Tag Archives: एम के पाण्डेय निल्को

आज लिखने को कुछ नहीं – एम के पाण्डेय निल्को

सुना है तुम्हारे चाहने वाले बहुत हैं

ये मोहब्बत की मिठाई सब में बांट देती हो क्या

कई गिर चुके हैं तुम्हारे इश्क के मंजर में

अंखियों से गोली मार देती हो क्या

पुरानी बातों को इस लॉक डाउन में फिर से सजाना है

आज हमारे पास बस यादों का खजाना है

कभी लिखा था तुम्हारें जुल्फों पर शेर

पर आज पूरी गजल तुम पर बनाना है

पर ग़ज़ल लिखे तो लिखे कैसे

मुझे नहीं पता तुम हो कैसे

मैं हूं यहां निभा रहा हूं जिम्मेदारियां

पूरे देश में जमातियों को मैंने ही बुलाया हो जैसे

ये महामारी है इसका सामना करो

घर बैठो और मेरी यादों को ताजा करो

सोचो कब मिले थे हम दोनों

एक बार फिर से बातों को साझा करो

– एम के पाण्डेय निल्को

मोटिवेशनल कहानी

एक लड़का था जो एक ऑफ़िस मैं 8 घंटे की डूटी करता 9 – 5 की। मगर रोज 8 बजे  office पहुँच जाता और देर रात तक काम करता रहता। 

एक दिन एक साथी ने पूछा, क्यूँ ? इतना काम करते हो ? कोई ओवर टाइम तो मिलता नहीं। 
वो बोला 8 घंटे डूटी तो सैलरी के लिया करता हूँ , बाक़ी के घंटे तरक़्क़ी, काम की बारीकी को सीखने और आगे बढ़ने के लिए करता हूँ।
काम घड़ी देख के मत करो । जब तक जिम्मेदारी पूरी ना हो तब तक करो। 
शुभ दिन
एम के पाण्डेय निल्को
Managing Worker – VMW Team 
| Research Scholar | छुट्टा आलोचक |
कलम, कैमरा और कम्प्यूटर | http://www.vmwteam.in

…वो कहर बरसाती है – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

वह पायल नहीं पहनती पांव में
 बस एक काले धागे से कहर बरसाती है
उसकी यही अदा तो ‘निल्को’
मुझे उसका दीवाना बनाती है
बहुत मजे से इठलाती है
 गूढ़ व्यंग की मीन बहुत बनाती है
माथे पर जब बिंदी लगाती है
तो पूरे विश्व को सुंदर बनाती है
‘मधुलेश’ का ख्याल आए तो
वह भी कविता बनाती है
जीवन की गहन अनुभूतियों पर
लिखने का प्रयास कर रचना वो बनाती है
मौसम बेईमान हो जाए जो तपाक से
रसोई में जाकर पकोड़े वो बनाती है
बस कुछ ही यूं ही आए हैं बड़े दिनों बाद इस ब्लॉग पर
पढ़कर वह भी इसे सार्थक बनाती है
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एम केपाण्डेयनिल्को

ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है


ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है 

क्यों तुम्हे दर्द से इतना प्यार है 

कलम लिखने को बहुत बेक़रार है 

क्योंकि इश्क खुद ही आज बीमार है 

ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है

प्रकृति ने खुद किया तुम्हारा शृंगार है 

उनकी चाहत भी बेशुमार है 

मैसेज के साथ साथ ऑडियो भी भेज दिया 

पर किया नहीं आज  तक इजहार है 

ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है

लेकिन तेरा आशिक बहुत दिलदार है 

प्यार ही जीवन का आधार है 

सोच रहा हूँ क्या लिखू तुम पर ‘निल्को’

