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Padmaavat Movie Review : इतनी विवादों के बाद आखिरकार पद्मावत रिलीज हो ही गई

रानी पद्मिनी की बहादुरी और राजपूतों की शौर्य को बयां करती फिल्म पद्मावती जिसको हाल में पद्मावत कर दिया गया है । संजय लीला भंसाली द्वारा निर्मित इस फिल्म में दीपिका पादुकोण , रणवीर सिंह और शाहिद कपूर मुख़्य किरदार के रूप में है । मेवाड़ का गौरव और राजपूताना शौर्य की कथाएं इतनी कमजोर नहीं है कि किसी के तीन घंटे की फ़िल्म बना लेने से उनका इतिहास धूमिल हो जाए । फिर भी पद्मावत को लेकर हंगामा क्यों बरस रहा ? पूरे देश में करणी सेना इस फिल्म का विरोध कर रही है कई जगह आगजनी तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आ रही हैं  । राजपूत सुरक्षा के लिए होते थे वह सुरक्षा प्रदान करते थे लेकिन कुछ राजनीति लाभ के लिए यह सब करना ठीक नहीं । जितनी फिल्म विवादित रही उतना ही चर्चा में बनी रही और इस फिल्म की मार्केटिंग फ्री में ही पूरे देश में हो गई । संजय लीला भंसाली को बहुत बड़े-बड़े बैनर नहीं बनवाने पड़े । सबसे मजे की बात है यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दे दी फिर भी राज्य सरकार अपने राज्य में इस फिल्म को दिखाने के लिए मना कर दी । सेंसर बोर्ड सुप्रीम कोर्ट दोनों ने फिल्म को पास कर दिया जो विवादित सीन था उसे  हटा दिया गया उसके बाद भी इसको रिलीज न होने दिया जाए इसका क्या मतलब ठीक है । कोई भी फिल्म आने वाली पीढ़ी के लिए एक कहानी के रूप में एक इतिहास को बयां करती हुई नजर आती है यदि हम उसको ठीक तरीके से प्रस्तुत ना करें तो हम अपनी पीढ़ी को गलत चीज की जानकारी देते रहते हैं इसलिए सभी फिल्म निर्माता से निवेदन आग्रह है कि सही दिखाए क्या चीज सही है गलत है वह बहुत अच्छे ढंग से समझते भी है शायद इसीलिए पद्मावती या पद्मावत बहुत ज्यादा विवादित रही है । पता नहीं आप लोग की क्यो फिल्म का विरोध कर रहे है । मैं तो यह भी नहीं जानता कि आप लोगों ने फ़िल्म देखी भी है या नहीं । वैसे बता दे कि यदि किसी ने फिल्म देखी है वो यही कहता सुनाई दे रहा है कि फ़िल्म को देखने के बाद खिलजी के खिलाफ नफरत और बढ़ जाएगी यही नहीं राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती को इतने बेहतरीन तरीके में दर्शाया गया है की इन दोनों की वीरता की कहानी जैसी आपको इतिहास में दिखाइए पढ़ाई गई थी वैसा ही कुछ फिल्म में भी दर्शाया गया है । चाहे गोरा बादल हो चाहे राजा रतन सिंह रानी पद्मावती तक  किसी की भी सम्मान के साथ फिल्में में कोई समझौता नहीं किया गया है और हां आप का डर था की इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी को हीरो की तरह दर्शाया गया है माफ कीजिएगा ऐसा कुछ नहीं है अलाउद्दीन खिलजी को एक बड़ा किरदार के रूप में जरूर दिखाए गया है बाकी अब तो फ़िल्म रिलीज हो ही चुकी है देखते है की करनी सेना और सुप्रीम कोर्ट में कौन सम्मानीय है ।

एम के पाण्डेय निल्को

मन की बात – एम के पाण्डेय निल्को

हम में से ज्यादातर लोगों का कोई टाईम टेबल नहीं होता, जब मन किया पढने बैठ जाते हैं, जो मन किया किताब उठा लेते हैं और पढने लगते हैं, कोई भी टॉपिक बीच से ही पढ्ने लग जाते हैं, इससे सिवाय confusion के कुछ हाथ नहीं लगता हमें ये तक पता नहीं रहता कि हमने कौन सा विषय कितना पढ लिया है, और लोग बेवजह ही अपनी meomory को दोष देते हैं, एक बेहतर रणनीति ही बेहतर जीत दिला सकती है, और रणनीति का पहला हिस्सा जो कि यहाँ पर टाईम टेबल है, यदि यह कमजोर है तो आप जीत की आशा कैसे कर सकते हैं, तो बेहतर सफलता के लिये एक बेहतर टाईम टेबल बनाईये

