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रुद्रपुर – भगवान रुद्र की दूसरी काशी – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

भारत में वैसे तो अनेकानेक मंदिर शिवालय हैं परन्तु उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर में 11वीं सदी में अष्टकोण में बने प्रसिद्ध दुग्धेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी अनूठी विशेषता के लिए विश्वविख्यात है। यहां शिवलिंग जमीन से अपने आप निकला था। इस शिवलिंग का आधार कहां तक है इसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग की लम्बाई पाताल तक है। देवरिया जनपद मुख्यालय से लगभग बीस किमी दूर स्थित रुद्रपुर नगरी को काशी का दर्जा प्राप्त है। यहां भगवान शिव, दुग्धेश्वरनाथ के नाम से जाने जाते है। इस मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त ईट बौद्ध कालीन है। इस क्षेत्र की जनता जनार्दन इनको बाबा दुधनाथ के नाम से भी पुकारती है । उप ज्योतिर्लिंगों की स्थापना के संबंध में पद्म पुराण की निम्न पंक्तियां उल्लिखित हैं- 
खड़ग धारद दक्षिण तस्तीर्ण दुग्धेश्वरमिति ख्याति सर्वपाप:,
 प्राणाशकम यत्र स्नान च दानं च जप: 
पूजा तपस्या सर्वे मक्षयंता यान्ति दुग्धतीर्थ प्रभावत:। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल दधीचि व गर्ग आदि ऋषि-मुनियों की तपस्थली भी है। इतिहास की माने तो रुद्रपुर में रुद्रसेन नामक राजा का किला था और इसी कारण यह रुद्रपुर कहलाया पर मेरे विचार से भगवान रुद्र (शिव) की पुरी (नगरी) होने के कारण इसका नाम रुद्रपुर पड़ा होगा । महाशिवरात्रि के दिन एवं श्रावण मास में यहां भारी भीड़ होती है। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव, ॐ नम: शिवाय और बाबा भोलेनाथ की जयकारों से गुंजायमान रहता है। जनश्रुतियों के अनुसार, मंदिर बनने से पहले यहां घना जंगल था। बताते है कि उस समय दिन में गाय, भैंस चराने के लिए कुछ लोग आया करते थे। आज जहां शिवलिंग है, वहां नित्य प्रतिदिन एक गाय प्राय: आकर खड़ी हो जाती थी तथा उसके थन से अपने आप वहां दूध गिरना शुरू हो जाता था। इस बात की जानकारी धीरे-धीरे तत्कालीन रुद्रपुर नरेश हरी सिंह के कानों तक पहुंची तो उन्होंने वहां खुदाई करवाई। खुदाई में शिवलिंग निकला। राजा ने सोचा कि इस घने जंगल से शिवलिंग को निकाल कर अपने महल के आस-पास मंदिर बनवाकर इसकी स्थापना की जाए।  कहा जाता है कि जैसे-जैसे मजदूर शिवलिंग निकालने के लिए खुदाई करते जाते वैसे-वैसे जमीन में धंसता चला जाता। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। शिवलिंग तो नहीं निकला वहां एक कुआं जरूर बन गया। सोमनाथ के अतिरिक्त सामान्य धरातल से नीचे का शिवलिंग भारत में संभवत: अन्यत्र कहीं नहीं है। बाद में राजा को भगवान शंकर ने स्वप्न में वहीं पर मंदिर स्थापना करने का आदेश दिया। भगवान के आदेश के बाद राजा ने वहां धूमधाम से काशी के विद्धान पंडितों को बुलवाकर भगवान शंकर के इस लिंग की विधिवत स्थापना करवाई। जब तक वह जीवित रहे, भगवान दुग्धेश्वरनाथ की पूजा-अर्चना और श्रावण मास में मेला आयोजित करवाते थे। मंदिर में आज भी भक्तों को लिंग स्पर्श के लिए 14 सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। यहां भगवान का लिंग सदैव भक्तों के दूध और जल के चढ़ावे में डूबा रहता है। कहा जाता है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी जब भारत की यात्रा की थी तब वह देवरिया के रुद्रपुर में भी आए थे। उस समय मंदिर की विशालता एवं धार्मिक महत्व को देखते हुए उन्होंने चीनी भाषा में मंदिर परिसर में ही एक स्थान पर दीवार पर कुछ चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित थी, जो आज भी अस्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है। 

