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गोस्वामी तुलसीदास की जयंती मनाई गई

जयपुर , गोपालपुरा बाइपास स्थित कृष्ण विहार हनुमान मंदिर में सरयूपारीण ब्राह्मण समाज, राजस्थान के तत्वावधान में गोस्वामी तुलसीदास जयंती कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमे मंदिर परिसर में आम, जामुन, अशोक सहित कई छायादार और फलदार पौधे समाज के अध्यक्ष बलराम मिश्रा के निर्देश में रोपण किया गया ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देवस्थान के चेयरमैन श्री आ डी शर्मा ने वरिष्ठजन  को स्मृति चिन्ह और अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया तथा गोस्वामी तुलसीदास के जीवन पर प्रकाश डाला ।

समारोह में डॉ राम किशोर शुक्ल, डॉ जय प्रकाश पाण्डेय , डॉ राजेंद्र मिश्र, डॉ अशोक तिवारी को उनके क्षेत्र मे उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम संचालक डॉ जयनारायण शुक्ल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए मानस के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से बताया कि किस तरह हम आजके भटके युवा वर्ग को सही मार्ग पर लाकर उसे सही संस्कार दे सकते हैं । महासचिव ओमप्रकाश तिवारी ने दु:ख प्रकट करते हुए कहा कि जब से पाठ्यक्रमों से रामायण-गीता जैसे संस्कार देने वाले ग्रन्थों को धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर बाहर निकाल दिया गया तब से हमारे बालक-बालिकाएँ उन संस्कारों से वंचित होगए जिनका उनके जीवन में महत्व था । परिणाम हमारे सामने है । मानस का लक्ष्मण-परशुराम संवाद युवाओं में जान फूँक देता था । अपने अद्यक्षीय उद्बोधन में डॉ अशोक तिवारी ने इस बात पर विशेष बल दिया की युवावर्ग को राम चरित मानस जैसे ग्रन्थों का नियमित अध्ययन करना चाहिए ।

कार्यक्रम के अंत में सुरेन्द्र चौबे ने कहा की तुलसी के साध्य राम की भक्ति है, पर साधन है उनकी कविता, तुलसी कविता की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि कविता वह है जो बुद्धिमानों को संतुष्ट करती है, आम आदमी का मनोरंजन करती है व तात्कालिक समस्याओं का समाधान करती है। उनका काव्य हमारे भीतरी और बाहरी तापों का शमन करने में सक्षम है।  यही कारण है कि वे सांस्कृतिक क्रांतिकारी माने जाते हैं तथा संगठन सचिव ए के पाण्डेय ने धन्यवाद उद्बोधन मे कहा की भारतीय समाज की अस्मिता का आधार शताब्दियों से राम चरित मानस रहा है और गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित्र मानस में हमारी अस्मिता को वाणी दी है। उपरोक्त अवसर पर श्री राम तिवारी, राजेश मिश्रा, सौरभ, विजय तिवारी, दुर्गा प्रसाद मिश्र, राकेश पाठक, ज्ञानेश्वर पाण्डेय, विनायक, विजय, मधुलेश, रवि, बबलू, सम्पत, नीलेश, सिद्धेश, हरी नारायण सहित सैकड़ो लोग उपस्थित थे ।

शैक्षणिक उपलब्धि का नया चलन 500/500

मेरी जानकारी मे पहले ऐसा नहीं था । अब शिक्षा बोर्डों मे पूर्णांक 500/500 देकर या इसके आस-पास अंक देकर पास करने का कम्पटीशन शुरू हो गया है । यह शिक्षा के बाजारीकरण का नया रूप है । हो सकता है कि ऐसा रिजल्ट देने वाले बोर्ड इसे अपनी भी उपलब्धि मानकर इतरा रहे ह़ों ।जबकि मेरी दृष्टि में यह  सम्बन्धित शिक्षा बोर्डों की पराजय है। पेपरसेटर और माडरेटर का सेट किया हुआ अवैज्ञानिक पेपर का प्रतिफल है या फिर शैक्षणिक प्रक्रिया में ग्यान और विषयवस्तु को केवल पूर्णांक पा लेने के हिसाब से ही निहित करके रखने का दोष है जो शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्ध्यांतों से मेल नहीं खाता । शिक्षा व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया है न कि ग्यान की पूर्णता का सर्टिफिकेट देकर इसे सीज करने की प्रक्रिया ।इसी लिए शैक्षणिक परफेक्शन तय करने या परफेक्शन मे एक या दो अंक काट लेने को लेकर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है ।