एम के पाण्डेय निल्को
ब्लॉगर

मैं सुबह का अख़बार नहीं होता

मंगलवार की सुबह
जल्दी ही नीद खुली
लगा हुआ किसी मुद्दे पर सुबह
और किसी को जीत मिली
रूप का
रंग का
बाजार नहीं होता
भले कमज़ोर हूँ
पर लाचार नहीं होता
निल्को को पढ़ना है तो
उसकी नज़र से पढ़िए
किसी के लिए भी
मैं सुबह का अख़बार नहीं होता
न जाने क्यू बैठे बैठे ही
कही दर्द हुआ करता है
कौन दुखता हुआ
मेरे घाव छुआ करता है
जो सामने की भीड़ में शामिल है
वह शख्स भी किसी का कातिल है
टूटते ये अजीबोगरीब रिश्ते
बस कलम,कैमरा और कीबोर्ड
यही निल्को के सिपाही है

कौन कहता है भारत भूखा मर रहा है?

लड़कियाँ भाव खा रही हैँ 
 लड़के धोखा खा रहे हैँ 
पुलिस रिश्वत खा रही है 
 नेता माल खा रहे हैँ 
किसान जहर खा रहे हैँ
 जवान गोली खा रहे हैँ 
कौन कहता है 
भारत भूखा मर रहा है?
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जय हो मंगलमय हो ।

“प्रभु “कहते” “है”

“होती” “आरती”, “बजते “शंख”                                 .     “पूजा” “में” “सब” “खोए” “है”❗

“मंदिर” “के” “बाहर” “तो” “देखो”,
          “भूखे” “बच्चे ” “सोए” “है “❗

“एक” “निवाला” “इनको” “देना”,
    “प्रसाद” “मुझे” “चढ” “जायेगा”❗

“मेरे” “दर” “पर” “माँगने” “वाले”                           .    “तुझे” “बिन” “माँगे” “सब” “मिल”  “जायेगा

प्रस्तुति
एम के पाण्डेय निल्को

अपने लिए भी जियें…..!

ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं.! फिर शुरू होती है नौकरी की खोज.!
ये नहीं वो, दूर नहीं पास.
ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते,
अंत में एक तय होती है, और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है. !
और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक, वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है… अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल..!
इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ.!
‘वो’ स्थिर होता है.
बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं.
इतने में अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.!
विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.!
शादी के पहले 2-3 साल नर्म, गुलाबी, रसीले और सपनीले गुज़रते हैं.!
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने.!
पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं.!
क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमना फिरना, खरीदी होती है.!
और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.!
सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है.! उसका खाना पीना , उठना बैठना, शु-शु, पाॅटी, उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार.!
समय कैसे फटाफट निकल जाता है, पता ही नहीं चलता.!
इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना, घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला..?
इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और बच्चा बड़ा होता गया…
वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में.!
घर की किस्त, गाड़ी की किस्त और बच्चे की ज़िम्मेदारी, उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शून्य  बढ़ाने का टेंशन.!
उसने पूरी तरह से अपने आपको काम में झोंक दिया.!
बच्चे का स्कूल में एॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा.!
उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.!
इतने में वो पैंतीस का हो गया.!
खूद का घर, गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य.!
फिर भी कुछ कमी है..?
पर वो क्या है समझ में नहीं आता..!
इस तरह उसकी चिड़-चिड़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगता है।
दिन पर दिन बीतते गए, बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया.! उसकी दसवीं आई और चली गयी.!
तब तक दोनों ही चालीस के हो गए.!
बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.!
एक नितांत एकांत क्षण में उसे वो गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है,
“अरे ज़रा यहां आओ,
पास बैठो.!”
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें, कहीं घूम के आएं…! उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहती है,
“तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है. मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है..!” कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल जाती है.!
और फिर आता है पैंतालीसवां साल,
आंखों पर चश्मा लग गया,
बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे,
दिमाग में कुछ उलझनें शुरू हो जाती हैं,
बेटा अब काॅलेज में है,
बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं, उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और…
बेटे का कालेज खत्म हो गया,
अपने पैरों पर खड़ा हो गया.!
अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया…!!!
अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा…!
उसे भी चश्मा लग गया.!
अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा  हो रहा था..!
पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू हो गया.!
बैंक में अब कितने शून्य हो गए,
उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे..!
गोली-दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा.!
डाॅक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं.!
बच्चे बड़े होंगे….
ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा.
बच्चे कब वापस आएंगे,
अब बस यही हाथ रह गया था.!
और फिर वो एक दिन आता है.!
वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था.!
वो शाम की दिया-बाती कर रही थी.!
वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है.!
इतने में फोन की घंटी बजी,
उसने लपक के फोन उठाया,
उस तरफ बेटा था.!
बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा..!
उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा..?
अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी..!”
एक काम करिये, इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहिये.!”
कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया..!
वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी.
उसने उसे आवाज़ दी,
“चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें.!”
वो तुरंत बोली,
“बस अभी आई.!”
उसे विश्वास नहीं हुआ,
चेहरा खुशी से चमक उठा,
आंखें भर आईं,
उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए,
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया..!!
उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा,
“बोलो क्या बोल रहे थे.?”
पर उसने कुछ नहीं कहा.!
उसने उसके शरीर को छू कर देखा, शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था..!
क्षण भर को वो शून्य हो गई,
“क्या करूं” उसे समझ में नहीं आया..!
लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई,  धीरे से उठी और पूजाघर में गई.!
एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई..!
उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली,
“चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे.!”
बोलो…!! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं..!
वो एकटक उसे देखती रही,
आंखों से अश्रुधारा बह निकली.!
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया.!
ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था….!!
यही जिंदगी है…??
नहीं….!!!
संसाधनों का अधिक संचय न करें,
ज्यादा चिंता न करें,
सब अपना अपना नसीब ले कर आते हैं.!
अपने लिए भी जियो, वक्त निकालो..!
सुव्यवस्थित जीवन की कामना…!!
जीवन आपका है, जीना आपने ही है…!
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

गीत ग़ज़ल हो या हो कविता – एम के पाण्डेय निल्को


गीत ग़ज़ल हो या हो कविता 
नज़र है उस पर चोरो की 
सेंध लगाये बैठे तैयार 
कॉपी पेस्ट को मन बेक़रार 
लिखे कोई और, पढ़े कोई और 
नाम किसी और का चलता है 
कुछ इस तरह इन चोरो का 
ताना बना भी चलता रहता है 
सोच सोच कर लिखे गजल जो
प्रसंशा वो नहीं पाता है 
पर चुराए हुए रचना पर 
वाह वाही खूब कमाता है 
मन हो जाता उदास निल्को 
किसी और का गुल खिलाये जाते है 
वो खुश होता किन्तु 
मन से पछताए जाये है 
***************
एम के पाण्डेय निल्को 

ज़िन्दगी है एक पहेली – एम के पाण्डेय निल्को


गांव में छोड़ आये वो बड़ी सी हवेली
शहरो में ढूंढते है वो एक सहेली
आराम या हराम से जिए जा रहे है
पर कौन समझाए की ज़िन्दगी है एक पहेली
छप रहे थे वो बन कर ख़बरे
कुछ लोग खड़े द्वार बन पहरे
उनका बनना और बिगड़ना मंज़ूर तो था की
क्योकि हम इस रफ़्तार में भी ठहरे
बढ़ चले वो प्रगति के पथ पर
अर्थ नहीं समझे वो इस अर्थ पर
जीतनी रफ़्तार से वो निखर रहे थे
आज देख रहा हूँ उन्हें इस फर्श पर
लोग बाज़ार में आकर बिक भी गए
हमारी कीमत भी वो लगा कर भी गए
पर आज बस इतना कहेगा ये निल्को
की वो तो लोगो के पान की पिक से भी गए

