Tag Archives: कविता

आज लिखने को कुछ नहीं – एम के पाण्डेय निल्को

सुना है तुम्हारे चाहने वाले बहुत हैं

ये मोहब्बत की मिठाई सब में बांट देती हो क्या

कई गिर चुके हैं तुम्हारे इश्क के मंजर में

अंखियों से गोली मार देती हो क्या

पुरानी बातों को इस लॉक डाउन में फिर से सजाना है

आज हमारे पास बस यादों का खजाना है

कभी लिखा था तुम्हारें जुल्फों पर शेर

पर आज पूरी गजल तुम पर बनाना है

पर ग़ज़ल लिखे तो लिखे कैसे

मुझे नहीं पता तुम हो कैसे

मैं हूं यहां निभा रहा हूं जिम्मेदारियां

पूरे देश में जमातियों को मैंने ही बुलाया हो जैसे

ये महामारी है इसका सामना करो

घर बैठो और मेरी यादों को ताजा करो

सोचो कब मिले थे हम दोनों

एक बार फिर से बातों को साझा करो

– एम के पाण्डेय निल्को

चांद अपनी चांदनी की रंगतों से डर गया

दिल हमारा जब तुम्हारी चाहतों से भर गया ।
चांद अपनी चांदनी की रंगतों से डर गया ।।

तेरी यादों में मेरे दिन रात कटते थे मगर।
मेरी नजरों में मेरे महबूब अब तू मर गया।।

आंख में पानी है होंठों पर मचलता है सवाल।
तुझसे पूछुं क्या तेरा एहसास इतना मर गया।।

मेरे चारों सिम्त सन्नाटों का इतना शोर है।
मेरा कमरा चीख के लम्हों से पल में भर गया।।

इन्तज़ार -ऐ-यार करना मेरी मजबूरी हुआ।
मैं अभी आता हूं ऐसा बोल कर दिलबर गया।।.

अलविदा कहकर गया वो फिर भी मेरे साथ है।
कैसे कह दूं दिल सजन की चाहतों से भर गया ।।

रात ढलकर सुबह आई कल्पना सपने धुले।
घर से निकली तो सफर में याद का लश्कर गया।।

“कल्पना गागडा़” शिमला, हिमाचल प्रदेश ।

…वो कहर बरसाती है – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

वह पायल नहीं पहनती पांव में
 बस एक काले धागे से कहर बरसाती है
उसकी यही अदा तो ‘निल्को’
मुझे उसका दीवाना बनाती है
बहुत मजे से इठलाती है
 गूढ़ व्यंग की मीन बहुत बनाती है
माथे पर जब बिंदी लगाती है
तो पूरे विश्व को सुंदर बनाती है
‘मधुलेश’ का ख्याल आए तो
वह भी कविता बनाती है
जीवन की गहन अनुभूतियों पर
लिखने का प्रयास कर रचना वो बनाती है
मौसम बेईमान हो जाए जो तपाक से
रसोई में जाकर पकोड़े वो बनाती है
बस कुछ ही यूं ही आए हैं बड़े दिनों बाद इस ब्लॉग पर
पढ़कर वह भी इसे सार्थक बनाती है
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एम केपाण्डेयनिल्को

नीचों का गठबंधन है

सारे  कौरव  हुए  इकट्ठे, नीचों  का  गठबंधन है
सूपनखा की नाक कटी है, चोरों के घर कृन्दन है

पड़ी है पीछे सीबीआई जगह कहाँ अब जाने को
मिल कर एक हुए हैं गीदड़ अपनी लाज बचाने को

मफलर वाला गिरगिट आया अपनी शान दिखायेगा
टोंटी चोर बुआ को लाया वो भी गाल बजायेगा

संविधान की रक्षा करने आया है एक  नौवीं फेल
जिसके अब्बा खाकर चारा भुगत रहे वर्षों से जेल

राफेल वाला पप्पू आया, दिखा रहा है अपना जोश 
खुद बेचारा बेल पे बाहर कोई दिलाये इसको होश

वो अब्दुल्ला जिसका जीवन गीत पाक के गाते गुजरा
उसको भी अब ये लगता है देश पे सच में आया खतरा

कई और छुटभैये नेता जिनकी कहीं नहीं है पूछ
चोरों के संग सीना ताने ऐंठ रहे है अपनी मूछ

कहे समीक्षा राष्ट्र विरोधी ख्वाबों की ताबीर नहीं
बंगाल हमारा सूपनखा के अब्बा की जागीर नहीं

