Category Archives: Social

भूचाल आ जाए

हर एक दिल में काश ख्याल आ जाये
रंजिशें मिटाने को भूचाल आ जाये ,

हर बशर में नूर उस का फिर क्यों झगड़े
हर जुबां पे काश ये सवाल आ जाये ,

गुनाहों की दुनिया से वाबस्ता रहे
क्या मजाल चेहरे मलाल आ जाये

बुझे बुझे चेहरे दिखे मुफ़लिसों के
खुदा करे के उन पर जमाल आ जाये

सितारे तोड़ मैं बांट दूँ मुफ़लिसों में
‘राकेश’ हाथों में गर कमाल आ जाये ,
_*🎊🌷राकेश कुमार मिश्रा🌷🎊*_

मुक्तक – दिनेश अवस्थी फर्रुखाबाद।

जीवन है एक संग्राम पीछे पग न धारिये।
बढ़ते रहो अविराम अपना मन न मारिये।
हर पल विजय की आशा और विश्वास को लिए,
भजिए हरी का नाम सारे दुःख बिसारिये।
_______________
मत दीन वचन औरों के सम्मुख न बोलिए।
राज दिल का भी प्यारे अपना न खोलिए।
सुनकर हंसेंगे लोग बांटेंगे न इंच भर,
वाणी की गरिमा प्यारे तुम स्वयंमेव तोलिए।
_______________
जीवन को सरसता में जियें तो सही रहे।
अपमान का न घूंट पियें तो सही रहे।
बाकी तो ठीक ठाक रहेगा ये तुम जानो,
हृदय में जलें प्रेम दिये तो सही रहे।

दिनेश अवस्थी फर्रुखाबाद।

पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के रिश्तेदारों सुन लो तुम,
इक दिन पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

कुछ तारे तो इधर बंटे हैं कुछ तारे हैं बंटे उधर,
धरती अम्बर ताक रहे हैं जाएं तो हम जाएं किधर।
बादल दल भी नारों की तख्तियां लेकर घूम रहे,
अपना पानी खुद पियेंगे सूख रहें हैं यहां अधर।
नदी गाँव की चुल्लूभर पानी में मरने वाली है,
इक दिन पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

सूरज ने जब आँख दिखाई तो रातें भी जली यहाँ,
चाँद के मद्धम उजियाले में इक पूनम है पली यहाँ।
अँधियारे मौका पाते ही रूप बदलते है रहते,
अपने दीपक होकर भी हर इक बाती है छली यहाँ।
सुबह यहां पर डरी-डरी खुद सन्ध्या धरने वाली है।
इक दिन पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

नैतिकता दौलत के घर पर खुद बंधक है बनी हुई।
और दौलत मद में होकर अब पापों में है सनी हुई।
सत्ता और गरीबी में हरदम रहता है द्वंद यहां,
कौन है छोटी कौन बड़ी है दोनों में है ठनी हुई।
सुनो द्रोपदी स्वयं यहां पर चीर को हरने वाली है।
इक दिन पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

✍🏻 नरेंद्रपाल जैन।
9785205694

नींद नहीं आती

हयात में जब मुश्किल तमाम आती है
मां की दुआ ही मुश्किल से बचाती है ,

उस रिज्क में कभी बरकत नहीं होती
जो रिज्क घर में हराम आती है ,

सुंकू कैसे मिलेगा तेरी हयात को
गर किसी मुफलिस का वो दिल दिल दुखाती है ,

जब किसी रात मुझको नींद नहीं आती
मां गोद में ले मुझे लोरी सुनाती है ,

बूढ़ा हो कर जवां हो जाता हूं ‘राकेश’
जब मां मुझे बेटा कह कर बुलाती है ,

राकेश कुमार मिश्रा

गिरती नैतिकता संवरे कब

ओ दिव्य अलौकिक मनुज समाज
सुनो अपनी अंर्तमन की आवाज।
घूम रहे कुटिल विचार के पंख जब
गिरती नैतिकता संवरे कब।।