एम के पाण्डेय निल्को


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आज कल के समाचार का हाल


आज कल के समाचार का हाल
दिन प्रतिदिन हो रहा बेहाल
टीवी एंकर को भी कहते पत्रकार
जो असल में है एक कलाकार
ख़बरों का करते ये बलात्कार
जनता सहती इनके अत्याचार
सही बताऊ तो नहीं रहा
चैनल और अख़बार
क्योकि कर रहे है ये सब
बहुत ही गन्दा व्यपार……!
एम के पाण्डेय निल्को

मनन है अभी छोटा बच्चा – एम के पाण्डेय निल्को

तस्वीर में दिख रहे ये दो चेहरे अपनी कला से जाने जाते है। मनन सूद अपने दिमागी कौशल से लोहा मनवा रहे है तो वही इनके दादा जी श्री आर सी सूद जी जुडो कराटे में राजस्थान के साथ पूरे भारत में अपना लोहा मनवा चुके है। फिर हाल तो आप मनन सूद पर एक रचना पढ़िए और इनके दिमागी कौशल को देखने के लिए #Youtube पर इनको सर्च करे।

मनन है अभी छोटा बच्चा
पर दिमाग से नहीं वो कच्चा
मन से वो बहुत ही सच्चा
और हम सबको लगता है वो अच्छा
कई चीजो की है उसको जानकारी
प्राइवेट हो या हो सरकारी
बात करा लो चाहे क्रिकेट की
या हो राजनीति सीक्रेट की
पल भर में देकर जवाब
कर देता सवाल को हलाल
इतिहास पूछो या पूछो भूगोल
कैसे है ये दुनिया गोल
पलक झपकते जवाब हाज़िर है उनका
बोलती बंद किया है वो सबका
वन्डर बॉय कहलाता है वो
कई चीज मुझे भी सिखलाता है वो
दादा जी से सीखता वो कराटे
और अंग्रेजी बोलता है वो फर्राटे
देश दुनिया की बड़ी और छोटी
पतली हो या बात हो मोटी
ध्यान लगाकर सुनता उनको
फिर दिमाग में बुनता उनको
इस निल्को में और मनन में
दो ही चीज गजब की है
एक तो उसका भोलापन है
और एक मेरा ये कवितापन
बहुमुखी प्रतिभा का धनी वो परिवार
करता है वो सबका सत्कार
पर सोचने पर मजबूर करते है मुझको
की है वो आख़िर किसके अवतार….?

एम के पाण्डेय निल्को

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सोच रहा हूँ कोई कविता गाऊँ – एम के पाण्डेय ‘निल्को’


समय पर जब यह समय मिला 
उनके लिए ही यह गीत बुना
मुलाकात जब उनसे हुई 
मानो बंजारे को घर मिला

देखा उनको जब आज के दिन
अच्छा नहीं लग रहा अब उनके बिन
मुलाकात का क्या हाल बताऊ
सोच रहा हूँ कोई कविता गाऊँ

तुम्हारे पास हूँ लेकिन
जो दूरी मैं समझता हूँ
तुम्हारे बिन यह रिश्ता
अधूरा है समझता हूँ

तुम्हे मैं भूल जाउगा
यह मुमकिन है नहीं लेकिन 
पर तुम्ही को भूलना सबसे 
जरुरी है समझता हूँ

अच्छा लगा मिल कर उनसे
बातें हुई पर न खुल कर उनसे
दिन का एक पहर कुछ ऐसे निकला
जैसे निल्को का कोई अपना निकला

सोच रहा हूँ की लिखूँ उनपर
लेकिन शुरुआत करू मैं कहा से
शब्दों के युद्ध हो रहे दिमाग में
काफी कुछ लिखा है उनके चेहरे के किताब में

निल्को ने जब देखा अपनी नज़र से
सब कुछ भूल गया उनकी असर से
क्षणिक मिलाप पर क्या कहूँ
कैसे इस पर कोई गीत लिखू

*********************
एम के पाण्डेय ‘निल्को’

चेहरे की वो बात – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

चेहरे की वो बात
अधूरी रह गई थी रात
किनारे बैठे थे वे साथ
डाले एक दूसरे मे हाथ
कह रहे थे
सुन रहे थे
एक दूसरे को
बुन रहे थे
और चेहरा पढ़ने की कोशिश मे
एक दूसरे पर हस रहे थे
फिर झटके से टूटा सपना
सब कह रहे है अपना अपना
पर अनुभव भरे इस ज़िंदगी मे
दर्द कर रहा है मेरा टखना
रात रह गई
बात रह गई
सपना टूटा पर
वह साथ ही रह गई
जैसे आई वर्षा की बूंद
पी हो जैसे अमृत की घूट
मस्तिक मे हो रही शब्दो की युद्ध
और सब लग रहा था है ये शुद्ध
रच रहे थे निल्को डूब कर
कौन कराये उनको पार
पूरी कविता पढ़ समझ लो
इतना ही है बस मेरा सार
********************

