Tag Archives: आरक्षण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को VMW Team का खुला पत्र

सेवा में ,
        माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी,
              प्रधानमंत्री ,
              भारत सरकार ,
                         नई दिल्ली

विषय- भारत में आरक्षण को   समाप्त किये जाने एवं पदोन्नति में आरक्षण हेतु 117वें संबिधान संशोधन बिल को निरस्त किये जाने विषयक |

  माननीय महोदय ,
      सौभाग्य की बात है कि बहुत समय बाद भारत में आपके कुशल नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की केन्द्रीय सरकार विद्यमान है।
आपके मेक इन इंडिया , स्वच्छता अभियान व नोट बंदी जैसी कई योजनाओं का हम ह्रदय से पूर्ण समर्थन करते हैं ।
*माननीय महोदय* ,
जैसा कि आप जानते हैं कि समाज के पिछडे वर्गों के लिये संविधान में मात्र *दस वर्षों के लिये आरक्षण* की व्यवस्था की गयी थी, किन्तु जातिवादी व निहित कारणों से जाति आधारित आरक्षण की अवधि व क्रीमीलेयर की सीमा को बारंबार बिना समीचीन समीक्षा के बढाया जाता रहा है ,
जिसे कि 10–  10 वर्ष करते करते आज 67 वर्ष पूरे हो गए हैं ।
*आज तक ऐसे आरक्षण प्राप्त डॉक्टर, इंजीनियर , प्रोफेसर , शिक्षक, कर्मचारी किसी ने नहीं कहा कि अब वह दलित या पिछड़ा नहीं रहा व अब उसे जातिगत आरक्षण की जरुरत नहीं है।*
  *इससे सिद्ध होता है कि आरक्षण का आधार पिछड़ा वर्ग या समूह के बजाय जाति किये जाने से इन 67 सालों में कोई लाभ नहीं हुआ है।*
महोदय ,
*इस जाति आरक्षण का लाभ जहां कुछ खास लोग परिवार समेत पीढी दर पीढी लेते जा रहें हैं वहीं वे इसे निम्नतम स्तर वाले अपने ही जरूरतमंदों लोगों तक भी नहीं पहुंचने दे रहे हैं। अन्यथा इन 67 वर्षों में हर आरक्षित वर्ग के व्यक्ति तक इसका लाभ पहुँच चुका होता।*
*ऐसे तबके को वे केवल अपने बार बार लाभ हेतु संख्या या गिनती तक ही सीमित कर दे रहे हैं।*
महोदय,
*गरीबी जाती देखकर नहीं आती*
*आरक्षण का आधार जाति किये जाने से जहाँ सामान्य वर्ग के तमाम निर्धन व जरूरतमंद युवा बेरोजगार व हतोत्साहित हैं , कर्मचारी कुंठित व उत्साहहीन हो रहे हैं,*
*वहीं समाज में जातिवाद का जहर बड़ी तेज़ी से बढ़ता जा रहा है।*
  अत: आपसे निवेदन है कि राष्ट्र के समुत्थान व विकास के लिये संविधान में संशोधन करते हुये आरक्षण को समाप्त करने का कष्ट करेंगे ।
किसी भी जाति – धर्म के असल जरूरतमंद निर्धन व्यक्ति को *आरक्षण नहीं बल्कि संरक्षण* देना सरकार को   सुनिश्चित करना चाहिए ।

*आरक्षण को पूर्ण रूप से समाप्त करने से पहले अगर वंचित वर्ग तक इसका ईमानदारी से वास्तव में सरकार लाभ पहुँचाना चाहती है तो इस आरक्षण को एक परिवार से एक ही व्यक्ति , केवल बिना विशेष योग्यता / कार्यकुशलता वाली समूह ग व घ की नौकरियों में मूल नियुक्ति के समय ही दिया जा सकता है।*

*आयकर की सीमा में आने वाले व्यक्ति के परिवार को आरक्षण से वंचित किया जाना चाहिये ताकि राष्ट्र के बहुमूल्य संसाधनों का सदुपयोग सुनिश्चित हो सके।*

*पदोन्नति में आरक्षण तो पूर्णत: बंद कराया ही जाना चाहिये जिससे कि योग्यता, कार्यकुशलता व वरिष्ठता का निरादर न हो।*

