Author Archives: vmwteam

आदमी इंसान बन जाए

बक्श तौफीक सब को खुदा आदमी इन्सान बन जाये
मोहब्बत लगा ले गले नफरत से अन्जान बन जाये ,

इल्तजा भी बस इतनी आदमी को इन्सान बनाने की
मैंने ये तो नहीं कहा था आदमी शैतान बन जाये ,

जज्बा इन्सानियत का हर इन्सान में भर दे अल्लाह
फिर कुछ फर्क नहीं कि वो हिन्दु या मुसलमान बन जाये ,

ये खबर किसी को हो न हो लेकिन मुझे खबर है सब
तेरी इनायत की नजर से सहरा गुलिस्तान बन जाये ,

न आबो-दाना , न आशियाना जिस वतन की आवाम पास
किस काम का लीडर , चाहे वतन का सुल्तान बन जाये ,

बनाये रखना हाथ अपना सर पे ‘राकेश’ के ऐ खुदा
ऐसा न हो बेच कर जमीर वो बेईमान बन जाये ,

राकेश कुमार मिश्रा

महाराष्ट्र का नाटक

चाहत में कुर्सी की देखो नीति नियम सब ध्वस्त हुए ।
संस्कार सद्भाव समर्पण मानो रवि सम अस्त हुए॥

नवाचार दिखता है यहां अब केवल भ्रष्टाचारी का।
चहुंओर डंका है बजता गद्दारी मक्कारी का॥

सरे बाजारों में अब नेताओं की मंडी लगती है।
राजनीति की शक्ल मुझे अब क्रूर घमंडी लगती है।

खूब विधायक बिकते है अब मंहगे सस्ते दामो में।
खूब कमाई होती है अब उल्टे सीधे कामों में॥

कोई विधायक छुपा रहा हैं कोई उन्हे पुचकार रहा।
लालच देता मंत्री का पद का कोई जूता मार रहा॥

नैतिकता की बातें अक्सर घोषणाओं में मिलती हैं।
शक्ल देखने नेता की केवल चुनावों में मिलती हैं॥

बेशक दीपक बिन बाती के हरगिज कभी नहीं जलता।
लेकिन राजनीति के अंदर ऐसा नियम नहीं चलता॥

मेरा दीपक तेरी बाती उसका तेल जलाएंगे।
आओ चोरों हम सब मिलकर के सरकार बनाएंगे॥

जब तक संभव है तब तक ही सारे मौज उडाएंगे।
एक दिन हम सब मिलकर के इस भारत को खा जाएंगे॥

– बृजबिहारी ‘ विराट ‘

महाराष्ट्र का नाटक

चाहत में कुर्सी की देखो नीति नियम सब ध्वस्त हुए ।
संस्कार सद्भाव समर्पण मानो रवि सम अस्त हुए॥

नवाचार दिखता है यहां अब केवल भ्रष्टाचारी का।
चहुंओर डंका है बजता गद्दारी मक्कारी का॥

सरे बाजारों में अब नेताओं की मंडी लगती है।
राजनीति की शक्ल मुझे अब क्रूर घमंडी लगती है।

खूब विधायक बिकते है अब मंहगे सस्ते दामो में।
खूब कमाई होती है अब उल्टे सीधे कामों में॥

कोई विधायक छुपा रहा हैं कोई उन्हे पुचकार रहा।
लालच देता मंत्री का पद का कोई जूता मार रहा॥

नैतिकता की बातें अक्सर घोषणाओं में मिलती हैं।
शक्ल देखने नेता की केवल चुनावों में मिलती हैं॥

बेशक दीपक बिन बाती के हरगिज कभी नहीं जलता।
लेकिन राजनीति के अंदर ऐसा नियम नहीं चलता॥

मेरा दीपक तेरी बाती उसका तेल जलाएंगे।
आओ चोरों हम सब मिलकर के सरकार बनाएंगे॥

जब तक संभव है तब तक ही सारे मौज उडाएंगे।
एक दिन हम सब मिलकर के इस भारत को खा जाएंगे॥