एम के पाण्डेय निल्को

लिखता हूँ बचपन की वो कहानी – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

बचपन की वो दुनिया
पचपन की उम्र में भी नहीं भूलती
क्योंकि जो की थी शरारते
वो भी कुछ नहीं कहती ।।  
न तो लोग बुरा मानते
और न ही मुझे मनाते
रूठे और मनाने के खेल से
हम किसी को नहीं सताते ।।
शाम को जब हम छत पर जाते
खेलते कूदते नहीं घबराते
पर आज के इस परिवेश में
हम बचपन को ही खोते पाते ।।
त्योहारों पर करते थे जो मस्ती
देखती रहती थी पूरी बस्ती
पर अब कोई साथ नहीं है
अकेलापन ही है अब सस्ती ।।
वो पेड़ों पर चड़ना और लटकना
मिट्टी में एक दूसरे को पटकना
छुपन छुपाई हो या हो सरकना
इसके लिए है अब तरसना ।।


लिखता हूँ बचपन की वो कहानी
खुद ही यानि निल्कोकी जुबानी
पर यह कलम अब नहीं चलती सुहानी
क्योंकि यह कविता शायद है अभी बाकी …….।।

एम के पाण्डेय निल्को

सोच रहा हूँ लिखू रानीखेत एक्सप्रेस की कहानी

दोस्तों अभी ट्रेन में सफ़र कर रहूँ और मन बेचैन हो रहा है । मुक्तक लिखने की सोचा तो विषय से भटक गया और मुक्तक की जगह लिख दिया पुक्तक । जैसे जैसे ट्रेन आगे बढ़ रही है ठण्ड उसका साथ बखूबी निभा रही है । सोच रहा हूँ लिखू रानीखेत एक्सप्रेस की कहानी निल्को की जुबानी , किन्तु भारतीय रेल इसमें बाधा उत्पन्न कर रही है । न तो कोई चार्जिंग की जगह और ना की कोई माहौल।
अभी तो इन पुक्तक से ही काम चलाये अगली बार कुछ नया जरूर लेकर आउगा । सादर – एम के पाण्डेय निल्को

की मेरे जाने या आने में
निल्को याद आता है ।
जहाँ भी मैं तो जाता हूँ
पास उसको ही पाता हूँ ।।

क्या गज़ब वो सफ़र था
क्या अजब वो पहर था ।
गांव की उसअजीबोगरीब
गलियो में एक शहर था ।।

तुम्हारी याद आती है
नज़ारे जो भो सोचता हूँ।
कोई जब रूप धरता हूँ
तो तुम रास आती हो।।

ठण्ड के इस मौसम में
बर्फ जब भी जमती है।
तुम्हारी सोच की गरमाहट
पसीने से तर बतर करती है।।

एम के पाण्डेय निल्को

एम के पाण्डेय ‘निल्को’ की कविता – वो दूरिया बढ़ाते गए

वो दूरिया बढ़ाते गए
और कुछ लोग यह देख कर मुस्कुराते गए
इस ज़िंदगी के कशमकश में
शायद निल्को को वो भुलाते गए
जब याद दिन वो आते है
इतिहास बनाए जाते है
ढ़ूढ़ते है सबको इधर उधर
पर तन्हा की ख़ुद को पाते है
जब जब तुम मुझसे दूर गए
शायद हमें तुम भूल गए
पर पुरानी अपनी बातों से
कहा तुम चूक गए
पर सुनो लकीरें भी बड़ी अजीब होती हैं
माथे पर खिंच जाएँ तो किस्मत बना देती हैं
जमीन पर खिंच जाएँ तो सरहदें बना देती हैं
खाल पर खिंच जाएँ तो खून ही निकाल देती हैं
और रिश्तों पर खिंच जाएँ तो दीवार बना देती हैं
जब जब तुम मौन रहते हो
तब तब मैं गुज़रते लम्हों में सदिया तलाश करता हूँ
में अपने आप में ही खामिया तलाश करता हूँ
अब तो  मेरा खुदसे मिलने को जी चाहता है
काफी कुछ सुना रहा हूँ अपने बारे में
इतना, आसान हूँ कि हर किसी को समझ आ जाता हूँ
लेकिन शायद तुमने ही ठीक से न पढ़ा है मुझे
किन्तु ये सबक मिल ही गया जाते जाते मुझे
अच्छे होते हैं बुरे लोग
कम से कम अच्छे होने का,
वे दिखावा तो नहीं करते………
सादर



