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ये जरुरी तो नहीं – अनुज शुक्ल

ये जरुरी तो नहीं……..
ख्वाबों में तेरा दीदार करु,
मैं टूटकर तुझसे प्यार करु,
पर तु भी मुझसे प्यार करें
ये जरुरी तो नहीं……..

माना तुम्हारे हजारों दिवाने है जमाने में,
पर मेरी तरह तुम्हें चाहे कोई,
ये जरुरी तो नहीं……..

हर मोड़ पर मिलेगें कोई न कोई जिन्दगी की राह में,
पर मेरे जैसा कोई मिले,
ये जरुरी तो नहीं……..

माना तुझे आता है चेहरें पर चेहरा लगाना,
पर मैं भी तेरी तरह बन जाऊ,
ये जरुरी तो नहीं……..

तंग है हालात तु नहीं है मेरे पास,
मै टूटकर बिखर जाऊ,
ये जरुरी तो नहीं……..

हुस्न वाले तो लाखों है जमाने में,
पर हर हुस्न वाले का दिल भी खुबसूरत हो,
ये जरुरी तो नहीं……..

ना जाने कितने शिकवे है मुझे तुझसे,
पर मैं तुझसे अपने दर्द का इजहार करु,
ये जरुरी तो नहीं……..

मैं जानता हॅू कि तुम मेरी नहीं हो सकती,
पर मैं तुम्हे चाहना छोड़ दूॅ,
ये जरुरी तो नहीं……..

अनुज शुक्ल

आज लिखने को कुछ नहीं – एम के पाण्डेय निल्को

सुना है तुम्हारे चाहने वाले बहुत हैं

ये मोहब्बत की मिठाई सब में बांट देती हो क्या

कई गिर चुके हैं तुम्हारे इश्क के मंजर में

अंखियों से गोली मार देती हो क्या

पुरानी बातों को इस लॉक डाउन में फिर से सजाना है

आज हमारे पास बस यादों का खजाना है

कभी लिखा था तुम्हारें जुल्फों पर शेर

पर आज पूरी गजल तुम पर बनाना है

पर ग़ज़ल लिखे तो लिखे कैसे

मुझे नहीं पता तुम हो कैसे

मैं हूं यहां निभा रहा हूं जिम्मेदारियां

पूरे देश में जमातियों को मैंने ही बुलाया हो जैसे

ये महामारी है इसका सामना करो

घर बैठो और मेरी यादों को ताजा करो

सोचो कब मिले थे हम दोनों

एक बार फिर से बातों को साझा करो

– एम के पाण्डेय निल्को

क्या रामायण का उत्तर कांड प्रक्षिप्त है….??


क्या राम ने सीता का त्याग किया था?शुद्र तपस्वी शम्बुक वध क्यों??प्रभु श्री राम के सन्दर्भ में कुछ भ्रांतियां अर्थात गलत बाते फैलाई गयी हैं उनका तार्किक निवारण..कृपया अपना कुछ मिनट दे कर इसे समझे जिससे आप धर्मद्रोहियों के झांसे न फसने पाएंगे..
भ्रान्ति: क्या श्रीराम जी शूद्र विरोधी थे? क्या उन्होने शंबूक का वध किया था ? क्या उन्होने गर्भवती सीता को छोड़ दिया था? क्या उनका या उनके भाइयों का लवकुश से युद्ध हुआ था? क्या सीता जी धरती मे समा गई थी??


