Tag Archives: एक नई चीज

एक बूँद -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’





ज्यों निकल कर बादलों की गोद से,
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी?

देव मेरे भाग्य में क्या है बदा,
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में?
या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूँगी या कमल के फूल में?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा,
वह समुन्दर ओर आई अनमनी,
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला,
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी।

लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते,
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर,
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें,
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर

देश को नया प्रधानमंत्री चाहिए

आज इस दौर मे
आजादी के मायने बादल गए
नेता-नागल और लोग बादल गए
नीति बदली रीति बदली
और बदला नजरिया
गाँव तो गाँव और
नगर भी हो गया सहरिया
जब इस भीड़ मे मैं गया तो
 लोगो के तरीके भी बादल गए
कुछ एसा बदला की लोग हैरान है
बात बात पर परेशान है
और प्रकृति ने खूब भी साथ दिया
बदलाव का नया रूप दिया
जब सब कुछ बदल ही रहा है
तो यह सरकार भी बदलनी चाहिए
बहुत पी चुके यह धीमा ज़हर
अब आजादी की सांस चाहिए
गए महात्मा पर रीति बना गए
गांधी ही कांग्रे की नीति बना गए
अब सोचता हूँ कुछ बदलाव चाहिए
केन्द्र मे दूसरी सरकार चाहिए
आजादी की सांस चाहिए
बेघर को मकान  चाहिए
भूखे को रोटी चाहिए
देश को नया प्रधानमंत्री चाहिए
मुझको आपका कमेंट चाहिए
ढेर सारा प्यार चाहिए
और लाइक तो चाहिए ही चाहिए……
*******************

                 मधुलेश पाण्डेय  “निल्को”


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आजादी के नए संघर्ष का वक्त


हमने आजादी जनता के लिए प्राप्त की थी और नारा दिया था कि हम ऐसी व्यवस्था अपनाएंगे जो जनता की जनता द्वारा और जनता के लिए होगी, लेकिन आजादी के 65 साल बीतने के बाद अनुभव यह हो रहा हे कि हमारी सत्ता अंग्रेजी सत्ता के समान ही कुछ निहित स्वार्थी लोगों के हित चिंतन में सिमटकर रह गई है। क्या आजादी का संघर्ष इसीलिए किया गया था? युवाओं ने इसीलिए बलिदान दिया था कि अंग्रेजों के स्थान पर कुछ ‘स्वदेशी’ लोग सत्ता का उपयोग करें। सत्ता का हस्तानांतरण हुआ है, लेकिन उसके आचरण में बदलाव नहीं आया है। जब भी 15 अगस्त नजदीक आता है मुझे ये पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं-आज हथकड़ी टूट गई है, नीच गुलामी छूट गई है, उठो देश कल्याण करो अब, नवयुग का निर्माण करो सब।

क्या सचमुच हथकड़ी टूट गई है और गुलामी से छुटकारा मिल गया है? हमारी शक्ति किसके कल्याण में लग रही है और कौन से नवयुग का हम निर्माण कर रहे हैं। यदि कुछ चमचमाती सड़कें, सड़कों पर पहले की अपेक्षा सौ गुना अधिक दौड़ रहे वाहन, शहरों का निरंतर विस्तार, तकनीकी उपकरणों की भरमार और कर्ज के सहारे निर्वाह को नवयुग का कल्याण माना जाए तो हम सचमुच 15 अगस्त 1947 के बाद बहुत आगे बढ़ गए हैं, लेकिन जिन जीवन मूल्यों के लिए हमने आजादी की जंग लड़ी, क्या उस दिशा में कोई प्रगति हुई है? देश में बढ़ते एकाधिकारवादी आचरण ने सत्ता को इतना भ्रष्ट और निरंकुश कर दिया है कि उसकी चपेट में आकर सारा अवाम कराह रहा है। महात्मा गांधी का मानना था कि गांवों का विकास ही उत्थान का प्रतीक होगा। गांवों में जीवन मूल्य के बारे में अभी भी संवेदनशीलता है। हमने पंचायती राज व्यवस्था को तो अपनाया है, लेकिन गांवों को उजड़ते जाने से नहीं रोक पा रहे हैं। कृषि प्रधान देश में खेती करना सबसे हीन समझा जाने लगा है। शिक्षा के लिए अनेक आधुनिक ज्ञान वाले संस्थान जरूर स्थापित हो गए हैं, लेकिन वहां से ‘शिक्षित’ होकर निकलने वालों की पहचान किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचा वेतन पाने के आधार पर हो रही है। स्वदेशी, स्वाभिमान और स्वावलंबन की भावना तिरोहित होती जा रही है। कर्ज जिसे आजकल ‘एड’ का नाम दे दिया गया है, एकमेव साधन बनकर रह गया है, जिसने हमें फिर गुलामी की तरफ धकेल दिया है। राजनीतिक आजादी तो मिली, लेकिन आत्मनिर्भरता के लिए प्रयास न होने के कारण हम आर्थिक रूप से गुलाम होते जा रहे हैं, जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में हुआ था। तब भी शासक तो स्वदेशी ही थे, लेकिन उनको चलना ईस्ट इंडिया कंपनी के अनुसार पड़ता था। आज हम भी अपने आर्थिक क्षेत्र को विश्व बैंक या विश्व मुद्रा कोष के पास गिरवी रख चुके हैं। जिन वस्तुओं की हमें जरूरत भी नहीं है उनको आयात करने की विवशता से हम बंधते जा रहे हैं। हमारी सीमाएं असुरक्षित हैं। हम यह जानते हैं कि किसके द्वारा और किस-किस प्रकार से असुरक्षा पैदा की जा रही है, लेकिन हम कार्रवाई नहीं कर सकते, क्योंकि उसके लिए किसी की रजामंदी जरूरी है। हमारा ध्यान केवल सत्ताधारी बने रहने तक सीमित हो गया है। उसे पाने के लिए समाज में संविधान के उपबंधों के अनुसार समान नागरिकता की भावना पैदा करने के बजाय हम वैसा ही उपाय करते जा रहे हैं जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था। उससे भी उसमें बढ़कर हम जातियों, उपजातियों आदि की पहचान उभारने में लगे हुए हैं। लालबहादुर शास्त्री ने संकट से उबरने के लिए सोमवार को अन्न न खाने की जो अपील की उससे कोई बहुत बड़ी बचत नहीं होने वाली थी, लेकिन लोगों ने उनकी बात मानी थी। आज क्या यह संभव है?
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भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए ही होती हैं

भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए ही होती हैं इसलिए उन्हें छुपाना नहीं जाहिर करना चाहिए। बिना प्रयास करे हारने से कोशिश करके हारना बेहतर है क्योंकि खामोशी ज्यादा दर्द देती है…. एम के पाण्डेय “निल्को”


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मनमोहन सा फील करता हूँ

आज कहने को कुछ नहीं ..
इस लिए अपना मुहं सील करता हूँ ।
अगर काफी देर कुछ ना कहूँ तो .
मनमोहन सा फील करता हूँ”
 आज  कुछ विचार आप के लिए ……………….

