Author Archives: vmwteam

राम पर लिखना कठिन हैं….

पहले उसे छला गया । फिर वो वन चला गया ।।
एक वचन की लाज रखने । भाई के सर ताज रखने।।
माँ की ममता छोड़ कर । सारे बंधन तोड़ कर।।
राम पर लिखना कठिन है ।।


न थी लालसा वैभव की । न थी सत्ता की पिपासा ।। रखा ठोकर पर सिंहासन । और दी
पिता को दिलासा ।।
जानते थे वे प्रभु है । और वैभव सारे लघु है।।
सोचो तुम तनिक ये । अवतार लेकर मानव में ।।
आम रहना कितना कठिन है । राम पर लिखना कठिन है ।।

सूखा सकते थे वे सागर। फिर भी उन्होंने हाथ जोड़े।।
जीत लेते लंका को । फिर भी वानर साथ जोड़े।।

राम हो जब दुख ही देखो । सोच कर तुम ख़ुद ही देखो।।
पास हो जब सारी शक्ति। और जिसकी होती हो भक्ति।।
काम करना कितना कठिन है। राम पर लिखना कठिन है ।।
राम पर लिखना कठिन है ।।

Anshu Pathak

पराया हमें वो बताने लगे हैं

इशारे से सब कुछ जताने लगे हैं
मुझे अपना अब वो बनाने लगे हैं।

उठाया है मैने जिन्हें ज़िन्दगी भर,
वही आज मुझको गिराने लगे हैं।

बताते थे ख़ुद कभी यार जो कल
वही आज मुझको बेगाने लगे हैं।

रहेंगे सदा साथ कहते थे जो कल
वही आँख मुझसे चुराने लगे हैं।

न रखते थे नज़रों से ओझल कभी जो
वही आज मुझको भुलाने लगे हैं।

बनाया था हमने जिसे दिल से अपना,
पराया हमें वो बताने लगे हैं।

बसाया था हमने जिसे अपने दिल में,
वही आज नश्तर चुभाने लगे हैं।

अनुज शुक्ल
VMW Team

चांद अपनी चांदनी की रंगतों से डर गया

दिल हमारा जब तुम्हारी चाहतों से भर गया ।
चांद अपनी चांदनी की रंगतों से डर गया ।।

तेरी यादों में मेरे दिन रात कटते थे मगर।
मेरी नजरों में मेरे महबूब अब तू मर गया।।

आंख में पानी है होंठों पर मचलता है सवाल।
तुझसे पूछुं क्या तेरा एहसास इतना मर गया।।

मेरे चारों सिम्त सन्नाटों का इतना शोर है।
मेरा कमरा चीख के लम्हों से पल में भर गया।।

इन्तज़ार -ऐ-यार करना मेरी मजबूरी हुआ।
मैं अभी आता हूं ऐसा बोल कर दिलबर गया।।.

अलविदा कहकर गया वो फिर भी मेरे साथ है।
कैसे कह दूं दिल सजन की चाहतों से भर गया ।।

