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माँ – विमल कुमार अग्निहोत्री

सर्दियों के मौसम में जैसे धूप है माँ,,
धरती पर उस ईश्वर का रूप है माँ,,

गर्मी हो तो मानो ठंडी छाँव है माँ,,
जिसकी दुआ ना हारे वो दांव है माँ,,

हर घर में हर ख़ुशी का बहाव है माँ,,
मेरा शहर मेरी गली मेरा गाँव है माँ,,

माँ जैसी भी हो खुदा सी होती है,,
माँ की गालियां भी दुआ सी होती है,,

जिसकी दुआओं से शौहरत मिली है,,
मुझे माँ के पाँव तले जन्नत मिली है,,

मुझसे पूंछा मियां ने खुदा कहाँ है,,
मैंने हंसकर कहा मेरी माँ यहाँ है,,

चलते बदन में जैसे कोई जाँ नहीं,,
हर ख़ुशी अधूरी है जिसकी माँ नहीं,,

महबूब से बेहतर, माँ के करीब हो,,
खुदा कसम मियाँ बहुत खुशनसीब हो,,

-विमल कुमार अग्निहोत्री

एक गजल आपके हवाले

जुबां पर जिक्र तक आया नही है,
किसी का नाम दोहराया नही है,

ख़यालों को बहाया आसुओ मे,
गजल को और तडपाया नही है।

लिखा था शेर कल जो आसुओ से,
अभी महफिल मे वो गाया नही है।

रहा है वो हमेशा साथ मेरे,
मगर वो मेरा हमसाया नही है।

बहुत की उसको’ समझाने की कोशिश,
मगर उसको समझ आया नही है।

मुझे मालूम ये आदत है उसकी
किसी ने उसको बहकाया नही है।

मुहब्बत से सने उसके खतों को,
अभी तक मैने दफनाया नही है।

गयी थी छोड़ कर के जब से जाना,
जिन्दगी मे कोई आया नही है।

उन दिनो तोड डाला था जो उसने,
सचिन का दिल वो लौटाया नही है।

सचिन साधारण
8787072954

हिन्दी कविता- मिटा क्यो नहीं देते

नाम दहेज का सब मिटा क्यो नहीं देते |
बेटी ही दहेज सब बता क्यो नहीं देते |
दुनिया बदल रही दस्तूर बदलना चाहिए |
दहेज लोभियो सीख सीखा क्यो नहीं देते |
बेटा है जरूरी जितना बेटियाँ भी जरूरी |
दूल्हे के बाजार बेटे बीठा क्यो नहीं देते |
बेटे से कम सहारा बुढ़ापा वो न होगी |
बेटियो के किस्से दिखा क्यो नहीं देते |
वो रहेगा बिदेश संग अपनी बीबी बच्चो |
अकेले मर गई माँ बता क्यो नहीं देते |
सुन माँ बाप परेशानी दौड़ी चली आती |
पास है बेटा अंजान सुना क्यो नहीं देते |
है अगर बेटा तो बेटा बनकर दिखाओ |
माता पिता सेवा पाँव दबा क्यो नहीं देते |
दुआ भी मिलेगी बदी और बरक्क्त भी |
बनके श्रवण जमाने दिखा क्यो नहीं देते |
अहमियत बेटी की बेटो से करो ज्यादा |
राजदुलारी मिठाई खिला क्यो नहीं देते |
बेटिया घर के चूल्हा चौको सीमित न रही |
कुल परिवार सम्मान बढ़ा क्यो नहीं देते |
बेटी के गुण शिक्षा दिक्षा दहेज समझ लो |
दहेज दानव लगा आग जला क्यो नहीं देते |

श्याम कुँवर भारती [राजभर]

सोचा आज कह ही दूँ

जब भी किसी समस्या का समाधान हो जाता है तब तब सोशलमीडिया पर बहुत ही आपत्तिजनक टिपण्णीयां मिलती है वीर रस के कवियों के बारे में कही दुकान बंद हो गयी कही अब क्या बेचेंगे इत्यादि ,

मैं बताता हूँ आज आपको जो कविताएं किसी समस्या पर लिखी जाती है उस कवि का दिल बड़ा होता है जो जानता है कि मेरी रचना शहीद होगी फिर भी लिखता है जैसे माँ अपने बेटे को सरहद पर भेजती है । अरे आपको क्या पता उस कवि को कितनी अपार खुशी होती है जब उसकी रचना शहीद होती है वो भी बिना उफ़ किये, कविता लिखने का उद्देश्य सफ़ल हो गया और भला उसे क्या चाहिए , दूसरी बात रचना मरी है शहीद हुए है अगर आप कवि है या साहित्य को सम्मान देते है तो उस रचना को शहीद कहिये जो रचना अपने कर्तव्य पर टिकी रही और आखिर एक स्वर्णिम युग लाकर अपने परमधाम को चली गयी जिसके लिए वो इस पृथ्वी पर अवतरित हुई थी ।