ओ पाश्चात्य संस्कृति में झूल रहा
मनुज अपना आचरण भूल रहा।
खोले मूल नैतिक वस्त्र जब
गिरती नैतिकता संवरे कब ।।

हमने समझी जिंदगी चल रही
देखी स्वार्थ से दुनियां फल रही
हो गए एक दूजे के मेहमान जब
गिरती नैतिकता संवरे कब।।

हाय ,हेल्लो का अब जमाना
भृष्टाचारी से पैसा कमाना
अपनत्व का भाव नही जब
गिरती नैतिकता संवरे कब ।।

सोशल मीडिया पढ़ाता पाठ
स्टेटज दिखाता अपनी ठाठ।
न मिलते हम अपनों से जब
गिरती नैतिकता संवरे कब ।।

न यहाँ नारी को सम्मान मिला
न सीता जी को वरदान मिला
हैवानियत में द्रोपदी लुटी जब

गिरती नैतिकता संवरे कब।।

सिगरेट ,नशा पीते शान समझते
दिखावेपन में जान समझते
बुढापे में बालो की ढाई जब,
गिरती नैतिकता संवरे कब ।।

न पढ़ते लोग रामायण ,गीता
बनके रावण लुटती सीता।
नई सदी में आये संस्कार जब
गिरती नैतिकता संवरे तब।।

प्रवीण शर्मा ताल

राम राज्य के सपने टूटे

त्याग तपस्या की भूमि पर
पाप बीज के अंकुर फूटे
बहुत संजोया बहुत सम्हाला
राम राज्य के सपने टूटे ।

आजादी का मूर्त रुप
सपनों मे नित आता है
बलिदानों की गाथा गाकर
बहता रक्त दिखाता है
उभरे ललाट पर शुभ्र रेख
स्वाभिमान का द्योतक है
चलो चलो भारत छोड़ो
इस पंक्ति का उद्घघोषक है
हुई तिरोहित मधुर कल्पना
जब अपने अपनों को लूटे
त्याग तपस्या की भूमि पर
पाप बीज के अंकुर फूटे
बहुत संजोया बहुत सम्हाला
राम राज्य के सपने टूटे ।

बहुत क्षोभ है जन जीवन में
हतप्रभ लोग गिरावट से
सीधे पन की हार सहज ही
झूठों और बनावट से
नैतिकता को निर्वासित कर
मूल्य हीन जीवन का पोषण
श्वेत दृष्टि मय कालिख भीतर
हैं भयहीन करें जो शोषण
जिस पथ पर हम चले जा रहे
जाने वह पथ कैसे छूटे
त्याग तपस्या की भूमि पर
पाप बीज के अंकुर फूटे
बहुत संजोया बहुत सम्हाला
राम राज्य के सपने टूटे ।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छग

हाँ कविता बोलती है

हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है,
मन की सारी वेदनाएं और खुशियां खोलती है।
हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है

एक यौवन हो सवेरा या वो ढलती शाम हो,
या बसन्ती रूप हो या पतझरों का याम हो।
सूख चुके फूल में भी खुश्बुओं को घोलती है।
हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है

बाहरी सब आहटों को है परखती आग में,
स्वप्न हो या हो हकीकत गा उठे हर राग में।
शब्द के लेकर तराजू भाव उसमें तोलती है,
हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है

ज़िन्दगी रिश्ते निभाती है स्वयं को तोड़कर,
हाँ नदी सिंधु में जाती पत्थरों को मोड़कर।
प्रीत की मधुशाल में वो बिन पिये ही डोलती है,
हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है

नरेंद्रपाल जैन

डॉ प्रियंका रेड्डी – कब तक सत्ता मौन रहेगी

कब तक सत्ता मौन रहेगी,
कब तक प्रसासन के हाथ बंधे रहेंगे
क्या बलात्कार करके आरोपी
जेल में सिर्फ मुँह छिपाने जाएंगे

अब तो थोड़ी शर्म करे प्रशाशन
और कोई सजा ऐसे सुनाए
अगर कोई बलात्कारी को बचाये
उसे भी सजा- ए- मौत दी जाए