एक साथ हैं गिद्ध और गीदड़,कुत्ते,और बिलाब सभी
एक  शेर  को  घेरेंगे  क्या नीच  निक्कमे घाघ  कभी

संविधान खतरे में होता जब भी इनकी पोल खुले
सच तो ये है डर है इनको कहीं न इनके झोल खुले

सीधी सच्ची बात है कि ये तभी तो मिलकर खायेंगे
जब  ये  चोर उचक्के मिलकर खुद सरकार बनायेंगे

देख  रहे  सब  भारतवासी इन सब झूठे मक्कारों को
उन्निस में सबक सिखाएंगे इन लोकतंत्र हत्यारों को

समीक्षा सिंह जादौन

कुछ और हो गए तुम – सोनू जैन

शेर  से  शोर  हो   गये  हो  तुम,
कितने कमज़ोर हो गये हो तुम।

हमको  पहचानते  नहीं  साहब,
आज कुछ ओर हो गये हो तुम।

बात  करते  नहीं ख़ुदा  से भी,
क्या कोई चोर हो गये हो तुम।

तुमको मालूम  ही नहीं  शायद,
ख़ुद से भी बोर हो गये हो तुम।

“सोनू” तुमसे हमें ये कहना है,
मैं पतंग, डोर  हो गये हो तुम।

✍सोनू कुमार जैन

ग़ज़ल – सरिता कोहिनूर

देश के उपकार पर अभिसार होना चाहिए
आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए

कौन कहता है,यहाँ है देश भक्तों की कमी
देखने वाली ऩज़र में धार होना चाहिए

सरहदों पर सैनिकों की क्यों शहादत रोज हो
आधुनिक और तेज सब हथियार होना चाहिए

पाक की नापाक कोशिश, चीन का अभिमान भी
तोड़ कर सीमा हमें अब पार होना चाहिए

देश की रोटी हैं खाते और बजाते पाक की
दोगले घोषित यहाँ गद्दार होना चाहिए

आज भी जिसको यहाँ माँ भारती से प्रेम है
उन जियालों का यहाँ सत्कार होना चाहिए

बह रहा है रक्त में हम सबके भारत का नमक
इसलिए माँ भारती पे वार होना चाहिए

देखती है ख़्वाब सरिता देश की तरुणाइ का
विश्व गुरु का अर्थ अब साकार होना चाहिए

सरिता कोहिनूर 💎

पथ निशान का – BY त्रिपुरेन्द्र ओझा " निशान"

जुड़ते -टूटते धागों ने ,
जलते बुझते आगों ने ,
बनते बिगड़ते रागों ने ,
समाज के विषधर नागों ने
पद-निशान को किसने मोड़ दिया
पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||१

पकड़ते छूटते हाथों ने
मिलते बिछड़ते साथों ने
बनती बिगडती बातों ने
मुंह मांगी सौगातों ने
पद-निशान को किसने मोड़ दिया
पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||२

अकेली तनहा रातों ने
कुछ शेष बचे हुए नातों ने
कुछ अपनों की घातों ने
कुछ गैरों के साथों ने
निज – मान को किसने तोड़ दिया

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||३

कुछ टेढ़ी मेढ़ी राहों ने
कुछ बिन मांगी चाहों ने
किये अनगिनत गुनाहों ने
कुछ अपनों की सलाहों ने
पद-निशान को किसने मोड़ दिया
पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||४

सुर्ख लाल लरजते होठों ने
उल्फत में मिले मुफ्त चोटों ने
दृग नीर बहाते सोतों ने 

निज – मान को किसने तोड़ दिया

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||५

नये समाज कि रीतों ने
कृत प्राण विहीन ,प्रण-जीतों ने
कुछ सुदूर देश के मीतों ने
कुछ भूली बिसरी गीतों ने
रुख निशान का किसने मोड़ दिया 

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||६

सौन्दर्य विष के प्यालों ने
कम्पित होठों के हालों ने
घनघोर घने लट जालों ने
तरसते गुजरते सालों ने
निज – मान को किसने तोड़ दिया

पथ ” निशान ” का किसने मोड़ दिया ||७

– त्रिपुरेन्द्र ओझा ” निशान “

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इस बरसात के मौसम मे

आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।
v मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

सुकुमा नक्सली हमले मे 26 जवानों की शहादत पर आक्रोश जताती मेरी रचना – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

(सुकुमा नक्सली हमले मे 26 सीआरपीएफ़ जवानों की शहादत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से आक्रोश जताती मेरी रचना – एम के पाण्डेय निल्को’)