वो कहती है तुम्हारी कलम,कैमरा, कम्प्यूटर सब लाजवाब है 

ज़िंदगी तेरे नख़रे भी हजार है

एम के पाण्डेय निल्को 

प्रकृति की विशेषता : एम के पाण्डेय निल्को

इस पूरे ब्रह्माण्ड में सिर्फ एक ही जगह ऐसी है जहाँ जीवन है और जहाँ चारो ओर हरियाली रहती है और इस हरियाली से यह धरती बहुत ही सुन्दर और आकर्षक लगती है. यह प्रकृति ही है जो हमें स्वस्थ जीवन जीने के लिए एक प्राकृतिक पर्यावरण देती है | यह प्रकृति हमें भगवान द्वारा दिया गया एक बहुमूल्य कीमती उपहार के समान है. हमें इस प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए और इसे नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए |
प्रकृति की सभी चीजों में कुछ ना कुछ अदभुत है

भारत महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश


एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट में भारत को महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश बताया गया है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की सर्वे में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा, मानव तस्करी और यौन व्यापार में ढकेले जाने के आधार पर भारत को महिलाओं के लिए खतरनाक बताया गया है । 

इस सर्वे के अनुसार महिलाओं के मुद्दे पर युद्धग्रस्त अफगानिस्तान और सीरिया क्रमश: दूसरे और तीसरे सोमालिया चौथे और सउदी अरब पांचवें स्थान पर हैं । सात साल पहले इसी सर्वे में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश बताया गया था।

दुनिया भर से केवल 548 जानकारों से 26 मार्च से 4 मई के बीच ऑनलाइन फोन और व्यक्तिगत तौर पर रायशुमारी की गई और बना दी गई एक ऐसा रिपोर्ट जिस पर विश्वास हो भी तो क्यो और कैसे ? 


जो फिरंगी आजतक एक आदर्श परिवार न बसा सके वो खुद के बनाए मापदंड के अनुसार भारत का सर्वे कर रहे है ? इस मुद्दे पर महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा है कि भारत के बाद रखे गए देशों में महिलाओं को बोलने का हक भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों से सर्वे किया गया उनकी संख्या बहुत कम है। उनकी राय के आधार पर दुनिया की राय नहीं बनाई जा सकती। 

भारत से ज्यादा सुरक्षा जिन देशो में है इस सर्वे के मुताबिक , उनका नाम लिखुंगा तो हसते हसते पेट मे दर्द हो जाएगा । आज भी भारत की महिलाएं और देशो की महिलाओं की तुलना में बहुत सभ्य संस्कारी और सुरक्षित है हाँ कुछ अपवाद हो सकते है इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता लेकिन इस तरह की रिपोर्ट तो बस पूर्व प्रायोजित ही है । महिलाएं ही नहीं किसी भी श्रेणी के लोगो के लिए भारत ही सबसे सुरक्षित देश है , इसके लिए कोई भी इतिहास का सहारा ले सकता है ।

एम के पाण्डेय निल्को

……विधवा विलाप करते है

ये जो ऑफिस के काम है न
बहुत बवाल करते है 
कोई एक स्टाफ चुप हो तो
दूसरा सवाल करते है 
और जब दे देता हूँ जवाब इनको 
तो पीठ पीछे बैठ कर विधवा विलाप करते है
एम के पाण्डेय निल्को