   आशा है कि महोदय राष्ट्र व आमजन के हित में इन सुझावों पर ध्यान देते हुये समुचित कार्यवाही करने व इस हेतु जन जागरण अभियान प्रारंभ कर मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने  का कष्ट करेंगे |

🙏 *विशेष निवेदन /आग्रह*🙏
*जन जागृति* के लिए आपको सिर्फ 10 लोगो को ये मेसेज फॉरवर्ड करना है और वो 10 लोग भी दूसरे 10 लोगों को ये मेसेज करें ।
इस प्रकार
1 = 10 लोग
यह 10 लोग अन्य 10 लोगों को मेसेज करेंगे
इस प्रकार :-
10 x10 = 100
100×10=1000
1000×10=10000
10000×10=100000
100000×10=1000000
1000000×10=10000000
10000000×10=100000000
100000000×10=1000000000
                            (100 करोड़ )
बस आपको तो एक कड़ी जोड़नी है देखते ही देखते सिर्फ आठ steps में पूरा देश जुड़ जायेगा।

VMW Team – आरक्षण की मांग करे

आओ मिलकर आग लगाएं,नित नित नूतन स्वांग करें,
पौरुष की नीलामी कर दें,आरक्षण की मांग करें,

पहले से हम बंटे हुए हैं,और अधिक बंट जाएँ हम,
100 करोड़ हिन्दू है,मिलकर इक दूजे को खाएं हम,

देश मरे भूखा चाहे पर अपना पेट भराओ जी,
शर्माओ मत,भारत माँ के बाल नोचने आओ जी,

तेरा हिस्सा मेरा हिस्सा,किस्सा बहुत पुराना है,
हिस्से की रस्साकसियों में भूल नही ये जाना है,

याद करो ज़मीन के हिस्सों पर जब हम टकराते थे,
गज़नी कासिम बाबर मौका पाते ही घुस आते थे

अब हम लड़ने आये हैं आरक्षण वाली रोटी पर,
जैसे कुत्ते झगड़ रहे हों कटी गाय की बोटी पर,

हमने कलम किताब लगन को दूर बहुत ही फेंका है,
नाकारों को खीर खिलाना संविधान का ठेका है,

मैं भी पिछड़ा,मैं भी पिछड़ा,कह कर बनो भिखारी जी,
ठाकुर पंडित बनिया सब के सब कर लो तैयारी जी,

जब पटेल के कुनबों की थाली खाली हो सकती है,
कई राजपूतों के घर भी कंगाली हो सकती है,

बनिए का बेटा रिक्शे की मज़दूरी कर सकता है,
और किसी वामन का बेटा भूखा भी मर सकता है,

आओ इन्ही बहानों को लेकर,सड़कों पर टूट पड़ो,
अपनी अपनी बिरादरी का झंडा लेकर छूट पड़ो,

शर्म करो,हिन्दू बनते हो,नस्लें तुम पर थूंकेंगी,
बंटे हुए हो जाति पंथ में,ये ज्वालायें फूकेंगी,

मैं पटेल हूँ मैं गुर्जर हूँ,लड़ते रहिये शानों से,
फिर से तुम जूते खाओगे गजनी की संतानो से,

ऐसे ही हिन्दू समाज के कतरे कतरे कर डालो,
संविधान को छलनी कर के,गोबर इसमें भर डालो,

राम राम करते इक दिन तुम अस्सलाम हो जाओगे,
बंटने पर ही अड़े रहे तो फिर गुलाम हो जाओगे,

मुझे आरक्षण नहीं चाहिए

मैं ब्राह्मण हूँ और मुझे आरक्षण नहीं चाहिए क्योंकि :

1. मै निकम्मा और कामचोर नहीं हूँ मुझे अपनी मेहनत और काबिलियत पर पूरा भरोसा है ।

2. मेरा कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है और मै इस बात में विश्वास रखता हूँ की प्रतिभा के बल पर ही आगे बढ़ना चाहिए ।

3. मै चाहता हूँ की योग्य व्यक्ति को ही आगे बढ़ने का हक है और उसे उसका हक मिलना चाहिए । किसी का हक मार कर उसकी रोटी छीनने में मेरा विश्वास नहीं है।

4. मै देश की तरक्की में योगदान देना चाहता हूँ इसलिए देशद्रोहियों की तरह तोड़ फोड़ आगजनी जनहानि करके अपनी नाजायज मांग मनवाने में विश्वास नहीं रखता ।