बहुत सुन चुके जुमले
कहो कैसी लाचारी है ?
हर घटना पर निंदा मंत्री
अब कुछ करने की बारी है
खोल दो हाथ तो
नहीं मार पाएगा कोई पर परिंदा
आप करते रहे केंद्र मे रहकर
बस कठोर से कठोर निंदा
मोदी जी क्या आप बरता सकते है
आखिर 26 शेरो के हत्यारे
क्यो है अब तक ज़िंदा ?
आप कहते है हम सेना का
बड़ा सम्मान रखते है
पर विपदा की इस घड़ी में
हम अलग अरमान रखते है
सत्ता के आगे आप सभी
नशे मे चूर लगते है
पता नहीं किस बात पर
बड़े मजबूर लगते है
लड़ोगे क्या तुम पाकिस्तान और आतंकवाद से
मार दिया घर मे ही तुम्हारे इस नकस्लवाद ने
शहादत शहीदो की निल्को
सियासी खेल लगती है
सारी रक्षा नीतिया
मुझे फेल लगती है
रंगा है खून से आज
फिर अपने माटी को
साप सूंघ गया है क्या
56 इंच के छती को
एम के पाण्डेय निल्को


(कृपया रचनाकार का नाम न हटाए और मूल रूप से ही शेयर करे ।)




मुझ पर एहसान करती है – एम के पाण्डेय ‘निल्कों’

मुझ पर एहसान करती है

ये कह कर बदनाम करती है

किसी रोज पढ़ेगा कोई इन चन्द लाइनों को

तो कोई कहेगा की तुमसे ही प्यार करती है

पर कभी नहीं वो एक़रार करती है

बस हर पल ही तकरार करती है

छेड़ा था किसी रोज दूर से ही उसको 

आज तक वो मुझसे सवाल करती है

शाम की वो क्लास करती है

सरे बाज़ार श्रंगार करती है

क्या मजाल जो कोई कह दे कुछ उसको

वही पर वो उसको हलाल करती है

गुस्से से चेहरा जब वो अपना लाल करती है

पूरे मोहल्ले मे फिर बवाल करती है

निल्को एक टक देखता है उसको

जब जब वो आखे चार करती है

एम के पाण्डेय निल्कों


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मुक्तक : आँख


आंखो मे सुरमा लगाती क्यू है

आईना देख इतराती क्यू है

तुझ पर जाऊ मैं वारि वारि

पर मुझे तू बार बार आजमाती क्यू है

एम के पाण्डेय निल्को

 

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होंठ उसके जैसे गुलाब की पंखुड़िया

होंठ उसके चेहरे पर
कुछ यूँ नज़र आते है
जैसे कुछ गुलाब की पंखुड़िया
पानी में नज़र आते है
उसे देख कर तो कुछ
लड़के भी शरमाते है
नंबर लेना देना, आगे पीछे घूमना
सब उसे देख अपनी
किस्मत आजमाते है
वो कहती है कैसे कैसे गीत
मुझे देख कर लोग गाते है
शक्ल सूरत में मुझे
अपनी प्रेमिका को को पाते है
कह दे वो यदि वो सच
और दिल की बात तो ‘निल्को’
सबसे पहले तुम्हारे जैसे लोग ही
अपना मुँह फुलाते है

एम के पाण्डेय निल्को

 

आतंकियों का समर्थन करने वालों का विरोध करती मेरी नयी रचना

(आठ आतंकियों के एनकाउंटर के लिए पुलिस का समर्थन और आतंकियों का समर्थन करने वालों का विरोध करती मेरी नयी रचना)
कवि – मयंक शर्मा (09302222285)

खूब मनाई दीवाली क्या खूब पटाखे फोड़े हैं
आठ फ़रिश्ते धरती से सीधे जन्नत को छोड़े हैं

जेल का दाना पानी खाकर जो अक्सर इतराते थे
संविधान को कोस कोस मस्ती में नाचे जाते थे

खाकी को गाली देते थे तुम कुछ ना कर पाओगे
बस हमको बिरयानी देते देते ही मर जाओगे

खाकी ने दिखलाया दम और नया सवेरा कर डाला
कतरा कतरा आतंकी का बारूदों से भर डाला

अंधकार को दूर भगाने नयी पहल कर  डाली है
दीवाली के अगले ही दिन चहल पहल कर डाली है

कुछ लोगों ने इसको फिर से जल्दी ही एक मोड़ दिया
वोटों की खातिर लाशों को फिर मज़हब से जोड़ दिया

आतंकी से हमदर्दी की फिर आवाज़े आती हैं
अंधकार के हक़ में लड़ने काली रातें आती हैं

