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वन्दे मातरम् – बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय

वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्य श्यामलां मातरं |
शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
सुखदां वरदां मातरम् .. वन्दे मातरम्
सप्त कोटि कण्ठ कलकल निनाद कराले
निसप्त कोटि भुजैर्ध्रुत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीं नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीं मातरम् .. वन्दे मातरम्
तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मंदिरे मंदिरे .. वन्दे मातरम्
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम् नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् .. वन्दे मातरम्
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम् धरणीं भरणीं मातरम् .. वन्दे मातरम्

लोटा तो पीतल का है, जुलाहे का नहीं

कबीर गंगा के घाट पर थे। उन्होंने एक ब्रम्हांड को किनारे पर हाथ से अपने शरीर पर पानी डालकर स्नान करते देखा तो अपना लोटा देते हुए कहा, ‘लीजिए इस लोटे से आपको स्नान करने में सुविधा होगी।’

ब्रम्हांड ने आग्नेय नेत्रों से घूरते हुए कहा, ‘रहने दे। ब्राण जुलाहे के लोटे से स्नान करने से भ्रष्ट हो जाएगा।’ संत कबीर हंसते हुए बोले, ‘लोटा तो पीतल का है, जुलाहे का नहीं, रही भ्रष्ट, अपवित्र होने की बात है, तो मिट्टी से साफ कर गंगा के पानी से इसे कई बार धोया गया है और यदि यह अभी भी अपवित्र है तो मेरे भाई दुर्भावनाओं, विकारों से भरा मनुष्य क्या गंगा में नहाने से पवित्र हो जाएगा?’ कबीर के इस पलटवार ने ब्रम्हांड को निरुर कर दिया।

‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वमम देव देवः।।’

‘‘माँ !’’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘माँ’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘माँ’ की ममता और उसके आँचल की महिमा का को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात-रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी-मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अटखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकड़कर चलना सिखाना, प्यार से डांटना-फटकारना, रूठना-मनाना, दूध-दही-मक्खन का लाड़-लड़ाकर खिलाना-पिलाना, बच्चे के लिए अच्छे-अच्छे सपने बुनना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार…..ये सब ही तो हर ‘माँ’ की मूल पहचान है। इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की ‘माँ’ की यही मूल पहचान है।
हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बावजूद ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है।
हमारे देश भारत में ‘माँ’ को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है और वेदों में ‘माँ’ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम ‘माँ’ के रूप में की उद्बोधित किया गया है:
‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वमम देव देवः।।’

वेदों में ‘माँ’ को ‘अंबा’, ‘अम्बिका’, ‘दुर्गा’, ‘देवी’, ‘सरस्वती’, ‘शक्ति’, ‘ज्योति’, ‘पृथ्वी’ आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसके अलावा ‘माँ’ को ‘माता’, ‘मात’, ‘मातृ’, ‘अम्मा’, ‘अम्मी’, ‘जननी’, ‘जन्मदात्री’, ‘जीवनदायिनी’, ‘जनयत्री’, ‘धात्री’, ‘प्रसू’ आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है।
ऋग्वेद में ‘माँ’ की महिमा का यशोगान कुछ इस प्रकार से किया गया है, ‘हे उषा के समान प्राणदायिनी माँ ! हमें महान सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करो। तुम हमें नियम-परायण बनाओं। हमें यश और अद्धत ऐश्वर्य प्रदान करो।’
सामवेद में एक प्रेरणादायक मंत्र मिलता है, जिसका अभिप्राय है, ‘हे जिज्ञासु पुत्र! तू माता की आज्ञा का पालन कर, अपने दुराचरण से माता को कष्ट मत दे। अपनी माता को अपने समीप रख, मन को शुद्ध कर और आचरण की ज्योति को प्रकाशित कर।’
प्राचीन ग्रन्थों में कई औषधियों के अनुपम गुणों की तुलना ‘माँ’ से की गई है। एक प्राचीन ग्रन्थ में आंवला को ‘शिवा’ (कल्याणकारी), ‘वयस्था’ (अवस्था को बनाए रखने वाला) और ‘धात्री’ (माता के समान रक्षा करने वाला) कहा गया है। राजा बल्लभ निघन्टु ने भी एक जगह ‘हरीतकी’ (हरड़) के गुणों की तुलना ‘माँ’ से कुछ इस प्रकार की है:
‘यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरितकी।’
(अर्थात, हरीतकी (हरड़) मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली होती है।)
श्रीमदभागवत पुराण में उल्लेख मिलता है कि ‘माताओं की सेवा से मिला आशिष, सात जन्मों के कष्टों व पापांे को भी दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा का कवच का काम करती है।’ इसके साथ ही श्रीमदभागवत में कहा गया है कि ‘माँ’ बच्चे की प्रथम गुरू होती है।‘
रामायण में श्रीराम अपने श्रीमुख से ‘माँ’ को स्वर्ग से भी बढ़कर मानते हैं। वे कहते हैं कि:
‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।’
(अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।)
महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि ‘भूमि से भारी कौन?’ तब युधिष्ठर जवाब देते हैं:
‘माता गुरूतरा भूमेः।’
(अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।)
महाभारत में अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म कहते हैं कि ‘भूमि के समान कोई दान नहीं, माता के समान कोई गुरू नहीं, सत्य के समान कोई धर्म नहीं और दान के समान को पुण्य नहीं है।’
इसके साथ ही महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने ‘माँ’ के बारे में लिखा है कि:
‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’

(अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।)
तैतरीय उपनिषद में ‘माँ’ के बारे में इस प्रकार उल्लेख मिलता है:
‘मातृ देवो भवः।’
(अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।)
संतो का भी स्पष्ट मानना है कि ‘माँ’ के चरणों में स्वर्ग होता है।’ आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी कालजयी रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रारंभिक चरण में ‘शतपथ ब्राहा्रण’ की इस सूक्ति का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया है:
‘अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः
मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।’

(अर्थात, जब तीन उत्तम शिक्ष अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा।)
‘माँ’ के गुणों का उल्लेख करते हुए आगे कहा गया है कि:
‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।’

(अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।)
‘चाणक्य-नीति’ के प्रथम अध्याय में भी ‘माँ’ की महिमा का बखूबी उल्लेख मिलता है। यथा:
‘रजतिम ओ गुरू तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।’

(अर्थात, जिस प्रकार संसार में पाँच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पाँच प्रकार की माँ होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरू की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।)
‘चाणक्य नीति’ में कौटिल्य स्पष्ट रूप से कहते हैं कि, ‘माता के समान कोई देवता नहीं है। ‘माँ’  परम देवी होती है।’
महर्षि मनु ने ‘माँ’ का यशोगान इस प्रकार किया है:
 ‘दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य होता है। सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण ‘माँ’ होती है।’
विश्व के महान साहित्यकारों और दार्शनिकों ने ‘माँ’ की महिमा का गौरवपूर्ण बखान किया है। एच.डब्लू बीचर के अनुसार, ‘जननी का हृदय शिशु की पाठशाला है।’ कालरिज का मानना है, ‘जननी जननी है, जीवित वस्तुओं में वह सबसे अधिक पवित्र है।’ इसी सन्दर्भ में विद्या तिवारी ने लिखा है, ‘माता और पिता स्वर्ग से महान् हैं।’ विश्व प्रसिद्ध नेपोलियन बोनापार्ट के अनुसार, ‘शिशु का भाग्य सदैव उसकी जननी द्वारा निर्मित होता है।’ महान भारतीय कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना में ‘माँ’ की महिम कुछ इस तरह बयां की:
‘स्वर्ग से भी श्रेष्ठ जननी जन्मभूमि कही गई।
सेवनिया है सभी को वहा महा महिमामयी’।।

(अर्थात, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ कही गई हैं। इस महा महिमामयी जननी और जन्मभूमि की सेवा सभी लोगों को करनी चाहिए।)
इसके अलावा श्री गुप्त ने ‘माँ’ की महिमा में लिखा है:
‘जननी तेरे जात सभी हम,
जननी तेरी जय है।’

इसी क्रम में रामचरित उपाध्याय ने अपनी रचना ‘मातृभूमि’ में कुछ इस प्रकार ‘माँ’ की महिमा का उल्लेख किया है:
‘है पिता से मान्य माता दशगुनी, इस मर्म को,
जानते हैं वे सुधी जो जानते हैं धर्म को।’

(जो बुद्धिमान लोग धर्म को मानते हैं, वे जानते हैं कि माता पिता से दस गुनी मान्य होती है।)
इसके साथ ही ‘माँ’ के बारे में एक महाविद्वान ने क्या खूब कहा है, ‘कोमलता में जिसका हृदय गुलाब सी कलियों से भी अधिक कोमल है तथा दयामय है। पवित्रता में जो यज्ञ के धुएं के समान है और कर्त्तव्य में जो वज्र की तरह कठोर है-वही दिव्य जननी है।’सिनेमा में भी ‘माँ’ पर आधारित बहुत सारी फिल्में और गाने बनाए गए हैं। कई गीत तो इतने मार्मिक बन पड़े हैं, जिनको सुनकर व्यक्ति एकदम द्रवित हो उठता है। मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा फिल्म ‘दादी माँ’ (1966) के लिए लिखा गया यह गीत आज भी ल���गों के हृदय पटल पर अपनी अमिट छाप बनाए हुए है:
‘उसको नहीं देखा हमने कभी,
पर इसकी जरूरत क्या होगी!
ऐ माँ…ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग,
भगवान की सूरत क्या होगी!!’