यह भी नशा, वह भी नशा – प्रेमचंद

 होली के दिन राय साहब पण्डित घसीटेलाल की बारहदरी में भंग छन रही थी कि सहसा मालूम हुआ, जिलाधीश मिस्टर बुल आ रहे हैं। बुल साहब बहुत ही मिलनसार आदमी थे और अभी हाल ही में विलायत से आये थे। भारतीय रीति-नीति के जिज्ञासु थे, बहुधा मेले-ठेलों में जाते थे। शायद इस विषय पर कोई बड़ी किताब लिख रहे थे। उनकी खबर पाते ही यहाँ बड़ी खलबली मच गयी। सब-के-सब नंग-धिड़ंग, मूसरचन्द बने भंग छान रहे थे। कौन जानता था कि इस वक्त साहब आएँगे। फुर-से भागे, कोई ऊपर जा छिपा, कोई घर में भागा, पर बिचारे राय साहब जहाँ के तहाँ निश्चल बैठे रह गये। आधा घण्टे में तो आप काँखकर उठते थे और घण्टे भर में एक कदम रखते थे, इस भगदड़ में कैसे भागते। जब देखा कि अब प्राण बचने का कोई उपाय नहीं है, तो ऐसा मुँह बना लिया मानो वह जान बूझकर इस स्वदेशी ठाट से साहब का स्वागत करने को बैठे हैं। साहब ने बरामदे में आते ही कहा-हलो राय साहब, आज तो आपका होली है?
राय साहब ने हाथ बाँधकर कहा-हाँ सरकार, होली है।
बुल-खूब लाल रंग खेलता है?
राय साहब-हाँ सरकार, आज के दिन की यही बहार है।
साहब ने पिचकारी उठा ली। सामने मटकों में गुलाल रखा हुआ था। बुल ने पिचकारी भरकर पण्डितजी के मुँह पर छोड़ दी तो पण्डितजी नहीं उठे। धन्य भाग! कैसे यह सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। वाह रे हाकिम! इसे प्रजावात्सल्य कहते हैं। आह! इस वक्त सेठ जोखनराम होते तो दिखा देता कि यहाँ जिला में अफसर इतनी कृपा करते हैं। बताएँ आकर कि उन पर किसी गोरे ने भी पिचकारी छोड़ी है, जिलाधीश का कहना ही क्या। यह पूर्व-तपस्या का फल है, और कुछ नहीं। कोई पहले एक सहस्र वर्ष तपस्या करे, तब यह परम पद पा सकता है। हाथ जोडक़र बोले-धर्मावतार, आज जीवन सफल हो गया। जब सरकार ने होली खेली है तो मुझे भी हुक्म मिले कि अपने हृदय की अभिलाषा पूरी कर लूँ।
यह कहकर राय साहब ने गुलाल का एक टीका साहब के माथे पर लगा दिया।
बुल-इस बड़े बरतन में क्या रखा है, राय साहब?
राय-सरकार, यह भंग है। बहुत विधिपूर्वक बनाई गयी है हुजूर!
बुल-इसके पीने से क्या होगा?
राय-हुजूर की आँखें खुल जाएँगी। बड़ी विलक्षण वस्तु है सरकार।
बुल-हम भी पीएगा।
राय साहब को जान पड़ा मानो स्वर्ग के द्वार खुल गये हैं और वह पुष्पक विमान पर बैठे ऊपर उड़े चले जा रहे हैं। ग्लास तो साहब को देना उचित न था, पर कुल्हड़ में देते संकोच होता था। आखिर बहुत ऊँच-नीच सोचकर ग्लास में भंग उँड़ेली और साहब को दी। साहब पी गये। मारे सुगन्ध के चित्त प्रसन्न हो गया।
दूसरे दिन राय साहब इस मुलाकात का जवाब देने चले। प्रात:काल ज्योतिषी से मुहूर्त पूछा। पहर रात गये साइत बनती थी, अतएव दिन-भर खूब तैयारियाँ कीं। ठीक समय पर चले। साहब उस समय भोजन कर रहे थे। खबर पाते ही सलाम दिया। राय साहब अन्दर गये तो शराब की दुर्गन्ध से नाक फटने लगी। बेचारे अंग्रेजी दवा न पीते थे, अपनी उम्र में शराब कभी न छुई थी। जी में आया कि नाक बन्द कर लें, मगर डरे कि साहब बुरा न मान जाएँ। जी मचला रहा था, पर साँस रोके बैठे हुए थे। साहब ने एक चुस्की ली और ग्लास मेज पर रखते हुए बोले-राय साहब हम कल आप का बंग पी गया, आज आपको हमारा बंग पीना पड़ेगा। आपका बंग बहुत अच्छा था। हम बहुत-सा खाना खा गया।
राय-हुजूर, हम लोग मदिरा हाथ से भी नहीं छूते। हमारे शास्त्रों में इसको छूना पाप कहा गया है।
बुल-(हँसकर) नहीं, नहीं, आपको पीना पड़ेगा राय साहब! पाप-पुन कुछ नहीं है। यह हमारा बंग है, वह आपका बंग है। कोई फरक नहीं है। उससे भी नशा होता है, इससे भी नशा होता है, फिर फरक कैसा?
राय-नहीं, धर्मावतार, मदिरा को हमारे यहाँ वर्जित किया गया है।
बुल-ऐसा कभी होने नहीं सकता। शास्त्र मना करेगा तो इसको भी मना करेगा, उसको भी मना करेगा। अफीम को भी मना करेगा। आप इसको पिएँ, डरें नहीं। बहुत अच्छा है।
यह कहते हुए साहब ने एक ग्लास में शराब उँड़ेलकर राय साहब के मुँह से लगा ही तो दी। राय साहब ने मुँह फेर लिया और आँखें बन्द करके दोनों हाथों से साहब का हाथ हटाने लगे। साहब की समझ में यह रहस्य न आता था। वह यही समझ रहे थे कि यह डर के मारे नहीं पी रहे हैं। अपने मजबूत हाथों से राय साहब की गरदन पकड़ी और ग्लास मुँह की तरफ बढ़ाया। राय साहब को अब क्रोध आ गया। साहब खातिर से सब कुछ कर सकते थे; पर धर्म नहीं छोड़ सकते थे। जरा कठोर स्वर में बोले-हुजूर, हम वैष्णव हैं। हम इसे छूना भी पाप समझते हैं।
राय साहब इसके आगे और कुछ न कह सके। मारे आवेश में कण्ठावरोध हो गया। एक क्षण बाद जरा स्वर को संयत करके फिर बोले-हुजूर, भंग पवित्र वस्तु है। ऋषि, मुनि, साधु, महात्मा, देवी, देवता सब इसका सेवन करते हैं। सरकार, हमारे यहाँ इसकी बड़ी महिमा लिखी है। कौन ऐसा पण्डित है, जो बूटी न छानता हो। लेकिन मदिरा का तो सरकार, हम नाम लेना भी पाप समझते हैं।
बुल ने ग्लास हटा लिया और कुरसी पर बैठकर बोला-तुम पागल का माफिक बात करता है। धरम का किताब बंग और शराब दोनों को बुरा कहता है। तुम उसको ठीक नहीं समझता। नशा को इसलिए सारा दुनिया बुरा कहता है कि इससे आदमी का अकल खत्म हो जाता है। तो बंग पीने से पण्डित और देवता लोग का अकल कैसे खप्त नहीं होगा, यह हम नहीं समझ सकता। तुम्हारा पण्डित लोग बंग पीकर राक्षस क्यों नहीं होता! हम समझता है कि तुम्हारा पण्डित लोग बंग पीकर खप्त हो गया है, तभी तो वह कहता है, यह अछूत है, वह नापाक है, रोटी नहीं खाएगा, मिठाई खाएगा। हम छू लें तो तुम पानी नहीं पीएगा। यह सब खप्त लोगों का बात। अच्छा सलाम!
राय साहब की जान-में-जान आयी। गिरते-पड़ते बरामदे में आये, गाड़ी पर बैठे और घर की राह ली।

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एक तिनका

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ।
एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।।

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन सा।
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे।
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया।
तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिये।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा।
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।। 

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

गाँव ! प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली!

नहीं समझ में आ रहा है बात शुरू कहाँ से करूँ? शीर्षक देने का भी मन नहीं हो रहा। मेरे गाँव का विडियो आप के लिए त्रिपुरेन्द्र के कैमरे से 


गाँव !

प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली!

जी हाँ,जिस जगह पर प्रकृति मनुष्य को सीने से लगाती है,वही गाँव है. इसीलिए गाँव जीवनदायिनी है. भोजन के लिए अनाज से लेकर फूल,फल और औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ भी गाँव से ही हमें प्राप्त होते हैं. गाँव किसी भी देश के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान करते हैं.

पिछले कुछ दिनों से मुझे मेरा घर बहुत याद आ रहा है 

मेरे गाँव में  एक  घर है आँगन, ओसार, दालान और छोटे-छोटे कमरों वाले उस बड़े से घर से धुँए, सौंधी मिट्टी, गुड़(राब) और दादी के रखे- उठे हुए सिरके की मिली-जुली गंध आती है   घर के बीच के बड़े से दुआर में कई छोटे-बड़े पेड़ों के साथ मीठे फल और ठंडी छाँव वाला एक श्री फल  का पेड़ है  जिसके बारे में अम्मा बताती थीं कि जब वो नयी-नयी ब्याह के आयी थीं, तो सावन में उस पर झूला पड़ता था. गाँव की बहुएँ और लड़कियाँ झूला झूलते हुए कजरी गाती थीं. हमने न कजरी सुना और न झूला झूले, पर आम के मीठे फल खाये और उसकी छाया का आनंद उठाया. तब हर देसी आम के स्वाद के आधार पर अलग-अलग नाम हुआ करते थे. उस पेड़ के दो नाम थे “निमिअव ” “तनकिहावा “मल्दाहावा ” और “मिठउआ.”………. जहा मधुलेश, त्रिपुरेन्द्र, गजेन्द्र, योगेश , अनु , अभिषेक खूब खेला है वो भी ऐसे- २ खेल जिसका नाम सुनने पर हसी आती है  जैसे हाड़ी मुवावान , गाय पकड़ आदि ……….कभी फिर से एक नए अंदाज में अपना बचपन लिखुगा  तब तक के लिए ………. प्रणाम !

