Tag Archives: अखण्ड ज्योति

"क़दम मिला कर चलना होगा"

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

रचनाकार: अटल बिहारी वाजपेयी

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें

 आज मकर संक्रांति है। हवा में घुली है पतंगों की शोखी। क्या बच्चे और क्या जवान, सभी छतों पर हैं। राजस्थान की राजधानी जयपुर मे आज का दिन पतंगो के नाम रहा। सुबह से ही गुलाबी नगर के आसमान में सतरंगी पतंगो का जाल बुन गया। युवक युवतियां और महिलाएं पतंगबाजी में बड़े उल्लास के साथ शामिल हुईं। इस अवसर पर कई विदेशी सैलानी भी पतंग महोत्सव में शरीक होकर पतंग उड़ाकर इस पर्व का लुत्फ उठाया। जयपुर में मकर संक्राति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।  संभवतः इस परंपरा की शुरूआत भगवान श्री राम के समय में हुई थी। तुलसी दास जी ने राम चरित मानस में भगवान श्री राम के बाल्यकाल का वर्णन करते हुए कहा गया है कि भगवान श्री राम ने भी पतंग उड़ायी थी।

राम इक दिन चंग उड़ाई।
इंद्रलोक में पहुंची जाई।।

तमिल की तन्दनानरामायण में भी इस घटना का जिक्र किया गया है। इस रामायण के अनुसार मकर संक्रांति ही वह पावन दिन था जब भगवान श्री राम और हनुमान जी की मित्रता हुई। मकर संक्राति के दिन राम ने जब पतंग उड़ायी तो पतंग इन्द्रलोक में पहुंच गयी।

पंतंग को देखकर इन्द्र के पुत्र जयंती की पत्नी सोचने लगी कि, जिसकी पतंग इतनी सुन्दर है वह स्वयं कितना सुंदर होगा। भगवान राम को देखने की इच्छा के कारण जयंती की पत्नी ने पतंग की डोर तोड़कर पतंग अपने पास रख ली।

भगवान राम ने हनुमान जी से पतंग ढूंढकर लाने के लिए कहा। हनुमान जी इंद्रलोक पहुंच गये। जयंत की पत्नी ने कहा कि जब तक वह राम को देखेगी नहीं पतंग वपस नहीं देगी। हनुमान जी संदेश लेकर राम के पास पहुंच गये। भगवान राम ने कहा कि वनवास के दौरान जयंत की पत्नी को वह दर्शन देंगे। हनुमान जी राम का संदेश लेकर जयंत की पत्नी के पास पहुंचे। राम का आश्वासन पाकर जयंत की पत्नी ने पतंग वापस कर दी।

तिन सब सुनत तुरंत ही, दीन्ही दोड़ पतंग।
खेंच लइ प्रभु बेग ही, खेलत बालक संग।।

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भारत के महान संत स्वामी विवेकानंद की आज जन्मतिथि है

भारत के महान संत स्वामी विवेकानंद की आज जन्मतिथि है. दुनियां भर के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत रहे स्वामी विवेकानंद आज भी बहुत से लोगों के आदर्श हैं. उनके जन्मदिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करें.
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खुला मन और बंद मन