‘माँ’ के बारे में लिखी गई ये हृदयस्पर्शी पंक्तियां हर किसी को प्रभावित किए बिना नहीं रहतीं:
‘कौन सी है वो चीज जो यहां नहीं मिलती।
सबकुछ मिल जाता है, लेकिन,
 हाँ…! ‘माँ’  नहीं मिलती।’

जो नारी ‘माँ’ नहीं बन पाती, वह जीवन भर स्वयं को अधूरा मानती है और जीवन भर तड़पती रहती है। समाज में ऐसी औरत को ‘बांझ’ कहा जाता है और उसकी कदम-कदम पर उपेक्षा की जाती है। नारी की इसी मनोदशा को हरियाणा के ‘सूर्यकवि’ पं. लखमीचन्द ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘पूर्ण भगत’ में कुछ इस तरह चित्रित किया है:
‘बांझ दोष की बीर नै के बेरा,
सन्तान होण का किसा दर्द हो सै।’

(अर्थात, जो औरत ‘माँ’ न बनी हो यानी जो बांझ हो, भला उसे प्रसव-पीड़ा का क्या पता हो सकता है।)
नारी इस सृष्टि और प्रकृति की ‘जननी’ है। नारी के बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी शाश्वत सत्य को हरियाणा के सिरमौर कवि पं. मांगे राम ने अपने प्रख्यात साँग ‘शकुन्तला-दुष्यन्त’ में कुछ इस प्रकार समाहित किया है:
‘स्त्री ना होती जग म्हं, सृष्टि को रचावै कौण।
ब्रहा्रा विष्णु शिवजी तीनों, मन म्हं धारें बैठे मौन।
एक ब्रहा्रा नैं शतरूपा रच दी, जबसे लागी सृष्टि हौण।’

(अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रहा्रा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ बैठे थे। जब ब्रहा्रा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई।)
कुल मिलाकर, संसार का हर धर्म जननी ‘माँ’ की अपार महिमा का यशोगान करता है। हर धर्म और संस्कृति में ‘माँ’ के अलौकिक गुणों और रूपों का उल्लेखनीय वर्णन मिलता है। हिन्दू धर्म में देवियों को ‘माँ’ कहकर पुकारा गया है। धार्मिक परम्परा के अनुसार धन की देवी ‘लक्ष्मी माँ’, ज्ञान की देवी ‘सरस्वती माँ’ और शक्ति की देवी ‘दुर्गा माँ’ मानीं गई हैं। नवरात्रों में ‘माँ’ को नौ विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। मुस्लिम धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोपरि और पवित्र स्थान दिया गया है। हजरत मोहम्मद कहते हैं कि ‘‘माँ’  के चरणों के नीचे स्वर्ग है।’ ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ में स्पष्ट लिखा गया है कि ‘माता के बिना जीवन होता ही नहीं है।’ ईसाई धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसके साथ ही भगवान यीशु की ‘माँ’ मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है। बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया गया है। यहुदी लोग भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं। यहुदियों की मान्यता के अनुसार उनके 55 पैगम्बर हैं, जिनमें से सात महिलाएं भी शामिल हैं। सिख धर्म में भी ‘माँ’ का स्थान सबसे ऊँचा रखा गया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि चाहे कोई भी देश हो, कोई भी संस्कृति या सभ्यता हो और कोई भी भाषा अथवा बोली हो, ‘माँ’ के प्रति अटूट, अगाध और अपार सम्मान देखने को मिलेगा। ‘माँ’ को अंग्रेजी भाषा में ‘मदर’ ‘मम्मी’ या ‘मॉम’, हिन्दी में ‘माँ’, स��स्कृत में ‘माता’, फारसी में ‘मादर’ और चीनी में ‘माकून’ कहकर पुकारा जाता है। भाषायी दृष्टि से ‘माँ’ के भले ही विभिन्न रूप हों, लेकिन ‘ममत्व’ और ‘वात्सल्य’ की दृष्टि में सभी एक समान ही होती हैं। ‘मातृ दिवस’ संसार भर में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। यूरोपीय देशों में ‘मदरिंग सनडे’ के रूप में मनाया जाता है। चीन में दार्शनिक मेंग जाई की माँ के जन्मदिन को ‘मातृ-दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। नेपाल में वैशाख कृष्ण पक्ष में ‘माता तीर्थ उत्सव’ मनाया जाता है। अमेरिका व भारत सहित कई कई अन्य देशों में मई के दूसरे रविवार को ‘मातृ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इंडोनेशिया में प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को ‘मातृ-दिवस’ मनाने की परंपरा है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार है।)