और रही बात अब क्या बेचेंगे, देश मे जब तक साम्प्रदायिक दंगे , अश्लीलता , लोभ , पाप , अत्याचार , आदि होते रहेंगे तब तक हम अपनी रचनाएं शहीद होने के लिए लिखते रहेंगे।

धन्यवाद

अंकित चक्रवर्ती

कहानी कहां शेष है

उनकी आंखों में पानी कहां शेष है
सांस है , जिंदगानी कहां शेष है
भूल जाओ कहानी पढ़ी जो कभी
अब खतम है कहानी कहां शेष है ।

आग दिल मे लिए वो निकल तो गए
आँच थोड़ी पड़ी वो पिघल तो गए
आँख थी फिर भी देखा गया ही नही
पांव रखते जमी पर फिसल तो गए ।

कौन फिसलन से खुद को बचा पाएगा
जिंदगी अपनी मुट्ठी पकड़ लाएगा
देख साहस का दामन न छूटे कभी
कल सुबह फिर सवेरा नया आएगा ।

मुस्कुरा कर लगाओ सुबह को गले
देख पंछी भी अपने डगर को चले
तुम भी चलते चलो कहीं रुकना नही
दीप वो जो हवाओं में जलता जले ।

दीप बन कर अंधेरे से लड़ना सदा
लक्ष्य को ध्यान रखना बढ़ना सदा
बिन लड़े कोई जीता है कोई समर
जीत के बिंब निज श्रम से गढ़ना सदा ।

प्रेम पुष्पों के वे तो भ्रमर हो गए
मन से जो भी लड़े वे अमर हो गए
भाव श्रद्धा का लेकर चले हैं पथिक
चलने वालों के पग पग डगर हो गए ।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छग

खुली हव मे सांस ले सकें – विजय कल्याणी तिवारी

दुषित हवाओं से मुक्ति हो
खुली हवा में सांस ले सकें
कौन यहां अवतारी होगा
जिससे थोड़ी आस ले सकें ।

बिखरे बिखरे माला मोती
छिन्न भिन्न होती आशाएं
विश्वासों का रिश्ता टूटा
सघन सबल अंतस शंकाएं ।

प्रेम और करूंणा के बदले
कुंठा कटुता शेष बचा है
सारा उजला पन परिवर्तित
अंतस कालिख बसा रचा है ।

अपनों ने अपनों को लूटा
मन: भेद भी खूब बढ़े हैं
जिन पर रहा अटूट भरोसा
नित्य छद्म वे लोग गढ़े हैं ।

परिवर्तन के इस प्रभाव ने
सब कुछ उलट पुलट कर डाला
छुप छुप कर वे शहद चाटते
शेष कंठ में उतरे हाला ।

सत्य प्रताड़ित झूठ पुष्ट है
धर्म कर्म है बात पुरानी
बहुत सबल हो गई धूर्तता
गढ़ी जा रही अलग कहानी ।

जाने मौसम कब बदलेगा
कब परिवर्तन आ पाएगा
लगता है कि समय की आंधी
बहुत दूर तक जाएगा ।

आशा वादी सोचों का क्या
वे टक टकी लगाए हैं
कभी तो उनका रूख बदलेगा
जो बरजोर हवाएं हैं ।

सोच सघन परिवर्तन मांगे
प्रात जाग की मांग करे
आर्तनाद की अद्भुत पीड़ा
जाने कब कैसे कौन हरे ।

लगता है खुद के उपक्रम का
केवल पथ ही शेष बचा है
शायद ईश्वर का हम सबको
यहीं परम अनुदेश बचा है ।

शायद साहस कर उठ जाना
परिवर्तन का उपक्रम लाए
अंधकार का शमन करे और
समता का सूरज उग आए ।

भेद मिटे मन मिले सहज ही
परिवर्तन का चक्र चले
जहां जहां हो घना अंधेरा
वहां वहां पर दीप जले ।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छग-आभिव्यक्ति-592

पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा ही सही मायने में श्राद्ध है – एम के पाण्डेय ‘निल्को’

श्राद्ध का अर्थ है, श्रद्धा से जो कुछ दिया जाय

(श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम)