निवारण: आजकल 2 पुस्तकें रामायण के नाम से जानी जाती है……..
1.वाल्मीकि रामायण 2.तुलसीदास जी की रामचरित मानस। इसमे से वाल्मीकि रामायण श्रीराम जी के समय मे लिखी गई है। आजकल प्राप्त वाल्मीकि रामायण मे 7 काण्ड (Chapter) हैं। अंतिम काण्ड उत्तर काण्ड है।
तपस्वी शंबूक का वध , लवकुश से युद्ध तथा गर्भवती माता सीता जी का त्याग दोनों इसी काण्ड मे आते है। परंतु सच्चाई यह है कि महर्षि वाल्मीकि ने जो रामायण लिखी थी उसमे 6 काण्ड ही थे। सातवा उत्तर काण्ड बाद मे (17 वी -18 वी शताब्दी मे ) मिलाया गया है। क्योकि उत्तर काण्ड महर्षि वाल्मीकि जी की रचना नहीं है इसलिए श्रीराम जी को तपस्वी शम्बूक का हत्यारा नहीं कहा जा सकता..ऐसा भ्रम फैलाया गया की श्री राम शम्बूक को पुष्पक विमान से ढूंढ कर उसका वध करते हैं जबकि
श्री राम का पुष्पक विमान लेकर शम्बूक को खोजना एक और असत्य कथन हैं क्यूंकि पुष्पक विमान तो श्री राम जी ने अयोध्या वापिस आते ही उसके असली स्वामी कुबेर को लौटा दिया था-सन्दर्भ- युद्ध कांड 127/62
प्रभु श्री राम को गर्भवती स्त्री माता सीता जी के त्याग का अपराधी भी नहीं कहा जा सकता. अतः सनातन धर्म के आदर्श मर्यादा पुरूषोंत्तम श्रीराम जी को बदनाम करने के लिए किसी दुष्ट ने ये उत्तर काण्ड बाद में मिलाया है.

इसके निम्नलिखित प्रमाण हैं।


1- “THE ILIAD OF THE EAST” “दी इलियड ऑफ दी ईस्ट” रामायण का इंगलिश मे संक्षिप्त अनुवाद है जो FREDERIKA RICHARDSON ने किया था। इसे MACMILLAN AND CO ने 1870 मे प्रकाशित किया था। इसमे केवल पहले 6 काण्डों का ही विवरण है। यदि इस अनुवादक के सामने उत्तरकाण्ड होता तो क्या वह उत्तरकाण्ड का अनुवाद न करता।


2 RALPH T. H. GRIFFITH ने 1874 में रामायण का इंगलिश मे अनुवाद किया है। इसे लंदन मे TRUBNER AND CO ने तथा भारत मे बनारस मे Lazarus And Co ने छापा था। इसमे भी पहले 6 भागों का अनुवाद है। युद्धकाण्ड के अंत मे अनुवादक उत्तरकांड के विषय मे लिखता हैं –
The Ramayan ends epically complete, with the triumphant return of Rama and his rescued queen to Ayodhya and his consecration and coronation in the capital of his forefathers. Even if the story were not complete, the conclusion of the last canto of the sixth Book evidently the work of a later hand than Valmiki’s, which speaks of Rama’s glorious and happy reign and promises blessings to those who read and hear the Ramayan, would be sufficient to show that, when these verses were added, the poem was considered to be finished.
अर्थात एक महाकाव्य के रूप मे रामयण विजयी राम की अपनी रानी को बचाने और अपने पूर्वजो की राजधानी मे राज्याभिषेक के साथ पूरी हो जाती है। छठे अध्याय के अंतिम खंड मे वाल्मीकि राम के गौरवशाली और खुशाहाल शासन की बात करते हैं और उनके लिए आशीर्वचन कहते हैं जो रामायण को पढ़ते और सुनते हैं। इससे यह निश्चित हो जाता है कि महाकाव्य यहाँ समाप्त हो जाता है। उत्तरकाण्ड बाद की रचना है जो किसी दूसरे द्वारा लिखी गई है।


3 – वाल्मीकि रामायण की संस्कृत में 3 टीका मिलती है. उसमे से सबसे मुख्य तथा पुरानी टीका श्री गोविन्दराज जी की है. गोविन्दराज जी ने अपना व् अपने गुरु का परिचय बालकाण्ड में रामयण के आरम्भ में तथा युद्ध काण्ड के अंत में दिया है. बिच में कहीं पर ही अपना परिचय नहीं दिया है. यदि गोविन्दराज जी के सामने उत्तर काण्ड होता तो वह अपना परिचय युद्ध काण्ड ने न देकर उत्तर काण्ड में देते.


4-सन 1900 के आसपास तक जो भी गोविन्दराज की टीका सहित वाल्मीकि रामायण छपी है उनमे उत्तरकाण्ड की टीका नहीं है. परन्तु 1930 के संस्करण में गोविन्दराज की उत्तर काण्ड पर टीका मिलती है.उसके उत्तर काण्ड पर जो टीका दी गई है वह पिछले 6 काण्डों की टीका से बिलकुल अलग है और उत्तर काण्ड को रामायण का हिस्सा दिखाने के लिए बनाई है.