एम के पाण्डेय निल्को

 


यात्रा वर्णन द्वारा एम के पाण्डेय निल्को

घड़ी में करीब सुबह के सात बज रहे थे, डैडी को सिद्धेश उर्फ़ यश के स्कूल में मीटिंग में शामिल होने जाना था तभी उनकी नज़र बालकनी से रोड पर खड़ी अपनी कार पर गई । उन्होंने कहा की, मधुलेश कार बहुत गन्दी हो गई है इतना सुनते ही मधुलेश बाल्टी और मग उठाये और छत से नीचे आ गए । पानी से भरी बाल्टी पूरे मोहल्ले की नज़र में थी कारण एक मात्र की मोहल्ले में कई दिन से पानी कम आ रहा था और मैं इस समय अपनी कार साफ कर रहा था । तभी मंदिर से गुड्डू चाचा लौट रहे थे। अभिवादन हुआ फिर उन्होंने मथुरा जाने का प्रोग्राम बनाया , बोला की कल एकादशी है चलते है गोवर्धन पर्वत की प्रक्रिमा करने । ऑफिस जाना है , बहुत काम है ये दलीले पेश हुई किन्तु उस मुरली वाले के आगे किसकी चलती है । प्रोग्राम फिक्स हो गया मैंने बोला की मैं ऑफिस से 1 बजे आ जाऊँगा। 3 बजे करीब ट्रेन थी बिना आरक्षण की यात्रा करनी थी , मन में संदेह था की सीट मिलेगी या नहीं किन्तु दिल ने कहा देखा जायेगा । ऑफिस में जल्दी जल्दी काम निपटा रहा था तब तक गुड्डू चाचा का फोन बजा बोले की 1 बजे घर आ जाना , स्टेशन भी टाइम पर जाना है । मैंने भी उत्साह पूर्वक बोला की ठीक है ।
एक बज कर 10 मिनट पर मैं अपने घर पर था । सामान पैक और चलने को मन बेकरार । 2 बजते है गुड्डू चाचा शुभम के साथ आये और बोले की नीलेश नहीं चलेगा क्या? नीलेश स्कूल से 2 बजकर 20 मिनट तक घर आता है , इंतज़ार करते तब तक लेट हो जाती । हम तीन लोग घर से निकल पड़े । पेलटफ़ॉर्म पर ट्रेन का इंतज़ार तभी फोन की घंटी बजती है और डैडी कहते है की ट्रेन कब तक आएगी समय है तो बताओ नीलेश भी जायेगा । मैंने भी कहा की अभी लगभग एक घंटा है । थोड़ी ही देर में नीलेश को लेकर डैडी स्टेशन आ गए , मैं उसे लेने के लिए पेलटफ़ॉर्म से बाहर आया और उसे उस जगह पर ले आया जहा गुड्डू चाचा और शुभम खड़े थे ।
जयपुर जंक्शन का पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 , खचाखच लोगो की भीड़ ट्रेन में और पेलटफ़ॉर्म पर , सब लोग एक उम्मीद से आती हुई जयपुर इलाहाबाद एक्सप्रेस को देख रहे है , तभी कान के पास चाय वाला बोलता है – चाय चाय गरमा गर्म चाय । पारा वैसे ही गर्म हो रहा है, जयपुर का तापमान वैसे ही 42 है ऊपर से लोगो भी भीड़ उसमे चार चाँद लगा रही है । जैसे ही ट्रेन पेलटफ़ॉर्म नंबर 2 पर रूकती है सवारिया उतरने और चढ़ने के लिए कोशिश कर रहे है वही पर मैं भी गेट पर हाथ लगा कर नीलेश और शुभम को आगे आने के लिए बुला रहा हूँ । दोनों बालक ट्रेन में बड़ी ही मुश्किल से चढ़ते है और पहले ही सीट पर कब्ज़ा।