         बोर्ड और जनसामान्य इन्हें बधाइयाँ देता है जिसके वे हकदार हैं । लेकिन एनसीईआरटी नई दिल्ली द्वारा आयोजित राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा मे इनमें से बहुत कम शायदही बच्चे चयनित हो पाते हैं । सर्वे करके देख ले तो यह बिडंम्बना समझ मे आ जायेगी और शिक्षा का मापदण्ड भी समझ मे आ जायेगा । धन्य हैं परफेक्ट पाठ्यक्रम, परफेक्ट शिक्षण, परफेक्ट पेपरसेटिंग, परफेक्ट उत्तरलिखने वाला और परफेक्ट यानि पूरे 500/500 देने वाला या परफेक्ट मे से एकाध अंक काट लेने वाला । मेरी समझ से अगर यह सब कार्य एक ही व्यक्ति करे और वह अपने को परफेक्ट मानता हो तभी सम्भव है ,अन्यथा नहीं । क्योंकि हर लेवेल पर एरर की संभावना है । यह शिक्षा प्रक्रिया की प्रकृति मे है ।

              बोर्ड मे परफेक्ट अंक लाकर विद्यार्थी और अभिभावक खुश तो बहुत होंगे , अचम्भित भी । मेहनत के अनुसार वे इस उपलब्धि पर बधाई के पात्र हैं । लेकिन जाने अनजाने एक भारी तनाव दबाव उन पर आ गया है अपनी परफेक्ट वाली पोजीशन मेन्टेन करने का । सभी जानते हैं कि पूर्ण अंक पाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता । अतः इस बिंदु पर आगे बढ़ने की              अभिप्रेरणा( मोटिवेशन) काम नहीं करती बल्कि तनाव-दबाव को मैनैज करने की काउन्सेल़िग जरूरी होती है
और असफल होने पर विघटन भी हो सकता है । अतः एक सिस्टम की खामी से उन्हें अनावश्क तनाव-दबाव मिल गया है जिसकी जिम्मेदारी कोई बोर्ड नहीं लेगा । और यह भी हो सकता है वही बोर्ड आगे भिन्न मूल्यांकन प्रस्तुत करके अपना पल्ला झाड़ लेगा  । कुलमिलाकर, मूल्यांकन की यह परंपरा मेधावी विद्यार्थियों पर पूर्णांक लाने का अनावश्यक बोझ लादती है । शिक्षा शास्त्रियों को इस पर चिन्तन करके निराकरण प्रस्तुत करना चाहिए । शुभमस्तु ।
                           —  —  —    हरि शरण ओझा ।

नीचों का गठबंधन है

सारे  कौरव  हुए  इकट्ठे, नीचों  का  गठबंधन है
सूपनखा की नाक कटी है, चोरों के घर कृन्दन है

पड़ी है पीछे सीबीआई जगह कहाँ अब जाने को
मिल कर एक हुए हैं गीदड़ अपनी लाज बचाने को

मफलर वाला गिरगिट आया अपनी शान दिखायेगा
टोंटी चोर बुआ को लाया वो भी गाल बजायेगा

संविधान की रक्षा करने आया है एक  नौवीं फेल
जिसके अब्बा खाकर चारा भुगत रहे वर्षों से जेल

राफेल वाला पप्पू आया, दिखा रहा है अपना जोश 
खुद बेचारा बेल पे बाहर कोई दिलाये इसको होश

वो अब्दुल्ला जिसका जीवन गीत पाक के गाते गुजरा
उसको भी अब ये लगता है देश पे सच में आया खतरा

कई और छुटभैये नेता जिनकी कहीं नहीं है पूछ
चोरों के संग सीना ताने ऐंठ रहे है अपनी मूछ

कहे समीक्षा राष्ट्र विरोधी ख्वाबों की ताबीर नहीं
बंगाल हमारा सूपनखा के अब्बा की जागीर नहीं

एक साथ हैं गिद्ध और गीदड़,कुत्ते,और बिलाब सभी
एक  शेर  को  घेरेंगे  क्या नीच  निक्कमे घाघ  कभी

संविधान खतरे में होता जब भी इनकी पोल खुले
सच तो ये है डर है इनको कहीं न इनके झोल खुले

सीधी सच्ची बात है कि ये तभी तो मिलकर खायेंगे
जब  ये  चोर उचक्के मिलकर खुद सरकार बनायेंगे

देख  रहे  सब  भारतवासी इन सब झूठे मक्कारों को
उन्निस में सबक सिखाएंगे इन लोकतंत्र हत्यारों को

समीक्षा सिंह जादौन

हनुमान जी की जाति क्या है ?