आख़िर कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान

हाल ही में भारत के बोधगया में हुए बम विस्फोटों के बाद रोहिंग्या मुस्लिम सुर्खियों में हैं, लेकिन प्रश्न यह भी है कि आखिर रोहिंग्या हैं कौनम्यांमार को क्या दिक्क़त है? इन्हें अब तक नागरिकता क्यों नहीं मिली? रोहिंग्या मुसलमान विश्‍व का सबसे अल्‍पसंख्‍यक समुदाय है। इनकी आबादी करीब दस लाख के बीच है। बौद्ध बहुल देश म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमान शताब्दियों से रह रहे हैं। बीते दिनो म्‍यांमार में हुई हिंसा में रोहिंग्‍या मुसलमानों के मारे जाने के बाद पूरे विश्‍व की नजरे इन पर आ गईं हैं। यह सुन्नी इस्लाम को मानते हैं। इन मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। ये म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को बिना अधिकारियों की अनुमति के अपनी बस्तियों और शहरों से देश के दूसरे भागों में आने जाने की इजाजत नहीं है। यह लोग बहुत ही निर्धनता में झुग्गी झोपड़ियों में रहने के लिए मजबूर हैं। पिछले कई दशकों से इलाके में किसी भी स्कूल या मस्जिद की मरम्मत की अनुमति नहीं दी गई है। नए स्कूल, मकान, दुकानें और मस्जिदों को बनाने की भी रोहिंग्या मुसलमानों को इजाजत नहीं है। म्यांमार में 25 अगस्त को भड़की हिंसा में क़रीब 400 मौतों की ख़बर है म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यक हैं और ये रोहिंग्या को अप्रवासी मानते हैं। साल 2012 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या-बौद्धों के बीच भारी हिंसा हुई थी साल 2015 में भी रोहिंग्या मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ, रोहिंग्या समुदाय 12वीं सदी के शुरुआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस तो गया, लेकिन स्थानीय बौद्ध बहुसंख्यक समुदाय ने उन्हें आज तक नहीं अपनाया है।
अराकान रोहिंग्या नेशनल ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक रोहिंग्या रखाइन में प्राचीन काल से रह रहे हैं। 1824 से 1948 तक ब्रिटिश राज के दौरान आज के भारत और बांग्लादेश से एक बड़ी संख्या में मजदूर वर्तमान म्यांमार के इलाके में ले जाए गए। ब्रिटिश राज म्यांमार को भारत का ही एक राज्य समझता था इसलिए इस तरह की आवाजाही को एक देश के भीतर का आवागमन ही समझा गया। ब्रिटेन से आजादी के बाद, इस देश की सरकार ने ब्रिटिश राज में होने वाले इस प्रवास को गैर कानूनी घोषित कर दिया। इसी आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया गया। जिसके चलते अधिकांश बौद्ध रोहिंग्या मुसमानों को बंगाली समझने लगे और उनसे नफरत करने लगे।
भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान हैं, जो जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मौजूद हैं।  चूंकि भारत ने शरणार्थियों को लेकर हुई संयुक्त राष्ट्र की 1951 शरणार्थी संधि और 1967 में लाए गए प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं इसलिए देश में कोई शरणार्थी कानून नहीं हैं । गौरतलब है कि भारत सरकार रोहिंग्या मुस्लिमों को शरण देने से इनकार कर रही हैसरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि, “रोहिंग्या मुसलमान देश की सुरक्षा के लिए खतरा है और इस समुदाय के लोग आतंकी संगठनों से भी जुड़े हो सकते हैं”हालांकि, कोर्ट से सरकार ने इसे होल्ड करने की अपील की है

एम के पाण्डेय निल्को
रिसर्च स्कॉलर, जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी 

….या फिर तुम्हारी यादें

तुम या फिर तुम्हारी यादें

जब जब आती है

एक सुखद एहसास मेरे मन को

छू कर भाग जाती है

भाग जाती है

क्योकि

वो रुक नही सकती

और मैं उसे

रोक नही सकता

उस क्षणिक समय में

खो जाते है

हम दोनों 

जी हाँ , सही सुन रहे है

हम दोनों

मैं और मेरी तन्हाइयां

क्योंकि यही तो साथ देती है

पहले से थी और 

बाद तक साथ रहेगी

यही तो है जो अपना है

जो साथ है

जो साथ रहेगा 

सुनाऊंगा किसी रोज

एक दूसरा किस्सा

जिसका तू ही होगा एक हिस्सा

मेरी खामोशियों को न तोड़ो

भादो का महीना है

वर्षा से कही आफत है तो

कही राहत है

क्या सुनाऊ

क्या लिखूं

सोच रहा हूँ यही छोड़ 

देता हूँ जो है

वो किस्मत के 

भरोसे

या करे संघर्ष 

मिलते है इस आधी अधूरी

बिना सिर पैर की

रचना के बाद

एम के पाण्डेय निल्को

इस बरसात के मौसम मे

आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।
v मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