कुछ कहते है गुंडागर्दी कुछ कहते मनमर्जी है
कुछ को फिर से पीड़ा है कि ये मुठभेड़ भी फर्जी है

कुछ लोगों को आठ वोट की कमी दिखाई देती है
कुछ की आँखों में मज़हब की नमी दिखाई देती है

कुछ चैनल के पत्रकार का पत्थर दिल भी पिघल गया
कैसे कोई अंधकार को इतनी जल्दी निगल गया

अपना भी एक दीप बुझ गया अंधकार से लड़ने में
लेकिन कोई कमी नहीं की उनके आगे अड़ने में

असली है मुठभेड़ अगर तो नमन हज़ारों है खाकी
नकली भी है तो उनको निपटाओ जितने हैं बाकी.

कवि – मयंक शर्मा (09302222285)
          दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
       
  

आप सभी को नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं।

चतुर्दश वार।
मिला सुतवार।।
बढे धन कीर्ति।
रहे यश शांति।।

                गजानन हाँथ।
                सदा उर साथ।।
                कटे सब कष्ट।
                रहे  प्रभु  दृष्ट।।

प्रदीप सुपर्व।
मिले अमरत्व।।
प्रकाश अपार।
प्रहर्ष हजार।।

                 जले जब प्रकाश।
                 सदा तम नाश।।
                 मिले तब प्रमोद।
                 रहे अनुमोद।।

करें सब विनोद।
सदैव प्रमोद।
बने क्षण अखर्व।
सदा बस अपूर्व।।
   
                 रहे प्रभु वास।
                 धनेश निवास।।
                 रहे बस हर्ष।
                 नही अपकर्ष।।
सौम्या मिश्रा

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" की एक रचना

इन मीठे-मीठे पकवानों का किसको भोग लगाऊं मैं
मेरे प्रभुजी हैं सीमा पर फ़िर कैसे खुशी मनाऊँ मैं

दुश्मन की लंका जली नहीँ संहार अभी तक बाकी है
प्रत्यंचा के आघातों की टंकार अभी तक बाकी है

सीता सी भूमी गिलगित सिंध बलूचिस्तानी रोती है
अगणित लाशें अपने सीने पर निर्दोषों की ढोती है

जेहादी रावण करता अट्टाहास इधर विस्फोटों से
सेना अपनी घायल होती रहती है असुरी चोटों से

लगता है जैसे खंडित हों माता के धड़ से अंग-अंग
लंकेश कोशिशें करता माँ की पावनता हो भंग-भंग

लेकिन अंगद से वीर हमारे गिरि बनकर के अड़े रहे
बलिदान दिया है प्राणों का रक्षक बनकर के खड़े रहे

दुश्मन को धूल चटाने वाले वीर जितेंदर बलिदानी
वो नितिन चौबिया चम्बल वाला अल्हड़ सिंह स्वाभिमानी

गुरनाम वीर जैसे कितने ही जगमग होते बुझे दीप
सिंधू के रक्तिम जल में मोती वितरित करते रहे सीप

आओ हम सब मिलकर उनके नामों के दिये जलाएंगे
जिस घर में अंधियारा हो उसको जगमग करने जाएँगे

उन असहाय माताओं के दिल में उम्मीद जगाएगे
उन रोते बच्चों के मुख पर मुस्कानें वापस लाएंगे

जिस दिन पावन माटी दुश्मन से करके जंग छुड़ाएगे
हाँ उसी दिवस को दीवाली जैसा उल्लास मनाएंगे

लेकिन इतना भी याद रहे पन्ना फ़िर दर-दर ना भटके
जो किया उसी ने दीपदान वो उसके दिल में ना खटके

जिसके सुत प्राणों को न्यौछावर करने वाले सेवक हैं
उसको एहसास दिलायेंगे हम भी तो उसके दीपक हैं

ये देव कहे जिस-जिस घर से सरहद पर दीपक जाता है
उस घर में दिये जला देना उसमें भी भारत माता है

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080

दीपक – मुक्तक

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मैं   अँधेरों   से  लड़ा  हूँ
आँधियों से  भी खड़ा हूँ
तुच्छ मत कहना मुझे तू
मोतियों  से  मैं  जड़ा हूं  !!!
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मुरारि पचलंगिया

मुक्तक – नज़र निल्को की

अपने सर को बोलो की हद में रहे
चादर उनकी कद में रहे
बड़े होंगे पद में, तो क्या हुआ
बोलो अपने सरहद में रहे
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

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