जनता के बीच सभी आरोपियों को
बीच चौराहे पर लटकाए
मौत की भीख वो मांगते रहे
मारो इतने जब तक मर ना पाएं

जो ऐसा बिल पास न कर सके
ऐसा शासन किसी भी काम का नही
जो स्त्रयो का सम्मान न कर सके
ऐसा प्रशासन किसी नाम का नही

सौरभ जैन(उज्ज्वल)

वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

दूरियां इस कदर मिटाने लगे हैं
वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

बन्द आँखों से भी नजर आते हैं
इस कदर दिल मे समाने लगे हैं

रूठ सकते नहीं एक पल के लिए
रूठ जाऊं तो फिर मनाने लगे हैं

रंगीनियां और मस्ती का आलम
ख्वाब आँखों में सजाने लगे हैं

मेरे अपने हुए, नहीं वो अजनबी
हाले दिल अपना बताने लगे हैं

जिंदगी भी तो मेरी मुस्कुराने लगी
अपनापन जबसे जताने लगे हैं

-किशोर छिपेश्वर”सागर”

हिन्दी कविता-आबरू लूटने लगे

अब सरे राह नारी नर भक्षी घूमने लगे |
अकेली अबला आबरू निर्भय लूटने लगे |
सुना था जंगलो मे जानवर हिंसक रहते है |
लूट आबरूअबला बोटियाँ काटने लगे |
राह अकेली औरत बचाने कोई आता नहीं |
मर्द मर्दानीगिनी दिखाने कोई आता नहीं |
जब बहू बेटियाँ समाज मे सुरक्षित नहीं |
पड़ जाये मुसीबत नारियां रक्षित नहीं |
देख दुर्दसा माँ बहनो छाती फटने लगे |
राजनीति कुर्सी हथियाने हथियार हो गई |
तोल मोल खरीद फ़रोक्त ब्यापार हो गई |
कहा सो गए नारिया बिच राह कटने लगे |
कितना दर्दनाक शर्मनाक मंजर रहा होगा |
लूटती तड़पती प्रियंका दिल सिहर रहा होगा |
अब भगवान भरोसे जानो अस्मत बचने लगे |

श्याम कुँवर भारती

आदमी इंसान बन जाए

बक्श तौफीक सब को खुदा आदमी इन्सान बन जाये
मोहब्बत लगा ले गले नफरत से अन्जान बन जाये ,

इल्तजा भी बस इतनी आदमी को इन्सान बनाने की
मैंने ये तो नहीं कहा था आदमी शैतान बन जाये ,

जज्बा इन्सानियत का हर इन्सान में भर दे अल्लाह
फिर कुछ फर्क नहीं कि वो हिन्दु या मुसलमान बन जाये ,

ये खबर किसी को हो न हो लेकिन मुझे खबर है सब
तेरी इनायत की नजर से सहरा गुलिस्तान बन जाये ,

न आबो-दाना , न आशियाना जिस वतन की आवाम पास
किस काम का लीडर , चाहे वतन का सुल्तान बन जाये ,

बनाये रखना हाथ अपना सर पे ‘राकेश’ के ऐ खुदा
ऐसा न हो बेच कर जमीर वो बेईमान बन जाये ,

राकेश कुमार मिश्रा

महाराष्ट्र का नाटक

चाहत में कुर्सी की देखो नीति नियम सब ध्वस्त हुए ।
संस्कार सद्भाव समर्पण मानो रवि सम अस्त हुए॥

नवाचार दिखता है यहां अब केवल भ्रष्टाचारी का।
चहुंओर डंका है बजता गद्दारी मक्कारी का॥

सरे बाजारों में अब नेताओं की मंडी लगती है।
राजनीति की शक्ल मुझे अब क्रूर घमंडी लगती है।

खूब विधायक बिकते है अब मंहगे सस्ते दामो में।
खूब कमाई होती है अब उल्टे सीधे कामों में॥

कोई विधायक छुपा रहा हैं कोई उन्हे पुचकार रहा।
लालच देता मंत्री का पद का कोई जूता मार रहा॥

नैतिकता की बातें अक्सर घोषणाओं में मिलती हैं।
शक्ल देखने नेता की केवल चुनावों में मिलती हैं॥

