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Padmaavat Movie Review : इतनी विवादों के बाद आखिरकार पद्मावत रिलीज हो ही गई

रानी पद्मिनी की बहादुरी और राजपूतों की शौर्य को बयां करती फिल्म पद्मावती जिसको हाल में पद्मावत कर दिया गया है । संजय लीला भंसाली द्वारा निर्मित इस फिल्म में दीपिका पादुकोण , रणवीर सिंह और शाहिद कपूर मुख़्य किरदार के रूप में है । मेवाड़ का गौरव और राजपूताना शौर्य की कथाएं इतनी कमजोर नहीं है कि किसी के तीन घंटे की फ़िल्म बना लेने से उनका इतिहास धूमिल हो जाए । फिर भी पद्मावत को लेकर हंगामा क्यों बरस रहा ? पूरे देश में करणी सेना इस फिल्म का विरोध कर रही है कई जगह आगजनी तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आ रही हैं  । राजपूत सुरक्षा के लिए होते थे वह सुरक्षा प्रदान करते थे लेकिन कुछ राजनीति लाभ के लिए यह सब करना ठीक नहीं । जितनी फिल्म विवादित रही उतना ही चर्चा में बनी रही और इस फिल्म की मार्केटिंग फ्री में ही पूरे देश में हो गई । संजय लीला भंसाली को बहुत बड़े-बड़े बैनर नहीं बनवाने पड़े । सबसे मजे की बात है यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दे दी फिर भी राज्य सरकार अपने राज्य में इस फिल्म को दिखाने के लिए मना कर दी । सेंसर बोर्ड सुप्रीम कोर्ट दोनों ने फिल्म को पास कर दिया जो विवादित सीन था उसे  हटा दिया गया उसके बाद भी इसको रिलीज न होने दिया जाए इसका क्या मतलब ठीक है । कोई भी फिल्म आने वाली पीढ़ी के लिए एक कहानी के रूप में एक इतिहास को बयां करती हुई नजर आती है यदि हम उसको ठीक तरीके से प्रस्तुत ना करें तो हम अपनी पीढ़ी को गलत चीज की जानकारी देते रहते हैं इसलिए सभी फिल्म निर्माता से निवेदन आग्रह है कि सही दिखाए क्या चीज सही है गलत है वह बहुत अच्छे ढंग से समझते भी है शायद इसीलिए पद्मावती या पद्मावत बहुत ज्यादा विवादित रही है । पता नहीं आप लोग की क्यो फिल्म का विरोध कर रहे है । मैं तो यह भी नहीं जानता कि आप लोगों ने फ़िल्म देखी भी है या नहीं । वैसे बता दे कि यदि किसी ने फिल्म देखी है वो यही कहता सुनाई दे रहा है कि फ़िल्म को देखने के बाद खिलजी के खिलाफ नफरत और बढ़ जाएगी यही नहीं राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती को इतने बेहतरीन तरीके में दर्शाया गया है की इन दोनों की वीरता की कहानी जैसी आपको इतिहास में दिखाइए पढ़ाई गई थी वैसा ही कुछ फिल्म में भी दर्शाया गया है । चाहे गोरा बादल हो चाहे राजा रतन सिंह रानी पद्मावती तक  किसी की भी सम्मान के साथ फिल्में में कोई समझौता नहीं किया गया है और हां आप का डर था की इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी को हीरो की तरह दर्शाया गया है माफ कीजिएगा ऐसा कुछ नहीं है अलाउद्दीन खिलजी को एक बड़ा किरदार के रूप में जरूर दिखाए गया है बाकी अब तो फ़िल्म रिलीज हो ही चुकी है देखते है की करनी सेना और सुप्रीम कोर्ट में कौन सम्मानीय है ।

एम के पाण्डेय निल्को

मन की बात – एम के पाण्डेय निल्को

हम में से ज्यादातर लोगों का कोई टाईम टेबल नहीं होता, जब मन किया पढने बैठ जाते हैं, जो मन किया किताब उठा लेते हैं और पढने लगते हैं, कोई भी टॉपिक बीच से ही पढ्ने लग जाते हैं, इससे सिवाय confusion के कुछ हाथ नहीं लगता हमें ये तक पता नहीं रहता कि हमने कौन सा विषय कितना पढ लिया है, और लोग बेवजह ही अपनी meomory को दोष देते हैं, एक बेहतर रणनीति ही बेहतर जीत दिला सकती है, और रणनीति का पहला हिस्सा जो कि यहाँ पर टाईम टेबल है, यदि यह कमजोर है तो आप जीत की आशा कैसे कर सकते हैं, तो बेहतर सफलता के लिये एक बेहतर टाईम टेबल बनाईये

एम के पाण्डेय निल्को
ब्लॉगर

मैं सुबह का अख़बार नहीं होता

मंगलवार की सुबह
जल्दी ही नीद खुली
लगा हुआ किसी मुद्दे पर सुबह
और किसी को जीत मिली
रूप का
रंग का
बाजार नहीं होता
भले कमज़ोर हूँ
पर लाचार नहीं होता
निल्को को पढ़ना है तो
उसकी नज़र से पढ़िए
किसी के लिए भी
मैं सुबह का अख़बार नहीं होता
न जाने क्यू बैठे बैठे ही
कही दर्द हुआ करता है
कौन दुखता हुआ
मेरे घाव छुआ करता है
जो सामने की भीड़ में शामिल है
वह शख्स भी किसी का कातिल है
टूटते ये अजीबोगरीब रिश्ते
बस कलम,कैमरा और कीबोर्ड
यही निल्को के सिपाही है

कौन कहता है भारत भूखा मर रहा है?