चार लोग एक सीट जायज है किन्तु यदि डिब्बा अनारक्षित हो तो ये ठीक नहीं । इसी नियम को पालन करते हुए एक और महिला जो की एक 3 वर्षीय बच्ची के साथ अकेले यात्रा कर रही थी उसको जगह दी माफ़ी चाहूँगा जगह दी नहीं , जगह बनाई । बैठने के लगभग 40 मिनट बाद ट्रेन चली और 5 मिनट में ही दूसरा स्टेशन आ गया जिसका नाम है गांधी नगर जयपुर । भीड़ अपने आप में ही सब कुछ बया कर रही थी फिर भी जनता आज रिकॉर्ड तोड़ने के मूड में दिख रही थी । जैसे तैसे ट्रेन चली , कुछ खड़े, कुछ अड़े और कुछ है बैठे । छोटे छोटे कई स्टेशन निकल रहे थे , ट्रेन अपनी अधितम रफ़्तार में थी । गरमा गर्म हवा मुझे और भी गर्म कर रहा था , मन तो कविता लिखने का था किन्तु शांत वातावरण मिला ही नहीं और कविता गिर गई ठन्डे बस्ते में । दौसा स्टेशन आया , प्यास बढ़ रही थी पर पेलटफ़ॉर्म दूसरी तरफ आया कोई बेचने वाला भी नहीं आया , मन को मनाया की थोड़ी देर रुके  और वो मान भी गया , ट्रेन चल दी भीड़ और बढ़ गई।
मैं  बैठ के बोर हो रहा था तभी दिमाग की बत्ती जली और जेब से अपना स्मार्ट फोन निकाला और बैठे बैठे ही लिखने लगा यात्रा वर्णन । ट्रेन बांदीकुई पहुँच रही है कुछ लोग उतर रहे है कुछ उलटी साइड से चढ़ रहे है । पानी आया , सभी अपनी अपनी प्यास बुझाए । एक छोटा बालक पानी की ज़िद करने लगा किन्तु उसकी दादी के पास पानी नहीं था उस समय । बच्चा कई बार पानी के लिए बोला , रोने की शक्ल भी बनाई । जब ये बात गुड्डू चाचा सुने तो उसे अपनी बोतल दिलवाई जिसमे थोडा पानी बचा था बच्चा आव देखा न ताव मुँह लगाया और पानी ……..गले के नीचे जैसे ही पानी उतरी उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी । ट्रेन में सब लोग बैठने और बैठाने की बात कर रहे है किन्तु ये ठोस कदम उठाये कौन ?
एक सज्जन ऊपर की सीट पर बैठने की ज़िद करने लगे । लाख मना करने पर भी नहीं माने कोशिश की ऊपर चढ़ने की , सफल भी हुए पर एक दो मिनट के लिए ही । पैर फिसल रहा था उनका पर मेरा दिल धड़क रहा था की कही वो मेरे ऊपर न गिर जाये । उनके दिल तक मेरी बात पहुची और वो पूरे 5 मिनट में  नीचे उतर आये । ट्रेन अलवर पहुँच रही थी , मुझे अपना इतिहास याद आ रहा था , आखिर राजस्थान की शुरुआत मैंने यही से की थी । बहुत ही मनोरम और ऐतिहासिक जगह है अलग । महाभारत के कई किस्से यहाँ की माटी में मिलते है । हसन खा मेवात नगर , जैन साहब का मकान, कैलाश पब्लिक स्कूल सब कुछ याद आ रहा था , मन रोम रोम खिल रहा था । तभी अचानक से नज़र दूसरी सीट पर बैठे दो आदमी पर पड़ी उम्र से वो नवयुवक लग रहे थे किन्तु बात वो धर्म की कहानियो पर कह रहे थे , कुछ पुरानी कहानी सुना रहे थे । बगल वाली सीट पर कुछ महिलाये भजन कीर्तन कर रही थी वो भी इस भीड़ में । उनकी इस ईश्वरी प्रेम को मैं प्रणाम करता हूँ जिस पर भीड़ का कोई भी असर नहीं पड़ रहा था ।
एम के पाण्डेय निल्को