(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BURILAGEYALAGEBHALI/entry/%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A8-%E0%A4%A4-%E0%A4%B0-%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%B9 

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एक सन्त की वसीयत

आर. एस.  पाण्डेय

 VMW Team  के  आर. एस.  पाण्डेय आप को एक सन्त (स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज ) की वसीयत के बारे में बताने जा रहे है , अच्छा लगने पर ब्लॉग समर्थक बनकर मेरा उत्साहवर्द्धन एवं मार्गदर्शन करें |
 स्वामी श्री रामसुखदासजीमहाराज का स्थानराजस्थान के सिंथलमें था लेकिनमृत्युपूर्व कोई पाँचवर्ष से वेऋषिकेश में हीस्थापित हो गएथे श्रीरामचरितमानस उनका प्रियग्रन्थ और भगवान्श्रीराम उनके आराध्यथे गीताप्रेस गोरखपुर से, रामचरित मानस औरमर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामसे सम्बन्धित प्रकाशितसाहित्य में श्रीरामसुखदासजी महाराज का योगदानसर्वाधिक है साधुसन्तों मेंवे अपने प्रकारके एकमात्र थेयह उनकी वसीयतपढ़ने के बादही अनुभव कियाजा सकता है उनकी वसीयतपढ़ने के बादहमें अपने आसपास केसन्तों कासन्तपनअवास्तविक अनुभव होने लगताहै मृत्युसे कुछ वर्षपूर्व के किसीवर्ष की मार्गशीर्षशुक्ल एकादशी (गीताजयन्ती) को उन्होंनेअपनी वसीयत लिखीथी जिसे गीतापे्रस, गोरखपुर से प्रकाशितकल्याणके अगस्त2005 अंक में अविकलप्रकाशित की थी