हमारे गाँव के सारे बुज़ुर्ग कहते हैं

बड़े शहरों में बहुत छोटे लोग रहते हैं।

गाँव से शहर में आए तो ये मालूम हुआ

घर नहीं दिल भी यहाँ पत्थरों के होते हैं।

कोशिश तो की बहुत मगर दिल तक नहीं पहुँचे

वो शहर के थे हाथ मिलाकर चले गए।

किसके दिल में है क्या अंदाज़ा नहीं मिलता है

शहर-ए-दीवार का दरवाज़ा नहीं मिलता है।

मर के वो अपने खून से तहरीर लिख गया

इक अजनबी को शहर में पानी नहीं मिला।

फूलों की न उम्मीद करो आके शहर में

घर में यहाँ तुलसी की जगह नागफनी है।

होटल का ताज़ा खाना भी स्वाद नहीं दे पाता है

माँ के हाथ की बासी रोटी मक्खन जैसी लगती है।

होठों पर मुस्कान समेटे दिल में पैनी आरी है

बाहर से भोले-भाले हैं भीतर से होशियारी है।

भूखे प्यासे पूछ रहे हैं रो-रो कर राजधानी से

कब तक हम लाचार रहेंगे आख़िर रोटी पानी से।

जब तक पैसा था बस्ती के सबके सब घर अपने

थे

जब हाथों को फैलाया सबके दरवाज़े बंद मिले।

मशरूफ़ हैं सब, दौरे-तरक्की के नाम पर

कोई भी मेरे शहर में खाली नहीं मिलता।



सौजन्य- मधुलेश पाण्डेय “निल्को” 

पूर्वांचल/गोरखपुर ( Gorakhpur)

उत्तर प्रदेश  के पूर्वांचल में गोरखपुर, बाबा गोरखनाथ के नाम से सुविख्यात अनेक पुरातात्विक, अध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों को समेटे हुए है। 
मुंशी प्रेमचन्द की कर्मस्थली व फिराक गोरखपुरी की जन्मस्थली के रुप मे गोरखपुर, पूर्वांचल के गौरव का प्रतीक है। 
तीर्थाकर महावीर, करुणावतार गौतम बुद्ध, संत कवि कबीरदास एवं गुरु गोरक्षनाथ ने जनपद के गौरव को राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्थापित किया । 
अमर शहीद पं0 राम प्रसाद बिस्मिल, बन्धु सिंह व चौरीचौरा आन्दोलन के शहीदों की शहादत स्थली गोरखपुर रही है । 
हस्तकला ‘टैराकोटा’ के लिए प्रसिद्ध व आधुनिक गोरखपुर का वर्तमान स्वरुप, मूलभूत सुविधा सम्पन्न, पर्यटकों को आकर्षित करता है। विगत वर्षों से गोरखपुर जनपद विकास के पथ पर अग्रसर है ।

Origin Of Name
The district Gorakhpur takes its name and fame from renowned, ascetic ‘Gorakshnath‘, who was an eminent profounder saint of ‘Nath Sampradaya’. A famous shrine ‘Gorakhnath’ was built in his honour on the same spot where he practised austerities.
History
The ancient Gorakhpur, in addition to modern, comprised the districts of Basti, Deoria, Azamgarh and parts of Nepal tarai. These region, which may be called as Gorakhpur Janpad, had been an important centre of Aryan culture and civilization.
Gorakhpur was a part of the famous kingdom of Koshal, one of sixteen mahajanpadas in 6th Century B.C. The earliest known monarch ruling over this region with his capital at Ayodhya was IKSVAKU, who founded the solar dynasty of Kshatriya. It produced a number of illustratious kings till the accession of Ram, who was the greatest ruler of this dynasty. Since then, it remained an integral part of the erstwhile empires of Maurya, Shunga, Kushana , Gupta and Harsha dynasties. According to tradition, the Tharu king, Mausen of Madan Singh (900-950 A.D.) ruled over Gorakhpur city and the adjoining area.
In medieval period, when the entire northern India lay prostrate before the Muslim ruler, Mohammad Ghori, the Gorakhpur region was not left out. For a longer period it remained under the sway of the muslim rulers, from Qutub-Ud-Din Aibak to Bahadur Shah.Tradition has it that Ala-ud-din Khilji (1296-1316) ordered the conversion of old shrine of Goraksha ( a popular deity ) of Gorakhpur into a mosque. However, on Akbar’s reorganisation of the empire, Gorakhpur gave its name to one of the five Sirkars comprising the province of Avadh.
Modern period was marked by the transfer of this region by the Nawab of Avadh to the East India Company in 1801. With this cession, Gorakhpur was raised to the status of a ‘DISTRICT. The first collector was Mr. Routledge. In 1829, Gorakhpur was made the headquarters of a Division of the same name, comprising the districts of Gorakhpur, Ghazipur and Azamgarh. Mr. R.M. Biad was first appointed Commissioner.
In 1865, new district Basti was carved out from Gorakhpur. The latter was further split up in 1946 to form new district Deoria. The third division of Gorakhpur led to the creation of district Mahrajganj in 1989.
Cultural & Historical Importance
Gorakhpur has its own cultural and historical importance.

* It belongs to the Great Lord Buddha, founderof Buddhism, who renounced his princely costumes at the confluence of rivers Rapti & Rohini  and proceeded further in the quest of truth in 600 BC.
* It is also associated with Lord Mahavir, 24th tirthankar, founder of Jainism.
* The next event of importance was the association of Gorakhpur with Gorakhnath. The date and place of his birth have not yet been finally settled, but it was  probably in the twelfth century that he flourished. His samadhi at Gorakhpur attracts a large number of pilgrims every year.
* The most significant event in the medieval period, however, was the coming of mystic poet and famous saint Kabir to Maghar. Born  in   Varanasi, his workplace  was Maghar  where most of his beautiful poems were composed. It was here that he gave the message to his countrymen to live in peace and religious harmony. The co-existence of ‘Samadhi’ and ‘Makbara’ at his burial place in Maghar attracts a large number of followers.
* Gorakhpur is also identified with the Gita Press, the world famous publisher of the Hindu religious  books. The  most  famous  publication  is   ‘KALYAN’ magazine. All 18 parts of Shree Bhagwat Gita is written on its marble-walls. Other  wall hangings and paintings reveal the events of life of Lord Ram and Krishna. The Gita Press is fore-front in dissemination of religious and spiritual consciousness across the country.
* Gorakhpur rose to great eminence due to the historic ‘CHAURI CHAURA’ incident of 4th Feb., 1922,  which was  a turning -point  in the  history of India’s  freedom  struggle.  Enraged  at the inhuman barbaric atrocities of  the police, the volunteers  burnt down the Chauri-Chaura Police Station,  killing  nineteen  policemen  at the  premises.  With  this  violence,  Mahatma   Gandhi withdrew the Non-Cooperation Movement launched in 1920.
* Another  important event took place at Doharia (In Sahjanwa Tehsil ) on 23rd August,1942. In response to the  famous Quit  India   Movement  of 1942,  a  meeting  was  held to register its protest against  the British  Government at Doharia  but the  latter responded with  unprovoked firing,  killing   nine and  injuring  hundreds. A Shaheed Smarak ,  in their memory, stands there which still today keeps their memory alive.
* The trial of Pt. Jawahar Lal Nehru  took place in this district in 1940. Here  he was sentenced to rigorous imprisonment of 4 years.
* Gorakhpur is also the Head Quarter of Air Force and known for Cobra Squadran.

Geographical Information

Location and Boundaries

The present district of Gorakhpur, 265 Kms east of capital Lucknow, on National Highway -28 lies between Latitude 26° 46´ N and Longitude 83° 22´ E, covers the geographical area of 3483.8 Sq. km. It is bounded by districts Mahrajganj in the north, Ambedkar Nagar, Azamgarh and Mau in the south, Kushinagar and Deoria in the east and Sant Kabirnagar in the west.

Gorakhpur is an important centre of Eastern U.P. It is the headquarter of North-Eastern Railway.

Air Force Station, and the main terminus for Kushinagar, Kapilvastu and Nepal.

Distance from main Cities (In Km.)