– बृजबिहारी ‘ विराट ‘

औरत के गीले बाल और लोकतंत्र

पॉलिटिकल साइंस के सेमिनार में एक विद्यार्थी का बयान था कि मेरा तो यक़ीन लोकतंत्र पर से सन 1996 में ही उठ गया था..
कहने लगा कि ये उन दिनों की बात है जब एक शनिवार को मैं मेरे बाक़ी तीनों बहन भाई, मम्मी पापा के साथ मिलकर रात का खाना खा रहे थे ।
पापा ने पूछा:- कल तुम्हारे चाचा के घर चलें या मामा के घर?
हम सब भाइयों बहनों ने मिलकर बहुत शोर मचा कर चाचा के घर जाने को कहा, सिवाय मम्मी के जिनकी राय थी कि मामा के घर जाया जाए।
बात बहुमत की मांग की थी और अधिक मत चाचा के खेमे में पड़े थे …बहुमत की मांग के मुताबिक़ तय हुआ कि चाचा के घर जाना है। मम्मी हार गईं। पापा ने हमारे मत का आदर करते हुए चाचा के घर जाने का फैसला सुना दिया। हम सब भाई बहन चाचा के घर जाने की ख़ुशी में जा कर सो गये।
रविवार की सुबह उठे तो मम्मी गीले बालों को तौलिए से झाड़ते हुए बमुश्किल अपनी हंसी दबा रहीं थीं..उन्होंने हमसे कहा के सब लोग जल्दी से कपड़े बदल लो हम लोग मामा के घर जा रहें हैं।
मैंने पापा की तरफ देखा जो ख़ामोशी और तवज्जो से अख़बार पढ़ने की एक्टिंग कर रहे थे.. मैं मुंह ताकता रह गया..
बस जी! मैंने तो उसी दिन से जान लिया है कि लोकतंत्र में बहुमत की राय का आदर… और वोट को इज़्ज़त … सब ढकोसले है।
“असल फैसला तो बन्द कमरे में उस वक़्त होता है जब ग़रीब जनता सो रही होती है”
इसके बाद उस विद्यार्थी ने पोलिटिकल साइंस छोड़कर इकोनॉमिक्स ले ली ।।

परिवर्तन को आने दो

धीरे धीरे मुख्य द्वार से
परिवर्तन को आने दो
जो संदेशा ले आया है
निज स्वर उसे सुनाने दो ।

केवल शुभ सुनने की मंसा
लेकर सदा चले आते हो
व्यर्थ ज्ञान की लिए पुस्तिका
जब जी चाहे समझाते हो
कब तक सच से मुख मोड़ोगे
कितना रार बढ़ाओगे
वह दिन जाने कब आए
जब निज मन को समझाओगे
खोलो मन की बंद किवड़िया
कुछ शुद्ध हवा तो आने दो
धीरे – धीरे मुख्य द्वार से
परिवर्तन को आने दो ।

स्वीकारो उन्मुक्त हृदय से
प्रगति पथिक बढ़ते जाओ
संशय शंका जहां जहां हो
निज मन दीप जलाओ
पाप श्राप से मुक्त रहे तन
कटे जनम भव बंधन
जग की रीत नीत निभ जाए
बन भागी अभिनंदन
धारण हो संदेश ईश का
धर्म ध्वजा लहराने दो
धीरे – धीरे मुख्य द्वार से
परिवर्तन को आने दो ।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छग

माँ के नाम

मुश्किलों से घिरी जब मुझे मेरी जाँ दिखी।
मैंनें आँखें बन्द की सामने खड़ी माँ दिखी।।

संघर्षों के बादलों ने जब गर्जना शुरू किया
मैंने सराय माँगी तो वाहें फैलाए माँ दिखी।।

घिरने की आदत बचपन की बदल न सका
जब भी गिरा तो संभालती मुझे माँ दिखी।।

नींद ने भी जब मुझसे तोड़ा नाता अपना
घुटने पर सर रख लोरी सुनाती माँ दिखी।।

मैंने अब तलक संभाले रखा है डर खुद में
जिसमें संस्कारों का पाठ पढाती माँ दिखी।।

जिसके कर्ज से न हो पाया कभी स्वतंत्र
ऐसे इंसान को खोजा तो बस माँ दिखी।।

मोहित शर्मा स्वतंत्र गंगाधर
पीलीभीत(उ0प्र0)

जितने भी है लोग परेशान मिल रहे

इंसानों की बस्ती में हैवान मिल रहे
जितने भी है लोग परेशान मिल रहे

कातिल है बड़े,कत्ल की फिराक में
मौत के ही सब तरफ सामान मिल रहे

अपाहिज से बदत्तर है इनकी जिंदगी
जान है मगर सभी बेजान मिल रहे

समझता ही नहीं कोई भी जज्बात को
अपनो में लगता है अनजान मिल रहे

इकदूजे को नीचा दिखाने हो रही साजिश
पैतरे जितने भी है आसान मिल रहे

फैशन के चलन में है मर्यादा ताक पर”सागर”
कहने के है सिर्फ ऊँचे खानदान मिल रहे

-किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट

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