उनकी वसीयतयहाँ जसकीजस प्रस्तुतहै
सेवा में विनम्रनिवेदन (वसीयत)
(शरीर शान्त होनेके बाद पालनीयआवश्यक निर्देश)
श्री भगवान् कीअसीम, अहैतुकी कृपासे ही जीवनको मानव शरीरमिलता है इसका एकमात्र उद्देश्यकेवल भगवत्प्राप्ति हीहै परन्तुमनुष्य इस शरीरको प्राप्त करनेके बाद अपनेमूल उद्देश्य कोभूल कर शरीरके साथ दृढ़तासे तादात्म्य करलेता है औरइसके सुख कोही परम सुखमानने लगता है शरीर कोसत्ता और महत्तादेकर उसके साथअपना सम्बन्ध मानलेने के कारणउसका शरीर सेइतना मोह होजाता है किइसका नाम तकउसको प्रिय लगनेलगता है शरीर के सुखोंमें मानबड़ाईका सुख सबसेसूक्ष्म होता है इसकी प्राप्तिके लिए वहझूठ, कपट, बेईमानीआदि दुर्गुणदुराचारभी करने लगजाता है शरीर नाम मेंप्रियता होने सेउसमें दूसरों सेअपनी प्रशंसा, स्तुतिकी चाहना रहतीहै वहयह चाहता हैकि जीवन पर्यन्तमेरे को मानबड़ाई मिलेऔर मरने केबाद मेरे नामकी कीर्ति हो वह यहभूल जाता हैकि केवल लौकिकव्यवहार के लिएशरीर का रखाहुआ नाम शरीरके नष्ट होनेके बाद कोईअस्तित्व नहीं रखता इस दृष्टिसे शरीर कीपूजा, मानआदरएवम् नाम कोबनाए रखने काभाव किसी महत्वका नहीं है परन्तु शरीरका मानआदरएवम् नाम कीस्तुतिप्रशंसा का भावइतना व्यापक हैकि मनुष्य अपनेतथा अपने प्रियजनोंके साथ तोऐसा व्यवहार करतेही हैं, प्रत्युत्जो भगवदाज्ञा, महापुरुषवचन तथाशास्त्र मर्यादा के अनुसारसच्चे हृदय सेअपने लक्ष्य (भगवत्प्राप्ति)-में लगेरहकर इन दोषोंसे दूर रहनाचाहते हैं, उनसाधकों के साथभी ऐसा हीव्यवहार करने लगजाते हैं अधिक क्या कहाजाय, उन साधकोंका शरीर निष्प्राणहोने पर भीउसकी स्मृति बनाएरखने के लिएवे उस शरीरको चित्र मेंआबध्द करते हैंएवम् उसको बहुतही साजसज्जाके साथ अन्तिमसंस्कारस्थल तकले जाते हैं विनाशी नामको अविनाशी बनानेके प्रयास मेंवे उस संस्कारस्थल परछतरी, चबूतरा यामकान (स्मारक) आदिबना देते हैं इसके सिवायउनके शरीर सेसम्बन्धित एकपक्षीय घटनाओं कोबढ़ाचढ़ाकर उनकोजीवनी, संस्मरण आदि केरूप में लिखतेहैं और प्रकाशितकरवाते हैं कहने को तोवे अपनेआपको उन साधकोंका श्रद्धालु कहतेहैं, पर कामवही कराते हैं, जिसका वे साधकनिषेध करते हैं
श्रद्धातत्व अविनाशी है अतः उन साधकोंके अविनाशी सिद्धान्तोंतथा वचनों परही श्रद्धा होनीचाहिए किविनाशी देह यानाम में नाशवान् शरीर तथानाम में तोमोह होता है, श्रद्धा नहीं परन्तु जब मोहही श्रद्धा कारूप धारण करलेता है तभीये अनर्थ होतेहैं अतःभगवान् के शाश्वत, दिव्य, अलौकिक श्रीविग्रह कीपूजा तथा उनकेअविनाशी नाम कीस्मृति को छोड़कर इन नाशवान्शरीरों तथा नामोंको महत्व देनेसे केवलअपना जीवन हीनिरर्थक होता है, प्रत्युत् अपने साथमहान् धोखा भीहोता है
वास्तविक दृष्टि से देखाजाए तो शरीरमलमूत्र बनानेकी एक मशीनही है इसको उत्तमसेउत्तम भोजन याभगवान् का प्रसादखिला दो तोवह मल बनकरनिकल जाएगा तथाउत्तमसेउत्तमपेय या गंगाजलपिला दो तोवह मूत्र बनकरनिकल जाएगा जब तक प्राणहैं, तब तकतो यह शरीरमलमूत्र बनानेकी मशीन हैऔर प्राण निकलजाने पर यहमुर्दा है, जिसकोछू लेने परस्नान करना पड़ताहै वास्तवमें यह शरीरप्रतिक्षण ही मररहा है, मुर्दाबन रहा है इसमें जोवास्तविक तत्व (चेतन) है, उसका चित्र तोलिया ही नहींजा सकता चित्र लिया जाताहै तो उसशरीर का, जोप्रतिक्षण नष्ट होरहा है इसलिए चित्र लेनेके बाद शरीरभी वैसा नहींरहता, जैसा चित्रलेते समय था इसलिए चित्रकी पूजा तोअसत् (‘नहीं’)- की हीपूजा हुई चित्र में चित्रितशरीर निष्प्राण रहताहै, अतः हाड़मांसमय अपवित्र शरीरका चित्र तोमुर्दे का भीमुर्दा हुआ
हम अपनी मान्यतासे जिस पुरुषको महात्मा कहतेहैं, वह अपनेशरीर से सर्वदासम्बन्ध विच्छेद हो जानेसे ही महात्माहै, किशरीर से सम्बन्धरहने के कारण शरीर कोतो वे मलके समान समझतेहैं अतःमहात्मा के कहेजाने वाले शरीरका आदर करना, मल का आदरकरना हुआ क्या यह उचितहै ? यदि कोईकहे कि जैसेभगवान् के चित्रआदि की पूजाहोती है, वैसेही महात्मा केचित्र आदि कीपूजा की जाएतो क्या आपत्तिहै ? तो यहकहना भी उचितनहीं है कारण कि भगवान्का शरीर चिन्मयएवम् अविनाशी होताहै, जबकि महात्माकहा जाने वालाशरीर पाञ्चभौतिक शरीरहोने के कारणजड़ एवम् विनाशीहोता है