5. मै खुद की समझ से काम करने में विश्वास रखता हूँ । कोई भी ऐरा गैरा मुझे धर्म और जाति के नाम पर उकसा दे ऐसा मुर्ख नहीं हूँ मै।

6. आरक्षण को मै जबरदस्ती मांगी गई भीख से अधिक कुछ नहीं समझता हूँ। इस तरह की खैरात लेकर मै अपने आप को सारी जिंदगी के लिए नाकाबिल नहीं बना सकता।

क्या आप भी अपने समुदाय से ये आशा रखते है ? क्या आप चाहेंगे की आपके योग्य बच्चे frustration में आकर कोई गलत कदम उठाये? यदि हाँ तो क्या हम इस धारणा को आगे बढ़ाने में सहयोग करेंगे ?
सादर
एम के पाण्डेय निल्को
http://www.vmwteam.blogspot.in

Whats App से प्राप्त – आरक्षण विरोध

हे युवाओं ! उठो और बहिष्कार कर दो ,

आरक्षण के उत्थान को तुम खाक़ कर दो ,


आरक्षण तो स्वार्थ है नेताओं का ,

जो कर देते हैं खंडन हम युवाओं का,

बना लेते हैं सरकार हमारे वोट से ,

और घोट देते हैं गला विश्वासों का,


नेताओं की इस तृष्णा को ख़त्म कर दो,

वोट राजनीति को संसद में बंद कर दो ,

हमारा और दोहन हो ना पाएगा

तुम ये नारा और भी बुलंद कर दो ,


वक्त है यंही हमारी एकजुटता का,

अपने विरोध स्वर के सदिश प्रसारता का,

राज रक्षक वहीं जो बन बैठे हैं भक्षक ,

समय हैं यंही उनके सर्वानाषता का ,


वोट नीति की गली आज अन्धकार कर दो ,

जोश और अटलता का आज तुम हुंकार भर दो ,

हे युवाओं ! उठो और बहिष्कार कर दो,

आरक्षण के उत्थान को तुम खाक़ कर दो 
(एक अजनबी के मैसेज से प्राप्त )
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एतना घोटाला की बाद भी देश चल रहल बा, इ सब कुछ पुण्यप्रतापी लोग के देन बा।

मनबोध मास्टर का नेता नाम से ही घिन हो गइल बा। एतना घिन जइसे नेता ना नेटा(पोंटा) होखें। घोटाला पर घोटाला होत देख बोल पड़लें- ‘ साग घोटाला, पात घोटाला। सुबह-शाम और रात घोटाला।
पाथर के हाथी बा खइलसि, 15 अरब के डाढ़ा।
 मंत्री जी लोग गटक रहल बा, घोटाला के काढ़ा।। 
लोकायुक्त किये खुलासा, बात कहत हैं पक्की।
 दो सौ जने आरोपित भइलें, कब पिसिहें जेल में चक्की।। 



…..और जब वो बड़ी हो जाएं तो सत्ता में बैठे मठाधीश ही सबसे पहले उनको भोग की वस्तु बना डालते हैं।