5 भारत में वाल्मीकि रामायण को आधार बना कर कई प्रादेशिक भाषाओं में रामायण लिखी गई है. जैसे कम्ब रामायण (तमिल में), रंगनाथ तेलुगु (तेलुगु में), तोरवे रामायण (कन्नड़ में) तथा तुलसीदास जी की रामचरित मानस (अवधि में). अब हम क्रम से इन पर विचार करते हैं.
1]- कम्ब रामायण – इसका रचना काल लगभग बारहवी शताब्दी है. संस्कृत से भिन्न उपलब्ध भाषाओ में यह सबसे पुरानी रामायण है. इसके लेखक महाकवि कम्बन है. इसकी मूल भाषा तमिल है. अब तक इसके हिन्दी में (पहला अनुवाद 1962में बिहार राजभाषा परिषद् ) कई अनुवाद हो चुके है. इसमें भी बालकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक 6 ही काण्ड है. यह भी भगवान् श्रीराम जी के राज्य अभिषेक व् श्री राम जी द्वारा दरबार में सभी के लिए प्रशंसा वचन के साथ पूरी होती है. यह बहुत अधिक वाल्मीकि रामायण से मिलती है. यदि महाकवि कम्बन जी के सामने वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तो वह इसका वर्णन जरुर करते. परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थी उसमे 6 काण्ड ही थे.


[2] रंगनाथ रामायण – इसका रचना काल लगभग 1380 इस्वी है. इसकी भाषा तेलुगु है परन्तु अब इसका हिंदी में अनुवाद (1961 में बिहार राजभाषा परिषद द्वारा) चुका है. यह रामायण श्रीराम जी के राज्य अभिषेक व् दरबार के दृश्य के साथ पूरी हो जाती है . इसमें बालकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक 6 काण्ड है. यदि इसके रचियता के सामने उपलब्ध वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तो वह अवश्य ही उसका उल्लेख करते परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थी उसमे 6 काण्ड ही थे. *


[3]- तोरवे रामायण – इसका रचना काल लगभग 1500 इस्वी है. इसकी मूल भाषा कन्नड़ है परन्तु अब इसका हिंदी में अनुवाद चुका है. इसके लेखक तोरवे नरहरी जी है. यह रामायण श्रीराम जी के राज्य अभिषेक, सुग्रीव आदि को विदा करना, रामराज्य में सुख शान्ति, दरबार के दृश्य तथा रामायण पढने के लाभ के वर्णन के साथ पूरी हो जाती है . इसमें बालकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक 6 काण्ड है. यदि इसके रचियता के सामने उपलब्ध वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तो वह अवश्य ही उसका उल्लेख करते परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थी उसमे 6 काण्ड ही थे.
कृपया इसे आप सभी से किसी न किसी माध्यम से साझा जरुर करें जिससे धर्मद्रोहियों और भ्रांतियों का उत्तर मिल सके..
जय श्री राम

आशुतोष नाथ तिवारी

राम पर लिखना कठिन हैं….

पहले उसे छला गया । फिर वो वन चला गया ।।
एक वचन की लाज रखने । भाई के सर ताज रखने।।
माँ की ममता छोड़ कर । सारे बंधन तोड़ कर।।
राम पर लिखना कठिन है ।।


न थी लालसा वैभव की । न थी सत्ता की पिपासा ।। रखा ठोकर पर सिंहासन । और दी
पिता को दिलासा ।।
जानते थे वे प्रभु है । और वैभव सारे लघु है।।
सोचो तुम तनिक ये । अवतार लेकर मानव में ।।
आम रहना कितना कठिन है । राम पर लिखना कठिन है ।।

सूखा सकते थे वे सागर। फिर भी उन्होंने हाथ जोड़े।।
जीत लेते लंका को । फिर भी वानर साथ जोड़े।।

राम हो जब दुख ही देखो । सोच कर तुम ख़ुद ही देखो।।
पास हो जब सारी शक्ति। और जिसकी होती हो भक्ति।।
काम करना कितना कठिन है। राम पर लिखना कठिन है ।।
राम पर लिखना कठिन है ।।