हनुमान ब्राह्मण जाति से हैं – रामायण में कई स्थान पर उनके प्रगाढ़ पाण्डित्य पर प्रकाश डाला गया है । जब वे अशोक वाटिका पहुंचते हैं तो उनका वक्तव्य है – यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् । रावण मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ॥ अर्थात् यदि मैं संस्कृत भाषा का प्रयोग करता हूं तो सीता मां मुझे रावण समझकर भयभीत हो सकती हैं । ( संस्कृत प्रायः उच्च वर्गों की खास तौर पर ब्राह्मणों की भाषा थी)

हनुमान क्षत्रिय जाति से हैं – क्षत्रिय कौन होता है जो शौर्य प्रदर्शन करे । आपद्काल में शत्रुओं से रक्षा करे । हनुमान जब राक्षसों के विरूद्ध लड़ रहे हैं तो अपने क्षत्रियत्व गुण का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । हनुमान चालीसा में उक्त है –महावीर विक्रम बजरंगी । आगे वहीं पर कथित है कि उनके हाथ में वज्र और ध्वजा विद्यमान है और वे जनेउ भी धारण किए हैं ( हाथ वज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेउ साजै)

हनुमान वैश्य जाति से हैं – अर्थ की दृष्टि से इस शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है जिसका मूल अर्थ “बसना” होता है। कर्म सिद्धांत वर्गीकरण मे पोषण के कार्यों से जुड़े गतिविधियों को वैश्य जाति के लोग अंजाम देते हैं । इस लिहाज से हनुमान सबसे बड़े वैश्य हैं क्योंकि वे स्वयं तो बसे ही लक्ष्मण को भी बसा दिया ।( संजीवनी लाकर उन्होंने लक्ष्मण को पुनर्जीवित किया था।)

हनुमान शूद्र जाति से हैं – गीता के १८वें अध्याय में कहा गया है कि परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यपि स्वभावजम् अर्थात् सेवा व सुश्रुषा करना शूद्र का कर्तव्य है । हनुमान से बड़ा भक्त खोज पाना नामुमकिन है । वे अनवरत अपने अराध्य प्रभु राम की सेवा में निरत रहते थे ।

गौरतलब है कि वर्ण का वर्गीकरण कर्म का वर्गीकरण है, न कि मनुष्य का वर्गीकरण। प्रत्येक मनुष्य कहीं न कहीं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र स्वयं है क्योंकि इन चारों के गुण उसमें समबेत हैं । पहले समय मनुष्य जाति का एक ही वर्ण था, चार वर्ण अथवा भिन्न-भिन्न जातियों की स्थापना बाद में हुई है

एक वर्ण मिदं पूर्वं विश्वमासीद् युधिष्ठिर।

कर्म क्रिया विभेदेन चातुर्वर्ण्यम् प्रतिष्ठितम्॥

न विशेषोऽस्ति वर्णानाम् सर्व ब्राह्ममिदं जगत्। ( महाभारत )

आज के परिप्रेक्ष्य में हमें यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि वार्ता का प्रस्थान बिन्दु क्या है? क्या हनुमान को हम वर्ग विशेष के नाते पूजते हैं या उनके कर्म व गुणों के आधार पर । यदि वे नीच कुल के भी होते तो क्या हम उनके गुणों के आधार पर उन्हें समादृत नहीं करते ?

एम के पाण्डेय
रिसर्च स्कॉलर

भारत महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश


एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट में भारत को महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश बताया गया है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की सर्वे में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा, मानव तस्करी और यौन व्यापार में ढकेले जाने के आधार पर भारत को महिलाओं के लिए खतरनाक बताया गया है । 

इस सर्वे के अनुसार महिलाओं के मुद्दे पर युद्धग्रस्त अफगानिस्तान और सीरिया क्रमश: दूसरे और तीसरे सोमालिया चौथे और सउदी अरब पांचवें स्थान पर हैं । सात साल पहले इसी सर्वे में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश बताया गया था।

दुनिया भर से केवल 548 जानकारों से 26 मार्च से 4 मई के बीच ऑनलाइन फोन और व्यक्तिगत तौर पर रायशुमारी की गई और बना दी गई एक ऐसा रिपोर्ट जिस पर विश्वास हो भी तो क्यो और कैसे ? 


