Tag Archives: एक नई चीज

तीन बातें

√.तीन चीजों को कभी छोटी ना समझे – बीमारी, कर्जा, शत्रु।
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•√.तीनों चीजों को हमेशा वश में रखो – मन, काम और लोभ।
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•√.तीन चीज़ें निकलने पर वापिस नहीं आती – तीर कमान से, बात जुबान से और प्राण शरीर से।
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•√.तीन चीज़ें कमज़ोर बना देती है – बदचलनी, क्रोध और लालच।
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•√.तीन चीज़े असल उद्धेश्य से रोकता हैं – बदचलनी, क्रोध और लालच।
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•√.तीन चीज़ें कोई चुरा नहीं सकता – अकल, चरित्र, हुनर।
√.तीन चीजों में मन लगाने से उन्नति होती है – ईश्वर, परिश्रम और विद्या।
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•√.तीन व्यक्ति वक़्त पर पहचाने जाते हैं – स्त्री, भाई, दोस्त।
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•√.तीनों व्यक्ति का सम्मान करो – माता, पिता और गुरु।
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•√.तीनों व्यक्ति पर सदा दया करो – बालक, भूखे और पागल।
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•√.तीन चीज़े कभी नहीं भूलनी चाहिए – कर्ज़, मर्ज़ और फर्ज़।
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•√.तीन बातें कभी मत भूलें – उपकार, उपदेश और उदारता।
•√.तीन चीज़े याद रखना ज़रुरी हैं – सच्चाई, कर्तव्य और मृत्यु।
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•√.तीन बातें चरित्र को गिरा देती हैं – चोरी, निंदा और झूठ।
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•√.तीन चीज़ें हमेशा दिल में रखनी चाहिए – नम्रता, दया और माफ़ी।
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•√.तीन चीज़ों पर कब्ज़ा करो – ज़बान, आदत और गुस्सा।
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•√.तीन चीज़ों से दूर भागो – आलस्य, खुशामद और बकवास।
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•√.तीन चीज़ों के लिए मर मिटो – धेर्य, देश और मित्र।
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•√.तीन चीज़ें इंसान की अपनी होती हैं – रूप, भाग्य और स्वभाव।
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•√.तीन चीजों पर अभिमान मत करो – ताकत,सुन्दरता, यौवन।
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•√.तीन चीज़ें अगर चली गयी तो कभी वापस नहीं आती – समय, शब्द और अवसर।
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•√.तीन चीज़ें इन्सान कभी नहीं खो सकता – शान्ति, आशा और ईमानदार
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सादर
VMW Team

अपने लिए भी जियें…..!

ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं.! फिर शुरू होती है नौकरी की खोज.!
ये नहीं वो, दूर नहीं पास.
ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते,
अंत में एक तय होती है, और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है. !
और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक, वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है… अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल..!
इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ.!
‘वो’ स्थिर होता है.
बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं.
इतने में अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.!
विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.!
शादी के पहले 2-3 साल नर्म, गुलाबी, रसीले और सपनीले गुज़रते हैं.!
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने.!
पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं.!
क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमना फिरना, खरीदी होती है.!
और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.!
सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है.! उसका खाना पीना , उठना बैठना, शु-शु, पाॅटी, उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार.!
समय कैसे फटाफट निकल जाता है, पता ही नहीं चलता.!
इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना, घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला..?
इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और बच्चा बड़ा होता गया…
वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में.!
घर की किस्त, गाड़ी की किस्त और बच्चे की ज़िम्मेदारी, उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शून्य  बढ़ाने का टेंशन.!
उसने पूरी तरह से अपने आपको काम में झोंक दिया.!
बच्चे का स्कूल में एॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा.!
उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.!
इतने में वो पैंतीस का हो गया.!
खूद का घर, गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य.!
फिर भी कुछ कमी है..?
पर वो क्या है समझ में नहीं आता..!
इस तरह उसकी चिड़-चिड़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगता है।
दिन पर दिन बीतते गए, बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया.! उसकी दसवीं आई और चली गयी.!
तब तक दोनों ही चालीस के हो गए.!
बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.!
एक नितांत एकांत क्षण में उसे वो गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है,
“अरे ज़रा यहां आओ,
पास बैठो.!”
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें, कहीं घूम के आएं…! उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहती है,
“तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है. मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है..!” कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल जाती है.!
और फिर आता है पैंतालीसवां साल,
आंखों पर चश्मा लग गया,
बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे,
दिमाग में कुछ उलझनें शुरू हो जाती हैं,
बेटा अब काॅलेज में है,
बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं, उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और…
बेटे का कालेज खत्म हो गया,
अपने पैरों पर खड़ा हो गया.!
अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया…!!!
अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा…!
उसे भी चश्मा लग गया.!
अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा  हो रहा था..!
पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू हो गया.!
बैंक में अब कितने शून्य हो गए,
उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे..!
गोली-दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा.!
डाॅक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं.!
बच्चे बड़े होंगे….
ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा.
बच्चे कब वापस आएंगे,
अब बस यही हाथ रह गया था.!
और फिर वो एक दिन आता है.!
वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था.!
वो शाम की दिया-बाती कर रही थी.!
वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है.!
इतने में फोन की घंटी बजी,
उसने लपक के फोन उठाया,
उस तरफ बेटा था.!
बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा..!
उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा..?
अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी..!”
एक काम करिये, इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहिये.!”
कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया..!
वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी.
उसने उसे आवाज़ दी,
“चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें.!”
वो तुरंत बोली,
“बस अभी आई.!”
उसे विश्वास नहीं हुआ,
चेहरा खुशी से चमक उठा,
आंखें भर आईं,
उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए,
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया..!!
उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा,
“बोलो क्या बोल रहे थे.?”
पर उसने कुछ नहीं कहा.!
उसने उसके शरीर को छू कर देखा, शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था..!
क्षण भर को वो शून्य हो गई,
“क्या करूं” उसे समझ में नहीं आया..!
लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई,  धीरे से उठी और पूजाघर में गई.!
एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई..!
उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली,
“चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे.!”
बोलो…!! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं..!
वो एकटक उसे देखती रही,
आंखों से अश्रुधारा बह निकली.!
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया.!
ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था….!!
यही जिंदगी है…??
नहीं….!!!
संसाधनों का अधिक संचय न करें,
ज्यादा चिंता न करें,
सब अपना अपना नसीब ले कर आते हैं.!
अपने लिए भी जियो, वक्त निकालो..!
सुव्यवस्थित जीवन की कामना…!!
जीवन आपका है, जीना आपने ही है…!
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