Anshu Pathak

पराया हमें वो बताने लगे हैं

इशारे से सब कुछ जताने लगे हैं
मुझे अपना अब वो बनाने लगे हैं।

उठाया है मैने जिन्हें ज़िन्दगी भर,
वही आज मुझको गिराने लगे हैं।

बताते थे ख़ुद कभी यार जो कल
वही आज मुझको बेगाने लगे हैं।

रहेंगे सदा साथ कहते थे जो कल
वही आँख मुझसे चुराने लगे हैं।

न रखते थे नज़रों से ओझल कभी जो
वही आज मुझको भुलाने लगे हैं।

बनाया था हमने जिसे दिल से अपना,
पराया हमें वो बताने लगे हैं।

बसाया था हमने जिसे अपने दिल में,
वही आज नश्तर चुभाने लगे हैं।

अनुज शुक्ल
VMW Team

चांद अपनी चांदनी की रंगतों से डर गया

दिल हमारा जब तुम्हारी चाहतों से भर गया ।
चांद अपनी चांदनी की रंगतों से डर गया ।।

तेरी यादों में मेरे दिन रात कटते थे मगर।
मेरी नजरों में मेरे महबूब अब तू मर गया।।

आंख में पानी है होंठों पर मचलता है सवाल।
तुझसे पूछुं क्या तेरा एहसास इतना मर गया।।

मेरे चारों सिम्त सन्नाटों का इतना शोर है।
मेरा कमरा चीख के लम्हों से पल में भर गया।।

इन्तज़ार -ऐ-यार करना मेरी मजबूरी हुआ।
मैं अभी आता हूं ऐसा बोल कर दिलबर गया।।.

अलविदा कहकर गया वो फिर भी मेरे साथ है।
कैसे कह दूं दिल सजन की चाहतों से भर गया ।।