VMW Team – शून्य एक हक़ीकत –

शून्य एक हक़ीकत तो क़रीब क़रीब हर पढ़े लिखे व्यक्ति पर उजागर है कि अंकगणित की दुनिया के इस हीरो, जिसे अंग्रेजी में ज़ीरो कहा जाता है का जन्म भारत में हुआ था। शून्य दरअसल क्या है? शून्य के आकार पर गौर करें। गोलाकार मण्डल की आकृति यूँ ही नहीं है। उसके खोखलेपन, पोलेपन पर गौर करें। एक सरल रेखा के दोनों छोर एक निर्दिष्ट बिन्दु की ओर बढ़ाते जाइए और फिर उन्हें मिला दीजिए। यह बन गया शून्य। यह शून्य बना है संस्कृत की ‘शू’ धातु से जिसमें फूलने, फैलने, बढ़ने, चढ़ने, बढ़ोतरी, वृद्धि, उठान, उमड़न और स्फीति का भाव है। स्पष्ट है कि शू से बने शून्य में बाद में चाहे निर्वात, सूनापन, अर्थहीन, खोखला जैसे भाव उसकी आकृति की वजह से समाविष्ट हुए हों, मगर दाशमिक प्रणाली को जन्म देने वालों की निगाह में शून्य में दरअसल फूलने-फैलने, समृद्धि का आशय ही प्रमुख था। इसीलिए यह शून्य जिस भी अंक के साथ जुड़ जाता है, उसकी क्षमता को दस गुना बढ़ा देता है, अर्थात अपने गुण के अनुसार उसे फुला देता है। जब इसके आगे से अंक या इकाई गायब हो जाती है, तब यह सचमुच खोखलापन, निर्वात, शून्यता का बोध कराता है। शून्य के आकार में भी यही सारी विशेषताएँ समाहित हैं। गोलाकार, वलयाकार जिसमें लगातार विस्तार का, फैलने का, वृद्धि का बोध होता है। दरअसल शून्य ही समृद्धि और विस्तार का प्रतीक है।

https://youtu.be/D9NUxnrj-Es

यह महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के बचपन की घटना है। एक बार गणित की कक्षा में अध्यापक ने ब्लैकबोर्ड पर तीन केले बनाए और पूछा- यदि हमारे पास तीन केले हों और तीन विद्यार्थी, तो प्रत्येक विद्यार्थी के हिस्से में कितने केले आएंगे? एक बालक ने तपाक से जवाब दिया- प्रत्येक विद्यार्थी को एक-एक केला मिलेगा। अध्यापक ने कहा-बिल्कुल ठीक। अभी भाग देने की क्रिया को अध्यापक आगे समझाने ही जा रहे थे कि रामानुजन ने खड़े होकर सवाल किया-सर! यदि किसी भी बालक को कोई केला न बांटा जाए, तो क्या तब भी प्रत्येक बालक को एक केला मिलेगा? यह सुनते ही सारे के सारे विद्यार्थी हो-हो करके हंस पड़े।
उनमें से एक ने कहा-यह क्या मूर्खतापूर्ण सवाल है। इस बात पर अध्यापक ने मेज थपथपाई और बोले-इसमें हंसने की कोई बात नहीं है। मैं आपको बताऊंगा कि यह बालक क्या पूछना चाहता है। बच्चे शांत हो गए। वे कभी आश्चर्य से शिक्षक को देखते तो कभी रामानुजन को। अध्यापक ने कहा – यह बालक यह जानना चाहता है कि यदि शून्य को शून्य से विभाजित किया जाए, तो परिणाम क्या एक होगा?
आगे समझाते हुए अध्यापक ने बताया कि इसका उत्तर शून्य ही होगा। उन्होंने यह भी बताया कि यह गणित का एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल था तथा अनेक गणितज्ञों का विचार था कि शून्य को शून्य से विभाजित करने पर उत्तर शून्य होगा, जबकि अन्य कई लोगों का विचार था कि उत्तर एक होगा। अंत में इस समस्या का निराकरण भारतीय वैज्ञानिक भास्कर ने किया। उन्होंने सिद्ध किया कि शून्य को शून्य से विभाजित करने पर परिणाम शून्य ही होगा न कि एक।