एम के पाण्डेय निल्को

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अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता

एम के पाण्डेय ‘निल्को’  

कुछ मेरे मित्र मेरे परिचय के बारे में ज्रिक कर रहे थे , उनकी शिकायत थी की कभी मैंने अपना परिचय ठीक से नहीं दिया | बताना चाहूगा की यह मेरी कमजोरी है की मैं अपना परिचय ठीक से नहीं करा पाता कई बार कोशिश की किन्तु सफल पूरी तरह से न हो सका , एक बार पुनः संक्षिप्त में कोशिश कर रहा हूँ ज़रा आप की बताइए कहा तक यह कोशिश सफल हुई | लेकिन इस बात का अफ़सोस है की कुछ लोग – 

हज़ारों ऐब ढूँढ़ते है वो निल्को में इस तरह,

अपने किरदारों में वो फरिश्तें हो जैसे …..!


और मैं हर बार यही कहता हूँ की –

जैसा भी हूँ अच्छा या बुरा अपने लिए हूँ 
मैं ख़ुद को नहीं देखता औरो की नज़र से ….!
वैसे 
ख़ामोशी भी  बहुत कुछ कहती है
कान लगाकर नहीं ,

दिल लगाकर सुनो ….

मै कोई बहुत बड़ा लेखक या कवि नहीं , बस यूं ही अपने मन के भावों को अपनी कलम के जरिये कागज़ पर उतार लेता हूँ जो कहीं कविताओं के रूप मे, कहीं लेखो के रूप मे अपनी जगह बना लेते है । मैं इस विश्व के जीवन मंच पर अदना सा किरदार हूँ जो अपनी भूमिका न्यायपूर्वक और मन लगाकर निभाने का प्रयत्न कर रहा है। पढ़ाई लिखाई के हिसाब से बुद्धू डिब्बा (कम्प्युटर) से स्नातक हूँ और प्रबंधन से परास्नातक। कई मासिक पत्रिका और वैबसाइट पर स्वतंत्र लेखन में कविता, टिप्पणी, आलोचना आदि में विशेष रुचि है उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िला के हरखौली गाँव मे जन्म और राजस्थान मे पढ़ाई की और आगे गांवो के लिए कुछ सरकारी – गैर सरकारी , सामाजिक परियोजनाओ का संचालन करने का इरादा । अपनी रचनाओ के माध्यम से गांवो/लोगो में जागरुकता लाना चाहता हूं ऒर समाज के लोगों का ध्यान उनकी समस्याओं की ऒर खीचना चाहता हूं। ताकि उनको भी स्वतंत्र पहचान एवं उडान भरने के लिए खुला आसमान मिल सके। बस यही मेरे जीवन का लक्ष्य है । बस इतनी सी बातें है मेरे बारे में।


सादर 

एम के पाण्डेय ‘निल्को’ 

झुकना – नज़र निल्को की

वो शख्स जो
तुमसे झुक का
मिला हो
शायद
वह तुमसे
कई गुना बड़ा हो ..!
उसकी आँखों में
तुम्हे लिए
जो खास बात है
वह एक
किसी के लिए
मिशाल है …!
मत हस
उसके इस
चाल चलन पर
वह गई गुना
समझदार है तुमसे …!
तुमने हस दिया
उसकी बुद्दिमता पर
लेकिन वह
सफल हो गया
अपनी इरादों पर…..!
तुमसे हस कर
जो कह दिया
ठीक है
उसने सचमुच में ही
ठीक कर दिया …..!
एक अनोखे तरीके से
अपना और तुम्हारा
काम कर गया ….!




एम के पाण्डेय ‘निल्को’

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