रात ढलकर सुबह आई कल्पना सपने धुले।
घर से निकली तो सफर में याद का लश्कर गया।।

“कल्पना गागडा़” शिमला, हिमाचल प्रदेश ।

कोरोना पर कुछ दोहे द्वारा सरिता कोहिनूर

कोरोना की फैलती,बीमारी घर द्वार।
महमारी भारी हुई,कहता अब संसार।।

काल भंयकर आ गया,भज लो प्रभू का नाम।
कोरोना का हो गया,विश्व बड़ा अब धाम।।

छूने से यह फैलता,खाँसी छींक जुकाम।
श्वसन तंत्र को फेल कर,मृत्यु लाय तमाम।

विचलित मानव सभ्यता,जीवन के आधार।
कोरोना का डर बुरा,घबराया संसार।।

अर्थव्यवस्था ठप्प है,ठप्प हुये सब काम।
मंदिर मस्जिद बंद है,घर में बंद अवाम।।

शेयर सभी लुटक गये,बंद हुये व्यापार।
भारी क्षती के दिख रहे,हम सबको आसार।।

त्राही त्राही मच गई, हुई प्रकृति की मार।
भैया अब तो बंद कर,सारे अत्याचार।।

साबुन से अब हाथ धो,कुछ मत छूना यार।
कहना यदि तुम मान लो,बचा रहे आधार।।

महमारी से जूझते,बूढे, बाल, जवान।
दूषित पानी अरु हवा,है विष वेल समान।।

कालेज इस्कूल बंद सब,और सिनेमा हाल।
सभागार सब बंद है,बंद हुये सब माल।।

सैर सपाटा बंद कर ,घर चुप बैठें लोग।
रूखी सूखी जो मिले,शांत लगाये भोग।।

कोरोना से हो रहा ,महा भयंकर नाश।
मानव मूरख खुद बना,करके जगत विनाश।।

सरिता कोहिनूर 💎

जन्मदिन कैसे मनाएं

किसी का जन्मदिवस मनाते समय, विशेषकर बच्चों का, यह प्रयास करना चाहिए कि मोमबत्ती की जगह मिट्टी के दीपक रखे जाएं और वो दीपक फूँक मार के बुझाया न जाये बल्कि बच्चे से ही उस दीपक को जलाने के लिए कहा जाए। कार्यक्रम पूरा होने पर दीपक में तेल/घी डालकर पूजा के कमरे/स्थान पर रखें और स्वाभाविक रूप से वो तेल/घी खत्म होने के बाद बुझ जाएगा। ऐसा नही की मेरा विचार वर्तमान आयोजनों के विरुद्ध है। यदि केक काट कर खाना है तो जरूर खाइए क्योंकि केक की जगह मिठाई या रसगुल्ला भी बिना काटे या तोड़े खाना संभव नही, परन्तु अपने बच्चे या कुटुंब के किसी सदस्य के नाम पर तुरंत जलाए हुए दीपक को उसी से फूंक मारकर बुझवा देना, धर्म तो छोड़िए विज्ञान या समाज की दृष्टि से भी अव्यवहारिक लगता है। एक बार इसी विमर्श पर किसी मित्र ने कहा कि यदि आप 20 मोमबत्ती बुझाते हैं तो उसका अर्थ ये है कि आप की आयु से 20 वर्ष कम हो गये या बुझ गए। यह एक कांसेप्ट जरूर हो सकता है परंतु मेरा मानना है कि 20 दीपक जला के यह भी कहा जा सकता है कि मैंने अपने जीवन के 20 साल आस-पास,समाज, परिवेश और देश को अपने स्तर से अपने हिस्से का उजाला देने का प्रयास किया है।
व्यक्तिगत विचार है जरूरी नही की हर कोई सहमत हो परंतु यदि अच्छा लगे तो इसे जरूर अपनाने का प्रयास करें।

आशुतोष की कलम से

यह दुनिया दीवानों की है

सरल धुनों पर तानों की है
भजनों,गीतों, गानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

बालकपन में हर बालक का
मनोभाव सच्चा लगता है
द्वेष- झूठ से बचे रहो तो
युवाकाल बच्चा लगता है
सस्ती मस्ती बहुत बुरी है
पर अच्छी मस्तानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

घर में रहें घरेलू बनकर
बाहर सबकुछ अनजाना है
रिश्तों का बंधन पूरा है
चाहे कम आना जाना है
अपनों में घुस गए पराये
भीड़ बढ़ी बेगानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

अपना अपना पात्र निभाने
हर कोई जग में आता है
उसमें ही खुश रहना होगा
जैसा, जहाँ मिला खाता है
चार दिनों की सबकी रौनक
खातिर सी मेहमानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

यहाँ बहुत चर्चे हैं उनके
जो परचों में छप जाते हैं
लेकिन बढ़ जाते हैं खर्चे
कभी-कभी जब नप जाते हैं
कहीं चित्त भी पट्ट उन्हीं की
गिरते चारों खानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

एकमात्र संदेश प्रेम का
द्वेष जगत आधार नहीं है
जो तुमने कुछ दिया न इसको
लेने का अधिकार नहीं है
सुन्दर पुष्पों की बगिया को
मत कह तीर कमानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

अमर अद्वितीय

आदमी इंसान बन जाए

काश आदमी इंसान बन जाये
मजहब सब का ईमान बन जाये ,

दैरो हरम सब मोहब्बत के हो
मोहब्बत पूजा अजान बन जाये ,

न अदावत हो भाई की भाई से
वो इस की ये उस की जान बन जाये ,

कर हिदायत अमीरे शहर को खुदा
कि मुफलिस पर मेहरबान बन जाये ,

रहे दिल में उस के हर पल फकीरी
चाहे मुल्क का सुल्तान बन जाये ,

जमीर जिन्दा रहे निगहे बान का
न वतन का वो बेईमान बन जाये ,

अगर ‘राकेश’ ये हो जाये वतन में
तो जन्नत हिंदुस्तान बन जाये ,
🎊🌷राकेश कुमार मिश्रा🌷🎊