पूरा देश लक्ष्मी की पूजा करता है दीपावली पर। दुर्गा की पूजा करता है नवरात्रा में, नौ दिन। सरकारें अरबों रूपए चाट रही हैं- ‘बेटी बचाओ’,  ’कन्या भू्रण’, ‘बेटी पढ़ाओ’, ‘शादी करवाओ’,  ’उनको मुफ्त शिक्षा दो’, ‘किताबें, यूनिफॉर्म, साइकिलें बांटों।’ और जब वो बड़ी हो जाएं तो सत्ता में बैठे मठाधीश ही सबसे पहले उनको भोग की वस्तु बना डालते हैं।
राजस्थान का भंवरीदेवी कांड तो एक मंत्री और विधायक का कारनामा निकला। ऎसे ही कारनामे में रामलाल जाट ने तो मंत्री पद खोया। भोपाल का शहला मसूद कांड, एक पाष्ाüद का हत्याकांड मध्यप्रदेश सरकार के मुंह पर आज भी कालिख पोत रहे हैं। दिल्ली में एक बस में गैंग रेप हुआ तो पूरे देश में भूचाल आ गया।
यहां तो सत्ता के मद में आए दिन बलात्कार, हत्याएं, गैंग रेप होते ही रहते हैं। मध्यप्रदेश में एक सप्ताह में 4 सामूहिक बलात्कार और 28 बलात्कार की घटनाएं हुई हैं। इस हालात में प्रदेश के गृह मंत्री को तो अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अघिकार ही नहीं है। ऎसी ही कालिख अन्य प्रदेशों में भी पुत रही है। मुझे तो ऎसे प्रदेश और देश में जीने में ही शर्म आ रही है। इन सत्ताधारियों ने पुलिस के भी हाथ काट रखे हैं। माफिया जाति का पोषण भी इनकी काली कमाई कर रही है।
दिल्ली तो सरताज है। बड़े नेता और नेत्रियों का इतिहास माफिया के साथ हर पन्ने पर लिखा है। नैना साहनी का काला दिन आज भी पढ़ा जा रहा है। सत्ता के दरिंदें गली-गली में फैल गए। खुले आम किस्मत के बदले अस्मत मांगने लग गए। हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश को तो इस चक्कर में त्यागपत्र देना पड़ा था।
सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि सत्ताधारी ही इनको सजा दिलाने के बजाए बचाने में जुट जाते हैं।  समझ में नहीं आता कि असुर कौन है? अपराधी या इनको बचाने वाले सत्ता के शीर्ष पुरूष्ा! एक को शर्म नहीं आती, बल्कि किसी एक को बचाने के लिए पुलिस अथवा सीबीआई के जरिए दूसरे को फंसा देते हैं। कहानी को ही तोड़-मरोड़ कर दूसरा रूप दे देते हैं। हत्या का श्रेय, गैंग रेप का श्रेय इनको भी जाता है। ये ही अपराध की प्रतिष्ठा करने के लिए जिम्मेदार हैं। जो न्यायाधीश जान-बूझकर आंखें बंद कर लेते हैं, ईश्वर उनको कभी नहीं छोड़ेगा।
दिल्ली जैसी घटना कहीं नहीं होनी चाहिए पर मीडिया को भी समाज और देश का मुंह काला करने वाली ऎसी हर घटना पर आक्रामक दिखना चाहिए। उसे किसी भी राज्य अथवा छोटे शहर-गांव में होने वाली घटना को हाशिए पर नहीं डाल देना चाहिए। जनता को भी उनसे वैसे ही जुड़ना चाहिए, जुलूस निकालने चाहिए जैसे दिल्ली की घटना पर निकले। दिल्ली और प्रदेशों के लोगों में इतना बड़ा भेद क्यों? क्या वहां का लोकतंत्र भिन्न हैं? क्या मध्यप्रदेश में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका (विशेषकर पुलिस)  भिन्न है? क्या लोगों की संस्कृति और मूल्य भिन्न हैं? क्यों दिल्ली के बाद की घटनाओं को नकारा जा रहा है? एक ही सप्ताह में चार गैंग रेप! सामंतशाही भी शर्मसार हो जाएगी।
जनता भी और मीडिया भी अभी तक दिल्ली की ही घटना से उद्वेलित है। इन चारों का तो जैसे कोई मां-बाप ही नहीं है।  किसने मंुह बंद किया मीडिया का? कटनी के गैंगरेप का आरोपी तो एक भाजपा नेता का बेटा था। क्या इनको रोजमर्रा की साधारण घटना मानकर छोड़ देना चाहिए? छत्तीसगढ़ में तो महिला पुलिस अघिकारी का यौन शोष्ाण प्रमाणित होने के बाद भी पुलिस ने सेना के अघिकारी को ही बचाया। लगता है कि इनमें से किसी घर में बहन-बेटियां नहीं हैं। एक तरफ ‘बेटी बचाओ’ और दूसरी ओर ‘बेटी को नोंच खाओ।’ डूब मरो!

गुलाब कोठारी (http://gulabkothari.wordpress.com/category/special-articles/)

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गणतंत्र दिवस के अवसर पर समस्त देशवासियों को ढेर सारी शुभकामनाएं !

