तेरी सोच से बहुत दुर निकल चुँका हूँ

की मैं अब तेरी सोच से बहुत दुर निकल चुँका हूँ
की तू बदला था जिस तरह मैं भी बदल चुँका हूँ

की तू अब मुझे शिकस्त देने मत सोच मेरे दोस्त
मैंने दुनिया पढ ली है मै भी दुनिया मै ढल चुँका हूँ

की अब तो दिल को पत्थर कर लिया है मैने
पिघलना था जितना यार पहले पिघल चुँका हूँ

अब तो मेरे कदम का रूकना मुमकिन नही है
मंजिल की तरफ मै तो कब का चल चुकाँ हूँ

की अब तू भी मजा ले जलने का इतंजार मे मेरे
तेरे इंतजार मे,मै तो मुद्तो जल चुँका हूँ

झूठी तसल्ली न दे प्रकाश दिल को तू अपने
याद उसे ही करता है रोज कहता बदल चुँका हूँ

शायर प्रकाश नागपुरी

हमारा देश हमारा परिवार

नजरें छुपा-छुपा कर
तुम जा कहाँ रहे हो
ये देश है हमारा
क्यूँ इसे ठुकरा रहे हो।

बन के तू आतंकी
पुरानी सीरत गवा रहे हो
अपने गोलियों के धुन से
क्यूँ इसको डरा रहे हो

क्या तुम्हें पता है
इसी भूमि पर पले बढ़े हो
फिर इन बारूदों से
क्यूँ सीना इसका दहला रहे हो।

कल तक था जिनको पूजा
आज उन्हें ही रूला रहे हो
कल बनाया जिसे सुहागन
आज सुहाग उसका मिटा रहे हो
नजरों की बात छोड़ो
क्यूँ बहन से कलाई छुपा रहे हो।

यहाँ मां, बहन, बेटी,भाई सभी हमारे
फिर क्यूँ दरिंदे बन रहे हो
अपनी दरिंदगी से
क्यूँ इनको सता रहे हो।

अब भी वक्त है तू आ जा
जिस राह से गुजर रहे हो
जिससे खिल उठे वतन हमारा
क्यूँ न उसे अपना रहे हो।
ये देश नहीं परिवार है हमारा
क्यूँ इसको सता रहे हो।

आपका:–प्रियव्रत कुमार

यशवंती जिसे तानाजी में भुला दिया गया

कोंडाणा के किले में चढ़ने के लिए तानाजी ने यशवंती नामक गोह प्रजाति की छिपकली का प्रयोग किया था जिसको फ़िल्म में नही दिखाया गयावर्णन है, चढ़ाई के लिए तानाजी ने अपने बक्से से यशवंती को निकाला, उसे कुमकुम और अक्षत से तिलक किया और किले की दीवार की तरफ उछाल दिया किन्तु यशवंती किले की दीवार पर पकड़ न बना पायी । फिर दूसरा प्रयास किया गया लेकिन यशवंती दुबारा नीचे आ गयी, भाई सूर्याजी व शेलार मामा ने इसे अपशकुन समझा, तब तानाजी ने कहा कि अगर यशवंती इस बार भी लौट आयी तो उसका वध कर देंगे और यह कहकर दुबारा उसे दुर्ग की तरफ उछाल दिया, इस बार यशवंती ने जबरदस्त पकड़ बनाई और उससे बंधी रस्सी से एक टुकड़ी दुर्ग पर चढ़ गई
अंत मे जब यशवंती को मुक्त करना चाहा तो पाया कि यशवंती भी भारी वजन के कारण वीरगति को प्राप्त हो चुकी थी किन्तु उसने अपनी पकड़ नही छोड़ी थी
तो हमारे देश मे होने को तो चेतक और यशवंती जैसे देशभक्त जानवर भी हुए है और न होने को कई जयचंद भी है ।
इस पोस्ट द्वारा यशवंती को नमन

वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

दूरियां इस कदर मिटाने लगे हैं
वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

बन्द आँखों से भी नजर आते हैं
इस कदर दिल मे समाने लगे हैं

रूठ सकते नहीं एक पल के लिए
रूठ जाऊं तो फिर मनाने लगे हैं

रंगीनियां और मस्ती का आलम
ख्वाब आँखों में सजाने लगे हैं

मेरे अपने हुए, नहीं वो अजनबी
हाले दिल अपना बताने लगे हैं

जिंदगी भी तो मेरी मुस्कुराने लगी
अपनापन जबसे जताने लगे हैं

-किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट

मरता हूँ तुमपे

इश्क में चोट सदा खाई है
बात से बात निकल आई है

हिज्र की कैसी ये रुसवाई है
जाँ मेरी बहुत ही घबराई है

है सनम जलवा तुम्हारा
करती बैचेन वो अंगड़ाई है

मुझ को कोई अच्छा नहीं लगता
मरता हूँ तुम पे ये सच्चाई है

जिंदगी तुम हो ही लेकिन
मेरे हिस्से में क्यूँ रुसवाई है

जोड़ के गैर से रिश्ता तुम ने
खुद को मुझसे किया हरजाई है

कोई अब कुछ भी कहे उनको
राकेश मैं दुआ दूंगा कसम खाई है ,
_*🎊🌷राकेश कुमार मिश्रा🌷🎊*_

कुछ यूं ही…… – डॉ नीलम

तू कभी मिले जो फुर्सत में ए जिंदगी
तो बैठ कर कहीं दो दो जाम हो जाए

कुछ हाल अपना सुनाएं कुछ तेरा सुने
बस यूं ही वक्त कटे और जिंदगी की शाम हो जाए

बहुत तल्खियां हैं नसीब में अपनी
आ जिंदगी कुछ तो तेरे नाम कर जाएं

खुदा ने हथेलियां तो दी मगर लकीरें भूल गया
चल कुछ नहीं तो खंजर से ही लकीरें खींच आएं

जिंदगी, नाराज नहीं तुझसे बस शिकवा है यही
हर बार मेरी गली के मोड़ से ही तू मुड़ जाए।

डा. नीलम

सलीका – शायर भट्टी

थोरी देर खड़े हुए थे *छाँव* में ।
आ गऐ है सभ की हम *निगाहों* में।

एक बार उसने गले लगाया था,
सारा जहाँ सिमट गया था *बाँहो* में।

युं ही नहीं संभल के चलना आया मुझे,
फूल नहीं काँटे थे मेरी *राहों* में।

लुप्त हुई है नस्लें कई परिंदों की,
इन्सानों ने ही घोला ज़हर *फिज़ाओं* में।

निकाल घर से दूआऐं देने वालोें को,
ढूंढ रहे हैं जिंदगी अब *दवाओं* में।

शहर में आ कर भी मैं परेशान नहीं हुआ,
सलीका जीने का सीखा हुआ है *गाँवों* में।

समुद्री तुफान भी मेरा कुछ बिगाड़ ना सके,
भट्टी माँ का नाम लिखा था मेने *नाव* में।

*शायर भट्टी*

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