लड़कियाँ भाव खा रही हैँ 
 लड़के धोखा खा रहे हैँ 
पुलिस रिश्वत खा रही है 
 नेता माल खा रहे हैँ 
किसान जहर खा रहे हैँ
 जवान गोली खा रहे हैँ 
कौन कहता है 
भारत भूखा मर रहा है?
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जय हो मंगलमय हो ।

“प्रभु “कहते” “है”

“होती” “आरती”, “बजते “शंख”                                 .     “पूजा” “में” “सब” “खोए” “है”❗

“मंदिर” “के” “बाहर” “तो” “देखो”,
          “भूखे” “बच्चे ” “सोए” “है “❗

“एक” “निवाला” “इनको” “देना”,
    “प्रसाद” “मुझे” “चढ” “जायेगा”❗

“मेरे” “दर” “पर” “माँगने” “वाले”                           .    “तुझे” “बिन” “माँगे” “सब” “मिल”  “जायेगा

प्रस्तुति
एम के पाण्डेय निल्को

अपने लिए भी जियें…..!

ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं.! फिर शुरू होती है नौकरी की खोज.!
ये नहीं वो, दूर नहीं पास.
ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते,
अंत में एक तय होती है, और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है. !
और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक, वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है… अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल..!
इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ.!
‘वो’ स्थिर होता है.
बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं.
इतने में अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.!
विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.!
शादी के पहले 2-3 साल नर्म, गुलाबी, रसीले और सपनीले गुज़रते हैं.!
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने.!
पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं.!
क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमना फिरना, खरीदी होती है.!
और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.!
सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है.! उसका खाना पीना , उठना बैठना, शु-शु, पाॅटी, उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार.!
समय कैसे फटाफट निकल जाता है, पता ही नहीं चलता.!
इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना, घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला..?
इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और बच्चा बड़ा होता गया…
वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में.!
घर की किस्त, गाड़ी की किस्त और बच्चे की ज़िम्मेदारी, उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शून्य  बढ़ाने का टेंशन.!
उसने पूरी तरह से अपने आपको काम में झोंक दिया.!
बच्चे का स्कूल में एॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा.!
उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.!
इतने में वो पैंतीस का हो गया.!
खूद का घर, गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य.!
फिर भी कुछ कमी है..?
पर वो क्या है समझ में नहीं आता..!
इस तरह उसकी चिड़-चिड़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगता है।
दिन पर दिन बीतते गए, बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया.! उसकी दसवीं आई और चली गयी.!
तब तक दोनों ही चालीस के हो गए.!
बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.!
एक नितांत एकांत क्षण में उसे वो गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है,
“अरे ज़रा यहां आओ,
पास बैठो.!”
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें, कहीं घूम के आएं…! उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहती है,
“तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है. मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है..!” कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल जाती है.!
और फिर आता है पैंतालीसवां साल,
आंखों पर चश्मा लग गया,
बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे,
दिमाग में कुछ उलझनें शुरू हो जाती हैं,
बेटा अब काॅलेज में है,
बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं, उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और…
बेटे का कालेज खत्म हो गया,
अपने पैरों पर खड़ा हो गया.!
अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया…!!!
अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा…!
उसे भी चश्मा लग गया.!
अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा  हो रहा था..!
पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू हो गया.!
बैंक में अब कितने शून्य हो गए,
उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे..!
गोली-दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा.!
डाॅक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं.!
बच्चे बड़े होंगे….
ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा.
बच्चे कब वापस आएंगे,
अब बस यही हाथ रह गया था.!
और फिर वो एक दिन आता है.!
वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था.!
वो शाम की दिया-बाती कर रही थी.!
वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है.!
इतने में फोन की घंटी बजी,
उसने लपक के फोन उठाया,
उस तरफ बेटा था.!
बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा..!
उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा..?
अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी..!”
एक काम करिये, इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहिये.!”
कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया..!
वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी.
उसने उसे आवाज़ दी,
“चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें.!”
वो तुरंत बोली,
“बस अभी आई.!”
उसे विश्वास नहीं हुआ,
चेहरा खुशी से चमक उठा,
आंखें भर आईं,
उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए,
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया..!!
उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा,
“बोलो क्या बोल रहे थे.?”
पर उसने कुछ नहीं कहा.!
उसने उसके शरीर को छू कर देखा, शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था..!
क्षण भर को वो शून्य हो गई,
“क्या करूं” उसे समझ में नहीं आया..!
लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई,  धीरे से उठी और पूजाघर में गई.!
एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई..!
उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली,
“चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे.!”
बोलो…!! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं..!
वो एकटक उसे देखती रही,
आंखों से अश्रुधारा बह निकली.!
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया.!
ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था….!!
यही जिंदगी है…??
नहीं….!!!
संसाधनों का अधिक संचय न करें,
ज्यादा चिंता न करें,
सब अपना अपना नसीब ले कर आते हैं.!
अपने लिए भी जियो, वक्त निकालो..!
सुव्यवस्थित जीवन की कामना…!!
जीवन आपका है, जीना आपने ही है…!
सादर
एम के पाण्डेय निल्को
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