दो  प्रकार के मन होते हैं-एक तो खुला मन और एक बंद मन। बंद मन वह है जो कहता है, ‘यह ऐसा ही होता है। मुझे मालूम है।’ खुला मन कहता है-‘हो सकता है। शायद मुझे मालूम न हो।’ सारी समस्याएं जानने से उठती हैं। जब भी तुम्हें लगता है कि तुम परिस्थिति को समझ रहे हो और उस पर लेबल लगाते हो, यही तुम्हारी समस्या की शुरु आत है। जब भी तुम्हें लगे कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है तो यह ‘ऐसा ही होता है’ की श्रेणी में आते हैं। यह सीमित ज्ञान की उपज है लेकिन जब तुम में विस्मय, धीरज, आनंद हो; तब तुम ‘मुझे नहीं पता, ऐसा हो सकता है’,की स्थिति में हो। सारा जीवन उस सीमित ‘मुझे मालूम है’ से सभी तरह ही संभावनाओं तक का स्थानांतरण है। तुम्हें लगता है तुम्हें इस संसार के बारे में सब मालूम है और यही सब से बड़ी समस्या है। यही एक जगत नहीं है। इस जगत की कई परतें हैं। जब तुम परेशान होते हो, तब जैसे कोई डोर तुम्हें खींच रही होती है। जब कोई घटना घटती है, तब उस घटना के उस तरह होने की कई संभावनाएं हो सकतीं हैं। न केवल ठोस स्तर पर लेकिन किसी कारणवश सूक्ष्म स्तर पर भी। मानो तुम अपने कमरे में दाखिल हुए। पाया कि किसी ने सारा कमरा तितर-बितर कर डाला है। तुम उस व्यक्ति के प्रति क्रोध से जोड़ देते हो लेकिन सूक्ष्म स्तर पर कुछ और भी हो रहा है। सीमित ज्ञान के कारण ऐसा होता है। इसका अनुभव करने के बाद भी तुम उसके परे कुछ देख नहीं पाते। एक कहावत है, कुएं में गिरे दिन में और देखा रात में। इसका अर्थ है, तुम्हारी आंखें खुली नहीं हैं। आसपास उसे देखने और पहचानने के लिए तुम पर्याप्त रूप से संवेदनशील नहीं हो। जब तक हम घटनाओं और भावनाओं को व्यक्तियों के साथ जोड़ेंगे, ये चक्र चलता रहेगा। तुम उससे कभी मुक्त नहीं हो पाओगे। तो सबसे पहले उस घटना और भावना को उस व्यक्ति, उस स्थान और उस समय से अलग कर दो। ब्रह्माण्ड की एकात्मकता के ज्ञान को जानो। यदि तुम्हारे हाथ पर एक पिन चुभे तो सारे शरीर को महसूस होता है। इसी प्रकार, हर शरीर सृष्टि से, हरेक से जुड़ा है क्योंकि सूक्ष्म स्तर पर केवल एक जीवन है। यद्यपि ठोस स्तर पर ये भिन्न दिखाई पड़ते हैं। अस्तित्व एक है। दैवत्व एक है। जब तुम चेतना की निश्चितता जान जाते हो, तब तुम जगत की अनश्चितता से निश्चिंत रह सकते हो। प्राय: लोग इससे ठीक विरु द्ध करते हैं। वे अविसनीय पर विास करते हैं और व्यग्र हो जाते हैं। संसार परिवर्तन है, और आत्मा अपरिवर्तनशील है। तुम्हें अपरिवर्तनशील पर विास और परिवर्तन का स्वीकार करना है। यदि तुम निश्चित हो कि सब कुछ अनिश्चित है, तो तुम मुक्त हो। जब तुम अज्ञान में अनिश्चित हो, तुम चिंतित और तनावपूर्ण हो जाते हो। जागरूकतासहित अनिश्चितता उच्च स्तर का चैतन्य और मुस्कान देते हैं। अनश्चितता में कार्य करना जीवन को एक खेल, एक चुनौती बना देता है। अक्सर लोग सोचते हैं, निश्चितता मुक्ति है। जब तुम निश्चित न हो, तब यदि तुम्हें मुक्ति लगे, तभी वह सच्ची मुक्ति है

फिर स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता |

ईश्वर ने हर एक को स्वतंत्रता प्रदान की है, अत: यदि कोई पुरुष भौतिक भोग करने का इच्छुक है और इसके लिए देवताओं से सुविधाएं चाहता है तो प्रत्येक हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित भगवान उसके मनोभावों को जानकर ऐसी सुविधाएं प्रदान करते हैं। कुछ लोग यह प्रश्न कर सकते हैं कि ईश्वर जीवों को ऐसी सुविधाएं प्रदान करके उन्हें माया के पाश में गिरने ही क्यों देते हैं? इसका उत्तर यह है कि यदि परमेश्वर उन्हें ऐसी सुविधाएं प्रदान न करें तो फिर स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अत: वे सबों को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते हैं- चाहे कोई कुछ करे- किन्तु उनका अंतिम उपदेश हमें भगवद्गीता में प्राप्त होता है- मनुष्य को चाहिए कि अन्य सारे कायरे को त्यागकर उनकी शरण में आए। इससे मनुष्य सुखी रहेगा। जीवात्मा तथा देवता दोनों ही परमेश्वर की इच्छा के अधीन हैं। अत: जीवात्मा न तो स्वेच्छा से किसी देवता की पूजा कर सकता है, न ही देवता परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध कोई वर दे सकते हैं। सामान्यत: जो लोग इस संसार में पीड़ित हैं, वे देवताओं के पास जाते हैं, क्योंकि वेदों में ऐसा करने का उपदेश है कि अमुक-अमुक इच्छाओं वाले को अमुक-अमुक देवताओं की शरण में जाना चाहिए। चूंकि प्रत्येक जीव विशेष सुविधा चाहता है, अत: भगवान उसे विशेष देवता से उस वर को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा की प्रेरणा देते हैं और उसे वर प्राप्त हो जाता है। जीवों में वह प्रेरणा देवता नहीं दे सकते, किन्तु भगवान परमात्मा हैं जो समस्त जीवों के हृदयों में उपस्थित रहते हैं, अत: कृष्ण मनुष्य को किसी देवता के पूजन की प्रेरणा प्रदान करते हैं। सारे देवता परमेश्वर के विराट शरीर के विभिन्न अंगस्वरूप हैं, अत: वे स्वतंत्र नहीं होते। वैदिक साहित्य में कथन है, ‘परमात्मा रूप में भगवान देवता के हृदय में भी स्थित रहते हैं, अत: वे देवता के माध्यम से जीव की इच्छा को पूरा करने की व्यवस्था करते हैं किन्तु जीव तथा देवता दोनों ही परमात्मा की इच्छा पर आश्रित हैं।
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