Category Archives: कहानी/ कविता

यह दुनिया दीवानों की है

सरल धुनों पर तानों की है
भजनों,गीतों, गानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

बालकपन में हर बालक का
मनोभाव सच्चा लगता है
द्वेष- झूठ से बचे रहो तो
युवाकाल बच्चा लगता है
सस्ती मस्ती बहुत बुरी है
पर अच्छी मस्तानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

घर में रहें घरेलू बनकर
बाहर सबकुछ अनजाना है
रिश्तों का बंधन पूरा है
चाहे कम आना जाना है
अपनों में घुस गए पराये
भीड़ बढ़ी बेगानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

अपना अपना पात्र निभाने
हर कोई जग में आता है
उसमें ही खुश रहना होगा
जैसा, जहाँ मिला खाता है
चार दिनों की सबकी रौनक
खातिर सी मेहमानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

यहाँ बहुत चर्चे हैं उनके
जो परचों में छप जाते हैं
लेकिन बढ़ जाते हैं खर्चे
कभी-कभी जब नप जाते हैं
कहीं चित्त भी पट्ट उन्हीं की
गिरते चारों खानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

एकमात्र संदेश प्रेम का
द्वेष जगत आधार नहीं है
जो तुमने कुछ दिया न इसको
लेने का अधिकार नहीं है
सुन्दर पुष्पों की बगिया को
मत कह तीर कमानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

अमर अद्वितीय

आदमी इंसान बन जाए

काश आदमी इंसान बन जाये
मजहब सब का ईमान बन जाये ,

दैरो हरम सब मोहब्बत के हो
मोहब्बत पूजा अजान बन जाये ,

न अदावत हो भाई की भाई से
वो इस की ये उस की जान बन जाये ,

कर हिदायत अमीरे शहर को खुदा
कि मुफलिस पर मेहरबान बन जाये ,

रहे दिल में उस के हर पल फकीरी
चाहे मुल्क का सुल्तान बन जाये ,

जमीर जिन्दा रहे निगहे बान का
न वतन का वो बेईमान बन जाये ,

अगर ‘राकेश’ ये हो जाये वतन में
तो जन्नत हिंदुस्तान बन जाये ,
🎊🌷राकेश कुमार मिश्रा🌷🎊

फुलवाम शहीदों को नमन –अपना वतन चाहिए


न सोहरत न दौलत मुझे अपना वतन चाहिए |
फलता फूलता और मुझे खिलता चमन चाहिए |
न हो दुश्मन कोई न हो अड़चन कोई |
मर सकूँ मै वास्ते वतन तिरंगा कफन चाहिए |
खून शहीदो सींचकर हरा किया गुलशन |
शहीद होने न दे भारत ऐसा नव रतन चाहिए |
अपनी धरती की मिट्टी माथे लगायेंगे हम |
सह सके वार दुश्मन फ़ौलादी बदन चाहिए |
न हो पतझड़ कभी और बहारे मुस्कुराए सदा |
हरी धरती मे बहती गंगा बाँकपन चाहिए |
बढ़े भाईचारा यंहा लोग सारे मिलके रहे |
देश तेरा न मेरा सबका ऐसा मन चाहीए |
न हिन्दू मुस्लिम कोई सब बनके भाई रहे |
न हो दंगा कही देश शांति औ अमन चाहिए |
मै रहूँ न रहूँ हिन्द जिंदाबाद रहे |
शान तिरंगा रहे भारती हिन्द नमन चाहिए |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )-
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
मोब।/व्हात्सप्प्स -9955509286

Propose Day – हमको तुमसे प्यार बहुत है

एक तुम्हारा होना पूरे घर को पावन कर देता है
मन मथुरा काशी बसती है दिल को मधुवन कर देता है
तेरी छुवन से रोम रोम भी जैसे संदल हो जाता है
पानी कब पानी रहता है ये गंगाजल हो जाता है!!

मेरे जीने की खातिर बस इतना सा आधार बहुत है
हमको तुमसे प्यार बहुत है…!!

उजियारा दस्तक देता है और अंधेरा छँट जाता है
नाम तुम्हारा लेते लेते सफर हमारा कट जाता है
पास अगर तुम होती हों तो जैसे सब अच्छा रहता है
साथ तुम्हारे जीवन जी लूं बस इतना ये मन कहता है!!

हाथ पकड़ कर साथ चलूँ मैं इतना सा अधिकार बहुत है
हमको तुमसे प्यार बहुत है…!!