जो फिरंगी आजतक एक आदर्श परिवार न बसा सके वो खुद के बनाए मापदंड के अनुसार भारत का सर्वे कर रहे है ? इस मुद्दे पर महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा है कि भारत के बाद रखे गए देशों में महिलाओं को बोलने का हक भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों से सर्वे किया गया उनकी संख्या बहुत कम है। उनकी राय के आधार पर दुनिया की राय नहीं बनाई जा सकती। 

भारत से ज्यादा सुरक्षा जिन देशो में है इस सर्वे के मुताबिक , उनका नाम लिखुंगा तो हसते हसते पेट मे दर्द हो जाएगा । आज भी भारत की महिलाएं और देशो की महिलाओं की तुलना में बहुत सभ्य संस्कारी और सुरक्षित है हाँ कुछ अपवाद हो सकते है इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता लेकिन इस तरह की रिपोर्ट तो बस पूर्व प्रायोजित ही है । महिलाएं ही नहीं किसी भी श्रेणी के लोगो के लिए भारत ही सबसे सुरक्षित देश है , इसके लिए कोई भी इतिहास का सहारा ले सकता है ।

एम के पाण्डेय निल्को

आख़िर कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान

हाल ही में भारत के बोधगया में हुए बम विस्फोटों के बाद रोहिंग्या मुस्लिम सुर्खियों में हैं, लेकिन प्रश्न यह भी है कि आखिर रोहिंग्या हैं कौनम्यांमार को क्या दिक्क़त है? इन्हें अब तक नागरिकता क्यों नहीं मिली? रोहिंग्या मुसलमान विश्‍व का सबसे अल्‍पसंख्‍यक समुदाय है। इनकी आबादी करीब दस लाख के बीच है। बौद्ध बहुल देश म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमान शताब्दियों से रह रहे हैं। बीते दिनो म्‍यांमार में हुई हिंसा में रोहिंग्‍या मुसलमानों के मारे जाने के बाद पूरे विश्‍व की नजरे इन पर आ गईं हैं। यह सुन्नी इस्लाम को मानते हैं। इन मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। ये म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को बिना अधिकारियों की अनुमति के अपनी बस्तियों और शहरों से देश के दूसरे भागों में आने जाने की इजाजत नहीं है। यह लोग बहुत ही निर्धनता में झुग्गी झोपड़ियों में रहने के लिए मजबूर हैं। पिछले कई दशकों से इलाके में किसी भी स्कूल या मस्जिद की मरम्मत की अनुमति नहीं दी गई है। नए स्कूल, मकान, दुकानें और मस्जिदों को बनाने की भी रोहिंग्या मुसलमानों को इजाजत नहीं है। म्यांमार में 25 अगस्त को भड़की हिंसा में क़रीब 400 मौतों की ख़बर है म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यक हैं और ये रोहिंग्या को अप्रवासी मानते हैं। साल 2012 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या-बौद्धों के बीच भारी हिंसा हुई थी साल 2015 में भी रोहिंग्या मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ, रोहिंग्या समुदाय 12वीं सदी के शुरुआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस तो गया, लेकिन स्थानीय बौद्ध बहुसंख्यक समुदाय ने उन्हें आज तक नहीं अपनाया है।
अराकान रोहिंग्या नेशनल ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक रोहिंग्या रखाइन में प्राचीन काल से रह रहे हैं। 1824 से 1948 तक ब्रिटिश राज के दौरान आज के भारत और बांग्लादेश से एक बड़ी संख्या में मजदूर वर्तमान म्यांमार के इलाके में ले जाए गए। ब्रिटिश राज म्यांमार को भारत का ही एक राज्य समझता था इसलिए इस तरह की आवाजाही को एक देश के भीतर का आवागमन ही समझा गया। ब्रिटेन से आजादी के बाद, इस देश की सरकार ने ब्रिटिश राज में होने वाले इस प्रवास को गैर कानूनी घोषित कर दिया। इसी आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया गया। जिसके चलते अधिकांश बौद्ध रोहिंग्या मुसमानों को बंगाली समझने लगे और उनसे नफरत करने लगे।
भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान हैं, जो जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मौजूद हैं।  चूंकि भारत ने शरणार्थियों को लेकर हुई संयुक्त राष्ट्र की 1951 शरणार्थी संधि और 1967 में लाए गए प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं इसलिए देश में कोई शरणार्थी कानून नहीं हैं । गौरतलब है कि भारत सरकार रोहिंग्या मुस्लिमों को शरण देने से इनकार कर रही हैसरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि, “रोहिंग्या मुसलमान देश की सुरक्षा के लिए खतरा है और इस समुदाय के लोग आतंकी संगठनों से भी जुड़े हो सकते हैं”हालांकि, कोर्ट से सरकार ने इसे होल्ड करने की अपील की है

एम के पाण्डेय निल्को
रिसर्च स्कॉलर, जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी 

कौन है यह चोटीकटवा ? जानें पूरा सच…!