समस्त देशवासियों को गणतंत्र दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं। गणतंत्र दिवस के मौके पर हमें देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने और भारत को विश्व का सिरमौर बनाने का संकल्प लेना चाहिए।
देश के 64वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।
देश की तरक्की के लिए हम लगातार अपना श्रेष्ठ दें, यही कामना।
जय हिन्‍द जय हिन्‍द की सेना
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Congres’s Shivir in Jaipur


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भारत के महान संत स्वामी विवेकानंद की आज जन्मतिथि है

भारत के महान संत स्वामी विवेकानंद की आज जन्मतिथि है. दुनियां भर के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत रहे स्वामी विवेकानंद आज भी बहुत से लोगों के आदर्श हैं. उनके जन्मदिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करें.
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आईआईटी-सामंजस्यकारी और संतुलित

केंद्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले की साझा एकल परीक्षा और आईआईटी की स्वायत्तता का हल निकल आने से बड़ी दुविधा दूर हो गई है। इसके लिए आम राय से जो नया फामरूला बना है, उसमें संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) और शीर्ष संस्थानों की स्वायत्तता, दोनों का समावेश किया गया है। इसलिए यह सामंजस्यकारी और संतुलित लगता है। इसी से उम्मीद है कि इसके पक्षकारों में से एक एनआईटी भी चार जुलाई को होने वाली बैठक में अपनी मुहर लगा देगा। यह एक महीने से भी ज्यादा समय से चले आ रहे विवाद का लोकतांत्रिक तरीके से समापन होना माना जाएगा। इस विवाद के मूल में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की वह महत्त्वाकांक्षी नीतियां हैं, जो शिक्षा-परीक्षा के क्षेत्र में बुनियादी बदलाव लाने के सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। 10 वीं तथा 12 वीं की पढ़ाई और परीक्षा पद्धति में अपेक्षित सुधार के बाद इंजीनियरिंग-मेडिकल की बहुस्तरीय परीक्षाओं को नियंत्रित करना था। लेकिन छात्रों को सिर्फ जरूरी परीक्षाओं में बैठाने और उनका स्वरूप एकदेशीय करने की मंशा में शीर्ष संस्थानों की स्वाभाविक स्तरीयता के निर्वाह का ख्याल नहीं रखा गया। कानपुर और नई दिल्ली के भारतीय प्रौद्योगिक संस्थानों को जेईई का सरकारी नजरिया पांच दशकों में अर्जित उनकी विशिष्टता तथा स्वायत्तता पर हस्तक्षेप लगा। आज अगर भारतीय मेधा की विदेशों में पूछ है तो आईआईटी में दाखिले की विशिष्ट परीक्षा पद्धति, उनके शिक्षक और स्वायत्त संचालन व्यवस्था का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। यह प्रतिष्ठा उन प्रक्रियाओं में समय के मुताबिक संशोधनों से बरकरार रह सकती है। इस पर अमल के बजाय आईआईटी को सर्वशिक्षा अभियान के डंडे से नहीं हांका जा सकता। शिक्षण क्षेत्र में भले इसे एक असमाजवादी दृष्टिकोण माना जाए लेकिन खास मेधा के साथ खास व्यवहार करना ही पड़ेगा। प्रधानमंत्री ने आईआईटी और उनके पूर्व छात्रों की मांगों पर सहमति जताते हुए सरकारी हस्तक्षेप न होने देने का उचित ही आश्वासन दिया था। नये फामरूले में पहली बार विभिन्न बोर्ड परीक्षाओं में छात्रों के हासिल अंकों को भी शामिल किया गया है। शीर्ष के 20 फीसद तक पर्सेटाइल वाले छात्रों को आईआईटी में दाखिले के काबिल माना जाएगा। इससे उनमें स्कूल स्तर पर भी बेहतर प्रदर्शन की जिजीविषा बनेगी। एआईईईई को इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि सफल छात्रों का प्रदर्शन स्कूलों में कैसा रहा है? श्रेणीबद्धता की रक्षा पर अड़े और इसे पाने में सफल रहे आईआईटी जेईई एडवांस की परीक्षा में उन खांचों को कैसे तोड़ पाएंगे जो 20 वीं सदी के अपेक्षाकृत तंग मॉडल बने हुए हैं, यह भी देखना है। 21 वीं सदी में बहुआयामी ढांचा बनाने की जरूरत है। अक्सर देखा गया है कि इन संस्थानों में दाखिला लेने वाले बहुत से छात्रों में इंजीनियरिंग की स्वाभाविक चाह नहीं होती। वे किसी न किसी दबाव में यहां चले आते हैं। कक्षाओं में अपने को असहज महसूस करते हैं जबकि यहां भी दाखिला वही गणित, भौतिकी और रसायन विषयों के लब्धांक के आधार पर होता है। यह कोचिंग संस्थानों के फलने-फूलने का रास्ता खुला छोड़ता है, जिसे नारायण मूर्ति ‘रट्टामार प्रतिभाओं के उत्पादक’ बताते हुए इंजीनियरिंग की स्वाभाविक मेधा की शिनाख्त में अड़ंगा बताते हैं। लिहाजा, परीक्षा के परंपरागत विषय और तरीके अंतरराष्ट्रीय मानकों की मांग करते हैं।

