Author Archives: vmwteam

वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

दूरियां इस कदर मिटाने लगे हैं
वो नजदीक मेरे आने लगे हैं

बन्द आँखों से भी नजर आते हैं
इस कदर दिल मे समाने लगे हैं

रूठ सकते नहीं एक पल के लिए
रूठ जाऊं तो फिर मनाने लगे हैं

रंगीनियां और मस्ती का आलम
ख्वाब आँखों में सजाने लगे हैं

मेरे अपने हुए, नहीं वो अजनबी
हाले दिल अपना बताने लगे हैं

जिंदगी भी तो मेरी मुस्कुराने लगी
अपनापन जबसे जताने लगे हैं

-किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट

मरता हूँ तुमपे

इश्क में चोट सदा खाई है
बात से बात निकल आई है

हिज्र की कैसी ये रुसवाई है
जाँ मेरी बहुत ही घबराई है

है सनम जलवा तुम्हारा
करती बैचेन वो अंगड़ाई है

मुझ को कोई अच्छा नहीं लगता
मरता हूँ तुम पे ये सच्चाई है

जिंदगी तुम हो ही लेकिन
मेरे हिस्से में क्यूँ रुसवाई है

जोड़ के गैर से रिश्ता तुम ने
खुद को मुझसे किया हरजाई है

कोई अब कुछ भी कहे उनको
राकेश मैं दुआ दूंगा कसम खाई है ,
_*🎊🌷राकेश कुमार मिश्रा🌷🎊*_

कुछ यूं ही…… – डॉ नीलम

तू कभी मिले जो फुर्सत में ए जिंदगी
तो बैठ कर कहीं दो दो जाम हो जाए

कुछ हाल अपना सुनाएं कुछ तेरा सुने
बस यूं ही वक्त कटे और जिंदगी की शाम हो जाए

बहुत तल्खियां हैं नसीब में अपनी
आ जिंदगी कुछ तो तेरे नाम कर जाएं

खुदा ने हथेलियां तो दी मगर लकीरें भूल गया
चल कुछ नहीं तो खंजर से ही लकीरें खींच आएं

जिंदगी, नाराज नहीं तुझसे बस शिकवा है यही
हर बार मेरी गली के मोड़ से ही तू मुड़ जाए।

डा. नीलम

सलीका – शायर भट्टी

थोरी देर खड़े हुए थे *छाँव* में ।
आ गऐ है सभ की हम *निगाहों* में।

एक बार उसने गले लगाया था,
सारा जहाँ सिमट गया था *बाँहो* में।

युं ही नहीं संभल के चलना आया मुझे,
फूल नहीं काँटे थे मेरी *राहों* में।

लुप्त हुई है नस्लें कई परिंदों की,
इन्सानों ने ही घोला ज़हर *फिज़ाओं* में।

निकाल घर से दूआऐं देने वालोें को,
ढूंढ रहे हैं जिंदगी अब *दवाओं* में।

शहर में आ कर भी मैं परेशान नहीं हुआ,
सलीका जीने का सीखा हुआ है *गाँवों* में।

समुद्री तुफान भी मेरा कुछ बिगाड़ ना सके,
भट्टी माँ का नाम लिखा था मेने *नाव* में।

*शायर भट्टी*

भूचाल आ जाए

हर एक दिल में काश ख्याल आ जाये
रंजिशें मिटाने को भूचाल आ जाये ,

हर बशर में नूर उस का फिर क्यों झगड़े
हर जुबां पे काश ये सवाल आ जाये ,

गुनाहों की दुनिया से वाबस्ता रहे
क्या मजाल चेहरे मलाल आ जाये

बुझे बुझे चेहरे दिखे मुफ़लिसों के
खुदा करे के उन पर जमाल आ जाये

सितारे तोड़ मैं बांट दूँ मुफ़लिसों में
‘राकेश’ हाथों में गर कमाल आ जाये ,
_*🎊🌷राकेश कुमार मिश्रा🌷🎊*_

मुक्तक – दिनेश अवस्थी फर्रुखाबाद।

जीवन है एक संग्राम पीछे पग न धारिये।
बढ़ते रहो अविराम अपना मन न मारिये।
हर पल विजय की आशा और विश्वास को लिए,
भजिए हरी का नाम सारे दुःख बिसारिये।
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मत दीन वचन औरों के सम्मुख न बोलिए।
राज दिल का भी प्यारे अपना न खोलिए।
सुनकर हंसेंगे लोग बांटेंगे न इंच भर,
वाणी की गरिमा प्यारे तुम स्वयंमेव तोलिए।
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जीवन को सरसता में जियें तो सही रहे।
अपमान का न घूंट पियें तो सही रहे।
बाकी तो ठीक ठाक रहेगा ये तुम जानो,
हृदय में जलें प्रेम दिये तो सही रहे।

दिनेश अवस्थी फर्रुखाबाद।

पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के रिश्तेदारों सुन लो तुम,
इक दिन पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

कुछ तारे तो इधर बंटे हैं कुछ तारे हैं बंटे उधर,
धरती अम्बर ताक रहे हैं जाएं तो हम जाएं किधर।
बादल दल भी नारों की तख्तियां लेकर घूम रहे,
अपना पानी खुद पियेंगे सूख रहें हैं यहां अधर।
नदी गाँव की चुल्लूभर पानी में मरने वाली है,
इक दिन पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

सूरज ने जब आँख दिखाई तो रातें भी जली यहाँ,
चाँद के मद्धम उजियाले में इक पूनम है पली यहाँ।
अँधियारे मौका पाते ही रूप बदलते है रहते,
अपने दीपक होकर भी हर इक बाती है छली यहाँ।
सुबह यहां पर डरी-डरी खुद सन्ध्या धरने वाली है।
इक दिन पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

नैतिकता दौलत के घर पर खुद बंधक है बनी हुई।
और दौलत मद में होकर अब पापों में है सनी हुई।
सत्ता और गरीबी में हरदम रहता है द्वंद यहां,
कौन है छोटी कौन बड़ी है दोनों में है ठनी हुई।
सुनो द्रोपदी स्वयं यहां पर चीर को हरने वाली है।
इक दिन पूनम मावस से समझौता करने वाली है।

✍🏻 नरेंद्रपाल जैन।
9785205694

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