बीते कई दिनों से चर्चाओं में आए चोटी कटवा को लेकर हर कोई सच्चाई जानना चाहता है । हर कोई जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा?  इसको लेकर बड़े-बड़े टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और वेब मीडिया में भी सुर्खियां बनी हुई है । तो वही सरकार से लेकर पुलिस प्रशासन भी चोटी कटवा को लेकर हैरान है, और जानना चाहता है कि आखिर क्या है चोटी कटवा? सर्च करने पर पता चला कि राजस्थान से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली, गुडगांव, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित अलग-अलग जगहों से भी आ रही हैं, समझ आया कि मसला मास हिस्टीरियाका है ।
राजस्थान के एक छोटे से गांव से शुरू हुई चोटी कटवा की कहानी अब दिल्ली हरियाणा चंडीगढ़ पंजाब होते होते देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश जा पहुंची है। यहां के मथुरा, आगरा, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, देवरिया समेत कई शहर चोटी कटवा से दहशत जदां है । यहां के कई गांवों से चोटी कटवा नाम की अफवाह से सनसनी मची हुई है । इससे सबसे ज्यादा दहशत में महिलाएं हैं, और अपनी चोटी बचाने को लेकर हैरान हैं। क्योंकि उसकी किसी ना किसी पड़ोसी गांव में या पड़ोसी की चोटी कट गई है , और अब वह भी दहशत में है। सच तो यह है कि 2017 में भी हम ऐसे हैं कि हमारे बीच मास हिस्टीरिया फैलाना बहुत आसान है।  आप सोचिए कि कौन सा भूत ऐसे लोगों की चोटी काटते फिरेगा?  कैमरे के सामने आने के लिए क्या लोग ये नहीं कर सकते?  या फिर बस डर के मारे?  मैं नहीं कह रहा कि ऐसा ही है, पर ऐसा भी हो सकता है। यूजीन इनस्को (फ्रेंच लेखक) की किताब राइनोसोर्स  की कहानी याद आ गई, ऐसा होता है कि एक आदमी शहर में राइनोसोर्स बन जाता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और धीरे-धीरे बाकी सब। ये चोटीकटवा की कहानी कुछ ऐसी ही लगती है. इसके कई तर्क हो सकते हैं,  पब्लिसिटी,  धार्मिक संवेदना फैलाना,  मास हिस्टीरिया फैलाना। कुछ भी हो सकता है, मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि हम जरा सोचे कि कहीं हम सब राइनोसोर्स तो नहीं बन रहे?
अपने आसपास के माहौल में अफवाहों की चपेट में आकर लोग एक्यूट साइकोसिस (मेनिया) की जद में आकर मास हिस्टीरिया का शिकार हो रहे हैं। इसमें कोई अंजान डर एक से दूसरे में पहुंचकर अफवाहों को बढ़ावा देता है। मास हिस्टीरिया की उन जगहों पर होने की आशंका ज्यादा रहती है जहां परिवार या समाज में भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इसमें पीड़ित को देखकर परिवार या अन्य आसपास के सदस्य खुद को उसी में ढालने की कोशिश करते हैं।  मास हिस्टीरिया एक सामान्य समस्या है। इसमें यदि एक बच्चा शिकायत करता है कि उसे पेट दर्द हो रहा है तो अन्य बच्चों को भी लगता है कि उनके साथ भी वैसा ही हो रहा है। जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं होता। हिस्टीरिया (Hysteria) की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। बहुधा ऐसा कहा जाता है, हिस्टीरिया अवचेतन अभिप्रेरणा का परिणाम है। अवचेतन अंतर्द्वंद्र से चिंता उत्पन्न होती है और यह चिंता विभिन्न शारीरिक, शरीरक्रिया संबंधी एवं मनोवैज्ञानिक लक्षणों में परिवर्तित हो जाती है। 

एम के पाण्डेय निल्को

शोध छात्र 


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