फुलवाम शहीदों को नमन –अपना वतन चाहिए


न सोहरत न दौलत मुझे अपना वतन चाहिए |
फलता फूलता और मुझे खिलता चमन चाहिए |
न हो दुश्मन कोई न हो अड़चन कोई |
मर सकूँ मै वास्ते वतन तिरंगा कफन चाहिए |
खून शहीदो सींचकर हरा किया गुलशन |
शहीद होने न दे भारत ऐसा नव रतन चाहिए |
अपनी धरती की मिट्टी माथे लगायेंगे हम |
सह सके वार दुश्मन फ़ौलादी बदन चाहिए |
न हो पतझड़ कभी और बहारे मुस्कुराए सदा |
हरी धरती मे बहती गंगा बाँकपन चाहिए |
बढ़े भाईचारा यंहा लोग सारे मिलके रहे |
देश तेरा न मेरा सबका ऐसा मन चाहीए |
न हिन्दू मुस्लिम कोई सब बनके भाई रहे |
न हो दंगा कही देश शांति औ अमन चाहिए |
मै रहूँ न रहूँ हिन्द जिंदाबाद रहे |
शान तिरंगा रहे भारती हिन्द नमन चाहिए |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )-
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
मोब।/व्हात्सप्प्स -9955509286

Propose Day – हमको तुमसे प्यार बहुत है

एक तुम्हारा होना पूरे घर को पावन कर देता है
मन मथुरा काशी बसती है दिल को मधुवन कर देता है
तेरी छुवन से रोम रोम भी जैसे संदल हो जाता है
पानी कब पानी रहता है ये गंगाजल हो जाता है!!

मेरे जीने की खातिर बस इतना सा आधार बहुत है
हमको तुमसे प्यार बहुत है…!!

उजियारा दस्तक देता है और अंधेरा छँट जाता है
नाम तुम्हारा लेते लेते सफर हमारा कट जाता है
पास अगर तुम होती हों तो जैसे सब अच्छा रहता है
साथ तुम्हारे जीवन जी लूं बस इतना ये मन कहता है!!

हाथ पकड़ कर साथ चलूँ मैं इतना सा अधिकार बहुत है
हमको तुमसे प्यार बहुत है…!!

तुम बिन खुशियाँ व्यर्थ है सारी त्योहारों मे बात नही है
चौराहों पर दीप जलें है पर चमकीली रात नही है
भीड़ बहुत है लोग बहुत हैं फिर भी सूनापन लगता है
सूने सूने हम अंदर से सूना घर आंगन लगता है!!

बिना तुम्हारे जीवन जीना लगता अब बेकार बहुत है
हमको तुमसे प्यार बहुत है…!!

कुलदीप सिंह नवाब

तेरी सोच से बहुत दुर निकल चुँका हूँ

की मैं अब तेरी सोच से बहुत दुर निकल चुँका हूँ
की तू बदला था जिस तरह मैं भी बदल चुँका हूँ

की तू अब मुझे शिकस्त देने मत सोच मेरे दोस्त
मैंने दुनिया पढ ली है मै भी दुनिया मै ढल चुँका हूँ

की अब तो दिल को पत्थर कर लिया है मैने
पिघलना था जितना यार पहले पिघल चुँका हूँ

अब तो मेरे कदम का रूकना मुमकिन नही है
मंजिल की तरफ मै तो कब का चल चुकाँ हूँ

की अब तू भी मजा ले जलने का इतंजार मे मेरे
तेरे इंतजार मे,मै तो मुद्तो जल चुँका हूँ

झूठी तसल्ली न दे प्रकाश दिल को तू अपने
याद उसे ही करता है रोज कहता बदल चुँका हूँ

शायर प्रकाश नागपुरी

हमारा देश हमारा परिवार

नजरें छुपा-छुपा कर
तुम जा कहाँ रहे हो
ये देश है हमारा
क्यूँ इसे ठुकरा रहे हो।

बन के तू आतंकी
पुरानी सीरत गवा रहे हो
अपने गोलियों के धुन से
क्यूँ इसको डरा रहे हो

क्या तुम्हें पता है
इसी भूमि पर पले बढ़े हो
फिर इन बारूदों से
क्यूँ सीना इसका दहला रहे हो।

कल तक था जिनको पूजा
आज उन्हें ही रूला रहे हो
कल बनाया जिसे सुहागन
आज सुहाग उसका मिटा रहे हो
नजरों की बात छोड़ो
क्यूँ बहन से कलाई छुपा रहे हो।