बेशक दीपक बिन बाती के हरगिज कभी नहीं जलता।
लेकिन राजनीति के अंदर ऐसा नियम नहीं चलता॥

मेरा दीपक तेरी बाती उसका तेल जलाएंगे।
आओ चोरों हम सब मिलकर के सरकार बनाएंगे॥

जब तक संभव है तब तक ही सारे मौज उडाएंगे।
एक दिन हम सब मिलकर के इस भारत को खा जाएंगे॥

– बृजबिहारी ‘ विराट ‘

महाराष्ट्र का नाटक

चाहत में कुर्सी की देखो नीति नियम सब ध्वस्त हुए ।
संस्कार सद्भाव समर्पण मानो रवि सम अस्त हुए॥

नवाचार दिखता है यहां अब केवल भ्रष्टाचारी का।
चहुंओर डंका है बजता गद्दारी मक्कारी का॥

सरे बाजारों में अब नेताओं की मंडी लगती है।
राजनीति की शक्ल मुझे अब क्रूर घमंडी लगती है।

खूब विधायक बिकते है अब मंहगे सस्ते दामो में।
खूब कमाई होती है अब उल्टे सीधे कामों में॥

कोई विधायक छुपा रहा हैं कोई उन्हे पुचकार रहा।
लालच देता मंत्री का पद का कोई जूता मार रहा॥

नैतिकता की बातें अक्सर घोषणाओं में मिलती हैं।
शक्ल देखने नेता की केवल चुनावों में मिलती हैं॥

बेशक दीपक बिन बाती के हरगिज कभी नहीं जलता।
लेकिन राजनीति के अंदर ऐसा नियम नहीं चलता॥

मेरा दीपक तेरी बाती उसका तेल जलाएंगे।
आओ चोरों हम सब मिलकर के सरकार बनाएंगे॥

जब तक संभव है तब तक ही सारे मौज उडाएंगे।
एक दिन हम सब मिलकर के इस भारत को खा जाएंगे॥

– बृजबिहारी ‘ विराट ‘

औरत के गीले बाल और लोकतंत्र

पॉलिटिकल साइंस के सेमिनार में एक विद्यार्थी का बयान था कि मेरा तो यक़ीन लोकतंत्र पर से सन 1996 में ही उठ गया था..
कहने लगा कि ये उन दिनों की बात है जब एक शनिवार को मैं मेरे बाक़ी तीनों बहन भाई, मम्मी पापा के साथ मिलकर रात का खाना खा रहे थे ।
पापा ने पूछा:- कल तुम्हारे चाचा के घर चलें या मामा के घर?
हम सब भाइयों बहनों ने मिलकर बहुत शोर मचा कर चाचा के घर जाने को कहा, सिवाय मम्मी के जिनकी राय थी कि मामा के घर जाया जाए।
बात बहुमत की मांग की थी और अधिक मत चाचा के खेमे में पड़े थे …बहुमत की मांग के मुताबिक़ तय हुआ कि चाचा के घर जाना है। मम्मी हार गईं। पापा ने हमारे मत का आदर करते हुए चाचा के घर जाने का फैसला सुना दिया। हम सब भाई बहन चाचा के घर जाने की ख़ुशी में जा कर सो गये।
रविवार की सुबह उठे तो मम्मी गीले बालों को तौलिए से झाड़ते हुए बमुश्किल अपनी हंसी दबा रहीं थीं..उन्होंने हमसे कहा के सब लोग जल्दी से कपड़े बदल लो हम लोग मामा के घर जा रहें हैं।
मैंने पापा की तरफ देखा जो ख़ामोशी और तवज्जो से अख़बार पढ़ने की एक्टिंग कर रहे थे.. मैं मुंह ताकता रह गया..
बस जी! मैंने तो उसी दिन से जान लिया है कि लोकतंत्र में बहुमत की राय का आदर… और वोट को इज़्ज़त … सब ढकोसले है।
“असल फैसला तो बन्द कमरे में उस वक़्त होता है जब ग़रीब जनता सो रही होती है”
इसके बाद उस विद्यार्थी ने पोलिटिकल साइंस छोड़कर इकोनॉमिक्स ले ली ।।