English Medium School

अभिभावक चाहे महल का हो या स्लम काहर एक की पहली पसंद इंग्लिश मीडियम स्कूल हो गयी है। परिणाम आज गली-गली में इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल रहे है। पर सवाल यह पैदा होता है कि इस इंग्लिश मीडियम शिक्षा व्यवस्था में बच्चे कुछ सीख भी पाते है ? साथियों ! शिक्षा का अर्थ मनुष्य की चेतना को जागृत कर ज्ञान को व्यवहारिक बनाना है। वही हमारे बच्चे बीना व्यवहारिक अर्थ समझें रटते चले जाते है। वे रट-रट कर केजी से पीजी तक पास कर जाते है। पर मौलिक ज्ञान सृजन नहीं कर पाते। हमारे बच्चों ने ‘रटनेको ही ‘ज्ञान’ समझ लिया है और ‘अंग्रेजी बोलने की योग्यता को (इंग्लिश स्पीकिंग)’ को ही ‘शिक्षा’ । विद्यार्थी वर्ग आज सिर्फ उतना पढ़ता है जितना की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए काफी है। डिग्री ही ज्ञान है इसका परिणाम यह निकला है कि डिग्री प्राप्त करों-  चाहे रटोंनकल करों या खरीद लो। हमारे बच्चे स्कूल में रटे ज्ञान का स्कूल के बाहर के बाहर की दूनियां के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते . 

एम के पाण्डेय निल्को

रुद्रपुर – भगवान रुद्र की दूसरी काशी – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

भारत में वैसे तो अनेकानेक मंदिर शिवालय हैं परन्तु उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर में 11वीं सदी में अष्टकोण में बने प्रसिद्ध दुग्धेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी अनूठी विशेषता के लिए विश्वविख्यात है। यहां शिवलिंग जमीन से अपने आप निकला था। इस शिवलिंग का आधार कहां तक है इसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग की लम्बाई पाताल तक है। देवरिया जनपद मुख्यालय से लगभग बीस किमी दूर स्थित रुद्रपुर नगरी को काशी का दर्जा प्राप्त है। यहां भगवान शिव, दुग्धेश्वरनाथ के नाम से जाने जाते है। इस मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त ईट बौद्ध कालीन है। इस क्षेत्र की जनता जनार्दन इनको बाबा दुधनाथ के नाम से भी पुकारती है । उप ज्योतिर्लिंगों की स्थापना के संबंध में पद्म पुराण की निम्न पंक्तियां उल्लिखित हैं- 
खड़ग धारद दक्षिण तस्तीर्ण दुग्धेश्वरमिति ख्याति सर्वपाप:,
 प्राणाशकम यत्र स्नान च दानं च जप: 
पूजा तपस्या सर्वे मक्षयंता यान्ति दुग्धतीर्थ प्रभावत:। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल दधीचि व गर्ग आदि ऋषि-मुनियों की तपस्थली भी है। इतिहास की माने तो रुद्रपुर में रुद्रसेन नामक राजा का किला था और इसी कारण यह रुद्रपुर कहलाया पर मेरे विचार से भगवान रुद्र (शिव) की पुरी (नगरी) होने के कारण इसका नाम रुद्रपुर पड़ा होगा । महाशिवरात्रि के दिन एवं श्रावण मास में यहां भारी भीड़ होती है। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव, ॐ नम: शिवाय और बाबा भोलेनाथ की जयकारों से गुंजायमान रहता है। जनश्रुतियों के अनुसार, मंदिर बनने से पहले यहां घना जंगल था। बताते है कि उस समय दिन में गाय, भैंस चराने के लिए कुछ लोग आया करते थे। आज जहां शिवलिंग है, वहां नित्य प्रतिदिन एक गाय प्राय: आकर खड़ी हो जाती थी तथा उसके थन से अपने आप वहां दूध गिरना शुरू हो जाता था। इस बात की जानकारी धीरे-धीरे तत्कालीन रुद्रपुर नरेश हरी सिंह के कानों तक पहुंची तो उन्होंने वहां खुदाई करवाई। खुदाई में शिवलिंग निकला। राजा ने सोचा कि इस घने जंगल से शिवलिंग को निकाल कर अपने महल के आस-पास मंदिर बनवाकर इसकी स्थापना की जाए।  कहा जाता है कि जैसे-जैसे मजदूर शिवलिंग निकालने के लिए खुदाई करते जाते वैसे-वैसे जमीन में धंसता चला जाता। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। शिवलिंग तो नहीं निकला वहां एक कुआं जरूर बन गया। सोमनाथ के अतिरिक्त सामान्य धरातल से नीचे का शिवलिंग भारत में संभवत: अन्यत्र कहीं नहीं है। बाद में राजा को भगवान शंकर ने स्वप्न में वहीं पर मंदिर स्थापना करने का आदेश दिया। भगवान के आदेश के बाद राजा ने वहां धूमधाम से काशी के विद्धान पंडितों को बुलवाकर भगवान शंकर के इस लिंग की विधिवत स्थापना करवाई। जब तक वह जीवित रहे, भगवान दुग्धेश्वरनाथ की पूजा-अर्चना और श्रावण मास में मेला आयोजित करवाते थे। मंदिर में आज भी भक्तों को लिंग स्पर्श के लिए 14 सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। यहां भगवान का लिंग सदैव भक्तों के दूध और जल के चढ़ावे में डूबा रहता है। कहा जाता है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी जब भारत की यात्रा की थी तब वह देवरिया के रुद्रपुर में भी आए थे। उस समय मंदिर की विशालता एवं धार्मिक महत्व को देखते हुए उन्होंने चीनी भाषा में मंदिर परिसर में ही एक स्थान पर दीवार पर कुछ चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित थी, जो आज भी अस्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है। 