लोगों की नौटंकी और बहकावे पर मत जाओ… और…. "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं"

Siddharth Singh

हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। VMW Team के सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत की एक पेशकश …..
 इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है।
आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: ‘आर्य’ शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी ‘सिन्धु’ नदी को ‘हिन्दु’ कहते थे क्योंकि वे ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे। भारत से बाहर ‘हिन्दू’ शब्द का उल्लेख ‘अवेस्ता’ में मिलता है। विनोबा जी के अनुसार हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा-प्रियता है
हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।
एक अन्य श्लोक में कहा गया है
ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:
गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।
ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है।
चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू’ शब्द इन्दु’ जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु’ को इन्तु’ कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को ‘इन्तु’ या ‘हिन्दु’ कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही ‘हिन्दू’ शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है।
भारत भूमि में अनेक ऋषि, सन्त और द्रष्टा उत्पन्न हुए हैं। उनके द्वारा प्रकट किये गये विचार जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी उनके विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं और कभी परस्पर विरोधी। हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है।
हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।
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आरक्षण का बंटवारा—- दबे पांव

A.K.Pandey

देश में आजकल मानों सांप सूंघा हुआ है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें और देश के विभिन्न उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय अपनी-अपनी भाषा में आरक्षण के मुद्दे पर कुछ न कुछ कह रहे हैं। एक ओर मूल आरक्षण का मुद्दा भी रस्साकसी का विषय बना हुआ है। एक लम्बी सूची है जातियों की, जो आरक्षण का लाभ प्राप्त करना चाहती हैं। दूसरी ओर उच्चतम न्यायालय का फैसला पचास प्रतिशत से अधिक पर रोक लगा रहा है। हर प्रदेश में यह प्रतिशत भी अलग-अलग है। एक जाति भिन्न-भिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न दर्जा प्राप्त है।