परिवर्तन को आने दो

धीरे धीरे मुख्य द्वार से
परिवर्तन को आने दो
जो संदेशा ले आया है
निज स्वर उसे सुनाने दो ।

केवल शुभ सुनने की मंसा
लेकर सदा चले आते हो
व्यर्थ ज्ञान की लिए पुस्तिका
जब जी चाहे समझाते हो
कब तक सच से मुख मोड़ोगे
कितना रार बढ़ाओगे
वह दिन जाने कब आए
जब निज मन को समझाओगे
खोलो मन की बंद किवड़िया
कुछ शुद्ध हवा तो आने दो
धीरे – धीरे मुख्य द्वार से
परिवर्तन को आने दो ।

स्वीकारो उन्मुक्त हृदय से
प्रगति पथिक बढ़ते जाओ
संशय शंका जहां जहां हो
निज मन दीप जलाओ
पाप श्राप से मुक्त रहे तन
कटे जनम भव बंधन
जग की रीत नीत निभ जाए
बन भागी अभिनंदन
धारण हो संदेश ईश का
धर्म ध्वजा लहराने दो
धीरे – धीरे मुख्य द्वार से
परिवर्तन को आने दो ।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छग

माँ के नाम

मुश्किलों से घिरी जब मुझे मेरी जाँ दिखी।
मैंनें आँखें बन्द की सामने खड़ी माँ दिखी।।

संघर्षों के बादलों ने जब गर्जना शुरू किया
मैंने सराय माँगी तो वाहें फैलाए माँ दिखी।।

घिरने की आदत बचपन की बदल न सका
जब भी गिरा तो संभालती मुझे माँ दिखी।।

नींद ने भी जब मुझसे तोड़ा नाता अपना
घुटने पर सर रख लोरी सुनाती माँ दिखी।।

मैंने अब तलक संभाले रखा है डर खुद में
जिसमें संस्कारों का पाठ पढाती माँ दिखी।।

जिसके कर्ज से न हो पाया कभी स्वतंत्र
ऐसे इंसान को खोजा तो बस माँ दिखी।।

मोहित शर्मा स्वतंत्र गंगाधर
पीलीभीत(उ0प्र0)

जितने भी है लोग परेशान मिल रहे

इंसानों की बस्ती में हैवान मिल रहे
जितने भी है लोग परेशान मिल रहे

कातिल है बड़े,कत्ल की फिराक में
मौत के ही सब तरफ सामान मिल रहे

अपाहिज से बदत्तर है इनकी जिंदगी
जान है मगर सभी बेजान मिल रहे

समझता ही नहीं कोई भी जज्बात को
अपनो में लगता है अनजान मिल रहे

इकदूजे को नीचा दिखाने हो रही साजिश
पैतरे जितने भी है आसान मिल रहे

फैशन के चलन में है मर्यादा ताक पर”सागर”
कहने के है सिर्फ ऊँचे खानदान मिल रहे

-किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट

अंतर मन की प्यास

सारे उपक्रम धरे रह गए
टूटी मन की आस
सूख गया अंतर हृदय
बुझी न मन की प्यास ।

तृष्णा तेरे त्रास तंत्र का
कहां कोई प्रतिकार
तू जिसके उर बस गया
उसका उप संहार
अक्सर सहता है वहीं
जीवन में उपहास
सूख गया अंतर हृदय
बुझी न मन की प्यास ।

नित नित करता है सखा
खुद से ही षडयंत्र
मर्यादाएं तोड़ रहा नित
इतना हुआ स्वतंत्र
कौन भंवर मे फंस रहा
कहां उसे आभास
सूख गया अंतर हृदय
बुझी न मन की प्यास ।

प्रत्यक्षम् परिणाम पर
करता कहां विचार
धर्म त्याग कर आतुर है
करने को व्यापार
अंधकार की आदत डाले
ढूंढ़े बुद्धि प्रभास
सूख गया अंतर हृदय
बुझी न मन की प्यास ।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छग

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