एम के पाण्डेय निल्को

 


सुकुमा नक्सली हमले मे 26 जवानों की शहादत पर आक्रोश जताती मेरी रचना – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

(सुकुमा नक्सली हमले मे 26 सीआरपीएफ़ जवानों की शहादत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से आक्रोश जताती मेरी रचना – एम के पाण्डेय निल्को’)


बहुत सुन चुके जुमले
कहो कैसी लाचारी है ?
हर घटना पर निंदा मंत्री
अब कुछ करने की बारी है
खोल दो हाथ तो
नहीं मार पाएगा कोई पर परिंदा
आप करते रहे केंद्र मे रहकर
बस कठोर से कठोर निंदा
मोदी जी क्या आप बरता सकते है
आखिर 26 शेरो के हत्यारे
क्यो है अब तक ज़िंदा ?
आप कहते है हम सेना का
बड़ा सम्मान रखते है
पर विपदा की इस घड़ी में
हम अलग अरमान रखते है
सत्ता के आगे आप सभी
नशे मे चूर लगते है
पता नहीं किस बात पर
बड़े मजबूर लगते है
लड़ोगे क्या तुम पाकिस्तान और आतंकवाद से
मार दिया घर मे ही तुम्हारे इस नकस्लवाद ने
शहादत शहीदो की निल्को
सियासी खेल लगती है
सारी रक्षा नीतिया
मुझे फेल लगती है
रंगा है खून से आज
फिर अपने माटी को
साप सूंघ गया है क्या
56 इंच के छती को
एम के पाण्डेय निल्को


(कृपया रचनाकार का नाम न हटाए और मूल रूप से ही शेयर करे ।)