भगवान् सर्वव्यापी हैं, अतःवे चित्र मेंभी हैं, परन्तुमहात्मा की सर्वव्यापकता(शरीर से अलग) भगवान् की सर्वव्यापकताके ही अन्तर्गतहोती है एक भगवान् केअन्तर्गत समस्त महात्मा हैं, अतः भगवान् कीपूजा के अन्तर्गतसभी महात्माओं कीपूजा स्वतः होजाती है यदि महात्माओं केहाड़मांसमय शरीरोंकी तथा उनकेचित्रों की पूजाहोने लगे तोइससे पुरुषोत्तम भगवान्की ही पूजामें बाधा पहुँचेगी, जो महात्माओं केसिद्धान्तों से सर्वथाविपरीत है महात्मा तो संसारमें लोगों कोभगवान् की ओरलगाने के लिएआते हैं, कि अपनी ओरलगाने के लिए जो लोगोंको अपनी ओर(अपने ध्यान, पूजाआदि में) लगाताहै, वह तोभगवद्विरोधी होता है वास्तव मेंमहात्मा कभी शरीरमें सीमित होताही नहीं
वास्तविक जीवनी या चरित्रवही होता हैजो सांगोपांग होअर्थात् जीवन कीअच्छीबुरी (सद्गुण, दुर्गुण, सदाचार, दुराचार आदि) सब बातों कायथार्थ रूप सेवर्णन हो अपने जीवन कीसमस्त घटनाओं कोयथार्थ रूप सेमनुष्य स्वयम् ही जानसकता है दूसरे मनुष्य तोउसकी बाहरी क्रियाओंको देखकर अपनीबुद्धि के अनुसारउसके बारे मेंअनुमान मात्र कर सकतेहैं, जो प्रायःयथार्थ नहीं होता आजकल जोजीवनी लिखी जातीहै, उसमें दोषोंको छुपाकर गुणोंका ही मिथ्यारूपसे अधिक वर्णनकरने के कारणवह सांगोपांग तथापूर्णरूप से सत्यहोती ही नहीं वास्तव मेंमर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम केचरित्र से बढ़करऔर किसी काचरित्र क्या होसकता है अतः उन्हीं केचरित्र को पढ़नासुनना चाहिए औरउसके अनुसार अपनाजीवन बनाना चाहिए जिसको हममहात्मा मानते हैं, उसकासिद्धान्त और उपदेशही श्रेष्ठ होताहै, अतः उसीके अनुसार अपनाजीवन बनाने कायत्न करना चाहिए
उपर्युक्त सभी बातोंपर विचार करकेमैं सभी परिचितसन्तों तथा सद्गृहस्थोंसे एक विनम्रनिवेदन प्रस्तुत कर रहाहूँ इसमेंसभी बातें मैंने व्यक्तिगत आधारपर प्रकट कीहैं अर्थात् मैंनेअपने व्यक्तिगत चित्र, स्मारक, जीवनी आदि काही निषेध कियाहै मेरीशारीरिक असमर्थता के समयतथा शरीर शान्तहोने के बादइस शरीर केप्रति आपका क्यादायित्व रहेगाइसका स्पष्टनिर्देश करना हीइस लेख काप्रयोजन है
(1)
यदि यह शरीरचलनेफिरने, उठनेबैठने आदि मेंअसमर्थ हो जाएएवं वैद्योंडाक्टरोंकी राय सेशरीर के रहनेकी कोई आशाप्रतीत होतो इसको गंगाजीके तटवर्ती स्थानपर ले जायाजाना चाहिए उस समय किसीभी प्रकार कीओषधि आदि काप्रयोग करकेकेवल गंगाजल तथातुलसीदल का हीप्रयोग किया जानाचाहिए उससमय अनवरतरूप सेभगवन्नाम का जपकीर्तन और श्रीमद्भगवत्गीता, श्रीविष्णुसहस्त्रनाम, श्रीरामचरितमानस आदि पूज्यग्रन्थों का श्रवणकराया जाना चाहिए
(2)
इस शरीर केनिष्प्राण होने केबाद इस परगोपीचन्दन एवं तुलसीमालाके सिवाय पुष्प, इत्र, गुलाल आदिका प्रयोग बिलकुलनहीं करना चाहिए निष्प्राण शरीरको साधुपरम्पराके अनुसार कपड़ेकी झोली मेंले जाया जानाचाहिए किलकड़ी आदि सेनिर्मित वैकुण्ठी (विमान) आदिमें ।जिस प्रकारइस शरीर कीजीवित अवस्था मेंचरणस्पर्श, दण्डवत्प्रणाम, परिक्रमा, माल्यार्पण, अपनेनामकी जयकार आदिका निषेध करताआया हूँ, उसीप्रकार इस शरीरके निष्प्राण होनेके बाद भीचरणस्पर्श, दण्डवत्प्रणाम, परिक्रमा, माल्यार्पण, अपनेनाम की जयकारआदि का निषेधसमझना चाहिए ।इसशरीर की जीवितअवस्था के, मृत्युअवस्था के तथाअन्तिम संस्कार आदि केचित्र (फोटो) लेने कामैं सर्वथा निषेधकरता हूँ
(3)
मेरी हार्दिक इच्छायही है किअन्य नगर यागाँव में इसशरीर के शान्तहोने पर इसकोवाहन में रखकरगंगाजी के तटपर ले जायाजाना चाहिए औरवहीं इसका अन्तिमसंस्कार कर देनाचाहिए यदिकिसी अपरिहार्य कारणसे ऐसा होनाकदापि सम्भव हो सके तोजिस नगर यागाँव में शरीरशान्त हो जाए, वहीं गायों केगाँव से जंगलकी ओर जानेआने केमार्ग (गोवा) अथवा नगरया गाँव सेबाहर जहाँ गायेंविश्राम आदि कियाकरती है, वहाँइस शरीर कासूर्य की साक्षीमें अन्तिम संस्कारकर देना चाहिए।इस शरीर केशान्त होने परकिसी की प्रतीक्षानहीं करनी चाहिए।अन्तिम संस्कारपर्यन्त केवल भजनकीर्तन, भगवन्नामजपआदि ही होनेचाहिए और अत्यन्तसादगी के साथअन्तिम संस्कार करना चाहिए