शास्त्रों में मनुष्य के लिए कुल 3 ऋण बतलाए गए हैं-

1. देव ऋण, 2. ऋषि ऋण और 3. पितृ ऋण।

ये तीन प्रकार के ऋण बतलाए गए हैं। इनमें श्राद्ध द्वारा पितृ ऋण उतारना आवश्यक माना जाता है, क्योंकि जिन माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्य और सुख-सौभाग्यादि की वृद्धि के अनेक यत्न या प्रयास किए, उनके ऋण से मुक्त न होने पर मनुष्य जन्म ग्रहण करना निरर्थक माना जाता है। श्राद्ध से तात्पर्य हमारे मृत पूर्वजों व संबंधियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान प्रकट करना है। 
दिवंगत व्यक्तियों की मृत्यु तिथियों के अनुसार इस पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन तिथियों में हमारे पितृगण इस पृथ्वी पर अपने-अपने परिवार के बीच आते हैं। श्राद्ध करने से हमारे पितृगण प्रसन्न होते हैं और हमारा सौभाग्य बढ़ता है। 
शुक्रवार, 13 सिंतबर को और शनिवार, 14 सितंबर को भादौ मास की पूर्णिमा है। इस तिथि पर भाद्रपद मास खत्म हो जाएगा। 15 सितंबर से आश्विन मास शुरू होगा। इस मास के कृष्ण पक्ष में पितृ पक्ष मनाया जाता है। इन दिनों में पितरों के लिए शुभ काम किए जाते हैं। आमतौर पर किसी व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि पर होती है, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। 
पुराण में 12 तरह के श्राद्ध बताए गए हैं जो की इस प्रकार है – 
नित्य श्राद्ध – पितृपक्ष के पूरे दिनों में हर रोज जल, अन्न, दूध और कुश से श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं। 
नैमित्तिक श्राद्ध – माता-पिता की मृत्यु के दिन यह श्राद्ध किया जाता है। इसे एकोदिष्ट कहा जाता है। 
काम्य श्राद्ध – यह श्राद्ध विशेष सिद्धि की प्राप्ति के लिए किया जाता है। 
वृद्धि श्राद्ध – सौभाग्य और सुख में कामना कामने के लिए वृद्धि श्राद्ध किया जाता है। 
सपिंडन श्राद्ध – यह श्राद्ध मृत व्यक्तियों को 12वें दिन किया जाता है। इसे महिलाएं भी कर सकती है। 
पार्वण श्राद्ध – इस श्राद्ध को पर्व की तिथि पर किया जाता है। इसलिए इसे पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। 
गोष्ठी श्राद्ध – जो श्राद्ध परिवार के सभी सदस्य मिलकर करते हैं उसे गोष्ठी श्राद्ध कहा जाता है। 
शुद्धयर्थ श्राद्ध – पितृपक्ष में किया जाने वाले यह श्राद्ध परिवार की शुद्धता के लिए किया जाता है। 
कर्मांग श्राद्ध – किसी संस्कार के मौके पर किया जाने वाले श्राद्ध कर्मांग श्राद्ध कहलाता है। 
तीर्थ श्राद्ध – किसी तीर्थ पर किये जाने वाला श्राद्ध तीर्थ श्राद्ध कहा जाता है। 
यात्रार्थ श्राद्ध – जो श्राद्ध यात्रा की सफलता के लिए किया जाता है उसे याश्रार्थ श्राद्ध कहा जाता है। 
पुष्टयर्थ श्राद्ध – जो श्राद्ध आर्थिक उन्ननि के लिए किए जाते हो इसे पुष्टयर्थ श्राद्ध कहा जाता है। 
अखिल भारतीय विद्वत महासभा के प्रवक्ता आचार्य पं शरदचन्द्र मिश्र बताते है की श्राद्ध कर्म मे कुछ ध्यान देने योग्य बातें भी है जिसका ध्यान रखना बहुत जरूरी है – 
1. श्राद्ध में दौहित्र (कन्या का पुत्र),कुतप काल (दिन के 15 मुहुर्त में आठवां मुहुर्त),और तिल को अत्यन्त पवित्र माना जाता है । 
2. श्राद्ध पक्ष के लिए शुक्ल पक्ष की अपेक्षा कृष्ण पक्ष, पूर्वाह्न की अपेक्षा अपराह्न श्रेष्ठ माना जाता है । 
3. पूर्वाह्न मे ,शुक्ल पक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों में तथा अपने जन्म दिन पर कभी श्राद्ध नही करना चाहिए । 
4. रात्रि में राक्षसी समय माना जाता है अतः रात्रि में श्राद्ध कर्म नही करना चाहिए । 
5. चतुर्दशी के दिन श्राद्ध करना अशुभ रहता है, जिनकी स्वाभाविक मृत्यु चतुर्दशी को हुई है, उनका श्राद्ध दूसरे दिन यानि अमावस्या को करना चाहिए, वैसे जो पितृ शस्त्र से मारे गये हैं वे चतुर्दशी के दिन श्राद्ध करने से प्रसन्न होते हैं । 
6. चाहें श्राद्ध पक्ष हो या न हो, किसी तीर्थस्थल पर पहुंचते ही सर्वप्रथम स्नान, तर्पण और श्राद्ध करना चाहिए । 
7. दोनो संध्यायों के समय श्राद्ध नही करना चाहिए । 