City

Distance

City

Distance

Lucknow

270

Patna

260

Varanasi

232

Guwahati

1256

Mumbai

1696

Cochin

2833

Agra

546

Ahmedabad

1738

Howrah

870

Nepal Border

90

Jammu

1260

Bangalore

2082

How to Reach

Rail : Gorakhpur is well connected with all major cities of India. It has computer- reservation facility. Details of Important trains connecting Gorakhpur is given below :

Train No.

Name of Train

From

To

Buddha Parikrama Express

Kalka

Kolkatta

2554

Vaishali Express

N.Delhi

Barauni

4674

Shaheed Express

Amritsar

Darbhanga

5208

Amrapali Express

Amritsar

Barauni

5087

Amarnath Express

Gorakhpur

Jammu Tawi

5651

Lohit Exp.

Guwahati

Jammu Tawi

5047

Purvanchal Exp.

Gorakhpur

Howrah

3020

Bagh Express

Kathgodam

Howrah

5012

Rapti Sagar Express

Gorakhpur

Cochin

5092

Gkp. Bangalore Exp.

Gorakhpur

Bangalore

5090

Gkp.-Secunderabad Exp.

Gorakhpur

Secunderabad

1016

Kushinagar Exp.

Gorakhpur

Kurla(Mumbai)

5046

Gkp.-Ahmedabad Exp.

Gorakhpur

Ahmedabad

9166

Sabarmati Express

Muzaffarpur

Ahmedabad

Roadways : Frequent road-transport is available for all major cities of U.P. The main Bus-stand is near railway station . Buses are available since early in the morning (3.00 Am) till late night, from Gorakhpur to Sanauli. Also, frequent service is available for other routes like Varanasi, Lucknow, Kanpur, Delhi etc. Link service for taking the Sharjah plane is also available, twice a week i.e. Sunday and Wednesday at 6.00 am.

Air : Air Force Station is 8 Km. from the railway station. On 8th March, 2003 it has been inaugurated as a commercial airport. Daily flights are available from Gorakhpur to Delhi and and Calcutta via Lucknow. The timings of the flight available at present are :

Flight From

Departure Time

Flight Destination

Reaching Time

Gorakhpur

10.00 am

Kolkata

11.20 am

Gorakhpur

16.50 pm

Delhi

19.00 pm

Delhi

7.20 am

Gorakhpur

9.30 am

Kolkata

3.00 pm

Gorakhpur

4.30 pm

Another airstrip of U.P. Civil Aviation is also available in Kasia, 55 km. from Gorakhpur in Kushinagar district. Nearest other commercialAirports are Lucknow and Varanasi. For other information regarding flights please see website.

EDUCATIONAL INSTITUTIONS

Education as an integral part of development of human resources has received an impetus with the establishment of the University of Gorakhpur. Progress in this sphere has been impressive over years. Gorakhpur has residential University, Engineering College, Medical College and Degree colleges for the students of the eastern region of Uttar Pradesh.

1. Deen Dayal Upadhyay University

Setup in 1957, 25 thousand students at present, are enrolled with approximately 320 teachers. Apart from the general courses, the University offers courses in Bio-Technology, Bio-Chemistry, Computer, Journalism, fine Arts & Music and MBA . It is also the centre of Academic Staff College (under UGC) and Indira Gandhi National Open University( IGNOU). It produced two chief ministers of the State, Shri. Vir Bahadur Singh and Shri. Raj Nath Singh Number of faculty members have held the post of Vice Chancellor, in different Universities with dignity. The prominent Vice Chancellor of Gorakhpur University were Prof. R.P. Rastogi (BHU), Prof. Nagendra (Lucknow), Prof. U.P. Singh (Purvanchal Univ.), Dr. Vidya Niwas Misra (Kashi Vidya Peeth), Prof. V.S. Pathak, Prof. Radhe Mohan& Mishra, Prof. Revati Raman etc. It also gave Directors of Higher Education Commission, Rajarshi Tondon Open University, Secondary Education Commission.

2. B.R.D. Medical College

Established in the year 1969, it is 6th Medical College in Uttar Pradesh. It is named after the prominent Social Worker Baba Raghav Das, a devoted freedom fighter and Sarvadaya Leader of this area. The College is situated 8 kms from the Gorakhpur Railway Station. Professor P.L. Shukla, was the founder Principal and Professor of Anatomy. This institution is affiliated ; with Gorakhpur University. The teaching hospital complex ‘Nehru Chikitsalaya’ came into existence in 1974. It has got 650 indoor beds and out patient departments for various disciplines of medical services.
Since 1980, the College is running Post Graduate training programme also, for the degree of M.S. & M.D. in Anatomy, Surgery, orthopaedics, Obst.& Gynaecology, Opthalmology, Phisiology, Pharmacology, Pathology, Anaesthesiology, Pediatrics, Medicine, Skin & V.D. etc. In addition to these courses, it also runs diploma courses, of the above listed departments. For further information please

3. M.M.M.Engineering College

Madan Mohan Malviya Engineering College was founded in 1962 to provide engineering and technical education for the development of the backward districts of eastern U.P. The college runs Under Graduate Programme in Civil, Electrical, Mechanical, Electronics & Communication and Computer Science. In addition to regular courses, it also runs part time Post Graduate Diploma Courses ( evening ) in Computer Application called P.G.D.C.A. and Computer Hardware Maintenance & Networking. Besides teaching & research facilities, the college provides technical know how and consultancy to various industries of this area. For further information

Eminent Personalities

Gorakhpur is proud of having a galaxy of personalities who brought in national and international accolate and glory to the district through their best services in different walks of life. Even today, they are immortalized with institutions named after them.

BABA RAGHAVDAS

Raghvendra Rao (original name), born in pune, a staunch patriot and an eminent social worker is popularly known as the Gandhi of Poorvanchal. He aroused cultural and national feelings, spread out education, served the poorest / lepers and sacrificed his life for the socio- economic betterment of the people of Purvanchal. In recognition to his service the medical college is named after him. Also for the shelter of lepers, Kushth Sewa Ashram was set up by him, 1951 at Gorakhpur. The noble saint and philosopher left for his heavenly abode on 15th January, 1958.

RAMPRASAD BISMIL (1897-1927)

Born in Shajahanpur, Ramprasad Bismil was a great revolutionary and believed in armed struggle against the British ruler. As the main accused in the famous Kakori Conspiracy Case (1925) he was hanged to death in Gorakhpur District Jail on 19th Dec.1927. He wrote his autobiography in jail, his last words being ” I wish the downfall of the British Empire”. His martyrdom at prime age inspired the people of Gorakhpur particularly and the nation to advance the freedom struggle to its logical end.

BABU BANDHU SINGH

The first great freedom fighter of Gorakhpur, waged Guerilla War with the Britishers, was at last arrested through an informer and hanged at Alinagar Chowk, Gorakhpur on 12th Aug. 1857. His supreme sacrifice remained a perpetual source of inspiration for the people of Gorakhpur till the attainment of freedom.

FIRAQ GORAKHPURI

Original name Raghupati Sahay, a noted Urdu poet, recipient of Gyanpeeth Award belonged to Gorakhpur.

PREM CHAND

Original name Ganpat Rai, World famous Hindi Writer, was born in Varanasi but Gorakhpur was his work-place. As a writer he got recognition from Gorakhpur during his stay as an Asst. teacher and Hostel Superintendent (1916-1921).

HANUMAN PRASAD PODDAR

Hanuman Prasad Poddar, lovingly called as Bhaijee, a multifacent personality, an editor of famous religious magazine ‘Kalyan’ is remembered for his untiring efforts to propogate and disseminate Hindu religion across the world.

MAHANT DIGVIJAYNATH

One of the famous founder of the Hindu Maha Sabha, a great nationalist and follower of yogi Gorakhnath, was closely associated with the famous Gorakhnath temple and established a number of educational institutions in the city. His contribution to the establishment of Gorakhpur University is significant.

Pt. S.N.M. TRIPATHI

Pt. Surti Narayan Mani Tripathi was the First ICS of UP State. He has held many important posts including the post of District Magistrate – Gorakhpur. That was the time when Pt. S.N.M. Tripathi took a vow to build an University in Gorakhpur. He was the Founder President of the Gorakhpur University. Other personalities like Mahant Digvijaynath, Shri Hanuman Prasad Poddar, Sardar Majithia were also members of the foundation team.

Pt. Dashrath Prasad Dwivedi

An editor of ‘Swadesh’ is known for his patriotic writings-editing.