अब पदोन्नति में आरक्षण का मुद्दा नए स्वरूप में उभरकर आ रहा है। सरकारें भी विचलित हैं और न्याय पाने वाले भी। चूंकि आरक्षण का आधार गरीबी न होकर जातियां हैं, अत: जातियों के बीच परम्परागत वैमनस्यता भी अपनी भूमिका निभा रही है। जातियों के इतिहास ने नई भूमिका पैदा कर दी कि अमुक जाति 1500 वर्षो से है या 4000 वर्षो से।
किसी भी एक जाति का नाम सूची में जोड़ते ही एक प्रश्न उठ जाता है कि इस जाति से कमजोर मान लें कि बीस जातियां और हंै, तब उनका नाम क्यों नहीं जुड़ना चाहिए? के न्द्र सरकार के पास नवीं सूची में जोड़ने के लिए जातियों की लम्बी सूची तैयार हो गई है। किन्तु इनको आरक्षण कहां से दिया जाए।
पचास प्रतिशत के बाद उच्चतम न्यायालय नहीं छोड़ेगा। जिनको पहले जितना मिल चुका है, वे कम करने को राजी क्यों होंगे। खैर यह लड़ाई आंकड़ो की है, कानून की है और सरकारों के लिए मनोरंजन मात्र है। उनको न लोगों से मतलब, न जातियों के हानि-लाभ से मतलब। उनके लिए तो बस वोट ही एकमात्र आधार है। अब यह कहा नहीं जा सकता कि यह कार्ड भी कितने साल काम आएगा। नई पीढ़ी जागरूक है और प्रतिक्रियावादी भी। जैसे कांग्रेस का मुस्लिम कार्ड फेल हो गया, भाजपा का हिन्दू कार्ड बदरंग हो गया, वैसे ही आरक्षण का कार्ड भी लम्बा चलने वाला नहीं है। भले ही हमारे नेताओं ने इसे दस वर्ष से बढ़ाकर साठ वर्ष पहुंचा दिया होगा। आगे मार्ग कठिन है। राजनेता यदि नहीं भी मानेंगे, तो नई पीढ़ी मनवा देगी। कैसे भले लोग थे जो इसे यहां तक ले आए! कैसे भले लोगों ने नाप-तौलकर देश को बराबर के दो भागों में बांट दिया। सन् 1947 के बंटवारे में तो ऎसे लोग नहीं थे। जो अलग होने को सहमत थे, अलग हो गए। हम हमारे घर में, वो उनके घर में। जिस तरह के देश विरोधी नारे लगते थे, अब ठंडे पड़ गए। किन्तु इस देश में आरक्षण का जो बंटवारा जानबूझकर किया गया है, उसके नारों की गूंज कई पीढियों तक रहेगी। दो धडे तो देश के हो चुके हैं, किन्तु पाकिस्तान की तरह अलग-अलग नहीं रह रहे। साथ-साथ रह रहे हैं। एक ही गांव, एक ही मोहल्ले में रह रहे हैं। एक-दूसरे को प्रतिक्षण नुकसान करने पर तुलेे हुए हैं। यह साथ जीने वालों की शैली नहीं है। बाहर के शत्रु से लड़ा जा सकता है, भितरघात से बच पाना कठिन है। इस वातावरण के रहते किसी अन्य शत्रु की देश को आवश्यकता ही नहीं है। एक वातावरण विशेष से मुक्ति दिलाने के लिए आरक्षण की सुविधा संविधान निर्माताओं ने दी थी। साठ साल में हम देश का स्पष्ट विभाजन देख रहे हैं।
आज हम किसी भी पाकिस्तानी के साथ कुछ समय रह सकते हैं, किन्तु आरक्षित और गैर आरक्षित वर्ग साथ नहीं रह सकता। ऊपर से भले कुछ भी दिखाई दे, पिछले सालों की फाइलों का इस दृष्टि से आकलन करें, सरकार में दोनों धड़ों की भूमिका देखें, समाज व्यवस्था में जो बदलाव आया है वह सब एक ही संदेश देते हैं- “आरक्षण ने देश के दो टुकड़े कर दिए, कानून सम्मत 50-50।” ये कभी सौहाद्रüपूर्ण ढंग से साथ नहीं रहेंगे। आने वाली पीढियों में आरक्षित वर्ग द्वितीय श्रेणी का नागरिक होकर अल्पसंख्यकों की तरह मुख्य धारा से बाहर हो जाएगा।
सरकार के बाहर, सामाजिक परिदृश्य में, दूरियां बढ़ने लग गई हैं, बढ़ती ही जाएगी। आरक्षित वर्ग शनै:-शनै: अपने समुदायों में सिमटकर अधिक असुरक्षित होते रहेंगे। तब यह वोट मांगने वाला कहीं दिखाई नहीं देगा। दोनों वर्ग एक-दूसरे को आगे बढ़ने से रोकते रहेंगे। आपस में गाली-गलौज तो चालू आहे। तब देश हमारे हाथ में कैसे सुरक्षित रह पाएगा? सरकारें तो विदेशियों को बुला-बुलाकर आज भी बेचने में कसर नहीं छोड़ रहीं। रोके कौन? इसका एक ही उत्तर है- समान नागरिकता, समान अवसर, समान अधिकार। देश नहीं झेल पाएगा आरक्षण की मार।

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इस आरक्षण ने..

 रविन्द्र नाथ यादव 

देश की किसी भी राजनीतक पार्टी के किसी भी नेता को आरक्षण के बारे बोलने पर उसकी जुबान को लकवा मर जाता है  उसे सिर्फ अपने राजनीतक भविष की चिंता है  पर देश की चिता नहीं  इस के लिए इन पर कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए  ६० सालों में देश का सत्य नाश के के रख दिया
है इस आरक्षण ने..