(4)
अन्तिम संस्कार के समयइस शरीर कीदैनिकोपयोगी सामग्री (कपड़े, खड़ाऊँ, जूते आदि)-कोभी इस शरीरके साथ हीजला देना चाहिएतथा अवशिष्ट सामग्री(पुस्तकें, कमण्डलु आदि)-कोपूजा में अथवास्मृति के रूपमें बिलकुल नहींरखना चाहिए, प्रत्युत्उनका भी सामान्यतयाउपयोग करते रहनाचाहिए
(5)
जिस स्थान परइस शरीर काअन्तिम संस्कार किया जाए, वहाँ मेरी स्मृतिके रूप मेंकुछ भी नहींबनाना चाहिए, यहाँतक कि उसस्थान पर केवलपत्थर आदि कोरखने का भीमैं निषेध करताहूँ अन्तिमसंस्कार से पूर्ववह स्थल जैसाउपेक्षित रहा है, इस शरीर केअन्तिम संस्कार के बादभी वह स्थलवैसे ही उपेक्षितरहना चाहिए अन्तिम संस्कार के बादअस्थि आदि सम्पूर्णअवशिष्ट सामग्री को गंगाजीमें प्रवाहित करदेना चाहिए ।मेरीस्मृति के रूपमें कहीं भीगौशाला, पाठशाला, चिकित्सालय आदिसेवार्थ संस्थाएँ नहीं बनानीचाहिए अपनेजीवनकाल में भीमैं ने अपनेलिए कभी कहींकिसी मकान आदिका निर्माण नहींकराया है औरइसके लिए किसीको प्रेरणा भीनहीं की है यदि कोईव्यक्ति कहीं भीकिसी मकान आदिको मेरे द्वाराअथवा मेरी प्रेरणासे निर्मित बताएतो उसको सर्वथामिथ्या समझना चाहिए
(6)
इस शरीर केशान्त होने केबाद सत्रहवीं, मेलाया महोत्सव आदिबिलकुल नहीं करनाचाहिए और उनदिनों में किसीप्रकार की कोईमिठाई आदि भीनहीं करनी चाहिए साधुसन्तजिस प्रकार अबतक मेरे सामनेभिक्षा लाते रहेहैं, उसी प्रकारलाते रहना चाहिए अगर सन्तोंके लिए सद्गृहस्थअपनेआप भिक्षालाते हैं तोउसी भिक्षा कोस्वीकार करना चाहिएजिसमें कोई मीठीचीज हो अगर कोईसाधु या सद्गृहस्थबाहर से जायँ तो उनकीभोजन व्यवस्था मेंमिठाई बिलकुल नहींबनानी चाहिए, प्रत्युत्उनके लिए भीसाधारण भोजन हीबनाना चाहिए
(7)
इस शरीर केशान्त होने परशोक अथवा शोकसभा आदिनहीं करना चाहिए, प्रत्युत् सत्रह दिन तकसत्संग, भजनकीर्तन, भगवन्नामजप, गीतापाठ, श्रीरामचरित मानसपाठ, सन्तवाणीपाठ, भागवतपाठ आदिआध्यात्मिक कृत्य ही होतेरहने चाहिए सनातनहिन्दूसंस्कृतिमें इन दिनोंके ये हीमुख्य कृत्य मानेगए हैं
(8)
इस शरीर केशान्त होने केबाद सत्रहवीं आदिकिसी भी अवसरपर यदि कोईसज्जन रुपयापैसा, कपड़ा आदि कोईवस्तु भेंट करनाचाहें तो नहींलेना चाहिए अर्थात्किसी से भीकिसी प्रकार कीकोई भेंट बिलकुलनहीं लेनी चाहिए यदि कोईकहे कि हमतो मन्दिर मेंभेंट चढ़ाते हैंतो इसको फालतूबात मानकर इसकाविरोध करना चाहिए बाहर सेकोई व्यक्ति किसीभी प्रकार कीकोई भेंट किसीभी माध्यम सेभेजे तो उसकोसर्वथा अस्वीकार कर देनाचाहिए किसीसे भी भेंट लेने केसाथसाथ यहसावधानी भी रखनीचाहिए कि किसीको कोई भेंट, चद्दर किराया आदिनहीं दिया जाए जब सत्रहवींका भी निषेधहै तो फिरबरसी (वार्षिक तिथि) आदि का भीनिषेध समझना चाहिए
(9)
इस शरीर केशान्त होने केबाद इस (शरीर)-से सम्बन्धितघटनाओं को जीवनी, स्मारिका, संस्मरण आदि किसीभी रूप मेंप्रकाशित नहीं कियाजाना चाहिए
अन्त में मैंअपने परिचित सभीसन्तों एवं सद्गृहस्थोंसे विनम्र निवेदनकरता हूँ किजिन बातों कामैंने निषेध कियाहै, उनको किसीभी स्थिति मेंनहीं किया जानाचाहिए इसशरीर के शान्तहोने पर इननिर्देशों के विपरीतआचरण करके तथाकिसी प्रकार काविवाद, विरोध, मतभेद, झगड़ा, वितण्डावाद आदि अवांछनीयस्थिति उत्पन्न करके अपनेको अपराध एवंपाप का भागीनहीं बनाना चाहिए, प्रत्युत् अत्यन्त धैर्य, प्रेम, सरलता एवं पारस्परिकविश्वास, निश्छल व्यवहार केसाथ पूर्वोक्त निर्देशोंका पालन करतेहुए भगवन्नामकीर्तनपूर्वकअन्तिम संस्कार कर देनाचाहिए जबऔर जहाँ भीऐसा संयोग हो, इस शरीर केसम्बन्ध में दिएगए निर्देशों कापालन वहाँ उपस्थितप्रत्येक सम्बन्धित व्यक्ति कोकरना चाहिए
मेरे जीवनकाल मेंमेरे द्वारा शरीरसे, मन से, जान में, अनजानमें किसी कोभी किसी प्रकारका कष्ट पहुँचाहो तो मैंउन सभी सेविनम्र हृदय सेक्षमा माँगता हूँ आशा है, सभी उदारतापूर्वक मेरेको क्षमा प्रदानकरेंगे
राम…..राम…..राम
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मां ब्रह्मचारिणी