गरीब बच्चो के संग लिया जन्मदिन का ‘आनंद’

 बड़े बड़े होटलो और रिहायसी जगह तो अपना जन्मदिन सभी मनाते है किन्तु आर्थिक रूप से कमजोर बच्चो के साथ ये कुछ और स्पेशल हो जाता है । हमारा उदेश्य उन तरसती आखो तक जन्मदिन के मिठाई और केक पहुंचाना है जो कभी ये स्वाद चख न सके । इस तरह से बच्चों की खुशियों को देखकर एक अलग ही आत्म-संतुष्टि का एहसास मिलता है| देवदर्शन डॉट नेट के सहयोग से बच्चो को खाने-पीने की सामग्री व खिलौने दिये गए । एम के पाण्डेय निल्को ने कहा की इस तरह से बच्चों की खुशियों को देखकर एक अलग ही आत्म-संतुष्टि का एहसास मिलता है| अपने बच्चों के जन्मदिन की पार्टी पर हम हजारों और लाखों रूपये खर्च कर देते हैं और कुछ बच्चों, दोस्तों और रिश्तेदारों को हम खिलाते-पिलाते हैं, जो कि इस तरह की पार्टी से उब चुके होते हैं या उनके लिये इतना महत्वपूर्ण नहीं होता , लेकिन यकीन मानिये आप उतनी ख़ुशी नहीं पा सकते जो इन बच्चों को ख़ुशी देकर पायी है| उक्त अवसर पर उमाकांत, रोहित, रवि, सुभाष ज्योति, प्रीती, कृष्ण, दीपक, अनुप, वर्षा, इत्यादि कई लोग मौजूद थे । 