यहाँ मां, बहन, बेटी,भाई सभी हमारे
फिर क्यूँ दरिंदे बन रहे हो
अपनी दरिंदगी से
क्यूँ इनको सता रहे हो।

अब भी वक्त है तू आ जा
जिस राह से गुजर रहे हो
जिससे खिल उठे वतन हमारा
क्यूँ न उसे अपना रहे हो।
ये देश नहीं परिवार है हमारा
क्यूँ इसको सता रहे हो।

आपका:–प्रियव्रत कुमार

यशवंती जिसे तानाजी में भुला दिया गया

कोंडाणा के किले में चढ़ने के लिए तानाजी ने यशवंती नामक गोह प्रजाति की छिपकली का प्रयोग किया था जिसको फ़िल्म में नही दिखाया गयावर्णन है, चढ़ाई के लिए तानाजी ने अपने बक्से से यशवंती को निकाला, उसे कुमकुम और अक्षत से तिलक किया और किले की दीवार की तरफ उछाल दिया किन्तु यशवंती किले की दीवार पर पकड़ न बना पायी । फिर दूसरा प्रयास किया गया लेकिन यशवंती दुबारा नीचे आ गयी, भाई सूर्याजी व शेलार मामा ने इसे अपशकुन समझा, तब तानाजी ने कहा कि अगर यशवंती इस बार भी लौट आयी तो उसका वध कर देंगे और यह कहकर दुबारा उसे दुर्ग की तरफ उछाल दिया, इस बार यशवंती ने जबरदस्त पकड़ बनाई और उससे बंधी रस्सी से एक टुकड़ी दुर्ग पर चढ़ गई
अंत मे जब यशवंती को मुक्त करना चाहा तो पाया कि यशवंती भी भारी वजन के कारण वीरगति को प्राप्त हो चुकी थी किन्तु उसने अपनी पकड़ नही छोड़ी थी
तो हमारे देश मे होने को तो चेतक और यशवंती जैसे देशभक्त जानवर भी हुए है और न होने को कई जयचंद भी है ।
इस पोस्ट द्वारा यशवंती को नमन

वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

दूरियां इस कदर मिटाने लगे हैं
वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

बन्द आँखों से भी नजर आते हैं
इस कदर दिल मे समाने लगे हैं

रूठ सकते नहीं एक पल के लिए
रूठ जाऊं तो फिर मनाने लगे हैं

रंगीनियां और मस्ती का आलम
ख्वाब आँखों में सजाने लगे हैं

मेरे अपने हुए, नहीं वो अजनबी
हाले दिल अपना बताने लगे हैं

जिंदगी भी तो मेरी मुस्कुराने लगी
अपनापन जबसे जताने लगे हैं

-किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट

मरता हूँ तुमपे

इश्क में चोट सदा खाई है
बात से बात निकल आई है

हिज्र की कैसी ये रुसवाई है
जाँ मेरी बहुत ही घबराई है

है सनम जलवा तुम्हारा
करती बैचेन वो अंगड़ाई है

मुझ को कोई अच्छा नहीं लगता
मरता हूँ तुम पे ये सच्चाई है

जिंदगी तुम हो ही लेकिन
मेरे हिस्से में क्यूँ रुसवाई है

जोड़ के गैर से रिश्ता तुम ने
खुद को मुझसे किया हरजाई है

कोई अब कुछ भी कहे उनको
राकेश मैं दुआ दूंगा कसम खाई है ,
_*🎊🌷राकेश कुमार मिश्रा🌷🎊*_

कुछ यूं ही…… – डॉ नीलम

तू कभी मिले जो फुर्सत में ए जिंदगी
तो बैठ कर कहीं दो दो जाम हो जाए

कुछ हाल अपना सुनाएं कुछ तेरा सुने
बस यूं ही वक्त कटे और जिंदगी की शाम हो जाए

बहुत तल्खियां हैं नसीब में अपनी
आ जिंदगी कुछ तो तेरे नाम कर जाएं

खुदा ने हथेलियां तो दी मगर लकीरें भूल गया
चल कुछ नहीं तो खंजर से ही लकीरें खींच आएं

जिंदगी, नाराज नहीं तुझसे बस शिकवा है यही
हर बार मेरी गली के मोड़ से ही तू मुड़ जाए।

डा. नीलम

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