VIR BAHADUR SINGH

Vir Bahadur Singh, real son of the soil, ex. Chief Minister of U.P. and Central Cabinet Minister of Communication, is widely remembered as the architect of modern Gorakhpur. Gorakhpur is indebted to him for ushering a series of developmental activities, the prominent being upgradation of the city Gorakhpur to B class and Nagar Nigam, creation of Gorakhpur Development Authority, construction of residential colonies, openeing of Sports College, Mahila I.T.I. and Navodaya Vidhyalaya, ambitous Ramgarh Project, Entertainment and Amusement Parks and widening of Roads.

Sir Surjit Singh Majithia

An Industrialist, founder of Sardar Nagar Sugar Mill and others. Sports loving and known for his charitable works.

Dr. Vidya Niwas Misra

Eminent Scholar of Hindi, Sanskrit Litrature resident of Gola Tehsil of Gorakhpur District. Padmeshree Awardee.

Smt. Janaki Devi

An Illiterate activist who reformed the people of many villages and is popular for her Social Activities. Resident of a Village of Pipraich Block, District Magistrate of Gorakhpur felicitated her alongwith other officials and public personalities.

Daler Mehndi

Popular Punjabi Singer, started his carrier from Gorakhpur District.

Jafar Gorakhpuri

Popular Filmy Song Writer known for his song ‘Bada Lutfa tha jab …..’ , belongs to Gorakhpur.

Sports Personalities from Gorakhpur

Syed Modi

An ace badminton player of Gorakhpur, eight times national champion(1980-87), recipient of Arjuna Award, winner of Gold Medal in Common Wealth Games(1982), bronze medalist of Asian games (1982), took participation in several international tournaments. He was known as the great stroke player both on forehand and backhand. Unfortunately, his promising life was cut short by the cruel assasin’s bullet on 28th June. 1988.

NARENDRA HIRWANI

Narendra Hirwani, born and brought up in Gorakhpur but played Ranji for M.P. State, is the youngest cricket test player and became crickecters of the year (1988). National record of taking maximum number of wickets (16 for 136) in test match( against west Indies at Madras) goes to his credit.

Prem Maya

Hockey Player, represented and captained Indian Women Hockey team. Arjun Awardee.

Late Shri. Janardan Singh

Bharat Bhim and famous wrestler from Gorakhpur.

Panne Lal Yadav

India Fame Wrestler, represented India, in India and abroad. Yash Bahrti Awardee.

Ram Ashray Yadav, Chandra Vijay Singh, Janardan Yadav

Wrestlers, represented India Railways Team as well as Indian Team. All are Yash Bharti Awardee.

ऑल इज वेल (ALL IS WELL)

कई दिनों से मेरे भाइयो /  दोस्तो ने
मुझे कहा – ऑल इज वेल “निल्को” ऑल इज वेल ।
मैंने कहा –
क्या तुम्हें लगता है की,
है सब कुछ ऑल इज वेल ?
भाई त्रिपुरेन्द्र ने कहा
मुन्नी बदनाम हुई , ऑल इज वेल ।
भाई अभिषेक ने कहा
शीला जवान हुई, ऑल इज वेल।
अचानक ही भाई ऋषिन्द्र बोले
अब तो मुन्नी हुई पुरानी, शीला की गई जवानी
शालू के ठुमके ही, ऑल इज वेल ।
इतने मे विनायक नर्सरी वाले विजय भाई जी पधारे,
और तपाक से बोले
अरे ये सब तो पुराने है , सब VMW Team के दीवाने है ।
अब सब बोलो ऑल इज वेल ।
भाई गजेंद्र जी लेट से आए और बोले –
क्या तुम्हें लगता है इस रेपिस्तान
है सब कुछ ऑल इज वेल ?
समर्थन मे योगेश जी भी उतरे,
अखबार के कुछ दिखाये क़तरे ।
और बड़े ज़ोर से बोले –
महगांई ने लूटा सबका चैन ,
दो जून की रोटी भी मन को कर रही बेचैन,
क्या यही है ऑल इज वेल ?
यह सब सुन मोहक ने भी मुह खोला ,
कई नेताओ का पोल खोला, और बड़े ज़ोर से बोला
गांधी अब हमारी कुटिया में नहीं आते
वह तो अफसरों, नेताओं, रसूखदारों,
अमीरों के यहां डेरा जमाए हैं,
जब भी हमने अपनी जेब में हाथ डाला,
बस चंद सिक्के ही पाए हैं।
क्या यही है ऑल इज वेल ?
गोरखपुर से देवेश भी आए
और अपनी बात कुछ इस तरह गाये –
देखता हूं चलन सियासत का,
हर कहीं बैर के बवंडर हैं।
फर्क ऊंचाइयों मे है लेकिन,
नीचता मे सभी बराबर हैं।
बात सुन कर सभी ताली बजाए ।
तभी मोहित भी आए ,
साथ मे नीलेश,आशुतोष, गिरिजेश
और सिद्देश बाबा को लाये ,
सब मिल कर नाचे गाये ,
एक सुंदर भारत बनाए ।
जहा न हो राजनीति की प्रतिस्परधा ,
ऐसा मेरा देश बनाए ,
फिर VMW Team  के साथ गाये –
ऑल इज वेल “मधुलेश” ऑल इज वेल ।

**********************

मधुलेश पाण्डेय “निल्को”
हरखौली,लार रोड,
सलेमपुर,देवरिया
उत्तर प्रदेश 




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……बदल गया देखने का नज़रिया !

कई दिनों से किसी व्यक्ति विशेष पर रख रहा था नज़र
लेकिन हरकते देख कर
मन बोला
लोग बदले, ज़माने बदले
पर तुम न बदलो नज़रिया
क्योकि
तुम तो ठहरे ग्रामीण सहरिया
वे लोग जो भेष बदला करते है
‘निल्को’ उन्हें द रियल हीरो कहा करते है
जिनकी जिन्दगी ही फिल्मी हो जाये
अपने घर के ही पडोसी हो जाये
तो ‘मधुलेश’ की एक बात याद रखना
की कितना ही बड़ा पेड़ हो जाये ,
आखिर उसे गिरना तो आसमान में नहीं
धरती पर ही जगह मिलती है
इन सब बातो से लगा की
सचमुच ही जमाना भी तो बदल रहा है
किन्तु इस दौड़ में कम तो आप भी नहीं है
अब तो चार घंटे की ही चांदनी
के बाद अँधेरी काली रात है
फिर क्यों अपनो को पराये
बनाने के लिए लोग परेशान है
कविता तो शायद ‘सहज’ लगे
लेकिन इसका ‘श्रेय’ किसको जाता है
यह तो नज़रिये का खेल है
कभी ‘रियल’ तो कभी ‘आशियाना’ नज़र आता है .
v मधुलेश पाण्डेय निल्को

पुण्यतिथि के अवसर पर देश के इन वीर सपूतों को शत शत नमन !

 
शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हँसतेहँसते भारत की आजादी  के लिए 23 मार्च 1931 को 7:23 बजे सायंकाल फाँसी का फंदा चूमा था. इन शहीदों की पुण्यतिथि पर प्रतिवर्ष शहीद दिवस मनाया जाता है.

तो आइये इन शहीदों का स्मरण कर लें.

शहीद भगत सिंह

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भगत सिंह प्रायः यह शेर गुनगुनाते रहते थे-

जबसे सुना है मरने का नाम जिन्दगी है
सर से कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं.

भगत सिंह मूलतः मार्क्ससमाजवाद के सिद्धांतो से प्रभावित थे. इस कारण से उन्हें अंग्रेजों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी. ऐसी नीतियों के पारित होने के खिलाफ़ विरोध प्रकट करने लिए क्रांतिकारियों ने लाहौर की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की सोची.

भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा ना हो तथा अंग्रेजो तक उनकी आवाज़ पहुंचे. निर्धारित योजना के अनुसार भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में एक खाली स्थान पर बम फेंक दिया. वे चाहते तो भाग सकते थे पर भगत सिंह की सोच थी की गिरफ्तार होकर वे अपना सन्देश बेहतर ढंग से दुनिया के सामने रख पाएंगे.

करीब २ साल जेल प्रवास के दौरान भगत सिंह क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े रहे और लेखन व अध्ययन भी जारी रखा. इसी दौरान उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ . फांसी पर जाने से पहले तक भी वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. जेल मे भगत सिंह और बाकि साथियो ने ६४ दिनो तक भूख हडताल की.

२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई. फांसी पर जाते समय वे तीनों गा रहे थे –

दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी .

फ़ासी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को लिखे पत्र में भगत सिह ने लिखा था –

उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,
चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें
सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें.