VMW Team 

 नवरात्रि के दूसरे दिन(29 सितंबर, गुरुवार) मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। देवी ब्रह्मचारिणी ब्रह्म शक्ति यानि तप की शक्ति का प्रतीक हैं। इनकी आराधना से भक्त की तप करने की शक्ति बढ़ती है। साथ ही सभी मनोवांछित कार्य पूर्ण होते हैं।

ब्रह्मचारिणी हमें यह संदेश देती हैं कि जीवन में बिना तपस्या अर्थात कठोर परिश्रम के सफलता प्राप्त करना असंभव है। बिना श्रम के सफलता प्राप्त करना ईश्वर के प्रबंधन के विपरीत है। अत: ब्रह्मशक्ति अर्थात समझने व तप करने की शक्ति हेतु इस दिन शक्ति का स्मरण करें। योगशास्त्र में यह शक्ति स्वाधिष्ठान में स्थित होती है। अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है।

कृष्ण कन्हाई –मंगल विजय,अखण्ड ज्योति

कन्हाई की याद

कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई ।
फिर से श्याम घटा घिर आई ।।1।।

भोगवाद की सघन-घटायें।
भादों के घन-सी मंडराएँ॥
कैसी अन्धियारी घिर आई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।2।।

क्रूर-कंस से बौराए।
देवसंस्कृति पर मँडराए॥
देखो ! दानवता इतराई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।3।।

पतन-पाप-पूतना विषैली
दुष्प्रवृत्तियों हैं जहरीली।।
मानवता सहमी, सकुचाई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।4।।

उगल रहा विष काम-कालिया।
कब नाथोगे रे ! सॉंवलिया।।
जन-जीवन-जमना अकुलाई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।5।।

हैं धृतराष्ट्र -मोह के अन्धे।
दुयॉधन के धोखे-धन्धे।।
दु:शासन के बेशरामाई
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।6।।

बढ़ते हैं कुकृत्य, कौरव से।
पाण्डव वंचित हैं गौरव से।।
भीष्म, द्रोण पर जड़ता छाई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।7।।

पान्चजन्य में फिर स्वर फूँको
कहो पार्थ से अरे न चूको।।
गीता की फूँको तरूणाई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।8।।

देवसंस्कृति बुला रही हैं।
करो दिग्विजय, समय यही हैं।।
परिवर्तन की वेला आई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।9।।

मंगल विजय `विजयवर्गीय`
अखण्ड ज्योति जनवरी १९९८
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