यात्रा वर्णन द्वारा एम के पाण्डेय निल्को

घड़ी में करीब सुबह के सात बज रहे थे, डैडी को सिद्धेश उर्फ़ यश के स्कूल में मीटिंग में शामिल होने जाना था तभी उनकी नज़र बालकनी से रोड पर खड़ी अपनी कार पर गई । उन्होंने कहा की, मधुलेश कार बहुत गन्दी हो गई है इतना सुनते ही मधुलेश बाल्टी और मग उठाये और छत से नीचे आ गए । पानी से भरी बाल्टी पूरे मोहल्ले की नज़र में थी कारण एक मात्र की मोहल्ले में कई दिन से पानी कम आ रहा था और मैं इस समय अपनी कार साफ कर रहा था । तभी मंदिर से गुड्डू चाचा लौट रहे थे। अभिवादन हुआ फिर उन्होंने मथुरा जाने का प्रोग्राम बनाया , बोला की कल एकादशी है चलते है गोवर्धन पर्वत की प्रक्रिमा करने । ऑफिस जाना है , बहुत काम है ये दलीले पेश हुई किन्तु उस मुरली वाले के आगे किसकी चलती है । प्रोग्राम फिक्स हो गया मैंने बोला की मैं ऑफिस से 1 बजे आ जाऊँगा। 3 बजे करीब ट्रेन थी बिना आरक्षण की यात्रा करनी थी , मन में संदेह था की सीट मिलेगी या नहीं किन्तु दिल ने कहा देखा जायेगा । ऑफिस में जल्दी जल्दी काम निपटा रहा था तब तक गुड्डू चाचा का फोन बजा बोले की 1 बजे घर आ जाना , स्टेशन भी टाइम पर जाना है । मैंने भी उत्साह पूर्वक बोला की ठीक है ।
एक बज कर 10 मिनट पर मैं अपने घर पर था । सामान पैक और चलने को मन बेकरार । 2 बजते है गुड्डू चाचा शुभम के साथ आये और बोले की नीलेश नहीं चलेगा क्या? नीलेश स्कूल से 2 बजकर 20 मिनट तक घर आता है , इंतज़ार करते तब तक लेट हो जाती । हम तीन लोग घर से निकल पड़े । पेलटफ़ॉर्म पर ट्रेन का इंतज़ार तभी फोन की घंटी बजती है और डैडी कहते है की ट्रेन कब तक आएगी समय है तो बताओ नीलेश भी जायेगा । मैंने भी कहा की अभी लगभग एक घंटा है । थोड़ी ही देर में नीलेश को लेकर डैडी स्टेशन आ गए , मैं उसे लेने के लिए पेलटफ़ॉर्म से बाहर आया और उसे उस जगह पर ले आया जहा गुड्डू चाचा और शुभम खड़े थे ।
जयपुर जंक्शन का पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 , खचाखच लोगो की भीड़ ट्रेन में और पेलटफ़ॉर्म पर , सब लोग एक उम्मीद से आती हुई जयपुर इलाहाबाद एक्सप्रेस को देख रहे है , तभी कान के पास चाय वाला बोलता है – चाय चाय गरमा गर्म चाय । पारा वैसे ही गर्म हो रहा है, जयपुर का तापमान वैसे ही 42 है ऊपर से लोगो भी भीड़ उसमे चार चाँद लगा रही है । जैसे ही ट्रेन पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 पर रूकती है सवारिया उतरने और चढ़ने के लिए कोशिश कर रहे है वही पर मैं भी गेट पर हाथ लगा कर नीलेश और शुभम को आगे आने के लिए बुला रहा हूँ । दोनों बालक ट्रेन में बड़ी ही मुश्किल से चढ़ते है और पहले ही सीट पर कब्ज़ा।
चार लोग एक सीट जायज है किन्तु यदि डिब्बा अनारक्षित हो तो ये ठीक नहीं । इसी नियम को पालन करते हुए एक और महिला जो की एक 3 वर्षीय बच्ची के साथ अकेले यात्रा कर रही थी उसको जगह दी माफ़ी चाहूँगा जगह दी नहीं , जगह बनाई । बैठने के लगभग 40 मिनट बाद ट्रेन चली और 5 मिनट में ही दूसरा स्टेशन आ गया जिसका नाम है गांधी नगर जयपुर । भीड़ अपने आप में ही सब कुछ बया कर रही थी फिर भी जनता आज रिकॉर्ड तोड़ने के मूड में दिख रही थी । जैसे तैसे ट्रेन चली , कुछ खड़े, कुछ अड़े और कुछ है बैठे । छोटे छोटे कई स्टेशन निकल रहे थे , ट्रेन अपनी अधितम रफ़्तार में थी । गरमा गर्म हवा मुझे और भी गर्म कर रहा था , मन तो कविता लिखने का था किन्तु शांत वातावरण मिला ही नहीं और कविता गिर गई ठन्डे बस्ते में । दौसा स्टेशन आया , प्यास बढ़ रही थी पर पेलटफ़ॉर्म दूसरी तरफ आया कोई बेचने वाला भी नहीं आया , मन को मनाया की थोड़ी देर रुके  और वो मान भी गया , ट्रेन चल दी भीड़ और बढ़ गई।
मैं  बैठ के बोर हो रहा था तभी दिमाग की बत्ती जली और जेब से अपना स्मार्ट फोन निकाला और बैठे बैठे ही लिखने लगा यात्रा वर्णन । ट्रेन बांदीकुई पहुँच रही है कुछ लोग उतर रहे है कुछ उलटी साइड से चढ़ रहे है । पानी आया , सभी अपनी अपनी प्यास बुझाए । एक छोटा बालक पानी की ज़िद करने लगा किन्तु उसकी दादी के पास पानी नहीं था उस समय । बच्चा कई बार पानी के लिए बोला , रोने की शक्ल भी बनाई । जब ये बात गुड्डू चाचा सुने तो उसे अपनी बोतल दिलवाई जिसमे थोडा पानी बचा था बच्चा आव देखा न ताव मुँह लगाया और पानी ……..गले के नीचे जैसे ही पानी उतरी उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी । ट्रेन में सब लोग बैठने और बैठाने की बात कर रहे है किन्तु ये ठोस कदम उठाये कौन ?
एक सज्जन ऊपर की सीट पर बैठने की ज़िद करने लगे । लाख मना करने पर भी नहीं माने कोशिश की ऊपर चढ़ने की , सफल भी हुए पर एक दो मिनट के लिए ही । पैर फिसल रहा था उनका पर मेरा दिल धड़क रहा था की कही वो मेरे ऊपर न गिर जाये । उनके दिल तक मेरी बात पहुची और वो पूरे 5 मिनट में  नीचे उतर आये । ट्रेन अलवर पहुँच रही थी , मुझे अपना इतिहास याद आ रहा था , आखिर राजस्थान की शुरुआत मैंने यही से की थी । बहुत ही मनोरम और ऐतिहासिक जगह है अलग । महाभारत के कई किस्से यहाँ की माटी में मिलते है । हसन खा मेवात नगर , जैन साहब का मकान, कैलाश पब्लिक स्कूल सब कुछ याद आ रहा था , मन रोम रोम खिल रहा था । तभी अचानक से नज़र दूसरी सीट पर बैठे दो आदमी पर पड़ी उम्र से वो नवयुवक लग रहे थे किन्तु बात वो धर्म की कहानियो पर कह रहे थे , कुछ पुरानी कहानी सुना रहे थे । बगल वाली सीट पर कुछ महिलाये भजन कीर्तन कर रही थी वो भी इस भीड़ में । उनकी इस ईश्वरी प्रेम को मैं प्रणाम करता हूँ जिस पर भीड़ का कोई भी असर नहीं पड़ रहा था ।
एम के पाण्डेय निल्को