इससे उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है . शहीद भगत सिंह सदा ही शेर की तरह जिए. चन्द्रशेखर आजा़द से पहली मुलाकात के समय ही जलती मोमबती की लौ पर हाथ रखकर उन्होने कसम खाई कि उनका जीवन वतन पर ही कुर्बान होगा.

खैर, भगत सिंह के बारे में तो सभी जानते हैं पर भगत सिंह का नाम राजगुरु और सुखदेव के बिना अधूरा है. हालांकि राजगुरु और सुखदेव का नाम हमेशा भगत सिंह के बाद ही आया है पर आजादी के इन दीवानों का योगदान भगत सिंह से किसी भी मायने में कमतर नहीं था. तो आइये राजगुरु और सुखदेव के बारे में भी कुछ जान लें.

 

शहीद राजगुरु

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शहीद राजगुरु का पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरुथा. राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, 1908 को पुणे ज़िले के खेड़ा गाँव में हुआ था, जिसका नाम अब राजगुरु नगरहो गया है. उनके पिता का नाम श्री हरि नारायण और माता का नाम पार्वती बाईथा. बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी आ गए थे. यहाँ वे संस्कृत सीखने आए थे. इन्होंने धर्मग्रंथों तथा वेदो का अध्ययन किया तथा सिद्धांत कौमुदी इन्हें कंठस्थ हो गई थी. इन्हें कसरत का शौक था और ये शिवाजी तथा उनकी छापामार शैली के प्रशंसक थे. वाराणसी में इनका सम्पर्क क्रंतिकारियों से हुआ. ये हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ गए और पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथके छद्म नाम से जाना जाने लगा. चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और जतिन दास इनके मित्र थे. वे एक अच्छे निशानेबाज भी थे.

राजगुरु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित थे. 1919 में जलियांवाला बाग़ में जनरल डायर के नेतृत्व में किये गये भीषण नरसंहार ने राजगुरु को ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ बाग़ी और निर्भीक बना दिया तथा उन्होंने उसी समय भारत को विदेशियों के हाथों आज़ाद कराने की प्रतिज्ञा ली और प्रण किया कि चाहे इस कार्य में उनकी जान ही क्यों न चली जाये वह पीछे नहीं हटेंगे.

जीवन के प्रारम्भिक दिनों से ही राजगुरु का रुझान क्रांतिकारी गतिविधियों की तरफ होने लगा था . अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक प्रदर्शन में पुलिस की बर्बर पिटाई से लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई थी. लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए राजगुरु ने 19 दिसंबर, 1928 को भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में अंग्रेज़ सहायक पुलिस अधीक्षक जे. पी. सांडर्सको गोली मार दी थी और ख़ुद ही गिरफ़्तार हो गए थे.

 

शहीद सुखदेव

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15 मई, 1907 को पंजाब के लायलपुर, जो अब पाकिस्तान का फैसलाबाद है, में जन्मे सुखदेव भगत सिंह की तरह बचपन से ही आज़ादी का सपना पाले हुए थे। भगतसिंह और सुखदेव के परिवार लायलपुर में पास-पास ही रहा करते थे.  ये दोनों लाहौर नेशनल कॉलेजके छात्र थे. दोनों एक ही सन में लायलपुर में पैदा हुए और एक ही साथ शहीद हो गए. इन्होने भगत सिंह, कॉमरेड रामचन्द्र एवम् भगवती चरण बोहरा के साथ लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया था. सांडर्स हत्या कांड में इन्होंने भगत सिंह तथा राजगुरु का साथ दिया था. १९२९ में जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किये जाने के विरोध में व्यापक हड़ताल में भाग लिया था.

भगत सिंह और सुखदेव दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी. चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में पब्लिक सेफ्टीऔर ट्रेड डिस्प्यूट बिलके विरोध में सेंट्रल असेंबलीमें बम फेंकने के लिए जब हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एचएसआरए) की पहली बैठक हुई तो उसमें सुखदेव शामिल नहीं थे. बैठक में भगतसिंह ने कहा कि बम वह फेंकेंगे, लेकिन आज़ाद ने उन्हें इज़ाज़त नहीं दी और कहा कि संगठन को उनकी बहुत ज़रूरत है. दूसरी बैठक में जब सुखदेव शामिल हुए तो उन्होंने भगत सिंह को ताना दिया कि शायद तुम्हारे भीतर जिंदगी जीने की ललक जाग उठी है, इसीलिए बम फेंकने नहीं जाना चाहते. इस पर भगतसिंह ने आज़ाद से कहा कि बम वह ही फेंकेंगे और अपनी गिरफ्तारी भी देंगे.

अगले दिन जब सुखदेव बैठक में आए तो उनकी आंखें सूजी हुई थीं. वह भगत को ताना मारने की वजह से सारी रात सो नहीं पाए थे. उन्हें अहसास हो गया था कि गिरफ्तारी के बाद भगतसिंह की फांसी निश्चित है. इस पर भगतसिंह ने सुखदेव को सांत्वना दी और कहा कि देश को कुर्बानी की ज़रूरत है. सुखदेव ने अपने द्वारा कही गई बातों के लिए माफी मांगी और भगतसिंह इस पर मुस्करा दिए थे.

जब-जब हम शहीदे आजम भगत सिंह , राजगुरु, सुखदेव जैसे शहीदों को याद करते हैं तो बरबस ये पंक्तियाँ याद आ ही जाती हैं-

कभी वो दिन भी आयेगा,
कि जब आजाद हम होंगे,
ये अपनी ही जमीं होगी,
ये अपना आसमां होगा,
शहीदों कि चिताओं पर,
लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का,
यही नामों-निशां होगा.

 

पुण्यतिथि के अवसर पर देश के इन वीर सपूतों को शत शत नमन !

भारतीय राष्ट्र जीता जागता ‘राष्ट्र पुरुष’ है।

मधुलेश पाण्डेय “निल्को”
दोस्तो, हम पाते हैं कि भारतीय राष्ट्र जीता जागता राष्ट्र पुरुषहै।हमें भारत देश के साथ अपने आप पर भी गर्व करना चाहिए, क्योंकि हमने भारत में जन्म लिया है । भारत की संस्कृति में विभिन्न युगों में समयकालपरिस्थिति तथा उन युगों के रीतिरिवाज, परंपरा, लोगों के विचारधाराओं एवं मान्यताओंको ध्यान में रखते हुए अनेक बार बदलाव हुआ है। यही कारण है कि आज भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह की संस्कृतियाँ, भाषायें, परंपराएँ, रीति रिवाज और मान्यताएँ बरकरार हैं ।राष्ट्रीय एकता प्रत्येक देश के लिए महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है सांस्कृतिक एकता और सांस्कृतिक एकता का सबसे प्रबल माध्यम साहित्य की परिधि के अन्तर्गत महाकाव्यों का विशेष महत्व है, लेकिन मुझे लगता है की आजकल भारतदेश वाकई कई समाजिक उथल पुथल से गुज़र रही है। बहुत प्रयास के बाद हम अंग्रेजों को भारत से निकलने में सफल हो गए थे। लेकिन अभी भी ये देश भाषाएँ , प्रदेशों , प्रान्तों ,उत्तर, दक्षिण ,मज़हब,धर्म , जाती आदि के तौर पर बंट कर ही रह गया है। इस देश में गरीबी , बेरोज़गारी आदि बहुत जटिल समस्याएँ है। मगर पड़े लिखे लोग भी इस मद्दे पर ध्यान देने से ज्यादा अपने जाती के लोगों को ही तरक्की करते हुए देखने में मज़ा लेते हैं। बहुत अफ़सोस की बात है। केवल अफ़सोस ही नहीं मुझे तो ऐसे लोगों से घ्रणा है। जो काले गोरे का भेद करते है
इस विशिष्टता के आधार पर एक कवि कहता है
बोली कोयल मैं हूँ काली
मुझसे रहे देश की लाली।
काले कृष्ण, राम भी काले
भारतवासी भी हैं काले।
काले होकर मीठा बोलो
वाणी में मिश्री-सी घोलो।
सच तो यह है कि जब-जब देश पर विपत्ति पड़ी, भारत के लोगों ने धर्म-जाति के भेदभाव को भुलाकर अपनी हिन्दवी-एकता प्रदर्शित की है। जब चीनी आक्रमण हुआ तो घर-घर से महिला-पुरुषों ने अपने जेवरात् निकाल कर सरकार को सौंप दिये।
      