फ्रिज में रखे आटे के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी।

भोजन केवल शरीर को ही नहीं, अपितु मन-मस्तिष्क को भी गहरे तक प्रभावित करता है। दूषित अन्न-जल का सेवन न सिर्फ आफ शरीर-मन को बल्कि आपकी संतति तक में असर डालता है।
ऋषि- मुनियों ने दीर्घ जीवन के जो सूत्र बताये हैं उनमें ताजे भोजन पर विशेष जोर दिया है। ताजे भोजन से शरीर निरोगी होने के साथ-साथ तरोताजा रहता है और बीमारियों को पनपने से रोकता है। लेकिन जब से फ्रीज का चलन बढा है तब से घर-घर में बासी भोजन का प्रयोग भी तेजी से बढा है। यही कारण है कि परिवार और समाज में तामसिकता का बोलबाला है। ताजा भोजन ताजे विचारों और स्फूर्ति का आवाहन करता है जबकि बासी भोजन से क्रोध, आलस्य और उन्माद का ग्राफ तेजी से बढने लगा है। शास्त्रों में कहा गया है कि बासी भोजन भूत भोजन होता है और इसे ग्रहण करने वाला व्यक्ति जीवन में नैराश्य, रोगों और उद्विग्नताओं से घिरा रहता है। हम देखते हैं कि प्रायःतर गृहिणियां मात्र दो से पांच मिनट का समय बचाने के लिए रात को गूंथा हुआ आटा लोई बनाकर फ्रीज में रख देती हैं और अगले दो से पांच दिनों तक इसका प्रयोग होता है। गूंथे हुए आटेको उसी तरह पिण्ड के बराबर माना जाता है जो पिण्ड मृत्यु के बाद जीवात्मा के लिए समर्पित किए जाते हैं। किसी भी घर में जब गूंथा हुआ आटा फ्रीज में रखने की परम्परा बन जाती है तब वे भूत और पितर इस पिण्ड का भक्षण करने के लिए घर में आने शुरू हो जाते हैं जो पिण्ड पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे भूत और पितर फ्रीज में रखे इस पिण्ड से तृप्ति पाने का उपक्रम करते रहते हैं। जिन परिवारों में भी इस प्रकार की परम्परा बनी हुई है वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट, रोग-शोक और क्रोध तथा आलस्य का डेरा पसर जाता है। इस बासी और भूत भोजन का सेवन करने वाले लोगों को अनेक समस्याओं से घिरना पडता है। आप अपने इष्ट मित्रों, परिजनों व पडोसियों के घरों में इस प्रकार की स्थितियां देखें और उनकी जीवनचर्या का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे किसी न किसी उलझन से घिरे रहते हैं। आटा गूंथने में लगने वाले सिर्फ दो-चार मिनट बचाने के लिए की जाने वाली यह क्रिया किसी भी दृष्टि से सही नहीं मानी जा सकती।
पुराने जमाने से बुजुर्ग यही राय देते रहे हैं कि गूंथा हुआ आटा रात को नहीं रहना चाहिए। उस जमाने में फ्रीज का कोई अस्तित्व नहीं था फिर भी बुजुर्गों को इसके पीछे रहस्यों की पूरी जानकारी थी। यों भी बासी भोजन का सेवन शरीर के लिए हानिकारक है ही।