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क्षीरसागर का कछुवा

क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेष शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मी जी उनके पैर दबा रही हैं। विष्णु जी के एक पैर का अंगूठा शैया के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं।
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क्षीरसागर के एक कछुवे ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार कर कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिव्ह्या से स्पर्श कर लूँ तो मेरा मोक्ष हो जायेगा उनकी ओर बढ़ा।
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उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग जी ने देख लिया और कछुवे को भगाने के लिये जोर से फुँफकारा। फुँफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया।
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कुछ समय पश्चात् जब शेष जी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया। इस बार लक्ष्मी देवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया।
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इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों प्रयास किये पर शेष जी और लक्ष्मी माता के कारण उसे कभी सफलता नहीं मिली। यहाँ तक कि सृष्टि की रचना हो गई और सत्युग बीत जाने के बाद त्रेता युग आ गया।
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इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों में जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहा। अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्टि को प्राप्त कर लिया था।
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कछुवे को पता था कि त्रेता युग में वही क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु राम का, वही शेष जी लक्ष्मण का और वही लक्ष्मी देवी सीता के रूप में अवतरित होंगे तथा वनवास के समय उन्हें गंगा पार उतरने की आवश्यकता पड़ेगी। इसीलिये वह भी केवट बन कर वहाँ आ गया था।
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एक युग से भी अधिक काल तक तपस्या करने के कारण उसने प्रभु के सारे मर्म जान लिये थे इसीलिये उसने राम से कहा था कि मैं आपका मर्म जानता हूँ।
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संत श्री तुलसी दास जी भी इस तथ्य को जानते थे इसलिये अपनी चौपाई में केवट के मुख से कहलवाया है कि
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“कहहि तुम्हार मरमु मैं जाना”।
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केवल इतना ही नहीं, इस बार केवट इस अवसर को किसी भी प्रकार हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। उसे याद था कि शेषनाग क्रोध कर के फुँफकारते थे और मैं डर जाता था।
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अबकी बार वे लक्ष्मण के रूप में मुझ पर अपना बाण भी चला सकते हैं पर इस बार उसने अपने भय को त्याग दिया था, लक्ष्मण के तीर से मर जाना उसे स्वीकार था पर इस अवसर को खो देना नहीं।
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इसीलिये विद्वान संत श्री तुलसी दास जी ने लिखा है –
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पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव
न नाथ उरराई चहौं।
मोहि राम राउरि आन
दसरथ सपथ सब साची कहौं॥
बरु तीर मारहु लखनु पै
जब लगि न पाय पखारिहौं।
तब लगि न तुलसीदास
नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥
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( हे नाथ ! मैं चरणकमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे उतराई भी नहीं चाहता। हे राम ! मुझे आपकी दुहाई और दशरथ जी की सौगंध है, मैं आपसे बिल्कुल सच कह रहा हूँ। भले ही लक्ष्मण जी मुझे तीर मार दें, पर जब तक मैं आपके पैरों को पखार नहीं लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ ! हे कृपालु ! मैं पार नहीं उतारूँगा। )
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तुलसीदास जी आगे और लिखते हैं –
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सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥
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केवट के प्रेम से लपेटे हुये अटपटे वचन को सुन कर करुणा के धाम श्री रामचन्द्र जी जानकी जी और लक्ष्मण जी की ओर देख कर हँसे। जैसे वे उनसे पूछ रहे हैं कहो अब क्या करूँ, उस समय तो केवल अँगूठे को स्पर्श करना चाहता था और तुम लोग इसे भगा देते थे पर अब तो यह दोनों पैर माँग रहा है।
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केवट बहुत चतुर था। उसने अपने साथ ही साथ अपने परिवार और पितरों को भी मोक्ष प्रदान करवा दिया। तुलसी दास जी लिखते हैं –
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पद पखारि जलु पान
करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि
पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥
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चरणों को धोकर पूरे परिवार सहित उस चरणामृत का पान करके उसी जल से पितरों का तर्पण करके अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्र को गंगा के पार ले गया।
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  श्री राम जय राम जय जय राम

कृष्ण जन्माष्टमी

आदरणीय मित्रो ;नमस्कार;मेरी पहली भक्ति रचना  “कान्हा ओं कान्हा” आप सभी को सौंप रहा हूँ । मुझे उम्मीद है कि  मेरी ये छोटी सी कोशिश आप सभी को जरुर पसंद आएँगी,  रचना   कैसी लगी पढ़कर बताईये कृपया अपने भावपूर्ण कमेंट से मेरा हौसला बढाए. कृपया अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा. आपकी राय मुझे हमेशा कुछ नया लिखने की प्रेरणा देती है और आपकी राय निश्चिंत ही मेरे लिए अमूल्य निधि है |


कान्हा ओं कान्हा



कैसा हो गया जमाना
लगता है अब फिर पड़ेगा
तुम्हे धरती पे आना
कान्हा ओं कान्हा….!
सब कुछ तुम देख रहे हो
फिर भी नहीं कुछ बोल रहे हो
पर आज तुम्हे पड़ेगा बताना ….!
बासुरी की धुन पर
तुम सबको नचाते
पता नहीं क्या – क्या
तुम रास रचाते …!
दिल किसी का
तुम न दुखाते
फिर क्यों ऐसा
दिन दिखाते ….!
पर ये जो कुछ भी
हो रहा है
तुम सब यह देख रहे हो
पर मौन का कारण
तुम्हे पड़ेगा बताना …!
दुःख तो बहुत है
लोग भी बहुत है
पर तुम बिन
कोई नहीं है…!
एक बार फिर आ जाओ
अपने दर्शन करा जावो
‘निल्को’ की यही चाह
पूरा करा जाओ …!
जब तक तुम न आओगे
मुझे अकेला पाओगे
कैसे मुझे समझोगे
जब तुम्हे हम बुलायेगे …! 