8. दिन के आठवें मुहूर्त (कुतप बेला) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है ।मध्याह्न काल, चांदी, कुश, गौ, तिल, नेपाल कम्बल और दौहित्र, खंगपात्र- –ये आठ कुतप माने गये है । 
9. दूसरे की भूमि में श्राद्ध नही करना चाहिए ।वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मन्दिर, ये दूसरे की भूमि नही माने जाते, क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नही माना जाता है । 
10. श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए, प्रदर्शन न करें । 
11. देव कर्म में (यदि चाहें तो) ब्राह्मण की परीक्षा न करें, लेकिन पितृकर्म में यत्नपूर्वक ब्राह्मण की परीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति तो ब्राह्मणों द्वारा ही होती है । 
12. श्राद्ध में ब्राह्मण को नियन्त्रित करना आवश्यक है जो विना ब्राह्मण के श्राद्ध करता है उसके घर में पितर भोजन नही करते, शाप देकर लौट जाते है ।ब्राह्मणहीन श्राद्ध से मनुष्य महापाप होता है । 
13. यदि श्राद्ध का भोजन करने वाले एक हजार ब्राह्मणों के सम्मुख एक भी योगी हो, तो वह यजमान के सहित सभी ब्राह्मणों का उद्धार कर देता है । 
14. श्राद्ध में जौ, काॅगुनी (टंगुनहिया),गेंहू, धान, तिल, मटर, कचनार, और सरसो का प्रयोग श्रेष्ठ रहता है ।तिल की मात्रा अधिक होने से श्राद्ध अक्षय हो जाता है ।वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करता है ।कुश राक्षसों से बचाता है । 
15. वेदज्ञ एक ब्राह्मण ही यदि श्राद्ध पर भोजन करे तो दस लाख अज्ञानी ब्राह्मणों करवाने के बराबर फल मिलता है । 
16. गुरू, नाना, मामा,भानजा? ससुर, दौहित्र, जामाता, बान्धव, ॠत्विज, एवं यज्ञ कर्ता इन दस को श्राद्ध में अवश्य भोजन कराना चाहिए । 
17. जो काम, क्रोध, अथवा भय के कारण- -पांच कोश (16 किलोमीटर) के भीतर रहने वाले जमाता, बहन तथा भानजे को भोजन नही कराता है एवं दूसरे को भोजन कराया, वहाॅ उसके पितरों के साथ देवता भी अन्न ग्रहण नही करते है । 
18. भानजा तथा भाई- बन्धु मूर्ख भी हो तो भी उसकी अनदेखी नही करनी चाहिए । 
19. जो एक श्राद्ध के अवसर पर आये अतिथि का सत्कार नही करते, उनका यह श्राद्ध का सम्पूर्ण फल नष्ट हो जाता है । 
20. श्राद्ध कर्म में सिर्फ गाय का दूध, दही, घी, काम में लेना चाहिए, परन्तु एक बात ध्यान रहे कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुका हो । 
21. श्राद्ध कर्म में मित्रों को बुलाकर श्राद्धान्न को मित्रता बढ़ाने का साधन बनाना श्राद्ध के अच्छे फल को नष्ट करता है । स्वर्ण, चाॅदी और ताम्बे के पात्र पितरों को प्रिय है श्राद्ध में चाॅदी का उपयोग, दर्शन और दान पुण्यदायक तो है ही, राक्षसों का नाश करने वाला भी माना जाता है । चाॅदी भगवान शिव के नेत्रों से उत्पन्न होने के कारण पितरों को प्रिय है । 
22. पितरों के लिए चाॅदी के पात्र में सिर्फ जल ही दिया जाय तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है ।पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के पात्र भी यदि चाॅदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना गया है । 
23. श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनो हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाया अन्नपात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते है । 
24. ब्राह्मणों को भोजन मौन रहकर और व्यंजनों की प्रशंसा किये वगैर करना चाहिए, क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन होकर भोजन ग्रहण करते है । 
अगर किसी को अपने परिजन की मृत्यु की तिथि सही-सही मालूम ना हो तो इसका श्राद्ध अमावस्या तिथि को किया जाना चाहिए। 
ऐसा विश्वास है कि श्राद्ध से प्रसन्न होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को आयु, धन, विद्या, सुख-संपत्ति आदि प्रदान करते हैं। पितरों के पूजन से मनुष्य को आयु, पुत्र, यश-कीर्ति, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। 

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