सबसे ज्‍यादा चर्चित एवं विवादास्‍पद विषय आरक्षण पर समग्रता से नजर डालने की जररत हें मेरी नजर में यह ऐसी दवा बन गयी हे जिसकी इजाद इसलिए की गयी थी ताकि समाज में वचितं एवं दलित पिछडो को विकास की मुख्‍य धारा से जोडकर उनकी स्थिति में सुधार लाया जा सके ।इसे आप सामाजिक क्रांत‍ि एंव सामाजिक बदलाव का माध्‍यम कर सकते है। लेकिन इस समय आरक्षण राजनैतिक रेवडी हो गयी है,ज‍िसे हर नेता अपने वोट बैंक के खाते में डालना चाहता है।
स्वतंत्र भारत में आरक्षण की शुरुआत दलित समाज को अन्य समाज के बराबर खडा करने के उद्देश्य से की गई थी। समय गुजरने के साथ-साथ दलित, आरक्षण तथा आरक्षण की आवश्यकताओं आदि की परिभाषा भी बदलती गई। यदि कुछ लोगों ने विशेषकर आरक्षित वर्ग के सम्पन्न लोगों ने इस आरक्षण नीति के लाभ उठाए हैं तो इसी आरक्षण के विद्वेष स्वरूप हमारा यह शांतिप्रिय देश कई बार आग की लपटों में भी घिर चुका है। मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने को लेकर पूरे देश में छात्रों द्वारा अपने भविष्य के प्रति चिंतित होकर जो आक्रोश व्यक्त किया गया था तथा उस दौरान जिस प्रकार की दर्दनाक घटनाएं सुनने में आई थीं, उन्हें याद कर आज भी दिल दहल जाता है। परन्तु आम जनता सिवाए मूकदर्शक बनी रहने के और कर भी क्या सकती है।
मेरे स्कूल  S.N.Public School, Beharadabar, Bhatani, Doeria के एक बच्चे (बारूद यादव) ने कहा – समाजवाद से जो रह गया, वह रहा सहा बंटाधार आरक्षण पूरा कर देगा.
सेना और निजी क्षेत्र में आरक्षण का सोच कर ही रूह काँप जाती हैं.
हे भगवान! इस देश ने तुम्हारा क्या बिगाङा हैं, इन नेताओं को अपने पास बुला ले….

प्रिंसिपल आशा ओझा जी ने कहा – भारत में रहना अब और भी चैलेंचिंग होने वाला है ।
सरकार अब शिक्षण संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण करने वाली है । तो अब हमारे बच्चे जो जी तोड मेहनत कर रहे हैं, मूर्ख हैं । क्योंकि कोई उससे कम योग्य होते हुए भी जाति के आधार पर प्रवेश पा लेगा । क्या ये करने से देश व समाज का भला होगा ? या जातिवाद, घूसघोरी को बढावा मिलेगा।
यह कदम सिस्टम को मजबूत करेगा या उसे और कमजोर करेगा ?
मेरा मानना है कि जिनके पास साधन नहीं है पर प्रतिभा है, उन्हें साधन प्रदान किए जाने चाहिए, चाहे वो किसी भी जाति के हों । पर परीक्षा में चयन सिर्फ योग्यता पर होना चाहिए ।
मतलब सरकार व समाज पढाई के लिए जो हो सकता है करे, ट्यूशन फीस माफ करे, किताबों का इन्तजाम करे, कोचिंग की व्यवस्था करे और एक ऐसा सहयोग दे कि साधनाभाव का एहसास न हो।
        के.के. ओझा जी कहते है की – निजीकरण ने मंडल के प्रभाव को बहुत कम कर दिया है। लेकिन आर्श्‍चय यह है कि इतने बडे एवं प्रभ‍ावित करने वाले विषय से मीडिया, एवं विधायिका ने अपना मुंह मोड लिया। इस पर तार्किकता की कोइ गुजांइस बाकी नहीं छोडी। इसी कारण आरक्षण अब बैमनस्‍य का जहर बन गया है

समाज सेवक श्री जनार्दन जी कहते है की – आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिये। चाहे किसी भी जाति का हो परंतु निर्धन को आरक्षण मिलना चाहिये।
पूर्व ग्राम प्रधान श्री नेबुलाल  यादव कहते है की आरक्षण का लाभ अभी तक कुछ जातियों तक ही क्‍यों सीमित है। O.B.C. में यादव,कुर्मी जाट,गुर्जरों ने ही फायदा लिया है। इसी प्रकार S.C.S.T. का फायदा जाटव व मीणाओं को ही ज्‍यादा मिला है। क्‍यों यह सामाजिक बदलाव की हवा अन्‍यों तक नहीं पहुचीं है।

 रविन्द्र नाथ यादव 
वशिष्ट   अध्यापक
S.N.Public School,
Beharadabar, Bhatani