की यह एक बड़ी वजह है। हमारे देश में लाखों की तादाद में तालाब थे, कुएं थे लेकिन हमने उन्हें रहने नहीं दिया, परिणाम हमारे सामने है। इस समय भारत में सूखे की समस्या ने एक विकराल रूप ले लिया है। महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ऐसे राज्य हैं, जिनके कुछ हिस्से इस समय सूखे की समस्या से जूझ रहे हैं। सूखे की बात आते ही हर कोई भगवान को दोष देने लगता है और इसे एक प्राकृतिक आपदा का नाम दे दिया जाता है। लेकिन क्या सूखे के लिए सिर्फ प्रकृति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? या इसके लिए और भी कोई दोषी है?सूखे और जल संकट पर शीर्ष अदालत ने बड़े ही तल्ख लहजे में कहा है कि देश के नौ राज्य सूखाग्रस्त हैं और सरकार इस पर आंखें बंद नहीं कर सकती। यह बुनियादी जरूरतों में से एक है और सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रभावित लोगों को इस समस्या से निजात दिलाए। भारत में सूखा पड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन क्या इसके लिए पहले से तैयार नहीं रहा जा सकता है? अगर बात करें सूखा पड़ने के कारण की, तो इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है सरकार की पॉलिसी। भारत में हर साल किसी न किसी क्षेत्र में सूखा जरूर पड़ता है और कई ऐसी जगहें भी हैं, जहां साल दर साल कमोबेश सूखे की स्थिति पैदा हो ही जाती है। बावजूद इसके सराकार की तरफ से कोई कड़े कदम नहीं उठाए जा रहे।

इस ओर न तो राज्य सरकार ध्यान देती है, न ही केन्द्र सरकार उस सूखी जमीन को हरा भरा करने की सोचती है। आलम ये है कि सूखे से परेशान होकर किसान आत्महत्या कर रहा है और नौजवान गांव छोड़कर शहरों की ओर रोजी रोटी की तलाश में निकल जा रहे हैं। गांव में बच रही हैं तो सिर्फ महिलाएं और लड़कियां।कई गांवों का तो ये हाल है कि लड़कियों की शादी भी नहीं हो रही है। सरकार पानी जमा करने का कोई इंतजाम नहीं करती है, बल्कि जब कहीं सूखा पड़ता है तो मदद के नाम पर चंद टैंकर पानी की भीख पहुंचा दी जाती है, जो उस गांव के प्यासे लोगों के बीच कुछ ऐसे गायब हो जाता है, जैसे बरसों से तपती जमीन पर पानी की बूंद पड़ते ही हवा हो जाती है।पूर्ववर्ती योजना आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश का 29 फीसदी इलाका पानी की समस्या से जूझ रहा है। वह भले ही जल संकट की सारी जिम्मेदारी कृषि क्षेत्र पर डाले, लेकिन हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की अहम भूमिका है। असल में फैक्टरियां ही अधिकाधिक पानी पी रही हैं। कई बार फैक्टरियां एक ही बार में उतना पानी जमीन से खींच लेती हैं, जितना एक गांव पूरे महीने में भी नहीं खींचता। जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। इसमें कहा गया है कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार में भी यह समस्या गंभीर है। परंपरागत कुएं और ट्यूबवेल में भूजल का स्तर काफी नीचे खिसक रहा है। तालाब बर्बाद हो रहे हैं और इन्हें अवैध रूप से खत्म किया जा रहा है।
  •  हमारे पास रिजर्व पुलिस है, रिजर्व आर्मी है, लेकिन रिजर्व पानी नहीं है। 

भारी वर्षा से आई भयंकर बाढ़ के लिए नुकसान का पैगाम बनकर आती है। लेकिन अनावृष्टि से उत्पन्न सूखा और उसका प्रभाव अधिक दुःखदाई होता है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल ऐसी दिक्कत होने के बावजूद हम बारिश के पानी पर ही निर्भर क्यों हैं? आखिर ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है कि इन क्षेत्रों में पानी की व्यवस्था हो सके।जिन क्षेत्रों में सूखे की सबसे अधिक परेशानी साल दर साल आ रही है, उन क्षेत्रों में बारिश के पानी को संरक्षित करने के तरीके बताए जाने चाहिए। साथ ही, ऐसे क्षेत्रों में सरकार की तरफ से जल संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि सूखे जैसी स्थिति पैदा होने से पहले ही लोगों को पानी मुहैया कराया जा सके। ऐसा करने से न केवल सूखे से निपटा जा सकता है, बल्कि उन सैकड़ों किसानों की जान बचाई जा सकती है, जो सूखे की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं।
अकाल में पैदो ले चार ही वंश
सासी, कुत्ता, गिद्ध और सरपंच।
बुंदेलखंड में कही जाने वाली ये लोकोक्ति कभी सूखे की त्रासदी को बयां करने के लिए कही गई होंगी। उस सूखे के लिए जिसके कारण आधे से ज्यादा भारत की आबादी पिछले तीन सालों से जूझ रही है। इस साल भी मानसून आने से पहले ही आधे भारत में सूखे के हालात बन रहे हैं। महाराष्ट्र के लातूर में पानी को बचाने के लिए धारा 144 लागू कर दी गई है तो मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में एक नहर के पानी की रखवाली के लिए दस से ज्यादा बंदूकधारी 24 घंटे तैनात रहते हैं। मध्यप्रदेश के ही छतरपुर में लोग शाम होते ही घर छोड़ देते हैं और कई कई किलोमीटर का सफर करने के बाद एक पहाड़ से बहने वाले झरने से बूंद बूंद पानी इकट्ठा कर सुबह घर लौटते हैं। हमेशा पानी से लबालब रहने वाला नासिक का पवित्र रामकुंड 130 सालों में पहली बार पूरी तरह सूख गया है।उत्तर प्रदेश का गंगा यमुना का दोआब क्षेत्र जहां दस साल पहले तक 30-40 फुट गहराई पर ही पर्याप्त पानी मिल जाता था वहां अब 100 फुट से ज्यादा खुदाई करने पर भी पानी नजर नहीं आता।
एम के पाण्डेय ‘निल्को’
(युवा ब्लॉगर)
आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद ………!
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