हमारे जैसा कोई दूसरा इस दुनिया है ही नहीं।

जब हमारे जैसा कोई दूसरा इस दुनिया है ही नहीं। फिर किसी से क्या तुलना। अपना आलस्य अपनी गप्पे अपनी बाते अपनी हार अपनी असफलता सब कुछ अपना है। एक दम यूनिक !! एकदम अलग !! यानि न कोई अपने से आगे और न अपने किसी से पीछे। सब के रास्ते अलग अलग है। सबकी मंजिले अलग अलग है। जो कुछ हमारे पास है वो किसी दूसरे के पास नहीं। लिहाजा….जो भी हमारे पास है। वह सिर्फ हमारे ही पास है। जो बेशकीमती है। शायद हम भी। और आप भी और ये दुनिया भी। ये ग़लत है की दुनिया बड़ी होती है, सच तो ये है की दुनिया से बड़ी दुनिया में रहने वाले मनुष्य का अपना मन होता है । सोचने पर किसी का जोर नही !! इसीलिए आज जी भर के सोचा है !! बस यंही कुछ लोचा है !!

मुक्तक – जो भी तेरे पास आता है ।

जो भी तेरे पास आता है
वो तेरा ही हो जाता है
तेरी उलझी सुलझी ये जुल्फ़े
मद मस्त होकर लहराता है

एम के पाण्डेय निल्को

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