       अभी हाल में ही हमने अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का स्वरूप देखा है। इसमें भी धर्म-जाति के भेदभाव को भुलाकर कर हिन्दवी-एकता का साकार स्वरूप प्रकट हो चुका है। इसप्रकार भारतीय जनमानस का अन्तर्मन अपनी परम्परागत संस्कृति एवं आध्यात्मिक चेतना के अनुरूप बारम्बार जाति-धर्म के भेदभाव को भुलाकर हिन्दवी-एकता को स्थापित करना चाहता है, लेकिन हमारी राजनीति इस जनचेतना को विश्रृंखलित करने का कुचक्र रच देती है।
भारतीय राजनीति में व्याप्त छलनात्मक चतुराई, स्वार्थ और पाखंड से सिंचित विषैली कूटनीति के बावजूद कुछ ऐसा भी है जो देश की सतत् रक्षा करता आ रहा है। इसमें तो पहली है हमारी आध्यात्मिक संस्कृति जो कभी राजनीतिज्ञों की पोषिता नहीं रही। दूसरी है राष्ट्रभाषा हिन्दी जिसका क्रेज निरन्तर बढ़ता जा रहा है। वैश्वीकरण के इस युग में शेष विश्व की तरह भारतीय समाज पर भी अंग्रेजी तथा यूरोपीय प्रभाव पड़ रहा है। बाहरी लोगों की खूबियों को अपनाने की भारतीय परंपरा का नया दौर कई भारतीयों की दृष्टि में अनुचित है। एक खुले समाज के जीवन का यत्न कर रहे लोगों को मध्यमवर्गीय तथा वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। कुछ लोग इसे भारतीय पारंपरिक मूल्यों का हनन मानते हैं। विज्ञान तथा साहित्य में अधिक प्रगति ना कर पाने की वजह से , भारतीय भारत की संस्कृति भारत की धरती की उपज है। उसकी चेतना की देन है। साधना की पूंजी है। उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है। भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है । उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है।
कोई राष्ट्र जब अपनी सांस्कृतिक जड़ों से उन्मूलित होने लगता है, तो भले ही ऊपर से बहुत सशक्त और स्वस्थ दिखाई दे….भीतर से मुरझाने लगता है। स्वतन्त्रता के बाद भारत के सामने यह सबसे दुर्गम चुनौती थी…..पाँच हज़ार वर्ष पुरानी परम्परा से क्या ऐसे राष्ट्रका जन्म हो सकता है, जो अपने में एकभारतीय सभ्यता के इस आध्यात्मिक सिद्धान्त को अनदेखा करने का ही यह दुष्परिणाम था कि पश्चिमी इतिहासकारों…और उनके भारतीय सबाल्टर्नअनुयायियों की आँखों में भारत की अपनी कोई सांस्कृतिक इयत्ता नहीं, वह तो सिर्फ़ कबीली जातियों सम्प्रदायों का महज एक पुँज मात्र है। वे इस बात को भूल जाते हैं कि यदि ऐसा होता, तो भारत की सत्ता और उसके अन्तर्गत रहनेवाले सांस्कृतिक समूहों की अस्मिता कब की नष्ट हो गई होतीहुआ भी उन अनेकस्रोतों से अपनी संजीवनी शक्ति खींच सके, जिसने भारतीय सभ्यता का रूप-गठन किया था ।
भारत की सभ्यता व संस्कृति का सानी नहीं कोई ,
विश्व के इतिहास में ऐसा स्वाभिमानी नहीं कोई !
वतन की सरज़मीं पर हुए शहीदों का बलिदान न व्यर्थ हो ,
उनकी कुर्बानी को याद कर युवाओं में देशभक्ति का संचार हो !
देश के नवयुवक जाग्रत हो देश का ऊँचा नाम कराएं ,
विश्व के मंच पर मिसाल बन भारत को महाशक्ति बनाएं !
मेरा सपना है कि भारत एक दिन विकसित देशों कि श्रेणी में आए ,
एक बार फिर से सोने कि चिडियां कहलाए !!!
     उस महान देश और उसके महान लोगों के बारे में देख, समझ और जानकर, किसी भी ईमानदार और होशमंद इंसान का सिर, उनके प्रति श्रध्दा और सम्मान से अपने आप झुक जाता है। चाहे वह इंसान किसी भी धर्म या देश का क्यों न हो। वह महान भारत और महान भारतीयों को नमस्कार करने से नहीं चूकता। भारत सचमुच महान है। उसके लोग सचमुच महान हैं। वे हर क्षेत्र में महान हैं। सिर से पाँव तक महान हैं मेरे ख़याल से एक राम, एक कृष्ण, एक गाँधी. सिर्फ इन नामों का सहारा लेकर हम आम तौर पर महानता का दावा नहीं कालजयी कवियों और साहित्यकारों के रूप में सूर्य और चंद्रमा पैदा करने की ताकत केवल हिन्दुस्तान की माटी में है, जिसने सूरदास जैसे साहित्य के सूर्य और तुलसीदास जैसे चंद्रमा को जन्म दिया। इस देश के साहित्य में वह ताकत है कि उसके बलबूते हमारी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता हजारों वर्षों से कायम है और आगे भी हजारों वर्षों तक कायम रहेगी।! 
जय हिंद, जय हिंदी, यह भारतीय एकता
* मधुलेश पाण्डेय “निल्को” *
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होली निकट आते ही कुछ …..


पानी बचाने के लिए अपना दैनिक व्यवहार बदलें, त्यौहार नहीं !!


होली निकट आते ही कुछ ……………… किस्म के लोग पानी बचाने का सन्देश देना शुरू कर देते हैं ! होली के अवसर पर पानी इनके लिए डीजल और पेट्रोल से भी ज्यादा कीमती हो जाता है ! होली ही क्यों भारतीय संस्कृति से जुड़ा हर त्यौहार इनके अनुसार पर्यावरण के लिए खतरा है ! दीपावली आने पर इन्हें सीधी ओजोन परत दिखाई देती है ! नदियों का प्रदुषण केवल गणेश चतुर्थी पर नजर आता है !


अब होली पर पुनः एक बार ऐसा माहोल बनाया जा रहा है कि पानी मिले रंग से होली खेलने पर पूरा देश सूखा और अकाल से ग्रस्त हो जाएगा ! इन ……………. में कुछ धूर्त गणितज्ञ भी होते हैं जो होली के दिन कितने लाख/करोड़ गैलेन पानी बर्बाद होगा, इसका भी हिसाब लगाकर अखबारों में छपवा देते हैं ! अब इन मूर्खों को कौन समझाए कि अपनी आवश्यकता के अनुसार पानी संग्रहण का काम बरसात में होता है ! उस समय ये प्राणी पता नहीं किस शाख पर बैठे रहते है ??

मेरा सभी मित्रों से अनुरोध है कि पानी बचाने के लिए अपने दैनिक व्यवहार को बदलें, त्यौहार को नहीं ! वर्ष पर पानी बचाएं लैकिन होली को होली की तरह मनाएँ !!

…..और जब वो बड़ी हो जाएं तो सत्ता में बैठे मठाधीश ही सबसे पहले उनको भोग की वस्तु बना डालते हैं।