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एम के पाण्डेय ‘निल्को’

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दशहरा : क्या रावण सचमुच मे मर गया ?

 दशहरे पर कल पूरे देश में अच्छाई पर बुराई की विजय के रूप में भगवान राम की पूजा होगी, दशहरा यानी विजय पर्व। दशहरा यानी न्याय और नैतिकता का पर्व। दशहरा यानी सत्य और शक्ति का पर्व। यह पर्व हमें संदेश देता है कि अन्याय और अनैतिकता का दमन हर रूप में सुनिश्चित है। चाहे दुनिया भर की शक्ति और सिद्धियों से आप संपन्न हों लेकिन सामाजिक गरिमा के विरूद्ध किए गए आचरण से आपका विनाश तय है।

कलयुग की तुलना में त्रेता युग हर मामले में बेहतर कहा जाता है और आखिर हो भी क्यों नहीं, उस समय कम से कम इस बात का सुकून था कि रावण एक ही था और उसे एक राम ने ठिकाने लगा दिया लेकिन आज के परिवेश में हालात बहुत पेचीदा हैं। अब तो गली-गली में रावण हैं। इन्हें मारने के लिए इतने राम कहां से लाएं?

पब्लिक जो हर बार रावण दहन देखने जाती है और खुशी-खुशी इस उम्मीद से घर लौटती है कि चलो रावण मर गया लेकिन हर बार होता है उसकी उम्मीदों पर …….? हम चाहे कितने ही रावण जला लें लेकिन हर कोने में कुसंस्कार और अमर्यादा के विराट रावण रोज पनप रहे हैं। रोज सीता के देश की कितनी ही ‘सीता’ नामधारी सरेआम उठा ली जाती है और संस्कृति के तमाम ठेकेदार रावणों के खेमें में पार्टियाँ आयोजित करते नजर आते हैं। आज देश में कहाँ जलता है असली रावण? जलती है यहाँ सिर्फ मासूम सीताएँ। जब तक सही ‘रावण’ को पहचान कर सही ‘समय’ पर जलाया नहीं जाता, कैसे सार्थक होगा, शक्ति पूजा के नौ दिनों के बाद आया यह दसवाँ दिन जिस पर माँ सीता की अस्मिता जीती थीं। भगवान राम की दृढ़ मर्यादा जीती थीं। कब जलेंगें इस देश में असली रावण और कब जीतेगीं हर ‘सीता’? कब तक जलेंगे रावण के नकली पुतले और कब बंद होगा दहेज व ‘इज्जत’ के नाम पर कोमल ‘सीताओं’ का दहन?

दशहरा कहो या विजयदशमी लेकिन रावण की पराजय कहीं दिखाई नहीं देती। जब तक सही रावण को पहचान कर सही समय पर जलाया नहीं जलाया नहीं जाता, व्यर्थ है, शक्ति पूजा के नौ दिनों के बाद आया यह दसवां दिन जिस पर असत्य पर सत्य की विजय हुई थी। भगवान राम की दृढ़ मर्यादा जीती थीं।

आज कहीं भी असली रावण नहीं जलते। वे तो अपने पुतले की तरह लगातार ऊंचे हो रहे हैं। होड़ हो रही है तेरा रावण 67 फुट का तो उसका 80 का फुट का परंतु मेरा रावण तो 100 फुट का। पुतलों की ऊंचाई की होड़ हो रही है जबकि राम जैसे चरित्र का कहीं अता-पता नहीं है। कब जलेंगे असली रावण और कब जीतेगा साधनहीन, वनवासी सरल राम और उसकी सेना। आखिर क्यों-

झूठ की जय-जयकार है सच पर सौ इल्जाम।

रावण का कद बढ़ रहा, सिकुड़ रहे श्रीराम॥

एम के पाण्डेय निल्को

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