तुम बिन खुशियाँ व्यर्थ है सारी त्योहारों मे बात नही है
चौराहों पर दीप जलें है पर चमकीली रात नही है
भीड़ बहुत है लोग बहुत हैं फिर भी सूनापन लगता है
सूने सूने हम अंदर से सूना घर आंगन लगता है!!

बिना तुम्हारे जीवन जीना लगता अब बेकार बहुत है
हमको तुमसे प्यार बहुत है…!!

कुलदीप सिंह नवाब

तेरी सोच से बहुत दुर निकल चुँका हूँ

की मैं अब तेरी सोच से बहुत दुर निकल चुँका हूँ
की तू बदला था जिस तरह मैं भी बदल चुँका हूँ

की तू अब मुझे शिकस्त देने मत सोच मेरे दोस्त
मैंने दुनिया पढ ली है मै भी दुनिया मै ढल चुँका हूँ

की अब तो दिल को पत्थर कर लिया है मैने
पिघलना था जितना यार पहले पिघल चुँका हूँ

अब तो मेरे कदम का रूकना मुमकिन नही है
मंजिल की तरफ मै तो कब का चल चुकाँ हूँ

की अब तू भी मजा ले जलने का इतंजार मे मेरे
तेरे इंतजार मे,मै तो मुद्तो जल चुँका हूँ

झूठी तसल्ली न दे प्रकाश दिल को तू अपने
याद उसे ही करता है रोज कहता बदल चुँका हूँ

शायर प्रकाश नागपुरी

हमारा देश हमारा परिवार

नजरें छुपा-छुपा कर
तुम जा कहाँ रहे हो
ये देश है हमारा
क्यूँ इसे ठुकरा रहे हो।

बन के तू आतंकी
पुरानी सीरत गवा रहे हो
अपने गोलियों के धुन से
क्यूँ इसको डरा रहे हो

क्या तुम्हें पता है
इसी भूमि पर पले बढ़े हो
फिर इन बारूदों से
क्यूँ सीना इसका दहला रहे हो।

कल तक था जिनको पूजा
आज उन्हें ही रूला रहे हो
कल बनाया जिसे सुहागन
आज सुहाग उसका मिटा रहे हो
नजरों की बात छोड़ो
क्यूँ बहन से कलाई छुपा रहे हो।

यहाँ मां, बहन, बेटी,भाई सभी हमारे
फिर क्यूँ दरिंदे बन रहे हो
अपनी दरिंदगी से
क्यूँ इनको सता रहे हो।

अब भी वक्त है तू आ जा
जिस राह से गुजर रहे हो
जिससे खिल उठे वतन हमारा
क्यूँ न उसे अपना रहे हो।
ये देश नहीं परिवार है हमारा
क्यूँ इसको सता रहे हो।

आपका:–प्रियव्रत कुमार

यशवंती जिसे तानाजी में भुला दिया गया

कोंडाणा के किले में चढ़ने के लिए तानाजी ने यशवंती नामक गोह प्रजाति की छिपकली का प्रयोग किया था जिसको फ़िल्म में नही दिखाया गयावर्णन है, चढ़ाई के लिए तानाजी ने अपने बक्से से यशवंती को निकाला, उसे कुमकुम और अक्षत से तिलक किया और किले की दीवार की तरफ उछाल दिया किन्तु यशवंती किले की दीवार पर पकड़ न बना पायी । फिर दूसरा प्रयास किया गया लेकिन यशवंती दुबारा नीचे आ गयी, भाई सूर्याजी व शेलार मामा ने इसे अपशकुन समझा, तब तानाजी ने कहा कि अगर यशवंती इस बार भी लौट आयी तो उसका वध कर देंगे और यह कहकर दुबारा उसे दुर्ग की तरफ उछाल दिया, इस बार यशवंती ने जबरदस्त पकड़ बनाई और उससे बंधी रस्सी से एक टुकड़ी दुर्ग पर चढ़ गई
अंत मे जब यशवंती को मुक्त करना चाहा तो पाया कि यशवंती भी भारी वजन के कारण वीरगति को प्राप्त हो चुकी थी किन्तु उसने अपनी पकड़ नही छोड़ी थी
तो हमारे देश मे होने को तो चेतक और यशवंती जैसे देशभक्त जानवर भी हुए है और न होने को कई जयचंद भी है ।
इस पोस्ट द्वारा यशवंती को नमन

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