पूरा देश लक्ष्मी की पूजा करता है दीपावली पर। दुर्गा की पूजा करता है नवरात्रा में, नौ दिन। सरकारें अरबों रूपए चाट रही हैं- ‘बेटी बचाओ’,  ’कन्या भू्रण’, ‘बेटी पढ़ाओ’, ‘शादी करवाओ’,  ’उनको मुफ्त शिक्षा दो’, ‘किताबें, यूनिफॉर्म, साइकिलें बांटों।’ और जब वो बड़ी हो जाएं तो सत्ता में बैठे मठाधीश ही सबसे पहले उनको भोग की वस्तु बना डालते हैं।
राजस्थान का भंवरीदेवी कांड तो एक मंत्री और विधायक का कारनामा निकला। ऎसे ही कारनामे में रामलाल जाट ने तो मंत्री पद खोया। भोपाल का शहला मसूद कांड, एक पाष्ाüद का हत्याकांड मध्यप्रदेश सरकार के मुंह पर आज भी कालिख पोत रहे हैं। दिल्ली में एक बस में गैंग रेप हुआ तो पूरे देश में भूचाल आ गया।
यहां तो सत्ता के मद में आए दिन बलात्कार, हत्याएं, गैंग रेप होते ही रहते हैं। मध्यप्रदेश में एक सप्ताह में 4 सामूहिक बलात्कार और 28 बलात्कार की घटनाएं हुई हैं। इस हालात में प्रदेश के गृह मंत्री को तो अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अघिकार ही नहीं है। ऎसी ही कालिख अन्य प्रदेशों में भी पुत रही है। मुझे तो ऎसे प्रदेश और देश में जीने में ही शर्म आ रही है। इन सत्ताधारियों ने पुलिस के भी हाथ काट रखे हैं। माफिया जाति का पोषण भी इनकी काली कमाई कर रही है।
दिल्ली तो सरताज है। बड़े नेता और नेत्रियों का इतिहास माफिया के साथ हर पन्ने पर लिखा है। नैना साहनी का काला दिन आज भी पढ़ा जा रहा है। सत्ता के दरिंदें गली-गली में फैल गए। खुले आम किस्मत के बदले अस्मत मांगने लग गए। हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश को तो इस चक्कर में त्यागपत्र देना पड़ा था।
सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि सत्ताधारी ही इनको सजा दिलाने के बजाए बचाने में जुट जाते हैं।  समझ में नहीं आता कि असुर कौन है? अपराधी या इनको बचाने वाले सत्ता के शीर्ष पुरूष्ा! एक को शर्म नहीं आती, बल्कि किसी एक को बचाने के लिए पुलिस अथवा सीबीआई के जरिए दूसरे को फंसा देते हैं। कहानी को ही तोड़-मरोड़ कर दूसरा रूप दे देते हैं। हत्या का श्रेय, गैंग रेप का श्रेय इनको भी जाता है। ये ही अपराध की प्रतिष्ठा करने के लिए जिम्मेदार हैं। जो न्यायाधीश जान-बूझकर आंखें बंद कर लेते हैं, ईश्वर उनको कभी नहीं छोड़ेगा।
दिल्ली जैसी घटना कहीं नहीं होनी चाहिए पर मीडिया को भी समाज और देश का मुंह काला करने वाली ऎसी हर घटना पर आक्रामक दिखना चाहिए। उसे किसी भी राज्य अथवा छोटे शहर-गांव में होने वाली घटना को हाशिए पर नहीं डाल देना चाहिए। जनता को भी उनसे वैसे ही जुड़ना चाहिए, जुलूस निकालने चाहिए जैसे दिल्ली की घटना पर निकले। दिल्ली और प्रदेशों के लोगों में इतना बड़ा भेद क्यों? क्या वहां का लोकतंत्र भिन्न हैं? क्या मध्यप्रदेश में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका (विशेषकर पुलिस)  भिन्न है? क्या लोगों की संस्कृति और मूल्य भिन्न हैं? क्यों दिल्ली के बाद की घटनाओं को नकारा जा रहा है? एक ही सप्ताह में चार गैंग रेप! सामंतशाही भी शर्मसार हो जाएगी।
जनता भी और मीडिया भी अभी तक दिल्ली की ही घटना से उद्वेलित है। इन चारों का तो जैसे कोई मां-बाप ही नहीं है।  किसने मंुह बंद किया मीडिया का? कटनी के गैंगरेप का आरोपी तो एक भाजपा नेता का बेटा था। क्या इनको रोजमर्रा की साधारण घटना मानकर छोड़ देना चाहिए? छत्तीसगढ़ में तो महिला पुलिस अघिकारी का यौन शोष्ाण प्रमाणित होने के बाद भी पुलिस ने सेना के अघिकारी को ही बचाया। लगता है कि इनमें से किसी घर में बहन-बेटियां नहीं हैं। एक तरफ ‘बेटी बचाओ’ और दूसरी ओर ‘बेटी को नोंच खाओ।’ डूब मरो!

गुलाब कोठारी (http://gulabkothari.wordpress.com/category/special-articles/)

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प्रकाश पर्व "दीपावली" आपके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ लेकर आये |

दीपावली के इस पावन अवसर पर आप सभी को और आपके समस्त पारिवारिकजनों को अपने और अपने Team की तरफ से दीपावली की ढेरों शुभकामनाये प्रेषित करता हूँ ! 
प्रेम से करना “गजानन-लक्ष्मी” आराधना।
आज होनी चाहिए “माँ शारदे” की साधना।।

अपने मन में इक दिया नन्हा जलाना ज्ञान का।
उर से सारा तम हटाना, आज सब अज्ञान का।।

आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!! 

प्रकाश पर्व “दीपावली” आपके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ लेकर आये |  
जिस तरह “दीपक” की “एक लो” “अमावस्या” की अँधेरी रात में उजाला भर देती हे ,उसी प्रकार  आपके जीवन के सारे अँधेरे दूर हो जाये और आपके जीवन में “उजाला ही उजाला” हो |  
आप अपने क्षेत्र में उच्चतम उंचाइयो  पर पंहुचे |
 इसी कामना के साथ आपको “दीपावली” की “ढेरो शुभकामनाये” |

आप लोगो के सुझाव और शिकायत की प्रतीक्षा में …

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अपने हि देश मे हक के लिऐ संघर्ष करती एक भाषा कि दास्तान

जिसे बोलते है 22 करोङ हिन्दूस्तानी,जिसे चाहने वालो कि संख्या है अधिक,मारीशस जैसे राष्ट्र कि एक प्रमुख भाषा है यह,हाँलैँड मे भी बोली जाती है यह,अब त आप लोग समझ गईल होईब जा काहेँ से कि ऊ भाषा ह भोजपुरी,भोजपुरी के नाम पर कई उठापटक बैठके भी हुईँ हैँ पर केहु भी भोजपुरी के रक्षा के संकल्प लेने के बाद क्यो नही करता है जन आंदोलन,भारतिय सियासत मे प्रमुख भुमीका निभावे वाली इ भाषा अपने देश मे हक पावे के खातिर संघर्ष कर रही है । महाराष्ट्र,गुजरात,असम जैसे प्रदेशो मे उन भारतियोँ को खास कर निशाना बनाया जाता है जो उत्तर भारत के होँ,वो भी बिहार और उत्तर प्रदेश के,क्योँकी ये लोग भोजपुरी से प्रेम करते हैँ । भोजपुरी को चाहते है । आज तक ये भाषा संविधान कि आठवीँ अनसुची मे सामिल नही हो पाई है । इसके जिम्मेदार हम भोजपुरी भाषी ही हैँ हमारे नेता जो वोट मागने आते हैँ उन्होने भी इस दिशा मे कोई उल्लेखनिय कार्य नही किया है । हाँ इंटरनेट पर कुछ वेबसाईट और ब्लागोँ ने इसे आगे बढाने का कार्य जरूर किया है । अभी भी समय है भाईयोँ जाग जाओ अपने मातृ भाषा और राष्ट्र भाषा को आगे बढाओँ,पर किसी भी अन्य भाषा का निरादर मत करो ।
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ईमानदारी को बनाएं हथियार

जानकारी और ज्ञान में वही फर्क है, जो आंख और प्रकाश में है। प्रकाश यानी दृष्टि। दृष्टि न हो तो आंख किस काम की और ज्ञान न हो तो जानकारियों का वजन भी मनुष्य की चाल को बिगाड़ देगा। इन बातों का असर हमारे दो अभियानों पर भी पड़ा। भ्रष्टाचार और अपराध, देश के ये दो कलंक बिंदिया बनकर चिपक गए। जब दुर्गुण ही शृंगार बन जाए, तब चेहरे को विकृत होना ही है। भ्रष्टाचार मिटेगा ईमानदारी से। हमारे पास ईमानदारी जानकारी की शक्ल में है, ज्ञान के रूप में नहीं। इसलिए ईमानदारी को समझदारी से जोडऩा होगा। एक गहरी समझ के साथ इसे शस्त्र बनाकर बेईमानों पर प्रहार करना होगा। लोगों ने ईमानदारी को ढाल बना लिया, अब हथियार बनाना होगा। इसी तरह अपराध के मुकाबले के लिए जिम्मेदारी को बहादुरी से जोडऩा होगा। कर्तव्यनिष्ठ लोग साहस दिखाने के मामले में रिजर्व हो जाते हैं। यह बिल्कुल ऐसा है कि हमारे पास जिम्मेदारी की आंख है, पर बहादुरी की दृष्टि नहीं। अंधे होकर आखिर कितनी लंबी यात्राएं कर पाएंगे। इसीलिए बेईमानों की जानकारी भी ईमानदारों के ज्ञान पर भारी पड़ जाती है और अपराधियों की दृष्टि जिम्मेदारों की आंख पर हावी हो जाती है। आध्यात्मिकता ही इस गड़बड़ाए तालमेल को ठीक कर पाएगी।

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