रात ढलकर सुबह आई कल्पना सपने धुले।
घर से निकली तो सफर में याद का लश्कर गया।।

“कल्पना गागडा़” शिमला, हिमाचल प्रदेश ।

कोरोना पर कुछ दोहे द्वारा सरिता कोहिनूर

कोरोना की फैलती,बीमारी घर द्वार।
महमारी भारी हुई,कहता अब संसार।।

काल भंयकर आ गया,भज लो प्रभू का नाम।
कोरोना का हो गया,विश्व बड़ा अब धाम।।

छूने से यह फैलता,खाँसी छींक जुकाम।
श्वसन तंत्र को फेल कर,मृत्यु लाय तमाम।

विचलित मानव सभ्यता,जीवन के आधार।
कोरोना का डर बुरा,घबराया संसार।।

अर्थव्यवस्था ठप्प है,ठप्प हुये सब काम।
मंदिर मस्जिद बंद है,घर में बंद अवाम।।

शेयर सभी लुटक गये,बंद हुये व्यापार।
भारी क्षती के दिख रहे,हम सबको आसार।।

त्राही त्राही मच गई, हुई प्रकृति की मार।
भैया अब तो बंद कर,सारे अत्याचार।।

साबुन से अब हाथ धो,कुछ मत छूना यार।
कहना यदि तुम मान लो,बचा रहे आधार।।

महमारी से जूझते,बूढे, बाल, जवान।
दूषित पानी अरु हवा,है विष वेल समान।।

कालेज इस्कूल बंद सब,और सिनेमा हाल।
सभागार सब बंद है,बंद हुये सब माल।।

सैर सपाटा बंद कर ,घर चुप बैठें लोग।
रूखी सूखी जो मिले,शांत लगाये भोग।।

कोरोना से हो रहा ,महा भयंकर नाश।
मानव मूरख खुद बना,करके जगत विनाश।।

सरिता कोहिनूर 💎

जन्मदिन कैसे मनाएं

किसी का जन्मदिवस मनाते समय, विशेषकर बच्चों का, यह प्रयास करना चाहिए कि मोमबत्ती की जगह मिट्टी के दीपक रखे जाएं और वो दीपक फूँक मार के बुझाया न जाये बल्कि बच्चे से ही उस दीपक को जलाने के लिए कहा जाए। कार्यक्रम पूरा होने पर दीपक में तेल/घी डालकर पूजा के कमरे/स्थान पर रखें और स्वाभाविक रूप से वो तेल/घी खत्म होने के बाद बुझ जाएगा। ऐसा नही की मेरा विचार वर्तमान आयोजनों के विरुद्ध है। यदि केक काट कर खाना है तो जरूर खाइए क्योंकि केक की जगह मिठाई या रसगुल्ला भी बिना काटे या तोड़े खाना संभव नही, परन्तु अपने बच्चे या कुटुंब के किसी सदस्य के नाम पर तुरंत जलाए हुए दीपक को उसी से फूंक मारकर बुझवा देना, धर्म तो छोड़िए विज्ञान या समाज की दृष्टि से भी अव्यवहारिक लगता है। एक बार इसी विमर्श पर किसी मित्र ने कहा कि यदि आप 20 मोमबत्ती बुझाते हैं तो उसका अर्थ ये है कि आप की आयु से 20 वर्ष कम हो गये या बुझ गए। यह एक कांसेप्ट जरूर हो सकता है परंतु मेरा मानना है कि 20 दीपक जला के यह भी कहा जा सकता है कि मैंने अपने जीवन के 20 साल आस-पास,समाज, परिवेश और देश को अपने स्तर से अपने हिस्से का उजाला देने का प्रयास किया है।
व्यक्तिगत विचार है जरूरी नही की हर कोई सहमत हो परंतु यदि अच्छा लगे तो इसे जरूर अपनाने का प्रयास करें।

आशुतोष की कलम से

यह दुनिया दीवानों की है

सरल धुनों पर तानों की है
भजनों,गीतों, गानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

बालकपन में हर बालक का
मनोभाव सच्चा लगता है
द्वेष- झूठ से बचे रहो तो
युवाकाल बच्चा लगता है
सस्ती मस्ती बहुत बुरी है
पर अच्छी मस्तानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

घर में रहें घरेलू बनकर
बाहर सबकुछ अनजाना है
रिश्तों का बंधन पूरा है
चाहे कम आना जाना है
अपनों में घुस गए पराये
भीड़ बढ़ी बेगानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

अपना अपना पात्र निभाने
हर कोई जग में आता है
उसमें ही खुश रहना होगा
जैसा, जहाँ मिला खाता है
चार दिनों की सबकी रौनक
खातिर सी मेहमानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

यहाँ बहुत चर्चे हैं उनके
जो परचों में छप जाते हैं
लेकिन बढ़ जाते हैं खर्चे
कभी-कभी जब नप जाते हैं
कहीं चित्त भी पट्ट उन्हीं की
गिरते चारों खानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

एकमात्र संदेश प्रेम का
द्वेष जगत आधार नहीं है
जो तुमने कुछ दिया न इसको
लेने का अधिकार नहीं है
सुन्दर पुष्पों की बगिया को
मत कह तीर कमानों की है
रे मन! तू दीवाना बन जा
यह दुनिया दीवानों की है

अमर अद्वितीय

आदमी इंसान बन जाए

काश आदमी इंसान बन जाये
मजहब सब का ईमान बन जाये ,

दैरो हरम सब मोहब्बत के हो
मोहब्बत पूजा अजान बन जाये ,

न अदावत हो भाई की भाई से
वो इस की ये उस की जान बन जाये ,

कर हिदायत अमीरे शहर को खुदा
कि मुफलिस पर मेहरबान बन जाये ,

रहे दिल में उस के हर पल फकीरी
चाहे मुल्क का सुल्तान बन जाये ,

जमीर जिन्दा रहे निगहे बान का
न वतन का वो बेईमान बन जाये ,

अगर ‘राकेश’ ये हो जाये वतन में
तो जन्नत हिंदुस्तान बन जाये ,
🎊🌷राकेश कुमार मिश्रा🌷🎊

« Older Entries