आइये आज से ही संकल्प लें कि आयन्दा यह स्थिति सामने नहीं आए। तभी आप और आपकी संतति स्वस्थ और प्रसन्न रह सकती है और औरों को भी खुश रखने लायक व्यक्तित्व का निर्माण कर सके । 

….बंजारे को घर मिला

दोस्तो मेरे मित्र सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत कहते है की आज कल रचनाओ मे अलंकार का प्रयोग देखने को कम ही मिलता है , उनकी इस बात से कुछ हट तक सहमत मैं भी हूँ । बहुत कोशिश करने के बाद कुछ प्रयोग करने की कोशिश है, ज़रा आप लोग ही बताए की कोशिश कहा तक सफल रही । साथ मे पाठको की जानकारी के लिए अलंकार के बारे मे भी कुछ जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
अलंकार का शाब्दिक अर्थ है, ‘आभूषण। जिस प्रकार सुवर्ण आदि के आभूषणों से शरीर की शोभा बढ़ती है उसी प्रकार काव्य अलंकारों से काव्य की। काव्य में भाषा को शब्दार्थ से सुसज्जित तथा सुन्दर बनाने वाले चमत्कारपूर्ण मनोरंजन ढंग को अलंकार कहते हैं। भारतीय साहित्य में अनुप्रास, उपमा, रूपक, अनन्वय, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, संदेह, अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति आदि प्रमुख अलंकार हैं।

 

अब यह रचना आप के लिए …..

समय पर जब समय मिला

सागर मे भी गगन मिला
मुलाक़ात जब उनसे हुई
मानो बंजारे को घर मिला
खुशखबर जब यह सुना
उनके लिए ही गीत गुना
जिसको सर्च किया मैंने यहाँ वहाँ
वह तो मेरे ही करीब मिला
राजनीति पर जब यह कलम चली
काजनीति की लहर चली
गली मोहल्ले और चौराहे पर
मधुलेश की ही बात चली
कुछ सीखने की जब सीख मिली
नहीं किसी से भीख मिली
जब वह अकेले चले थे
तो नहीं यह भीड़ चली
बेशक कवियों की घनी आबादी है
पर लिखने की कहाँ पाबन्दी है
कभी-कभी तो चर्चा मंच पर भी
निल्को की भी लहर चली
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मधुलेश पाण्डेय निल्को

 

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 धन्यवाद ………!

नहीं था मैं ऐसा……- प्रकाश टाटीवाल

नहीं था मैं ऐसा 
प्रकाश  

क़त्ल हुआ है ऐसा
इस बेजान दिल का
तब से हूँ उदास,
गुमनाम सा
इन गलियों में
वैसे तो दुनिया में कितना गम है
और मेरा गम
मेरा गम उससे भी शायद कही ज्यादा है
ये नहीं है मेरी फितरत
और नहीं है मेरा शौक
की दिल दुखाऊ
किसी सच्चे दिल का
बस डरता हूँ ,
हा डरता हूँ की
ना दुबारा निकल पडू
उन्ही गुमनाम गलियों में
जिसमे दर्द के सिवा और कुछ नहीं …..
वो दर्द में किसी को
नहीं देना चाहता
जो सहा है मेने भी कभी  
बस इसी वजहों से
खीच लेता हूँ अपने कदम पीछे को की ……
         प्रकाश टाटीवाल 

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है (डॉ कुमार विश्वास – Dr Kumar Vishwas)

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को, बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है, या मेरा दिल समझता है
मोहब्बत एक एहसासो की, पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था, कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते है, मेरी आँखों में आंसू है
जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है
समंदर पीर के अंदर है, लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है , इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू, बना लेना मगर सुनले
जो मेरा हो नहीं पाया, वो तेरा हो नहीं सकता
भ्रमर कोई कुमुदनी पर, मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे, सब किस्सा मोहब्बत का
हम किस्से को, हकीक़त में, बदल बैठे तो हंगामा
तुम्हारे पास हूँ लेकिन, जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती , अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मै भूल जाऊँगा, ये मुमकिन है नही लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ
मैं जब भी तेज चलता हूँ ,नज़ारे छूट जाते हैं
कोई जब रूप धरता हूँ , तो साँसे टूट जाती है
मैं रोता हूँ तो आकार लोग कन्धा थपथपाते हैं
मैं हँसता हूँ तो अक्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं
बहुत टुटा बहुत बिखरा, थपेड़े सह नहीं पाया
हवाओं के इशारो पर मगर में बह नहीं पाया
अधुरा अनसुना ही रह गया, ये प्यार का किस्सा

कभी में कह नहीं पाया कभी तुम सुन नहीं पाई

डॉ कुमार विश्वास

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प्रधानमंत्री- श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी


भारत की महान परम्पराओं एवं संस्कारों का पालन करने करने वाले नेता “श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी” को देश के “प्रधानमंत्री” बनने पर बहुत बहुत बधाईया !! – VMW Team

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